सत्य का अनुसरण कैसे करें (5) भाग दो

सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना

अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना

I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना

च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है

आओ, हम “सत्य का अनुसरण कैसे करें” विषय पर संगति जारी रखें। इस अवधि के दौरान हम अभी भी “सत्य का अनुसरण कैसे करें” के भीतर “त्याग देना” से संबंधित विषयवस्तु पर चर्चा कर रहे हैं, “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” के मुख्य विषय पर बात कर रहे हैं। इस विषय का पहला पहलू परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना है। इस पहलू में हमने परमेश्वर के कार्य के बारे में लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं पर चर्चा की है जिसमें एक अपेक्षाकृत जटिल मुद्दा शामिल है : जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के बीच अंतर। इसमें कई बारीकियाँ शामिल हैं। जब लोग रोजमर्रा के जीवन में समस्याओं का सामना करते हैं तब वे अवधारणाओं को लेकर हमेशा भ्रमित रहते हैं और स्पष्ट रूप से यह अंतर नहीं कर पाते हैं कि कोई मुद्दा किस श्रेणी का है या उनमें कैसे भेद किया जाए। उदाहरण के लिए, कुछ खास अभिव्यक्तियों के संबंध में लोग यह अंतर नहीं कर पाते हैं कि वे मानवता से संबंधित हैं या जन्मजात स्थितियों से। और कुछ दूसरी अभिव्यक्तियों के बारे में लोग यह नहीं बता पाते हैं कि वे मुद्दे भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित हैं या मानवता से। लोग इन मामलों में अंतर नहीं कर पाते हैं। लोग अक्सर जन्मजात स्थितियों की कुछ समस्याओं और खामियों को भ्रष्ट स्वभाव मान लेते हैं या मानवता के कुछ दोषों और समस्याओं को भ्रष्ट स्वभाव मान लेते हैं। कभी-कभी जब यह भ्रष्ट स्वभाव की अभिव्यक्ति होती है तब भी वे इसे एक जन्मजात स्थिति की अभिव्यक्ति मान लेते हैं जो बदल नहीं सकती है। इसलिए लोग अक्सर परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया के दौरान जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के मुद्दों के बारे में बहुत अस्पष्ट महसूस करते हैं और उनमें अंतर नहीं कर सकते हैं। पिछली बार हमने इसके एक भाग पर संगति की थी और यकीनन कुछ उदाहरण भी दिए थे, लेकिन मुझे लगता है कि वह पर्याप्त रूप से विशिष्ट नहीं था। आज हम इन तीन श्रेणियों के भीतर मुद्दों को लेंगे और उन पर और विशिष्ट रूप से संगति करेंगे। मैं कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों और उदाहरणों के बारे में बात करूँगा और फिर तुम लोग यह भेद पहचान जाओगे कि वे किस श्रेणी में आते हैं : जन्मजात स्थितियाँ, मानवता या भ्रष्ट स्वभाव। अगर तुम लोग उनका भेद नहीं पहचान सके तो हम सब मिलकर उनकी खोजबीन करेंगे। यह कैसा विचार है? (अच्छा है।) पिछली बार हमने जन्मजात स्थितियों पर थोड़ी ज्यादा संगति की थी, इसलिए इस संबंध में भेद पहचानने की तुम्हारी क्षमता यकीनन कुछ हद तक ज्यादा स्पष्ट है। लेकिन अभी भी ऐसी कुछ चीजें हैं जो अपेक्षाकृत सीमा रेखा पर हैं या मानवता के पहलुओं से मिलती-जुलती हैं और लोग अभी भी यह अंतर नहीं कर सकते हैं कि उन्हें जन्मजात स्थितियों के तहत श्रेणीबद्ध किया जाना चाहिए या मानवता के तहत। मैं कुछ अभिव्यक्तियों या कुछ व्यवहार और क्रियाकलापों का प्रस्ताव दूँगा और फिर तुम लोग बताओगे कि उन्हें किस पहलू के तहत श्रेणीबद्ध किया जाना चाहिए। इस तरीके से संगति करने का क्या फायदा है? एक बार जब तुम्हें मालूम हो जाएगा कि कोई अभिव्यक्ति किस पहलू से संबंधित है तब तुम्हें यह भी मालूम हो जाएगा कि उससे किस तरीके से पेश आना है और उसे कैसे सँभालना है।

6. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ

चीजों को करने में लगनशीलता और आलस

