सत्य का अनुसरण कैसे करें (19) भाग चार

परमेश्वर लोगों को जो जन्मजात स्थितियाँ देता है उनमें शामिल विभिन्न क्षमताओं का या लोगों में जो भी काबिलियत और क्षमताएँ जन्मजात होती हैं उनका, पश्चिमी या पूर्वी शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। लोगों को परमेश्वर द्वारा दी गई जन्मजात स्थितियों में मौजूद अलग-अलग क्षमताएँ सकारात्मक चीजें हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि वे सकारात्मक चीजें हैं? क्योंकि ये जन्मजात स्थितियाँ परमेश्वर से आती हैं। विशिष्ट तौर पर, इन जन्मजात स्थितियों के होने से एक सृजित इंसान सकारात्मक चीजों को स्वीकार कर पाता है और वास्तविक जीवन में सामने आने वाले विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से सीख पाता है, उनके आधार पर आत्म-चिंतन कर पाता है, उन पर पकड़ बना पाता है और उन्हें समझ पाता है। इसे परमेश्वर ने लोगों के लिए व्यवस्थित और तैयार किया है, इसलिए यह एक सकारात्मक चीज है। चाहे पूर्वी शिक्षा हो या पश्चिमी शिक्षा, चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों का उस सत्य से कोई लेना-देना नहीं है जो परमेश्वर लोगों को सिखाता और देता है। यहाँ तक कि यह, सत्य और उस मानवता के खिलाफ है जो परमेश्वर लोगों में देखना चाहता है। इसलिए न तो पूर्वी शिक्षा और न ही पश्चिमी शिक्षा सकारात्मक चीज है। चाहे समाज से आए, बुरी प्रवृत्तियों से आए या किसी शासक वर्ग से, यह सकारात्मक नहीं है। हालाँकि पश्चिमी शिक्षा पूर्वी शिक्षा की तुलना में थोड़ी अधिक उन्नत और बेहतर है, लोगों को थोड़ी आजादी देने और उनकी कुछ जरूरतें पूरी कर पाने में समर्थ है, लेकिन यह केवल लोगों की स्वतंत्र इच्छाशक्ति का और समस्याओं के बारे में सोचने और अपनी राय खुलकर व्यक्त करने की उनकी क्षमता का इस्तेमाल करती है। यानी, यह सकारात्मक चीजों का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह जिन विचारों की हिमायत करती है और जिन लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है, वे लोगों को सही रास्ते पर ले जाने के लिए नहीं हैं, न ही वे उन्हें परमेश्वर जैसा चाहता है वैसे सच्चे सृजित इंसान बनने में मदद करने के लिए हैं। इसलिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए, हालाँकि पश्चिमी शिक्षा पूर्वी शिक्षा से बेहतर है या यह मानवता की जरूरतें पूरी करती है, लेकिन इसने लोगों की स्वतंत्र इच्छाशक्ति या कुछ निश्चित क्षमताओं का इस्तेमाल करके उन्हें परमेश्वर के सामने समर्पण करने, सृजित प्राणी के तौर पर सही तरीके से काम करने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने में समर्थ नहीं बनाया है। यह शिक्षा लोगों को परमेश्वर के सामने भी नहीं लाई है, न ही इसने परमेश्वर की आराधना करने और बुराई से दूर रहने में समर्थ बनने में उनकी मदद की है। पूर्वी शिक्षा और पश्चिमी शिक्षा का काम एक ही है : दोनों ही, लोगों को परमेश्वर से और सत्य से दूर कर देती हैं। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, दोनों ही मानवजाति पर शैतान के शासन की व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि में और शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया से उभरी हैं। इसलिए, चाहे पूर्वी संस्कृति के रूप में शिक्षा हो या पश्चिमी संस्कृति के रूप में, हर कोई शैतान की भ्रष्टता वाले इस मानव संसार में जीता है। इसी तरह, अलग-अलग समाजों में या समाज के अलग-अलग रूपों की शिक्षा के तहत मानवजाति भी भ्रष्ट हो गई है और इस भ्रष्टता का नतीजा यह है कि लोगों में एक ऐसी मानवता आ गई है जिसने—संस्कृति के अलग-अलग स्तरों और रूपों में—भ्रष्ट स्वभावों को अपना जीवन बना लिया है। पूरब