सत्य का अनुसरण कैसे करें (9) भाग एक

सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना

अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना

I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना

च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है

इस अवधि के दौरान हमारी संगति के विषय में एक अपेक्षाकृत व्यापक दायरा शामिल रहा है, है ना? (हाँ।) इसमें मानवता के कुछ और विशिष्ट मुद्दे शामिल रहे हैं और साथ ही इसमें लोगों के जीवन के कुछ मुद्दे भी शामिल रहे हैं। हमने पिछली सभा में काबिलियत से जुड़े विषयों के बारे में संगति की और फिर हमने इस बारे में संगति की कि जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों का भेद कैसे पहचानना है। काबिलियत के विषय पर हमारी संगति मूल रूप से पूरी हो चुकी है; अब से तुम इस विषय-वस्तु के आधार पर इस बारे में राय बना सकते हो कि वास्तव में किसी व्यक्ति की काबिलियत कैसी है। इन तीनों पहलुओं—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—के बारे में संगति करते समय हमने लोगों के दैनिक जीवन की कुछ अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों के बारे में संगति की ताकि यह राय बना सकें कि क्या ये उनकी जन्मजात स्थितियों, मानवता या भ्रष्ट स्वभावों के तहत आते हैं। जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के तीनों पहलुओं के बारे में हमारी संगति के जरिये क्या अब तुम्हें सृजित प्राणियों के रूप में मनुष्यों की मूलभूत संरचना की ठोस समझ है? (हम इसे पहले से थोड़ा-सा ज्यादा समझ सकते हैं।) हम लोगों के जीवन में प्रकट होने वाले तीनों पहलुओं के बारे में संगति इस कारण से करते हैं कि सृजित मानवजाति जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों से बनी होती है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम पुरुष हो या महिला, तुम जवान हो या बूढ़े, तुम किस जाति के लोगों में या किस देश में रहते हो, किस काल में रहते हो या तुम किस तरह के सामाजिक परिवेश और पृष्ठभूमि में रहते हो—संक्षेप में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा बाहरी रंग-रूप कैसा है—जब तक तुम सृजित प्राणी हो, तब तक तुम इन्हीं तीन पहलुओं से बने हो : जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव। दूसरे शब्दों में, वह हर व्यक्ति जो भ्रष्ट मानवजाति से है, जन्मजात स्थितियों और मानवता से और भ्रष्ट स्वभावों के जीवन से बना होता है। यानी हर सृजित मनुष्य में जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। यकीनन, व्यक्ति की जन्मजात स्थितियाँ परमेश्वर द्वारा नियत होती हैं। मानवता अंशतः जन्मजात स्थितियों से प्रभावित होती है और अंशतः परिवार द्वारा की गई परवरिश, सामाजिक परिवेश और शैतान की शिक्षा से अनुकूलित और प्रभावित होती है। दूसरी तरफ, भ्रष्ट स्वभाव व्यक्ति के शैतानी स्वभाव और शैतानी प्रकृति होते हैं जो शैतान द्वारा गुमराह किए जाने और उसकी भ्रष्टता से उत्पन्न होते हैं। यह भ्रष्ट प्रकृति अंशतः व्यक्ति के परिवार से, अंशतः समाज से और अंशतः उन प्रभावों और अनुकूलन से आती है जिनका व्यक्ति अलग-अलग परिवेशों में अनुभव करता है। इस परिप्रेक्ष्य से कोई भी सृजित व्यक्ति वास्तव में किसी भी तरह का रहस्य नहीं है क्योंकि वह इन तीन पहलुओं से बना होता है : जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव। इसलिए, यह भेद पहचानना वास्तव में आसान होना चाहिए कि कोई व्यक्ति किस तरह का व्यक्ति है। परमेश्वर द्वारा नियत और प्रदान की गई जन्मजात स्थितियों को एक तरफ रख दिया जाए तो केवल यह भेद पहचानना बच जाता है कि किसी व्यक्ति की मानवता किस तरह की है और उसमें कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं—इनसे तय होता है कि इस व्यक्ति का सार किस तरह का है। इस तरह से भेद पहचानने से चीजें बहुत स्पष्ट हो जाती हैं। इन चीजों के आधार पर यह भेद पहचानना कोई मुश्किल मामला नहीं है कि किसी व्यक्ति का सार क्या है। इस तरह से भेद पहचानने का एक आधार है और एक मापदंड भी है।

6. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ

इससे पहले हमने उन जन्मजात स्थितियों की कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों की सूची बनाई थी जिनमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं हैं। जन्मजात स्थितियाँ वे नींव हैं जिस पर लोग जीवित रहने के लिए भरोसा करते हैं और वे स्थितियाँ हैं जो सृजित मानवजाति में होनी चाहिए। चाहे यह व्यक्ति के जन्म से संबंधित स्थितियाँ हों, जैसे कि जन्म का समय, परिवेश और जगह, या फिर व्यक्ति का रंग-रूप, काबिलियत, विशेष कौशल, सहज ज्ञान, रुचियाँ, शौक और व्यक्तित्व जैसे पहलू हों—ये सभी व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों का हिस्सा हैं। ये जन्मजात स्थितियाँ लोगों को भ्रष्ट नहीं करती हैं और यकीनन इन जन्मजात स्थितियों में कोई भ्रष्ट स्वभाव भी नहीं होते हैं। आमतौर पर, जन्मजात स्थितियाँ कुछ मूलभूत स्थितियाँ होती हैं जो किसी सृजित मनुष्य के पास होनी चाहिए ताकि वह जीवित बच सके और जीवन जी सके। मानवता का मतलब वह चीज है जिसे उस सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के साथ जिया जाता है, जो जन्मजात स्थितियों वाले शरीर से प्रकट होती है। जहाँ तक भ्रष्ट स्वभावों की बात है, तो इसे समझना आसान है—भ्रष्ट स्वभाव शैतान द्वारा इस शरीर के जीवन को भ्रष्ट किए जाने का नतीजा हैं, जिसमें जन्मजात स्थितियाँ और मानवता होती है। क्या यह थोड़ा-सा अमूर्त है? कुल मिलाकर, सृजित मनुष्य सृजित प्राणी हैं जिन्हें भ्रष्ट स्वभाव नियंत्रित करते हैं और उनमें मानवता का मूलभूत जमीर और विवेक होता है। इन सृजित प्राणियों में परमेश्वर द्वारा नियत अलग-अलग जन्मजात स्थितियाँ होती हैं। यह परमेश्वर द्वारा सृजित मानवजाति की मूलभूत संरचना है। इसमें जन्मजात स्थितियों और भ्रष्ट स्वभावों को समझना आसान है लेकिन मानवता अपेक्षाकृत अमूर्त हो सकती है। आसान शब्दों में कहें तो मानवता सृजित मानवजाति का एक अनूठा गुण है जो उसे दूसरे जीवित प्राणियों से अलग करता है। इस अनूठे गुण वाले सृजित प्राणियों में जमीर और विवेक, चरित्र और सही-गलत में फर्क करने की क्षमता भी होती है। ये अनूठे गुण, जो मानवजाति को दूसरे जीवित प्राणियों से अलग करते हैं, मानवता को बनाते हैं। इस मानवता में यकीनन भाषा का उपयोग करके व्यक्त करने की क्षमता, सही-गलत में अंतर करने की क्षमता, समझने की क्षमता, नई चीजें स्वीकार करने की क्षमता, सृष्टिकर्ता के वचन स्वीकारने की क्षमता और परमेश्वर का आदेश स्वीकारने और किसी भी मामले को सँभालने की क्षमता शामिल हैं। यही मानवता है। मानवता की सरलतम समझ यह है कि यह सृजित मानवजाति का एक अंतर्निहित गुण है जो उसे दूसरे जीवित प्राणियों से अलग करता है। इस गुण की सबसे मूलभूत विशेषताएँ जमीर और विवेक हैं। यह इसे समझने का सरलतम तरीका है। इसमें कुछ विवरण हैं, जैसे कि सत्यनिष्ठा और चरित्र जो मानवता में होने चाहिए, सकारात्मक चीजों और नकारात्मक चीजों में अंतर करना और सकारात्मक चीजों का चयन और कार्यान्वयन करना। मूल रूप से ये वही चीजें हैं जो लोगों को जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के तीनों पहलुओं के बारे में समझनी और जाननी चाहिए। क्या तुम लोगों ने इससे पहले इन मुद्दों के बारे में सोचा है? (हमने इससे पहले इनके बारे में नहीं सोचा है।) इन मुद्दों का पहली बार सामना करने पर क्या तुम उन्हें समझ सकते हो? क्या तुम उनका मतलब समझ सकते हो? (हम उन्हें कुछ हद तक समझ सकते हैं।) क्या किसी को लगता है कि हम जिस विषय पर बात कर रहे हैं वह बहुत ज्यादा गहन और कुछ हद तक अमूर्त है और फलसफे पर चर्चा करने जैसा थोड़ा-सा समझ से परे है? हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के इन तीनों पहलुओं की जिन विशिष्ट अभिव्यक्तियों के बारे में इन दिनों संगति की है उनके आधार पर अभी जिस बारे में बात की गई वह तुम लोगों के लिए अमूर्त नहीं होनी चाहिए। इन तीनों पहलुओं की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ तुम्हें समझ आनी चाहिए। इसके अलावा, क्या इन तीनों पहलुओं के बीच संबंध भी स्पष्ट नहीं होने चाहिए? मानवता वह सत्यनिष्ठा, चरित्र, जमीर और विवेक है जो व्यक्ति अपने पास मूलभूत जन्मजात स्थितियाँ होने की नींव के आधार पर प्रकट करता है। भ्रष्ट स्वभाव वे चीजें हैं जो जन्मजात स्थितियों के जरिए मानवता में जी जाती हैं और वे लोगों द्वारा जिए जाने वाले अलग-अलग स्वभाव हैं जो उस जीवन से नियंत्रित होते हैं जो शैतान उनमें डालता है। इस तरह से चाहे व्यक्ति की जन्मजात स्थितियाँ कुछ भी हों, वे सिर्फ सबसे मूलभूत बाहरी खोल हैं, जबकि वह जीवन जो सही मायने में व्यक्ति के सार को नियंत्रित कर सकता है, शैतान द्वारा व्यक्ति में डाले गए भ्रष्ट स्वभाव हैं। यानी यह भेद पहचानने के लिए कि व्यक्ति का सार क्या है उन स्वभावों को देखो जिन्हें वह प्रकट करता है। अगर वह जो स्वभाव प्रकट करता है वे घमंड, अड़ियलपन, धोखेबाजी, दुष्टता या क्रूरता के भ्रष्ट स्वभाव हैं, तो चाहे उसका चरित्र दयालु हो या बुरा, यह व्यक्ति वास्तव में शैतान का है क्योंकि उसका जीवन शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है। इसलिए, व्यक्ति का गुण क्या है यह उसकी जन्मजात स्थितियों पर नहीं बल्कि उस जीवन पर निर्भर करता है जो उसके भीतर है। अगर उसका जीवन शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है तो चाहे उसकी जन्मजात स्थितियाँ बाहर से कितनी भी कुलीन या महान दिखाई दें, वे वास्तव में शैतान के हैं और भ्रष्ट मानवजाति के सदस्य हैं। अगर व्यक्ति का जीवन ऐसा है जहाँ सत्य उसका जीवन है, तो चाहे उसकी जन्मजात स्थितियाँ बाहर से कितनी भी साधारण, सामान्य या नीची नजर से देखी जाने वाली दिखें—और भले ही बाहर से वह अपनी मानवता की कुछ कमजोरियाँ, अपर्याप्तताएँ और दोष प्रदर्शित करे—वह अब भी उस मानवजाति का हिस्सा है जिसे बचाया गया है। वे वास्तव में परमेश्वर के हैं, शैतान के नहीं हैं। उनका सार बदल जाता है। जैसे ही उनका सार बदल जाता है, उनका संबंध भी बदल जाता है—वे