सत्य का अनुसरण कैसे करें (17) भाग दो
अगर कोई यह नहीं जानता कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और नकारात्मक चीजें क्या होती हैं और फिर भी कहता है, “मेरे पास जमीर है और मैं बहुत ईमानदार और दयालु हूँ,” तो क्या यह आत्म-जागरूकता की अनुपस्थिति नहीं दर्शाता? तुम्हारी ईमानदारी कहाँ से आती है? तुम्हारा मन नकारात्मक चीजों से ही भरा है—तुम किस चीज के इस्तेमाल से साबित कर सकते हो कि तुम ईमानदार हो? तुम्हारा सबूत कहाँ है? तुम किस आधार पर कहते हो कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो? और तुम अपनी तथाकथित दयालुता को अभ्यास में कैसे ला सकते हो? तुम्हारे अंदर दुष्ट और नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों के सिवा कुछ नहीं है। क्या तुम दयालु हो सकते हो? अगर तुम लोगों को फँसाओ नहीं या उन्हें नुकसान न पहुँचाओ, तो यही बहुत अच्छा होगा। कुछ लोग यह साबित करने के लिए कि उनमें मानवता है और वे ईमानदार और दयालु हैं, अपने झेंग वांग, झेंग झांग, झेंग झोउ, झेंग गैंग जैसे नाम रख लेते हैं[क]—हालाँकि ये नाम निश्चित रूप से “ईमानदार” होना ध्वनित करते हैं, फिर भी क्या इनका मतलब यह है कि व्यक्ति वास्तव में ईमानदार है? सच्ची ईमानदारी कहाँ से आती है? वह मानवता से आती है। जब व्यक्ति की मानवता में उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता या बुनियादी शर्तें होती हैं, तभी वह ईमानदार हो सकता है। अगर तुम यह भी नहीं जानते कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं या तुम सकारात्मक चीजें बस पसंद ही नहीं करते और तुमने कभी एक भी सकारात्मक चीज या सकारात्मक विचार और दृष्टिकोण स्वीकार नहीं किया है, फिर भी तुम ईमानदार होने का दावा करते हो तो क्या यह बेशर्मी नहीं है? किस आधार पर तुम ईमानदार होने का दावा करते हो? कुछ लोग कहते हैं, “मेरी विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य और जीवन के प्रति दृष्टिकोण सब सही हैं।” क्या इसका सत्य से कोई लेना-देना है? क्या सही विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य और जीवन के प्रति दृष्टिकोण होने का यह मतलब है कि व्यक्ति के पास सत्य है? दूसरे लोग कहते हैं, “मुझमें ‘सकारात्मक ऊर्जा’ है। मैं जो कहता और करता हूँ, वह व्यावहारिक होता है और लोगों को लाभ पहुँचाता है। मैं कभी लोगों का मनोबल गिराने वाली बातें नहीं कहता, मैं कभी कोई निराशाजनक बात नहीं कहता और मैं ऐसी चीजें नहीं कहता जिनसे लोगों को शर्मिंदगी हो या वे नकारात्मक और कमजोर महसूस करें या जो उन्हें हतोत्साहित करें। मैं जो कुछ भी कहता हूँ, वह लोगों को प्रोत्साहित, प्रेरित या उत्प्रेरित करता है। क्या इसे ‘सकारात्मक ऊर्जा’ माना जाता है? ‘सकारात्मक ऊर्जा’ शब्द आजकल समाज में बहुत प्रचलित है। ‘सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होना’ कितना शानदार, फैशनेबल और उत्तम विचार है!” अन्य लोग कहते हैं, “देखो, मैं कैसे धार्मिकता की भावना से भरा हुआ हूँ। जब मैं वहाँ खड़ा होता हूँ तो एक सैनिक जैसा दिखता हूँ—मेरी आँखें चमकीली और निगाह पैनी है, मैं छिछोरा नहीं हूँ। वे स्थानीय गुंडे, नीच खलनायक और बुरे लोग मेरे नजदीक आने की हिम्मत नहीं करते। जब वे मेरे सामने होते हैं तो उनका असली रूप सामने आ जाता है, वे अपनी कायरता दिखाते हैं और नीच दिखाई देते हैं। जब आम आदमी मेरे आसपास होता है, तो उसे सही तरह से पेश आना पड़ता है और वह लापरवाही से क्रियाकलाप करने की हिम्मत नहीं करता। देखो, मेरी यह धार्मिक भावना दुष्टता का दमन कर सकती है!” क्या यह ईमानदार होना है? (नहीं।) समाज में गरीबों की मदद करने के लिए अमीरों को लूटना, न्यायोचित कार्य के लिए बहादुरी से क्रियाकलाप करना, दयालु और दानशील होना और संकटग्रस्त युवतियों को बचाकर नायक बनना लोकप्रिय