सत्य का अनुसरण कैसे करें (9) भाग चार

संदेह करने की प्रवृत्ति होना

चलो, इसके बाद हम संदेह करने की प्रवृत्ति होने पर चर्चा करें। हमने अभी-अभी ऐसी किस अभिव्यक्ति पर चर्चा की जो संदेह करने की प्रवृत्ति से कुछ हद तक मिलती-जुलती है? (संवेदनशीलता।) संवेदनशीलता किस तरह की समस्या है? (मानवता का एक दोष है।) संदेह करने की प्रवृत्ति संवेदनशीलता से एक स्तर ऊँची होती है; यह समस्या ज्यादा गंभीर है। संवेदनशीलता सिर्फ कुछ हद तक बचकानी मानवता का संकेत है, जैसे किसी बच्चे की होती है, जबकि संदेह करने की प्रवृत्ति में कुछ खास विचार और दृष्टिकोण शामिल होते हैं—इसे आमतौर पर बहुत ज्यादा सोचने के रूप में जाना जाता है जो खराब चरित्र को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति संदेह करने की प्रवृत्ति वाले व्यक्ति से दस युआन की कीमत वाला सामान खरीदने में मदद करने के लिए कहता है और खासतौर से जोर देता है, “तुम दस युआन से ऊपर बिल्कुल भी नहीं जा सकते। अगर वह सामान बहुत ही महँगा हो तो उसे मत खरीदना।” यह सुनने के बाद वह सोचता है, “क्या तुम सिर्फ शिष्ट बन रहे हो? तुम वास्तव में कोई ऐसा सामान चाहते हो जिसकी कीमत एक सौ युआन है, लेकिन तुम इसे कहने से शरमा रहे हो। तो फिर मैं इसे तुम्हारे लिए खरीदूँगा ताकि मैं तुम्हें खुश कर सकूँ और तुम्हारे मन में अपने बारे में सकारात्मक भावनाएँ छोड़ सकूँ।” फिर पता चलता है कि जब वह इसे वापस लेकर आता है तो दूसरा व्यक्ति कहता है, “यह तो बहुत ही महँगा है। मेरे पास सिर्फ दस युआन हैं; मेरे पास इतने सारे पैसे नहीं हैं।” तो क्या उस व्यक्ति के लिए एक सौ युआन की कीमत वाला सामान खरीदकर अंत में उसने उस व्यक्ति का नुकसान नहीं करवा दिया? फिर भी वह दूसरे व्यक्ति को समझ नहीं पाता है बल्कि यह संदेह करता है कि वह व्यक्ति ज्यादा पैसे खर्च नहीं करना चाहता है और उसका फायदा उठाने का प्रयास कर रहा है। मुझे बताओ, क्या शक करने की प्रवृत्ति वाले ऐसे लोग बहुत परेशानी पैदा करने वाले नहीं होते हैं? (हाँ।) वे किस तरह से परेशानी पैदा करने वाले होते हैं? (उनके विचार बहुत ही पेचीदा होते हैं।) बहुत ज्यादा पेचीदा विचारों वाले लोगों के साथ मेलजोल रखना मुश्किल होता है। मुझे बताओ, क्या ईमानदार व्यक्तित्व वाले लोग ऐसे लोगों से मेलजोल रखने के इच्छुक होते हैं? (नहीं।) तुम्हें नहीं पता कि वे भीतर क्या सोच रहे हैं या उनके विचार किस दिशा में जा रहे हैं और तुम उनके इरादों की असलियत नहीं देख पाते हो या यह नहीं देख पाते हो कि वे तुम पर कैसे शक कर रहे हैं। इसलिए जब तुम सँभालने के लिए उन्हें कोई चीज सौंपते हो, भले ही वह स्पष्ट रूप से कोई बहुत ही सरल, छोटा मामला ही क्यों न हो, वे इसे बहुत पेचीदा और बोझिल बना देते हैं। क्योंकि वे इस प्रक्रिया में मामलों को बहुत ही ज्यादा पेचीदा बना देते हैं, इसलिए तुम भी थका हुआ महसूस करते हो और सोचते हो कि इसे खुद करना बेहतर होता। तुम ऐसे लोगों से मेलजोल नहीं रखना चाहते और बस उनसे दूर रहना चाहते हो। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम्हारे पास कोई ऐसी चीज है जिसकी अब तुम्हें जरूरत नहीं है और उसे ऐसे ही रख छोड़ना बरबादी होगी और उसे फेंक देना अफसोस की बात होगी, इसलिए तुम वह चीज इस किस्म के व्यक्ति को दे देते हो। वह न सिर्फ इसकी तारीफ नहीं करता है, बल्कि अपने दिल में शक भी करता है : “तुम यह मुझे क्यों दे रहे हो? इसके पीछे कुछ तो होगा। क्या तुम यह प्रयास कर रहे हो कि मैं सोचूँ कि तुम एक अच्छे व्यक्ति हो या मुझ पर तुम्हारा एक एहसान हो जाए या तुम मुझसे अपने लिए कुछ करने के लिए कह रहे हो?” तुमने कभी भी यह उम्मीद नहीं की कि वह इतने छोटे-से मामले के बारे में इतना ज्यादा सोचेगा, कि उसे थोड़ा-सा कुछ देने से इतना ज्यादा शक पैदा हो सकता है। उसके शक दूर करने के लिए तुम्हें उसे बहुत सारी चीजें कहनी पड़ती हैं। क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? तुम्हें इस व्यक्ति से नफरत महसूस होने लगती है और उसके बाद अगर तुम्हारे पास कोई चीज ज्यादा हो तो तुम वह चीज उसे देने के बजाय फेंक देना पसंद करोगे। तुम उसे क्यों