सत्य का अनुसरण कैसे करें (8) भाग पाँच
बदमिजाज होना
बदमिजाज होना, गुस्सैल होना—यह किस पहलू से संबंधित है? (यह मानवता की एक कमी है।) बदमिजाज होने को गुस्सैल होना भी कहा जा सकता है—क्या इसे मानवता की एक कमी माना जाता है? (नहीं।) इसे कैसे देखा जाना चाहिए? एक व्यक्ति जो खुशमिजाज है, अपना द्वेष मुस्कान के पीछे छिपाकर रखता है, हमेशा सौम्य और मैत्रीपूर्ण तरीके से बोलता है, कभी किसी से बहस नहीं करता है और हमेशा वही कहता है जो दूसरे लोग सुनना चाहते हैं—क्या यह अच्छा है? (नहीं।) अगर कोई कहता है कि यह व्यक्ति अशिष्ट है तो वह कहता है, “अशिष्ट होना अच्छा है; अशिष्ट लोग परेशानी उत्पन्न नहीं करते हैं।” अगर कोई कहता है कि वह गंजा है, तो वह कहता है, “गंजा होना अच्छा है; गंजे लोग होशियार होते हैं।” यानी चाहे दूसरे लोग कुछ भी कहें या उससे कैसे भी पेश आएँ, वह कभी भी अपने आपे से बाहर नहीं होता है या गुस्सा नहीं होता है—क्या इस तरह का व्यक्ति अच्छा होता है? (नहीं।) जब यह बात आती है कि वह वाकई किन लोगों को पसंद करता है, अच्छे लोगों और अच्छी चीजों, और कुकर्मियों और बुरी चीजों के बारे में उसके विचार और नजरिए क्या हैं और क्या वह अच्छे लोगों को ठीक समझता है और कुकर्मियों से नफरत करता है या कुकर्मियों को ठीक समझता है और अच्छे लोगों से नफरत करता है, तो इन चीजों पर उसका कोई स्पष्ट दृष्टिकोण या रुख नहीं होता है और वह किसी भी चीज पर टिप्पणी नहीं करता है। चाहे उसके सामने कोई भी मामला आए, वह हमेशा उसे एक मुस्कान से टाल देता है, वह विशेष रूप से हँसमुख होता है और उसमें गुस्सा बिल्कुल नहीं होता है। क्या यह मानवता का एक गुण है? (नहीं।) खुशमिजाज होना मानवता का एक गुण नहीं है, तो क्या बदमिजाज होना मानवता की एक कमी है? क्या किसी व्यक्ति का खुशमिजाज या बदमिजाज होना यह तय कर सकता है कि उसकी मानवता कैसी है? (नहीं।) उदाहरण के लिए, कुछ लोग किसी को अपने कर्तव्य में लापरवाह होते देखते हैं और परवाह नहीं करते, वे किसी को कलीसिया के कार्य में बाधा डालते देखते हैं और उन्हें गुस्सा नहीं आता है; और वे यहाँ तक कहते हैं, “कोई बात नहीं, तुम सुधर जाओगे—आराम से, कोई जल्दी नहीं है। परमेश्वर हमारे लिए श्रमसाध्य इरादे रखता है; हमें परमेश्वर के प्रेम और उसके अनुग्रह का बदला चुकाना चाहिए और हम लापरवाह नहीं हो सकते। अगली बार इस पर ध्यान देना।” क्या ये लोग खुशमिजाज हैं? (हाँ।) कुछ लोग जब देखते हैं कि कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर के हितों का बचाव नहीं कर रहा है तो वे कहते हैं, “क्या तुम परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने का प्रयास कर सकते हो? यह बहुत ही अच्छा होगा अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील बनो। हमें अच्छे लोग बनना चाहिए—अगर हम अच्छे लोग नहीं बनते हैं तो परमेश्वर हमें पसंद नहीं करेगा। हम जिस तरीके से आचरण करते हैं, उससे कम-से-कम हमें परमेश्वर के घर के हितों का बचाव तो करना ही चाहिए—भविष्य में इस पर ध्यान देना।” क्या इसमें कोई मिजाज दिखाया जा रहा है? (नहीं।) उनका मिजाज काफी अच्छा है, है ना? कुछ लोग कभी भी गुस्सा नहीं होते हैं चाहे कुछ भी हो जाए। जब वे देखते हैं कि कुछ लोग सुसमाचार का प्रचार करते समय ऊपरवाले को और परमेश्वर के घर को धोखा देने के लिए अक्सर गलत संख्याएँ रिपोर्ट करते हैं, तो वे कहते हैं, “अगर ज्यादातर लोग इस तरह से झूठी संख्याएँ रिपोर्ट कर रहे हैं तो फिर यह पवित्र आत्मा के कार्य की धारा है—हमें इसके प्रति समर्पण करना चाहिए!” कोई उन्हें गलत ठहराते हुए कहता है, “झूठी संख्याएँ बताना झूठ बोलना और परमेश्वर को धोखा देना है; मैं ऐसा नहीं कर सकता।” वे जवाब देते हैं, “क्यों नहीं? दूसरे लोग झूठी संख्याएँ बताते हैं, सिर्फ अच्छी खबरों की सूचना देते हैं, बुरी खबरों की नहीं। तुम इतने बेवकूफ क्यों बन रहे हो?” जब वे लोगों को झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करते देखते हैं, तो उन्हें खुशी होती है। जब वे कुछ लोगों को सिद्धांतों से चिपके रहते और झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने से इनकार करते देखते हैं तो वे नाराज हो जाते हैं और भड़क उठते हैं, मेज पर मुक्का मारते हैं और कहते हैं, “तुम झूठी संख्याएँ रिपोर्ट क्यों नहीं कर रहे हो? क्या तुम पवित्र आत्मा की धारा के खिलाफ जाना चाहते हो? अगर तुम झूठी संख्याएँ रिपोर्ट नहीं करोगे, तो मैं तुम्हें बर्खास्त कर दूँगा! मैं तुम्हें बाहर निकाल दूँगा!” उनके इस तरीके से आपा खोने के बारे में तुम क्या सोचते हो? (यह बुरा है।) यह दुष्ट गुस्से का विस्फोट है। जब उन्हें आपा खोना चाहिए तब नहीं खोना और जब नहीं खोना चाहिए तब उनका मनमाने ढंग से आपा खोना, बुरी चीजों को उचित कहना, झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने को पवित्र आत्मा की धारा कहना और उसकी बहुत ज्यादा तारीफ करना और यहाँ तक कि उसको बढ़ावा भी देना—क्या यह घिनौना नहीं है? (हाँ।) जब वे देखते हैं कि कोई व्यक्ति झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने से इनकार कर देता है तो वे मेज पर मुक्का मारते हैं, भड़क उठते हैं और घूरते हैं, उसे बर्खास्त करना या बाहर निकाल देना चाहते हैं—यह “प्रचंड क्रोध” है! बड़े लाल अजगर के पास एक “प्रचंड ऑपरेशन” है; उस शैतान के शक्ति प्रदर्शन को “प्रचंड ऑपरेशन” कहा जाता है और यह इन लोगों का “प्रचंड क्रोध” है। अगर तुम झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने से इनकार कर देते हो और वे मेज पर मुक्का मारते हैं और तुम्हारे खिलाफ अपना प्रचंड क्रोध शुरू कर देते हैं, तो ऐसी परिस्थिति में क्या तुम सिद्धांतों से चिपके रहने, सिर्फ वास्तविक संख्याएँ रिपोर्ट करने और झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने से इनकार करने की हिम्मत करोगे? क्या तुम उनके खिलाफ खड़े होने और उनकी आलोचना करने और उन्हें उजागर करने की हिम्मत करोगे, यह कहोगे : “तुम लोगों को झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने के लिए मजबूर कर रहे हो—तुम एक शैतान हो! यहाँ तक कि तुम झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने में मसीह-विरोधियों का अनुसरण करने को पवित्र आत्मा की धारा भी कहते हो। क्या यह पवित्र आत्मा और परमेश्वर की ईश-निंदा नहीं है? तुम सही को गलत से अलग नहीं करते हो और तुम पवित्र आत्मा की ईश-निंदा करते हो और फिर भी तुम अपने आपको एक निष्पक्ष फरिश्ता मानते हो। तुम किसी को भी झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने की अपनी माँग के खिलाफ जाने की अनुमति नहीं दोगे और यहाँ तक कि तुम आपा भी खो देते हो। तुममें न्याय की रत्ती भर भावना नहीं है। न सिर्फ तुम बुरी चीजों को उजागर नहीं करते हो और उनकी निंदा नहीं करते हो, बल्कि तुम बड़े पैमाने पर उन लोगों पर अपना गुस्सा भड़कने भी देते हो जो सत्य से चिपके रहते हैं और झूठी संख्याएँ रिपोर्ट करने से इनकार कर देते हैं, यहाँ तक कि तुम उन पर अपने ‘प्रचंड क्रोध’ का कहर भी बरपाते हो। क्या यह जानबूझकर परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ करना और बाधा डालना नहीं है? क्या यह उसी प्रकृति का व्यवहार नहीं है जैसा बड़ा लाल अजगर करता है?” तो, फिर से इस बात को देखा जाए कि क्या बदमिजाज होना वाकई मानवता की एक कमी है या मानवता का एक गुण है, तो इसे सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किन परिस्थितियों के कारण व्यक्ति आपा खोता है और किन परिस्थितियों के कारण नहीं खोता है और यह इस पर भी निर्भर करता है कि आमतौर पर वह व्यक्ति बदमिजाज क्यों होता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति किस चीज का अनुसरण कर रहा है, क्या उस व्यक्ति के पास स्व-आचरण के लिए सिद्धांत हैं और सत्य के प्रति उसका रवैया वास्तव में कैसा है और साथ ही, परमेश्वर, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के घर के हितों और कलीसिया के कार्य के प्रति उसका रवैया कैसा है। अगर सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने, परमेश्वर के घर के हितों का बचाव करने और परमेश्वर के घर के कार्य का बचाव करने के लिए वह विभिन्न कुकर्मियों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय लगातार बदमिजाज होता है, तो फिर यह उसकी मानवता का एक गुण है। लेकिन अगर वह विभिन्न बुरी चीजों या परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली चीजों से सामना होने पर कभी भी भड़कता नहीं है या गुस्सा नहीं होता है, जैसे कि उसका उनसे कोई लेना-देना ही न हो, तो फिर यह उसकी मानवता की एक कमी नहीं है—यह खराब मानवता है, न्याय की भावना बिल्कुल नहीं होना है और यकीनन यह भ्रष्ट स्वभाव की श्रेणी में आता है। तो मिजाज को कैसे देखा जाना चाहिए? किसी व्यक्ति के खुशमिजाज होने का आवश्यक रूप से यह मतलब नहीं है कि उसकी मानवता अच्छी है और किसी व्यक्ति के बदमिजाज होने का आवश्यक रूप से यह मतलब नहीं है कि उसकी मानवता खराब है—यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी बदमिजाजी का निशाना किस चीज की तरफ है। अगर उसकी बदमिजाजी का निशाना उन चीजों की तरफ है जो बुरी और अँधकारमय हैं और सत्य के अनुरूप नहीं हैं—अगर उसका निशाना उन चीजों की तरफ है जो परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं, परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाती हैं और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करती हैं और बाधा डालती हैं—और वह इन चीजों को लेकर बेचैन, उत्तेजित और चिंतित रहने के कारण बार-बार गुस्सा हो जाता है और आपा खो बैठता है, तो फिर यह खराब मानवता नहीं है। यह परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना है, यह मानवता का एक गुण है। इसके विपरीत, अगर इन नकारात्मक चीजों से सामना होने पर वह कोई मिजाज नहीं दिखाता है, परमेश्वर के घर या परमेश्वर की गवाही के हितों का बचाव करने के लिए आगे नहीं आता है और सत्य सिद्धांतों से चिपका नहीं रहता है और इन चीजों को रोकने या प्रतिबंधित करने के लिए आगे नहीं आता है, बल्कि इन गड़बड़ियों और विघ्न-बाधाओं को बढ़ने और निरंकुश रूप से फैलने देता है, तो भले ही ऐसे लोग बहुत खुशमिजाज दिखाई देते हों, लेकिन दरअसल उनका चरित्र घिनौना है। क्या यही बात नहीं है? (हाँ, है।) बदमिजाज होने के मुद्दे को कैसे देखा जाना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की बदमिजाजी का निशाना किन मामलों की तरफ है; तुम्हें यह देखना चाहिए कि उस व्यक्ति का चरित्र कैसा है, वह क्या अनुसरण करता है और किस मार्ग पर चलता है और सत्य के प्रति, परमेश्वर के प्रति, परमेश्वर के घर के कार्य के प्रति और परमेश्वर के घर के हितों के प्रति उसका क्या रवैया है। क्या इसे देखने का यह तरीका सटीक है? (हाँ।) अगर किसी व्यक्ति में न्याय की कोई भावना नहीं है, लेकिन वह गर्ममिजाज है, आसानी से भड़क उठता है और अपने दैनिक जीवन में लोगों से मेलजोल रखते समय उसे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है, बार-बार गुस्से से तमतमाने लगता है और अक्सर मामूली बातों पर दूसरों से बहस करता रहता है और उनसे भिड़ जाता है, यहाँ तक कि अभद्र भाषा का भी उपयोग करता है, तो यह मानवता की एक कमी नहीं है—यह घिनौना चरित्र है। भ्रष्ट स्वभाव के लिहाज से देखा जाए तो, इस व्यक्ति का स्वभाव क्रूर है और कोई भी उसे उकसाने की हिम्मत नहीं करता है। वह न्यायोचित मामलों का बचाव करने, सकारात्मक चीजों का बचाव करने, सत्य