सत्य का अनुसरण कैसे करें (9) भाग तीन
सुन्न होना
चलो, एक और अभिव्यक्ति पर चर्चा करें, सुन्न होना। यह क्या समस्या है? (यह मानवता का एक दोष है।) सुन्न होना मानवता का एक दोष है। लोगों में सुन्न होने की सामान्य अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? चीजें करते समय सुस्ती से प्रतिक्रिया करना, धीमी रफ्तार से चलना और लचीलेपन की कमी होना और समस्याओं के बारे में सोचते समय कम विचार होना या समस्याओं के अपेक्षाकृत कम पहलुओं पर ही चिंतन कर पाना। इन सभी को सुन्न होना कहते हैं। सुन्न होने में मानवता का कौन-सा पहलू शामिल है? इसमें लोगों और चीजों के बारे में व्यक्ति के नजरिए की गहराई, उसके स्व-आचरण और क्रियाकलापों की गहराई और साथ ही जब लोगों और चीजों को देखने की और आचरण करने और कार्य करने की बात आती है, तो इसमें उसकी बुद्धिमत्ता या काबिलियत शामिल है। आमतौर पर “सुन्न” शब्द से किस तरह के व्यक्ति का वर्णन किया जाता है? (अपेक्षाकृत खराब काबिलियत वाले व्यक्ति का।) सुन्न होने का मतलब है कि व्यक्ति में खराब काबिलियत, कम बुद्धिमत्ता और सुस्त प्रतिक्रियाएँ हैं—इन अभिव्यक्तियों का होना ही सुन्न होना है। सुन्न होना मानवता का एक बड़ा दोष है। इस सुन्न होने का मतलब तुम्हारे हाथ या पैर का सुन्न होना और संवेदना खो देना नहीं है—यह इस किस्म की शारीरिक असंवेदनशीलता नहीं है। न ही इसका मतलब जड़, मंद या सख्त होने के व्यक्तित्व से संबंधित लक्षण से है। बल्कि यह एक मानसिक प्रतिक्रिया है या समस्याएँ सँभालने में व्यक्ति की बुद्धिमत्ता की एक अभिव्यक्ति है। आमतौर पर जब इस तरह के व्यक्ति के आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों की बात आती है, तो यह व्यक्ति अक्सर सुन्न, मंदबुद्धि और कोई प्रतिक्रिया नहीं होने की अवस्था में होता है। यानी वह चीजों को देखता है लेकिन उन चीजों के सार की असलियत नहीं देख पाता है और भीतर की समस्याओं पर उसका ध्यान नहीं जाता है। जब तुम उसे यह याद दिलाते हो कि यहाँ एक समस्या है तो उसकी कोई प्रतिक्रिया तक नहीं होती है और उसे यह पता नहीं होता है कि यह एक समस्या है। भले ही कोई व्यक्ति समस्या की तरफ उसका ध्यान दिला दे, तब भी वह समस्या की गंभीरता या समस्या के सार की असलियत नहीं देख सकता है। नतीजतन, वह बहुत सारे मामले बहुत धीरे-धीरे सँभालता है। यह सुन्न होना है। सुन्न होना अपने आप में मानवता का एक दोष है। जहाँ तक सुन्न लोगों का सवाल है, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो या उनके शरीर का कोई भी अंग सुन्न हो, इस पहलू में उनकी मानवता की अभिव्यक्तियों के लिहाज से वे विशिष्ट, आवश्यक कार्य नहीं कर सकते हैं और न ही वे ऐसे कार्य की जिम्मेदारी ले सकते हैं जिसमें तकनीकी विषय-वस्तु शामिल है या जिसकी प्रकृति बहुत ही ज्यादा विशेषीकृत है। यकीनन ऐसे लोग अगुआ और कार्यकर्ता होने के भी योग्य नहीं होते हैं। अगर कोई अगुआ या कार्यकर्ता सुन्न है तो उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य में परेशानी खड़ी होगी, वह एकदम रुक जाएगा और पंगु हो जाएगा। वे समस्याओं पर ध्यान दे पाने में समर्थ नहीं हैं और उन्हें तुरंत हल कर पाने में समर्थ नहीं हैं, इसलिए जब विभिन्न समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं तो वे उन पर ध्यान नहीं दे सकते हैं और समस्याएँ हल नहीं हो सकती हैं। वे अपनी आँखों से समस्याएँ नहीं देख सकते हैं, इसलिए वे उन्हें हल करना शुरू नहीं कर सकते हैं और उन्हें नहीं पता होता है कि कौन-सा कार्य करना सबसे जरूरी है। वे हर रोज नियमित रूप से सिर्फ जरा-सा सतही कार्य कर सकते हैं। ऊपरवाला जो भी कार्य-व्यवस्थाएँ जारी करता है, वे उन्हें आगे सौंप देते हैं, लेकिन उन्हें आगे सौंपने के बाद उन्हें पता नहीं होता है कि उन्हें उचित रूप से कार्यान्वित किया जा सकता है या नहीं, कौन-से नतीजे प्राप्त किए जा सकते हैं या बाद के प्रभाव क्या होंगे। वे किसी भी चीज की असलियत नहीं देख सकते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके आस-पास कितने लोग बुरा कर्म कर रहे हैं या विघ्न-बाधाएँ या गड़बड़ियाँ उत्पन्न कर रहे हैं, वे इसे नहीं बूझ सकते हैं। वे यह भी नहीं जानते हैं कि कितने कार्य पर अनुवर्ती कार्रवाई करने की जरूरत है या किस विशिष्ट कार्य को कार्यान्वित करने की जरूरत है। कोई उनसे पूछता है : “क्या तुमने कार्य सौंप दिया है और व्यवस्थित कर दिया है?” वे कहते हैं : “सब कुछ व्यवस्थित कर दिया गया है। मैंने उनके साथ संगति की और कार्य-व्यवस्था को एक बार ऊँची आवाज में पढ़कर सुनाया—हर किसी को यह मालूम है।” क्या यह कार्य-व्यवस्था को कार्यान्वित करना है? (नहीं।) कार्य-व्यवस्था को कार्यान्वित करने के लिए सबसे पहले अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ उचित रूप से सौंपने, किस अगुआ को कौन-सा कार्य सँभालना चाहिए यह निर्दिष्ट करने और यह सुनिश्चित करने की जरूरत होती है कि कार्य की हर मद विशिष्ट