सत्य का अनुसरण कैसे करें (17) भाग एक

उत्पत्तियों के आधार पर लोगों की तीन श्रेणियाँ

मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की विशेषताएँ

II. उचित-अनुचित का भेद पहचानना और यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत

क. उचित-अनुचित का भेद पहचानना

पिछली बार हमने मनुष्यों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की अभिव्यक्तियों और विशेषताओं पर संगति की थी—अर्थात उनमें जमीर और विवेक होता है और वे उचित-अनुचित का भेद पहचान सकते हैं और जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। आज हम पिछली बार के विषय पर संगति जारी रखेंगे। आओ, उससे पहले मैं तुम्हें एक कहानी सुनाऊँ। कुछ साल पहले मैंने एक घटना के बारे में सुना था। एक सुंदर युवती स्क्रीन टेस्ट दे रही थी और किसी ने यूँ ही कह दिया, “तुम्हारी टाँगें काफी मोटी हैं!” उस युवती ने मन ही मन सोचा, “यह कहकर कि मेरी टाँगें मोटी हैं, क्या तुम यह नहीं कह रहे कि मैं मोटी हूँ? अगर मैं मोटी हूँ, तो क्या मैं कैमरे पर अच्छी दिखूँगी? क्या यह लज्जास्पद नहीं होगा?” तो वह विचार करने लगी कि कैसे वह अपनी टाँगों का मोटापा कम कर सकती है ताकि वह कैमरे पर छरहरी और सुंदर दिखाई दे। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उसने हर तरह की जानकारी जुटाने में खुद को झोंक दिया और वजन कम करने के कई तरीके आजमाए, जैसे कि पूरे भोजन के बजाय सिर्फ डाइट फूड खाना या रोजाना सिर्फ फल और सब्जियाँ खाना—संक्षेप में, उसने वही खाया जो वजन कम करने में मदद कर सकता था। उसने सुना कि कॉफी पीना वजन कम करने का एक तेज और कारगर उपाय है, इसलिए कभी-कभी वह सिर्फ कॉफी पीती। कुछ लोगों ने कहा कि कम सोने से वजन जल्दी कम होता है, इसलिए वह रोज सिर्फ दो-तीन घंटे ही सोती। काफी जद्दोजहद और कोशिशों के बाद उसे वाकई नतीजे दिखे। उसका वजन कम हो गया, वह छरहरी हो गई और उसकी टाँगें पतली हो गईं। वह देखने में तो अच्छी और आकर्षक लगने लगी, लेकिन शारीरिक रूप से उसमें कुछ बुरी प्रतिक्रियाएँ होने लगीं। कौन-सी बुरी प्रतिक्रियाएँ? उसे अक्सर चक्कर आ जाते और सिर भारी रहता और दिन में अपना कर्तव्य निभाते हुए वह हमेशा सुस्त रहती। खड़े होने पर वह लड़खड़ा जाती और बैठे रहने पर पूरे शरीर में कमजोरी महसूस करती। उसे दिन गुजारना भारी हो जाता और बहुत ज्यादा शारीरिक पीड़ा होती। क्या ज्यादातर लोग इस युवती की वर्तमान स्थिति के बारे में जानने के इच्छुक हैं और क्या वह अभी भी जिंदा और स्वस्थ है? क्या तुम लोग वजन कम करने के बारे में उसके अनुभव और विचार सुनना चाहते हो? (नहीं।) इस दुनिया में रहते हुए लोग नहीं जानते कि सही तरह से और नियमितता के साथ कैसे जिएँ, जिन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से उनका सामना होता है उनके साथ कैसे पेश आएँ। जब वे कोई टिप्पणी सुनते हैं या किसी घटना का अनुभव करते हैं तो वे नहीं जानते कि कौन-सा तरीका उसके साथ पेश आने के लिए उचित है और उन्हें नुकसान से बचा सकता है ताकि वे वास्तव में सही और गरिमापूर्ण तरीके से जिएँ। गैर-विश्वासियों की तो बात ही छोड़ दो, ज्यादातर विश्वासी भी इन चीजों से अनजान हैं। बाहरी दुनिया से आने वाली सूचनाओं और समाचारों, और साथ ही विभिन्न विचारों, दृष्टिकोणों, विधर्मों और भ्रांतियों का सामना करने पर लोगों में उनका भेद पहचानने की कोई क्षमता नहीं होती और न ही उनसे बचाव करने की कोई क्षमता होती है। बेशक, उनमें सही विचार और दृष्टिकोण भी नहीं होते, उनके साथ सकारात्मक परिप्रेक्ष्य से पेश आने का सही तरीका अपनाना तो दूर की बात है। इसलिए लोग बहुत दयनीय ढंग से जीते हैं। उस युवती को ही लो जिसका मैंने अभी जिक्र किया। मुझे बताओ, क्या उसका जीवन थकाऊ है? क्या वह दयनीय है? (वह दयनीय है।) वह दयनीय क्यों है? ऐसा करके उसने कहाँ गलती की? क्या सभी लोग सुंदर होने और इज्जतदार ढंग से जीने का प्रयास नहीं करते? क्या यह चाहना गलत है कि दूसरे तुम्हें पसंद करें और मिलने पर तुम्हारी प्रशंसा और सराहना करें? तुम लोग इस मामले को कैसे देखते हो? (बाहरी सुंदरता और प्रशंसा पाने के लिए उसने जो किया वह अपने शरीर को नुकसान पहुँचाना था। चूँकि उसने परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों का पालन नहीं किया, इसलिए अंततः उसके सभी शारीरिक प्रकार्य बिगड़ गए। उसे चक्कर आना और सिर भारी होना ऐसे नतीजे थे जो उसने खुद पैदा किए थे। मुझे लगता है कि यह स्त्री भ्रमित है।) क्या यही मामला है? (हाँ।) लोग अपनी थोड़ी-सी इंसानी बुद्धिमत्ता, चतुराई और विचारों के साथ पैदा होते हैं। फिर वे कुछ ज्ञान अर्जित करते हैं, कुछ कौशल प्राप्त करते हैं और एक अच्छे व्यक्ति जैसा दिखने के बारे में थोड़ा-बहुत सीखते हैं। क्या ये चीजें बाहरी दुनिया से आने वाले विभिन्न विचारों, दृष्टिकोणों, विधर्मों और भ्रांतियों, और विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं? क्या ये तुम्हें इन चीजों का सही ढंग से सामना करने में सक्षम बना सकती हैं? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। जब लोग सत्य नहीं समझते तो ऐसे ही दयनीय और त्रासद हो जाते हैं; अंततः इसके कई भयानक परिणाम होते हैं। उनमें बाहरी दुनिया के किसी भी विधर्म और भ्रांति या विचार और दृष्टिकोण का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, न ही अपने सामने आने वाले लोगों, घटनाओं और चीजों की बात आने पर वे सही विचार और दृष्टिकोण रखते हैं। जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो वे भ्रमित हो जाते हैं और उनकी मूर्खता अनगिनत रूपों में प्रकट होती है। जब उनके साथ कुछ नहीं घटता तो वे कुछ धर्म-सिद्धांत समझते प्रतीत होते हैं और कुछ मनुष्य जैसे लगते हैं, लेकिन जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो कहानी अलग होती है—उनके दिलों के विकृत, कुरूप, बेतुके विचार और दृष्टिकोण प्रकट हो जाते हैं। जब बात सचमुच आचरण की, जीवित रहने की या जीवन में किसी खास विचार या दृष्टिकोण की भी आती है तो लोग बहुत अज्ञानी और मूढ़ होते हैं और उनके रवैये और दृष्टिकोण बहुत बेतुके होते हैं। तो, बहुत-से लोग कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, कई वर्षों से धर्मोपदेश सुन रहे हैं और अपने कर्तव्य भी निभा रहे हैं और उन्होंने कभी जानबूझकर ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे गड़बड़ियाँ या विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न होती हों, न ही उन्होंने जानबूझकर ऐसे शब्द कहे हैं जो परमेश्वर का विरोध या ईशनिंदा करते हों—बाहरी तौर पर उनमें कोई दोष नहीं पाया जा सकता, लेकिन जब बाहरी दुनिया के विभिन्न गलत विचारों और दृष्टिकोणों, विशेष रूप से कुछ अपेक्षाकृत लोकप्रिय विचारों और दृष्टिकोणों से उनका सामना होता है तो अपने दिलों की गहराई में वे उनसे घृणा नहीं करते, न ही वे उनका प्रतिरोध करते हैं या उन्हें अस्वीकार करते हैं बल्कि उनके प्रति अनुराग और अनुमोदन महसूस करते हैं और जैसे ही कोई उपयुक्त परिवेश या अवसर आता है, वे अनजाने ही इन चीजों को स्वीकार लेते हैं और उन्हें अपने जीवन में लागू कर लेते हैं। क्या वह युवती जिसका पहले जिक्र किया गया है, इसका एक बहुत ही स्पष्ट उदाहरण नहीं है? (हाँ।) क्या यह दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुगमन करने का एक तरीका है? (हाँ।) उसने सिर्फ उनका अनुगमन ही नहीं किया—उसने उन्हें पूरी तरह से लागू किया। क्या दुनिया आज सेक्सी, आकर्षक, छरहरी और सुंदर देहयष्टि वाली होने की वकालत नहीं करती? ये विचार हर उद्योग में, लोगों के हर समूह में, यहाँ तक कि आस्था रखने वाले लोगों में भी लोकप्रिय हैं। कुछ वृद्ध महिलाएँ थीं जो प्रभु में विश्वास करती थीं और औसतन 60 से ज्यादा उम्र की होने के बावजूद वे इस बात के लिए एक-दूसरे से होड़ करती थीं कि कौन ज्यादा अच्छी लग रही है। उन्होंने अपनी बगल में बैठी एक युवती से पूछा, “तुम्हारी राय में हममें से कौन इस पोशाक में सबसे अच्छी लगती है?” लड़की ने जवाब दिया, “तुम सभी लड़कियाँ इसमें सुंदर लग रही हो!” हालाँकि वे साठ से ज्यादा उम्र की थीं, फिर भी उन्हें “लड़कियाँ” कहा जाना जरूरी था; वे “महिलाएँ” कहलाने को तैयार नहीं थीं और इससे खुश भी नहीं थीं। उनकी पीठ पीछे वह लड़की दूसरों से कहती थी, “वे साठ से ज्यादा उम्र की हैं; वे अब भी कितनी अच्छी दिख सकती हैं?” लेकिन वृद्ध महिलाओं का यह समूह अभी भी इसमें आनंद ले रहा था। क्या उन्हें जरा भी शर्म थी? (नहीं।) वे इतने सालों से प्रभु में विश्वास कर रही थीं, फिर भी उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती थीं। क्या उनकी मानवता असामान्य नहीं है? जब लोगों में जमीर और विवेक नहीं होता, तब वे कई बेतुकी चीजें कर सकते हैं, कई ऐसी चीजें जो लोगों को अवमाननाप्रद और घिनौनी लगती हैं, और कई ऐसी चीजें जो उनका नीच चरित्र प्रकट करती हैं। ऐसा क्यों है कि बहुत-से लोग दुष्ट प्रवृत्तियों का भेद नहीं पहचानते और उनमें उनसे बचाव करने की कोई क्षमता नहीं होती, और नतीजतन वे उनसे गुमराह और प्रभावित होकर उनके साथ बह जाते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और लेश मात्र भी सत्य नहीं समझते। चाहे उनके साथ कुछ भी घटित हो, वे उसकी असलियत नहीं जान सकते, और जैसे ही वे किसी प्रलोभन का सामना करते हैं, वैसे ही वे बेनकाब हो जाते हैं और उस प्रलोभन में फँस जाते हैं। देखो, आज समाज के सभी वर्गों में क्या पढ़ाया जा रहा है और क्या लोकप्रिय है। एक रेडियो रिपोर्टर ने एक छोटे बच्चे का साक्षात्कार लिया और उससे पूछा, “तुम्हारा पसंदीदा बाल-गीत कौन-सा है?” लड़के ने अपना सिर खुजाया और कहा, “‘चाँद मेरा दिल।’” जिन लोगों ने यह सुना, उन्हें समझ नहीं आया कि हँसें या रोएँ। उन्हें क्यों समझ नहीं आया कि हँसें या रोएँ? क्या यह एक बाल-गीत है? (नहीं, यह एक प्रेम-गीत है।) यह एक प्रेम-गीत है, लेकिन बच्चे ने गलती से इसे बाल-गीत समझ लिया। इस घटना से हम समझ सकते हैं कि समाज में क्या लोकप्रिय है। यह समाज में व्याप्त दुष्ट प्रवृत्तियों