के लोगों में पूर्वी संस्कृति से पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुणों के भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों में पश्चिमी संस्कृति की पृष्ठभूमि में पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुणों के भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। हालाँकि पूरब और पश्चिम के लोग अपनी मानवता के गुणों के मामले में अलग दिख सकते हैं, लेकिन अपने भ्रष्ट स्वभावों के मामले में, चूँकि वे सभी शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, पूरब और पश्चिम दोनों के लोग एक समान भ्रष्ट स्वभावों में जीते हैं और दोनों में ऐसी मानवता है जहाँ समान भ्रष्ट स्वभाव उनका जीवन हैं। इस तरह, पूरब और पश्चिम के लोगों का प्रकृति सार एक जैसा है : दोनों ही सत्य और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। इसलिए, पूरब या पश्चिम के लोगों के बारे में कुछ भी प्रशंसा के लायक नहीं है। चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, परमेश्वर और सत्य की उपस्थिति में दोनों ही नकारात्मक चीजें हैं, जिनमें कुछ भी सराहनीय नहीं है। पूर्वी और पश्चिमी दोनों सभ्यताएँ मानवजाति के सृजन में परमेश्वर के मूल इरादे के खिलाफ हैं, जो यह था कि मानवजाति उसकी आराधना करे; वे इंसानों को, जो प्राणियों की श्रेणी में आते हैं, परमेश्वर की उपस्थिति से दूर करने के लिए सांस्कृतिक शिक्षा के अपने-अपने संबंधित रूपों का इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में, पूरब और पश्चिम एक जैसे हैं, हैं ना? (हाँ।) पूरब और पश्चिम में कुछ भी प्रशंसा के लायक नहीं है। देखो, हालाँकि दोनों ने अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार लिया है, लेकिन पूरब के लोग इसे स्वीकारने के बाद तुरंत भाई-बहनों की मेजबानी करना शुरू कर देते हैं और सक्रिय होकर उन्हें अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को सुसमाचार का उपदेश देने के लिए ले जाते हैं; उनमें सुसमाचार प्रचार के काम के प्रति बहुत जोश और उत्साह होता है—दूसरी ओर, पश्चिमी लोग अलग होते हैं। वे सुसमाचार प्रचार के काम को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। आधे साल या एक साल तक परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकारने के बाद भी, जब तुम उनसे पूछते हो कि क्या उन्होंने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को सुसमाचार का प्रचार किया है, तब वे कहते हैं, “मेरे माता-पिता, रिश्तेदार, दोस्त और कलीसिया जाने वाले ज्यादातर लोग प्रभु की वापसी के मामले में अपने अलग विचार और दृष्टिकोण रखते हैं। मुझे इस पर सावधानी से सोचना होगा और उनसे बात करनी होगी, तभी मैं उन्हें संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ता के तौर पर तुम लोगों को दे पाऊँगा। हम पश्चिम में जिस तरह से आचरण करते हैं, उसकी मुख्य खासियत यह है कि अपने अधिकारों का बचाव करना और अपने स्वतंत्र स्थान की अधिक से अधिक सीमा तक रक्षा करना हमारे लिए अनिवार्य है। तुम बिना सोचे-समझे लोगों को सुसमाचार का उपदेश कैसे दे सकते हो?” तुम कहते हो, “तुम उन्हें सुसमाचार का उपदेश इसलिए देते हो ताकि वे प्रभु का स्वागत कर सकें, अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों को प्राप्त कर सकें और उनके पास उद्धार पाने और आपदाओं में जीवित रहने का अवसर हो। यह परमेश्वर का आदेश है और यह वह जिम्मेदारी है जो तुम्हें पूरी करनी ही होगी।” वे जवाब देते हैं, “ठीक है, मुझे अभी भी पहले खुद की रक्षा करनी है; परमेश्वर का आदेश इंतजार कर सकता है। मैं इस मामले में खुद फैसला ले सकता हूँ। मेरे अपने स्वतंत्र विचार होने