सत्य का अनुसरण कैसे करें (2) भाग एक

सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : जाने देना

अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना

I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना

हम पिछले कुछ समय से सत्य का अनुसरण करने के तरीके के अभ्यास में पहली मुख्य मद पर चर्चा कर रहे हैं, जो कि “त्याग देना” है। पिछली बार हमने “त्याग देना” से संबंधित तीसरी मद—अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना—के बारे में संगति की थी, जो कि बिल्कुल नई विषय-वस्तु थी। इस विषय-वस्तु का सिर्फ एक ही पहलू नहीं है; इसमें कई मद और ढेरों विषय-वस्तुएँ शामिल हैं। ये विषय-वस्तुएँ वे हैं जो लोग परमेश्वर के कार्य की प्रक्रिया में अनुभव करते हैं, और ये लोगों के जीवन और अनुसरणों से सीधे संबंधित हैं, इसलिए जिस पहले पहलू पर हमें वाकई संगति करनी चाहिए, वह परमेश्वर के बारे में लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। यह एक ऐसा विषय है जिससे लोग परमेश्वर में विश्वास रखने के मार्ग पर चलने की प्रक्रिया में बच नहीं सकते हैं। मैंने पिछली बार इस विषय-वस्तु के एक भाग पर संगति की थी। कोई हमें यह बताए कि मैंने विशेष रूप से किस चीज पर संगति की थी। (पिछली बार परमेश्वर ने व्यक्ति के अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देने के बारे में संगति की थी। परमेश्वर ने सबसे पहले अपने कार्य के बारे में हमारी धारणाओं और कल्पनाओं को उजागर किया था। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के दिन के बारे में हमारी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं और हम यह भी मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य बहुत ही अलौकिक है और जब तक पवित्र आत्मा कार्य करता है और लोगों को प्रेरित करता है, तब तक लोग किसी भी समस्या को हल करने में समर्थ होंगे और उनके भ्रष्ट स्वभाव परिवर्तित हो जाएँगे। इन धारणाओं और कल्पनाओं को उजागर करते समय परमेश्वर ने हमें बताया था कि वह अपने कार्य में जो परिणाम प्राप्त करने का इरादा रखता है वह है अपने वचनों को हममें कार्यान्वित करना ताकि जब हमारे रोजमर्रा के जीवन में हमारे साथ चीजें घटित हों तो हम परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में समर्थ हों—हममें से हरेक के लिए परमेश्वर की यह अपेक्षा है।) और कौन इसमें कुछ और जोड़ सकता है? (पिछली बार परमेश्वर ने इस तथ्य पर भी संगति की थी कि लोग मानते हैं कि परमेश्वर उनकी अस्थायी अभिव्यक्तियों के आधार पर उन पर फैसला सुनाता है और वे यह भी सोचते हैं कि बाहरी विनियमों और बाहरी रूप से अच्छे व्यवहारों का पालन करके वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं और ऐसा करके वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं—ये सभी लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। साथ ही, जब लोग कमजोर होते हैं या विद्रोहीपन और भ्रष्टता प्रकट करते हैं तो वे मानते हैं कि परमेश्वर उन्हें अनुशासित करेगा और सजा देगा—यह भी एक धारणा और कल्पना है। परमेश्वर द्वारा लोगों की इन धारणाओं और कल्पनाओं के प्रकाशन से हम समझ गए हैं कि परमेश्वर हमारा बाहरी रूप से अच्छा व्यवहार नहीं चाहता है और न ही वह यह चाहता है कि हम कुछ बाहरी अभ्यासों और विनियमों का पालन करें। बल्कि वह उम्मीद करता है कि जब हमारे साथ चीजें घटित हों तो हम सत्य सिद्धांतों की तलाश करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हों।) ये धारणाएँ और कल्पनाएँ अलग-अलग मात्राओं में हर किसी में होती हैं, है ना? (हाँ।) लोग सत्य का अनुसरण करना शुरू करने से पहले या जब वे सत्य नहीं समझते हैं और जब उन्होंने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया होता है तो वे इन धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग इस बारे में अनुमान लगाने के लिए करते हैं कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है या इस बारे में निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए करते हैं कि परमेश्वर कैसे कार्य करेगा। साथ ही, वे इन अनुमानों का उपयोग खुद अपने पर, अपने खुद के परिणाम पर और इस पर फैसला सुनाने के लिए भी करते हैं कि क्या भविष्य में वे धन्य किए जाएँगे या उन्हें बदकिस्मती सहनी पड़ेगी। इसलिए लोगों द्वारा सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में ये धारणाएँ और कल्पनाएँ लोगों द्वारा परमेश्वर का कार्य स्वीकारने में, उनके सत्य के अनुसरण में और उनके द्वारा सत्य की प्राप्ति में काफी हद तक बाधाएँ बन गई हैं। कहने का मतलब यह है कि अगर लोग इन धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग नहीं पाते हैं और वे हमेशा उन्हें परमेश्वर में विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने के लिए अपनी प्रेरणा और मूल कारण मानते हैं तो ये धारणाएँ और कल्पनाएँ सत्य का अनुसरण करने और उसे प्राप्त करने में उन्हें बहुत हद तक बाधित करेंगी। और अंत में वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं का उपयोग सिर्फ परमेश्वर के सामने अपना खुद का मूल्य, पहचान और रुतबा निर्धारित करने के लिए और वे परमेश्वर के घर में किस तरह का व्यवहार प्राप्त करने में समर्थ होंगे, उनका गंतव्य क्या होगा और भविष्य में उन्हें कौन-से आशीष प्राप्त होंगे, उनके पास कितना अधिकार होगा और वे कितने शहरों पर राज करेंगे और वे स्वर्ग में एक स्तंभ होंगे या मुख्याधार होंगे या वे इस जीवन में कितना प्राप्त कर सकेंगे और आने वाली दुनिया में कितना प्राप्त कर सकेंगे। क्योंकि ये धारणाएँ और कल्पनाएँ लोगों के जीवन और अनुसरण से संबंधित हैं, इसलिए ये उन मार्गों को प्रभावित करती हैं जिन्हें लोग अपनाते हैं और यकीनन ये लोगों के अंतिम परिणाम और गंतव्य को भी प्रभावित करती हैं। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के बीच जीते और अनुसरण करते हैं; इस प्रकार वे अनिवार्यतः इन्हीं धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर सभी चीजों को देखते हैं और सभी चीजों के बारे में राय बनाते हैं और दृढ़ फैसले लेते हैं। इसलिए, परमेश्वर चाहे जिस तरह सत्य प्रदान करे और लोगों को बताए कि उन्हें क्या दृष्टिकोण रखने चाहिए और कौन-सा मार्ग अपनाना चाहिए, जब तक लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को नहीं छोड़ेंगे, वे उन्हीं के अनुसार जीते रहेंगे और स्वाभाविक रूप से ये धारणाएँ और कल्पनाएँ लोगों का जीवन और उनके जीवित रहने के नियम बन जाएँगी और अनिवार्यतः वे तरीके और पद्धतियाँ बन जाएँगी जिनके द्वारा लोग सभी तरह की घटनाओं और चीजों से निपटते हैं। एक बार जब लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ वे सिद्धांत और कसौटियाँ बन जाती हैं जिनके द्वारा वे लोगों और चीजों को देखते हैं, आचरण और कार्य करते हैं तो चाहे वे परमेश्वर में कैसे भी विश्वास क्यों न रखें या कैसे भी अनुसरण क्यों न करें और चाहे वे कितना भी कष्ट क्यों न सहें या कितनी भी कीमत क्यों न चुकाएँ, यह सब कुछ निष्फल ही होगा। अगर कोई व्यक्ति अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार जीता है तो वह परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा होता है और उसके प्रति विरोधपूर्ण होता है; उसमें न तो उन परिवेशों के प्रति सच्चा समर्पण होता है जिनका इंतजाम परमेश्वर करता है, न ही उसकी अपेक्षाओं के प्रति सच्चा समर्पण होता है। फिर अंत में उसका परिणाम बहुत ही दुखद होगा। अगर तुमने बहुत सारे वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है और उसके लिए खुद को खपाया है, हर तरफ दौड़-धूप की है और एक बड़ी कीमत चुकाई है, लेकिन तुम्हारे हर कार्य का प्रारंभिक बिंदु और स्रोत तुम्हारी अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं तो तुम