सिद्धांतों को बनाए रखने या परमेश्वर के घर के हितों और कार्य का बचाव करने के लिए आपा नहीं खोता है, बल्कि अपने सारे हितों, अपनी प्रतिष्ठा, रुतबे, घमंड, भौतिक संपत्ति, पैसे, वगैरह-वगैरह का बचाव करने की खातिर आपा खोता है। ऐसे व्यक्ति की बदमिजाजी को घिनौने चरित्र के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। बदमिजाजी को परिस्थिति के आधार पर देखा जाना चाहिए, यह विचार करना चाहिए कि व्यक्ति की बदमिजाजी का निशाना किस चीज की तरफ है और इसके पीछे क्या इरादे हैं। अगर वह अपने हितों का बचाव करने या अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का बचाव करने के लिए वाकई आपा खो सकता है और एक अकेली टिप्पणी पर हंगामा खड़ा कर सकता है, तो उसका चरित्र घिनौना है। अगर जब उसके व्यक्तिगत हितों से जुड़े मामलों की बात आती है, तो वह आमतौर पर काफी दरियादिल होता है—उदाहरण के लिए, जब कभी-कभार लोग ऐसी टिप्पणियाँ करते हैं जो उसे निशाना बनाती हैं और उसके गौरव को जरा-सी ठेस पहुँचाती हैं या उसका जरा-सा फायदा उठाती हैं, तो वह आमतौर पर इसे नजरअंदाज कर देता है और आपा नहीं खोता है—अगर वह छोटी-छोटी चीजों पर ज्यादा परेशान नहीं होता है और दूसरों से मेलजोल रखते समय सहनशील हो सकता है और फिर भी जब वह किसी को कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते और बाधा डालते और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते देखता है तो वह आपा खो देता है, तो यह बुरा चरित्र नहीं है। बल्कि यह वही न्याय की भावना है जो मानवता में होनी चाहिए; यह मानवता का एक गुण है।
रूठने की प्रवृत्ति होना
रूठने की प्रवृत्ति होना—यह किस तरह की समस्या से संबंधित है? (यह मानवता की एक कमी है।) यह मानवता की एक कमी है। किस तरह के लोगों में रूठने की प्रवृत्ति होती है? (ओछे लोगों में।) ओछे लोग, तुनकमिजाज लोग और बच्चे, इन सब में रूठने की प्रवृत्ति होती है। जब उनके सामने कोई छोटी-मोटी समस्या आती है, तब वे तुरंत गुस्सा हो जाते हैं, तुमसे बात करने से मना कर देते हैं, तुमसे मिलने से मना कर देते हैं और तुम्हारे कॉल का उत्तर भी नहीं देते हैं। तुम अनजाने में कुछ ऐसा कह देते हो जिससे उन्हें ठेस पहुँचती है, और वे रूठने लगते हैं, लंबे समय तक तुम्हें अनदेखा करने लगते हैं, और इस बारे में पूछे जाने पर भी कुछ नहीं कहते हैं। तुम उनसे पूछते हो, “क्या हुआ? अगर कोई समस्या है तो चलो उसे हल कर लें। अगर मुझ पर तुम्हारा कोई ऋण है तो मैं उसे चुका दूँगा। अगर मेरी कही किसी बात से तुम्हें ठेस पहुँची है तो मैं माफी माँगता हूँ और तुम मुझसे जो भी करवाना चाहते हो, मैं वह सब कर सकता हूँ।” फिर भी वे चुप रहते हैं, रूठे रहते हैं। क्या ऐसे लोग परेशान करने वाले नहीं होते हैं? (हाँ।) यह असामान्य मानवता है। मानवता से संबंधित समस्याएँ जो चरित्र से संबंधित मुद्दों के स्तर तक नहीं पहुँचती हैं, वे सब मानवता की कमियों से संबंधित हैं। कमी का मतलब है कि जो चीज सामान्य मानवता में मौजूद होनी चाहिए, वह चीज व्यक्ति में मौजूद नहीं है—आचरण करते समय या मामले सँभालते समय किसी व्यक्ति का रवैया या ढंग असामान्य या अपरिपक्व है और सामान्य मानवता के लिए सूझ-बूझ का मानक पूरा नहीं करता है। यह एक कमी है। एक बात तो यह है कि रूठने की प्रवृत्ति होने से दूसरे लोग चिढ़ जाते हैं और वे ऐसे लोगों से मेलजोल रखना नापसंद करते हैं। इसके अलावा, रूठने की प्रवृत्ति होना बच्चों जैसा अपरिपक्व होना है। आमतौर पर लगभग दस वर्ष की आयु के बच्चे ही इस तरीके से व्यवहार करते हैं—वयस्कों में ये अभिव्यक्तियाँ नहीं होती हैं। जब ऐसे व्यक्ति के तुमसे अच्छे संबंध होते हैं, तो तुम दोनों जुड़वाँ भाइयों की तरह होते हो। लेकिन जब तुम्हारे बीच कड़वाहट आ जाती है तब वह शत्रुतापूर्ण हो जाता है, रूठ जाता है, तुमसे बात करने से इनकार कर देता है, तुमसे मिली सारी चीजें तुम्हें वापस कर देता है और तुमसे हमेशा के लिए संबंध तोड़ लेता है। फिर भी कौन जाने—एक दिन हो सकता है कि वह सुलह कर ले और पहले की तरह घनिष्ठ हो जाए। ये अपरिपक्वता की अभिव्यक्तियाँ हैं। अपरिपक्वता की इन सभी अभिव्यक्तियों को मानवता की कमी के रूप में निर्दिष्ट किया जाता है। रूठने की प्रवृत्ति होना मानवता की एक कमी है। जिन लोगों में रूठने की प्रवृत्ति होती है वे कर्तव्य करते समय चीजों में देरी करने की सबसे ज्यादा संभावना रखते हैं। तुम्हें कभी यह पता नहीं होता है कि वे कब इस कारण से कई दिनों तक रूठे रह जाएँ कि किसी ने उन्हें कुछ ऐसा कह दिया जिससे उन्हें ठेस पहुँच गई। चाहे कर्तव्य कितना भी महत्वपूर्ण हो, वे बिना कुछ भी कहे इसे करना बंद कर सकते हैं। तुम्हें लग सकता है कि वे अब भी सामान्य रूप से अपना कर्तव्य कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वे बहुत पहले ही अपना कार्य बंद कर चुके होते हैं। इसलिए यह अनिवार्य है कि रूठने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों को कभी भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपा जाए, विशेष रूप से वे काम जो नाजुक चरणों में हैं क्योंकि वे बेहद उद्दंड, हमेशा भावुक और रूठने की प्रवृत्ति रखने वाले होते हैं, उनमें तर्क-शक्ति की कमी होती है जिसके कारण वे अपना कर्तव्य करने की अवधि के दौरान आसानी से अपना कार्य छोड़ देते हैं। अगर यह कार्य पूरी तरह से उन्हीं के द्वारा किया जाना है या उनकी जगह लेने वाला कोई और वहाँ नहीं है, तो उन्हें कार्य सौंपते समय तुम्हारे पास उनके कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए कोई जरूर होना चाहिए। अगर कोई और है जो उनकी जगह ले सकता है तो उन्हें अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण कार्य नहीं सौंपा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों में जरा-सी काबिलियत होती है और वे कलीसिया के अगुआ का कार्य सँभाल सकते हैं, लेकिन जब कोई भाई या बहन कुछ ऐसा कह देता है जिससे उन्हें ठेस पहुँचती है तो वे रूठ जाते हैं : “मैं छोड़ रहा हूँ! तुम लोग जिसे चाहो उसे अगुआ बनने दे सकते हो। मैं अपना जीवन जीने के लिए घर वापस जा रहा हूँ—मैं इससे तंग आ चुका हूँ!” एक बार वे रूठ गए तो वे अपना कर्तव्य छोड़ सकते हैं और वहाँ से चले जा सकते हैं और कौन जाने कि वे कब वापस आएँगे। क्या ऐसे लोग भरोसेमंद होते हैं? (नहीं।) वे अपना गुस्सा अपने कर्तव्य और कलीसिया के कार्य पर निकालते हैं, किसी भी समय अपना कर्तव्य छोड़ देते हैं। क्या यह अपरिपक्वता की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) अपने कर्तव्य और कलीसिया के कार्य से ऐसे पेश आना जैसे यह कोई बच्चों का खेल हो, घर-घर खेलने जैसा हो—यह अपरिपक्वता की अभिव्यक्ति है। जब बच्चे घर-घर खेलते हैं तब यह बस एक खेल होता है—अगर वे परेशान हो जाते हैं तो वे खेलना बंद कर देते हैं; इससे किसी चीज में देरी नहीं होती। लेकिन कलीसिया के कार्य या किसी कर्तव्य से ऐसे पेश आना जैसे कोई बच्चा घर-घर खेल रहा हो, जब चाहें तब छोड़ देना—क्या इससे चीजों में देरी नहीं होती है? इससे सिर्फ उनके अपने मामलों में ही देरी नहीं होती है—अगर वे कलीसिया के अगुआ हैं, तो कलीसिया के कार्य में उनके कारण देरी होती है। अगर वे कोई महत्वपूर्ण कर्तव्य कर रहे हैं तो उस महत्वपूर्ण कर्तव्य में देरी हो जाती है। इसलिए, उपयोग करने के लिए लोगों को चुनते समय तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या उनमें रूठने की प्रवृत्ति होने की समस्या है। अगर वाकई उनमें यह समस्या है, तो क्या यह गंभीर है? यह कितनी गंभीर है? क्या वे अपना कार्य छोड़ देंगे? जब वे रूठेंगे तब क्या वे गुस्से से झुंझला उठेंगे, घर चले जाएँगे और अपना कर्तव्य करना बंद कर देंगे, चाहे कोई भी उन्हें बुलाए, क्या वे वापस नहीं आएँगे? इस तरह के लोगों को सँभालना बहुत मुश्किल होता है। उनका उपयोग कभी मत करना—वे काँटेदार किस्म के होते हैं। उन्हें मनाना काम नहीं करता है, उन्हें अनुशासित करना काम नहीं करता है और चाहे तुम कैसे भी सत्य के बारे में संगति करो, इसे स्वीकारना उन्हें मुश्किल लगता है। सिर्फ जब वे खुद इसका पता लगा लेते हैं और अपने आप इसे समझ लेते हैं, तभी वे उबर सकते हैं और सामान्य समझ पर लौट सकते हैं। इसलिए, भ्रष्ट स्वभाव होने के अलावा अगर किसी की मानवता में भी कई कमियाँ या दोष हैं, तो एक बार किसी अप्रिय चीज से उसका सामना हो जाए तो वह इससे इतना नकारात्मक बन सकता है कि फिर उबर नहीं पाता है। भले ही उसमें कुछ संकल्प हो और वह उद्धार प्राप्त करने के लिए सत्य का अनुसरण करने को तैयार हो और भले ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने और एक सृजित प्राणी के रूप में मानक-स्तर का होने का उसका मन हो, जब कठिनाइयाँ या अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं तो वह अब और आगे नहीं बढ़ पाता है। इसलिए, अगर कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण करना चाहता है और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहता है, तो उसे उन कमियों या दोषों को हल करने के लिए सत्य की तलाश करनी चाहिए जो उसकी मानवता में मौजूद हो सकते हैं। अगर तुम्हारे पास ऐसा दिल नहीं है जिसमें परमेश्वर के लिए जबरदस्त चाह हो या जो सत्य के लिए तरसता हो और तुम मानवता की इन कमियों पर काबू पाने को तैयार नहीं हो या ऐसा करने के लिए तुम्हारे पास अपर्याप्त संकल्प हो, तो तुम्हारे सामने आने वाली चुनौतियाँ बहुत सारी होंगी। अगर तुम इन व्यक्तिगत कमियों को बदल नहीं सकते या उन पर जीत हासिल नहीं कर सकते तो अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ देना तुम्हारे लिए और भी मुश्किल होगा।
फायदा उठाना पसंद करना
आओ, अब हम “फायदा उठाना पसंद करने” की बात करें—यह किस तरह की समस्या है? (यह मानवता की एक कमी है।) क्या यह मानवता की एक कमी है? फायदा उठाना पसंद करना चरित्र की समस्या है। अगर कोई हर परिस्थिति में फायदा उठाता है, चाहे वह सब्जी, कागज का टुकड़ा या पानी की छोटी बोतल जैसी छोटी-सी चीज ही क्यों न हो, तो यह उसके चरित्र की समस्या है—उसका चरित्र घिनौना है। यह मानवता की कमी नहीं है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) ऐसे लोग घिनौने चरित्र वाले होते हैं और उनमें सत्यनिष्ठा नहीं होती है। किसी दुकान में खरीदारी करते समय वे हमेशा मोल-भाव करने का प्रयास करते हैं और छूट माँगते हैं। बाजार में सब्जियाँ खरीदते समय वे कुछ सेंट के लिए लगातार बहस करते हैं। जब वे किसी होटल में ठहरते हैं और डिस्पोसेबल तौलिए, टूथब्रश और टूथपेस्ट जैसी मुफ्त चीजें देखते हैं, तब वे एक भी चीज पीछे छोड़े बिना सब कुछ अपने घर ले जाते हैं, उन्हें कुछ भी छूट जाने का डर रहता है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या वे इसलिए फायदा उठाना पसंद करते हैं क्योंकि वे गरीब हैं?” नहीं, इस तरह के लोगों का चरित्र बस ऐसा ही होता है। उनके परिवार में पैसों की तंगी नहीं होती है लेकिन फिर भी वे फायदा उठाने पर अड़े रहते हैं। इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद परमेश्वर के घर का भी फायदा उठाता है। कुछ लोग अपने घर पर खाना नहीं खाते हैं बल्कि मुफ्त का खाना खाने के लिए हमेशा मेजबान के घर चले जाते हैं, ऐसे दिखाते हैं जैसे वे मेजबान के घर के कामों में मदद करने के लिए वहाँ आए हैं। वे चुपके से भाई-बहनों की चीजों का उपयोग करते हैं। वे अपनी चीजों का उपयोग करने से बचते हैं और हमेशा दूसरों की चीजों का उपयोग करते हैं। वे अपने कपड़े नहीं पहनते हैं और हमेशा किसी और के कपड़े पहनते