नहीं देते? वह इसलिए नहीं है कि तुम बेरहम हो, बल्कि इसलिए क्योंकि तुम मुसीबत पैदा नहीं करना चाहते। इससे पहले किसी ने अभी-अभी एक जगह किराए पर ली थी और उसमें सफाई का कोई भी सामान मौजूद नहीं था। इसलिए, मैं घर से सफाई का कुछ सामान ले आया; सफाई के पदार्थ की कुछ बोतलें पूरी भरी हुई थीं, जबकि कुछ बोतलें आधी भरी हुई थीं। वह जगह किराये पर लेने वाले व्यक्ति ने उनकी तरफ देखा और कहा : “भले ही तुमने मुझे ये चीजें मुफ्त में दी हों, फिर भी मैं तुम्हें धन्यवाद नहीं देने वाला हूँ—ये उपयोग की हुई हैं। अगर वे नई होतीं तो क्या तुमने उन्हें मुझे दिया होता?” क्या ये शब्द दुःख पहुँचाने वाले नहीं हैं? (हाँ।) वे दुःख पहुँचाने वाले क्यों हैं? (इस तरह से उसने सद्भावना को विकृत कर दिया।) उसने मेरी सद्भावना को दुर्भावना माना। मैंने तुम्हें मुझे धन्यवाद देने के लिए नहीं कहा और न ही मैंने तुमसे सामान का भुगतान करने के लिए कहा। बात सिर्फ इतनी है कि तुम एक जगह किराए पर ले रहे हो और उसमें सफाई का कोई सामान मौजूद नहीं है और बाहर जाना और उन्हें खरीदना तुम्हारे लिए असुविधाजनक है। मैं बस अपने पास पड़े सामान से थोड़ा-सा हिस्सा तुम्हारे लिए लेकर आया ताकि तुम्हारे लिए चीजें और सुविधाजनक हो जाएँ। मैं तुम्हें इन चीजों का उपयोग करने देकर तुम्हारी खुशामद करने का प्रयास नहीं कर रहा था—मुझ पर तुम्हारा कोई एहसान बाकी नहीं है और मैंने तुमसे मेरा कोई एहसान लेने के लिए भी नहीं कहा। वह इतने छोटे-से मामले पर संदेह करने लगा : “उफ! इसमें इतनी क्या बड़ी बात है? तुम मेरे लिए कुछ चीजें लेकर आए और अब तुम सोचते हो कि तुमने मुझ पर कोई एहसान कर दिया है! तुम जो सामान लेकर आए, वह वैसे भी कुछ अच्छा नहीं है—अगर तुम इसे यूँ ही दे रहे हो तो फिर यह अच्छा कैसे हो सकता है?” इस व्यक्ति से निपटना वाकई मुश्किल है। मैंने यह दावा नहीं किया कि ये चीजें किसी तरह के दुर्लभ अमृत हैं—ये तो बस कुछ आम सफाई के उत्पाद हैं। अगर तुम इनका उपयोग नहीं करना चाहते तो तुम्हें करने की जरूरत नहीं है। चीजों को इतना पेचीदा क्यों बनाना? मुझे एहसास हुआ कि इस व्यक्ति के साथ मिलजुलकर रहना और इससे निपटना मुश्किल है। अगर मैं कुछ भी नहीं लाया होता तो क्या इससे कम परेशानी नहीं हुई होती? ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ भी नहीं लाने से भी परेशानी पैदा हो सकती थी। हो सकता है कि तब भी वह सोचता, “मैं यह जगह किराए पर ले रहा हूँ और तुम मेरे लिए सफाई का कोई सामान तक लेकर नहीं आए। हमें भाई-बहन होना चाहिए, फिर भी तुमने मेरे प्रति बिल्कुल भी प्रेम नहीं दिखाया!” तब भी उसके पास कहने के लिए कुछ होता। ऐसे लोगों का चरित्र बहुत खराब होता है। दूसरे लोग अच्छे हैं या बुरे, यह मापने के लिए वे हमेशा अपनी पसंद और मानकों का उपयोग करते हैं। वे कड़ी नजर से लगातार दूसरों की पड़ताल करते रहते हैं और उन्हें मापते हैं, यह सोचते हैं कि वे नैतिक रूप से बेहतर हैं जबकि दूसरे सभी लोगों का एक अंधकारमय पहलू है और दूसरे लोगों के पास हमेशा अपने खुद के मकसद होते हैं चाहे वे कैसे भी कार्य करें, जबकि अकेले वे ही भ्रष्ट नहीं हैं और पूर्ण हैं।

जिन लोगों में संदेह करने की प्रवृत्ति होती है उनका चरित्र खराब होता है। चूँकि उनका चरित्र खराब होता है, इसलिए वे अनिवार्य रूप से इस चरित्र के अधीन कार्य करेंगे। वे जो प्रकट करेंगे वह भ्रष्ट स्वभाव होगा, वह निश्चित रूप से सामान्य मानवता नहीं होगी। अगर यह सामान्य मानवता नहीं है तो फिर यह वास्तव में क्या है? यह भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित है। जब संदेह करने की प्रवृत्ति होने की बात आती है तो ऐसे लोगों द्वारा अपने क्रियाकलापों और दूसरों के साथ मेलजोल में प्रकट किए गए प्रतिनिधि भ्रष्ट स्वभाव निश्चित रूप से दुष्टता और धोखेबाजी हैं। उनके विचार बहुत ही पेचीदा होते हैं, बहुत ही दुष्ट और कपटी होते हैं। चूँकि वे खुद तब तक एक तिनका नहीं तोड़ते हैं जब तक कि उनके लिए उसमें कुछ न हो, इसलिए वे यह मान लेते हैं कि बाकी सभी लोग भी ऐसे ही हैं। अगर तुम उस तरह के व्यक्ति नहीं हो तो भी वे इसका विश्वास