परमेश्वर को सही मायने में स्वीकार नहीं करते हो और उसके प्रति समर्पण नहीं करते हो। चाहे ये धारणाएँ और कल्पनाएँ किताबों से आएँ, समाज से आएँ या तुम्हारी व्यक्तिगत इच्छाओं और रुचियों से आएँ, संक्षेप में, जब तक ये धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, तब तक ये सत्य नहीं हैं; और जब तक ये सत्य नहीं हैं, तब तक ये सत्य की विरोधी हैं, लोगों के सत्य स्वीकारने में एक बाधा हैं और परमेश्वर और सत्य की दुश्मन हैं। इसलिए, जब तक तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार जीते हो, तब तक तुम सभी चीजों को इन धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार मापोगे और देखोगे और इनके कारण तुम अंत में निश्चित रूप से उन परिवेशों के खिलाफ विद्रोह करोगे जिनका इंतजाम परमेश्वर ने तुम्हारे लिए किया है और तुम परमेश्वर द्वारा तुम्हारे मार्गदर्शन या तुम पर उसकी संप्रभुता के खिलाफ विद्रोह करोगे। संक्षेप में, यहाँ कोई सच्ची स्वीकृति और समर्पण नहीं है। ऐसा क्यों है? क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम कितनी कठिनाइयाँ सहते हो या कितनी कीमत चुकाते हो, जब तक तुम अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार जीते हो, तुम्हारे द्वारा सही जाने वाली कठिनाइयाँ और चुकाई जाने वाली कीमत सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होती हैं और उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता है; तब तक यह कहा जा सकता है कि तुम्हारे द्वारा सही जाने वाली कठिनाइयाँ और चुकाई जाने वाली कीमत मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं और तुम्हारी पसंद पर आधारित हैं, और तुम्हारी दैहिक इच्छाएँ तुष्ट करने और तुम्हारे कुछ लक्ष्य संतुष्ट करने के उद्देश्य से हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा पौलुस ने दिखाया था : उसने बहुत सारा कार्य किया और बहुत दौड़-धूप की, यूरोप के एक बड़े हिस्से में सुसमाचार प्रचार किया, लेकिन चाहे उसने कितना भी कष्ट क्यों न सहा हो और कितनी भी कीमत क्यों न चुकाई हो या उसने कितनी भी दौड़-धूप क्यों न की हो, उसके पास कभी भी ऐसे विचार और दृष्टिकोण नहीं थे जो सत्य के अनुरूप हों, उसने कभी भी सत्य स्वीकार नहीं किया और उसके पास कभी भी परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया और वास्तविक अनुभव नहीं था—वह हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जीता था। उसकी विशिष्ट धारणा और कल्पना क्या थी? वह यह थी कि जब वह अपनी दौड़ पूरी कर लेगा और अच्छी लड़ाई लड़ लेगा तो धार्मिकता का एक मुकुट उसके लिए रखा होगा—यही पौलुस की धारणा और कल्पना थी। उसकी धारणा और कल्पना का विशिष्ट सैद्धांतिक आधार क्या था? वह यह था कि परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम इस आधार पर तय करेगा कि उसने कितनी दौड़-धूप की है, कितनी कीमत चुकाई है और कितना कष्ट सहा है। सिर्फ ऐसी धारणा और कल्पना के सैद्धांतिक आधार पर ही पौलुस अनजाने में मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल पड़ा। नतीजतन, जब वह रास्ते के अंत तक पहुँचा तो उसे अपने व्यवहार और परमेश्वर का प्रतिरोध करने की अभिव्यक्तियों या परमेश्वर का प्रतिरोध करने के अपने सार के बारे में बिल्कुल कोई समझ नहीं थी, फिर पश्चात्ताप होना तो दूर की बात है। वह परमेश्वर में विश्वास रखते हुए अब भी अपनी मूल धारणा और कल्पना में जकड़ा हुआ था और न सिर्फ उसके पास परमेश्वर के प्रति रत्ती भर भी सच्चा समर्पण नहीं था, बल्कि वह यह मानता था कि बदले में वह परमेश्वर से एक अच्छा परिणाम और गंतव्य प्राप्त करने का और भी ज्यादा हकदार है। “बदले में” इस बात को कहने का एक सुखद, सभ्य तरीका है, लेकिन दरअसल यह कोई विनिमय या लेन-देन भी नहीं था—वह परमेश्वर से सीधे इन चीजों की माँग कर रहा था, परमेश्वर से सीधे इन्हें माँग रहा था। उसने परमेश्वर से इनकी माँग कैसे