लोगों को सौंपी गई है। इसके अलावा अगुआओं और कार्यकर्ताओं को विशिष्ट तौर से बता दिया जाना चाहिए कि इसे कैसे और किन सिद्धांतों के अनुसार करना है। ये सभी मामले स्पष्ट रूप से समझा दिए जाने चाहिए ताकि सभी को पता हो कि यह कार्य कैसे करना है। कार्य आवंटित करने का सिर्फ यही मतलब है। कुछ लोग कार्य का निर्वहन करते समय दूसरों को बस कार्य-व्यवस्था ऊँची आवाज में पढ़कर सुना देते हैं और सभी को इस बारे में अपनी समझ और भावनाएँ साझा करने के लिए कह देते हैं, और बस हो गया। जब तक वे सभी को अपने कर्तव्य करने में व्यस्त देखते हैं, तब तक वे मानते हैं कि कार्य-व्यवस्था उचित रूप से कार्यान्वित कर दी गई है। इस मौके पर अगर तुम उनसे पूछते हो : “क्या भाई-बहनों को अपने कर्तव्य करने में कोई कठिनाई है? क्या अब भी कोई समस्या मौजूद है? क्या उन्हें हल करने के लिए तुमने संगति की?” वे जवाब देते हैं : “मैंने किसी भी समस्या के बारे में नहीं सुना है—मैं जाऊँगा और इसकी छानबीन करूँगा।” दरअसल इस कार्य के प्रभारी ने किसी समस्या या कठिनाई की बात नहीं उठाई, लेकिन वे कठिनाइयाँ बिल्कुल मौजूद हैं। वह इसलिए क्योंकि वह इतना सुन्न है कि उसका ध्यान उन पर नहीं जा पाता है। उदाहरण के लिए, जब दो लोग अपने कर्तव्य करने के दौरान एक दूसरे के साथ सहयोग नहीं कर सकते हैं और रुतबे के लिए आपस में होड़ करते हैं, तो वह इसे भी नहीं बूझ पाता है और इससे कार्य पर असर पड़ता है। वह यहाँ तक कहता है, “उनका रिश्ता काफी अच्छा है—वे बातचीत करते हैं और एक-दूसरे से संचार करते हैं। अगर वे सहयोग नहीं कर सकते तो वे बात नहीं कर रहे होते।” लोग उससे पूछते हैं, “क्या वे रुतबे के लिए एक-दूसरे से होड़ कर रहे हैं? क्या वे मिलजुलकर सहयोग कर सकते हैं?” वह जवाब देता है, “मुझे इस बारे में नहीं मालूम।” सिर्फ पूछताछ के बाद ही यह बात पता चलती है कि वे दोनों सहयोग करने में समर्थ नहीं हैं और एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं—इस बात पर मुकाबला कर रहे हैं कि कौन ज्यादा उदात्त उपदेश देता है, किसकी आवाज ज्यादा ऊँची है और कौन ज्यादा देर तक बोलता है। बहुत पहले से ही परमेश्वर के चुने हुए लोगों का इन चीजों पर ध्यान जा चुका है। अगर तुम उस व्यक्ति से पूछते हो, “क्या इन समस्याओं को तुरंत हल किया गया?” वह कहेगा, “नहीं, उन्हें हल नहीं किया गया है। मुझे पता ही नहीं था कि यह वह कार्य है जो मुझे करना चाहिए।” उसे इतनी बड़ी समस्या को हल करना भी नहीं आता है—क्या वह कमजोर दिमाग वाला नहीं है? (हाँ।) वह कार्य-व्यवस्थाओं को एक बार ऊँची आवाज में पढ़ता है और फिर यह अपेक्षा करता है कि सभी अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने की घोषणाएँ करें और शपथ लें और उसके बाद वह मान लेता है कि उसका काम पूरा हो गया है। वह खुद से कहता है, “मुझे याद है कि कलीसिया का अगुआ कौन है, कौन कार्य के किस मद के लिए विशिष्ट तौर से जिम्मेदार है और कौन फिल्म-निर्माण कार्य का प्रभारी है,” लेकिन उसे बस यह दिखाई नहीं देता है कि कार्य की उन विशिष्ट मदों को कैसे पूरा किया जाना चाहिए। सुन्न और मंदबुद्धि होना ऐसा दिखता है—वे बेवकूफ व्यक्ति हैं। उनका ध्यान किसी भी समस्या पर नहीं जा पाता है और वे नहीं जानते हैं कि सत्य सिद्धांतों के किसी भी पहलू के बारे में कैसे संगति करनी है। जब सत्य सिद्धांतों से जुड़ी समस्याओं की बात आती है तो वे नहीं जानते हैं कि उन्हें हल करने के लिए सत्य की संगति कैसे करनी है। जब कार्मिक या प्रशासनिक कार्यों से जुड़ी समस्याओं की बात आती है तो वे उनमें से किसी को भी बूझ नहीं सकते हैं। भले ही वे यह बिल्कुल देखते हों कि कोई व्यक्ति कार्य नहीं कर सकता है, फिर भी उन्हें नहीं पता होता है कि इसे कैसे हल करना है। वे किसी भी चीज की असलियत नहीं देख सकते हैं। सुन्न होने का यही मतलब होता है। उन्हें सिर्फ कुछ धर्म-सिद्धांत बोलने आते हैं, लेकिन वे कार्य में सक्षम नहीं होते हैं—वे दिखने में सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसा व्यक्ति मानक-स्तर का अगुआ है? (नहीं।) अगर अगुआ और कार्यकर्ता सुन्न हैं तो यह परेशानी वाली बात है—वे कोई भी कार्य बिल्कुल भी नहीं कर पाएँगे। अगर वे वह कार्य नहीं करते हैं जो उन्हें करना चाहिए और जब कोई किसी समस्या की रिपोर्ट करता है तो वे उसे भी नहीं सँभालते हैं, तो यह अब सिर्फ सुन्न होने का मुद्दा नहीं रह जाता है, बल्कि यह सामान्य मानवता की कमी है और जमीर और विवेक के सामान्य प्रकार्य को खोना है।