चाहिए और मैं तुम लोगों के बहकावे में नहीं आ सकता। हम पश्चिम के लोग लोकतंत्र और आजादी को महत्व देते हैं; हममें अपने अधिकारों की रक्षा करने की जागरूकता है। हम तुम पूरब के लोगों जैसे नहीं हैं जो बिना सोचे-समझे जोश दिखाते हैं। हम सभी का अपना निजी जीवन स्थान है और कोई किसी को परेशान नहीं करता।” देखा? ऐसे ही अहम पलों में पूरब और पश्चिम के लोगों की मानवता के विशिष्ट गुणों में भिन्नता और अंतर का पता चलता है। लेकिन किसी भी मामले में, चाहे मानवता के विशिष्ट गुण पूर्वी शिक्षा से आए हों या पश्चिमी शिक्षा से—चाहे वह उत्साह हो या उदासीनता—जब तक कोई इंसान शैतान के भ्रष्ट स्वभावों में जीता है, तब तक वह भ्रष्ट मानवजाति का हिस्सा है। यहाँ ऊँच-नीच का कोई अंतर नहीं है; हर किसी को सत्य की समझ, परमेश्वर के वचनों के प्रावधान, परमेश्वर के उद्धार और साथ ही, परमेश्वर के न्याय और ताड़ना की जरूरत है।

हालाँकि पूरब और पश्चिम के लोगों की संस्कृतियाँ अलग-अलग हैं और वे परमेश्वर के प्रभुत्व और संप्रभुता के अधीन अलग-अलग सभ्यताओं में रहते हैं, लेकिन परमेश्वर के सामने उनकी केवल एक ही पहचान है और वह है सृजित प्राणियों की पहचान। सृजित प्राणियों की समानता का आधार यह है कि परमेश्वर ने लोगों के लिए जो जन्मजात स्थितियाँ बनाई हैं, वे एक समान हैं। पूरब और पश्चिम के लोगों के बीच चाहे कितने भी सांस्कृतिक भेद हों; चाहे उनके रूप-रंग, उनकी भाषा, या समस्याओं के बारे में सोचने के उनके ढंग और तरीके कितने भी अलग हों, जब तक परमेश्वर के सामने तुम उसके बनाए हुए सृजित प्राणी हो, तब तक तुम्हारे पास जो एकमात्र सकारात्मक चीज है वह है वे जन्मजात स्थितियाँ जो उसने तुम्हें दी हैं; बाकी सब कुछ नकारात्मक है। यह तुम लोगों को थोड़ी सामान्य बात लग सकती है, इसलिए विशेष रूप से कहें तो, परमेश्वर द्वारा दी गई जन्मजात स्थितियों को छोड़कर, तुममें जो कुछ भी है वह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर बदलना चाहता है; यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें सत्य स्वीकार करके बदलना और त्याग देना चाहिए। तुम्हें क्या जानने की जरूरत है? मानवजाति की तथाकथित संस्कृति, चाहे वह पूर्वी हो या पश्चिमी, उन विचारों और दृष्टिकोणों या सिद्धांतों और कथनों से बनी है जिन्हें अलग-अलग दौर के शासक वर्गों ने जनता को शिक्षित करने के लिए डिजाइन किया है। लेकिन चाहे वह पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी, इसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। भले ही इसका सत्य से टकराव न हो, फिर भी इसे सकारात्मक चीज नहीं कहा जा सकता। कोई संस्कृति कितनी भी अच्छी हो, वह सत्य के बराबर नहीं हो सकती, सत्य का प्रतिनिधित्व करना तो दूर की बात है। भले ही लोग इसे नकारात्मक चीज न मानते हों, फिर भी इसे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में बिल्कुल नहीं रखा जा सकता। तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। भले ही कोई विचारधारा मानवजाति के बीच अपेक्षाकृत उन्नत और प्रगतिशील हो, वह लोगों के अधिकारों और हितों के साथ-साथ उनके अस्तित्व की रक्षा करती हो और उसका किसी भी तरह से सत्य से टकराव न हो, फिर भी इसे सकारात्मक चीजों की श्रेणी में बिल्कुल नहीं रखा जा सकता। क्यों नहीं रखा जा सकता? क्योंकि केवल वही चीजें जो परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के दायरे में हैं, सकारात्मक चीजें हैं। तो इस दायरे की चीजों को सकारात्मक चीजों की श्रेणी में क्यों रखा गया है? क्योंकि उनमें सत्य शामिल है। व्यापक दृष्टिकोण से, इसे परमेश्वर के स्तर से और परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से देखने