की? जैसे कि उसने कहा, “मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं अच्छी लड़ाई लड़ चुका हूँ—महिमा का मुकुट अब मेरा है। मैं इसी का हकदार हूँ और परमेश्वर को न्यायपूर्वक इसे मुझे दे देना चाहिए।” पौलुस ने जो मार्ग अपनाया वह परमेश्वर के प्रति प्रतिरोध का मार्ग था, जो उसके विनाश का कारण बना और अंतिम परिणाम के रूप में उसे सजा दी गई। इसे परमेश्वर के बारे में उसकी धारणा और कल्पना से अलग करना असंभव था। उसने हमेशा अपनी धारणा और कल्पना को लगातार जकड़े रखा; उसने परमेश्वर की कही बातों को, परमेश्वर द्वारा लोगों को दिए गए सत्यों को—जीवन के मार्ग को—एक तरफ रख दिया और अनदेखा कर दिया, यहाँ तक कि उसने तिरस्कार और अवमानना का रवैया भी अपना लिया और उसने यह तथ्य भी नहीं माना या नहीं स्वीकारा कि यीशु मसीह परमेश्वर का देहधारण था। जब वह मार्ग के अंत तक पहुँच चुका था, तब भी वह पहले की तरह अपनी धारणा और कल्पना से चिपका रहा और खुद को परमेश्वर के मुकाबले खड़ा करता रहा जो अंत में उसे विनाश के अवश्यंभावी परिणाम की तरफ ले गया। इसलिए परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में अगर लोग अपनी सभी विभिन्न नकारात्मक भावनाएँ त्याग देने में समर्थ हो जाते हैं और वास्तविक जीवन में कुछ ऐसी चीजें त्याग देने में समर्थ हो जाते हैं जो सत्य का अनुसरण करने में उनके लिए बाधा बनती हैं, लेकिन वे अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को नहीं त्याग सकते हैं तो यह एक बहुत ही खेदजनक और दुखद बात होगी और अंत में लोग वैसे ही दंडित होने का परिणाम भुगतेंगे जैसा पौलुस ने भुगता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बात निश्चित है। इसलिए, “त्याग देने” के अभ्यास में “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देने” की मद सबसे निर्णायक और महत्वपूर्ण मद है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। तुम्हें इसी चीज की अक्सर जाँच करनी चाहिए : परमेश्वर के साथ अपने रिश्ते में और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया में अब भी तुम्हारे पास कौन-सी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं जो सत्य, परमेश्वर की इच्छाओं या परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं और जो तुम्हारे और परमेश्वर के बीच खड़ी हैं। तुम्हें इनकी जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों से उनकी तुलना करनी चाहिए और फिर उन्हें त्याग देना चाहिए। त्याग देने का उद्देश्य किसी प्रक्रिया से गुजरना नहीं है, बल्कि सत्य स्वीकार करना है, इस संबंध में उन सत्य सिद्धांतों को स्वीकार करना है जिन्हें परमेश्वर ने लोगों के सामने रखा है और अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को प्रतिस्थापित करने के लिए इन सत्य सिद्धांतों का उपयोग करना है और अपने अनुसरण के परिप्रेक्ष्य और अपने अनुसरण की दिशा को बदलना है ताकि तुम अपने जीवन में और परमेश्वर का अनुसरण करने की प्रक्रिया में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप होने के बजाय परमेश्वर के अनुरूप हो सको। परमेश्वर का कार्य लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं को हल करना है और वह लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ हल करने के लिए उन्हें सत्य भी प्रदान करता है। लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं का समाधान करके परमेश्वर उन्हें अपने द्वारा इंतजाम किए गए हर परिवेश से निपटने के लिए और जीवन में अपने सामने आने वाले हर मामले से निपटने के लिए सही विचार, मत, दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य रखने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर अपना कार्य करता है और अपने वचनों के जरिये लोगों को सत्य प्रदान करता है, इसलिए नहीं कि वह उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ पूरी कर सके, बल्कि इसलिए कि वह उनकी धारणाओं और कल्पनाओं का प्रतिकार कर सके और अंत में उन्हें अपनी धारणाएँ और कल्पनाएँ त्याग देने और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बना सके।