है। कुछ लोग ये काम करके खुद को नायक समझते हैं और कई अन्य लोग इन नायकों के आगे नतमस्तक होते हैं। दूसरे लोग कहते हैं, “मैं कभी लोगों का फायदा नहीं उठाता, मैं धार्मिकता की भावना से भरा हुआ हूँ, मैं दृढ़तापूर्वक ईमानदार और निष्पक्ष हूँ और मैं सही-गलत में अंतर कर सकता हूँ। जब दो लोग लड़ रहे होते हैं और मुझसे विवाद में मध्यस्थता करने के लिए कहते हैं तो मैं दोनों पक्षों को बराबर सजा देता हूँ और कोई पक्षपात नहीं करता। देखो, मैं किस धार्मिक भावना से भरा हुआ हूँ, हर कोई मेरी प्रशंसा करता है!” क्या इसे ईमानदार होना माना जाता है? (नहीं।) जहाँ पहले उल्लिखित “सही विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य और जीवन के प्रति दृष्टिकोण” और “सकारात्मक ऊर्जा” के विचार लोकप्रिय चीनी अभिव्यक्तियाँ हैं, वहीं यह आखिरी अभिव्यक्ति—दयालु और दानशील होना, पुण्य संचित करना और अच्छे काम करना और न्यायपूर्ण उद्देश्य के लिए बहादुरी से काम करना—संभवतः सभी देशों और सभी लोगों में सार्वभौमिक रूप से सम्मानित है। इसलिए लोग इसे धार्मिकता की भावना, ईमानदारी मानते हैं। यहाँ तक कि परमेश्वर में विश्वास करने वाले ज्यादातर लोग भी सोचते हैं कि यह बहुत ईमानदार है और कहते हैं, “हमारे राष्ट्रीय नायक, फलाँ-फलाँ को देखो। उसने राष्ट्र के धार्मिक और महान उद्देश्य के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, राष्ट्र की रक्षा के लिए एक बंकर को उड़ाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया। वह धार्मिकता की भावना से ओतप्रोत था। आखिर मानवता होने का यही तो अर्थ है!” अब इस पर गौर करें, तो क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) यह गलत कैसे है? ऐसी ईमानदारी, जिसे लोग ईमानदारी मानते हैं या जिसका लोग आदर करते हैं, का मूल्यांकन उन मानकों के आधार पर किया जाता है जो अच्छी और अपेक्षाकृत सकारात्मक चीजों के लिए इंसानी लालसा पर आधारित होते हैं। लोगों की दैहिक धारणाओं और कल्पनाओं के कारण, और चूँकि वे नहीं समझते कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं, इसलिए वे उन लोगों को अच्छे लोग मानते हैं जो दूसरों के लिए अपने हितों का त्याग कर सकते हैं और अच्छे व्यवहारों में संलग्न रहते हैं—या जो सक्रिय रूप से दूसरों को नहीं फँसाते या नुकसान नहीं पहुँचाते, दूसरों के लिए कोई खतरा पैदा नहीं करते और जो कोई बुरे नतीजे नहीं लाए हैं—और वे उनका आदर करते हैं और उन्हें ईमानदार निरूपित करते हैं। “ईमानदार” की यह परिभाषा लोगों की ईमानदारी की धारणाओं पर और साथ ही दुष्ट प्रवृत्तियों और दुष्ट मानवजाति के प्रति उनकी घृणा और अद्भुत चीजों के लिए उनकी लालसा पर आधारित है। चूँकि मानवजाति में ज्यादातर लोग दूसरों को दबाते, धमकाते, फँसाते और नुकसान पहुँचाते हैं और चूँकि यह दुनिया बहुत बुरी, अंधकारमय है और इसमें निष्पक्षता या धार्मिकता का नामोनिशान नहीं पाया जाता, इसलिए जब ऐसे नायक या तथाकथित अच्छे काम करने वाले और नेकी करने वाले लोग प्रकट होते हैं, तो लोग उनका सम्मान करते हैं और उन्हें सर्वोत्तम संभव शब्दों से परिभाषित करते हैं। क्या इस परिभाषा के सिद्धांत सटीक हैं? (वे सटीक नहीं हैं।) परिभाषा के सिद्धांत और आधार ही अपने आप में गलत हैं। उदाहरण के लिए, एक समूह में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे ज्यादातर दूसरे लोग धमकाते हैं, लेकिन एक खास व्यक्ति है जो उसे नहीं धमकाता। जिस व्यक्ति को धमकाया जा रहा है, वह कहता है, “वह जो मुझे नहीं धमकाता, एक अच्छा व्यक्ति है।” क्या यह कथन सटीक है? (नहीं।) क्या यह तर्कसंगत है? (यह तर्कसंगत नहीं है।) बताओ, इसमें क्या गलत है? (शायद जो व्यक्ति उसे नहीं धमकाता वह उसे प्रतिकूल नहीं पाता या वह उसे इसलिए नहीं धमकाता क्योंकि वस्तुनिष्ठ स्थिति और परिस्थितियाँ उपयुक्त