नहीं करेंगे और अगर तुम समझाने का प्रयास करते हो तो भी इससे कोई फायदा नहीं होगा—वे तुम्हें बस इसी तरीके से देखते हैं। वे सभी चीजों, मामलों और सभी लोगों को देखने के लिए एक दुष्ट तरीके और दुष्ट स्वभाव का उपयोग करते हैं। अगर तुम जो करते हो वह उचित हो, मानवता की जरूरतों के अनुरूप हो, मानवता की तार्किकता के अनुरूप हो या सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो, तो भी वे इसके पीछे कई प्रश्न-चिह्न लगाएँगे और तुमसे पूछेंगे, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हारा क्या मकसद है?” तुम कहते हो, “मेरा कोई मकसद नहीं है,” लेकिन वे इस पर विश्वास ही नहीं करेंगे—वे तुम पर एक मकसद थोपने और तुमसे इसे कबूल करवाने पर अड़े रहेंगे। क्या ऐसे लोग परेशान करने वाले नहीं होते हैं? (हाँ।) जिन लोगों में संदेह करने की प्रवृत्ति होती है उनके लिए दूसरों के साथ मिलजुलकर रहना मुश्किल होता है। ऐसे लोग निश्चित रूप से सरल और खुले नहीं होते हैं, और यकीनन वे ईमानदार लोग नहीं होते हैं। उनके चरित्र में ईमानदारी, दयालुता और तार्किकता के तत्व मूलतः पूरी तरह से नदारद होते हैं। तो उनके चरित्र के मुख्य अंश क्या हैं? संविभ्रम, धोखेबाजी, दुष्टता के साथ-साथ सादगी की कमी और बेईमानी। वे सभी लोगों और सभी मुद्दों को बहुत पेचीदा चीजों के रूप में देखते हैं। अगर तुम उनसे ईमानदारी से बात करते हो तो भी वे विश्लेषण करेंगे और सोचेंगे कि तुमने ऐसा क्यों कहा। अगर उन्होंने तुम्हारे साथ लंबे समय तक काम किया हो और वे जानते हों कि तुम्हारा चरित्र कैसा है, तो भी वे बातचीत करते समय, मामले सँभालते समय या तुमसे मेलजोल रखते समय तुम्हारे प्रति प्रायः संदेह का रवैया अपनाएँगे। इसलिए ऐसे लोग बहुत परेशान करने वाले होते हैं। उनके साथ काम करने से बहुत सारे बोझ और औपचारिकताएँ जुड़ जाती हैं और तुम्हें अपनी तरफ से बहुत सारा गृह-कार्य करना पड़ता है और उन्हें जानना भी पड़ता है—यह जानना पड़ता है कि उन्हें कौन-सी चीजें पसंद नहीं हैं और उन्हें क्या करना या किस बारे में बात करना पसंद नहीं है। नहीं तो अगर तुम सावधान नहीं रहे तो तुम उन्हें नाराज कर सकते हो या उनकी नजर में उन्हें दुःख पहुँचा सकते हो। वे लोगों के साथ इस तरीके से पेश आते हैं तो वे परमेश्वर से कैसे पेश आते हैं? (वे परमेश्वर से भी इसी तरीके से पेश आते हैं।) क्या वे परमेश्वर से ईमानदारी से पेश आएँगे? (नहीं।) उदाहरण के लिए, जब कलीसिया उनके लिए कोई कर्तव्य करने की व्यवस्था करती है तो वे सोचना शुरू कर देते हैं, “क्या परमेश्वर को पता है कि मैं यह कर्तव्य कर रहा हूँ? क्या वह इसे याद रखेगा? मुझे कितना प्रयास करना चाहिए कि बस काम चल जाए और परमेश्वर के सामने इसे याद रखा जाए?” कुछ समय तक अपना कर्तव्य करने के बाद वे इसकी भी छानबीन करते हैं कि अगुआ और कार्यकर्ता उन्हें कैसे देखते हैं और क्या उनके पास उनके बारे में कोई नकारात्मक मूल्यांकन हैं। आखिर यह किस किस्म की मानवता है? वे जिस रवैये से मामले सँभालते हैं उसके जरिये प्रकट की गई मानवता को देखा जाए तो ऐसे लोग बहुत ही परेशान करने वाले होते हैं और उनके लिए सत्य स्वीकारना आसान नहीं होता है। ऐसा क्यों है? क्योंकि उनका ईमानदार होना मुश्किल है; उनके जमीर में न्याय की भावना नहीं होती है, उनका विवेक सही नहीं होता है और चीजों के बारे में राय बनाने का उनका तरीका बेतुका होता है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह बेतुका है? क्योंकि वे अपेक्षाकृत अतिवादी होते हैं, उनमें चीजों पर अड़ जाने की प्रवृत्ति होती है और वे नीच होते हैं—वे चीजों को सामान्य मानवता के सोचने के तरीके का उपयोग करके नहीं देखते हैं। वे खुले और स्पष्टवादी नहीं होते हैं बल्कि एक खास तौर से अंधकारमय तरीके से जीते हैं। फिर भी उन्हें कभी नहीं लगता कि वे एक अंधकारमय तरीके से जीते हैं और यह तक सोचते हैं कि वे दूसरों से ज्यादा होशियार हैं और दूसरों की तुलना में ज्यादा परिष्कार के साथ और बारीकियों पर ध्यान देते हुए जीते हैं। वे खासतौर से अपनी चतुराई की सराहना करते हैं। इसे खुद को चतुर समझना कहते हैं। जो लोग खुद को