की परिघटनाओं में से एक है और बुजुर्गों और बच्चों दोनों को ही इन प्रवृत्तियों से गहरा नुकसान पहुँचता है और वे इनमें गहरे धँस जाते हैं। परमेश्वर का अनुगमन करने वालों में आश्चर्यजनक रूप से ऐसे बहुत-से लोग हैं जो इन प्रवृत्तियों का अनुगमन करते हैं और इन प्रवृत्तियों द्वारा समर्थित विचार खुद पर लागू भी करते हैं। और अंत में क्या होता है? इसके अच्छे नतीजे निकलते हैं या बुरे? (बुरे।) इसके बुरे नतीजे निकलते हैं—दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुगमन करने से यही होता है। लोग अपने देह की यौन इच्छाओं में, दैहिक भावनाओं में और खाने-पीने और मौज-मस्ती में फँस जाते हैं, भोग-विलास की धुंध में जीते हैं। उनके पास कोई सही विचार या दृष्टिकोण नहीं होता और अस्तित्व के प्रति कोई सही रवैया नहीं होता जिससे वे जीवन का सामना कर सकें। वे बिना किसी जागरूकता के इसी अवस्था में जीते हैं और इसका प्रतिरोध करने में अशक्त होते हैं। अंत में, वे गहरे और गहरे धँसते जाते हैं और इससे खुद को बाहर निकालने में असमर्थ रहते हैं। और अंतिम परिणाम क्या होता है? वे शैतान द्वारा पूरी तरह से निगल लिए जाते हैं, उसका भोजन बन जाते हैं।

मानवजाति के बीच रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए, अगर तुम यह भेद नहीं पहचानते कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं तो इस अराजक दुनिया में, इस जटिल इंसानी दुनिया में तुम्हारे लिए जीवन के सही विचारों और दृष्टिकोणों पर कायम रहना बहुत कठिन होगा और जीवन में उस सही मार्ग पर कायम रहना बहुत कठिन होगा जिसके लिए तुम लालायित रहते हो; तुम्हें कभी पता नहीं चलेगा कि कब तुम कोई खास वक्तव्य सुनकर या किसी खास घटना का सामना करके अनायास ही दुष्ट प्रवृत्तियों के साथ बह जाओगे। अगर लोगों में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता न हो तो वे अपने जीवन का प्रबंधन भी ठीक से नहीं कर सकते, जीवित रहने के मार्ग पर आने वाले सही-गलत के विभिन्न प्रमुख मुद्दों की तो बात ही छोड़ दो जिनसे निपटना उनके लिए और भी कठिन होता है। अगर लोग यह नहीं समझते कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं तो वे नहीं जान पाएँगे कि अपने जीवन का प्रबंधन कैसे करें और उनके पास सही जीवनशैली नहीं होगी। अगर वे स्वस्थ जीवन के बारे में विभिन्न प्रकार की जानकारी देखते हैं तो वे यह नहीं जान पाएँगे कि उनका भेद कैसे पहचाना जाए या किसे स्वीकार किया जाए और किसे अस्वीकार किया जाए, सही, सकारात्मक कथन कैसे आत्मसात किए जाएँ या गलत कथन कैसे अस्वीकार किए जाएँ। यह तक कहा जा सकता है कि ऐसे लोग अपने शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा भी नहीं कर सकते। कुछ लोग एक अति से दूसरी अति पर चले जाते हैं, जबकि कुछ लोग लगातार एक ही अति पर जीते रहते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग सुनते हैं : “खूब सारे फल खाना स्वास्थ्यवर्धक होता है। इससे विटामिन मिलते हैं और तुम्हारी त्वचा नम और मुलायम बनती है, जिससे तुम सभी के प्रिय बन जाते हो।” तो वे इस पर यकीन कर लेते हैं और जितने भी फल मिल जाएँ, खाना शुरू कर देते हैं और खान-पान की असामान्य आदतें अपना लेते हैं। कुछ समय बाद वे लगातार अस्वस्थ महसूस करते हैं और अस्पताल में जाँच से पता चलता है कि उनके रक्त में शर्करा बढ़ गई है। वे हैरान हो जाते हैं : “मैं आम तौर पर काफी स्वस्थ भोजन करता हूँ, फिर मेरे रक्त में शर्करा बढ़ क्यों गई? दूसरों ने कहा था कि ढेर सारे फल खाने से विटामिन मिलते हैं, फिर मैं इस कथन का पालन करके और ढेर सारे फल खाकर गलत कैसे हो सकता हूँ?” डॉक्टर कहता है, “फलों में विटामिन तो होते हैं, लेकिन उनमें चीनी की मात्रा ज्यादा होती है। वे मुख्य खाद्य पदार्थों की जगह नहीं ले सकते और उन्हें पूरे भोजन की तरह नहीं खाया जा सकता। तुम उन्हें कम मात्रा में या किफायत से ही खा सकते हो। अगर तुम उन्हें बिल्कुल न खाओ तो भी तुममें पोषक तत्त्वों की कमी नहीं होगी, क्योंकि अनाज और सब्जियों में ये सभी पोषक तत्त्व पहले से मौजूद रहते हैं।” डॉक्टर का कथन उचित है। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि उनकी जीवनशैली समस्याग्रस्त है? (हाँ।) यह ठीक उसी प्रकार की गलती है जिसे कुछ लोग करते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि यह गलती उन्हें करनी चाहिए? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं की, भले ही मेरे रक्त में शर्करा अधिक है।” तुम इस कथन के बारे में क्या सोचते हो? क्या यह तर्कहीन नहीं है? क्या तुम्हारे रक्त में शर्करा बढ़ने का परमेश्वर से कोई लेना-देना है? क्या इसके जिम्मेदार तुम खुद नहीं हो? तुम लापरवाही से और बिना सिद्धांतों के खाते हो। तुम्हें लगता है कि फल स्वादिष्ट होते हैं इसलिए तुम उन्हें खाना बंद नहीं कर सकते, या तुम्हें मांस स्वादिष्ट लगता है इसलिए तुम कोई सब्जी नहीं खाते, बिल्कुल भी संयम नहीं दिखाते, और नतीजतन तुम्हें बीमारियाँ हो जाती हैं। क्या इसकी वजह तुम खुद नहीं हो? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के बारे में शिकायत न करने से, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम नेक हो, परमेश्वर से प्रेम करते हो, शुद्ध हो? दरअसल, कुछ बीमारियाँ तुम्हारी अपनी वजह से होती हैं और उनका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होता और वे तुम्हारी अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण होती हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं, “अंडे, मांस और डेरी-उत्पाद पौष्टिक होते हैं और तुम्हारे प्रोटीन-सेवन की पूर्ति कर सकते हैं। चावल और आटे में पोषक तत्त्व कम होते हैं, इसलिए व्यक्ति को ज्यादा मांस, अंडे और डेरी-उत्पाद खाने चाहिए।” यह सुनकर कुछ लोग कहते हैं, “मुझे मांस खाना बहुत पसंद है। चूँकि ऐसा कहा जाता है कि मांस पौष्टिक होता है, इसलिए मैं इसे ज्यादा खाऊँगा। दूसरे लोग दिन में 4 ग्राम खाते हैं, लेकिन मैं कम से कम दो बार के भोजन में प्रति भोजन आधा किलो खाऊँगा!” वे इस तरह असंयमित होकर खाते हैं, ज्यादा और ज्यादा खाते हैं, रोज दूसरों से दो-तीन गुना ज्यादा खाते हैं और देर रात में नाश्ता भी खाते हैं। समय के साथ उनके पेट की क्षमता बढ़ने लगती है और पेट की क्षमता जितनी ज्यादा होती है, भूख भी उतनी ही ज्यादा लगती है। अंत में क्या होता है? वे बीमार होने की हद तक खाते हैं, उनका वजन बढ़ जाता है और उन्हें हमेशा नींद आती रहती है और वे सुस्त महसूस करते हैं। उनके पास जाँच के लिए अस्पताल जाने के अलावा कोई चारा नहीं रहता और जाँच के नतीजे बताते हैं कि उन्हें उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त-शर्करा और उच्च रक्त-वसा है। वे विचार करते हैं, “क्या बात सिर्फ इतनी नहीं है कि मैं रोजाना मांस के कुछ निवाले ज्यादा खाता था? क्या लोगों ने यह नहीं कहा था कि ज्यादा मांस खाना शरीर के लिए अच्छा है और इससे व्यक्ति कुपोषण से बच सकता है? तो फिर मुझसे कहाँ गलती हुई? मेरा रक्तचाप उच्च क्यों है? मेरे इस बूढ़े शरीर का ध्यान रखना कितना मुश्किल है! मैं मांस के कुछ अतिरिक्त निवाले भी नहीं खा सकता!” तुम हर भोजन में आधा किलो मांस खाते हो—क्या यह वाकई कुछ और निवाले मात्र हैं? और तुम आम तौर पर बहुत देर तक बैठते हो और व्यायाम नहीं करते, फिर भी तुम इतना खाते हो। अंत में तुम्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो जाती हैं और तुम अपने दिल में बेचैनी महसूस करने लगते हो। वे यहाँ तक सोचते हैं, “यह परमेश्वर द्वारा मेरा शोधन करना है। यह कुछ नहीं है, मैं समय के साथ ठीक हो जाऊँगा। मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करूँगा!” तुम्हें परमेश्वर के बारे में शिकायत करने का क्या अधिकार है? क्या तुम्हारी बीमारी परमेश्वर द्वारा तुम्हारा शोधन करने का तरीका है या इसकी वजह तुम खुद हो? तुम मांस खाने से मोटे और बीमार हो जाते हो और सोचते हो कि यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा शोधन करना है और परमेश्वर तुम्हारी आस्था की परीक्षा ले रहा है। क्या परमेश्वर इस तरह तुम्हारा शोधन करेगा? (नहीं।) तो इस नतीजे की वजह क्या थी? (इसकी वजह इंसानी मूर्खता थी।) खुद लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे नहीं जानते कि अपने जीवन का प्रबंधन कैसे करें, वे नहीं समझते कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, वे नहीं जानते कि अपने भौतिक जीवन के साथ सही तरीके से कैसे पेश आएँ, वे नहीं जानते कि परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के लिए स्थापित जीवित रहने के नियमों का पालन कैसे करें और वे नहीं जानते कि विभिन्न जन्मजात शारीरिक स्थितियों के नियमों का पालन कैसे करें। वे हमेशा मूर्खतापूर्ण और बेतुके अभ्यासों में लगे रहते हैं, परमेश्वर के बारे में हमेशा धारणाओं और कल्पनाओं से भरे रहते हैं और उनमें असंयमित इच्छाओं की कोई कमी नहीं होती। अंत में क्या होता है? वे हमेशा रास्ता भटक जाते हैं, हमेशा गलतियाँ करते हैं और परमेश्वर को लगातार गलत समझते हैं। क्या यह बहुत ही तकलीफदेह मामला नहीं है? (हाँ, है।)

देह और भौतिक संसार में रहते हुए लोग बहुत सारी जानकारी, बहुत सारे विचारों और दृष्टिकोणों, और साथ ही बहुत सारे विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों के संपर्क में आएँगे। अगर वे यह भेद पहचानना नहीं जानते कि विभिन्न लोग, घटनाएँ और चीजें सकारात्मक हैं या नकारात्मक, यह नहीं जानते कि क्या स्वीकारें और क्या नकारें, सकारात्मक चीजों पर कायम रहना नहीं जानते और नहीं जानते कि वे सही क्यों हैं, और नकारात्मक चीजों को अस्वीकार करना नहीं जानते—इन चीजों के नकारात्मक सार से वाकिफ होना तो दूर की बात है—क्या इस तरह जीना बहुत खतरनाक नहीं है? (है।) यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्हें किसी भी समय अपनी जान गँवाने का खतरा है। लोग अपने भौतिक जीवन और स्वास्थ्य जैसे साधारण मामलों का भी ठीक से प्रबंधन नहीं कर सकते; अपनी