सुन्न होना मानवता का एक दोष है। वैसे तो यह दोष भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक नहीं बढ़ता है, लेकिन बस अपने आप में यह समस्या जानलेवा है। एक ऐसा जीता-जागता व्यक्ति वहाँ खड़ा है जिसमें क्रियाशील इंद्रियाँ और अंग तो हैं, लेकिन उसमें बस लोगों और चीजों को देखने या आचरण करने और कार्य करने की एक सामान्य व्यक्ति की क्षमता नहीं है। जब वे कार्य करते हैं तो वे बिना किसी विचार वाले निकम्मे व्यक्ति की तरह होते हैं—वे किसी भी समस्या पर ध्यान नहीं दे सकते हैं, जब दूसरे लोग समस्याएँ उठाते हैं तो वे उन्हें हल करने में और भी कम सक्षम होते हैं और वे यह नहीं देख सकते हैं कि क्या कार्य किया जाना चाहिए। अपने मन में उन्हें लगता है जैसे उन्हें किसी भी चीज से कोई फर्क नहीं पड़ता। नतीजतन वे कोई कार्य नहीं कर सकते हैं—वे बेकार, निकम्मे व्यक्ति होते हैं। क्या यह समस्या काफी गंभीर नहीं है? देखा तुमने, जिद्दी लोग और संवेदनशील लोग कम-से-कम सक्रिय विचार रखते हैं—उनमें सामान्य व्यक्ति की सोच होती है; यानी उनके मन लगातार काम कर रहे होते हैं। लेकिन सुन्न लोगों के मन सरल होते हैं; यह ऐसा है मानो उनका मन पंगु हो गया हो, यह ऐसा है मानो वे मर चुके हों। वैसे तो उनके पास आँखें होती हैं, लेकिन चाहे वे कुछ भी देखें, उनके मन में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है और वे अपने मन में उस पर चिंतन नहीं करते हैं; उनके पास कोई विचार नहीं होता है और वे पूरी तरह से काठ की आकृतियाँ होती हैं। काठ की आकृतियाँ क्या होती हैं? ये काठ पर उकेरे गए लोग होते हैं; वे बाहर से लोगों जैसे दिखते हैं, लेकिन जब तुम उनसे बात करते हो तो वे प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। तुम उनसे घर पर नजर रखने के लिए कहते हो, लेकिन जब घर को लूटा जाता है तो वे कुछ नहीं करते हैं। तुम उनसे पूछते हो, “तुमने घर पर नजर क्यों नहीं रखी?” और वे फिर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी भी चीज पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता है तो यह बहुत परेशानी वाली बात है। दूसरे शब्दों में, मानवता की सहज प्रवृत्ति को जो कार्य करने चाहिए—जैसे कि विचार और जागरूकता के कार्य और वे कार्य जो आँख, कान, मस्तिष्क और दिल को करने चाहिए—वे नहीं किए जा सकते हैं। उनमें वे विचार जो सामान्य मानवता वाले लोगों में होने चाहिए, होते ही नहीं हैं या उनकी कमी होती है। इसे ही सुन्न होना कहते हैं। सुन्न लोग निकम्मे लोगों से इतने अलग नहीं होते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “तुम कहते हो कि इस किस्म के लोग सुन्न होते हैं, उनकी आँखें, कान और मस्तिष्क अपने काम नहीं कर सकते हैं। लेकिन अगर तुम उनका अपमान करते हो तो वे प्रतिक्रिया करते हैं। अगर उनका कोई नुकसान होता है तो वे प्रतिक्रिया करते हैं। तो क्या अब भी उन्हें बेवकूफ लोग माना जा सकता है?” यहाँ तक कि कुछ जानवर भी मनुष्यों की बोली समझ सकते हैं—वे उन अच्छी और बुरी दोनों चीजों को समझ सकते हैं जो तुम उनके बारे में कहते हो। अगर कोई व्यक्ति मानव होकर मनुष्यों की बोली नहीं समझ पाता है तो वह मानव होने के मानक पर खरा नहीं उतरता है। इसलिए यह मापने के लिए कि कोई व्यक्ति मानव है या नहीं, मानव के मानक का उपयोग किया जाना चाहिए। मैं जानवरों का जिक्र क्यों करता हूँ? यह तुम्हें यह बताने के लिए है कि तुम एक जीवित प्राणी हो जो सृजित मनुष्यों की श्रेणी में आता है, जानवरों की श्रेणी में नहीं। अगर मनुष्य के रूप में तुम्हारे पास वे विचार नहीं हैं जो जानवरों में भी होते हैं, तो तुम बहुत कमतर हो। यहाँ तक कि जानवरों को भी यह पता होता है कि जो उनके साथ अच्छा व्यवहार करते हैं और उन्हें रोज भोजन देते हैं उनके साथ उन्हें अच्छा व्यवहार करना चाहिए और उनके पास आना चाहिए। अगर मनुष्य के रूप में तुममें ऐसी मानवता नहीं है, तो क्या अब भी तुम मनुष्य कहलाने लायक हो? मैं यह तुलना क्यों करता हूँ? यह तुम्हें यह बताने के लिए है कि तुम कोई जानवर या ऊँचे स्तर का जानवर नहीं हो; तुम एक व्यक्ति हो, तुम परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों में सबसे ऊँचे स्तर के प्राणी हो—मनुष्य हो। तुममें भाषा की क्षमता, सोचने की क्षमता और सत्य समझने की क्षमता है। परमेश्वर ने तुम्हें सभी चीजों का स्वामी बनने, सभी चीजों और दूसरे जीवित प्राणियों का प्रबंधन करने के लिए बनाया है। तुम सभी चीजों में सभी जीवित प्राणियों के प्रबंधक हो। उन्हें प्रबंधित करने के लिए तुम्हें उनसे ऊपर होना चाहिए। उनका प्रबंधन करने की क्षमता होने के लिए तुम्हें उनसे बेहतर होना चाहिए। इसलिए जानवरों का जिक्र करना तुम्हें छोटा दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हें यह याद दिलाने और समझाने के लिए है कि तुम्हें उनसे बेहतर होना चाहिए। उनका प्रबंधन करने और उनकी अगुआई करने के लिए तुम्हें उन क्षमताओं का उपयोग करना चाहिए जो तुम्हारी मानवता में होनी चाहिए और साथ ही उन विभिन्न प्रकार की सामान्य समझ और क्षमताओं का उपयोग करना चाहिए जो तुमने जन्म लेने के बाद से हासिल की हैं, तुम्हें वह करना चाहिए जो एक मनुष्य को करना चाहिए, जिसे परमेश्वर ने तुम्हें करने का आदेश दिया है। अगर तुम खुद को एक सृजित मनुष्य मानते हो तो तुम्हें अपनी मानवता और अपने सार को मापने के लिए सृजित मानवजाति के मानक का उपयोग करना चाहिए। यह मानक उस मानक से निम्नतर नहीं होना चाहिए जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है। इसलिए किसी व्यक्ति की काबिलियत और उसकी मानवता के विभिन्न पहलुओं में समस्याओं को मापने के लिए मनुष्यों के मानक का उपयोग किया जाना चाहिए। मानवता के लिहाज से बहुत-से लोग प्रतिक्रिया करने में मानसिक रूप से सुन्न और सुस्त होते हैं जिसके कारण वे अपने कर्तव्य करने के दौरान अपने कई कर्तव्यों का निर्वहन खराब तरीके से करते हैं—वे कलीसियाई कार्य में अक्षम होते हैं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं। इसलिए, तुम्हें खुद को जानना चाहिए और अपना माप जानना चाहिए। अगर तुममें इस तरह की काबिलियत या मानवता नहीं है या अगर तुम्हारी मानवता में सुन्न होने का दोष है तो तुम्हें अगुआ या पर्यवेक्षक बनने की होड़ नहीं करनी चाहिए। अगर तुम अगुआ या पर्यवेक्षक बन जाते हो तो तुम जिस भी कलीसिया के कार्य के लिए जिम्मेदार होगे, वह कलीसिया पंगु हो जाएगी। तुम कार्य की जिस भी मद के लिए जिम्मेदार होगे, वह कार्य पूरी तरह से गड़बड़ हो जाएगा। अगर तुम इसके लिए सक्षम नहीं हो सकते तो तुम्हें एक तरफ खड़े हो जाना चाहिए और जो लोग इसका निर्वहन करने में सक्षम हैं उन्हें इसे करने देना चाहिए। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) आत्म-जागरूकता होना और फिर ज्यादा सक्षम लोगों के लिए जगह बनाना सीखना और दूसरों की सिफारिश करना—यही अभ्यास का सिद्धांत है। कुछ लोग कहते हैं, “मैं इतना सुन्न हूँ कि मैं नहीं बता सकता कि कौन अच्छा है—मैं किसी की सिफारिश कैसे कर सकता हूँ?” अगर तुम यह नहीं बता सकते हो कि किसमें अच्छी काबिलियत है और सिफारिशें नहीं कर सकते हो, तो तुम्हें कुछ सबक सीखने की जरूरत है। जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो सत्य समझता है और दूसरों का भेद पहचान सकता है, तब तुम्हें उससे सीखना चाहिए। उसके साथ ज्यादा संगति करके तुम कुछ चीजें सीख पाओगे। चूँकि तुम्हारी अपनी मानवता में सुन्न होने का दोष है इसलिए इस बारे में नकचढ़े या चयनशील मत बनो कि तुम कौन-से कर्तव्य करते हो। खुद तुममें यह दोष है इसलिए ऐसे बहुत-से प्रकार के कार्य और कर्तव्य नहीं हैं जिन्हें तुम कर सकते हो। अगर बहुत कठिनाई से तुम्हारे लिए कोई उपयुक्त पद मिल जाता है और फिर भी तुम नकचढ़े और चयनशील बने रहते हो तो यह सुन्न होने या मानवता के दोष की समस्या नहीं है बल्कि भ्रष्ट स्वभाव है। कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव? यह घमंड वाला, समर्पण नहीं करने वाला और अपने खुद का माप नहीं जानने वाला स्वभाव है। तुम कुछ भी नहीं हो, बस बेकार और बेवकूफ हो, फिर भी तुम ऐसे कर्तव्य करना चाहते हो जो गरीमापूर्ण हों, जो थकाऊ नहीं हों और जिनका दूसरे लोग बहुत सम्मान करते हों—यह घमंडी स्वभाव को दर्शाता है। अगर तुम बहुत सुन्न हो, तुम्हारे पास वह कार्य है जो तुम्हें करना चाहिए और ऐसे मामले हैं जिनका तुम्हें ध्यान रखना चाहिए, लेकिन तुम न तो उन्हें करते हो और न ही तुम्हारा उन पर ध्यान जाता है, अगर तुम चीजें गलत हो जाने पर एक तिनका तोड़ने तक का कष्ट नहीं करते हो और यहाँ तक कि जब तुम किसी चीज को परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाते देखते हो तो तुम उसे अनदेखा कर देते हो, सोचते हो, “यह मेरे अपने घर की समस्या नहीं है, इसलिए मैं इसके लिए परेशान नहीं होऊँगा,” यह सिर्फ सुन्न होना नहीं है बल्कि जमीर और विवेक की कमी है। अगर तुममें जरा-सा भी जमीर और विवेक है और तुम परमेश्वर के घर के मामलों को अपने मामले मानते हो तो तुम्हें अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं पहुँचने देना चाहिए। लेकिन अगर तुममें यह नेक इरादा नहीं है और तुम एक भी अच्छी चीज नहीं करते हो तो क्या तुम मंदबुद्धि और सुन्न व्यक्ति नहीं हो? सुन्न होने की अभिव्यक्ति पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।
बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना
आओ, अब बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने के बारे में बात करें। बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना किस तरह की समस्या है? (यह मानवता का एक दोष है।) क्या यह एक दोष है? (यह खराब चरित्र की समस्या है।) खराब चरित्र का मतलब बुरी मानवता है। बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने में मानवता का कौन-सा पहलू शामिल है? इसमें जमीर और विवेक के साथ-साथ सत्यनिष्ठा और गरिमा भी शामिल हैं। इसमें व्यक्ति के चरित्र का पहलू शामिल है। बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? कौन-सी बातें दर्शाती हैं कि व्यक्ति बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला है? वह जो भी बेशर्म चीजें करता है वे निश्चित रूप से बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने की अभिव्यक्तियाँ हैं। चापलूसी करना और तलवे चाटना बिना यह महसूस किए कि यह सिहरन पैदा करने वाला है—क्या यह बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना नहीं है? (हाँ।) हम इसे बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना क्यों कहते हैं? क्योंकि ऐसा करना दर्शाता है कि व्यक्ति में शर्म की कोई भावना नहीं है। शरमाए बिना या दिल की धड़कन तेज हुए बिना वह कुछ ऐसे शब्द कह सकता है जो सामान्य मानवता के जमीर का उल्लंघन करते हों या जो तथ्यों के अनुरूप न हों, चाहे वे शब्द कितने भी सिहरन पैदा करने वाले या अप्रिय हों और उसे इस बात की परवाह नहीं होती है कि दूसरे लोग उसे सुनने के बाद उसके बारे में क्या सोचते हैं; भले ही दूसरे उस पर हँसें, वह परवाह नहीं करता है। उसमें शर्म की भावना नहीं होती है, है ना? (हाँ।) क्या शर्म की कोई भावना नहीं होना बिल्कुल बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना नहीं है? साथ ही जब कोई व्यक्ति स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं होता है, फिर भी वह रुतबे के लिए और अगुआ बनने के लिए खुलेआम होड़ करता है—तो क्या यह बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना नहीं है? (हाँ।) वह न सिर्फ खुलेआम होड़ करता है बल्कि चुनावों के दौरान फर्जी मतपत्र भी बनाता है। दूसरे लोग हर व्यक्ति के लिए एक वोट डालते हैं, जबकि वह अपने लिए दो वोट डालता है—क्या यह बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना नहीं है? (हाँ।) जब दूसरे लोग उसे वोट नहीं देते हैं तो वह खुद को वोट दे देता है। ऐसे लोग बेबाकी से और शर्म की कोई भावना के बिना अगुआ बनने की होड़ करते हैं—वे कितनी बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले होते होंगे! आमतौर पर जो लोग रुतबे से प्रेम करते हैं और महत्वाकांक्षा रखते हैं वे सभी खुद को अच्छी तरह से प्रस्तुत करना चाहते हैं ताकि हो सके तो दूसरे लोग उन्हें अगुआ के रूप में चुन लें। एक बार जब वे अगुआ के रूप में चुन लिए जाते हैं तो वे काफी गर्व महसूस करते हैं, लेकिन अगर वे नहीं चुने जाते हैं तो वे दुखी और नाराज हो जाते हैं—यह एक सामान्य अभिव्यक्ति है। लेकिन बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले लोग ऐसे नहीं होते हैं। वे ऐसे किसी भी साधन का उपयोग करेंगे जो अगुआ बनने के लिए जरूरी है। वे कहते हैं, “हर कोई मुझे नापसंद करता है और मुझे वोट नहीं देगा, लेकिन मैं अगुआ बनने का कोई रास्ता ढूँढ ही निकालूँगा। भले ही मुझे धोखा देना पड़े और चालाकी भरे उपायों का उपयोग करना पड़े, मैं सभी से अगुआ के रूप में मुझे वोट दिलवाऊँगा!” दूसरे लोग कहते हैं, “भले ही तुम अगुआ बन जाओ, फिर भी हर कोई तुम्हें नापसंद ही करेगा। तुम्हारे बारे में हमारी राय अच्छी नहीं है और तुम्हारी प्रतिष्ठा बुरी है। अगर तुमने किसी कार्य की व्यवस्था की तो कोई भी तुम्हारी बात नहीं मानेगा।” वे जवाब देते हैं, “भले ही तुम मेरी बात मत मानो, मैं फिर भी अगुआ बनने का प्रयास करूँगा!” ऐसे लोग कितनी बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले होते होंगे! इसे देखा जाए तो क्या ऐसे लोगों में आत्म-जागरूकता की कमी नहीं होती है? (हाँ।) उनमें आत्म-जागरूकता की कमी होती है और कुछ हद तक एक हिंसक गुण होता है। अपने स्व-आचरण के बारे में बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले लोगों के विचारों और दृष्टिकोणों को देखा जाए तो उनमें अपनी मानवता को लेकर शर्म की कोई भावना नहीं होती है, वे सत्यनिष्ठा या चरित्र, जमीर या शर्मिंदगी की भावना की परवाह नहीं करते हैं, न ही वे नैतिकता की परवाह करते हैं और न ही स्व-आचरण की आधाररेखा की—वे इन सभी चीजों की अवहेलना करते हैं। उनके विचारों और जागरूकता को देखा जाए तो वे पूरी तरह से बेवकूफ, जाहिल और नीच होते हैं। इस प्रकार यह कहा जाता है कि वे खराब और बुरे चरित्र वाले होते हैं। इसलिए वे जो बेशर्म चीजें करते हैं वे निश्चित रूप से उनके गलत विचारों और दृष्टिकोणों से संचालित होती हैं। कलीसिया में चुनावों के दौरान वे खुद को चुनने, खुद के लिए वोट देने और अगुआ बनने पर जोर देते हैं—अगुआ नहीं बनना उनके लिए अस्वीकार्य है और अगर वे अगुआ नहीं बनते हैं तो वे उन्हें वोट नहीं देने के लिए भाई-बहनों से नफरत करेंगे। एक बार जब उन्हें पता चलता है कि तुमने उन्हें वोट नहीं दिया तो तुम उन्हें अप्रिय लगने लगते हो। चाहे तुम कुछ भी कहो, वे किसी न किसी चीज से उसका मुँहतोड़ जवाब देते हैं। वे तुमसे बात करते समय बेहद रूखे हो जाते हैं, मानो वे आग उगल रहे हों। वे यह भी सोचते हैं कि तुमसे कैसे बदला लिया जाए और तुम्हें कैसे सताया जाए और यहाँ तक कि वे जीवन भर तुमसे बात करने से भी इनकार कर सकते हैं। ऐसे लोगों के इन विशिष्ट क्रियाकलापों से जो प्रकट होता है वह भ्रष्ट स्वभाव है। यह किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? (क्रूरता।) इसे हल्के ढंग से कहा जाए तो यह घमंड है और अपनी क्षमताओं को ज्यादा आँकना है—वे बस अगुआ बनना चाहते हैं। लेकिन चीजें