चतुर समझते हैं उनमें अपनी मानवता के विवेक के लिहाज से और अपने जमीर में न्याय की भावना के लिहाज से बहुत कमी होती है। इसलिए, ऐसे लोगों की मानवता खराब होती है और दूसरे लोग उनसे संपर्क में रहने के इच्छुक नहीं होते हैं। भले ही कोई भी कुछ कहे, ऐसे लोग उसे एक मुद्दा बना देंगे। वे जो मतलब लगाते हैं, वे सभी अतिवादी चीजें हैं जो विकृत होती हैं, आवेगशीलता की होती हैं, शैतान की होती हैं और भावनाओं की होती हैं—ये सभी ऐसी चीजें हैं जो अंधकारमय और नकारात्मक होती हैं, ऐसी चीजें हैं जो सत्य के विपरीत होती हैं और सत्य का प्रतिरोध करती हैं। ये चीजें लोगों का सही मार्ग की तरफ बिल्कुल मार्गदर्शन नहीं कर सकती हैं। इसलिए, इस किस्म के लोग बहुत ही अप्रिय और घिनौने होते हैं। वे अँधेरे कोनों और अपनी छोटी-सी दुनिया में जीते हैं। वे खासतौर से आत्म-मुग्ध और आत्म-प्रशंसक होते हैं, सोचते हैं कि वे दूसरों से ज्यादा उत्कृष्ट, शानदार, सम्मानजनक और गरिमामय जीवन जीते हैं—उन्हें कोई भी छू नहीं सकता है। दरअसल ऐसे लोगों का चरित्र बहुत ही अधम होता है और उनमें कोई वास्तविक गरिमा नहीं होती है। वास्तविक गरिमा की कमी का मतलब यह है कि उनका चरित्र खासतौर से खराब होता है क्योंकि उनकी मानवता से जो उत्पन्न होता है वे सभी अंधकारमय चीजें होती हैं जिन्हें खुले में नहीं लाया जा सकता, वे ईमानदार और निष्कपट चीजें नहीं होती हैं। इसलिए ऐसे लोगों में बोलने के लिए कोई गरिमा नहीं होती है। जिन लोगों में संदेह करने की प्रवृत्ति होती है उनके द्वारा कौन-से नतीजे लाए जाने की संभावना रहती है? सादे शब्दों में कहा जाए तो ऐसे लोग शातिर चालबाजियों से भरे होते हैं। संदेह करने की प्रवृत्ति होने का मतलब है कि ये लोग बहुत सारी शातिर योजनाएँ रखते हैं। देखो कि दानव राजा परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर कैसे जुल्म करते हैं और उन्हें कैसे गिरफ्तार करते हैं—वे इतनी सारी शातिर योजनाएँ रखते हैं जो अंत में लोगों को इस हद तक नुकसान पहुँचाती हैं कि उनके परिवार टूट जाते हैं जिनमें से कुछ के सदस्य मर जाते हैं और एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। यह राक्षसों और दानव राजाओं की करतूत है। इसलिए संदेह करने की प्रवृत्ति रखने वाले लोगों में से कोई भी अच्छा नहीं होता है। परमेश्वर में विश्वास रखने वालों को सत्य सिद्धांतों के आधार पर लोगों और चीजों को देखना चाहिए, उन्हें बिना सोचे समझे संदेह में नहीं पड़ना चाहिए और वे जो कहते हैं उसके पीछे सबूत होना चाहिए। किसी व्यक्ति या मामले को देखते समय तुम्हारे मन में जो विचार उत्पन्न होते हैं कम-से-कम वे सकारात्मक और दूसरों को स्वीकार्य होने चाहिए। इससे भी बेहतर है कि वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होने चाहिए, दूसरों के लिए मददगार होने चाहिए और उनका दूसरों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ना चाहिए। लेकिन संदेह करने की प्रवृत्ति वाले लोगों द्वारा उत्पन्न किए गए कोई भी विचार और दृष्टिकोण सत्य के अनुरूप नहीं होते हैं; वे कम-से-कम सकारात्मक चीजें तो नहीं होती हैं—यानी ऐसे लोग जिस परिप्रेक्ष्य से समस्याओं पर विचार करते हैं या वे जो विचार और धारणाएँ उत्पन्न करते हैं, वे सत्य के अनुरूप नहीं होती हैं। इसलिए इस किस्म के लोग अँधेरे कोनों में रहते हैं और उनके पास बोलने के लिए कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती है। उनके विचारों से उत्पन्न होने वाली सभी चीजें अंधकारमय और दुष्ट होती हैं—ये चीजें सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होती हैं और ये लोगों या उनके जीवन पर सकारात्मक प्रभाव नहीं डालेंगी। अगर तुम ऐसे लोगों के संदेह से उत्पन्न होने वाले विभिन्न विचार और दृष्टिकोण स्वीकारते हो, तो तुममें जहर भर जाएगा और तुम उनके द्वारा नीचे घसीट लिए जाओगे—यह शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बराबर है। लेकिन अगर तुममें ऐसे लोगों का भेद पहचानने की क्षमता है और तुम उन्हें नकारात्मक उदाहरण मानते हो, तो तुम कुछ प्रगति कर सकते हो और नकारात्मक चीजों को समझने में भेद पहचानने की कुछ क्षमता प्राप्त कर सकते हो। संदेह करने की प्रवृत्ति होने पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