तो चलो, पहली अभिव्यक्ति से शुरू करें : चीजें करने में लगनशील होना, मतलब कि व्यक्ति बहुत मेहनती है। यह किस पहलू से संबंधित है? (यह व्यक्ति की मानवता की अभिव्यक्ति है।) तो फिर क्या यह मानवता का गुण है या दोष? (मानवता का गुण है।) बहुत लगनशील और मेहनती होना मानवता का गुण है। साफ-सुथरापन और सफाई पसंद करना और स्वच्छता बनाए रखना—यह किस तरह की अभिव्यक्ति है? (मानवता का गुण है।) (यह जीवन की एक अच्छी आदत है, यह व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों के तहत आता है।) क्या यह जन्मजात स्थिति है? क्या यह व्यक्ति की मानवता का गुण और मजबूत पक्ष नहीं है? (हाँ।) अभी-अभी किसी ने कहा कि यह जन्मजात स्थिति है; यह गलत है। इसमें व्यक्ति की मानवता के साथ-साथ जीवन की आदतें भी शामिल हैं; यकीनन यह मानवता का गुण और मजबूत पक्ष भी है। अगली अभिव्यक्ति : कुछ लोग आलसी होते हैं; उन्हें सुख-सुविधाएँ पसंद होती हैं और मेहनत से नफरत होती है और वे काम करना पसंद नहीं करते हैं। जब वे काम नहीं कर रहे होते हैं तब वे विशेष रूप से सहज महसूस करते हैं, लेकिन जब वे काम करना शुरू करते हैं तब उनका मिजाज बदतर हो जाता है—वे चिड़चिड़े, खिन्न और नाराज हो जाते हैं। जब करने के लिए काम होता है तब वे सुस्त, ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं और काम नहीं करना चाहते हैं। लेकिन जब खाने-पीने और मौज-मस्ती करने की बात आती है तब उनमें बेहद ऊर्जा होती है। आलस—यह किस तरह की समस्या है? (बुरी मानवता की।) कम-से-कम यह मानवता का दोष है, कमी है और मानवता में एक महत्वपूर्ण समस्या है। यह अभी बुरी मानवता के स्तर तक नहीं पहुँची है। अगर ऐसे लोगों को दूसरों पर हुक्म चलाना और उनका शोषण करना पसंद होता है, वे दूसरों से काम करवाते हैं जबकि खुद कुछ नहीं करते हैं तो यह कैसी समस्या हुई? (बुरी मानवता की।) जब उनसे कोई काम करने के लिए कहा जाता है तब वे उससे बचने के लिए सभी तरह के कारण और बहाने ढूँढ़ लेते हैं; वे बस काम करना ही नहीं चाहते हैं। वे साफ-साफ अपने इरादे नहीं बताते हैं बल्कि तरह-तरह के तरीके, चालबाजियाँ या झूठ और धोखाधड़ी का उपयोग करते हैं, दूसरों से काम करवाने का प्रयास करते हैं जबकि खुद मौज-मस्ती करने के लिए इससे जी चुराते हैं। यह किस तरह की समस्या है? (भ्रष्ट स्वभाव की, दुष्ट स्वभाव की।) क्या यह सिर्फ भ्रष्ट स्वभाव है? जो लोग दूसरों का शोषण करना और दूसरों पर हुक्म चलाना पसंद करते हैं, सबसे पहली बात, वे बुरी मानवता और नीच चरित्र वाले होते हैं। दूसरी बात, दूसरों पर हुक्म चलाने के उनके चालाक तरीके उनके धोखेबाज, दुष्ट स्वभाव को उजागर करते हैं। दूसरों का शोषण करना और उन पर हुक्म चलाना पसंद करने की उनकी अभिव्यक्तियाँ दर्शाती हैं कि, एक तो उनमें बुरी मानवता है और दूसरा उनका भ्रष्ट स्वभाव गंभीर—धोखेबाज और दुष्ट है। देखो, कुछ अभिव्यक्तियाँ सिर्फ बुरी मानवता या व्यक्ति की मानवता में किसी कमी को दर्शाती हैं और वे भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं पहुँचती हैं। लेकिन कुछ अभिव्यक्तियाँ जो नीच मानवता की नींव पर आधारित हैं, उनमें सीधे तौर पर भ्रष्ट स्वभाव शामिल होते हैं। इसलिए, कोई भी अभिव्यक्ति इतनी सरल नहीं होती है। कुछ अभिव्यक्तियों में सिर्फ एक समस्या नहीं बल्कि दो समस्याएँ शामिल होती हैं।

छिछलापन

छिछलापन—यह किस पहलू के तहत आता है? (यह मानवता का दोष है।) सही कहा, यह मानवता का दोष है। अगर यह सिर्फ खुद को सजाने-सँवारने, खुद को खूबसूरत दिखाने, और अच्छी शक्ल वाला, आकर्षक, सजीला या जवान होने की तारीफें पाने की चाह के बारे में हो—यह चाहना कि दूसरे लोग उसके रूप-रंग के बारे में ऊँची राय या सकारात्मक नजरिया रखें—तो यह सिर्फ मानवता का मामला होने तक सीमित है। यह मानवता का किस तरह का मुद्दा है? स्पष्ट रूप से यह कोई गुण नहीं है बल्कि एक दोष है। हो सकता है कि कुछ लोग कहें, “हर किसी को खूबसूरती से प्रेम होता है—यह दोष कैसे हो सकता है?” तो मैं यह क्यों कहता हूँ कि छिछलापन मानवता का दोष है? चूँकि छिछलापन एक दोष है, इसलिए इसकी अभिव्यक्तियाँ जायज नहीं हैं। छिछलेपन का मतलब उचित, गरिमामय, धर्मनिष्ठ या गंभीर दिखना या दूसरों पर गरिमा और शालीनता की छाप छोड़ना नहीं है; यह उचित दिखने के स्तर पर नहीं है, बल्कि यह उचित दिखने पर जायज रूप से ध्यान देने से कहीं अत्यधिक और गंभीर है। जब लोग छिछले होते हैं तब वे खुद को सजाने-सँवारने और अपनी नुमाइश करने पर विशेष ध्यान देते हैं, दूसरों का ध्यान अपनी छवि पर केंद्रित करवाते हैं, यहाँ तक कि इस चक्कर में कुछ हद तक बेशर्म भी हो जाते हैं—दूसरे शब्दों में, ये लोग बहुत सारे मामलों में रूप-रंग से प्रभावित और बेबस होते हैं। यह मानवता का दोष है। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों को बिना सौंदर्य-प्रसाधन लगाए बाहर जाने में शर्मिंदगी महसूस होती है। जब तक वे खुद पर कुछ इत्र न छिड़क लें, वे दूसरों से मिलने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं। वे हमेशा इन्हीं मामलों में डूबे रहते हैं, हमेशा खुद को अत्यधिक सजाना-सँवारना चाहते हैं ताकि दूसरे लोग उनके बारे में अच्छी राय बनाएँ और उन्हें पसंद करें। यह बहुत ही ज्यादा छिछला होना है—इस बिंदु पर यह दोष बन जाता है। यह दोष पहले से ही सामान्य मानवता के दायरे और अपेक्षित मानकों से परे जा चुका है। बहुत ही ज्यादा छिछला होना मानवता का दोष है। इसी के साथ इस अभिव्यक्ति पर हमारी चर्चा समाप्त होती है।

सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना

अगली अभिव्यक्ति है सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना। यह किस प्रकार की अभिव्यक्ति है? (यह व्यक्ति की मानवता की त्रुटि है; यह खुद को आगे धकेलना पसंद करना है, अपना दिखावा करना पसंद करना है।) तो फिर क्या इसके भीतर कोई भ्रष्ट स्वभाव है? (हाँ, क्योंकि अगर किसी को सुर्खियाँ बटोरना पसंद है तो वह अपना दिखावा करना चाहता है, अलग दिखना चाहता है।) सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना और हमेशा अपना दिखावा करने की चाह होना—यह किस तरह की समस्या है? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें अगुआई की क्षमता होती है या इसलिए है क्योंकि वे सत्य समझते हैं और उनमें दायित्व का बोध होता है? अगर उनमें दायित्व का बोध है, कार्य क्षमताएँ हैं और वे कार्य की किसी मद का भार उठा सकते हैं तो यह सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना नहीं है। तो फिर सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना किस तरह की समस्या है? एक पहलू में, यह व्यक्ति की मानवता का दोष है। इस प्रकार के लोग सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हैं। वे जहाँ भी जाते हैं वहाँ अपना दिखावा करना पसंद करते हैं, वे डरते हैं कि वे दूसरे लोगों की नजरों में नहीं आएँगे। वे बहुत दिखावटी तरीके से, बढ़ा-चढ़ाकर और ऊँची आवाज में बोलते भी हैं। जितने ज्यादा लोग होते हैं, वे बोलने के लिए उतने ही ज्यादा उत्सुक होते हैं, हमेशा भीड़ में अपनी जगह बनाने की चाह रखते हैं। सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना खराब मानवता की अभिव्यक्ति नहीं मानी जा सकती है। इसमें व्यक्ति का चरित्र शामिल नहीं होता है और यह सिर्फ मानवता का एक दोष है, एक तरह की कमी या समस्या है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह मानवता की कमी या समस्या है? क्योंकि यह विवेक की कमी होने की अभिव्यक्ति है। ये लोग लगातार सुर्खियाँ बटोरने का प्रयास करते हैं, लेकिन क्या वे सच में कार्य का भार उठाने में सक्षम हैं? वे हमेशा सुर्खियाँ बटोरना क्यों चाहते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि वे महत्वाकांक्षा और इच्छा से संचालित होते हैं? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें रुतबा, प्रशंसा पाना और खुद को आकर्षण का केंद्र बनाना पसंद है? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों के बीच प्रतिष्ठा पाना, दूसरों से बेहतर होना और दूसरों की अगुआई करना पसंद है? (हाँ।) क्या इस तरह के व्यक्ति की मानवता उजागर नहीं हो जाती है? यह किस तरह की मानवता है? इसमें विवेक की कमी है। क्या यह मानवता का दोष नहीं है? (हाँ, है।) एक लिहाज से यह मानवता का दोष है। दूसरे लिहाज से इस तरह का व्यक्ति सिर्फ कभी-कभार ही खुद को आगे धकेलने या अपना दिखावा करने का प्रयास नहीं करता है; बल्कि, क्योंकि वह महत्वाकांक्षा और इच्छा से संचालित होता है और रुतबा, शक्ति और अंतिम फैसला लेने वाला होना पसंद करता है, इसलिए वह सुर्खियाँ बटोरना पसंद करता है। तो क्या इसमें भ्रष्ट स्वभाव भी शामिल नहीं है? (हाँ, है।) यह किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? (अहंकारी स्वभाव है।) यह अहंकार है। क्या चीज उन्हें सुर्खियाँ बटोरने का अधिकार देती है? क्या चीज उन्हें अंतिम फैसला लेने और दूसरों की अगुआई करने का अधिकार देती है? कुछ लोग कहते हैं, “मैं सत्य समझता हूँ और मुझमें दायित्व का बोध है।” भले ही तुममें दायित्व का बोध हो, फिर भी यह देखना जरूरी है कि क्या तुम वास्तविक कार्य कर सकते हो। यह मामला ऐसा नहीं है कि सिर्फ इसलिए कि तुममें दायित्व का बोध है और तुम इसे करना चाहते हो, तो तुम वास्तव में इसे अच्छी तरह से कर भी सकते हो। इन दोनों चीजों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं है। करने की चाह रखना और करना पसंद करने का मतलब यह नहीं है कि तुम इसे कर भी सकते हो या तुम अगुआई के कार्य में सक्षम हो। तुम्हें सुर्खियाँ बटोरना पसंद है, तुम्हें रुतबा पसंद है—क्या इसका मतलब यह है कि सभी को तुम्हें चुनना ही होगा? कलीसिया के अगुआओं को चुनने के सिद्धांत क्या हैं? (यह इस बात पर आधारित होना चाहिए कि क्या व्यक्ति में कार्यक्षमता है, क्या वह सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है और क्या वह सही व्यक्ति है।) कम-से-कम, तुम्हें सही व्यक्ति तो होना ही चाहिए। तुममें आध्यात्मिक समझ होनी चाहिए, सत्य समझने की क्षमता होनी चाहिए और कार्यक्षमता भी होनी चाहिए। सिर्फ तभी तुम विकसित किए जाने की सभी शर्तें पूरा करते हो और विकास के लिए उम्मीदवार बनते हो। तुम्हें ये सभी शर्तें पूरी करनी होंगी। अगर तुम इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं करते हो तो क्या हर कोई तुम्हें सिर्फ इसलिए अगुआ चुन लेगा क्योंकि तुम्हें सुर्खियाँ बटोरना पसंद है? ऐसा कभी नहीं होगा। इसलिए अगर तुम हमेशा सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हो, हमेशा अपना दिखावा करना पसंद करते हो तो क्या यह अहंकार नहीं है? (हाँ।) यह अहंकार है और खुद को ज्यादा आँकना है। मानवता के परिप्रेक्ष्य से, अहंकार विवेक की कमी है। अगर सत्य के अनुसार मापा जाए तो यह भ्रष्ट स्वभाव है और यह शैतानी स्वभाव है। सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना मानवता का दोष और भ्रष्ट स्वभाव दोनों है जिसमें दो मुद्दे भी शामिल हैं। वैसे तो सुर्खियाँ बटोरने की चाह खराब या बुरी मानवता के स्तर तक नहीं पहुँचती है, इसके बावजूद यह विवेक की कमी की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है और साथ ही अहंकारी स्वभाव की भी अभिव्यक्ति है। अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ सुर्खियाँ बटोरना ही पसंद है और वह लोगों का दमन नहीं करता है या उन्हें सताता नहीं है और वह फूट डालने या गुटबाजी करने के लिए कुकर्मियों के साधनों का उपयोग नहीं करता है तो यह उसकी मानवता का सिर्फ एक दोष है। लेकिन अगर वह कुकर्मियों या मसीह-विरोधियों की अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करता है और कुछ बुरे कर्म भी करता है तो मानवता का यह दोष और बिगड़ जाता है—यह क्या बन जाता है? खराब, भयानक और बुरी मानवता—इन पहलुओं का उपयोग ऐसी मानवता का निरूपण करने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त, ऐसे लोगों द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों की अभिव्यक्तियों में अहंकार और क्रूरता दोनों शामिल हैं; यकीनन ज्यादा विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ भी होती हैं। इसलिए, ऐसे लोगों की मानवता का इस आधार पर निरूपण किया जाना चाहिए कि वे किस हद तक इन भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करते हैं। अगर वे सिर्फ सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हैं और वे बुरी मानवता की अभिव्यक्तियाँ नहीं दिखाते हैं—लोगों का दमन नहीं करते हैं या उन्हें सताते नहीं हैं, गुट नहीं बनाते हैं और गुप्त रूप से स्वतंत्र राज्य स्थापित नहीं करते हैं