करने के उनके साधनों और उनकी विभिन्न अभिव्यक्तियों को देखा जाए तो वे क्रूर स्वभाव वाले लोग हैं। इन बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले लोगों का, जिनमें नीच मानवता होती है, भ्रष्ट स्वभाव बहुत स्पष्ट होता है। उनके सभी क्रियाकलाप भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक बढ़ सकते हैं। बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना उनके चरित्र की एक अभिव्यक्ति है; फिर अपनी बातों और क्रियाकलापों में वे अपने चरित्र के इस पहलू द्वारा शासित होते हैं और नतीजतन वे कई बेशर्म कर्म करते हैं और घमंड और क्रूरता जैसे विभिन्न भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं। इसलिए, कुछ हद तक किसी व्यक्ति के चरित्र से प्रकट होने वाली नीच अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभावों के तहत आती हैं; ये सभी अभिव्यक्तियाँ उनके प्रकृति सार से जुड़ी और उलझी होती हैं और किसी भी भ्रष्ट स्वभाव के उनके विशिष्ट प्रकाशन उनके नीच चरित्र से उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार नीच चरित्र और भ्रष्ट स्वभाव आपस में जुड़े हुए हैं। लोगों के भ्रष्ट स्वभाव शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट किए जाने के बाद उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, लोगों की मानवता में नीच चरित्र के पहलू, जैसे कि जिद्दी, संकीर्ण विचारों वाला और बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होना, ये सभी शैतान द्वारा लोगों को भ्रष्ट किए जाने और उन्हें प्रभावित करने के कारण होते हैं। सत्य स्वीकार करने से पहले सभी लोग सबसे पहले कई भ्रामक, बुरे और नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों की भ्रष्टता और उनके द्वारा गुमराह किया जाना स्वीकार करते हैं—वे अपने दिलों में इन भ्रामक चीजों को अपने जीवन के रूप में स्वीकार करते हैं और इसका मतलब है कि भ्रष्ट स्वभाव उनका जीवन बन जाता है।
बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने की कुछ अन्य अभिव्यक्तियाँ हैं। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने, अपने से ऊपर के लोगों को धोखा देने और अपने से नीचे के लोगों से चीजें छिपाए रखने या कार्य-व्यवस्थाओं के खिलाफ जाने जैसे स्पष्ट क्रियाकलाप करते हैं और यहाँ तक कि उनके क्रियाकलाप कलीसियाई कार्य को बहुत नुकसान भी पहुँचाते हैं। फिर भी वे न सिर्फ चिंतन नहीं करते हैं और अपनी समस्याओं को जानने नहीं लगते हैं या कलीसियाई कार्य में बाधा डालने के अपने कुकर्म स्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि इसके विपरीत वे यह भी मानते हैं कि उन्होंने अच्छी तरह से कार्य किया है और वे श्रेय और पुरस्कार चाहते हैं, हर जगह इस बात की डींग हाँकते हैं और गवाही देते हैं कि उन्होंने कितना कार्य किया है, उन्होंने कितना कष्ट सहा है, उन्होंने अपने कार्य के दौरान कितने योगदान दिए हैं, कार्य करते हुए सुसमाचार का प्रचार करके उन्होंने कितने लोग प्राप्त किए हैं, वगैरह-वगैरह। वे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते हैं कि उन्होंने कितना बुरा कर्म किया है या कलीसियाई कार्य को कितना बड़ा नुकसान पहुँचाया है। यकीनन वे पश्चात्ताप भी नहीं करते हैं और अपना रास्ता तो बिल्कुल नहीं बदलते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोग बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले नहीं हैं? (वे हैं।) अगर तुम उनसे पूछते हो, “क्या तुमने कलीसियाई कार्य सत्य सिद्धांतों के अनुसार पूरा किया? क्या तुम्हारा कार्य परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं के अनुरूप था?” तो वे इस विषय को टाल देते हैं। फिर अगर दूसरे लोग यह उजागर करते हैं कि उन्होंने अपने कार्य के दौरान परमेश्वर के चढ़ावों को गंभीर नुकसान पहुँचाया—कुछ नुकसान कई सौ युआन तक के, कुछ कई हजार तक के और कुछ तो दसियों हजार तक के थे—तो जब उनसे भरपाई करने के लिए कहा जाता है तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होती है? यह सुनकर जमीर, विवेक और शर्म की भावना वाले सामान्य लोग एकाएक गिर पड़ेंगे, अपने दिलों की गहराई से अपमानित और शर्मिंदा महसूस करेंगे। वे मानेंगे कि उन्होंने अपना कार्य अच्छी तरह से नहीं किया और वे परमेश्वर के इतने कर्जदार हैं और इसलिए वे खुद को सही ठहराने का प्रयास नहीं करेंगे; भले ही उन्होंने कुछ ठोस कार्य किया हो और बहुत कष्ट सहा हो, उन्हें यह जिक्र करने लायक नहीं लगेगा। अगर उनका कार्य सही मायने में अच्छी तरह से किया गया होता तो क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य को इतना ज्यादा नुकसान पहुँचा पाता? वह नहीं पहुँचा पाता। सिर्फ उनके द्वारा किए गए नुकसान को देखा जाए तो यह साबित किया जा सकता है कि उनका कार्य खराब तरीके से किया गया था और इसलिए उन्हें गलती मान लेनी चाहिए और पश्चात्ताप करना चाहिए। चाहे उनके द्वारा