हैं। जब वे किसी को कपड़ों की धुलाई करते देखते हैं, तब वे उससे कहते हैं कि वह लगे हाथ उनके लिए भी कुछ चीजें धो दे और आखिर में उसे सात-आठ कपड़े धोने के लिए दे देते हैं—यह स्पष्ट रूप से फायदा उठाना है। उनका चरित्र बस इसी तरह का होता है। हालाँकि उनके परिवार के पास स्पष्ट रूप से पैसा है, फिर भी वे भाई-बहनों से पैसे उधार लेते हैं। यह पूछे जाने पर कि वे इसे कब चुकाएँगे, वे कहते हैं, “जब मेरे पास पैसे होंगे तो मैं इसे लौटा दूँगा। अगर मेरे पास पैसे नहीं हों तो मैं इसे कैसे चुका सकता हूँ? मेरे पास कोई पैसा नहीं है—बस मेरा जीवन है!” इन शब्दों का क्या मतलब हुआ? स्पष्ट रूप से वे चुकाना नहीं चाहते हैं और उनका ऐसा करने का कभी इरादा ही नहीं था—वे बस फायदा उठाना चाहते हैं, अपने आनंद के लिए और बेरोकटोक पैसे खर्च करने के लिए दूसरों के पैसों का उपयोग करते हैं। उनका यही उद्देश्य है। जब वे देखते हैं कि किसी ने कोई नई चीज खरीदी है, तब उन्हें बहुत दिलचस्पी हो जाती है और वे उसे उधार लेने के बारे में लगातार सोचते रहते हैं। अगर मालिक को इसकी जरूरत है और वह इसे उधार नहीं देना चाहता, तो भी वे इसे जबरदस्ती उधार ले लेते हैं। वे उसका तब तक उपयोग करते हैं जब तक कि वह चीज पुरानी नहीं हो जाती या टूट नहीं जाती और वे फिर भी उसे वापस नहीं करते हैं, उससे ऐसे पेश आते हैं जैसे कि यह उनकी अपनी ही हो। इस तरह का व्यक्ति हर जगह फायदा उठाता है, चीजें उधार लेता है और उन्हें कभी वापस नहीं करता। क्या यह मानवता की एक कमी है? (नहीं।) यह सत्यनिष्ठा नहीं होना और घिनौना चरित्र होना है। क्या तुम लोगों ने कभी इस तरह का व्यक्ति देखा है? (हाँ।) ऐसे लोग बहुत हैं। मुझे बताओ, क्या इस तरह का व्यक्ति सत्य का अभ्यास कर सकता है? (नहीं।) इनमें से ज्यादातर व्यक्ति किस तरह के लोग हैं? क्या वे बदमाश नहीं हैं? चाहे वे दूसरों का कितना भी फायदा उठाएँ, उनका जमीर कभी भी स्वयं पर आरोप नहीं लगाता है। मुझे बताओ, क्या उनमें जमीर होता है? (नहीं।) बिना जमीर वाले लोग किस तरह के व्यक्ति होते हैं? चलो, हम यह नहीं कहते हैं कि वे अच्छे लोग हैं या कुकर्मी हैं—कम-से-कम उनमें सत्य का अभ्यास करने के लिए अपेक्षित मानवता के सबसे मूलभूत मानकों और शर्तों की कमी तो होती ही है। हमने इससे पहले यह संगति की थी कि सत्य का अभ्यास करने के लिए एक व्यक्ति में कम-से-कम जमीर तो होना ही चाहिए। व्यक्ति के जमीर में शर्म की भावना शामिल होती है। क्या जो लोग अपने जमीर में स्वयं पर कोई आरोप महसूस किए बिना हमेशा दूसरों का फायदा उठाते रहते हैं उनमें शर्म की भावना होती है? (नहीं।) क्या शर्म की भावना रहित लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) वे कुछ भी महसूस किए बिना और अपने जमीर से किसी भी तरह की फटकार के बिना बुरे कर्म करते हैं। इसलिए न्यायपूर्ण कर्म करना और सही मार्ग पर चलना उनको कतई आकर्षक नहीं लगता क्योंकि उनकी मानवता को ऐसी चीजों की कोई जरूरत नहीं होती है। उनकी क्या जरूरतें हैं? उनकी जरूरत किसी भी नुकसान से अपने हितों की रक्षा करना और साथ ही दूसरों के हित छीनकर अपने हित के लिए उनका उपयोग करना है। उनकी मानवता में ऐसे व्यवहार के लिए फटकार या स्वयं पर आरोप लगाने की कोई भावना नहीं होती है और न ही कोई शर्म की भावना होती है। इसलिए, इस तरह के व्यक्ति के लिए सत्य का अभ्यास करना बहुत मुश्किल होता है। उनके आचरण का जीवन-सिद्धांत है : जो कुछ भी उनके लिए फायदेमंद है, चाहे वह भौतिक लिहाज से हो या मनोवैज्ञानिक लिहाज से, उसे रत्ती भर भी नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जहाँ तक दूसरों की अच्छी और कीमती चीजों का प्रश्न है, वे हमेशा उनका मालिक बनना, उन्हें जब्त करना या उन्हें जबरन हड़प लेना चाहते हैं। एक बार उन्हें अवसर मिल जाए तो वे दूसरों की अच्छी चीजें अपने लिए जब्त कर लेंगे। वे खुद को अवसर से चूकने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दे सकते हैं और अगर वे इससे चूक भी गए तो उन्हें जीवन भर इसका पछतावा रहेगा। वे कैसे आचरण करते हैं उसमें उनका यह जीवन-सिद्धांत झलकता है। क्योंकि वे इस जीवन-सिद्धांत द्वारा नियंत्रित होते हैं, इसलिए वे दूसरों का फायदा उठाते समय और दूसरों के लाभों को अपने लाभ होने का दावा करते समय न्यायसंगत और सहज महसूस करते हैं और उन्हें महान उपलब्धि का एहसास होता है। अगर वे फायदा उठाने में विफल रहते हैं या ऐसा करने का अवसर चूक जाते हैं तो उन्हें लगता है कि वे विफल हो गए हैं और खुद को बेवकूफ समझते हैं। फायदा उठाते समय वे अच्छा, खुश और शांत महसूस करते हैं। लेकिन जब उन्हें फायदा उठाने का अवसर दिखाई देता है और वे फायदा नहीं उठाते हैं, तब वे परेशान और बेचैन हो जाते हैं : “अगर मैंने यह फायदा नहीं उठाया तो यह बरबादी है। अगर कोई और इसे ले लेता है तो क्या मेरा ही नुकसान नहीं होगा?” जरा देखो इसे—क्या इस जीवन-सिद्धांत द्वारा नियंत्रित कोई व्यक्ति एक अच्छा व्यक्ति बनने का प्रयास कर सकता है? (नहीं।) सत्य का अभ्यास करते समय लोगों को कई चीजें छोड़ने की जरूरत होती है, जैसे कि उनके संजोये हुए गर्व की भावना, रुतबे और दूसरी मनोवैज्ञानिक चीजों के साथ-साथ कुछ भौतिक चीजें भी। इन सभी में व्यक्तिगत हित शामिल होते हैं और सत्य का अभ्यास करने के लिए लोगों से इन चीजों के खिलाफ विद्रोह करने, उन पर काबू पाने, उन्हें छोड़ देने और उन्हें जाने देने की अपेक्षा की जाती है। जो लोग फायदा उठाना पसंद करते हैं, वे इनमें से कुछ भी बिल्कुल नहीं कर सकते हैं। वे अपने अभिमान या रुतबे को जाने नहीं दे सकते हैं और वे किसी भी भौतिक हित को छोड़ने में तो और भी कम सक्षम होते हैं। सत्य का अभ्यास करते समय वे इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते हैं। तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) इसलिए उनके लिए सत्य का अभ्यास करना बेहद मुश्किल होता है। वे सारी मनोवैज्ञानिक और भौतिक अच्छी चीजों को अपने पास रखना चाहते हैं और उन्हें कभी जाने नहीं दे सकते हैं जो कि सीधे सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों से टकराता है और उनके खिलाफ जाता है। इसलिए वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। जरा उन लोगों को देखो जो फायदा उठाना विशेष रूप से पसंद करते हैं—वे कितनी दूर तक जाते हैं? किसी के घर जाने पर वहाँ से निकलने से पहले वे सुनिश्चित करते हैं कि वे उनका कुछ पानी पीयें और कुछ खाना खाएँ। मुझे बताओ, क्या इस तरह के चरित्र वाले लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) हर चीज मापने का उनका मानक इस सिद्धांत पर आधारित होता है कि क्या वे फायदा उठा सकते हैं और लाभ हासिल कर सकते हैं। व्यक्तिगत लाभ वह सिद्धांत है जिसके द्वारा वे हर चीज मापते हैं। उनका स्व-आचरण सिर्फ दूसरों का फायदा उठाने पर ही केंद्रित रहता है। जब तक उन्हें नुकसान नहीं होता है और वे फायदा उठा सकते हैं तब तक उन्हें लगता है कि यह सार्थक है। उनका मानना है कि अपने आचरण में व्यक्ति को फायदा उठाने में समर्थ होना चाहिए और व्यक्ति तभी बुद्धिमान और चालाक होता है जब उसने बार-बार फायदा उठाया हो—अगर किसी व्यक्ति को यह नहीं पता कि फायदा कैसे उठाना है तो वह व्यक्ति बेवकूफ है! स्व-आचरण के लिए उनका मानक सिर्फ फायदा उठाना और कभी कोई नुकसान नहीं उठाना है। वे इस नजरिए को अपने आचरण के मानक के रूप में लेते हैं—क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? (नहीं।) क्या उनके दिलों में सत्य के लिए कोई जगह है? क्या यह उनके दिलों में वर्चस्व रख सकता है? (नहीं।) तो वे किन सत्यों का अभ्यास कर सकते हैं? (किसी का भी नहीं।) वे किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हैं—उनका चरित्र बहुत ही निम्न है जिसके कारण दूसरे लोग उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के घर में कर्तव्य करते हैं; परमेश्वर का घर उन्हें दैनिक उपयोग के लिए कुछ चीजें उपलब्ध कराता है और वे अक्सर इस बहाने का उपयोग करके कि वे खत्म हो गई हैं, और देने का अनुरोध करते हैं जबकि वास्तव में उनके पास अब भी कुछ बची हुई होती हैं। वे हमेशा उन्हें और देने का अनुरोध क्यों करते हैं? वे सोचते हैं, “अगर मैंने इसका फायदा नहीं उठाया और कोई दूसरा व्यक्ति फायदा उठा लेता है तो क्या मुझे नुकसान नहीं होगा?” इसे देखो—यह किस तरह का चरित्र है? इस तरह का व्यक्ति हर चीज मापने के लिए जिस मानक का उपयोग करता है वह इस सिद्धांत पर आधारित है कि वह फायदा उठा सकता है और लाभ हासिल कर सकता है या नहीं। उसका दिल पूरी तरह से हितों के विचारों से भरा होता है। तुम उसके साथ सकारात्मक चीजों या सत्य के बारे में चाहे कैसे भी संगति करो, वह इसे स्वीकारने से इनकार करता है जिसका उसकी काबिलियत से या इस बात से कोई लेना-देना नहीं होता कि वह समझ सकता है या नहीं—बात यही है कि उसका जीवन-सिद्धांत जो उसके आचरण में झलकता है वह समस्यात्मक है। वह बिल्कुल भी सकारात्मक चीजों को स्वीकार नहीं करेगा या उनका अभ्यास नहीं करेगा और न ही वह सत्य सिद्धांतों का पालन करेगा। उसका चरित्र बेहद निम्न है। मुझे बताओ, क्या इस तरह के व्यक्ति के साथ सत्य के बारे में संगति करना जरूरी है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि वह कभी भी सत्य का अभ्यास नहीं करेगा।) उसकी मानवता में जमीर की भावना की कमी है और वे सत्य का अभ्यास करने की मूलभूत शर्तें पूरी नहीं करते। उसका दिल सिर्फ फायदा उठाने और लाभ हासिल करने पर केंद्रित रहता है। यह कहा जा सकता है कि इस तरह का व्यक्ति बस सत्य सुनने के अयोग्य है और उद्धार प्राप्त करने के बारे में धर्मोपदेश सुनने के अयोग्य है। देखो, तुम लोग पूरी तरह से यह नहीं समझते थे कि फायदा उठाना पसंद करना किस तरह की समस्या है, है ना? तुम यहाँ तक सोचते थे कि यह मानवता की एक कमी है। क्या यह मानवता की एक कमी है? (नहीं।) अब तुम समझ गए हो, है ना? यह किस तरह की समस्या है? (यह चरित्र की समस्या है—इस तरह का व्यक्ति निम्न चरित्र का होता है।)
दान देने की प्रवृत्ति होना
आओ, अब हम दान देने की प्रवृत्ति के बारे में बात करें। अगर किसी व्यक्ति की दान देने की प्रवृत्ति के पीछे कोई मकसद नहीं है और यह सिर्फ एक व्यवहार है या उसके दैनिक जीवन में एक आम अभ्यास है तो दान देने की इस प्रवृत्ति को मानवता का एक गुण माना जाना चाहिए। चाहे जो भी हो, लेने से देना बेहतर है। कम-से-कम जिस व्यक्ति में दान देने के प्रति झुकाव होता है, उसके पास ऐसा दिल होता है जो दूसरों के प्रति सहानुभूति रखता है, उसकी मानवता में दयालुता का तत्व होता है, वह कंजूस नहीं होता है और भौतिक चीजों को ज्यादा महत्व नहीं देता है। इसके अलावा, जब उसके पास अपेक्षाकृत भरपूर भौतिक चीजें होती हैं तब वह अपनी अतिरिक्त चीजें या वे चीजें दे देता है जिनका वह खुद उपयोग नहीं करता है, लेकिन वे दूसरों के उपयोग के लिए उपयुक्त होती हैं जिससे दूसरों का जीवन जरा-सा ज्यादा आरामदेह या सुविधाजनक बन जाता है। इन क्रियाकलापों के पीछे के मकसद को देखा जाए तो, जिन लोगों का दान देने के प्रति झुकाव होता है उनमें, कम-से-कम दयालु मानवता होती है, और वे दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने और दूसरों पर दया करने की मूलभूत अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं—यह उनकी मानवता का एक गुण है। ऐसे लोगों का चरित्र अपेक्षाकृत अच्छा होता है, यह उन कुकर्मियों से कहीं बेहतर होता है जो दूसरों का फायदा उठाना और मनमाने ढंग से दूसरों की चीजें हड़पना पसंद करते हैं—उनमें