परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है (भाग दो)

व्यवस्था के युग में परमेश्वर में विश्वास रखने वाले धर्मशास्त्रियों और फरीसियों और आधुनिक ईसाई और कैथोलिक प्रार्थनालयों के पादरियों, एल्डरों, फादरों और बिशपों में क्या अंतर है? यानी यहोवा में विश्वास रखने और यीशु में विश्वास रखने में क्या अंतर है? जिस नाम में वे विश्वास रखते हैं उस नाम के अलावा, और क्या अंतर है? यहोवा में विश्वास रखने वाले लोग किससे जुड़े रहते थे? उनके विश्वास का तरीका क्या था? (उन्होंने व्यवस्था और आज्ञाओं को कायम रखा।) क्या पवित्र आत्मा का कार्य उन्हें समझ आया? क्या उन्हें अपना सलीब उठाकर चलने का मार्ग समझ आया? (नहीं, उन्हें समझ नहीं आया।) क्या वे जानते थे कि परमेश्वर ही सत्य, मार्ग और जीवन है? क्या उनके मन में ऐसी संकल्पना थी? क्या उन्हें वे संदेश मालूम थे जो यीशु में विश्वास रखने वालों ने सुने हैं? (उन्हें मालूम नहीं थे।) यीशु में विश्वास रखने वाले लोग उन्हें किस दृष्टि से देखते हैं? (वे पिछड़े हुए, रूढ़िवादी थे और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ नहीं चल पाए।) मुख्य बात यह है कि वे परमेश्वर के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाए। परमेश्वर ने कहा कि मसीहा आएगा, और जब वह देहधारी होकर आया तो उसे यीशु मसीह कहा गया। उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया, इसके बजाय उन्होंने अड़ियल बनकर उसका प्रतिरोध किया। उन्होंने स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु देहधारी परमेश्वर था, और उन्होंने उसे सूली पर चढ़ा दिया। वे पीछे रह गए और अनुग्रह के युग के आते-आते निकाल दिए गए। वे अनुग्रह के युग के संदेशों को नहीं जानते थे, जैसे कि छुटकारा, सलीब से उद्धार और पश्चात्ताप। क्या यह एक अंतर नहीं है? (है।) तो अनुग्रह के युग वाले लोग किस चीज की बात करते हैं? उनमें और व्यवस्था के युग वाले विश्वासियों के बीच क्या अंतर है? वे और क्या जानते हैं? अव्वल तो यह कि बाइबल पढ़ने पर गौर करें, तो वे पुराने और नए नियम पढ़ते हैं; जिस परमेश्वर में वे विश्वास रखते हैं उसके नाम पर गौर करें, तो वे अब परमेश्वर को सिर्फ यहोवा नाम से नहीं पुकारते, इसके बजाय मुख्य रूप से वे उसे यीशु मसीह पुकारते हैं। वे किस पर अमल करते हैं? पाप‑स्वीकारोक्ति और पश्चात्ताप, धैर्य और विनम्रता; वे स्नेही हैं, आदेशों का पालन करते हैं, अपना सलीब उठाते हैं, सलीब की यातना सहने के मार्ग पर चलते हैं, और मृत्यु के बाद स्वर्ग में आरोहण करने की बाट जोहते हैं। कई मायनों में वे व्यवस्था के युग के विश्वासियों से अलग हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में, और पवित्र आत्मा द्वारा पूरित होकर, उसकी अगुवाई में चलने की बात करते हैं; वे प्रार्थना करने और प्रभु यीशु के नाम पर कर्म करने और सुसमाचार का प्रचार करने की बात करते हैं। वे जिन चीजों की बात करते हैं, वे व्यवस्था के युग की चीजों से बिल्कुल भिन्न हैं, लेकिन अंत में, वे परमेश्वर से यहूदी आस्था के लोगों वाले निष्कर्ष ही प्राप्त करते हैं—वे भी एक धार्मिक समूह के सदस्य हैं। यह कैसा मामला है? व्यवस्था के युग के वे यहूदी फरीसी, मुख्य याजक, और धर्मशास्त्री, नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते थे, लेकिन उन्होंने उसके मार्ग को पीठ दिखाई, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर को सूली पर चढ़ा दिया। तो क्या उनके विश्वास को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकती थी? (नहीं।) परमेश्वर ने उन्हें पहले ही यहूदी आस्था के लोगों के रूप में, एक धार्मिक समूह के सदस्यों के रूप में निरूपित कर रखा था। और इसी तरह आज परमेश्वर, यीशु में विश्वास रखने वालों को एक धार्मिक समूह के सदस्यों के रूप में देखता है, इस अर्थ में कि वह उन्हें अपनी कलीसिया के सदस्यों के रूप में या अपने विश्वासियों के रूप में स्वीकार नहीं