या लोगों को गुमराह करने और उनसे आज्ञा मनवाने के लिए अपरंपरागत तरीकों का उपयोग नहीं करते हैं—तो यह सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना सिर्फ मानवता का एक दोष है। लेकिन जैसे ही ऐसे बुरे कर्म कर लिए जाते हैं, तब यह बात सिर्फ मानवता का दोष नहीं रह जाती है। फिर यह किस तरह की समस्या बन जाती है? (यह खराब, भयानक और बुरी मानवता बन जाती है।) बिल्कुल। यह अब सिर्फ मानवता का दोष नहीं है, बल्कि बुरी मानवता है। सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना सिर्फ मानवता का एक दोष है। अगर ऐसे व्यक्ति में आध्यात्मिक समझ, एक खास काबिलियत और कार्यक्षमता है तो क्या तुम उसे अपना अगुआ चुनोगे? (हाँ।) तुम उसे क्यों चुनोगे? (क्योंकि वह कुकर्मी नहीं है।) उसका सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना उसके भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन भर है। उसके सुर्खियाँ बटोरना पसंद करने में बुराई का कोई तत्व नहीं है और वह कुकर्मी नहीं है। जब तक वह अगुआ बनने की शर्तें पूरी करता है तब तक उसे चुना जा सकता है और आगे विकसित किया जा सकता है। वैसे तो सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना मानवता में खराब विवेक की अभिव्यक्ति है, लेकिन यह देखते हुए कि वह कार्य कर सकता है, उसमें कार्यक्षमता है, आध्यात्मिक समझ है, सत्य समझने की क्षमता है और इसके अलावा वह कुछ कार्य करने और पर्यवेक्षक बनने को तैयार है, उसे चुना जा सकता है। उसे क्यों चुना जा सकता है? क्योंकि उसकी मानवता मानक स्तर की है और उसकी काबिलियत भी। जब तक वह कुकर्मी या मसीह-विरोधी नहीं है, वह लोगों को नहीं सताएगा, उनका दमन नहीं करेगा और स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का प्रयास नहीं करेगा, तब तक उसे अगुआ के रूप में चुना जा सकता है। लेकिन अगर सुर्खियाँ बटोरना पसंद करने में बुरी मानवता के तत्व शामिल हैं तो क्या ऐसे व्यक्ति को चुना जाना चाहिए? (नहीं।) अगुआ के रूप में चुने जाने से पहले ही वह कुटिल साधनों का उपयोग करना, गुप्त रूप से गुट बनाना और वोटों से छेड़छाड़ करना शुरू कर देता है। अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए वह धूर्त चालें चलता है और यहाँ तक कि वह अफवाहें गढ़ने और ऐसे कुछ अच्छे लोगों के बारे में बुरी बातें करने में भी सक्षम होता है जो सत्य के अनुसरण में अपेक्षाकृत ईमानदार होते हैं और अपने कर्तव्य करते हैं। वह ऐसी बहुत-सी चीजें करता है जो सत्य और मानवीय नैतिक मूल्यों के खिलाफ हैं जिससे वह कुछ बुरे कर्म कर डालता है। क्या तुम लोग ऐसे व्यक्ति को अगुआ के रूप में चुन सकते हो? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि उसकी मानवता बुरी है।) विशिष्ट रूप से कहें तो ऐसा इसलिए है क्योंकि वह कुकर्मी है; वह लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों को पूरा नहीं करता है। परमेश्वर का घर कुकर्मियों का उपयोग नहीं करता है। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग कुकर्मियों के हाथों में पड़ जाएँ तो क्या नतीजे होंगे? एक बात तो यह है कि उन्हें सताया जाएगा और उनका दमन किया जाएगा। दूसरी बात यह है कि कलीसिया भुरभुरी रेत की तरह बिखर जाएगी और अव्यवस्थित हो जाएगी। ऐसे में तुम अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहे होगे, बल्कि कुकर्मियों की सेवा कर रहे होगे, कुकर्मियों द्वारा नियंत्रित किए जा रहे होगे और कुकर्मियों का अनुसरण कर रहे होगे। इसके क्या नतीजे होंगे? उद्धार प्राप्त करने की तुम्हारी उम्मीद तहस-नहस हो जाएगी। क्या अब तुम समझते हो? (हाँ।) तो अगर दो लोग सुर्खियाँ बटोरना पसंद करते हैं और दोनों के ही अहंकारी भ्रष्ट स्वभाव हैं तो तुम किस आधार पर किसी एक को अगुआ चुनोगे? (उनकी मानवता के आधार पर।) सही कहा, उनकी मानवता के आधार पर। अहंकार, धोखेबाजी और अड़ियलपन जैसे विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन सार्वभौमिक हैं; इस लिहाज से सभी एक जैसे हैं। तो अंतर कहाँ निहित है? लोगों की मानवता में। ऊपर से कुछ लोग ज्यादा निरंकुश होते