कुछ हद तक ज्यादा सत्यनिष्ठा होती है। वे बदले में कोई भी चीज माँगे बिना, दूसरों से तारीफ की या अपने पीछे अच्छी प्रतिष्ठा छोड़ने की इच्छा किए बिना दान देते हैं और दूसरों की मदद करते हैं। यह बस उनका स्व-आचरण के प्रति रवैया है या उनकी जीवन शैली है। उदाहरण के लिए, जब वे देखते हैं कि किसी के पास कपड़े नहीं हैं, तब वे तुरंत अपने अतिरिक्त कपड़े उस व्यक्ति को पहनने के लिए दे देते हैं। जब वे देखते हैं कि किसी दूसरे व्यक्ति का परिवार गरीब है और अक्सर उसे पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता है, तब वे अपने परिवार का कुछ चावल उसे दे देते हैं ताकि उसके पास भी खाने के लिए पर्याप्त भोजन हो। जब वे नया कम्प्यूटर खरीदते हैं और देखते हैं कि किसी और का कम्प्यूटर मुश्किल से उपयोग के लायक है, तब वे अपना पुराना कम्प्यूटर उस व्यक्ति को उपयोग करने के लिए दे देते हैं। वे बदले में कुछ भी माँगे बिना दान देते हैं—यह बस उनका चरित्र है। यह मानवता का एक गुण है और इसे अच्छे चरित्र की अभिव्यक्ति के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। दान देने के प्रति झुकाव होने का व्यवहार बिल्कुल भी बुरा नहीं है, लेकिन कुछ लोग, क्योंकि उनका दान देने के प्रति झुकाव होता है, अक्सर सोचते हैं, “मैं दयालु हूँ, मैं नेक हूँ, मैं उदार हूँ। मेरा दान और सहायता प्राप्त करने के बाद कई लोगों के जीवन बेहतर हो गए हैं। मैं परमेश्वर के उद्धार की वस्तु हूँ। अगर परमेश्वर मेरे जैसे व्यक्ति को नहीं बचाता है, तो वह किस तरह के व्यक्ति को बचाएगा?” वे अक्सर मानते हैं कि वे “एक अच्छे व्यक्ति हैं जिसका दान देने के प्रति झुकाव है।” मान लो कि कोई उनसे कहता है, “तुम्हारी मानवता अच्छी नहीं है। तुम ऐसी कई चीजें करते हो जो सत्य के खिलाफ जाती हैं और तुम सत्य से प्रेम नहीं करते।” यह सुनने के बाद वे आगबबूला हो जाएँगे। यहाँ क्या समस्या है? कुछ लोगों के परिवार अपेक्षाकृत दौलतमंद हैं और उन्होंने अपने आस-पास के सभी भाई-बहनों पर एहसान किए हैं। इसलिए वे लोग अक्सर सोचते हैं, “मैं कलीसिया में इन लोगों से बहुत अच्छी तरह से पेश आया हूँ—इन सभी को मुझसे कुछ न कुछ मदद मिली है। क्या इन लोगों के दिलों में मेरे लिए प्रतिष्ठा और रुतबा नहीं है? क्या कलीसिया में मैं ही सबसे अच्छी काबिलियत और सबसे अच्छी मानवता वाला व्यक्ति नहीं हूँ? क्या मुझे अगुआ नहीं होना चाहिए? क्या सभी भाई-बहनों को मेरी बात नहीं माननी चाहिए?” यह किस तरह का मुद्दा है? क्या यह भ्रष्ट स्वभावों का मुद्दा नहीं है? (हाँ।) सिर्फ इसलिए कि उनका व्यवहार जरा-सा अच्छा है, वे अब अपना सच्चा माप नहीं जानते हैं, वे इस व्यवहार को पूँजी मानते हैं, हमेशा कलीसिया के अगुआ बनना चाहते हैं और उनका घमंड बढ़ जाता है, वे सोचते हैं कि वे असाधारण हैं। वे परमेश्वर के वचनों द्वारा उजागर किए गए विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों को खुद से नहीं जोड़ते हैं। वे मानते हैं कि दान देने के प्रति उनका झुकाव होने का मतलब है कि वे एक अच्छे व्यक्ति हैं, उनमें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, वे जो कुछ भी करते हैं वह सही है और उन्हें कलीसिया में अगुआ और एक मिसाल होना चाहिए और भाई-बहनों को उनका अनुकरण करना चाहिए। ये किस चीज के प्रकाशन हैं? (भ्रष्ट स्वभावों के।) यह भ्रष्ट स्वभावों के स्तर तक बढ़ चुका है। वैसे तो दान देने के प्रति झुकाव होना मानवता का एक गुण है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति अपना आकलन एक ऐसे अच्छे व्यक्ति के रूप में करता है जिसे इस कारण से निश्चित रूप से बचाया जाएगा, तो क्या इस तरह का विचार और दृष्टिकोण सही है? वे दान देने के प्रति झुकाव होने के अपने अच्छे व्यवहार को अच्छा चरित्र और नेक सत्यनिष्ठा होना मानते हैं और यहाँ तक कि इसे सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना भी मानते हैं। यह एक गंभीर गलती है। यह घमंड और आत्मतुष्टता है और आत्म-जागरूकता का पूर्ण अभाव है। दान देने के प्रति झुकाव होने को अच्छा व्यवहार कहा जा सकता है। ज्यादा-से-ज्यादा, जिस व्यक्ति का दान देने के प्रति झुकाव होता है उसका चरित्र अपेक्षाकृत अच्छा होता है, उन लोगों से कहीं बेहतर होता है जो फायदा उठाते हैं। लेकिन बस इसलिए कि तुममें दान देने के प्रति झुकाव होने का यह अच्छा व्यवहार है, तुम यह दावा नहीं कर सकते कि तुम एक अच्छे व्यक्ति हो, तुममें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है और तुम कलीसिया के अगुआ होने, दूसरों से ऊपर खड़े होने और हुक्म जारी करने के योग्य हो। यह घमंडी स्वभाव है। वैसे तो तुममें दान देने और दूसरों की मदद करने के प्रति झुकाव है—इनमें से कुछ अच्छे व्यवहारों में जुड़ना है—जो कि मानवता का एक गुण है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुममें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है। अगर तुम दान देने और दूसरों की मदद करने की अपनी प्रवृत्ति को पूँजी मानते हो और तुममें कलीसिया का अगुआ बनने और खुद को दूसरों से ऊपर उठाने की महत्वाकांक्षा पनपने लगती है तो यह भ्रष्ट स्वभाव का मुद्दा है। क्या अब तुम अंतर देख सकते हो? अच्छा चरित्र होने का यह मतलब नहीं है कि व्यक्ति में कोई भ्रष्ट स्वभाव ही नहीं है। कुछ लोग दूसरों से मूल रूप से काफी हद तक अच्छी तरह बातचीत करते हैं और मेलजोल रखते हैं—वे दूसरों का फायदा नहीं उठाते हैं और यहाँ तक कि वे दान भी देते हैं और दूसरों की मदद भी करते हैं—उनमें मानवता के कुछ गुण होते हैं। लेकिन उनके साथ कुछ समय बिताने के बाद तुम्हें पता चलता है कि वे बहुत घमंडी हैं, उन्हें डींग हाँकना पसंद है और वे कभी-कभी झूठ भी बोलते हैं और काफी धोखेबाज हैं। अगर तुम उनकी आलोचना