चिंता करने के लिए उन्हें दूसरों की जरूरत पड़ती है, उन्हें परमेश्वर की जरूरत पड़ती है कि वह उनकी सुरक्षा और निगरानी करे, वरना वे गलतियाँ करते रहेंगे, या तो एक दिशा में बहुत दूर तक चले जाएँगे या दूसरी दिशा में बहुत दूर तक चले जाएँगे। समाज की दुष्ट प्रवृत्तियाँ स्वीकार कर कुछ महिलाएँ नतीजों की परवाह किए बिना, खुद को सुंदर बनाने के उपाय खोजने में सिर खपाती हैं। कुछ अंधाधुंध तरीके से परंपरागत चीनी दवाएँ लेती हैं, कुछ अंधाधुंध तरीके से पश्चिमी दवाएँ लेती हैं, कुछ लापरवाही से टॉनिक लेती हैं और कुछ लापरवाही से एक खास तरह का खाना खाती हैं। नतीजतन, उन्हें पेट की समस्याएँ हो जाती हैं और वे आहें भरते हुए और बीमार और कमजोर दिखते हुए दिन बिताती हैं। वे न सिर्फ खुद को सुंदर बनाने में नाकाम रहती हैं, बल्कि देखने में घिनौनी भी लगती हैं। कुछ लोगों की त्वचा काफी अच्छी होती है, लेकिन फिर भी वे संतुष्ट नहीं होते और खुद पर तमाम तरह के सौंदर्य-प्रसाधन पोतने पर जोर देते हैं। एक समय ऐसा आता है जब वे घटिया सौंदर्य-प्रसाधन इस्तेमाल करते हैं और कुरूप होकर रह जाते हैं, उनके पूरे चेहरे पर दाग-धब्बे पड़ जाते हैं और पूरा चेहरा बदरंग हो जाता है और देखने में डरावना लगता है। कुछ लोग सौंदर्य-उपचार और प्लास्टिक-सर्जरी दोनों करवाते हैं—उनमें से कुछ अपनी नाक की हड्डी ऊँची करवाने की कोशिश करते हैं, लेकिन न सिर्फ उसे ऊँची करवाने में विफल रहते हैं, बल्कि उसे विकृत बना डालते हैं, और कुछ लोग ठुड्डी में फिलर लगवाते हैं जो गलत हो जाता है और जब भी वे मुस्कुराते या जम्हाई लेते हैं तो हास्यास्पद लगते हैं, जिससे उन्हें कभी इनमें से कुछ भी करने से डर लगता है—यह बहुत दुखद है, यह जीने का कितना थकाऊ तरीका है! क्या वे ऐसा करके अपने लिए मुसीबत खड़ी नहीं कर रहे हैं? अपने कद से असंतुष्ट कुछ महिलाएँ अपने पैरों का निचला हिस्सा तुड़वा लेती हैं और फिर उन्हें जोड़कर लंबा करवाती हैं, लेकिन प्रक्रिया गलत हो जाती है जिससे उनके पैर, जो पहले बिल्कुल ठीक थे, अपंग हो जाते हैं। क्या यह त्रासद नहीं है? (है।) तमाम तरह के खराब नतीजे निकले हैं—ऐसे लोगों का नतीजा कभी अच्छा नहीं होता। दुष्ट प्रवृत्तियों द्वारा समर्थित कोई भी विचार या दृष्टिकोण भ्रामक और दुष्ट होता है, यह वाकई बेहद हानिकारक है। जिस स्वादिष्ट भोजन और सौंदर्य अभ्यासों का वे समर्थन करती हैं, वे वास्तव में अच्छे नहीं होते; वे सब दुष्ट होते हैं और अंततः लोगों को नुकसान पहुँचाते और फँसाते हैं। ये अज्ञानी महिलाएँ यह नुकसान सहने को तैयार रहती हैं और उनमें इन दुष्ट विचारों और दृष्टिकोणों से बचाव करने की कोई क्षमता नहीं होती। वे वही खाती हैं जो उनसे खाने को कहा जाता है और वही करती हैं जो उनसे करने को कहा जाता है, जरा भी चीजों का भेद नहीं पहचानतीं, बस आँख मूँदकर पीछे चलती हैं। वे कितनी आज्ञाकारी हैं! और आखिर में क्या होता है? उनमें से शायद ही किसी को अच्छा नतीजा मिलता है। जब तक उन्हें बीच रास्ते में ही अपनी गलती का एहसास नहीं होता और वे अपना नुकसान कम करने के लिए सही समय पर पीछे नहीं मुड़तीं, अगर वे इन दुष्ट प्रवृत्तियों का अनुगमन करती रहती हैं और इन दुष्ट विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारती रहती हैं, तो अंततः वे उत्तरोत्तर विकृत होती जाएँगी, अच्छे और बुरे में भेद करने में उत्तरोत्तर असमर्थ होती जाएँगी और रूप-रंग में उत्तरोत्तर दानवों जैसी होती जाएँगी, मनुष्य जैसी नहीं रह जाएँगी। यह कहा जा सकता है कि निन्यानवे प्रतिशत लोग सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद नहीं पहचानते और स्वेच्छा से दुष्ट प्रवृत्तियाँ स्वीकार लेते हैं। जब महिलाएँ साथ मिलकर कपड़े खरीद रही होती हैं तो देखो वे क्या कहती हैं। कुछ महिलाएँ कहती हैं, “यह तुम पर अच्छा नहीं लगता; यह तुम्हारे चेहरे को गोरा नहीं दिखाता और न ही तुम्हारी देहयष्टि का दिखावा करता है। यह किसी का ध्यान नहीं खींचेगा। मेरे खयाल से वह आकर्षक दिखता है और लोगों का ध्यान खींचेगा!” दूसरी महिलाएँ कहती हैं, “यह मोहक नहीं है। तुम्हें थोड़ा शरीर दिखाने की जरूरत है, तुम्हें सेक्सी और नयनाभिराम बनने की जरूरत है—सिर्फ यही काम करेगा। अगर तुम हमेशा इतनी लकीर की फकीर बनी रहोगी तो कोई तुम्हें पसंद नहीं करेगा।” कुछ माएँ तो इस बात पर भी जोर देती हैं कि उनकी बेटियाँ अभिनेत्री बनें। बेटी कहती है, “मनोरंजन उद्योग बहुत गड़बड़ है! मैं अभिनेत्री नहीं बनना चाहती।” तब उसकी माँ उसे डाँटती है : “क्या तुममें कोई महत्वाकांक्षा नहीं है? जैसा तुम्हारा कद, रूप और त्वचा है, तुम्हें बहुत-से कुदरती फायदे मिले हैं! अगर तुम अभिनेत्री बनकर पैसे नहीं कमाओगी, तो हम अपनी बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी करेंगे? अगर तुम मशहूर हो सकती हो और पैसा कमा सकती हो, तो किसी के साथ सोना भी ठीक है। वरना तुम अपने अच्छे नैन-नक्श बर्बाद कर लोगी! हमने तुम्हें इस उम्र तक पाला है और तुम्हारे पिताजी और मैं तुम्हारी सफलता का आनंद लेने