सत्य और परमेश्वर के हो जाते हैं। इसलिए, किसी व्यक्ति के संबंध, सार और अंतिम परिणाम में उसकी जन्मजात स्थितियाँ निर्णायक कारक नहीं हैं और यकीनन उसकी मानवता भी पूरी तरह से निर्णायक कारक नहीं है, बल्कि यह बात निर्णायक कारक है कि उसका जीवन क्या है। अगर शुरू से आखिर तक व्यक्ति का जीवन ऐसा है जिसमें भ्रष्ट स्वभाव उसका जीवन है और वह शैतान का है, तो उसका संबंध शैतान से होगा; अगर जीवन के रूप में उसके पास सत्य है तो वह परमेश्वर का है और इस तरह से उसका संबंध परमेश्वर से उस सुंदर गंतव्य में होगा जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए तैयार किया है। सभी पहलुओं में लोगों की अलग-अलग अभिव्यक्तियों और सार के आधार पर लोगों का मौजूदा संबंध क्या है? क्या लोगों का जीवन ऐसा है जिसमें सत्य उनका जीवन है? (नहीं।) तो व्यक्ति का सार वास्तव में किस पर निर्भर करता है? (इस पर कि उसके पास जीवन के रूप में क्या है।) बिल्कुल; तुम्हारे भीतर का जीवन जो भी है, वही तुम्हारा सार है। अगर तुम्हारे भीतर का जीवन बदल जाता है और अब भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारा जीवन नहीं रहते हैं, बल्कि सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है तो तुम्हारे सार के लिहाज से तुम परमेश्वर के और सत्य के हो जाते हो। यकीनन लोगों का मानवता का गुण नहीं बदलता है—लोग अब भी मनुष्य ही हैं और उनके गुण के लिहाज से वे अब भी सृजित मनुष्य ही हैं। लेकिन, क्योंकि तुम्हारा जीवन बदल गया है इसलिए तुम्हारा संबंध भी बदल गया है। संक्षेप में, जन्मजात स्थितियाँ वे मूलभूत स्थितियाँ हैं जो सृजित मानवजाति बनाती हैं। यानी जब तक तुम सृजित मनुष्य कहलाते हो तब तक तुममें ये जन्मजात स्थितियाँ जरूर होनी चाहिए—ये मूलभूत स्थितियाँ हैं। मानवता वह है जो व्यक्ति जब अपनी जन्मजात स्थितियों के तहत रहता है उस समय उसकी सामान्य मानवता से प्रकट होती है और उससे जी जाती है। भ्रष्ट स्वभाव भ्रष्ट मानवजाति में अंतर्निहित जीवन हैं, जो जन्मजात स्थितियों और मानवता के खोल के नीचे छिपे होते हैं। इन तीनों पहलुओं में संबंध और अंतर, और साथ ही इनमें से हरेक जो भूमिकाएँ निभाता है या सृजित मानवजाति में जो कार्य करता है, वे सभी ठीक वैसे ही हैं जैसा बताया गया है। इससे पहले हमने जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के इन तीनों पहलुओं से संबंधित कुछ ऐसी अभिव्यक्तियों के बारे में संगति की थी जिन्हें लोग प्रकट करते हैं। लेकिन इन तीनों पहलुओं से जुड़ी विषय-वस्तु उससे भी परे जाती है जिसके बारे में हमने संगति की है, इसलिए हमें आज इस विषय पर संगति करना जारी रखना होगा।

हकलाना और अटक-अटककर बोलना

पिछली बार हम जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के अलग-अलग प्रकाशनों के बारे में कहाँ रुके थे? बुजदिली और दबंगता पर, है ना? (हाँ।) वह संगति पूरी हो गई थी। आओ अब बोलते समय हकलाने और अटक-अटककर बोलने पर एक नजर डालें—यह किस तरह की समस्या है? (एक जन्मजात स्थिति है।) यह एक जन्मजात स्थिति है और एक प्रकार का शारीरिक दोष भी है। यकीनन, हकलाने के रूपों में फर्क होता है। कुछ हकलाने वाले लोग एक अकेले शब्दांश को खींच देते हैं, जबकि दूसरे लोग एक ही शब्दांश को दोहराते रहते हैं और सारा दिन ले लेने के बावजूद एक पूरा वाक्य भी बोल नहीं पाते हैं। संक्षेप में, यह एक जन्मजात स्थिति है और यकीनन यह एक प्रकार का शारीरिक दोष भी है। क्या इसका संबंध भ्रष्ट स्वभाव से होता है? (नहीं।) इसका संबंध भ्रष्ट स्वभाव से नहीं होता है। अगर कोई कहता है, “तुम तो अटक-अटककर बोलते हो; तुम यकीनन चालाक हो!” या “तुम तो बात करते समय हकलाते भी हो; तुम इतने घमंडी कैसे हो सकते हो?”