हैं, जबकि कुछ ज्यादा रूढ़िवादी होते हैं; कुछ अपेक्षाकृत भ्रमित और जल्दबाज होते हैं, जबकि दूसरे लोग अपेक्षाकृत चतुर और बारीकी से काम करने वाले होते हैं। कुछ ज्यादा बहिर्मुखी और खुशमिजाज होते हैं, जबकि दूसरे लोग ज्यादा अंतर्मुखी होते हैं। लोगों के व्यक्तित्वों की बाहरी अभिव्यक्तियों में अंतर होता है और उनकी मानवता का सार भी निश्चित रूप से एक जैसा नहीं होता है। कुछ लोगों में जमीर और नैतिकता की सीमाएँ होती हैं, जबकि दूसरों में नहीं होतीं। कुछ लोग तो बुरे, निष्ठुर और क्रूर भी होते हैं—वे बिना किसी शिकन के मार डालते हैं और लोगों को निगल जाते हैं, हड्डियाँ वगैरह भी। वे कुछ भी करने में सक्षम हैं। इसलिए, कुकर्मियों के लिए दूसरों को तड़पाना कुछ भी नहीं है। अगर तुम लोग कुकर्मियों के हाथों में पड़ गए तो तुम्हारे अच्छे दिन समाप्त हो जाएँगे और उसके बाद से तुम अँधेरे में रहोगे। अगर कोई कुकर्मियों के हाथों में पड़ जाता है तो यह बड़े लाल अजगर के हाथों में पड़ने के समान है। क्या तुम लोगों ने इसका अनुभव किया है? (हाँ।) कुकर्मियों की मानवता के लिहाज से बुराई, क्रूरता, निष्ठुरता, नैतिक सीमाओं की गैर-मौजूदगी और जमीर के मानक नहीं होना उनकी सबसे प्रमुख और स्पष्ट अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर के प्रति और सत्य के प्रति उनके रवैये को देखा जाए तो उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल भी नहीं होता है। वे दुस्साहसी और अविचारी होते हैं, कुछ भी कर डालने की हिम्मत रखते हैं, उनके जमीर की कोई सीमा नहीं होती है। सत्य की बात करें तो, वे उसे रत्ती भर भी स्वीकार नहीं करते हैं। ऊपरी तौर पर वे अपने कर्तव्यों में प्रयास कर सकते हैं और कष्ट सह सकते हैं और वे दान भी दे सकते हैं। लेकिन वे जिस तरीके से परमेश्वर और सत्य से पेश आते हैं उसमें उन्हें जरा-सा भी भय नहीं होता है। जब भी परमेश्वर की गवाही देने, देहधारी परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर की पहचान और सार की गवाही देने, परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने या इस बात की गवाही देने की बात आती है कि परमेश्वर मानवजाति के लिए कैसे कीमत चुकाता है और परमेश्वर मानवजाति को बचाने के लिए कैसे अपने दिल के खून और अपने जीवन का उपयोग करता है तब उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता है और वे बोलना नहीं चाहते हैं। अपने दिलों में वे परमेश्वर का तिरस्कार करते हैं। लेकिन जब वे अपनी गवाही देते हैं, तब उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है और वे लगातार बोलते चले जाते हैं। सुर्खियाँ बटोरना पसंद करना मानवता का सिर्फ एक दोष है। अगर ऐसे लोग बुरे कर्म न करें और उनमें जमीर और नैतिकता की सीमाएँ हों तो वे आमतौर पर अपने जमीर की सीमाओं के अनुसार मामलों को माप सकते हैं, बशर्ते वे कुछ सत्य समझ सकें; उनका जमीर कार्य करता है। उदाहरण के लिए, अगर उन्हें अपनी पसंद का कोई विपरीत लिंग का व्यक्ति मिल जाता है और वे उसके पास जाना चाहते हैं तो क्योंकि उनकी मानवता में जमीर की सीमाएँ होती हैं और उनमें सत्यनिष्ठा और शर्म की भावना होती है, इसलिए वे प्राकृतिक रूप से खुद को रोक लेंगे। लेकिन कुकर्मी ऐसी चीजों की परवाह नहीं करते हैं। अगर उन्हें कोई पसंद आ जाता है तो वे जबरदस्ती उसके पास पहुँच जाएँगे; अगर दूसरा पक्ष सहमत नहीं हो तो वे उसे सताने, वश में करने या उसके लिए मुसीबत खड़ी करने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाएँगे। जमीर की सीमाओं वाले लोग अपने जमीर से नियंत्रित होते हैं; ऐसे कुछ अपराध हैं जो वे नहीं करेंगे और ऐसी कुछ सीमा रेखाएँ हैं जिन्हें वे नहीं लाँघेंगे क्योंकि उनमें सत्यनिष्ठा और शर्म की भावना होती है। अगर वे सत्य समझते हैं और उनके द्वारा उसकी स्वीकृति अपेक्षाकृत गहरी और मजबूत है तो उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होगा। क्योंकि वे परमेश्वर से डरते हैं और उसका भय मानते हैं, इसलिए वे आमतौर पर कुछ सीमा रेखाएँ नहीं लाँघेंगे। इसलिए, अगुआ के रूप में ऐसे किसी का होना जिसमें जमीर की