सत्य का अनुसरण कैसे करें (18) भाग दो
परमेश्वर द्वारा नियत सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं
सकारात्मक चीजों की परिभाषा से जुड़ा एक और पहलू है परमेश्वर द्वारा नियत किया जाना और परमेश्वर द्वारा नियत की गई चीजों का दायरा काफी बड़ा है। उदाहरण के लिए, मोटे तौर पर विभिन्न जीवों की जीवन-अवधि, रूप, जन्मजात प्रकृति और अनुवांशिक गुणों और साथ ही उनके जीवित बचे रहने के तरीके, उनकी गतिविधि के प्रतिमान, भोजन प्राप्त करने और प्रजनन के तरीके और चार मौसमों के अनुकूल होने के लिए उनके रहने के प्रतिमान, जिसमें उनके प्रवास की दिशाएँ और गतिविधि की सीमाएँ शामिल हैं; इसके अलावा, चार मौसम, पहाड़ों, नदियों और झीलों के स्थान और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा आदेशित विभिन्न जीवित या निर्जीव चीजों के अस्तित्व के रूप, इत्यादि—लोगों को इस दायरे में आने वाली इन चीजों का भी सम्मान करना चाहिए, उन्हें जीवित बचे रहने के लिए जगह देनी चाहिए और उन्हें खत्म करने, उनमें दखल देने या उन्हें नुकसान पहुँचाने के लिए इंसानी इच्छा या अप्राकृतिक साधनों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, बाघ शाकाहारी जानवरों को खाने के लिए पैदा होते हैं; जेबरा, हिरण, बारहसिंगा और कुछ छोटे जानवर सभी बाघों के शिकार होते हैं। यह एक प्राणी का भोजन प्राप्त करने का तरीका है और वह दायरा है जिसमें वह ऐसा करता है; यह उसके जीवित बचे रहने का एक नियम है। तो, जीवित बचे रहने के इस नियम में क्या शामिल है? इसमें परमेश्वर का विधान शामिल है। चूँकि यह परमेश्वर द्वारा नियत है, इसलिए चाहे लोग इसे धारणात्मक परिप्रेक्ष्य से कैसे भी देखें—चाहे वे इसे अद्भुत समझें या खूनी और क्रूर—यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक चीज है। यह बिल्कुल निश्चित है और तुम इसे नकार नहीं सकते। भले ही तुम्हें अपने दिल में लगे कि बाघ द्वारा जानवरों का शिकार करना बहुत खूनी और क्रूर है और तुम ऐसा त्रासद दृश्य होते हुए देख तक नहीं सकते, फिर भी तुम्हें जानवरों की दुनिया में जीवित बचे रहने के तरीके का सम्मान करना चाहिए। तुम्हें इसे बाधित या सीमित नहीं करना चाहिए और इस पारिस्थितिक परिवेश में अप्राकृतिक रूप से हस्तक्षेप करना या इसे नुकसान पहुँचाना तो बिल्कुल नहीं चाहिए। इसके बजाय तुम्हें चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना चाहिए और जानवरों की दुनिया के जीवित बचे रहने के परिवेश की रक्षा करनी चाहिए। तुम्हें विभिन्न जानवरों से उनके जीवित बचे रहने का अधिकार नहीं छीनना चाहिए। मांसाहारी जानवरों द्वारा शाकाहारी जानवरों या अन्य जानवरों का शिकार करके उनका भक्षण करना उनके जीवित बचे रहने का एक नियम है और जीवित बचे रहने का यह नियम परमेश्वर ने बनाया था और परमेश्वर ने ही नियत किया था। मनुष्य को इसमें दखल नहीं देना चाहिए या इसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए बल्कि चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देना चाहिए। तो चीजों को स्वाभाविक रूप से होने देने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि जब तुम किसी बाघ या किसी दूसरे मांसाहारी जानवर को हिरण या दूसरे जानवर का शिकार करते हुए देखो तो अगर तुममें पर्याप्त साहस है तो तुम बिना दखल दिए दूर से देख सकते हो। अगर तुम डरपोक हो और खून-खराबे वाली, जानलेवा लड़ाई का यह दृश्य देखना सहन नहीं कर सकते तो मत देखो, लेकिन तुम्हें इन मांसाहारी जानवरों के शिकार करने वाले