का इंतजार करते रहे हैं! अगर हमें इतना भी नहीं दिया गया, तो हमने तुम्हें किस लिए पाला था?” क्या माता-पिता का अपने बच्चों को इस तरह शिक्षित करना सही है? (नहीं।) बच्चों को इस तरह शिक्षित करने के क्या नतीजे होते हैं? (बच्चों को नुकसान होता है।) एक दिन जब ऐसी बच्ची चीजें समझ जाती है और वह इतने ज्यादा दुख और दर्द से गुजर चुकी होती है तो वह अपनी माँ से अनिवार्यतः नफरत करने लगती है और नाराज होने लगती है; वह कहती है, “यह सब तुम्हारा दोष है! तुमने मेरा मार्गदर्शन कर मुझे सही रास्ते पर नहीं चलाया! मैंने कहा था कि मैं अभिनय नहीं करना चाहती, लेकिन तुम जिद पर अड़ी रही। अब देखो मुझे—मैं लगभग चालीस की हो गई हूँ, मैं अभी भी पति नहीं ढूँढ़ सकती और कोई मुझे नहीं चाहता। जो लोग मेरे पीछे पड़े थे, वे बस खिलवाड़ कर रहे थे और कभी मुझसे शादी करने का इरादा नहीं रखते थे। क्या मेरी पूरी जिंदगी बर्बाद नहीं हो गई?” बच्चे बहुत तकलीफ झेलते हैं और माता-पिता दोषी और समस्या की जड़ होते हैं। वे अपने बच्चों को नुकसान पहुँचाते हैं।

अगर परमेश्वर में विश्वास करने वाले भी गैर-विश्वासियों की ही तरह दुष्ट प्रवृत्तियों से खुद को छुड़ाने में असमर्थ रहते हैं, तो यह एक समस्या की ओर संकेत करता है। अगर तुम किसी भी दुष्ट प्रवृत्ति, किसी भी दुष्ट, नकारात्मक कथन या ऐसे विभिन्न अभ्यासों का जिनमें लोग संलग्न रहते हैं, भेद नहीं पहचानते, चाहे वे कुछ भी हों, और तुम उनका अनुगमन भी करते हो और जानबूझकर उन्हें खुद पर आजमाते हो, तो परमेश्वर की नजर में ये सब शर्मिंदगी के प्रतीक हैं। परमेश्वर क्या कहेगा? वह कहेगा कि एक व्यक्ति के रूप में तुममें सही और गलत में अंतर करने की क्षमता नहीं है, तुममें सकारात्मक चीजें स्वीकारने की वास्तविकता नहीं है, और इतना ही नहीं, तुम नकारात्मक चीजों को अस्वीकार करने के क्रियाकलापों और अभ्यासों में संलग्न नहीं हुए हो। वह कहेगा कि तुम इंसान नहीं हो और तुम इंसानी जमीर और विवेक रखने की बुनियादी शर्त पूरी नहीं करते। वह कहेगा कि तुम इंसान नहीं हो और राज्य तुम्हें स्वीकार नहीं करेगा। अगर तुम इंसान नहीं हो तो तुम्हारे लिए सत्य स्वीकारना असंभव है, क्योंकि अपने दिल में तुम व्यक्तिपरक ढंग से जिन्हें स्वीकारने के इच्छुक हो, वे सब शैतान की दुष्ट चीजें हैं, और तुम्हारा दिल सकारात्मक चीजों का पूर्णतः प्रतिरोध करता है, उनका विरोध करता है और उन्हें अस्वीकार करता है; तुम्हारा उनके प्रति कभी स्वीकृति का रवैया नहीं रहा। इसलिए परमेश्वर कहता है कि तुम मानव नहीं हो, तुममें मानवता नहीं है। परमेश्वर मानवता रहित लोगों को नहीं चाहता। यह मत सोचना, “अगर परमेश्वर मुझे स्वीकार नहीं करता, तो मैं परमेश्वर को प्रभावित करने और अपने प्रति उसका रवैया बदलने के लिए थोड़ा और कष्ट सह लूँगा और थोड़ी और कीमत चुका दूँगा।” परमेश्वर चीजें करने का कोई निश्चित तरीका नहीं चाहता; परमेश्वर चाहता है कि तुममें अपने दिल की गहराई से सत्य स्वीकारने का रवैया हो और साथ ही सत्य स्वीकारने की वास्तविकता और सत्य का अभ्यास करने का प्रमाण हो। तुम्हें ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसमें वास्तव में मानवता हो—यह मानवता कोई दिखावटी चीज नहीं है। अगर तुममें वाकई सामान्य मानवता के कुछ चिह्न हैं, यानी अगर तुममें सही-गलत में फर्क करने की कई अभिव्यक्तियाँ हैं, अगर तथ्य दर्शाते हैं कि तुम सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हो, और अगर इस बात के उदाहरण हैं कि तुमने सकारात्मक चीजों को स्वीकार किया है और नकारात्मक चीजों को अस्वीकार किया है, और यह देखा जा सकता है कि तुममें सत्य को जीने की अभिव्यक्ति है, तो परमेश्वर कहेगा कि तुममें मानवता है और वह तुम्हें मानव कहेगा। अगर तुम कहते हो, “मुझमें भी मानवता है, मैं सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का भेद पहचान सकता हूँ,” लेकिन तुममें सत्य-वास्तविकता को जीने की अभिव्यक्ति नहीं है और तुम्हारे शब्दों का कोई प्रमाण नहीं है, तो यह बड़ी परेशानी की बात है। धर्म-सिद्धांत के तौर पर तुम स्वीकार करते हो कि, “परमेश्वर जो कहता और करता है वे सब सकारात्मक चीजें और सत्य हैं और शैतान जो कहता और करता है वे सब दुष्टतापूर्ण, नकारात्मक चीजें हैं; परमेश्वर से जो कुछ आता है वह सब सकारात्मक चीजें हैं, शैतान से जो कुछ आता है वह सब नकारात्मक चीजें हैं और समाज के लोगों से जो कुछ आता है वह सब दुष्टतापूर्ण, नकारात्मक चीजें हैं”—अर्थात धर्म-सिद्धांत के तौर पर तुम बिना किसी समस्या के सही बोलते हो, और तुम जो बोलते हो उसमें कोई दोष नहीं पाया जा सकता—लेकिन जब तुम्हारा वास्तविक परिस्थितियों से सामना होता है, तब तुम कभी सकारात्मक चीजों को स्वीकार नहीं करते, कभी सकारात्मक चीजों पर कायम नहीं रहते और सकारात्मक चीजों के नियमों और कानूनों का पालन नहीं करते। यह साबित करता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो उचित-अनुचित का भेद नहीं पहचानता। लोग अपने दिल में स्पष्ट होते हैं कि उनमें ये