किए गए नुकसानों के लिए मुआवजे की जरूरत हो या न हो, कम-से-कम उन्हें यह तथ्य स्वीकारना चाहिए कि उनके कार्य ने कलीसियाई कार्य में बाधा और गड़बड़ी उत्पन्न की। सिर्फ पूरी तरह से बेशर्म लोग ही यह तथ्य स्वीकारने से इनकार करेंगे। वे कहेंगे, “अगर मैं नुकसान की भरपाई कर दूँ, तो भी मैं यह स्वीकार नहीं करूँगा कि मैंने कोई गलती की या अपने कार्य में कुछ गलत किया। अगर मैं कर्जे चुकाता हूँ, तो भी मैं एक गुणवान व्यक्ति हूँ, परमेश्वर के घर के औसत व्यक्ति से बेहतर हूँ। मेरा इतिहास गौरवशाली रहा है!” यह किस तरह की मानवता है? मुझे बताओ, क्या इस किस्म के लोगों में शर्म की कोई भावना होती है? क्या वे “शर्म की भावना” शब्द बोल भी सकते हैं? अगर उनमें सही मायने में शर्म की कोई भावना नहीं है तो यह समस्यात्मक है। अगर वे अपने दिलों में स्पष्ट रूप से जानते हैं कि उन्होंने बुरा कर्म किया है, लेकिन वे अड़ियलपन से इसे जबानी तौर पर स्वीकारने से इनकार कर देते हैं तो क्या ऐसे लोग बहुत जिद्दी नहीं हैं? अगर वे अपने दिलों में यह पहचानते हैं कि उन्होंने बुरा कर्म किया है और इसे जबानी तौर पर स्वीकार भी सकते हैं तो वे अभी भी जमीर वाले व्यक्ति माने जाते हैं—उनमें अभी भी शर्म की भावना है। अगर वे न सिर्फ इसे जबानी तौर पर स्वीकारने से इनकार कर देते हैं, बल्कि अपने दिलों में उद्दंड भी हैं, लगातार प्रतिरोध करते रहते हैं और यहाँ तक कि हर जगह ये दावे फैलाते रहते हैं कि परमेश्वर का घर उनके साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार कर रहा है और वे बदकिस्मती के शिकार हैं, तो उनकी समस्या गंभीर है। कितनी गंभीर? उनमें बिल्कुल भी जमीर या विवेक नहीं है। जमीर में न्याय और दयालुता दोनों की भावना शामिल होनी चाहिए। न्याय की भावना का एक पहलू यह है कि लोगों में शर्म की भावना होनी चाहिए। जब लोग शर्म को जानते हैं, सिर्फ तभी वे ईमानदार हो सकते हैं, उनमें न्याय की भावना हो सकती है और वे सकारात्मक चीजों से प्रेम कर सकते हैं और उन्हें पकड़कर रख सकते हैं। लेकिन अगर तुम्हारे जमीर में और न्याय की भावना में शर्म की भावना नहीं है और तुम शर्म नहीं जानते हो—और अगर कुछ गलत करने के बाद भी तुम इस बारे में शर्मिंदा महसूस नहीं करते हो और आत्म-चिंतन करना या खुद से नफरत करना नहीं जानते हो और तुम्हें कोई पछतावा नहीं होता है और इस बात की परवाह नहीं होती है कि दूसरे तुम्हें कैसे उजागर करते हैं और तुम झेंपते नहीं हो और तुममें कोई शर्म नहीं है—तो एक व्यक्ति के रूप में तुम्हारा जमीर समस्यात्मक है और यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हारा कोई जमीर है ही नहीं। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि तुम्हारा दिल बुरा है या दुष्ट है—यह मुमकिन है कि तुम्हारा दिल दुष्ट हो, यह भेड़िये का दिल हो; सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक हो। बिना जमीर और बिना मानवता वाले लोग राक्षस होते हैं। अगर तुम कुछ गलत करते हो और तुम्हें बिल्कुल भी शर्म महसूस नहीं होती है और तुम्हें पश्चात्ताप या अपराधबोध नहीं होता है और तुम सिर्फ आत्म-चिंतन ही नहीं करते हो बल्कि बहस करते हो, विरोध करते हो और खुद को बचाने और सही ठहराने का प्रयास भी करते हो, एक अच्छा दिखने वाला मुखौटा पहनते हो, तो अगर मानक मानवता के आधार पर मापा जाए, तो तुम्हारी मानवता समस्यात्मक है। चाहे तुम्हारा विवेक कैसा भी हो, अगर तुम जमीर के मानक पर खरे नहीं उतरते हो तो यह कहना मुश्किल है कि तुममें वास्तव में मानवता है या नहीं। चलो, हम इस बात पर चर्चा नहीं करते हैं कि तुम्हारी आंतरिक आत्मा क्या है, तुम कहाँ से आए हो या अतीत में तुमने क्या बुरा किया है; चलो, तुम्हारे पिछले जीवन के बारे में बात नहीं करते हैं। इस जीवन में तुम्हारे पास जो जमीर होना चाहिए सिर्फ उसके लिहाज से बात की जाए तो, अगर तुममें शर्म की भावना नहीं है तो एक व्यक्ति के रूप में तुम मानक-स्तर के नहीं हो। कुछ लोग कहते हैं, “मैं बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला हूँ, इसलिए मैं जो भी चाहता हूँ उसे ले लेता हूँ।” लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम ऐसा कहाँ करते हो—परमेश्वर के घर में ऐसा करना काम नहीं करेगा। परमेश्वर का घर वह जगह नहीं है जिस पर तुम पल सको। अगर तुम इस पर पलने की जिद करते हो तो तुम पर आफत आना तय है। कुछ लोग सोचते हैं, “मैं मगरमच्छ की तरह मोटी चमड़ी वाला हूँ। मैं जहाँ भी जाता हूँ, इसी तरीके से कार्य करता हूँ, ऐसे इधर-उधर घूमता रहता हूँ मानो मैं उस जगह का मालिक हूँ! मुझे परवाह नहीं है कि दूसरे लोग मेरे बारे में क्या कहते हैं—मेरे बारे में कौन क्या कर सकता है?” हो सकता है कि लोग तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कर पाएँ, लेकिन चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हर चीज जो तुम करते हो, उसे परमेश्वर कैसे मापता है और कैसे उसका मूल्यांकन करता है, परमेश्वर तुम्हें कैसे परिभाषित करता है और तुम पर क्या फैसले सुनाता है। अगर तुम इस पर ध्यान नहीं देते हो, तो क्या तुम अभी भी परमेश्वर में विश्वास रखने वाले व्यक्ति हो? अगर तुम इस बारे में परवाह तक नहीं करते हो तो फिर तुम छद्म-विश्वासी हो। लोग तुम्हारे बारे में जो कहते हैं उसके प्रति तुम बेपरवाह हो सकते हो, लेकिन क्या तुम्हारे बारे में परमेश्वर के मूल्यांकन, तुम्हारे बारे में उसके नजरिए और उसके द्वारा तुम पर सुनाए गए फैसलों की तुम्हें परवाह नहीं करनी चाहिए? अगर परमेश्वर ने तुम्हारा यह मूल्यांकन किया है कि तुम बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले हो, शर्मिंदगी से पूरी तरह बेखबर हो और तुममें शर्म की कोई भावना नहीं है, तुम्हारी मानवता में कई चीजों की कमी है और तुममें कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण चीजें नहीं हैं, तो तुम्हें एक नए सिरे से आचरण करना शुरू करना चाहिए—तुम्हें पश्चात्ताप करना चाहिए और अपने खुद के तर्क पेश करना बंद कर देना चाहिए। भले ही तुम्हारे पास हजारों-लाखों बहाने हों, लेकिन यह अकेला तथ्य कि तुम बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले हो यह तय करने के लिए काफी है कि तुम्हारी मानवता और जमीर में एक बहुत बड़ी समस्या है। अकेले इसी से मापा जाए तो तुम्हारी समस्या बहुत गंभीर है। अगर तुम यह समझ सकते हो कि मैं क्या कह रहा हूँ, तो तुम्हें पश्चात्ताप करना चाहिए और अपने दिल में अपने खुद के तर्क पेश करना बंद कर देना चाहिए। तुम्हारा तर्क आवेगशीलता से, भावनाओं से, शैतान से उपजा है—अगर तुम यह मानते हो कि तुम्हारा तर्क गलत नहीं है, तो भी यह सत्य नहीं है। तुम्हारे बारे में परमेश्वर का मूल्यांकन पूरी तरह से तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों पर आधारित नहीं है। परमेश्वर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों पर विचार करने से पहले तुम्हारी मानवता को देखता है। तुम्हारी मानवता कैसी है और हर मामले के प्रति तुम्हारा रवैया कैसा है यह तुम्हारे चरित्र से तय होता है। परमेश्वर जो देखता है वह निश्चित रूप से सटीक होता है और जिस मानक से वह तुम्हें मापता है वह भी सत्य के अनुरूप होता है। चाहे वह किसी को भी मापे, यह कभी भी उसके बाहरी रंग-रूप पर आधारित नहीं होता है बल्कि इस पर आधारित होता है कि वह वास्तव में क्या करता है, उसके दैनिक जीवन में उसके प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं, हर मामले को सँभालते समय उसके विचार, दृष्टिकोण और रवैये क्या होते हैं और साथ ही सकारात्मक चीजों के प्रति, सत्य के प्रति और परमेश्वर के प्रति उसका क्या रवैया है। चाहे अंत में परमेश्वर तुम्हें कैसे भी परिभाषित या मूल्यांकित करे, तुम्हारे साथ अन्याय नहीं होगा। यह तुम्हारी अस्थायी अभिव्यक्ति या कभी-कभार के अपराध पर आधारित नहीं है; यह एक ऐसा मूल्यांकन है जो तुम्हारी पूरी अभिव्यक्तियों पर आधारित है। इसलिए, हर व्यक्ति के बारे में परमेश्वर का मूल्यांकन सटीक और वस्तुनिष्ठ होता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला होने की अभिव्यक्ति में व्यक्ति का चरित्र शामिल होता है। यकीनन कुछ हद तक यह भ्रष्ट स्वभाव के स्तर तक भी पहुँच जाता है। क्योंकि ऐसे लोगों में मानवता का यह पहलू होता है, इसलिए यह उनसे कुछ निश्चित चीजें करवाता है और जब वे ये चीजें करते हैं तो अपना भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं। चाहे किसी भी तरह का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो, बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाले लोगों द्वारा प्रकट किए जाने वाले भ्रष्ट स्वभावों और उनके द्वारा किए गए क्रियाकलापों को उनकी मानवता से अलग नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, किसी व्यक्ति का भ्रष्ट स्वभाव बदल सकता है या नहीं और उसे छोड़ा जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका चरित्र कैसा है। अगर उसका चरित्र बुरा है, अगर वह सत्य का प्रतिरोध करता है, सत्य से दूर भागता है और उससे विमुख है और सत्य स्वीकारने से इनकार करता है तो उसके भ्रष्ट स्वभाव छोड़ पाना मुश्किल होगा और वह उद्धार प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगा। लेकिन अगर अपने चरित्र के लिहाज से वह कुकर्मी नहीं है और वह सत्य समझ सकता है और स्वीकार सकता है, जिद्दी नहीं है और उसमें नीच चरित्र की समस्याएँ नहीं हैं, तो उसके भ्रष्ट स्वभाव छोड़े जा सकते हैं। हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, लेकिन क्या चीज यह तय करती है कि व्यक्ति भ्रष्टता को छोड़ सकता है और उद्धार प्राप्त कर सकता है? (यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति का चरित्र कैसा है।) बिल्कुल—यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति की मानवता अच्छी है या खराब है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?