व्यवहार की इस वजह से निंदा नहीं करनी चाहिए कि तुम खूनी दृश्य देखना बर्दाश्त नहीं कर सकते, और यह शिकायत तो तुम्हें और भी नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ने इन मांसाहारी जानवरों को सृजित कर गलती की; यह एक ऐसा काम है जिसमें कोई समझ नहीं है। यह सामान्य है कि तुम इसे नहीं समझते, लेकिन तुम्हें मांसाहारी जानवरों से उनके जीवित बचे रहने का अधिकार नहीं छीनना चाहिए। कुछ लोग पूछते हैं, “तो क्या हमें अप्राकृतिक रूप से उनकी रक्षा करनी चाहिए?” दखल देने का कोई काम न करके या नुकसान न पहुँचाकर तुमने पहले ही मनुष्य होने की जिम्मेदारी पूरी कर दी है। अप्राकृतिक रूप से उनकी रक्षा करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि जानवर भी परमेश्वर के बनाए हुए प्राणी हैं; और यह देखते हुए कि उन्हें परमेश्वर ने सृजित किया था, परमेश्वर उन्हें पहले ही जीवित बचे रहने की क्षमता दे चुका है—उन्हें तुम्हारे दखल देने या मदद करने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, क्या तुम उनकी मदद कर सकते हो? क्या तुम वह क्रूरता दोहरा सकते हो जिससे वे अपना शिकार करते हैं? लोगों में वह गुण नहीं है। ज्यादा से ज्यादा, लोग सिर्फ कुछ शिकार मारने के लिए हथियारों का इस्तेमाल कर सकते हैं जो जानवरों की जरूरतें पूरी करने से बहुत दूर है। इसके अलावा, कुछ जानवर मरा हुआ शिकार नहीं खाते; वे सिर्फ जिंदा, ताजा मांस खाते हैं। तुम्हें मांसाहारी जानवरों के जीवित बचे रहने के अधिकारों में दखल नहीं देना चाहिए या उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए, न ही तुम्हें शाकाहारी जानवरों को नुकसान से बचाना चाहिए; इतना काफी है कि तुम उन्हें नुकसान न पहुँचाओ या उनका शिकार न करो। सभी तरह के जानवरों के जीवित बचे रहने के अपने नियम हैं और वे परमेश्वर द्वारा नियत नियमों और परमेश्वर द्वारा स्थापित कानूनों के अनुसार प्रजनन करेंगे और जीवित रहेंगे। उनके जीवित बचे रहने के अपने नियम हैं और जीवित बचे रहने की अपनी क्षमताएँ हैं और अनेक प्रकार से उनकी जीवित बचे रहने की क्षमताएँ इंसानों की जीवित बचे रहने की क्षमताओं से भी श्रेष्ठ हैं। हालाँकि वे हथियार और औजार नहीं बना सकते और न ही उनका इस्तेमाल कर सकते हैं, फिर भी कुछ मामलों में स्वतंत्र रूप से जीवित बचे रहने की उनकी क्षमता इंसानों की क्षमता से बेहतर है। अगर इंसान जंगल में रहते तो उनके लिए जीवित बचे रहना मुश्किल होता; कुछ तो प्यास, भूख या ठंड से मर जाते या जंगली जानवरों द्वारा खा लिए जाते। यह स्पष्ट है कि जंगल में स्वतंत्र रूप से जिंदा रहने की इंसानों की क्षमता जानवरों की क्षमता से कम है। और ऐसा क्यों है? यह भी परमेश्वर के विधान से संबंधित है।
जो कुछ परमेश्वर द्वारा नियत है, उसके बारे में लोगों को जिस सिद्धांत का पालन करना चाहिए वह है उसमें जानबूझकर दखल न देना या उसे नुकसान न पहुँचाना। उदाहरण के लिए, जानवरों के साथ व्यवहार को ही लो : लोगों को दया करके उनकी रक्षा करने की जरूरत नहीं है। अगर तुम उन्हें परेशान नहीं करते, उनके जीवन परिवेश को नुकसान नहीं पहुँचाते या उनके जीवित बचे रहने के नियमों और कानूनों को नष्ट नहीं करते तो तुम इंसान होने की अपनी जिम्मेदारी पूरी कर देते हो। अगर कोई जानवर घायल हो जाता है या किसी मुश्किल का सामना करता है और इंसानों से मदद माँगता है तो क्या लोगों को उसकी मदद करनी चाहिए? (हाँ।) इस मदद को अप्राकृतिक दखल नहीं माना जाता, बल्कि यह एक ऐसी जिम्मेदारी है जो लोगों को निभानी चाहिए। यह एक