अभिव्यक्तियाँ हैं या नहीं। जब तुम कोई दुष्टतापूर्ण, नकारात्मक विचार या दृष्टिकोण सुनते हो या किसी दुष्ट प्रवृत्ति के बारे में जानकारी सुनते हो तो तुम्हारा क्या रवैया होता है? तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण क्या होते हैं? तुम्हारा झुकाव किस ओर होता है? तुम उससे सहमत होते हो या उससे विकर्षित होते हो? तुम उसे अपने दिल में सँजोकर रखने और आवश्यकता पड़ने पर उसका प्रयोग करने की योजना बनाते हो या तुम उससे विमुख होते हो और अपने दिल में उसकी निंदा करते हो और उसे स्वीकार करने से पूरी तरह इनकार करते हो? अपने दिल में तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हारा रवैया वास्तव में क्या है। अगर कोई कहता है कि वह नहीं जानता, तो क्या उसके पास दिल है? अपने रवैये के बारे में भी स्पष्ट न होना—क्या यह कोई सामान्य व्यक्ति है? अगर तुम अपने दिल में जानते हो कि तुम अच्छे इंसान नहीं हो और तुम जानते हो कि तुम्हारी विभिन्न दुष्ट प्रवृत्तियों और दुष्ट कथनों में बहुत रुचि है और तुम हमेशा उनका अनुगमन करना और उनमें भाग लेना चाहते हो, लेकिन तुम खुद को थोड़ा पीछे हटाने के लिए मजबूर महसूस करते हो क्योंकि तुम परमेश्वर के घर के विभिन्न सत्य-सिद्धांतों और परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण अपनी इज्जत की चिंता से बँधे हुए होते हो, जबकि वास्तव में तुम अपने दिल की गहराइयों में सकारात्मक चीजों से विकर्षित होते हो और उन्हें अस्वीकार करते हो, तो भले ही तुम दावा करो कि तुम्हें सकारात्मक चीजें पसंद हैं और दुष्ट प्रवृत्तियाँ नापसंद हैं, यह तुम्हारी वास्तविक भावनाओं के खिलाफ जाता है। एक उदाहरण पेश है। कुछ लोग कहते हैं, “बहुत अधिक मांस खाना अच्छा नहीं है, यह अस्वास्थ्यकर है। तुम्हें कम मात्रा में मांस खाना चाहिए और चावल, गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ और सब्जियाँ अधिक खानी चाहिए।” कुछ लोग इसे स्वीकार कर सकते हैं। उन्हें नहीं लगता कि कम मांस खाना उनकी इच्छा के विरुद्ध होने वाला है; इससे वे परेशान या वास्तव में क्षुब्ध महसूस नहीं करते। इसके बजाय वे सोचते हैं, “यही करना सही है। कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद मुझे लगता है कि यह मेरे शरीर के लिए अच्छा है। मेरी समग्र मानसिक अवस्था सुधरी है और मैं शारीरिक रूप से पहले से ज्यादा स्वस्थ हूँ। इस तरह खाना बहुत अच्छा है!” लेकिन कुछ लोगों की स्वीकृति उनकी इच्छा के विरुद्ध होती है। उन्होंने बहुत पहले ही मन बना लिया होता है : “बहुत सारा मांस खाने में क्या अस्वास्थ्यकर है? ज्यादा सब्जियाँ खाना तुम्हें अनिवार्यतः स्वस्थ नहीं बनाता। तुम इसे किसी भी तरह से देखो, मांस ज्यादा स्वादिष्ट और मजेदार होता है! अगर मांस न हो तो कुछ सब्जियाँ खाना ठीक है—यह भूखे मरने से बेहतर है—लेकिन अगर मांस है तो तुम्हें खूब मांस खाना चाहिए। तुम सब मूर्ख हो, तुम सब दिखावा कर रहे हो। अकेला मैं हूँ जो दिखावा नहीं कर रहा। तुम लोगों में से कोई भी मेरे जितना सच्चा नहीं है। मैं वही कहता हूँ जो मैं सोचता हूँ। मांस वाकई स्वादिष्ट होता है!” हर भोजन में वे सब्जियाँ बहुत कम खाते हैं, लेकिन मांस काफी ज्यादा खाते हैं। बताओ, क्या वे सकारात्मक कथनों को दिल से स्वीकारते हैं? (नहीं।) वे उन्हें नहीं स्वीकारते, न ही उनका अभ्यास करने में सक्षम होते हैं। वे अपने दिलों में उनसे पूरी तरह से विकर्षित होते हैं। वे कहते हैं, “ये कथन सकारात्मक कैसे हो सकते हैं? मुझे क्यों नहीं लगता कि ये सकारात्मक हैं? इनमें क्या अच्छाई है? मेरे ज्यादा मांस खाने में क्या बुराई है? मैं मर नहीं गया और तुम लोगों में से कोई भी मुझसे बेहतर नहीं जी रहा!” वे तथ्य नहीं स्वीकारते और यह भी नहीं मानते कि ज्यादा मांस खाना उनके स्वास्थ्य के लिए खराब है। वे सही कथनों तक को नहीं स्वीकार सकते, तो फिर वे तथ्यों को कैसे स्वीकारेंगे? ऐसा होने की संभावना और भी कम होगी। ऐसे लोगों के लिए सकारात्मक चीजों को स्वीकारना उनकी इच्छा के बिल्कुल विपरीत होता है। उन्हें ऐसा करना बहुत कष्टदायक और कठिन लगता है। यह दर्शाता है कि उनकी मानवता में कोई समस्या है और वे अपने दिलों में सत्य से प्रेम नहीं करते। कुछ लोग सही शब्द सुनकर, जो कि सकारात्मक चीजें होती हैं, उन्हें यह कहते हुए सहजता से स्वीकार सकते हैं, “मैं इसी बात को लेकर चिंतित था और नहीं जानता था कि इससे किस तरीके से पेश आया जाए, मेरे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं था। सौभाग्य से तुमने इस पर प्रकाश डाल दिया। तुम्हारी बात सुनते ही मुझे लगा कि चीजों के बारे में यह नजरिया सही है, यह दृष्टिकोण शुद्ध, वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक है और यह मानवता के अनुरूप है।” यह सुनने के बाद वे तुरंत इसे अभ्यास में ला सकते हैं। हालाँकि वे कभी-कभी खुद को ढील देने वाले और स्वेच्छाचारी हो सकते हैं, लेकिन वे जल्दी से सही रास्ते पर लौट आते हैं। वे बिना इस बात की जरूरत महसूस किए कि दूसरे उनकी निगरानी करें या उन पर नियंत्रण रखें, सकारात्मक चीजें करते हैं और उन्हें ऐसा नहीं लगता कि ऐसा करना उनकी इच्छा के विरुद्ध है, न ही इससे उन्हें कोई परेशानी महसूस होती है। यह वैसा ही है जैसे भेड़ों को घास खाना पसंद होता है। अगर तुम भेड़ों को मांस दोगे तो वे उसे नहीं खाएँगी, लेकिन अगर तुम उन्हें घास दोगे तो वे उसे बड़े चाव से खाएँगी, क्योंकि वे शाकाहारी होती हैं और उन्हें आंतरिक रूप से घास की आवश्यकता होती है। लेकिन भेड़िये अलग होते हैं। वे खाने के लिए खास तौर से मांस खोजते हैं; वे घास नहीं खाते और उन्हें लगता है कि मांस जितना स्वादिष्ट कुछ भी नहीं है। ये उनकी प्रकृति के प्राकृतिक प्रकाशन हैं, जिन्हें कोई नहीं बदल सकता। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो वे बाद में अर्जित करते हों, न ही यह कोई ऐसी चीज है जो उन्हें सिखाई जाती हो। भेड़ें जन्म से घास खाती हैं और भेड़िये जन्म से मांस खाते हैं। कोई भी भेड़ को मांसाहारी जानवर बनना या भेड़िये को घास खाने वाला जानवर बनना नहीं सिखा सकता। यह उनके सार की अभिव्यक्ति है। तुम्हें क्या चाहिए और तुम किस चीज से प्रेम करते हो, यह तुम्हारी मानवता द्वारा निर्धारित होता है। अगर तुम्हारी मानवता को सकारात्मक चीजें नहीं चाहिए तो तुम सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करोगे। अगर तुम्हें नकारात्मक चीजें पसंद हैं तो इसका मतलब है कि तुम्हारे दिल को नकारात्मक चीजें चाहिए। यह तुम्हारे प्रकृति सार से तय होता है, इसे दूसरों को तुम्हारे भीतर डालने की जरूरत नहीं होती। अगर कोई तुम्हें सकारात्मक दिशा में मोड़ने में तुम्हारी मदद करना चाहता है और तुम्हारे साथ कुछ सत्य सिद्धांतों पर संगति करता है, तो तुम अपनी इज्जत का खयाल करके या शर्मिंदगी से बचने के लिए इसे अस्थायी रूप से स्वीकार सकते हो और मौखिक रूप से अपनी सहमति व्यक्त कर सकते हो, लेकिन पर्दे के पीछे तुम कैसे सोचते हो और कैसे अभ्यास करते हो, यह पूरी तरह से तुम्हारी प्रकृति से निर्धारित होता है। तुम इसका दिखावा नहीं कर सकते और तुम्हारे माता-पिता भी तुम्हें नहीं बदल सकते। तुम्हारी मानवता में सकारात्मक चीजों से प्रेम करना और नकारात्मक चीजों से घृणा करना शामिल है या नहीं, यह कोई तय नहीं कर सकता; सिर्फ तुम्हारा सार ही इसे तय करता है। क्या यह बात अब स्पष्ट है? (हाँ।) इसलिए, कोई उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है या नहीं, यह उसकी मानवता के बारे में बहुत-कुछ कहता है। अगर तुम्हारा उचित-अनुचित का भेद पहचानना एक प्राकृतिक प्रकाशन है, तो तुम जन्म से कुछ सकारात्मक चीजों में विशेष रुचि रखते हो। जब कोई व्यक्ति कोई सही चीज कहता है तो तुम उसे सुनने के लिए बहुत इच्छुक रहते हो और तुम बस यही चाहते हो कि वे और ज्यादा कहें ताकि तुम ज्यादा सुनो और ज्यादा लाभ उठाओ और कम भटको या बिल्कुल भी न भटको। और जब तुम्हारा सामना कुछ दुष्टतापूर्ण, नकारात्मक चीजों से होता है तो तुम अपने दिल में उनसे विकर्षित होते हो और उनसे बचते हो और उनमें शामिल होने के अनिच्छुक होते हो—यहाँ तक कि उनके बारे में सुनना भी नहीं चाहते। तुम इसके कारण नहीं जानते; तुम बस नकारात्मक चीजें पसंद कर ही नहीं सकते, लेकिन जब कोई सही बात कहता है तो तुम उसे सुनने के बहुत इच्छुक होते हो और अगर कोई तुम्हारा उपहास करता है तो भी तुम परवाह नहीं करते—तुम नहीं जानते कि यह प्रेरणा कहाँ से आती है। कुछ लोग तुम्हारी इस सच्ची प्रेरणा को देखकर तुम्हारा तिरस्कार करते हैं और तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं, तुम्हें मूर्ख समझते हैं, लेकिन तुम असहमत होते हो। तुम सोचते हो, “अगर कोई सही कहता है तो मैं उसे स्वीकारता हूँ। इसमें इतनी मुश्किल क्या है?” यह मानवता का एक प्राकृतिक प्रकाशन है। तुम्हारी मानवता में सकारात्मक चीजों से प्रेम करने और नकारात्मक चीजों से विमुख होने की यह प्राकृतिक भावना होना सामान्य मानवता की एक विशेषता और अभिव्यक्ति है। जब तुममें यह भावना और ऐसी मानवता होती है, तभी तुम ईमानदार और दयालु हो सकते हो और सही रुख और पद से तुम वह कह सकते हो जो कहना चाहिए और वह कर सकते हो जो करना चाहिए। जब तुममें मानवता का उचित-अनुचित का भेद पहचानने वाला पहलू होता है, तो तुममें सत्य स्वीकारने और परमेश्वर के विभिन्न स्पष्ट कथनों, जिनमें सत्य-सिद्धांत शामिल होते हैं, को स्वीकारने की मूलभूत शर्त होती है। अगर तुममें मानवता का उचित-अनुचित का भेद पहचानने वाला पहलू नहीं होता, तो तुम्हारी मानवता में जमीर और विवेक अनुपस्थित होते हैं और तुममें सत्य स्वीकारने, परमेश्वर के वचन स्वीकारने और परमेश्वर से तमाम सकारात्मक मार्गदर्शन और सही मार्ग स्वीकारने की मूलभूत शर्त नहीं होती। यहाँ तक कि तुममें सत्य स्वीकारने और सकारात्मक चीजें स्वीकारने की मूलभूत शर्त भी नहीं होती, इसलिए तुम्हारे समर्पण करने में सक्षम होने का कोई भी जिक्र सिर्फ बेतुका, कोरी कल्पना होता है।

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