करते हो तो वे इसे स्वीकारने से इनकार कर देते हैं और वे कुछ हद तक क्रूर होते हैं, यहाँ तक कि वे मेज पर मुक्का मारते हैं और कहते हैं, “मैंने इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है—ऐसा कौन है जिसे मुझसे दान न मिला हो? भाई-बहनों से पूछ लो—क्या मैंने कभी किसी का फायदा उठाया है? क्या मैंने कभी किसी को नुकसान पहुँचाया है या ठेस पहुँचाई है?” क्या दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाकर तुम एक अच्छा व्यक्ति बन जाते हो? क्या दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाना बस वह न्यूनतम चीज नहीं है जो व्यक्ति को करनी चाहिए? तुम्हारे पास अकड़बाज होने का क्या कारण है? किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना या ठेस नहीं पहुँचाना वह चीज है जो व्यक्ति को करनी चाहिए—यह पूँजी नहीं है। दूसरों का फायदा नहीं उठाने का यह मतलब नहीं है कि तुम सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में समर्थ हो। तुम्हें आत्म-चिंतन करना सीखना चाहिए और दूसरों की आलोचना और मदद स्वीकारने में समर्थ होना चाहिए—सिर्फ तभी तुम एक सूझ-बूझ वाले व्यक्ति बन पाओगे। अब तुम्हारी काट-छाँट की जा रही है क्योंकि तुमने एक भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किया है और तुम्हारे क्रियाकलाप सत्य के अनुरूप नहीं हैं। यह इस तथ्य को नकारना नहीं है कि दान देने के प्रति झुकाव होने का तुम्हारा अच्छा व्यवहार एक सकारात्मक चीज है, या यह तुम्हारे चरित्र को नकारना नहीं है। बल्कि काट-छाँट करने और उजागर करने का अभ्यास इसलिए किया जा रहा है क्योंकि तुमने गलती की है और सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन किया है। अगर तुम इसे स्वीकार सकते हो तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य से प्रेम करता है और सत्य का अभ्यास कर सकता है। अगर तुम इसे स्वीकार नहीं करते हो तो दान देने की तुम्हारी प्रवृत्ति, ज्यादा-से-ज्यादा, मानवता का एक गुण है। लेकिन, क्योंकि तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव में घमंड, क्रूरता और दुष्टता हावी रहती हैं, तुम सत्य स्वीकार नहीं कर सकते हो और इसलिए तुम पूरी तरह से अधम हो और तुम निकम्मे हो। काट-छाँट से सामना होने पर इस तरह के लोग बहुत बड़ा हंगामा मचाते हैं, अपनी योग्यताओं के बारे में बात करते हैं और उन्होंने जो जरा-सा अच्छा व्यवहार किया है उसका दिखावा करते हैं। वे पागल कुत्तों की तरह व्यवहार करते हैं, गुस्से से फट पड़ते हैं। उनकी जो थोड़ी-सी अच्छी छवि थी वह पूरी तरह से गायब हो जाती है और उनकी प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाती है। हर कोई इसे स्पष्ट रूप से देखता है और कहता है, “इस व्यक्ति में एक बहुत ही भ्रष्ट स्वभाव है—वह कुकर्मी है, झगड़ालू महिला जैसा है! यह खुशकिस्मती है कि उसे कलीसिया का अगुआ नहीं चुना गया। अगर वह कलीसिया का अगुआ बन जाता तो वह जरा-सी भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाता—अगर कोई उसे बर्खास्त करने का प्रयास करता तो वह उस व्यक्ति का पीछा कभी नहीं छोड़ता और आखिरी साँस तक उसके खिलाफ लड़ता रहता। यह विनाशकारी होता!” अगर तुम सिर्फ उनके एक अच्छे व्यवहार या उनकी मानवता के एक गुण को देखते हो, तो तुम यह देख ही नहीं सकते कि उनके भ्रष्ट स्वभाव किस तरह के हैं, सत्य के प्रति उनका रवैया कैसा है या वे सत्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं। जब वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं और फिर उजागर होते हैं और काट-छाँट से गुजरते हैं तब सत्य के प्रति उनका रवैया थोड़ा-थोड़ा करके सतह पर आ जाता है और उजागर हो जाता है। इसलिए, किसी व्यक्ति का चरित्र या उसकी मानवता के गुण और कमियाँ पूरी तरह से यह तय नहीं कर सकतीं कि वह सत्य स्वीकारता है या नहीं। उसके चरित्र या उसकी मानवता के गुणों और कमियों को देखा जाए तो यह देखना भी असंभव है कि सत्य के प्रति उसका रवैया कैसा है। जब वह कोई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता है या जब उसका उजागर किए जाने या काट-छाँट किए जाने से सामना होता है, सिर्फ तभी सत्य के प्रति उसका रवैया प्रकट होता है और तभी यह पता चल सकता है कि क्या वह सत्य से प्रेम करता है, क्या वह सत्य का अभ्यास कर सकता है और उसके पास अंत में बचाए जाने की कितनी उम्मीद है। ऐसे लोगों की दान देने और दूसरों की मदद करने की प्रवृत्ति से तुम देख सकते हो कि उनकी मानवता में क्या गुण और कमियाँ हैं। फिर उनकी समस्याओं की श्रृंखला से—जैसे कि उनका घमंडी और आत्मतुष्ट बनना और दान देने और दूसरों की मदद करने की उनकी प्रवृत्ति के कारण से अगुआ बनने और दूसरों से ऊपर खड़ा होने की चाह करना—तुम स्पष्ट रूप से सत्य के प्रति उनका रवैया देख सकते हो; और सत्य के प्रति उनके रवैये के आधार पर तुम स्पष्ट रूप से यह देख सकते हो कि वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं या नहीं। इन व्यवहारों के जरिये तुम उनकी मानवता के गुणों और कमियों का भेद पहचान सकते हो, उनके चरित्र का भेद पहचान सकते हो और साथ ही मानवता और भ्रष्ट स्वभाव के बीच अंतर समझना सीख सकते हो, लेकिन तुम पूरी तरह से यह नहीं बता सकते कि वे अंत में बचाए जा सकते हैं या नहीं या उनका नतीजा कैसा होगा। यह तय करना कि किसी को बचाया जा सकता है या नहीं कुछ हद तक ज्यादा जटिल है—तुम्हें यह भी देखना पड़ता है कि क्या वह सत्य स्वीकार सकता है या नहीं, आत्म-चिंतन कर सकता है या नहीं और भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने पर सच्चा पश्चात्ताप कर सकता है या नहीं; इसका फैसला इन पहलुओं के आधार पर किया जाना चाहिए।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?