अयोग्यता

चलो, इसके बाद हम अयोग्यता के बारे में बात करें। हर कोई समझता है कि अयोग्यता का क्या मतलब है—इसका मतलब है किसी भी चीज को अच्छी तरह से सँभालने में असमर्थ होना, शक्तिहीन दिखना, ठीक वैसे ही जैसे लोग अक्सर कहते हैं : “तुम इतने अयोग्य क्यों हो? तुम्हारा वाकई कोई भविष्य नहीं है!” क्या अयोग्यता अच्छी चीज है? (नहीं।) तो चलो इसे श्रेणीबद्ध करें—यह क्या है? (यह मानवता का एक दोष है।) अयोग्यता स्पष्ट रूप से मानवता का एक दोष है। अयोग्यता का मतलब है कि व्यक्ति के पास मामले सँभालने में बहुत कम बुद्धिमत्ता है और जीवित बचे रहने की खराब क्षमताएँ हैं—इसे ही अयोग्यता कहा जाता है। कुछ लोग बेढंगे तरीके से बोलते हैं, खुद को व्यक्त करने में असमर्थ होते हैं; कुछ लोग शर्मीले, अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाले भी होते हैं—जब उन्हें बहुत सारे लोगों के सामने बोलना पड़ता है या सबकी नजरों में आना पड़ता है, तो उन्हें मंच पर आने से भय लगता है, वे दब्बू महसूस करते हैं और बोलने की हिम्मत नहीं करते हैं और अक्सर दूसरे लोगों द्वारा डराए-धमकाए जाते हैं। कुछ कुकर्मी विश्वास करते हैं कि ऐसे लोगों को डराना-धमकाना उचित है और यह बहुत मजेदार और आनंददायक है—वे इस किस्म के लोगों का हर रोज मजाक उड़ाते हैं और उन्हें छेड़ते हैं। अयोग्य लोगों में मामले सँभालने की खराब क्षमता होती है। ऐसा हो सकता है कि उनमें से कुछ लोगों में जीवित बचे रहने की क्षमताएँ भी खराब हों, वे पैसे कमाने में असमर्थ हों और हमेशा दूसरों के आस-पास बहुत डरपोक और अत्यधिक सतर्क बने रहते हों। जब वे ताकतवर लोगों को देखते हैं तो उनसे दूर भागते हैं और बोलने की हिम्मत नहीं करते हैं। यहाँ तक कि जब उन्हें डराया-धमकाया जाता है तो वे प्रतिरोध करने की हिम्मत नहीं करते हैं, वे डरते हैं कि कहीं वे दूसरों को नाराज न कर दें। इस किस्म के लोगों की मानवता में अयोग्यता की अभिव्यक्तियाँ देखी जाएँ तो यह सिर्फ एक तरह का मानवता का दोष है। किसी की अयोग्यता कभी भी उसमें गलत विचार और दृष्टिकोण उत्पन्न होने या उसके द्वारा खुद पर या दूसरों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डालने का कारण नहीं बनी; इसलिए अयोग्यता सिर्फ मानवता का एक दोष है। क्या कोई अयोग्य व्यक्ति बनना चाहता है? (नहीं।) कोई भी अयोग्य व्यक्ति नहीं बनना चाहता—ऐसा क्यों है? अयोग्य लोगों को डराया-धमकाया जाता है और हर कोई उन्हें नीची नजर से देखता है, है ना? (सही कहा।) अगर तुमसे बुरा और अयोग्य होने के बीच चुनने के लिए कहा जाए तो तुम निश्चित रूप से अयोग्य होने के बजाय बुरा होना चुनोगे। तुम मन ही मन सोचोगे : “मैं कभी भी अयोग्य व्यक्ति नहीं बनूँगा! इस समाज में अयोग्य लोगों के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है और उन्हें डराया-धमकाया जाता है, वे लोकप्रिय नहीं होते हैं; चाहे वे कहीं भी चले जाएँ, उन्हें नीची नजर से देखा जाता है और दूसरे उन्हें पैरों तले कुचल डालते हैं। न सिर्फ उनमें मौजूदगी की कोई भावना नहीं होती है, बल्कि उनके जीवित रहने का अधिकार भी छीन लिया जा सकता है। लेकिन कुकर्मी होना अलग है—कुकर्मी जहाँ भी जाते हैं वहीं दूसरे लोग उनसे डरते हैं और उनके साथ बहुत सम्मान से पेश आते हैं। कोई भी उन्हें भड़काने की हिम्मत नहीं करता है। वे जहाँ भी जाते हैं वहीं विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं और दूसरों को पैरों तले कुचल भी सकते हैं। कुकर्मी इस दुनिया में जहाँ भी होते हैं, फलते-फूलते रहते हैं।” अगर तुम लोगों से अभी चुनने के लिए कहा जाए तो तुम लोगों में से कोई भी अयोग्य व्यक्ति नहीं बनना चाहेगा—तुम सभी कुकर्मी बनना चाहोगे। क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) यह सही क्यों नहीं है? यह किस सत्य सिद्धांत का विरोध करता है? अयोग्यता मानवता का एक दोष है। सबसे आम अभिव्यक्तियों में किसी भी चीज को अच्छी तरह से सँभालने में असमर्थ होना, भेदभाव किया जाना