नहीं हैं। इसका यह मतलब नहीं कि वह एक अच्छा व्यक्ति है।) उसके दृष्टिकोण में तार्किक त्रुटि है। यह विचार कि जो लोग तुम्हें धमकाते हैं वे बुरे लोग हैं, इसलिए जो लोग तुम्हें नहीं धमकाते वे अच्छे लोग ही होंगे, एक तार्किक त्रुटि है, है ना? (हाँ।) दूसरों को धमकाने वाले ज्यादातर लोग अच्छे लोग नहीं होते, लेकिन दूसरों को धमकाने का क्या मतलब है इसे परिभाषित करने का तुम्हारा मानक जरूरी नहीं कि सटीक हो, इसलिए तुम्हारी इस परिभाषा का सटीक होना भी जरूरी नहीं कि जो लोग तुम्हें धमकाते हैं वे बुरे लोग होते हैं और यह कहना भी सटीक नहीं कि जो लोग तुम्हें नहीं धमकाते वे अच्छे लोग ही होंगे। ऐसे कई परिदृश्य हो सकते हैं जिनमें कोई तुम्हें न धमकाए। हो सकता है वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता, इसलिए वह तुम्हें धमकाने की जहमत नहीं उठा सकता। शायद वह तुम्हें जानता ही न हो, इसलिए तुम्हें धमका नहीं सकता। शायद उसे लगता हो कि तुम उससे ज्यादा सख्तजान हो, इसलिए वह तुम्हें धमकाने की हिम्मत नहीं करता। ऐसे कई संभावित परिदृश्य हैं। उसे एक अच्छे इंसान के रूप में परिभाषित करने का तुम्हारा आधार इस नींव पर निर्मित है कि उसने तुम्हें धमकाया नहीं, इसलिए इस परिभाषा का आधार ही गलत है। किसी को एक अच्छे इंसान के रूप में परिभाषित करने का असली आधार क्या होता है? अगर यह व्यक्ति सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, दूसरों के साथ निष्पक्षता से और सिद्धांतों के साथ पेश आता है और अपने काम करने के तरीके में भी सिद्धांत रखता है, तो भले ही वह कभी-कभी तुम्हारे साथ रुखाई से, कठोर लहजे में बात करता हो या तुम्हारी आलोचना करता हो, वह तुम्हें धमका नहीं रहा होता। वह सिद्धांतों के अनुसार काम कर रहा होता है और मामलों का आकलन तथ्यों के आधार पर कर रहा होता है। इस तरह वह वास्तव में एक अच्छा इंसान होता है और वह लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार पेश आने में सक्षम होता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे नहीं होते। जब वे देखते हैं कि तुम्हारे पास रुतबा है और तुम सख्तजान हो, तो वे तुम्हारी चापलूसी करते हैं। जब वे देखते हैं कि तुम्हारे पास कोई रुतबा नहीं है और तुम वंचित हो, तो वे तुम्हें धमकाते हैं, कुचलते हैं और बोलते समय हमेशा तुम्हें ठेस पहुँचाते हैं। अगर तुम कुछ सही करते हो तो वे तुमसे ईर्ष्या करते हैं। अगर तुम कुछ गलत करते हो तो वे तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं और तुम्हें नीचा दिखाते हैं। ऐसे लोग बुरे लोग होते हैं। अगर तुम अच्छे-बुरे का मापन सकारात्मक चीजों और सत्य सिद्धांतों के आधार पर करते हो तो चीजों को मापने के तुम्हारे मापदंड और तुम्हारे मापन के नतीजे सही होंगे। दुनिया और समाज में सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का मूल्यांकन या परिभाषा अपने आप में उलटी है। समाज में ज्यादातर लोग अपने प्रिय नेताओं, मशहूर लोगों या सितारों की अंधभक्ति करते हैं। ये मशहूर लोग, सितारे और नेता चाहे कुछ भी कहें, उन्हें लगता है कि वह सही है और कोई उसे उजागर नहीं करता या उसका विरोध नहीं करता। चाहे वे लोग आम लोगों पर कितना भी रोब जमाएँ और कितनी भी सीनाजोरी करें, गरीबों के साथ भेदभाव करें या उनसे पैसे ऐंठें, या बेवजह इंसानी जिंदगियाँ इस तरह नष्ट करें जैसे वे बेकार हों, कोई उनका विरोध करने या उनके खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए खड़ा नहीं होता। अगर वे राजनीतिक बढ़त हासिल करने के लिए कुछ अच्छी चीजें करते हैं तो बहुत लोग उनकी प्रशंसा और बड़ाई करेंगे। अगर न्याय के लिए लड़ने वाला कोई व्यक्ति आकर शैतानी शासन को या प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों को उजागर करता है, तो जनता सामूहिक रूप से उन पर हमला करेगी और उसकी उन्हें हटाने और गायब कर देने की बुरी तरह इच्छा होगी। यह क्या दर्शाता है? यह कि समाज हर चीज अन्यायपूर्ण और विकृत तरीके से करता है; वह सही और गलत को उलट देता है। भ्रष्ट मानवजाति जिन मानकों से अच्छे और बुरे, और सकारात्मक और नकारात्मक को परिभाषित करती है, वे सब गलत होते हैं, इसलिए उनके द्वारा निकाले गए निष्कर्ष भी अनुचित होते हैं।