ऐसी जिम्मेदारी क्यों है जो लोगों को निभानी चाहिए? क्योंकि यह ऐसी चीज है जिसे करने में इंसान सक्षम हैं। इस स्थिति में, लोगों को प्यार दिखाना चाहिए और मदद करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इंसान और जानवर दोनों ही प्राणी हैं। बात बस यह है कि परमेश्वर की नजर में इंसान उसके उद्धार का पात्र है, एक ऊँचे दर्जे का प्राणी है, दूसरों से अलग है। चूँकि इस भौतिक दुनिया में, इस जगह सभी एक-साथ रहते हैं, इसलिए जरूरत के समय एक-दूसरे की मदद करना किसी सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करता। यह ऐसा चरित्र है जो कम से कम, इंसानों में होना चाहिए और ऐसी चीज है जिसे हासिल करने में उन्हें समर्थ होना चाहिए। अगर सच में कोई घायल जानवर तुम्हारे पास मदद के लिए आता है, तो वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि वह तुम्हारा बहुत सम्मान करता है और तुम पर भरोसा करता है। यह तथ्य कि वह तुम्हारी मदद माँग सकता है, यह साबित करता है कि वह बेवकूफ नहीं है; वह सोचने में सक्षम है और जानता है कि हालाँकि इंसान उनसे अलग हैं, लेकिन इंसानों के पास उसे जिंदा रहने में मदद करने के तरीके हैं। जब दूसरे प्राणी इंसानों का इतना सम्मान करते हैं तो क्या इंसानों को सभी चीजों के स्वामी की भूमिका अच्छे से नहीं निभानी चाहिए और वे दायित्व पूरे नहीं करने चाहिए जो उन्हें करने चाहिए? (हाँ।) यही अभ्यास का सिद्धांत है। सभी चीजों के स्वामी की भूमिका अच्छे से निभाने के लिए सिर्फ यह इच्छा रखना काफी नहीं है—इसके लिए वास्तविक क्रियाकलाप जरूरी है। जब दूसरी जीवित चीजें मुश्किलों का सामना करती हैं या वे जरूरतमंद होती हैं तो तुम्हें उनकी सहायता करने के लिए मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर उनका मरना या किसी बड़ी आपदा का सामना करना नियत है और तुम मदद नहीं कर सकते तो कुछ नहीं करना है और तुम्हें बस चीजों को अपने आप होने देना चाहिए—तुम्हें बस पूरी कोशिश करनी है। अगर तुम उन्हें मुश्किलों या खतरे में देखते हो, तो उसी समय तुम्हें अपनी जिम्मेदारी और दायित्व निभाना चाहिए। अगर नहीं देखते तो उसे ढूँढ़ने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है—यह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं है। उनकी अपनी नियति है और तुम्हें इस बारे में अग्रसक्रिय रूप से कोशिश करने की जरूरत नहीं है। इसके उलट, अगर वे मुश्किल में हैं और तुमसे मदद माँगते हैं, तो मदद का हाथ बढ़ाना तुम्हारा परम कर्तव्य है; तुम्हें मना नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हें सड़क पर कोई जंगली हंस मिलता है जो तुम्हारा रास्ता रोक रहा है और तुम्हें जाने से रोकने की कोशिश कर रहा है तो अगर तुम्हारा दिल प्रेममय है तो तुम्हें समझना चाहिए कि हंस मुश्किल में है और मदद माँगने के लिए तुम्हारे पास आया है। इस समय तुम्हें क्या करना चाहिए? (हमें हंस के पीछे जाकर देखना चाहिए कि क्या गड़बड़ी है और अगर कर सकें तो उसकी मदद करनी चाहिए।) यह सही है। हंस के पीछे जाओ, देखो वह तुम्हें कहाँ ले जाता है और उसे किस मुश्किल या खतरे का सामना करना पड़ा है जिसके लिए इंसानी मदद की जरूरत है। तुम्हें उसकी मदद करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए—तुम उसे मँझधार में नहीं छोड़ सकते। जिम्मेदारी की यही भावना है जो इंसानों में होनी चाहिए। परमेश्वर द्वारा बनाए गए विभिन्न जीवों को सँजोकर रखना, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों को सँजोकर