और अलग-थलग किया जाना शामिल है। क्योंकि अयोग्य लोगों को डराया-धमकाया जाता है और समाज में उन्हें पैरों तले कुचला जाता है, इसलिए कोई भी अयोग्य होने का इच्छुक नहीं होता है। सभी लोग उन लोगों से ईर्ष्या करते हैं जो सक्षम और कुशल होते हैं और वे सभी दूसरों से अलग दिखना चाहते हैं, शक्ति और प्रभाव प्राप्त करना चाहते हैं और दूसरों को पैरों तले कुचल डालना चाहते हैं, किसी भी समूह में विशेषाधिकार और प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहते हैं, वे न सिर्फ दूसरों द्वारा डराए-धमकाए जाने से बचना चाहते हैं, बल्कि जब चाहे तब दूसरों को धमकाने में समर्थ भी होना चाहते हैं। क्या इस तरह का विचार और दृष्टिकोण सही है? क्या यह सत्य के अनुरूप है? (नहीं।) तुम लोगों ने इतने सारे सत्य सुने हैं, फिर भी तुम अब भी कुकर्मियों को स्वीकारते हो—इसका मतलब है कि तुम लोगों का स्वभाव भी काफी दुष्ट है। तुम्हें जो भी कुकर्मी दिखाई देता है, तुम उससे ईर्ष्या करते हो और उसकी सराहना करते हो। तुम्हें अपने दिल में अच्छी तरह से पता है कि कुकर्मी बुरे होते हैं, फिर भी तुम उनका अनुसरण करने से खुद को रोक नहीं पाते हो, ऐसा महसूस करते हो कि ऐसा करने से तुम्हें सहारे का एक साधन मिल जाता है और यह तुम्हें डराए-धमकाए जाने से बचाता है। जब तुम अयोग्य लोगों को देखते हो तो वे तुम्हें घिनौने लगते हैं और तुम उन्हें नीची नजर से देखते हो, यहाँ तक कि उन्हें पैरों तले कुचल डालना भी चाहते हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि अगर तुमने कुकर्मियों का अनुसरण किया तो तुम कितने बुरे कर्म करोगे और तुम्हें कितना प्रतिफल मिलेगा? अगर तुम कुकर्मियों का अनुसरण करते हो तो तुम्हें उद्धार मिलने की कितनी संभावना होगी? अगर तुम कुकर्मियों का अनुसरण करते हो तो क्या तुम बुरे कर्म करने से बच पाओगे? मान लो कि तुम कुकर्मियों का अनुसरण करते हो, ईमानदारी से उनकी सेवा करते हो और उनके मातहत के रूप में कार्य करते हो। वे तुम्हारे साथ कुछ फायदा बाँट सकते हैं और तुम दूसरों को पैरों तले कुचलने के लिए उनका अनुसरण करने में समर्थ हो सकते हो और सबसे बढ़िया भोजन और पेय प्राप्त कर सकते हो, बहुत आनंद का अनुभव कर सकते हो, डराए-धमकाए जाने से बच सकते हो और इस जीवन में दूसरों के बीच रुतबा हासिल कर सकते हो। लेकिन इन चीजों का आनंद लेने के लिए तुम्हें बहुत सारे बुरे कर्म करने पड़ेंगे! क्या तुम्हें पता है कि तुम्हें कितना सारा प्रतिफल मिलेगा और कितनी कड़ी सज़ा मिलेगी? क्या यह सही मार्ग है? (नहीं।) तो क्या तुम लोग अब भी अयोग्य व्यक्ति नहीं बनने और धमकाए जाने से बचने की खातिर बुरे कर्म करने और सज़ा पाने का चुनाव करने का बलिदान देने को तैयार हो—इस जीवन में आनंद के बदले में अपने गंतव्य और किस्मत का बलिदान दोगे? क्या यह तुम लोगों का विचार और दृष्टिकोण है? कुछ लोग वास्तव में इस तरह का दृष्टिकोण रखते हैं—वे अयोग्य और डराए-धमकाए जाने के बजाय कुकर्मी बनना चुनेंगे। क्या यह कुकर्मियों के मार्ग पर चलने की चाह करना नहीं है? अयोग्यता सिर्फ मानवता का एक दोष है—इसमें इतना बुरा क्या है? क्या दूसरों को डराना-धमकाना और बुरे कर्म करना वाकई बेहतर विकल्प है? अगर परमेश्वर तुम्हें भूख से मरने नहीं देता है और तुम्हें खाने के लिए भोजन प्रदान करता है, तो क्या तुम वाकई भूख से मर सकते हो? अगर परमेश्वर तुम्हें आनंद, आजादी, खुशी, सुख और शांति से जीने की अनुमति देता है तो तुम्हें इनमें से किसी भी चीज की कमी नहीं होगी। तो क्या हुआ अगर दूसरे लोग तुम्हें डराते-धमकाते हैं? कोई भी तुमसे ये चीजें नहीं छीन सकता—परमेश्वर तुम्हें जो प्रदान करता है, वह तुमसे कोई नहीं छीन सकता। अगर तुम कुकर्मियों का अनुसरण करते हो और कुकर्मियों के मार्ग पर चलते हो तो तुम जिन सुखों का आनंद लोगे वे सब पापपूर्ण सुख होंगे। इसके अलावा, बुरे कर्म करके तुम जो भी पैसे या भौतिक सुख हासिल करोगे, वह जबरन जब्ती से हासिल किया हुआ होगा, इस जीवन में तुम जिस सुख का अनुभव करोगे वह परमेश्वर ने तुम्हें जो दिया है उससे ज्यादा होगा और इसलिए तुम्हें भविष्य में बहुत-से जन्मों तक इसका प्रतिदान देना पड़ेगा। सज़ा पाने की कीमत पर इस जीवन में देह के सुख हासिल करना—क्या यह सही मार्ग पर नहीं चलना नहीं है? तुम लोग डराए-धमकाए जाने के बजाय कुकर्मी बनना चुनोगे—यह अपनी आत्मा की गहराइयों में बुराई के प्रति तुम लोगों की धारणा और बुराई को संजोए रखने का भाव दर्शाता है। तो अयोग्य होने में इतना बुरा क्या है? मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो यह एक प्रकार का दोष है, लेकिन यह एक जन्मजात स्थिति भी है जो एक ऐसी चीज है जिसे लोग बदल नहीं सकते। अयोग्य लोग अपनी मर्जी से अयोग्य नहीं बने। हालाँकि यह एक दोष है लेकिन यह भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, यह व्यक्ति के चरित्र की समस्या नहीं है। तो इसमें इतना बुरा क्या है? अगर तुम्हें तुम्हारी अयोग्यता और निम्न रुतबे के कारण अक्सर डराया-धमकाया जाता है और तुम इस दुनिया के अन्याय और बुराई को और इस समाज के अंधकार को गहराई से समझ सकते हो और नतीजतन परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकारने के लिए ईमानदारी से उसके सामने आते हो और खुशी से परमेश्वर के प्रभुत्व और आयोजनों के प्रति समर्पण करते हो और परमेश्वर को तुम्हारी किस्मत का प्रभार लेने देते हो—तो क्या यह अयोग्यता तुम्हारे लिए सुरक्षा का एक रूप नहीं है? अयोग्यता कोई नकारात्मक चीज नहीं है; यह सिर्फ एक प्रकार का मानवता का दोष है। दोष का क्या मतलब है? इसका मतलब अपर्याप्तता, एक छोटी-सी समस्या, एक दाग है—यह सिर्फ कुछ ऐसा है जो अपूर्ण है, जिसमें कुछ कमी है, जो पूरी तरह से व्यक्ति की पसंद के मुताबिक नहीं है या आदर्श नहीं है, लेकिन यह खराब या नीच चरित्र नहीं दर्शाता है। तो तुम यह छोटा-सा दोष क्यों बर्दाश्त नहीं कर सकते? इतना ही नहीं, यह छोटा-सा दोष तुम्हारे जीवन प्रवेश के लिए बड़ा फायदा ला सकता है। या यह कहा जा सकता है कि कुछ लोग, क्योंकि उनमें मानवता का यह दोष, यह जन्मजात स्थिति होती है, अंत तक पूरे दिल से परमेश्वर का अनुसरण करने में ज्यादा सक्षम होते हैं। अंत में, क्योंकि वे सत्य स्वीकार सकते हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल रख सकते हैं, वे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ देने और उद्धार प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य से यह एक आशीष है—लोगों को अयोग्य होने से इनकार नहीं करना चाहिए। अयोग्य होने में इतना बुरा क्या है? अयोग्यता के कारण व्यक्ति का भ्रष्ट स्वभाव बदतर नहीं हो जाएगा। परमेश्वर किसी को इसलिए नीची नजर से नहीं देखेगा या उसे बचाने से इनकार नहीं करेगा क्योंकि वह अयोग्य है और न ही अयोग्यता उसके सत्य स्वीकारने या बचाए जाने को प्रभावित करेगी। इसलिए, तुम लोगों का विचार और दृष्टिकोण बदलना होगा—यह अब भी काफी दूर है। कुछ लोग कहते हैं, “मैं अयोग्य व्यक्ति बनने के बजाय कुकर्मी बनना पसंद करूँगा। अयोग्य लोगों के पास कोई भविष्य नहीं होता है, उन्हें हर कोई नीची नजर से देखता है और यहाँ तक कि वे खुद को भी नीची नजर से देखते हैं। अयोग्य व्यक्ति होना निरर्थक है; कुकर्मी होना शानदार है—तुम जो चाहे कर सकते हो, जिसे डराना-धमकाना आसान लगता हो, उसे डरा-धमका सकते हो और कोई भी प्रतिरोध करने की हिम्मत नहीं करता है। उस तरीके से जीना कितना तड़क-भड़क वाला है!” तड़क-भड़क में क्या फायदा है? अगर तुम दुनिया में सफल होते हो और तड़क-भड़क वाले तरीके से रहते हो तो तुम्हारी संभावनाएँ और गंतव्य बरबाद हो जाएँगे। अब तुम परमेश्वर के सामने नहीं आ पाओगे और अब तुम परमेश्वर से लगाव महसूस नहीं करोगे; अब परमेश्वर तुम्हें आकर्षित नहीं करेगा और अब परमेश्वर के घर में जीवनयापन का परिवेश और कार्य करने का परिवेश तुम्हें आकर्षित नहीं करेगा। तुम परमेश्वर को छोड़ दोगे और ऐसे जीवनयापन के परिवेश की तलाश करोगे जहाँ तुम अपनी सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं का उपयोग करना शुरू कर सको और अपनी कीमत वसूल कर सको। परमेश्वर का घर लोगों के कुकर्मों को सीमित करता है और कोई भी कुकर्मी परमेश्वर के घर में कहीं नहीं पहुँच सकता या डटा नहीं रह सकता। अगर तुम