करता। परमेश्वर धार्मिक जगत की इस प्रकार निंदा क्यों करता होगा? इसलिए कि धार्मिक समूहों के सभी सदस्यों, विशेष तौर पर विभिन्न संप्रदायों के उच्च-स्तरीय अगुआओं के पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता, न ही वे परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करने वाले होते हैं। वे सब छद्म-विश्वासी हैं। वे देहधारण में विश्वास नहीं करते हैं, सत्य को स्वीकारना तो दूर की बात है। वे कभी नहीं खोजते, सवाल नहीं पूछते, जाँच नहीं करते या अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य या उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, इसके बजाय वे अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के कार्य की भर्त्सना और ईशनिंदा करते हैं। इसमें व्यक्ति स्पष्ट तौर पर देख सकता है कि वे शायद परमेश्वर में नाममात्र के लिए विश्वास रखते हों, मगर परमेश्वर उन्हें अपने विश्वासियों के रूप में स्वीकार नहीं करता है; वह कहता है कि वे कुकर्मी हैं, कि वे जो भी करते हैं उसका उसके उद्धार के कार्य से जरा भी संबंध नहीं है, वे गैर-विश्वासी हैं जो उसके वचनों से बाहर हैं। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो जैसा कि तुम अभी रखते हो, तो क्या वह दिन नहीं आएगा जब तुम लोग भी बस धार्मिक अनुयायी बन कर रह जाओगे? धर्म के भीतर रहकर परमेश्वर में विश्वास रखने से उद्धार प्राप्त नहीं हो सकता—ऐसा आखिर क्यों है? अगर तुम लोग नहीं बता सकते कि ऐसा क्यों है, तो यह दर्शाता है कि तुम लोग बिल्कुल भी न तो सत्य समझते हो, न ही परमेश्वर के इरादे समझते हो। परमेश्वर में विश्वास के साथ सबसे बड़ी त्रासदी यही हो सकती है कि वह धर्म बनकर रह जाए और परमेश्वर उसे खत्म कर दे। मनुष्य के लिए यह अकल्पनीय है, और जो लोग सत्य नहीं समझते, वे इस मामले को कभी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते। मुझे बताओ, जब एक कलीसिया परमेश्वर की दृष्टि में धीरे-धीरे धर्म में तब्दील हो चुकी होती है और अपनी स्थापना के बाद बहुत सारे वर्षों से गुजरकर एक संप्रदाय बन चुकी होती है तो क्या इसके लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र हैं? क्या वे उसके परिवार के सदस्य हैं? (नहीं।) वे सदस्य नहीं हैं। ये लोग, जो सच्चे परमेश्वर में केवल नाममात्र के लिए विश्वास रखते हैं, फिर भी वह उन्हें धार्मिक दिखावे वाले लोग मानता है; ये किस मार्ग पर चलते हैं? जिस मार्ग पर वे चलते हैं उस पर वे परमेश्वर में विश्वास की पताका लिए होते हैं, फिर भी वे कभी उसके मार्ग का अनुसरण नहीं करते; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे उसमें विश्वास तो रखते हैं फिर भी उसकी आराधना नहीं करते, यहाँ तक कि वे उसे त्याग देते हैं; यह ऐसा मार्ग है जिस पर वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी उसका प्रतिरोध करते हैं, परमेश्वर के नाम में, सच्चे परमेश्वर में नाममात्र के लिए विश्वास रखते हैं, फिर भी शैतान और दानवों की आराधना करते हैं, और अपने मानवीय उद्यम को संचालित करते हुए एक स्वतंत्र मानवी राज्य की स्थापना करते हैं। यही वो मार्ग है जिस पर वे चलते हैं। उनके चलने का मार्ग देखने से यह स्पष्ट है कि वे छद्म-विश्वासियों का जत्था हैं, मसीह-विरोधियों का गिरोह हैं, उन शैतानों और दानवों का समूह हैं जो स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उसके कार्य को बाधित करने के लिए निकल पड़े हैं। धार्मिक जगत का यही सार है। क्या ऐसे लोगों के समूह का मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की प्रबंधन योजना से कोई सरोकार है? (नहीं।) अगर परमेश्वर के विश्वासियों ने, वे चाहे जितने भी हों, अपने विश्वास को परमेश्वर से एक धार्मिक समूह के विश्वास के रूप में निरूपित करा दिया तो ये लोग परमेश्वर के कार्य और उद्धार के पात्र नहीं हैं और परमेश्वर इस बारे में पहले ही मन बना चुका है—इन लोगों को बचाया नहीं जा सकता। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन के बिना एक समूह जो बिल्कुल भी न उसके सामने समर्पण करता है और न उसकी आराधना करता है, शायद वह नाममात्र के लिए उसमें विश्वास रखता हो, लेकिन वह धर्म के पादरियों और एल्डरों का ही अनुसरण और पालन करता है, और धर्म के पादरी और एल्डर अपने सार से ही शैतान के और पाखंडी होते हैं। इसलिए, वे लोग जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं। वे अपने दिलों में परमेश्वर में विश्वास का अभ्यास करते हैं, लेकिन दरअसल, मनुष्य उनके साथ हेर-फेर करता है, वे इंसानी आयोजनों और वर्चस्व के अधीन होते हैं। तो, अनिवार्यतः वे जिनका अनुसरण और पालन करते हैं वे शैतान और दानव हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली दुराचारी शक्तियाँ हैं, और परमेश्वर के शत्रु हैं। क्या परमेश्वर ऐसे लोगों के गिरोह को बचाएगा? (नहीं।) क्यों नहीं? देखो, क्या ऐसे लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं? नहीं; वे पश्चात्ताप नहीं करेंगे। वे परमेश्वर में आस्था की पताका के नीचे इंसानी कामकाज और उद्यमों से जुड़ जाते हैं, जोकि मनुष्य के उद्धार हेतु परमेश्वर की प्रबंधन योजना के विपरीत है, जिसका अंतिम परिणाम यह होता है कि परमेश्वर उन्हें ठुकरा देगा। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को बचाना असंभव है; वे पश्चात्ताप करने में सक्षम नहीं हैं और चूँकि वे शैतान के कब्जे में आ गए हैं, इसलिए परमेश्वर इन लोगों को उसे ही सौंप देता है। परमेश्वर में किसी की आस्था को परमेश्वर की स्वीकृति मिल सकेगी या नहीं, क्या यह उसकी परमेश्वर में आस्था की अवधि पर निर्भर करता है? क्या यह किसी के द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों या माने जाने वाले विनियमों के प्रकार पर निर्भर करता है? क्या परमेश्वर इंसानी प्रथाओं को देखता है? क्या वह उनकी संख्या देखता है? (नहीं।) तो फिर वह किस बात पर गौर करता है? जब परमेश्वर लोगों के एक समूह को चुनता है, तो वह किस आधार पर यह मापता है कि उन्हें बचाया जा सकता है कि नहीं और वह उन्हें बचाएगा कि नहीं? यह इस पर आधारित है कि वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं कि नहीं; यह उस मार्ग पर आधारित है जिस पर वे चलते हैं। हालाँकि परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में मनुष्य को उतने सत्य नहीं बताए होंगे, जितने वह आज बताता है, और हालाँकि वे इतने विनिर्दिष्ट नहीं थे, फिर भी वह उस समय भी मनुष्य को पूर्ण करने में सक्षम था, और ऐसे लोग भी थे जो बचाए जा सके। तो आज के युग के लोग, जिन्होंने इतने सत्य सुने हैं और जो परमेश्वर के इरादे समझते हैं, अगर उसके मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते, या उद्धार के मार्ग पर नहीं चल सकते, तो अंत में उनका परिणाम क्या होगा? उनका अंतिम परिणाम वैसा ही होगा जैसा ईसाई धर्म और यहूदी धर्म के विश्वासियों का हुआ—उन्हीं की तरह उन्हें भी बचाया नहीं जा सकेगा। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है। तुमने चाहे जितने भी धर्मोपदेश सुने हों, जितने भी सत्य समझ लिए हों, कोई फर्क नहीं पड़ता—अगर तुम अभी भी मनुष्य का अनुसरण करते हो, अभी भी शैतान का अनुसरण करते हो, और अंत में परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम नहीं हो पाते हो, न ही उसका भय मान पाते हो, और बुराई से दूर रह पाते हो, तो ऐसे लोगों को परमेश्वर ठुकरा देता है। संभव है धर्म के लोग बाइबल के विशाल ज्ञान का प्रचार करने में सक्षम हों, और वे कुछ आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत समझते हों, लेकिन वे परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर पाते, उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव नहीं कर पाते, या सच्चे दिल से उसकी आराधना नहीं कर पाते, न ही वे उसका भय मान पाते हैं और न बुराई से दूर रह पाते हैं। वे सब पाखंडी हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सच्चे दिल से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, ऐसे लोगों को एक संप्रदाय, एक इंसानी समूह या इंसानी गिरोह और शैतान के बसेरे के रूप में परिभाषित किया जाता है। सामूहिक रूप में, वे शैतान के गिरोह हैं, मसीह-विरोधियों का राज्य हैं, और परमेश्वर उन्हें पूरी तरह ठुकरा देता है।