घ. लोगों का विश्वास कि परमेश्वर का कार्य उनकी काबिलियत, सहज प्रवृत्तियों, व्यक्तित्व वगैरह को बदल सकता है

इससे पहले हम परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की कुछ धारणाओं और कल्पनाओं पर संगति कर चुके हैं। लोगों के पास इन धारणाओं और कल्पनाओं के अलावा परमेश्वर के कार्य के बारे में कुछ दूसरी धारणाएँ और कल्पनाएँ भी हैं जो उन्हें सत्य का अनुसरण करने की प्रक्रिया में त्याग देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर का कार्य स्वीकार करने के बाद अगर वे सत्य का अनुसरण करने में समर्थ होते हैं तो वे पूरी तरह से नए बना दिए जाएँगे और जब उनके पास अपने जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन होंगे तो उनके पास एक पूरी तरह से नया जीवन होगा और वे एक नए व्यक्ति के रूप में नया जीवन प्राप्त करेंगे। वे मानते हैं कि उनकी काबिलियत बेहतर हो चुकी होगी और उनकी सहज प्रवृत्तियाँ भी कुछ हद तक बदल चुकी होंगी और इसलिए उनके साथ अक्सर ऐसी चीजें होंगी जिनकी उन्होंने कभी उम्मीद नहीं की होगी। यानी वे न सिर्फ ऐसी चीजें करने में समर्थ होंगे जो उनकी अपनी काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों से परे हैं, बल्कि वे उन्हें अत्यंत सहज और सुचारू रूप से करने में भी समर्थ होंगे। सिर्फ यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया में कुछ लोग अक्सर यह भी महसूस करते हैं कि जब से उन्होंने सत्य का अनुसरण करना शुरू किया है, तब से उनके व्यक्तित्व और मिजाज में सुधार हुआ है, उनकी आँखें पहले से अधिक रोशन हो गई हैं और उनकी सुनने की शक्ति पहले से बेहतर हो गई है। समय-समय पर वे आईने में देखते हैं और महसूस करते हैं कि वे दिन-ब-दिन स्वर्गदूतों जैसे बनते जा रहे हैं; उन्हें लगता है कि वे दिन-ब-दिन सुंदर और पहले से कहीं ज्यादा चुस्त दिखने लगे हैं। कुछ लोगों को यह भी लगता है कि उनके जीवन की कुछ आदतें बदल गई हैं और उनके जीने के ढंग अलग हो गए हैं—पहले अगर वे बहुत देर से सोते थे तो लगातार जम्हाई लेते रहते थे, लेकिन जब से उन्होंने सत्य का अनुसरण करना शुरू किया है, तब से ये प्रतिक्रियाएँ गायब हो गई हैं और उन्हें यह विशेष रूप से चमत्कारी लगता है। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में यह मानते हैं कि जब वे सत्य का अनुसरण करना शुरू करेंगे तो परमेश्वर उन पर कुछ कार्य करेगा ताकि वे अप्रत्याशित परिवर्तनों से गुजरें। इसमें रातों-रात उनकी काबिलियत में सुधार होना शामिल है—वे औसत दर्जे या बहुत ही खराब काबिलियत वाले व्यक्ति से अत्यंत चतुर, सक्षम और अनुभवी व्यक्ति बन जाएँगे, काबिलियत और बुद्धि वाले व्यक्ति बन जाएँगे और उनकी सोच का क्षेत्र भी उन्नत हो जाएगा। जब लोग पहली बार परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करते हैं और सत्य का अनुसरण करने का फैसला करते हैं तो उनमें सत्य के अनुसरण के बारे में अत्यधिक अतिशयोक्तिपूर्ण और अवास्तविक कल्पनाएँ होती हैं, संक्षेप में, इनमें से कोई भी कल्पना वाकई वास्तविकता के अनुरूप नहीं होती है। लोग मानते हैं कि जब तक वे सत्य का अनुसरण करेंगे, तब तक उनके कई पहलू उन्नत हो जाएँगे और आगे बढ़ेंगे और कुछ क्षेत्रों में तो वे साधारण लोगों से आगे भी निकल जाएँगे। इसलिए, कुछ लोग अपना नाम ल्यू चाओ रख लेते हैं, कुछ लोग मा चाओ रख लेते हैं और कुछ दूसरे लोग निउ चाओ रख लेते हैं। इन नामों का मतलब क्रमशः गधों, घोड़ों और बैलों से आगे निकलना है—यानी घोड़े से तेज दौड़ने में समर्थ होना और गधे या बैल से ज्यादा शक्ति होना। आमतौर पर गधे चीजें खींचने में बहुत मजबूत होते हैं, घोड़ों के पैर बहुत ताकतवर होते हैं और बैलों में बहुत सहनशक्ति