रखना—यह सकारात्मक चीजों से प्यार करने का चरित्र है जो लोगों में होना चाहिए। कुछ लोग पूछते हैं, “क्या यह पुण्य संचित करना और अच्छा काम करना है?” नहीं। “पुण्य संचित करने और अच्छा काम करने” वाली बात सही नहीं है। ऐसे बड़े बोल बोलने की जरूरत नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो, पुण्य संचित करने और अच्छा काम करने का पूरा विचार बकवास है! यह इंसान के दायित्व निभाना है; यह जिम्मेदारी की सबसे बुनियादी भावना है जो लोगों में होनी चाहिए। एक बार जब तुम हंस की मदद कर देते हो, तो तुम्हारी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। तुम्हें उससे धन्यवाद देने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए, न ही तुम्हें उससे अपनी दया का बदला चुकाने की उम्मीद करनी चाहिए—तुमने जो किया वह ऐसी चीज थी जिसे करने के लिए इंसान बाध्य हैं। यह दायित्व पूरा करना और जिम्मेदारी की यह भावना रखना परमेश्वर के वचनों का पालन करना है—परमेश्वर द्वारा सृजित और नियत सभी चीजें सकारात्मक चीजें हैं और हमें उन्हें सँजोकर रखना चाहिए। परमेश्वर का आदेश है कि उसकी बनाई सभी चीजों को सँजोकर रखो। यह मानवता के सामान्य बोध का हिस्सा है जो कम से कम, सभी चीजों के स्वामी होने के नाते इंसानों में होना चाहिए। विशिष्ट रूप से यह जिम्मेदारी की वह भावना है जो कम से कम, उनमें होनी चाहिए। दूसरे जीवों के साथ दखलंदाजी मत करो, उनके जीवित बचे रहने के नियम नष्ट मत करो और उनसे उनका जीवित बचे रहने का अधिकार मत छीनो; इसके अलावा, किसी खास तरीके से जीने में अप्राकृतिक ढंग से उनकी मदद करने या किसी खास तरीके से जीवित बचे रहने के लिए उनका मार्गदर्शन करने और उन्हें विनियमित करने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बजाय, उनके जीवित बचे रहने के कानूनों और उनके जीवित बचे रहने के नियमों का सम्मान करो। जब उन्हें मदद की जरूरत हो, अगर तुम्हें यह दिखे, तो तुम्हें उनसे किनारा नहीं करना चाहिए या आँखें मूँदकर उन्हें नुकसान होते और मरते हुए नहीं देखना चाहिए, बल्कि इंसानों को जो जिम्मेदारी और दायित्व निभाना चाहिए, उसे निभाने के लिए मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए। उनकी मदद करके तुम उन्हें बचाते हो। इससे तुम थककर चूर नहीं हो जाओगे, न ही इसके लिए तुम्हें कोई बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी या बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ेगी और उन्हें बचाने के लिए अपनी जान तो बिल्कुल भी नहीं देनी पड़ेगी। इसमें तुम्हारा कुछ नहीं जाएगा; यह ऐसी चीज है जो तुम्हें एक इंसान के तौर पर करनी ही चाहिए। अगर तुमसे उन्हें अपनी पूरी ताकत से बचाने के लिए कहा जाए, तो यह हासिल करना आसान नहीं होगा, लेकिन तुम्हें चीजों को उनके प्राकृतिक तरीके से होने देना चाहिए—उनमें दखल नहीं देना चाहिए, उनके जीवन परिवेश को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए या उनके जीवित बचे रहने के नियम नष्ट नहीं करने चाहिए और उनसे उनका जीवित बचे रहने का अधिकार नहीं छीनना चाहिए। अगर तुम यह भी नहीं कर सकते, तो तुम अमानव हो, तुम इंसान का पुनर्जन्म नहीं हो और तुममें मानवता नहीं है। मानवता न होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कि तुममें जानवरों की रक्षा करने, उनकी देखभाल करने और परमेश्वर द्वारा बनाए गए जीवों का सम्मान करने का जमीर और विवेक तक नहीं है। अगर तुम हमेशा उन्हें नुकसान पहुँचाने, उन्हें खाने और उनसे उनके जीवित बचे रहने का अधिकार छीनने के बारे में सोचते रहते हो, तो तुम इंसान नहीं बल्कि एक जंगली जानवर हो। क्या अब यह स्पष्ट है? (हाँ।)