पर, उनमें परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार; परमेश्वर का स्वभाव; परमेश्वर की सृष्टि, विधान और इन सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता के पीछे के सिद्धांत और मूल इरादे; वह उद्देश्य जिसे वह हासिल करना चाहता है, और जिन सकारात्मक चीजों को वह बनाए रखना चाहता है उनसे होने वाले सभी प्रभाव शामिल हैं। चूँकि परमेश्वर के स्तर से, इनमें परमेश्वर का अधिकार, सामर्थ्य और विचार शामिल हैं, साथ ही परमेश्वर द्वारा यह सब करने में शामिल निर्धारित नियम और कानून और इसका मानवजाति पर पड़ने वाला प्रभाव भी शामिल है, इसलिए इस दायरे में आने वाली चीजें निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें हैं। मानवीय परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हर एक चीज लोगों के लिए फायदेमंद है; यह सब मानवजाति की व्यवस्थित उत्तरजीविता और प्रजनन को बनाए रखने और कायम रखने के लिए मौजूद है। एक दूसरी, और अधिक विशिष्ट बात भी है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है : ये चीजें लोगों को सत्य समझने और परमेश्वर को बेहतर ढंग से जानने में, आखिरकार उद्धार पाने के मार्ग पर चलने में, और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाले लोग बनने में समर्थ बनाने के लिए मौजूद हैं—यही वह नतीजा है जिसे हासिल किया जाना है। इसलिए, चाहे परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या मानवीय परिप्रेक्ष्य से, परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत और परमेश्वर की संप्रभुता के दायरे में आने वाले लोग, घटनाएँ और चीजें सभी सकारात्मक चीजें हैं। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। जरा सोचो—क्या मानव सभ्यता और संस्कृति उन चीजों के बराबर हो सकती हैं जो परमेश्वर के वचनों और मनुष्य के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के स्तर की हैं? वे निश्चित रूप से ऐसी चीजों के बराबर नहीं हो सकतीं या उन तक नहीं पहुँच सकतीं। मानवीय शिक्षा या संस्कृति की विषय-वस्तु में परमेश्वर का सार, परमेश्वर का स्वभाव या परमेश्वर द्वारा मानवजाति के लिए निर्धारित नियम और कानून शामिल नहीं हैं, सभी चीजों को बनाने में परमेश्वर का मूल इरादा शामिल होना तो दूर की बात है। इसके अलावा, मानवीय परिप्रेक्ष्य से, इस तरह की शिक्षा और संस्कृति मानवजाति को सृष्टिकर्ता, परमेश्वर को जानने में मदद नहीं कर सकतीं, न ही वे मानवजाति को बेहतर ढंग से जीने या सामान्य और व्यवस्थित तरीके से प्रजनन करने और जीवित रहने में मदद कर सकती हैं। इसके विपरीत, इस तरह की संस्कृति और सभ्यता के शैक्षिक परिवेश में मानवजाति पतन और विनाश की ओर बढ़ेगी। एक और अधिक महत्वपूर्ण पहलू है : इस तथाकथित “सांस्कृतिक शिक्षा” और “सामाजिक सभ्यता” के अधीन, मानवजाति सत्य, अपने जीवित रहने का महत्व या जीवित बचे रहने का तरीका नहीं समझ सकती। इसके माध्यम से लोग जीवन के प्रति सही नजरिया भी हासिल नहीं कर सकते और उद्धार पाने के मार्ग पर नहीं चल सकते, न ही वे परमेश्वर की आराधना करने या परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने में समर्थ हो सकते हैं। इसके विपरीत, ऐसी सांस्कृतिक शिक्षा और सभ्यता वाले सामाजिक परिवेश में, मानवजाति उत्तरोत्तर अधिक भ्रष्ट और दुष्ट बनती जाती है, परमेश्वर से और दूर होती जाती है और बहुत अधिक बुराई करने लगती है। आखिरकार, भले ही परमेश्वर मानवजाति को नष्ट न करे, फिर भी मानवजाति खुद ही अपना विनाश कर लेगी। अगर मानवजाति खुद को शासित करने लगे, तो वह विनाश की ओर बढ़ेगी; यह होना ही है। मानवजाति के पास इतनी उच्च स्तर की संस्कृति है, इतना सारा ज्ञान है, इतनी महान सभ्यता है, वह विज्ञान पर विश्वास करती है और उस पर निर्भर रहती है—तो फिर भी वह खुद ही अपना विनाश क्यों करेगी? मानवजाति ज्ञान के पीछे भागती है और विज्ञान का इतना अधिक सम्मान करती है, फिर भी न केवल उसने सत्य नहीं समझा है और वह परमेश्वर में विश्वास करने, परमेश्वर का अनुसरण करने और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के रास्ते पर नहीं चली है, बल्कि वह खुद ही अपनी बरबादी भी ला सकती है। यहाँ क्या हो रहा है? मानवजाति के धरती का प्रबंधन करने के कारण अब इसका क्या हाल हो गया है? पूरी धरती का पानी, मिट्टी और हवा प्रदूषित हो गई है, पारिस्थितिक पर्यावरण बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया है और पूरी मानवजाति का जीवन धीरे-धीरे एक निराशाजनक स्थिति में आ गया है। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे हर कोई देख सकता है, इसलिए विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, है ना? (हाँ।) तो चाहे पूर्वी संस्कृति हो या पश्चिमी संस्कृति, चाहे मानवजाति की सभ्यता कैसी भी हो, भले ही वह किसी भी तरह से सत्य से न टकराती हो, फिर भी उसे सकारात्मक चीज की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। “मानव संस्कृति और सभ्यता” के विषय में शामिल किए गए दृष्टिकोण, विचार, सिद्धांत, धर्म-सिद्धांत, तर्क और व्यवहार; इस विषय के अंतर्गत निर्मित कोई भी उत्पाद, कृतियाँ या सुधार आदि सकारात्मक चीजें नहीं हैं। कुछ लोग कहते हैं, “चूँकि ये सकारात्मक चीजें नहीं हैं, तो क्या इसका मतलब है कि हमें इनकी आलोचना करनी होगी और इन्हें नकारात्मक चीजों की श्रेणी में रखना होगा?” मैंने इसे इतने शाब्दिक तरीके से नहीं कहा। हो सकता है इन चीजों में सकारात्मक या नकारात्मक चीजें शामिल नहीं हों, लेकिन किसी भी मामले में, वे निश्चित रूप से सकारात्मक चीजें नहीं हैं। यानी, भले ही ये चीजें सत्य से न टकराती हों और परमेश्वर की सृष्टि, विधान और संप्रभुता के सिद्धांत का उल्लंघन न करती हों—अगर वे नकारात्मक चीजें नहीं हैं—फिर भी वे बिल्कुल भी सकारात्मक चीजें नहीं हैं। संक्षेप में, मैं तुम्हें बता दूँ : भले ही कोई चीज सत्य से न टकराए, जब तक वह परमेश्वर द्वारा सृजित, परमेश्वर द्वारा नियत या परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं है, तब तक वह सकारात्मक चीज नहीं है। यह इस बात का भेद पहचानने का सिद्धांत है कि कोई चीज सकारात्मक है या नहीं; तुम्हें इस सिद्धांत के आधार पर चीजों में खुद भेद करना चाहिए। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? वह यह है कि तुम्हारे दिल में यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि जब तुम साफ-साफ नहीं देख पाते कि कोई चीज सकारात्मक है या नकारात्मक, तो तुम पहले उसे किनारे कर सकते हो और उसे अनदेखा कर सकते हो। जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद बढ़ जाएगा और सत्य तुम्हारे लिए स्पष्ट हो जाएगा, तब तुम स्वाभाविक रूप से उसका भेद पहचान पाओगे। लेकिन अभी के लिए, तुम्हें स्पष्ट रूप से यह पहचानना होगा कि कौन-सी चीजें सकारात्मक चीजें हैं जो परमेश्वर से आती हैं; तुम्हें उन्हें सही तरीके से स्वीकार करना होगा और उनके साथ सही तरीके से व्यवहार करना होगा। यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए फायदेमंद है। एक और महत्वपूर्ण बात है : अगर कोई चीज सकारात्मक चीजों की परिभाषा के दायरे में आती है, तो तुम्हें उसे बिल्कुल भी नकारात्मक चीज नहीं मानना चाहिए। यह सिद्धांत की बात है और तुम्हें इसके बारे में स्पष्ट होना चाहिए।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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