होती है, इसलिए ये लोग खुद को ल्यू चाओ, मा चाओ और निउ चाओ कहते हैं। तुम देखो कि वे जो भी नाम चुनते हैं उस पर विशेष सोच-विचार करते हैं। लोग अपने लिए जो नाम चुनते हैं उससे यह देखा जा सकता है कि लोगों में परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी खुद की समझ होती है; बदकिस्मती से यह समझ सत्य के अनुरूप नहीं होती है और सकारात्मक नहीं होती है—यह लोगों की धारणा और कल्पना होती है। भले ही यह धारणा और कल्पना विकृत या चरम हो, संक्षेप में, यह तथ्यों के साथ और सत्य के साथ असंगत होती है; यह बहुत खोखली और अलौकिक चीजों से संबंधित होती है। परमेश्वर लोगों पर जिस सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है वह यह है : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोगों में कैसी काबिलियत है या उनके पास किस तरह की कार्यक्षमता है या चीजों से निपटने की किस तरह की योग्यता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उनकी जन्मजात प्रवृत्तियाँ क्या हैं और उनका व्यक्तित्व, आदतें, जीने के ढंग, रुचियाँ और शौक क्या हैं या यहाँ तक कि उनका लिंग क्या है, संक्षेप में, परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों को उनकी अंतर्निहित काबिलियत, सहज प्रवृत्तियों, व्यक्तित्व, आदतों, उनके जीने के सही तौर-तरीकों और साथ ही उनकी जायज रुचियों और शौकों इत्यादि के आधार पर सत्य समझने, सत्य स्वीकारने, सत्य के प्रति समर्पण करने और फिर सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम बनाने का परिणाम प्राप्त करना है। तो यह परिणाम किस आधार पर प्राप्त किया जाता है? यह लोगों में सत्य समझने और बूझने की क्षमता होने के आधार पर और उनमें सामान्य मानवता होने के आधार पर प्राप्त किया जाता है। यह तथाकथित उन्नत मानवता के आधार पर प्राप्त नहीं किया जाता है और न ही यह अलौकिक मानवता के आधार पर प्राप्त किया जाता है। इसलिए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम सत्य के किन पहलुओं पर संगति करते हैं, यह सब कुछ तुम्हें इस आधार पर उनमें प्रवेश करने में सक्षम बनाने के लिए है कि तुममें सामान्य मानवता है और सत्य बूझने की क्षमता है। लेकिन लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ इसके बिल्कुल विपरीत हैं। लोग मानते हैं कि परमेश्वर के कार्य द्वारा लोगों में प्राप्त परिणाम और सत्य की उसकी अभिव्यक्ति लोगों की अंतर्निहित काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों के खिलाफ जाते हैं और ये उनके व्यक्तित्व, आदतों, रुचियों और शौकों के भी खिलाफ जाते हैं। लोग व्यावहारिक तरीके से सत्य की तलाश करने का प्रयास करने के बजाय अक्सर यह उम्मीद करते हैं कि उनके साथ कोई चमत्कार होगा, उनके साथ कुछ अलौकिक या कुछ ऐसा होगा जो अप्रत्याशित है और जो उनकी अपनी काबिलियत और सहज प्रवृत्तियों से परे है। इस तथ्य से क्या साबित होता है? क्या ऐसा नहीं है कि लोग सत्य के अनुसरण को कुछ विशेष रूप से अलौकिक और खोखली चीज के रूप में देखते हैं? क्या ऐसा नहीं है कि वे परमेश्वर द्वारा लोगों पर कार्य करने के तरीकों को विशेष रूप से अलौकिक और खोखला मानते हैं? (हाँ।) लोग अक्सर यह उम्मीद करते हैं कि वे जितना ज्यादा सत्य का अनुसरण करेंगे, उनकी काबिलियत उतनी ही ज्यादा होगी या ढेरों धर्मोपदेश सुनने और सत्य स्वीकारने और समझने के बाद उनकी काबिलियत पहले से बेहतर हो जाएगी। यह एक धारणा और कल्पना है, है ना? (हाँ।) उदाहरण के लिए, कोई पेशा सीखने की बात ले लो : जब तुम स्कूल में थे, तब अगर तुम किसी पेशे में महारत हासिल करना चाहते तो तुम्हें उस पेशे के ज्ञान को रटकर याद करना पड़ता और सुबह से लेकर शाम तक पढ़ाई करनी पड़ती और अपना खाली समय उसे सीखने का प्रयास करने में लगाना पड़ता। जब से तुमने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है, तब से तुम सोचने लगे हो कि जब तक पवित्र आत्मा कार्य करता है, तब तक लोगों की काबिलियत में सुधार होगा, वे परिवर्तित होंगे और वे पहले से अलग बन जाएँगे। इसलिए, तुम तय करते हो कि परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करे, व्यक्ति को बस सहयोग करना है और सत्य का अनुसरण करने और पेशेवर ज्ञान सीखने का प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं है; व्यक्ति के लिए अपना कर्तव्य करना ही पर्याप्त है—इस तरह से परमेश्वर में विश्वास रखकर भी व्यक्ति प्रगति कर लेगा। क्या लोग इसी तरीके से इसकी कल्पना नहीं करते हैं? (हाँ।) मुझे बताओ, क्या यह अनुसरण करने का सही तरीका है? क्या इस तरीके से अनुसरण करने से सच्चा परिवर्तन आ सकता है? (नहीं, नहीं आ सकता।) संभवतः परिवर्तन नहीं आ सकता। उदाहरण के लिए, कुछ लोग सोचते हैं कि अच्छा गाने के लिए उन्हें सुबह से शाम तक अभ्यास करना होगा, दूसरों की तकनीकें चुरानी होंगी और दूसरे लोगों के गुणों से सीखने के लिए सभी तरह के गाने सुनने होंगे और सिर्फ इसी तरीके से वे उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके विपरीत, कुछ लोग मानते हैं कि गायन प्रतिभा पर निर्भर करता है; उन्हें लगता है कि अगर किसी व्यक्ति में गायन का गुण है और वह गायन पसंद करता है तो वह अच्छा गाने में समर्थ होगा और अगर किसी में गायन का गुण नहीं है या उसे गायन से लगाव नहीं है तो उसे अच्छा गाने के लिए, भावना के साथ गाने के लिए पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जाने पर निर्भर रहना होगा ताकि उसका गायन सुनकर दूसरों को खुशी मिले। नतीजतन, ज्यादातर लोग हमेशा इस तरह का भ्रम रखते हैं; वे खुद को प्रेरित करने के लिए पवित्र आत्मा पर भरोसा करते हैं, नहीं तो वे गाना गाने के लिए अपना मुँह नहीं खोलते हैं। यह एक धारणा और कल्पना है, है ना? कुछ लोग सोचते हैं कि पेशेवर ज्ञान सीखने में इतना प्रयास करने की जरूरत नहीं है और जब तक लोग सत्य का अनुसरण करते हैं तब तक परमेश्वर कार्य करेगा, और लोगों द्वारा व्यर्थ बलिदान देना बेकार और निरर्थक है। वे सोचते हैं कि जैसे ही परमेश्वर कार्य करता है, वह लोगों द्वारा किसी भी मात्रा में किए जाने वाले प्रयास से ज्यादा उपयोगी होता है, इसलिए जब तक लोग सच्चाई से अपने कर्तव्य करते हैं और अपने दिल परमेश्वर को समर्पित करने के लिए तैयार रहते हैं तब तक पवित्र आत्मा उनमें कार्य करेगा और उनकी काबिलियत और क्षमताएँ तत्क्षण सामान्य मानवता के दायरे से परे उन्नत हो जाएँगी—वे उन चीजों को समझ पाएँगे जो पहले उनकी समझ में नहीं आती थीं, और हालाँकि इससे पहले वे एक बार में पाठ की दो पंक्तियाँ भी नहीं पढ़ पाते थे, लेकिन परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद वे एक बार में दस पंक्तियाँ पढ़ने और उन्हें अच्छी तरह से याद करने में समर्थ हो जाएँगे। लेकिन चाहे वे कितना भी प्रशिक्षण क्यों न ले लें, वे अब भी इसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं, इसलिए वे सोचते हैं, “क्या परमेश्वर मुझे अनुग्रह नहीं दे रहा है? क्या मैं अपना कर्तव्य करने में पर्याप्त मेहनती और ईमानदार नहीं हूँ?” क्या यही बात है? (नहीं।) तुम्हें लगता है कि तुम जितना ज्यादा ऐसी चीजें प्राप्त करने में समर्थ होते हो जो अलौकिक हों, तुम्हारी अपनी ही काबिलियत और क्षमताओं की सीमा से परे हों, उससे उतना ही ज्यादा यह साबित होता है कि यह परमेश्वर का कार्य है; कि अगर तुम्हारी निष्ठा और सहयोग करने की तुम्हारी इच्छा लगातार बढ़ती जाती है तो परमेश्वर तुममें ज्यादा से ज्यादा कार्य करेगा और तुम्हारी काबिलियत और क्षमताएँ लगातार बढ़ती रहेंगी। क्या लोगों की यही धारणा और कल्पना नहीं होती है? (हाँ।) क्या तुम लोगों की विशेष रूप से इस तरह से सोचने की प्रवृत्ति है? (है।) इस तरह से सोचने का क्या नतीजा होता है? क्या इसका नतीजा हमेशा विफलता और साकार होने का अभाव नहीं होता है? कुछ लोग तो नकारात्मक भी हो जाते हैं और कहते हैं, “मैंने