परमेश्वर जो नियत करता है, उसके बारे में कुछ अन्य स्थितियाँ हैं। उदाहरण के लिए, कुछ जानवरों के उत्तरजीविता के नियम दूसरे जीवों से थोड़े अलग या उलटे भी होते हैं, जैसे उल्लू, चमगादड़ और कुछ दूसरे जानवर, जिनका उत्तरजीविता का नियम दिन में सोना और रात में सक्रिय रहना है। यह परमेश्वर ने नियत किया था और अगर कभी-कभी खास परिस्थितियों की वजह से ये जानवर कुछ समय के लिए अपनी यह दिनचर्या बदल लें, तो भी सामान्य स्थितियों में उनके उत्तरजीविता के कानून और नियम बुनियादी तौर पर नहीं बदलते। लोग हमेशा इन जानवरों के नियम बदलने के बारे में सोचते रहते हैं, उन्हें इंसानों की तरह दिनचर बनाना चाहते हैं। वे इन जानवरों के अनुवांशिक गुण और रक्त सीरम, उनकी गतिविधियों के तौर-तरीकों वगैरह पर अनुसंधान करते हैं, उनके उत्तरजीविता के नियमों और गतिविधियों के तौर-तरीकों को बदलने और नष्ट करने का हर तरीका सोचते हैं। क्या यह अच्छा है? (नहीं।) क्या ऐसा व्यवहार, ऐसी सोच एक सकारात्मक चीज है? (नहीं।) यह एक नकारात्मक चीज है और ऐसी चीज है जो गैर-मानव करते हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान से ये जीव थोड़े बदल तो जाते हैं, लेकिन बहुत दर्दनाक और असामान्य रूप से जीने लगते हैं। सामान्य लोग यह देखना सहन नहीं कर सकते। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं, “अब इतने सारे चूहे हो गए हैं; अगर कुत्ते चूहों को पकड़ पाते तो कितना अच्छा होता। कुत्ते घर की रखवाली कर पाते और हम कुत्तों के खाने पर पैसे भी बचा पाते क्योंकि वे चूहे खाते और हमें बिल्लियाँ रखने की जरूरत न पड़ती। एक तीर से तीन शिकार हो जाते। कितना अच्छा होता, है ना?” फिर वे अनुसंधान करते हैं कि बिल्लियों और कुत्तों के अनुवांशिक गुण कैसे मिलाए जाएँ, ताकि कुत्तों में कुत्ते और बिल्ली दोनों के अनुवांशिक गुण हों और वे कुत्ते और बिल्ली की एक संकर प्रजाति बन जाएँ जो घर की रखवाली भी कर सकें और चूहे भी पकड़ सकें। क्या यह विचार अच्छा है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि वे हमेशा परमेश्वर ने जो नियत किया है उसे नष्ट करना चाहते हैं और परमेश्वर द्वारा नियत कानून तोड़ना चाहते हैं। यह ठीक वही है जो शैतान करता है और जो भ्रष्ट मानवजाति करती है।) ऐसे विचार दुष्टतापूर्ण होते हैं। दुष्टतापूर्ण विचार कहाँ से आते हैं? वे पूरी तरह से शैतान और आत्माओं से आते हैं। इसलिए, ऐसे भ्रष्ट लोग गैर-मानव होते हैं। वे हमेशा परमेश्वर द्वारा नियत सकारात्मक चीजें बदलना चाहते हैं और विभिन्न जीवों के परमेश्वर द्वारा नियत मूल प्रकार्य, गतिविधियों के तौर-तरीके और उत्तरजीविता के नियम बदलना चाहते हैं। वे हमेशा परमेश्वर द्वारा नियत जीवों के उत्तरजीविता के स्वरूप नष्ट करना चाहते हैं, वे हमेशा कुछ दुष्ट और बहुत ज्यादा विद्रोही विचार, सोच और दृष्टिकोण विकसित कर लेते हैं और हमेशा परमेश्वर द्वारा नियत विभिन्न चीजें नष्ट करना चाहते हैं। ऐसे लोग गैर-मानव हैं; उनमें मानवता नहीं है। उनकी सोच या क्रियाकलाप कभी भी जमीर और विवेक के दायरे में नहीं होते, बल्कि वे हमेशा सामान्य मानवता का दायरा पार करना चाहते हैं—यह गैर-मानव होने की अभिव्यक्ति है। वे सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के भीतर परमेश्वर द्वारा नियत सभी चीजों के उत्तरजीविता के नियमों और अस्तित्व के रूपों का सम्मान नहीं