सीमाएँ हैं तुम्हारे लिए बहुत फायदेमंद है। कम-से-कम वह तुम्हें चोट नहीं पहुँचाएगा, फिर तुम्हें रोकने या तुम्हें नुकसान पहुँचाने की तो बात ही छोड़ दो और वह तुम लोगों को कुछ भरण-पोषण और मदद भी दे सकता है। लेकिन कुकर्मी अलग होते हैं। वे तुम्हें गुमराह करने के लिए सिर्फ शब्दों का ही उपयोग नहीं करते हैं; वे तुम्हें सताने, तुम्हें दबाने और तुम्हें कुचल डालने के लिए विभिन्न विधियों का भी उपयोग करते हैं। अगर तुम उनकी आज्ञा नहीं मानते हो, उनकी बात नहीं सुनते हो या किसी चीज पर उनसे बहस करते हो तो वे न सिर्फ तुम पर हमला करेंगे, बल्कि तुम्हारी निंदा भी करेंगे, तुम्हें शर्मिंदा भी करेंगे और यहाँ तक कि तुम्हें वश में करने का प्रयास भी करेंगे। इस तरीके से तुम पूरी तरह से उनके हाथों में पड़ जाओगे। आम भ्रष्ट मनुष्यों और कुकर्मियों के बीच सबसे बड़ा अंतर इस बात में निहित है कि उनकी मानवता अच्छी है या बुरी और उनका जमीर कार्य करता है या नहीं। कुकर्मियों में कोई जमीर नहीं होता है, इसलिए उनमें सत्यनिष्ठा या शर्म की कोई भावना भी नहीं होती है और वे किसी भी तरह का बुरा कर्म करने में सक्षम होते हैं। जबकि आम भ्रष्ट मनुष्यों की मानवता में भी दोष और कमियाँ होती हैं, वे जमीर और विवेक द्वारा नियंत्रित होते हैं, इसलिए ऐसी कई तरह की सीमा रेखाएँ हैं जिन्हें लाँघने में वे अक्षम होते हैं। भले ही वे परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते हों, फिर भी वे कुछ स्पष्ट बुरे कर्म नहीं करेंगे; उदाहरण के लिए, वे यौन अनैतिकता या चोरी जैसे क्रियाकलाप करने में अक्षम हैं। इस बारे में सोचो : परमेश्वर में विश्वास रखने से पहले जब तुम दुनिया में थे तब अगर कोई तुम्हें व्यभिचार करने की अनुमति देता तो क्या तुम कर सकते थे? व्यभिचार का क्या मतलब है? इसका मतलब है गलती या आत्म-ग्लानि का कोई बोध महसूस किए बिना एक से ज्यादा यौन साथी होना, यहाँ तक कि एक ही समय में विपरीत लिंग के कई लोगों के साथ रिश्ते में होना। क्या तुम लोग ऐसी चीज कर सकते हो? (नहीं।) उन व्यभिचारी महिलाओं, वेश्याओं और लम्पटों को देखो—वे ऐसा कर सकते हैं। क्या तुम लोग इन लोगों से अलग नहीं हो? (हाँ।) अंतर कहाँ निहित है? यह इस बात में निहित है कि व्यक्ति में मानवता का जमीर और विवेक है या नहीं। जमीर और विवेक तुम्हें सत्यनिष्ठा और शर्म की भावना देते हैं, इसलिए तुम व्यभिचार के क्रियाकलाप नहीं करोगे और तुम्हारा एक मानक होगा : “उस तरीके से आचरण करना अच्छा नहीं है; मैं उस तरह का व्यक्ति नहीं बनूँगा। मैं अपने और उन लोगों के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचूँगा। अगर मुझे पीट-पीटकर मार डाला जाए तो भी मैं व्यभिचार नहीं करूँगा।” अगर कुछ लोगों को ऐसी स्थिति में बेच दिया जाए तो वे कहेंगे, “मैं उस तरह का व्यक्ति बनने के बजाय मरना पसंद करूँगा!” कुछ लोग अपमान और अन्याय सहते हैं, अनिच्छा से इसे मान लेते हैं, लेकिन वे अपने दिल में अनिच्छुक होते हैं और स्थिति से बाहर निकलने के किसी भी अवसर को पकड़ लेंगे। हालाँकि, कुछ लोग खुद ही उस तरह की व्यवस्था की तलाश करेंगे, भले ही दूसरे उन्हें रोकने का प्रयास करें। वे ऐसा करते हैं भले ही वे उससे कोई पैसा न कमाएँ—उन्हें बस व्यभिचार करने में आनंद आता है और उन्हें इस बात की बिल्कुल परवाह नहीं होती है कि यह फायदेमंद है या नहीं। क्या ये दोनों प्रकार के लोग अलग नहीं हैं? (हाँ।) लोगों की मानवता में ठीक यही अंतर है। मानवता में अंतर महत्वपूर्ण है। अगर तुम लोग विभिन्न प्रकार के लोगों में मानवता की अभिव्यक्तियों में अंतरों की असलियत देख सकते हो तो तुम लोग लोगों का भेद पहचान पाओगे। इसलिए, किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करना पूरी तरह से उसके भ्रष्ट स्वभाव पर या थोड़े समय के लिए या एक घटना में उसकी अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों पर आधारित नहीं किया जा सकता है। बल्कि, वह सही मायने में किस तरह का व्यक्ति है, इसका मूल्यांकन उसकी मानवता और उसके प्रकृति सार के आधार पर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही सुर्खियाँ बटोरना पसंद करने की अभिव्यक्ति पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