परमेश्वर को अपनी भरपूर निष्ठा दी है—परमेश्वर मुझे अच्छी काबिलियत क्यों नहीं देता है? परमेश्वर मुझे अलौकिक क्षमताएँ क्यों नहीं देता है? मैं अब भी हमेशा कमजोर क्यों हूँ? मेरी काबिलियत में सुधार नहीं हुआ है, मैं कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता हूँ और पेचीदा मामलों का सामना करने पर भरमा जाता हूँ। पहले भी ऐसा ही था, अब भी बिल्कुल ऐसा ही क्यों है? इसके अलावा, मैं अपने कर्तव्य के निर्वहन और समस्याओं से निपटने में अपनी देह से ऊपर कभी भी क्यों नहीं उठ पाता हूँ? मैं कुछ धर्म-सिद्धांत समझता हूँ, फिर भी मैं चीजें स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता हूँ और जब मामलों से निपटने की बात आती है तो मैं ढुलमुल बना रहता हूँ और मैं अब भी अच्छी काबिलियत वाले लोगों जितना अच्छा नहीं हूँ। मेरी कार्यक्षमता भी खराब है और मेरा कर्तव्य निर्वहन अकुशल है। मेरी काबिलियत बिल्कुल भी नहीं सुधरी है! क्या चल रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर के प्रति मेरी ईमानदारी अपर्याप्त है? या परमेश्वर मुझे पसंद नहीं करता है? मुझमें कहाँ कमी है?” कुछ लोग विभिन्न कारण तलाशते हैं और इस सच्चाई को बदलने के लिए कई तरीके आजमा चुके हैं, जैसे कि ज्यादा धर्मोपदेश सुनना, परमेश्वर के ज्यादा वचन याद करना, ज्यादा आध्यात्मिक भक्ति टिप्पणियाँ लिखना, साथ ही लोगों को सत्य की ज्यादा संगति करते हुए सुनना और ज्यादा तलाश करना, लेकिन अंतिम नतीजा अब भी निराशाजनक ही होता है। उनकी काबिलियत और कार्यक्षमता पहले जैसी ही बनी रहती है, तीन से पाँच वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी कोई सुधार नहीं होता है। फिर वे अपने व्यक्तित्व पर एक नजर डालते हैं और पाते हैं कि वे अब भी पहले की तरह बुजदिल हैं, बूढ़ी गाय की तरह सुस्त हैं या वे अब भी अधीर व्यक्तित्व वाले हैं और हर चीज को हड़बड़ाहट से सँभालते हैं—कोई परिवर्तन नहीं हुआ है! दूसरे लोग देखते हैं कि ऐसा लगता है कि हाल ही में उनकी रुचियाँ और शौक नहीं बदले हैं और उनके कुछ दोष, आदतें और कमियाँ भी नहीं बदली हैं। और दूसरे लोग जो देर से सोना और देर से उठना पसंद करते हैं, वे देखते हैं कि जीवन की ये आदतें भी जस की तस हैं। इसलिए वे सभी सोचते हैं, “क्या चल रहा है? क्या ऐसा हो सकता है कि पवित्र आत्मा मुझ पर कार्य नहीं कर रहा है? क्या परमेश्वर ने मुझे छोड़ दिया है? क्या परमेश्वर मुझसे खुश नहीं है? क्या मैं गलत मार्ग अपना रहा हूँ? क्या मैं गलत तरीके से अनुसरण कर रहा हूँ? क्या मैंने अपना कर्तव्य करने में पर्याप्त रूप से अपना दिल नहीं लगाया है? क्या मैंने पर्याप्त कीमत नहीं चुकाई है?” वे सभी तरह के कारणों की तलाश करते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें कोई नतीजा नहीं मिलता है। उनके पास नतीजे नहीं होने का क्या कारण है? (इसका कारण यह है कि वे हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में जीते रहे हैं। वे सोचते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद जब तक वे उसके प्रति निष्ठावान रहेंगे तब तक जैसे ही परमेश्वर कार्य करेगा, उनकी काबिलियत और कार्यक्षमता में सुधार होगा—उनके ऐसे विचार उनकी धारणाओं और कल्पनाओं से जन्म लेते हैं।) लोगों की धारणाएँ और कल्पनाएँ उनके अनुसरण के लक्ष्यों और तरीकों को, उनके द्वारा अपनाए जाने वाले मार्गों को और अंत में उनके फायदों और परिणामों को तय करती हैं। अगर लोगों के पास ऐसी धारणाएँ और कल्पनाएँ हों तो वे क्या प्राप्त करेंगे? क्या वे सत्य प्राप्त करेंगे? क्या वे परमेश्वर में सच्ची आस्था और परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम प्राप्त करेंगे? क्या वे परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त करेंगे? (नहीं।) वे इनमें से कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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