आओ, एक उदाहरण देखते हैं। कुछ लोग घरों में घुसकर लूटपाट करते हैं—गरीबों की मदद के लिए अमीरों को लूटते हैं। अमीरों की संपत्ति लूटने के बाद वे आम लोगों की मदद करते हैं। जब आम लोग इससे लाभान्वित होते हैं और इसका फायदा उठाते हैं तो वे खुश होते हैं और इन लोगों की प्रशंसा नायकों और सदाचारी ईमानदार लोगों के रूप में करते हैं। लेकिन अगर तुम इन तथाकथित सदाचारी ईमानदार लोगों द्वारा किए गए कार्यों का विश्लेषण करो, तो क्या वे वास्तव में ईमानदार होते हैं? कुछ अमीर लोगों ने अपनी संपत्ति परिश्रमपूर्वक प्रबंधन और प्रयास से अर्जित की होती है और कुछ तो ऐसे भी होते हैं जिन्होंने कई पीढ़ियों के प्रबंधन और प्रयास से ही अपनी संपत्ति संचित की होती है। तुम किस अधिकार से उनकी चीजें लूटते हो? तुमने उनकी निजी संपत्ति लूटी है—यह गलत है। अगर तुम सक्षम हो तो जाकर खुद पैसा कमाओ। अपने कमाए हुए पैसे का इस्तेमाल गरीबों की सहायता के लिए करना—इसे दानशील होना माना जा सकता है। लेकिन तुम अमीरों की संपत्तियाँ लूटते हो, दूसरों की संपत्ति अपनी बना लेते हो और फिर गरीबों की मदद करते हो। गरीबों की नजर में इसे ईमानदार माना जाता है। क्या यह बिल्कुल बेतुका नजरिया नहीं है? गरीब और आम लोग ऐसे लोगों का नायकों के रूप में सम्मान करते हैं और ये “नायक” इस उपाधि और इस सम्मान का ऐसे आनंद लेते हैं मानो यह उनका हक हो। क्या यह बेशर्मी नहीं है? क्या यह बिल्कुल बेतुका नहीं है? (है।) खुद उनके पास वह नहीं होता जो पैसा कमाने के लिए जरूरी है और वे अमीरों के प्रति द्वेष रखते हैं, इसलिए वे हिंसा का इस्तेमाल करके अमीरों का धन लूटते हैं और उसे आम लोगों में बाँट देते हैं, ताकि आम लोग उनकी तारीफ करें। दरअसल, वे जो चीजें लेते हैं, वे उनकी अपनी मेहनत से कमाई हुई बिल्कुल नहीं होतीं और गरीब लोग जिन चीजों का आनंद लेते हैं, वे इन लुटेरों की नहीं, बल्कि अमीरों की होती हैं। तो फिर ऐसा क्यों होना चाहिए कि चूँकि ये चीजें उनके हाथों से गुजरी होती हैं, सिर्फ इसलिए आम लोग और गरीब उनके प्रति पूर्णतया आभारी हों? और क्या आम लोगों का इन चीजों का शांत जमीर के साथ आनंद लेना सही है? क्या ये वे चीजें हैं जिनके तुम हकदार हो? क्या तुमने इन्हें अपनी मेहनत से कमाया है? तुम उन लूटी हुई चीजों का, जो तुमने नहीं कमाई हैं, शांत जमीर के साथ आनंद लेते हो और तुम्हें यह भी लगता है कि अमीरों को लूटा जाना चाहिए और तुम्हें लूटी हुई चीजों का आनंद लेना चाहिए। तुम्हें ये चीजें मुफ्त में और बिना कोई कीमत चुकाए मिलती हैं और तुम शांत जमीर के साथ इनका आनंद लेते हो। क्या यह बेशर्मी नहीं है? (हाँ।) ये तथाकथित नायक लोगों की इस प्रशंसा और इस सम्मान का आनंद लेते हैं। ये चीजें वे अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने के लिए करते हैं। लोग जितनी ज्यादा उनकी प्रशंसा और पूजा करते हैं, वे उतने ही उन्मत्त हो जाते हैं, और वे महलों तक को लूट लेते हैं, उनके अंदर का खजाना चुरा लेते हैं, उसे बेच देते हैं और फिर गरीबों के आँगन में पैसा बिखेर देते हैं। वे गरीबों की मदद अमीरों को लूटकर करते हैं। क्या यह पूरी तरह से बेतुका नहीं है? (है।) इस बारे में तो कुछ भी कहना ही क्या कि दूसरों की संपत्ति लूटना कानून का उल्लंघन है या नहीं, नैतिकता और मानवता की दृष्टि से भी यह अस्वीकार्य है और यह तथाकथित ईमानदारी नहीं है। जिन चीजों को उन्होंने लूटा, वे बिल्कुल