करते या उन्हें कायम नहीं रखते। इसके बजाय, वे हमेशा परमेश्वर द्वारा नियत उत्तरजीविता के नियमों को नष्ट करना, बाधित करना और बदलना चाहते हैं, ताकि दूसरे जीवों के जीने के तरीके बदल सकें। वे चाहते हैं कि बिल्लियाँ अब बिल्लियाँ न रहें और कुत्ते अब कुत्ते न रहें, उन सभी को असामान्य, दुष्टतापूर्ण चीजों में बदल दें, उन्हें एक दुष्टतापूर्ण दिशा में विकसित होने पर मजबूर कर दें। वे हमेशा सकारात्मक चीजों का अस्तित्व नष्ट करना चाहते हैं और हमेशा सकारात्मक चीजों के उत्तरजीविता के स्वरूप को नष्ट करना चाहते हैं। क्या वे गैर-मानव नहीं हैं? (हैं।) गैर-मानवों द्वारा उत्पन्न और धारण किए गए विचार और दृष्टिकोण नकारात्मक चीजें होती हैं और वे सकारात्मक चीजों की विरोधी होती हैं। चूँकि उनके दृष्टिकोण नकारात्मक चीजें हैं और सकारात्मक चीजों के विरोध में हैं, इसलिए क्या उनके द्वारा अपने पेशों में बनाई जाने वाली वस्तुएँ और वे नतीजे जो वे उत्पन्न करते हैं, नकारात्मक चीजें नहीं हैं? (वे हैं।) ये चीजें नकारात्मक चीजें होती हैं। हालाँकि कुछ चीजें मानवजाति पर सीधे कोई बुरा असर नहीं डालतीं या उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचातीं, फिर भी अगर वे परमेश्वर द्वारा नियत चीजों की विरोधी हैं, अगर वे परमेश्वर के बनाए गए कानूनों और नियमों का उल्लंघन करती हैं और अगर उनका जीवित बचे रहने का एक अलग तरीका या एक अलग कानून और नियम है जो परमेश्वर द्वारा नियत कानूनों और नियमों में मनुष्य के अप्राकृतिक दखल देने, उनका प्रसंस्करण करने और उन्हें नष्ट करने के कारण बना है, तो ये चीजें नकारात्मक चीजें हैं। चाहे जितने भी लोग ऐसी चीज के अस्तित्व को स्वीकारते और मानते हों या चाहे वह जितने भी लोगों के जीवन और उत्तरजीविता को शारीरिक सुख देती हो, अगर वह परमेश्वर द्वारा नियत मूल रूप में नहीं है और अगर वह परमेश्वर द्वारा नियत मूल अवस्था में नहीं है, बल्कि उसकी उत्तरजीविता की नियत संरचना, रूप या कानून और नियम बदल दिए गए हैं और नष्ट कर दिए गए हैं, तो वह एक नकारात्मक चीज है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान ने उसका प्रसंस्करण कर दिया है, उसे नुकसान पहुँचा दिया है और बदल दिया है और उसमें शैतान की अवधारणाएँ, उसके विचार और दृष्टिकोण, यहाँ तक कि शैतान के कुछ जहर या शैतान की साजिशें भी डाल दी गई हैं। अगर लोग उसकी असलियत न जान पाएँ, तो भी वह एक नकारात्मक चीज है। संक्षेप में, अगर वह ऐसी चीज है जो परमेश्वर द्वारा नियत मूल चीज की विरोधी है, ऐसी चीज—चाहे वह सजीव हो या निर्जीव—जिसका परमेश्वर द्वारा नियत मूल रूप, संरचना या उत्तरजीविता के कानून और नियम नष्ट कर दिए गए हैं और बदल दिए गए हैं और साथ ही जिसमें शैतान की तरफ से विभिन्न अतिरिक्त चीजें डाल दी गई हैं या जोड़ दी गई हैं, तो वह एक नकारात्मक चीज है और पहले ही विकृत की जा चुकी है। इंसानों के शारीरिक जीवन या उत्तरजीविता पर उसका चाहे किसी भी तरह का मात्रात्मक प्रभाव हो, अगर उसमें गुणात्मक बदलाव हुआ है और उसकी गुणवत्ता बदल गई है, तो वह एक नकारात्मक चीज है। यह पक्का है और बिल्कुल भी गलत नहीं है। अगर कोई चीज नकारात्मक चीज है, चाहे वह इस दुनिया में कितने भी समय से मौजूद हो या मनुष्य और समाज द्वारा कितने भी समय से स्वीकृत हो, अगर वह परमेश्वर द्वारा नियत मूल चीज नहीं है, तो परमेश्वर उसे मान्यता नहीं देता और अगर परमेश्वर उसे मान्यता नहीं देता, तो वह एक नकारात्मक चीज है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?