—क्या ऐसे कथन सही हैं? (नहीं।) दोष या नुक्स के रूप में हकलाहट का संबंध किसी व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभावों के किसी भी पहलू से नहीं है। इसलिए हकलाहट एक जन्मजात स्थिति और एक प्रकार का शारीरिक दोष है। स्पष्ट रूप से इसमें किसी व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं हैं और इसका उनसे कोई भी संबंध नहीं है। हकलाने से जुड़ी एक और परिस्थिति है : कुछ लोग बोलते समय आमतौर पर नहीं हकलाते हैं, लेकिन जब तुम उनसे कोई सवाल पूछते हो तो वे हिचकिचाने और अटकने लगते हैं; वे एक वाक्य बोलने में पूरा दिन लगा देते हैं और फिर भी तुम यह समझ नहीं पाते हो कि वे क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बातें कभी भी पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं होती हैं, तुम्हें हमेशा उनके मतलब के बारे में अटकलें लगानी पड़ती हैं—तुम जो भी अटकल लगाते हो वही उनका मतलब बन जाता है। नहीं तो वे मतलब की जगह मुस्कुराहट का उपयोग करते हैं। संक्षेप में, वे तुम्हारे सवाल का सीधे तरीके से जवाब नहीं देते हैं। उदाहरण के लिए, तुम उनसे पूछते हो, “तुम कहाँ से आए हो?” वे कहते हैं, “मैं ... मैं ... वो बस इधर-उधर घूमता रहा और ...” यह सुनने के बाद भी तुम्हें पता नहीं होता है कि वे कहाँ से आए। या तुम उनसे पूछते हो, “तुम उस व्यक्ति की काबिलियत का मूल्यांकन कैसे करते हो?” वे कहते हैं, “उसकी ... काबिलियत, वो ... हर कोई, ऐसा है ... हम सभी ... अम ... को वाकई ... साफ-साफ नहीं पता।” वे इस तरह से रुक-रुककर और तोड़-तोड़कर क्यों बोलते हैं? क्या यह हकलाना या अटक-अटककर बोलना है? ऐसा नहीं लगता है। फिर वे इस तरह से क्यों बोलते हैं? अगर यह हकलाने या अटक-अटककर बोलने के कारण नहीं है, तो इसका क्या कारण है? (वे एक भ्रष्ट स्वभाव द्वारा नियंत्रित हैं।) यह स्पष्ट रूप से एक स्वभाव का प्रकाशन है। इसका मतलब है कि जब वे कुछ व्यक्त करते हैं या कोई चीज करते हैं तो वे एक स्वभाव द्वारा नियंत्रित होते हैं जो उनके जीवन का वह हिस्सा है जिससे वे एक निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बोलने और कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह लक्ष्य क्या है? यह लक्ष्य सच्चे तथ्यों को छिपाना है, तुम्हें सच्चे तथ्य बताने से बचना है; वे चीजों को इतनी स्पष्टता से समझाना नहीं चाहते हैं। वे इस तरह से कार्य क्यों करते हैं? वह इसलिए क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने बता दिया कि वास्तव में क्या चल रहा है तो उन्हें इसके नतीजे भुगतने पड़ेंगे—या तो वे किसी को नाराज कर देंगे या खुद को नुकसान पहुँचा लेंगे। वे ये नतीजे नहीं सहना चाहते; वे नहीं चाहते कि तुम सच्चे तथ्य जानो। यह एक भ्रष्ट स्वभाव के नियंत्रण के तहत बोलने और कार्य करने का एक ढंग और शैली है। जो जीवन उन्हें इस तरह से कार्य करने के लिए नियंत्रित करता है, वह उनकी प्रकृति को दर्शाता है और उनका इस तरह से कार्य करना यह साबित करता है कि उनके पास कोई भी सत्य नहीं है। वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार नहीं बोलते हैं। तो सत्य सिद्धांतों के अनुसार बोलने के लिए व्यक्ति को कैसे बोलना चाहिए? इसे करने के लिए व्यक्ति को एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए, ठीक जैसा परमेश्वर कहता है : “तुम्हारी बात ‘हाँ’ की ‘हाँ,’ या ‘नहीं’ की ‘नहीं’ हो।” क्या वे ऐसा करते हैं? (नहीं।) वे क्या करते हैं? न तो वे हाँ कहते हैं जब यह हाँ होती है और न ही ना कहते हैं जब यह ना होती है। वे किस पद्धति का उपयोग करते हैं? वे अस्पष्ट रूप से बोलते हैं, अपना मतलब व्यक्त करने के लिए धूर्त और दुष्ट तरीकों का उपयोग करते हैं ताकि खुद को बचाने का अपना लक्ष्य हासिल कर सकें। वे किसी मामले को सँभालने या कुछ व्यक्त करने के लिए शैतान द्वारा उन्हें निर्देश दी गई और उनमें डाली गई पद्धतियों का उपयोग करते हैं। यह स्पष्ट रूप से शैतान का भ्रष्ट स्वभाव है। यह मानवता का उथला प्रकाशन नहीं है बल्कि शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के नियंत्रण के तहत कार्य करने के तरीके का प्रकाशन है।

रोमांचक चीजों का आनंद लेना

चलो, एक और अभिव्यक्ति के साथ जारी रखें : रोमांचक चीजों का आनंद लेना और नीरसता को नापसंद करना; रोमांचक चीजों की खातिर सारी चीजें करना और हर जीवनशैली चुनना। यह किस तरह की समस्या है? सबसे पहली बात, क्या यह चीज जन्मजात स्थितियों में रुचियों और शौक के तहत आती है? (हाँ।) यह आती है? ध्यान से सोचो—क्या यह सही मायने में वहीं की है? क्या व्यक्ति की तार्किकता में रोमांचक चीजों का आनंद लेना सामान्य है? (यह सामान्य नहीं है।) फिर क्या इसे जन्मजात स्थितियों के तहत श्रेणीबद्ध करना उचित है? (नहीं।) इसे इस तरीके से देखा जाए तो यह उचित नहीं है। यह अभिव्यक्ति किस तरह की समस्या के तहत आती है? अगर हम यह कहें कि रोमांचक चीजों का आनंद लेना एक भ्रष्ट स्वभाव है तो यह किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? क्या यह घमंड, धोखेबाजी या क्रूरता है? (यह इनमें से कोई भी नहीं है।) यह किसी भी तरह के भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं है। तो यह किस तरह की समस्या है? (यह मानवता की समस्या है।) यह मानवता की किस तरह की समस्या है? क्या यह कुछ हद तक ठीक से काम न करना है? (हाँ।) यह अनुचित तरीके से आचरण करना और ठीक से काम न करना है, यह रोमांचक चीजों का आनंद लेना है और बेचैन होना है। बेचैनी सामान्य मानवता का अभाव दर्शाती है। इसमें जमीर शामिल नहीं है लेकिन यह मुख्य रूप से सामान्य मानवता में तार्किकता का अभाव दर्शाती है। ऐसे लोग एक कार्य पर चिपके नहीं रह पाते हैं या अपने कर्तव्य नियमों का पालन करते हुए और कर्तव्यनिष्ठ तरीके से नहीं कर पाते हैं। वे वयस्कों की तरह चीजें करने में असमर्थ होते हैं; उनमें परिपक्व सोच, व्यक्तिगत आचरण की परिपक्व शैली और चीजें करने का परिपक्व तरीका नहीं होता है। कम-से-कम यह उनकी मानवता का एक दोष है। यकीनन यह उनके चरित्र की समस्या होने के स्तर तक नहीं बढ़ता है लेकिन उस रवैये से संबंधित होता है जिससे वे आचरण और कार्य करते हैं। नवीनता का और रोमांचक चीजों का आनंद लेना, जो कुछ भी वे करते हैं उसमें अस्थिर होना, डटे रहने में असमर्थ होना, बेचैन और अनुचित होना और हमेशा रोमांचक चीजों की तलाश करने और नई-नई चीजें आजमाने की चाह रखना—इस प्रकार के मुद्दे