भी ऐसी चीजें नहीं हैं जिन पर उनका कोई हक होना चाहिए। वे नीच, घटिया, संदिग्ध, गैरकानूनी और अपरंपरागत तरीकों से हासिल की गई चीजें हैं। वे उनके बदले कुछ पैसे लेते हैं और उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें प्रथमतः मदद की जरूरत ही नहीं है या उनके विचार से जिनकी मदद की जानी चाहिए, और फिर इन लोगों से प्रशंसा पाते हैं और इस सम्मान का आनंद लेते हैं। क्या यह बेशर्मी नहीं है? फिर भी उन्हें खुद पर बहुत गर्व होता है और वे खुद को ऐसे नायक कहते हैं जो गरीबों की मदद के लिए अमीरों को लूटते हैं। ऐसे लोग समाज में खासे लोकप्रिय होते हैं। प्राचीन काल में ऐसे कुछ तथाकथित “नायक” होते थे और उनकी कहानियाँ आज भी प्रचलित हैं। क्या यह बेतुका नहीं है? (है।) पूरी मानवजाति में बहुत कम लोग हैं जो वास्तव में समझते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं। लोग इन चीजों का भेद नहीं पहचान सकते। “नायकों” द्वारा लूटी गई चीजों का आम लोग कितने दिन आनंद ले सकते हैं? क्या तुम इनके हकदार हो? क्या इन्हें तुमने कमाया है? न तो तुमने इन्हें कमाया है और न ही तुम इनके हकदार हो—इसे नाहक लाभ स्वीकारना कहते हैं। क्या इन चीजों का आनंद लेना तुम्हारे लिए सम्मानजनक है? तुम गरीब इसलिए हो क्योंकि तुम आलसी हो या तुममें क्षमता की कमी है। जमीर और विवेक से युक्त व्यक्ति को भोजन और वस्त्र पाकर संतुष्ट रहना चाहिए और उसे उसी का आनंद लेना चाहिए जो वह कमा सकता है। परमेश्वर तुम्हें गुजारा करने का साधन देता है, इसलिए तुम्हें संतुष्ट रहना चाहिए। अगर तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो अमीर है, जिसके पास बहुत-सी चीजें हैं, जो धनी है और तुम हमेशा जो कुछ उसके पास है उसमें बराबर का हिस्सा चाहते हो, तो क्या यह उचित है? यह विचार अपने आप में तर्कसंगत नहीं है। शैतान समाज को नियंत्रित करता है और समाज की सत्ता उसके पास है, इसलिए बेशक निष्पक्षता नहीं है। समाज में गरीब बहुत हैं जबकि अमीर कम हैं—चाहे इसका कारण कुछ भी हो, तथ्य यह है कि कुछ लोग अमीर हैं और कुछ लोग गरीब। समाज ऐसा ही है—हो सकता है तुम सक्षम होने के बावजूद अमीर न बन पाओ और हो सकता है तुम सक्षम न होने के बावजूद एक अमीर आदमी की जिंदगी जी पाओ। कोई भी इन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकता, लेकिन चाहे जो भी हो, इसमें भी परमेश्वर का विधान है। दूसरों से लूटी गई चीजें तुम्हारी नहीं हैं और अगर तुम उन्हें पा लो, तो भी वे तुम्हारी नहीं हैं और देर-सवेर तुम उन्हें खो दोगे। उन लोगों को देखो जो बहादुरी और न्याय का ढोंग रचकर घरों में घुसकर लूटपाट करते हैं और गरीबों की मदद करने के लिए अमीरों को लूटते हैं। वे पर्दे के पीछे हर तरह की खराब चीजें करते हैं, जैसे खाना, पीना, वेश्यावृत्ति, जुआ खेलना और नशीले पदार्थों का सेवन करना, यहाँ तक कि कुछ तो हत्या या बलात्कार तक कर बैठते हैं। फिर, गरीबों की मदद करने के लिए अमीरों को लूटने के कुछ कारनामे करने मात्र से ही आम लोग उनकी नायकों की तरह पूजा करने लगते हैं। क्या यह नीच चरित्रों के फलने-फूलने का मामला नहीं है? आम लोग—घृणित किस्म के लोग, नीच लोग और भीड़—जब भी थोड़ा लाभ प्राप्त करते हैं तब खुश होते हैं और जो भी उन्हें लाभ पहुँचाता है, उसकी प्रशंसा करते हैं। और उन “नायकों” का क्या? आम लोग उन्हें कुछ सम्मान देते हैं, पुरस्कृत करते हैं और नायक मानते हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि यह तारीफों का मुकुट है, वे सचमुच नायक हैं और उनका कोई सानी नहीं है। इसलिए वे लूटपाट करते रहते हैं और नतीजतन, जब वे किसी राजमहल को लूटते हैं तब अंततः एक ही गोली में मारे जाते हैं। वे सचमुच सोचते थे कि उनमें महान क्षमताएँ हैं और वे अलौकिक हैं, वे असाधारण हैं और आम लोगों से श्रेष्ठ हैं, लेकिन असल में उनमें एक गोली से बचने तक की क्षमता नहीं थी और वे अपनी जान गँवा बैठे। क्या वे इसी के हकदार नहीं थे? (हाँ।) लूटपाट का कृत्य अपने आप में सम्माननीय नहीं है। यह नीचता है। आम लोगों की प्रशंसा पाने, अच्छी प्रतिष्ठा पाने, थोड़ा सम्मान पाने के लिए डकैती पर निर्भर रहना—यह कितनी घृणित चीज है। अंत में, वे अपनी प्रशंसा तक करते हैं : “आम लोग गुजारा नहीं कर सकते और लोग मुश्किल हालात में हैं, यह सब अधिकारियों की वजह से है। देखो, मुझमें कितनी ज्यादा धार्मिकता की भावना है; मुझमें निम्न-वर्ग के आम लोगों के लिए दया है!” क्या ऐसे लोग ईमानदार होते हैं? (नहीं।) आम लोग भी कुटिलता से बोलते हैं और थोड़ा-सा लाभ मिलने पर मुस्कुरा देते हैं। अगर उन्हें तुमसे किसी भी तरह का लाभ नहीं मिलता तो तुम चाहे कितनी भी मुश्किल में हो, वे तुम पर ध्यान नहीं देंगे। लेकिन अगर तुम उन पर उपकार करते हो, उन्हें कुछ ठोस लाभ दिलाते हो, तो वे खुश हो जाएँगे और कहेंगे, “तुम कितने अच्छे इंसान हो! बहुत दानशील व्यक्ति हो!” वे बहुत अच्छी लगने वाली चीजें कहते हैं, लेकिन उनका कहा एक भी शब्द सच नहीं होता। यहाँ तक कि वे सही शब्द भी नहीं बोल पाते। भला वे ईमानदार कैसे हैं? असल में उनकी हर बात कपटपूर्ण होती है।
कुछ लोग खुद को धार्मिकता की भावना से ओतप्रोत, जमीर और मानवता वाले लोग मानते हैं। लेकिन क्या उनकी यह धार्मिकता जिक्र करने लायक भी है? इसके अलावा, यह धार्मिकता की भावना बिल्कुल नहीं है; यह एक प्रकार की ईमानदारी है जिसकी उन्होंने विलक्षण रूप से अपने लिए कल्पना कर ली है, जिसका परमेश्वर द्वारा कही गई सकारात्मक चीजों से या किसी भी सत्य सिद्धांत से कोई लेना-देना नहीं है। यह ईमानदारी नहीं है; यह विकृत तर्क, पाखंड और भ्रांतियाँ हैं। यह कहा जा सकता है कि जिन बातों का वे प्रचार करते हैं, जैसे सकारात्मक ऊर्जा, सही विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य और जीवन के प्रति दृष्टिकोण और अद्वितीय, तीक्ष्ण अंतर्दृष्टि, वे ईमानदार और सही प्रतीत तो होती हैं, लेकिन वास्तव में ऐसी नहीं होतीं। सटीक रूप से कहें तो, ये सभी हानिकारक प्रवृत्तियाँ और बुरे प्रभाव, विकृत तर्क और पाखंड हैं; ये सभी नकारात्मक चीजें हैं और ये सभी पाखंड और भ्रांतियाँ हैं जो सकारात्मक चीजों के बिल्कुल विपरीत हैं। इसलिए, अगर तुम गैर-विश्वासियों की इन बातों से सहमत हो और अपने दिल में हमेशा इन दृष्टिकोणों से चिपके रहते हो, तो यह साबित होता है कि गैर-विश्वासियों की ही तरह तुम भी एक ईमानदार इंसान नहीं हो और तुम्हारी मानवता में कोई ईमानदारी नहीं है। तुम खुद को एक ईमानदार इंसान के रूप में पेश करना चाहते हो, ठीक वैसे ही जैसे शैतान खुद को प्रकाश के दूत के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। शैतान कुछ अच्छी लगने वाली बातें कहता है, खुद को परमेश्वर, एक ईमानदार सदाचारी इंसान और किसी सकारात्मक चीज के रूप में पेश करना चाहता है। तुम भी खुद को कुछ ऐसा ही पेश कर रहे हो जो तुम नहीं हो; तुम हमेशा कहते हो कि तुममें एक सही विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य, और जीवन के प्रति दृष्टिकोण है, कि तुममें सकारात्मक ऊर्जा और धार्मिक भावना है, कि तुम एक नायक हो, एक तीक्ष्ण और अद्वितीय अंतर्दृष्टि वाले व्यक्ति हो, या तुम ईमानदार हो और तुम्हें किसी चीज का डर नहीं है, कि तुम जहाँ भी जाते हो, लोगों से बोलते और व्यवहार करते समय अपने साथ एक धार्मिक भावना रखते हो—तुम हमेशा खुद को इसी तरह पेश करते हो। खैर, मैं कहता हूँ कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसमें ज्यादा जमीर बिल्कुल नहीं है, ऐसा व्यक्ति जो खुद को धार्मिकता की भावना रखने वाले, ईमानदार और मानवता से युक्त व्यक्ति के रूप में पेश करना चाहता है। चूँकि तुम इन चीजों का दिखावा कर रहे हो, इसका मतलब है कि तुममें ये चीजें नहीं हैं—वरना क्या तुम्हें इनका दिखावा करने की जरूरत होती? अगर तुममें सचमुच मानवता होती, तो तुम्हें उसका दिखावा करने की जरूरत न होती और न ही तुम तथाकथित “सही विश्वदृष्टि, जीवन-मूल्य और जीवन के प्रति दृष्टिकोण”, “सकारात्मक ऊर्जा”, “धार्मिकता की भावना होना” और “वीरतापूर्ण भावना होना” जैसी बातें स्वीकार कर पाते; तुम इन नकारात्मक चीजों को स्वीकार न करते—कहने की जरूरत नहीं कि आज तक इतने सारे धर्मोपदेश सुनने के बाद तुम्हें इन चीजों का भेद पहचानना आना चाहिए था। अगर तुममें मानवता होती, तो तुम बहुत पहले ही इन नकारात्मक चीजों को नकार चुके होते। अगर कोई सचमुच इन बातों और तर्कों को सामने रखे, तो भले ही तुम इनका भेद न पहचानते, लेकिन तुम इन्हें अपने दिल की गहराइयों से स्वीकार न करते। तुम सोचते कि ये चीजें बहुत झूठी हैं, तथाकथित समाजशास्त्रियों, शिक्षाविदों और विचारकों, तथाकथित प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों, और दुनिया के उन राक्षसों और दानव राजाओं द्वारा समर्थित चीजें, ये सब ऐसी चीजें हैं जो लोगों को दिखावा करने के लिए कहती हैं। यह समाज में प्रचलित एक कहावत की तरह है, “अगर सभी थोड़ा-सा प्रेम दें, तो दुनिया एक अद्भुत जगह बन जाएगी।” देखो, दुष्ट दानव कहते हैं कि सभी को थोड़ा-सा प्रेम देना चाहिए, दूसरे शब्दों में, सभी आम लोगों को प्रेम देना चाहिए, सभी को दुष्ट दानवों से प्रेम करना चाहिए, सभी को आज्ञाकारी ढंग से उनकी पार्टी की बात सुननी और माननी चाहिए, और देश और उनकी पार्टी के लिए कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहिए या परेशानी पैदा नहीं करनी चाहिए, और तब दुनिया में शांति होगी। दरअसल, आम लोग कब बखेड़ा खड़ा करते हैं? स्पष्ट रूप से, ये दानव ही हैं जो अशांति भड़काते हैं और सत्ता और लाभ के लिए होड़ करते हैं। मानवजाति शैतान द्वारा गुमराह और भ्रष्ट कर दी गई है; वे सब दानवों और शैतान का अनुगमन करते हैं और वे सभी परमेश्वर से दूर रहते हैं और उसका विरोध करते हैं। तो, क्या यह समाज शांति का अनुभव कर सकता है? मुझे बताओ, क्या यह कहावत “अगर सभी थोड़ा-सा प्रेम दें, तो दुनिया एक अद्भुत जगह बन जाएगी” सही है? ये सब बच्चों को धोखा देने के लिए कहे गए शब्द हैं। अगर तुम इन शब्दों का भेद नहीं पहचानते और यह मानते हो, “दुनिया के लिए अभी भी आशा है, इस मानवजाति में अभी भी बुरे लोगों से ज्यादा अच्छे लोग हैं, भविष्य में दुनिया एक अद्भुत जगह बन जाएगी और यह मानवजाति एक सुंदर भविष्य की ओर बढ़ेगी,” तो तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण आम जनता से अलग नहीं हैं और तुम बस एक अमानव हो। अमानवों की एक विशेषता यह है कि वे खास तौर से छद्मवेश धारण करना पसंद करते हैं, अपने रूप को छिपाने के लिए सुखद लगने वाली, अलंकृत, पाखंडी बातों का उपयोग करते हैं, जबकि उनके दिलों की गहराइयाँ विशेष रूप से गंदी और अंधकारमय होती हैं और उनकी घृणित, घटिया चालें एक के बाद एक चलती रहती हैं। उन्हें न्याय और धार्मिकता से जरा भी प्रेम नहीं होता; उन्हें बस चालें चलना पसंद होता है। वे सुनने में बहुत मधुर लगने वाली चीजें कहते हैं; अपनी मुस्कुराहट के पीछे खंजर छिपाए रहते हैं और हर संभव दुष्कर्म करते हैं। ऐसे लोग मानवता से रहित होते हैं। ये ठीक उन्हीं लोगों के प्रकाशन हैं जिनमें मानवता नहीं होती। क्या यह ईमानदारी की अभिव्यक्ति है? (नहीं।) चूँकि ये लोग ईमानदार नहीं होते, इसलिए क्या तुम्हें लगता है कि ये दयालु हो सकते हैं? (नहीं।) दयालु होना तो भूल जाओ, अगर ये एक भी बुरा काम कम कर दें, तो यह जश्न मनाने का कारण होगा, धरती पर सभी के लिए एक आशीष होगा। और फिर भी ये खुद को ईमानदार कहते हैं! यह बस उनका अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना है! ये तो यह भी