कुकर्मियों को पसंद करते हो और उनमें से एक बनना चाहते हो तो क्या अब भी तुम परमेश्वर के घर में रह सकते हो? देर-सवेर तुम्हें दूर कर दिया जाएगा। तुम न सिर्फ एक अच्छा गंतव्य प्राप्त करने में विफल रहोगे, बल्कि मौत के बाद तुम्हें उस बुरे कर्म की सजा भी मिलेगी जो तुमने किया। इसलिए, वैसे तो अयोग्यता मानवता का एक दोष है, लेकिन यह कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है और न ही इसका मतलब यह है कि व्यक्ति की मानवता बुरी है। ऐसा कौन है जिसमें कुछ खामियाँ नहीं हैं? अयोग्यता ठीक वैसी ही है जैसे कुछ लोग हकलाने के साथ पैदा होते हैं या कुछ लोग जरा-से बदसूरत पैदा होते हैं—ये सभी जन्मजात दोष हैं। मनुष्यों में त्वचा का रंग अलग-अलग होता है—कुछ लोग गोरे पैदा होते हैं, कुछ लोग पीले रंग की त्वचा लेकर पैदा होते हैं और कुछ लोग काले रंग की त्वचा लेकर पैदा होते हैं। यह एक जन्मजात स्थिति है। हो सकता है कि पीले रंग की त्वचा वाले लोग इतने स्वस्थ न दिखें, उनकी रंगत इतनी बढ़िया नहीं होती है—यह एक छोटा-सा दोष है। काली त्वचा वाले लोग ज्यादा तगड़े दिखते हैं, फिर भी कोई भी काली त्वचा पाना नहीं चाहता। आमतौर पर गोरी त्वचा वाले लोगों से ईर्ष्या की जाती है लेकिन उनमें से भी कुछ लोगों को लगता है कि बहुत ज्यादा फीकी त्वचा अच्छी नहीं है और इसलिए वे अपनी त्वचा को धूप में झुलसाकर काँसे रंग का बनाना पसंद करते हैं, वे मानते हैं कि इससे वे स्वस्थ दिखते हैं और उनकी त्वचा में चमक आ जाती है। देखा तुमने, अयोग्यता लोगों की विभिन्न जन्मजात स्थितियों जैसी ही है—बस यही है कि यह एक तरह का दोष है। तो क्या यह एक बड़ी समस्या है? (नहीं।) इसलिए, भले ही यह समस्या मानवता का एक दोष हो, लेकिन यह तुम्हारे द्वारा सत्य की स्वीकृति या सत्य की तुम्हारी समझ को प्रभावित नहीं करती है। तो क्या तुम लोग अब भी अयोग्य व्यक्ति होने का प्रतिरोध करते हो? (अब नहीं करते।) क्या जब तुम अयोग्य लोगों को देखोगे तो अब भी उन्हें डराओगे-धमकाओगे? (नहीं।) तुम उन्हें काफी डराते-धमकाते थे, है ना? क्या अब जब तुम अयोग्य लोगों को देखोगे तो अब भी उन्हें नीची नजर से देखोगे और नीचा दिखाओगे? (नहीं।) अगर तुम खुद एक अयोग्य व्यक्ति हो तो तुम्हें तो और भी खुद को नीची नजर से नहीं देखना चाहिए। अगर तुम अयोग्य हो, तो यही सही—परमेश्वर के वचनों के अनुसार ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करो। भले ही तुम अयोग्य हो, लेकिन तुम्हें ईमानदार होना चाहिए और धोखेबाज नहीं होना चाहिए और परमेश्वर को इस तरह के व्यक्ति पसंद हैं। परमेश्वर को क्या पसंद है? यह तुम्हारी अयोग्यता नहीं है। उसे जो पसंद है वह यह है कि तुम अपनी अयोग्यता के कारण एक ईमानदार व्यक्ति बनने को तैयार हो; वह यह है कि चूँकि तुम्हें नीची नजर से देखा जाता है और लोग तुम्हें पसंद नहीं करते हैं, इसलिए तुम परमेश्वर को खुश करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए एक ईमानदार व्यक्ति बनने के तरीकों के बारे में सोचते हो और तुम वही करते हो जो परमेश्वर कहता है। इस तरह से तुम्हारी अयोग्यता एक फायदा बन जाती है, है ना? (हाँ।) क्या अब तुम लोगों का दृष्टिकोण बदल गया है? (हाँ।) यकीनन यह जरूरी नहीं है कि सभी अयोग्य लोग सत्य स्वीकारने में समर्थ हों। कुछ लोगों की मानवता में अयोग्यता का दोष होने के अलावा उनके चरित्र में भी समस्याएँ होती हैं। इसे सामान्य सिद्धांत नहीं बनाया जा सकता। अयोग्यता अपने आप में कोई बड़ी समस्या नहीं है लेकिन तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि व्यक्ति का चरित्र कैसा है। अगर कोई धोखेबाज है या नीच चरित्र वाला है—अगर वह बेशर्मी से मोटी चमड़ी वाला है, संदेह करने की प्रवृत्ति वाला है, संवेदनशील है, जिद्दी है या यहाँ तक कि शातिर स्वभाव का भी है—तो वह व्यक्ति किसी भी तरह से अच्छा नहीं है। इसलिए, यह जरूरी नहीं है कि अयोग्य व्यक्ति अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति हो। ठीक है, अयोग्यता पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है।

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