चीजों को सुव्यवस्थित ढंग से, दिमागी रूपरेखा के साथ और क्रमबद्ध तरीके से करना

चलो, हम दूसरी अभिव्यक्ति पर चलें। कुछ लोग चीजों को सुव्यवस्थित ढंग से, दिमागी रूपरेखा के साथ और क्रमबद्ध तरीके से करते हैं; वे विचार और मनन के जरिए यह तय कर सकते हैं कि पहले क्या करना है और बाद में क्या करना है। वे चरणों का पालन करते हैं और चीजें बेतहाशा ढंग से करने के बजाय उनके पास योजनाएँ होती हैं। चाहे वे कुछ भी करें, वे चरणों का पालन करते हैं, यहाँ तक कि कपड़े धोने जैसे सबसे आसान काम के लिए भी। वे कपड़ों को रंग के अनुसार अलग करते हैं, गहरे और हल्के रंग की चीजों को अलग-अलग धोते हैं; वे जानते हैं कि कपड़ों की संख्या के आधार पर कितने पानी और कितने डिटर्जेंट का उपयोग करना है और वे बरबादी से बचते हैं—यह सब कुछ योजनाबद्ध, बहुत व्यवस्थित, सूक्ष्म और किफायती होता है। यह किस प्रकार की अभिव्यक्ति है? (यह मानवता का गुण और मजबूत पक्ष है।) तो क्या यह गुण यह दर्शा सकता है कि इस प्रकार के व्यक्ति में अच्छी मानवता है? (नहीं।) यह उसकी मानवता का सिर्फ एक गुण और मजबूत पक्ष है। यह किसी के चरित्र या आचरण के सिद्धांतों को शामिल करने के स्तर तक नहीं पहुँचता है और न ही इसमें कोई भ्रष्ट स्वभाव शामिल है। यह बस जीवन की एक आदत या जीवन के प्रति एक रवैया है। कुछ लोग चीजों को दिमागी रूपरेखा के साथ, योजना के साथ करते हैं; वे पैटर्न को अच्छी तरह से समझ सकते हैं और जब काम पूरा हो जाता है तब दूसरे लोगों को यह संतोषजनक लगता है। ये अच्छी काबिलियत वाले लोग हैं। लेकिन खराब काबिलियत वाले लोगों के लिए यह अलग है—वे हर चीज उल्टे-पुल्टे और अव्यवस्थित ढंग से, बिना किसी दिमागी रूपरेखा या योजना के, पूरी तरह से बेतरतीब ढंग से करते हैं जो अंत में एकदम गड़बड़झाला हो जाता है। यह किस तरह की समस्या है? (मानवता का दोष है।) मानवता के इस दोष में क्या शामिल है? (अत्यंत खराब काबिलियत।) अत्यंत खराब काबिलियत वाले ऐसे लोगों को बस निर्बुद्धि कहा जाता है। जब मैं कुछ लोगों से कहता हूँ, “क्या तुम बेवकूफ हो? तुम इतनी सरल-सी चीज कैसे नहीं समझ सकते?” तब वे जवाब में कहते हैं, “मैं निर्बुद्धि हूँ।” “निर्बुद्धि” होने का क्या मतलब है? इसका मतलब है कोई काबिलियत नहीं होना या खराब काबिलियत होना—यह काबिलियत की समस्या है। यह मुद्दा किसके तहत आता है? क्या यह जन्मजात स्थिति नहीं है? (हाँ।) अगर कोई जन्मजात रूप से निर्बुद्धि है तो क्या उसे प्रशिक्षित करने का कोई मतलब है? ऐसे लोग हर चीज को बिना योजना या दिमागी रूपरेखा के करते हैं। एक आसान कार्य में उनका पूरा दिन लग जाता है जिससे महत्वपूर्ण मामलों में देरी हो जाती है। यह कोई काबिलियत नहीं होना या खराब काबिलियत होना है। अविश्वासी लोग बुरी मानवता वाले लोगों का अक्सर बिना काबिलियत वालों के रूप में वर्णन करते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई किसी दूसरे व्यक्ति को कूड़ा फैलाते, अस्वच्छ रहते या सबके सामने जोर-जोर से चीखते-चिल्लाते, पढ़ाई कर रहे या आराम कर रहे लोगों को तंग करते देखता है तब वह कह सकता है कि उस व्यक्ति में कोई काबिलियत नहीं है। मेरी नजर में यह व्यवहार संबंधी कायदों को नहीं समझना और मानवता की कमी है—इसे काबिलियत नहीं होना कैसे कहा जा सकता है? क्या “काबिलियत नहीं होना” का यही मतलब है? “काबिलियत” का क्या मतलब है? इसका मतलब चीजों को करने में कुशलता और कारगरता है—इसे काबिलियत कहते हैं। तो क्या जो लोग बिना किसी दिमागी रूपरेखा के कार्य करते हैं, वे खराब काबिलियत वाले होते हैं? (हाँ।) यह भी मानवता का दोष है। क्या यह दोष जन्मजात है? क्या इसे बदलना आसान है? क्या इसे प्रशिक्षण के जरिए बदला जा सकता है? क्या सुअर को पेड़ पर चढ़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है? सुअर इसके लिए नहीं बना है—उसमें यह काबिलियत नहीं होती है। चीजें करने में दिमागी रूपरेखा की कमी होना काबिलियत की समस्या है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें