परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है (भाग एक)

जिन लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता, वे कितने भी लंबे समय से उसमें विश्वास रख लें, वे नहीं बदलेंगे। केवल परमेश्वर का भय मानने वाले लोग ही पवित्र आत्मा का कार्य पाकर उद्धार के मार्ग पर कदम रख सकते हैं। मनुष्य के पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल का होना कितना अहम है न! कुछ लोग खुद को कभी भी क्यों नहीं जान पाते? इसलिए कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता। कुछ लोग कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य क्यों प्राप्त नहीं कर पाते? इसलिए कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता। सिर्फ वे ही लोग जिनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, अक्सर आत्मचिंतन कर खुद को जानने में समर्थ हो पाते हैं; वे हमेशा गलतियाँ करने या गलत रास्ते पर चलने से डरते हैं। जब उनके साथ ऐसा कुछ घटता है, जिसमें उन्हें विकल्प चुनने पड़ते हैं, तो वे परमेश्वर का अपमान करने के बजाय मनुष्य का अपमान करना पसंद करते हैं, परमेश्वर से दूर होने या उसे धोखा देने के बजाय उत्पीड़न सहना पसंद करते हैं। अय्यूब ऐसा व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, और उसे परमेश्वर की स्वीकृति मिली।

परमेश्वर में अपने विश्वास से अगर तुम्हें उद्धार प्राप्त करना है, तो तुम्हारा अनुभव कहाँ से शुरू होना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना स्वीकार करने, खुद का सच्चा ज्ञान पाने और सच्चे दिल से प्रायश्चित्त करने से शुरू करना चाहिए—यह उद्धार के मार्ग पर कदम रखना है। लोगों के लिए खुद को जानना आसान नहीं है; उनके लिए खुद के भ्रष्ट स्वभाव और सार को जानना और यह जानना कि परमेश्वर के सामने, सृष्टिकर्ता के सामने वे कितने लघु और तुच्छ हैं, और भी कठिन है। अगर लोग अपने खुद के भ्रष्ट स्वभाव या भ्रष्ट सार को नहीं जान सकते, तो फिर क्या वे जान सकेंगे कि परमेश्वर के साथ उनका संबंध किस तरह का है, परमेश्वर के सामने उनका कद क्या है, और क्या परमेश्वर उनसे प्रेम करता है? (वे नहीं जान सकेंगे।) तो इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद उन्होंने क्या प्राप्त किया है? क्या उन्होंने सत्य प्राप्त किया है? क्या वे उद्धार के मार्ग पर कदम रख पाए हैं? परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, अगर वे उसके वचनों को खाते और पीते हैं, कलीसियाई जीवन जीते हैं और अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो क्या इसका मतलब परमेश्वर के साथ संबंध होना है? सृष्टिकर्ता के साथ संबंध रखने के लिए एक व्यक्ति क्या कर सकता है, उसे किसका अनुसरण करना चाहिए, किस ओहदे पर रहना चाहिए, और अपना मार्ग कैसे चुनना चाहिए। क्या तुम लोग जानते हो? तुम लोग जवाब नहीं दे सकते। लगता है तुम लोगों में बहुत अधिक कमी है, यानी तुम लोग जिन बहुत-सी चीजों को नहीं समझते हो उनमें सत्य खोजने या उन पर संगति करने पर ध्यान नहीं देते हो, इसलिए तुम्हारे कलीसियाई जीवन में विवरणों की कमी है और इसके नतीजे संभवतः बहुत अच्छे नहीं हो सकते हैं। तुम्हारे होंठों पर ऐसे आध्यात्मिक शब्द और कथन हैं जो अक्सर परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोग बोलते हैं, मगर तुम लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते, न ही तुम अपनी खुद की आत्मा में लौटते हो और न ही शांत होकर यह मनन करते हो : “परमेश्वर के कहे इन वचनों का क्या अर्थ है? मैं अपने वास्तविक जीवन में इनका प्रयोग कैसे कर सकता हूँ? मैं इन वचनों को पुख्ता कैसे कर सकता हूँ—मैं इन्हें वास्तविकता में कैसे बदल सकता हूँ? मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ कि ये वचन सिर्फ धर्म-सिद्धांत और सिद्धांत बनकर न रह जाएँ, बल्कि मेरे जीवन का अंश बन जाएँ, वह दिशा बन जाएँ जिधर मुझे चलना है? मुझे कैसा व्यवहार करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन मेरे जीवन का अंश बन जाएँ?” अगर तुम लोग ऐसी बातों पर चिंतन-मनन कर सको, तो तुम अनेक विवरणों को तर्कसंगत ढंग से समझ सकोगे। लेकिन आमतौर पर तुम लोग ऐसी चीजों पर कभी चिंतन-मनन नहीं करते, इसलिए सामान्य रूप से जिन अधिकतर सत्यों पर चर्चा की जाती है, तुम उनकी शाब्दिक समझ पर ही रुक जाते हो। अगर लोग शाब्दिक समझ पर रुक जाएँ, तो दूसरे लोग उनके बारे में क्या देख पाएँगे? लोग अक्सर आध्यात्मिक सिद्धांतों, आध्यात्मिक शब्दावली, और आध्यात्मिक कहावतों के बारे में प्रचार करते हैं, लेकिन उनके जीवन में, तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने या परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने की वास्तविकता नहीं देख सकते। आज तुम लोग एक बहुत बड़ी समस्या का सामना कर रहे हो। वह समस्या क्या है? समस्या यह है कि चूँकि तुम लोग थोड़े-से धर्म-सिद्धांत का उपदेश देने में सक्षम हो और कुछ आध्यात्मिक कथनों की समझ रखते हो और खुद को जानने के अपने अनुभवों के बारे में थोड़ी बात कर सकते हो, इसलिए तुम्हें लगता है कि तुम सत्य को समझते हो, परमेश्वर में तुम्हारी आस्था एक निश्चित स्तर पर पहुँच गई है, तुम लोग ज्यादातर लोगों से ऊपर हो, लेकिन असल में तुम लोगों ने सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है और अगर लोग तुम्हें सहारा और पोषण न दें, तुम्हारे साथ सत्य की संगति न करें और तुम्हें मार्गदर्शन न दें तो तुम लोग एकदम से ठहर जाओगे और पतित हो जाओगे। तुम लोग परमेश्वर की गवाही देने के कार्य की जिम्मेदारी लेने में असमर्थ हो, तुम परमेश्वर का आदेश पूरा करने में सक्षम नहीं हो, फिर भी, अंदर से तुम लोग अभी भी अपने बारे में ऊँची राय रखते हो, तुम्हें लगता है कि तुम ज्यादातर लोगों से ज्यादा समझते हो—लेकिन वास्तव में तुम लोगों में आध्यात्मिक कद की कमी है, तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, और केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत समझने में सक्षम होने से ही तुम अहंकारी हो गए हो। इस तरह की दशा में प्रवेश करते ही लोग जब यह सोचते हैं कि वे पहले ही सत्य हासिल कर चुके हैं और वे आत्म-संतुष्ट हो जाते हैं तो वे किस तरह के खतरे में होते हैं? अगर कोई चिकनी-चुपड़ी बातें करने वाला नकली अगुआ या मसीह-विरोधी वास्तव में दिखाई दे जाए तो तुम लोग निस्संदेह गुमराह हो जाओगे और उसका अनुसरण करने लगोगे। यह खतरनाक है, है न? तुम लोगों के अहंकारी, आत्मतुष्ट और आत्मसंतुष्ट होने की संभावना है—उस स्थिति में, क्या तुम लोग परमेश्वर से भटक नहीं जाओगे? क्या तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात करके अपने रास्ते नहीं चल दोगे? तुम लोगों में सत्य वास्तविकता नहीं है, और तुम परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ हो; तुम केवल अपनी गवाही देकर खुद का दिखावा कर सकते हो—तो क्या तुम खतरे में नहीं हो? इसके अलावा, अगर तुम लोग इस हालत में फँसे हुए हो, तो तुम कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करोगे? कहने की जरूरत नहीं कि सबसे पहले, तुम एक अहंकारी और आत्मतुष्ट स्वभाव प्रकट करोगे; क्या तुम लोग अपने पद का दिखावा नहीं करोगे, अपनी वरिष्ठता पर नहीं इतराओगे? क्या तुम ऊँचे रुतबे से लोगों को भाषण नहीं दोगे? अगर तुम ऐसा भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो, तो क्या परमेश्वर तुमसे घृणा नहीं करेगा? अगर कोई व्यक्ति खास तौर पर अहंकारी और आत्मतुष्ट है, और आत्म-परीक्षण नहीं करता, तो क्या यह संभव नहीं कि परमेश्वर उसे तिरस्कृत कर दे? सच में यह बहुत संभव है। उदाहरण के लिए : हो सकता है, तुम लोगों ने कई वर्षों तक अपने कर्तव्य निभाए हों, लेकिन तुम्हारे जीवन प्रवेश में कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है, तुम केवल कुछ सतही सिद्धांत समझते हो, और तुम्हें परमेश्वर के स्वभाव और सार का कोई सच्चा ज्ञान नहीं है, तुमने कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं की है—अगर आज तुम लोगों का यह आध्यात्मिक कद है, तो तुम्हारे क्या करने की संभावना होगी? तुम लोगों में कौन-सी भ्रष्टताएँ प्रकट होंगी? (अहंकार और दंभ।) क्या तुम्हारा अहंकार और दंभ घनीभूत होंगे, या अपरिवर्तित रहेंगे? (वे घनीभूत होंगे।) वे घनीभूत क्यों होंगे? (क्योंकि हम खुद को अत्यधिक योग्य समझेंगे।) और लोग किस आधार पर अपनी ही योग्यता के स्तर को परखते हैं? इस पर कि उन्होंने कोई कर्तव्य विशेष कितने वर्षों तक किया है, कितना अनुभव प्राप्त किया है, है न? अगर बात ऐसी है तो, क्या तुम लोग धीरे-धीरे वरिष्ठता को ध्यान में रखकर सोचना शुरू नहीं कर दोगे? उदाहरण के लिए, एक भाई ने कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया है और लंबे समय तक कर्तव्य निभाया है, इसलिए वह बात करने के लिए सबसे योग्य है; एक बहन को यहाँ कुछ ही समय हुआ है, और यूँ तो उसमें थोड़ी-सी काबिलियत है, पर उसे यह कर्तव्य निभाने का अनुभव नहीं है, और उसे परमेश्वर पर विश्वास किए लंबा समय नहीं हुआ है, इसलिए वह उसके बारे में बात करने के लिए सबसे कम योग्य है। बात करने के लिए सबसे योग्य इंसान मन में सोचता है, “चूँकि मेरे पास वरिष्ठता है, इसलिए इसका अर्थ है कि मेरा कर्तव्य निर्वहन मानक स्तर का है, और मेरा अनुसरण अपने चरम पर है, और ऐसा कुछ नहीं है जिसके लिए मुझे अनुसरण करना चाहिए या जिसमें मुझे प्रवेश करना चाहिए। मैंने यह कर्तव्य बखूबी निभाया है, मैंने यह काम कमोबेश पूरा कर दिया है, परमेश्वर को संतुष्ट होना चाहिए।” और इस तरह से वे आत्मसंतुष्ट होने लगते हैं। क्या यह इस बात का संकेत है कि उन्होंने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है? उनकी तरक्की बंद हो गयी है। उन्होंने अभी भी सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया है और फिर भी वे खुद को अत्यधिक योग्य समझते हैं, और वरिष्ठता को ध्यान में रखकर बात करते हैं, और परमेश्वर द्वारा पुरस्कार की प्रतीक्षा करते हैं। क्या यह अहंकारी स्वभाव का खुलासा नहीं है? जब लोग “अत्यधिक योग्य” नहीं होते, तो वे सतर्क रहना जानते हैं, वे खुद को गलतियाँ न करने की याद दिलाते हैं; जब वे खुद को अत्यधिक योग्य मान लेते हैं, तो वे अहंकारी हो जाते हैं, अपने बारे में ऊँची राय रखना शुरू कर देते हैं, और उनके आत्मसंतुष्ट होने की संभावना होती है। ऐसे समय, क्या यह संभव नहीं कि वे परमेश्वर से पुरस्कार और मुकुट माँगें, जैसा कि पौलुस ने किया था? (हाँ।) इंसान और परमेश्वर के बीच क्या संबंध है? यह सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणियों के बीच का संबंध नहीं है। यह एक लेन-देन के संबंध से ज्यादा कुछ नहीं है। और जब ऐसा होता है, तो लोगों का परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होता, और संभव है कि परमेश्वर उनसे अपना चेहरा छिपा ले—जो एक खतरनाक संकेत है।

कुछ लोग परमेश्वर को दरकिनार कर देते हैं, उसके चुने हुए लोगों को खुद नियंत्रित करने लगते हैं, जिस स्थान में लोग अपना कर्तव्य निभाते हैं उसे वे मसीह-विरोधियों के स्वतंत्र राज्य में बदल देते हैं; वे परमेश्वर की सेवा और आराधना करने वाली कलीसियाओं को धार्मिक संगठनों में बदल देते हैं। क्या ऐसे लोगों ने सत्य और जीवन में प्रवेश किया है? क्या ऐसे लोग परमेश्वर का अनुसरण या उसकी सेवा करते हैं या उसकी गवाही देते हैं? बिल्कुल नहीं। क्या वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं? (नहीं।) फिर वे क्या कर रहे हैं? क्या वे मनुष्य के उद्यम और कामकाज नहीं चला रहे हैं? तुम मनुष्य के उद्यमों और कामकाज को चाहे जितने भी अच्छे तरीके से चलाओ, अगर तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, और तुमने सत्य का अनुसरण करना बंद कर दिया है, तो क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर से तुम्हारा कोई संबंध नहीं है? क्या यह बड़ी भयावह बात नहीं है? जब कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास रखकर उसका अनुसरण करता है, तो उसे जिस बात का सबसे ज्यादा डर होना चाहिए वह है उसका परमेश्वर के वचनों और सत्य से दूर होकर इंसानी कामकाज और उद्यमों में शामिल होना। ऐसा करना अपने खुद के रास्ते से भटक जाना है। उदाहरण के लिए, मान लो कोई कलीसिया किसी अगुआ का चुनाव करती है। इस अगुआ को सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करना आता है, और वह सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे पर ध्यान देता है। वह जरा भी व्यावहारिक कार्य नहीं करता। फिर भी तुम लोग देखते हो कि वह शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार अच्छी तरह से करता है, सत्य के अनुरूप करता है और सब कुछ सही कहता है, इसलिए तुम उसे बहुत सराहते हो, तुम्हें लगता है कि वह एक अच्छा अगुआ है। तुम उसकी सारी बातें मानते हो, और आखिरकार, तुम उसका अनुसरण करते हो, पूरी तरह से उसकी आज्ञा मानते हो। तो क्या तुम एक झूठे अगुआ द्वारा गुमराह और नियंत्रित नहीं किए जा रहे हो? और वह कलीसिया क्या एक धार्मिक समूह नहीं बन गयी है जिसका प्रमुख एक झूठा अगुआ है? एक झूठे अगुआ वाले धार्मिक समूह के सदस्य अपना कर्तव्य निभाते-से लग सकते हैं, मगर क्या वे सच में अपना कर्तव्य निभा रहे होते हैं? क्या वे सच में परमेश्वर की सेवा कर रहे होते हैं? (नहीं।) अगर ये लोग परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हैं या अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे हैं, तो क्या परमेश्वर से उनका कोई संबंध है? जिस गिरोह का परमेश्वर से कोई संबंध नहीं, क्या वह गिरोह परमेश्वर में विश्वास रखता है? बताओ भला, क्या किसी झूठे अगुआ के अनुयायियों या किसी मसीह-विरोधी के अधीन रहने वाले लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य है? यकीनन नहीं। और भला किस कारण से उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है? क्योंकि वे परमेश्वर के वचनों से भटक चुके हैं, वे परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते या उसकी आराधना नहीं करते, मगर झूठे चरवाहों और मसीह-विरोधियों की बातें मानते हैं—इसलिए परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है और उन पर आगे कोई कार्य नहीं करता। वे परमेश्वर के वचनों से भटक गए हैं, और उसने उन्हें तिरस्कृत कर दिया है, और उन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य खो दिया है। तो क्या वे परमेश्वर द्वारा बचाए जा सकेंगे? (नहीं।) नहीं बचाए जा सकते, यानी दिक्कत होगी। इसलिए कलीसिया में चाहे जितने भी लोग अपना कर्तव्य निभा रहे हों, उनका बचाया जाना अहम तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि वे सच में मसीह का अनुसरण करते हैं या किसी व्यक्ति का, वे सच में परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सत्य का अनुसरण कर रहे हैं या धार्मिक गतिविधियों, इंसानी कामकाज और उद्यमों में शामिल हो रहे हैं। यह अहम तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वे सत्य को स्वीकार कर उसका अनुसरण कर सकते हैं, और क्या वे समस्याओं का पता चलने पर उन्हें सुलझाने के लिए सत्य खोज सकते हैं। ये बातें सबसे ज्यादा अहम हैं। लोग किसका अनुसरण करते हैं और वे किस मार्ग पर चलते हैं, वे वास्तव में सत्य स्वीकारते हैं या उसे त्याग देते हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं या उसका विरोध करते हैं—परमेश्वर लगातार इन सब बातों की पड़ताल करता रहता है। परमेश्वर हर कलीसिया और हर व्यक्ति पर नजर रखता है। कलीसिया में चाहे जितने लोग कोई कर्तव्य निभा रहे हों या परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हों, जैसे ही वे परमेश्वर के वचनों से भटकते हैं, जैसे ही वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवाते हैं, वे परमेश्वर के कार्य को अनुभव करना बंद कर देते हैं और इस प्रकार उनका—और उनके द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य का—परमेश्वर के कार्य से कोई संबंध या इसमें कोई हिस्सा नहीं रह जाता है, ऐसे में यह कलीसिया एक धार्मिक समूह बन चुकी है। अच्छा बताओ, अगर कलीसिया एक धार्मिक समूह बन जाए तो उसके क्या परिणाम होते हैं? क्या तुम लोग यह नहीं कहोगे कि ये बहुत बड़े खतरे में हैं? कोई समस्या आने पर वे कभी भी सत्य की खोज नहीं करते, और सत्य सिद्धांतों के आधार पर कार्य नहीं करते, बल्कि वे मनुष्यों की व्यवस्थाओं और चालाकियों में फँस जाते हैं। बहुत-से ऐसे भी हैं जो अपना कर्तव्य निभाते समय कभी भी प्रार्थना या सत्य सिद्धांतों की खोज नहीं करते; वे सिर्फ दूसरों से पूछकर उनके अनुसार चलते रहते हैं, उनकी भाव-भंगिमा देखकर सब कुछ करते रहते हैं। दूसरे लोग उन्हें जो करने को कहते हैं, वे वही करते हैं। उन्हें लगता है कि अपनी समस्याओं के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करना और सत्य की खोज एक अस्पष्ट-सी और मुश्किल चीज है, इसलिए वे कोई सीधा-सादा और आसान हल तलाशते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरों पर निर्भर रहना और उनके अनुसार चलते रहना आसान और सर्वाधिक व्यावहारिक है और इसलिए वे वही करते हैं जो दूसरे लोग कहते हैं, हर काम में दूसरों से पूछते रहते हैं और वैसा ही करते रहते हैं। परिणामस्वरूप, वर्षों के विश्वास के बाद भी, जब भी उन्हें किसी समस्या का सामना करना पड़ा, उन्होंने कभी भी परमेश्वर के सम्मुख आकर प्रार्थना नहीं की और उसकी इच्छाओं और सत्य को जानने की कोशिश नहीं की, ताकि उन्हें सत्य की समझ आ सके, और वे परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य और व्यवहार कर सकें—उन्हें कभी भी ऐसा कोई अनुभव नहीं हो पाया। क्या ऐसे लोग सचमुच परमेश्वर में आस्था का अभ्यास करते हैं? मैं सोचता हूँ : ऐसा क्यों है कि कुछ लोग एक धार्मिक समूह में प्रवेश करने के बाद परमेश्वर में विश्वास रखने से लेकर किसी व्यक्ति में विश्वास रखने की ओर, परमेश्वर का अनुसरण करने से लेकर किसी व्यक्ति का अनुसरण करने की ओर इतने प्रवृत्त होते हैं? वे इतनी जल्दी कैसे बदल जाते हैं? अनेक वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, अभी भी वे क्यों हर चीज में किसी व्यक्ति की बात मानेंगे और उसका अनुसरण करेंगे? इतने वर्षों के विश्वास के बावजूद उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कभी भी कोई स्थान नहीं रहा। वे जो कुछ भी करते हैं उनमें से किसी भी काम का परमेश्वर से कोई संबंध नहीं होता और उसके वचनों से भी कोई लेना-देना नहीं होता। उनके भाषण, क्रियाकलाप, जीवन, आचरण, मामलों से निपटना, यहाँ तक कि उनका कर्तव्य निर्वहन और परमेश्वर की सेवा, उनके सारे कार्य और कर्म, उनका पूरा व्यवहार, उनसे प्रकट हुई हर सोच और विचार—किसी का भी परमेश्वर में विश्वास से या उसके वचनों से कोई संबंध नहीं होता। क्या ऐसा व्यक्ति परमेश्वर का एक ईमानदार विश्वासी है? क्या परमेश्वर में विश्वास के साथ बिताए उस व्यक्ति के वर्षों की संख्या उसका आध्यात्मिक कद तय कर सकती है? क्या यह साबित कर सकती है कि परमेश्वर से उसका संबंध सामान्य है? बिल्कुल नहीं। कोई व्यक्ति ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास रखता है या नहीं, यह देखने के लिए इस बात पर गौर करना सबसे अहम है कि क्या वह परमेश्वर के वचनों को दिल से स्वीकार कर सकता है, और क्या वह उसके वचनों के बीच जी सकता है और उसके कार्य का अनुभव कर सकता है।

इस बात पर चिंतन-मनन करो : परमेश्वर में विश्वास रखते समय अगर तुम सिर्फ धार्मिक संस्कारों में शामिल होते हो और सिर्फ कुछ विनियमों का पालन करते हो; अपना कर्तव्य निभाते समय और कार्य करते समय अगर तुम सत्य सिद्धांतों पर ध्यान दिए बिना सिर्फ दिखावा करते हो; अगर तुम सत्य पर संगति करते समय सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करते हो, मगर तुम्हारे पास कोई व्यावहारिक ज्ञान नहीं है; अगर सुसमाचार का प्रचार करते समय और गवाही देते समय तुम्हारी संगति के कथन सतही हैं; अगर तुम लोगों का पोषण कर उन्हें सहारा देने के लिए सिर्फ आध्यात्मिक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों की बात करते हो—तो क्या तुम परिणाम पा सकोगे? परमेश्वर में विश्वास रखते समय अगर तुम सिर्फ बाहरी आध्यात्मिकता का अनुसरण करते हो, तो क्या तुम्हारा ऐसा विश्वास परमेश्वर के कार्य का अनुभव है? क्या इस प्रकार अपना कर्तव्य निभाकर तुम सत्य प्राप्त कर सकते हो? क्या यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास है? (नहीं।) वास्तव में परमेश्वर में सच्चा विश्वास क्या है? तुम लोगों ने अनेक वर्षों से परमेश्वर का अनुसरण किया होगा, उसके अनेक वचन पढ़े होंगे, कुछ ज्यादा ही धर्मोपदेश सुने होंगे, और बहुत-से धर्म-सिद्धांत समझे होंगे—और जाहिर तौर पर तुममें से कुछ लोगों ने आंशिक रूप से सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया होगा—लेकिन क्या तुम लोग यह कहने की हिम्मत कर सकते हो कि तुमने उद्धार योग्य आध्यात्मिक कद हासिल कर लिया है? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम दोबारा शैतान द्वारा गुमराह होकर बंदी नहीं बना लिए जाओगे? क्या तुम आश्वस्त हो कि तुम दोबारा मनुष्य की आराधना कर उसका अनुसरण नहीं करोगे? क्या तुम यह सुनिश्चित कर सकते हो कि तुम मार्ग के अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करोगे, इससे बिल्कुल पीछे नहीं हटोगे, तुम धार्मिक लोगों की तरह, व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण करने के बजाय सिर्फ एक स्वर्गिक अज्ञात परमेश्वर में विश्वास नहीं रखोगे? हो सकता है तुम लोग देहधारी परमेश्वर का अनुसरण करते हो, मगर क्या तुम सत्य का अनुसरण कर रहे हो? क्या तुम परमेश्वर के सामने सच्चा समर्पण करने और उसका ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो? क्या अभी भी यह खतरा नहीं है कि तुम लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर जाओ? तुम लोगों को इन सभी बातों पर चिंतन-मनन करना चाहिए। आज तुम्हारे कौन-कौन से विश्वास के साधन, विचार और दशाएँ ईसाई धर्म के विश्वासियों के समान हैं या उनसे मिलते-जुलते हैं? किस चीज में तुम वही दशा साझा करते हो? अगर परमेश्वर में विश्वास रखने वाला कोई व्यक्ति सत्य का ऐसे पालन करता है मानो वह विनियमों का संकलन हो, तो क्या उसका विश्वास धार्मिक अनुष्ठान में संलग्न होने की ओर नहीं बढ़ेगा? (जरूर बढ़ेगा।) धार्मिक अनुष्ठानों का पालन ईसाई धर्म से बिल्कुल अलग नहीं है—ऐसा करने वाले लोग थोड़े ज्यादा उन्नत हैं और शिक्षण और सिद्धांत के मामले में तरक्की कर चुके हैं, और अपनी आस्था में थोड़े ज्यादा ऊँचे और उन्नत हैं। बस इतना ही है। परमेश्वर में विश्वास, अगर धार्मिक विश्वास, धर्मशास्त्र के अध्ययन, और विनियमों और अनुष्ठानों के संकलन में तब्दील हो जाता है, तो क्या यह ईसाई धर्म में तब्दील नहीं हो गया है? नई और पुरानी शिक्षाओं में अंतर है, लेकिन अगर तुम सत्य को सिर्फ धर्म-सिद्धांत समझते हो, और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का तरीका जानना तो दूर, यह भी नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास कैसे करें—और चाहे तुम कितने भी वर्ष परमेश्वर में विश्वास रखो, कितने भी कष्ट सहो, तुम्हारा व्यवहार कितना भी अच्छा हो, फिर भी सत्य की तुम्हारी समझ सच्ची नहीं है, तुमने सत्य हासिल नहीं किया है, या सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है—तो क्या विश्वास का तुम्हारा तरीका ईसाई धर्म वाला नहीं है? क्या यह ईसाई धर्म का सार नहीं है? (हाँ।) तो अपने क्रियाकलापों या अपने कर्तव्य निर्वहन में तुम्हारी ऐसी क्या दृष्टियाँ या दशाएँ हैं जो ईसाइयत के लोगों के समान या बिल्कुल वही होती हैं? (हम विनियमों का पालन कर खुद को शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से लैस करते हैं।) विनियमों का पालन, शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार, सत्य को शब्द और धर्म-सिद्धांत मान लेना—और क्या? (हम काम करने पर ध्यान देते हैं, जीवन प्रवेश पर नहीं।) तुम सिर्फ मेहनत करने पर ध्यान देते हो, जीवन प्राप्त करने या सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने पर नहीं—और क्या? (हम आध्यात्मिकता और अच्छे व्यवहार के प्रकटन पर ध्यान देते हैं।) अब तुम लोगों ने थोड़ा बता दिया है, इसलिए मैं उसे संक्षेप में पेश करूँगा : अच्छे व्यवहार के प्रकटन का अनुसरण करना, और खुद को आध्यात्मिकता की चादर में लपेटने की जबरदस्त कोशिश करना, और लोगों द्वारा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं में सही माने जाने वाले और उनके द्वारा समर्थन किए जाने वाले काम करना—यह झूठी आध्यात्मिकता का अनुसरण है। ऐसा व्यक्ति पाखंडी है, जो बड़े जोर-शोर से शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करता है, जो दूसरों को अच्छी चीजें करने और अच्छा इंसान बनने का निर्देश देता है, और जो आध्यात्मिक व्यक्ति होने का दिखावा करता है। फिर भी अपने आचरण में और मामलों से निपटने में और अपने कर्तव्य निर्वहन में, वह कभी भी सत्य नहीं खोजता, बल्कि शैतानी स्वभाव के साथ जीता है। उसके साथ कुछ भी घटित हो जाए, वह अपनी ही इच्छा से चलता है, परमेश्वर को किनारे कर देता है। वह कभी भी सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम नहीं करता; वह सिर्फ विनियमों का पालन करता है। वह सत्य को बिल्कुल नहीं समझता, न ही वह परमेश्वर के इरादों या मनुष्य से परमेश्वर के अपेक्षित मानकों को समझता है, या यह समझता है कि मनुष्य को बचाकर परमेश्वर क्या हासिल करेगा। वह कभी भी सत्य के इन विवरणों पर गंभीरता से गौर नहीं करता न ही इनके बारे में पूछता है। मनुष्य की ये तमाम बातें और व्यवहार जिस चीज का खुलासा करते हैं, वह पाखंड है। ऐसे लोगों के दिलों की सच्ची दशाओं और उनके बाहरी व्यवहार को देखकर, सुनिश्चित हुआ जा सकता है कि उनमें सत्य वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं है, वे दरअसल पाखंडी फरीसी हैं, छद्म-विश्वासी हैं। अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास तो रखता है मगर सत्य का अनुसरण नहीं करता, तो क्या उसका विश्वास सच्चा है? (नहीं।) क्या कोई व्यक्ति जो अनेक वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखता है, मगर सत्य को बिल्कुल स्वीकार न करे, तो क्या वह परमेश्वर का भय मान सकता है, और बुराई से दूर रह सकता है? (नहीं।) वह यह प्राप्त नहीं कर सकता। तो फिर ऐसे लोगों के व्यवहार की प्रकृति क्या है? वे किस प्रकार के मार्ग पर चल सकते हैं? (फरीसियों का मार्ग।) वे अपने आप को किस चीज से सज्जित करने में अपने दिन बिताते हैं? क्या ये शब्द और धर्म-सिद्धांत नहीं हैं? वे खुद को फरीसियों जैसा और अधिक बनाने, और अधिक आध्यात्मिक बनाने और परमेश्वर की सेवा करने वाले लोगों जैसा और अधिक बनाने के लिए खुद को शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से लैस और सुसज्जित करने में अपने दिन बिताते हैं—भला इन सब कर्मों की प्रकृति क्या है? क्या यह परमेश्वर की आराधना करना है? क्या यह उसमें सच्ची आस्था है? (नहीं, यह नहीं है।) तो, वे क्या कर रहे हैं? वे परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं; वे बस एक प्रक्रिया के चरण पूरे कर रहे हैं। वे आस्था का ध्वज लहरा रहे हैं और धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हैं, आशीषित होने का अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। ये लोग परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। अंत में, ऐसे लोगों के समूह का अंत ठीक प्रार्थनालयों के भीतर के उन लोगों की तरह होगा जो कथित रूप से परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसमें विश्वास रखते हैं और उसका अनुसरण करते हैं।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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