मानवता के दोषों के तहत आते हैं। रोमांचक चीजों का आनंद लेने वाले लोगों में सामान्य मानवता की तार्किकता का अभाव होता है; उनके लिए वे जिम्मेदारियाँ और कार्य वहन करना आसान नहीं होता है जो वयस्कों को वहन करने चाहिए। वे जो भी कार्य करते हैं, यदि वे उसे लंबे समय तक करते हैं और उसकी नवीनता खो जाती है तो उन्हें यह उबाऊ लगता है, वे उसे करने में दिलचस्पी खो देते हैं और नवीनता और रोमांच की भावना तलाशना चाहते हैं। रोमांचक चीजों के बिना उन्हें लगता है कि चीजें नीरस हैं और उन्हें आध्यात्मिक शून्यता की भावना का भी अनुभव हो सकता है। जब वे ऐसा महसूस करते हैं तो उनके दिल बेचैन हो उठते हैं और वे रोमांचक चीजों या ऐसी चीजों की तलाश करना चाहते हैं जो उन्हें दिलचस्प लगती हैं। वे लगातार कुछ अपरंपरागत करना चाहते हैं। जब भी वे पाते हैं कि वे जो कार्य कर रहे हैं या जो मामले सँभाल रहे हैं वे उबाऊ या अरोचक हैं तो वे जारी रखने की इच्छा खो देते हैं। भले ही वह कार्य कुछ ऐसा हो जो उन्हें करना चाहिए या वह कोई सार्थक और कीमती कार्य हो, फिर भी वे डटे नहीं रह पाते हैं। देखो कि किस तरह से अविश्वासियों के बीच ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो बार-बार नशीली दवाओं का उपयोग करते हैं। चाहे इसके पीछे कोई भी कारण हो, वे रोमांच की भावना तलाशने और ऐसी अतार्किक अनुभूतियाँ तलाशने के लिए नशीली दवाओं का उपयोग करने में आनंद लेते हैं जो सामान्य लोगों में होने वाली अनुभूतियों से परे होती हैं। रोमांचक चीजों का आनंद लेने वाले लोग उन्हीं लोगों जैसे होते हैं जो उत्तेजन के लिए नशीली दवाओं पर भरोसा करते हैं। वे जिस तरीके से आचरण करते हैं उसमें सामान्य लोगों की तार्किकता नहीं होती है और वे अपनी जीवनशैली का चयन करते समय हमेशा अवास्तविक और उत्कृष्ट अनुभूतियों का अनुसरण करना पसंद करते हैं। यह बहुत खतरनाक है। इस प्रकार के लोग बाहर से अक्सर ऐसे दिखते हैं जैसे कि उन्हें कोई बड़ी समस्या नहीं है। अगर तुम ऐसे लोगों का भेद नहीं पहचान पाते हो या उनके सार या इस तरह की समस्या के सार की असलियत नहीं देख पाते हो, तो हो सकता है कि तुम सोचो, “इन लोगों के स्वभाव बस अस्थिर हैं; वे तीस या चालीस वर्ष के हो चुके हैं लेकिन अब भी बच्चों की तरह बचकाने हैं।” दरअसल, इस प्रकार के लोग अपने दिलों की गहराई में लगातार रोमांचक चीजों की तलाश करते रहते हैं। वे चाहे जो भी करें, उनमें वयस्कों के विचारों और जागरूकता के साथ-साथ उस तरीके और रवैये का भी अभाव होता है जिससे वयस्क मामले सँभालते हैं। इसलिए, ऐसे लोग बहुत समस्यात्मक होते हैं। हो सकता है कि उनकी मानवता बुरी न हो और उनका चरित्र खास तौर पर घिनौना न हो, लेकिन उनकी मानवता के इस दोष के कारण उनके लिए बड़ा कार्य, खास तौर पर कुछ महत्वपूर्ण कार्य के लिए योग्य होना बहुत मुश्किल होता है। जब तुम उनके साथ सत्य पर संगति करते हो तो वे कहते हैं, “मुझे सब समझ आता है; मैं बस इसे कर नहीं पाता।” वे सामान्य लोगों के विचारों और रवैयों के साथ उचित रूप से और कर्तव्यनिष्ठा से नहीं जी सकते हैं या कार्य नहीं कर सकते हैं। उनके दिल हमेशा बेचैन रहते हैं। ऐसी अभिव्यक्तियों वाले लोग बहुत समस्यात्मक भी होते हैं। रोमांचक चीजों का आनंद लेने की अभिव्यक्ति पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

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