नहीं जानते कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं और सकारात्मक चीजों के बारे में सुनने के बाद भी ये अपने दिलों में उन्हें पसंद नहीं करते, यहाँ तक कि उनसे विकर्षित होते हैं और घृणा करते हैं। और फिर भी वे कहते हैं कि वे ईमानदार और दयालु हैं। उन्हें क्या लगता है कि वे किसे बेवकूफ बना रहे हैं? मानवजाति की तथाकथित ईमानदारी, दयालुता और विवेक सकारात्मक चीजों पर आधारित नहीं हैं, न ही ये सत्य की कसौटियों पर आधारित हैं। इस प्रकार, मानवजाति द्वारा परिभाषित लोगों की ईमानदारी, दयालुता, तार्किकता और लोगों का जमीर और विवेक सब गलत हैं, उनका सत्य में कोई आधार नहीं है और वे सब विकृत तर्क और पाखंड हैं।
अगर व्यक्ति में जमीर और विवेक है, तो प्रथमतः, वह उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है। दूसरे, वह जानता है कि क्या सही है और क्या गलत। हमने अभी उचित-अनुचित का भेद पहचानने के बारे में संगति की। अपना आकलन करो और फिर अपने माता-पिता और अपने भाई-बहनों का आकलन करो—क्या तुम लोगों में कोई ऐसा है जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो? अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है, तो भविष्य में तुम्हारा सत्य स्वीकारना और उसके प्रति समर्पण करना स्वाभाविक होगा। थोड़ा प्रयास करके, थोड़ा कष्ट सहकर और थोड़ी कीमत चुकाकर तुम इसे हासिल कर पाओगे—तब तुम्हारे उद्धार की आशा है। अगर तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो उचित-अनुचित का भेद पहचान सकता है और अतीत में तुम सत्य से विमुख थे, उसे स्वीकार नहीं सकते थे और उसका अभ्यास करने को तैयार नहीं थे और सत्य स्वीकारने और उसका अभ्यास करने का जिक्र आते ही तुम पूरी तरह से चिढ़ जाते थे और ऐसा महसूस करते थे जैसे तुम्हारा सिर किसी शिकंजे में फँस गया हो, तुम व्यथित थे और स्वतंत्रता से वंचित थे, तो भविष्य में भी सत्य स्वीकारने और उसका अभ्यास करने के बारे में तुम्हारी यही भावना रहेगी; तुम सत्य नहीं स्वीकारोगे। सत्य स्वीकारने में तुम्हारी असमर्थता और उससे तुम्हारी विमुखता का कारण यह नहीं है कि तुमने परमेश्वर में थोड़े समय से ही विश्वास किया है, न ही यह कारण है कि परमेश्वर ने तुम्हें अनुशासित नहीं किया है या तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं ली है। ये असली मूल कारण नहीं हैं। असली मूल कारण क्या है? तुममें उचित-अनुचित का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, यह बुनियादी शर्त असली मूल कारण है, इसलिए भविष्य में भी तुम सत्य नहीं स्वीकार पाओगे और सत्य के प्रति समर्पण हासिल नहीं कर पाओगे। कुछ लोग कहते हैं, “अगर मैं सत्य नहीं स्वीकार सकता या उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकता, तो क्या मैं तब भी उद्धार पा सकता हूँ?” और तुम लोग क्या कहते हो—क्या वे पा सकते हैं? (नहीं।) मेरा उत्तर है, “यह कहना बहुत कठिन है।” यह कहना बहुत कठिन क्यों है? अब जबकि मैंने इतना कुछ कह दिया है और इतनी सारी अभिव्यक्तियाँ सूचीबद्ध कर दी हैं, तो यह निश्चित नहीं है कि तुम स्वयं का उनसे मिलान कर सकोगे या उन्हें अपने भीतर पहचान सकोगे। इसके अलावा, यह भी निश्चित नहीं है कि जिन मामलों और सत्य के जिन पहलुओं के बारे में मैंने बोला है उन्हें तुम समझ सकते हो या नहीं। इसलिए, अगर मैं तुम्हें यह नहीं बताता कि तुम बचाए जा सकते हो या नहीं, तो भी तुममें से प्रत्येक व्यक्ति सत्य और सकारात्मक चीजों के प्रति अपने रवैये के आधार पर इसका पता लगा सकता है। मुझे तुम्हें इतनी स्पष्टता से और खुलकर बताने की कोई आवश्यकता नहीं है; तुम लोग अपने-अपने दिल में पहले से ही जानते हो।
फुटनोट :
क. मूल चीनी पाठ में “झेंग” नाम में नैतिक ईमानदारी का संकेतार्थ है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?