फिलहाल, तुम लोगों के लिए सबसे जरूरी काम सत्य का अनुसरण करना है। एक ओर, अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें देर नहीं करनी चाहिए और दूसरी ओर तुम्हें अल्प समय में यह यत्न जरूर करना चाहिए कि तुम उद्धार के मार्ग पर कदम रख लो और परमेश्वर द्वारा त्यागे न जाओ। अगर ऐसा हुआ तो बहुत भयावह होगा! यह तुम्हारा आखिरी और हाथ से छूटता हुआ मौका है क्योंकि परमेश्वर अंत के दिनों में उद्धार का कार्य कर रहा है। अगर परमेश्वर तुम्हें ऐसा व्यक्ति तय कर देता है जिसने कभी भी उसके मार्ग का अनुसरण नहीं किया, जिसने कभी उसका भय नहीं माना, न ही बुराई से दूर रहा, और जब वह तुम्हें त्याग देने का फैसला लेता है, तो वह अब तुम्हें फटकारेगा नहीं, अनुशासित नहीं करेगा, तुम्हारी काट-छाँट नहीं करेगा, तुम्हारा न्याय नहीं करेगा, तुम्हें ताड़ना नहीं देगा—वह तुम्हें पूरी तरह त्याग देगा। उस वक्त, तुम पूरी तरह आजाद महसूस करोगे। अब कोई तुम पर नजर नहीं रखेगा। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास के तरीके में कोई दखल नहीं देगा; तुम चाहे जो बुरा करो, कोई फटकार नहीं पड़ेगी। अपने कर्तव्य निभाते समय अगर तुम समर्पित नहीं हो या सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं की संतुष्टि खोजते हो, या कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी या बाधा डालते हो, तो तुम्हें कोई फटकार नहीं मिलेगी और न ही तुम्हें कोई अनुशासित करेगा। अगर तुम्हारे दिल में परमेश्वर के बारे में कुछ धारणाएँ हैं, तो भी तुम्हें कोई फटकार नहीं मिलेगी और न ही तुम्हें कोई अनुशासित करेगा। अगर तुम काट-छाँट किए जाने का प्रतिरोध करते हो या इसे नकारते हो, पीठ पीछे लोगों का आकलन करते या उन्हें कमजोर बनाते हो, या उन्हें अपनी तरफ लुभाते हो, तो भी तुम्हें कोई फटकार नहीं मिलेगी और न ही तुम्हें कोई अनुशासित करेगा। यह किस बात का संकेत है? क्या यह एक अच्छा संकेत है? कोई तुम पर नजर नहीं रखता, कोई भी तुम्हारी काट-छाँट नहीं करता, परमेश्वर तुम्हें नहीं फटकारता। लगता है हर चीज तुम्हारे ढंग से हो रही है, और तुम जो भी चाहो कर सकते हो। जाहिर तौर पर यह अच्छा संकेत नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हें छोड़ देना चाहता है, तो तुम्हें फटकार नहीं मिलेगी, तुम अनुशासन महसूस नहीं करोगे, न ही अब तुम न्याय और ताड़ना महसूस करोगे। परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को त्याग दिए जाने का क्या अर्थ होता है? इसका अर्थ है कि इस व्यक्ति का कोई अंतिम परिणाम नहीं है, उसने उद्धार का अपना मौका खो दिया है। जब परमेश्वर किसी का त्याग कर देता है, तो सबसे पहले वह उसे फटकार महसूस नहीं करने देता; वह हर दिन खुद से बेहद खुश रहता है और सोचता है कि वह धन्य है, इसलिए वह यों ही देह-सुख में लिप्त हो जाता है, गिर जाता है, अपने दिल की इच्छाओं का अनुसरण करता है, जो चाहा जैसा चाहा करता है। वह जो भी स्वच्छंदता करना चाहे, उसे कोई फटकार नहीं मिलती, न ही कोई अनुशासन होता, और बेचैनी या सब कुछ ठीक न होने की भावना तो दूर की बात है। कोई व्यक्ति जो परमेश्वर की फटकार या अनुशासन छोड़ देता है, वह खतरे की कगार पर है। अपना अगला कदम वह कैसे रास्ते पर रखेगा? वह गिर जाता है, स्वच्छंद, विलासी होने लगता है, और उसकी बुराइयाँ कभी थमती नहीं। इसमें बड़ी मुसीबत है। बाहर से कुछ लोग काफी आरामदेह हालत में बेपरवाह-से जीते-से लगते हैं, मगर सत्य समझने वाले लोग समझ जाते हैं कि ऐसा व्यक्ति खतरे में है, परमेश्वर उसे नहीं चाहता—उसने उसे छोड़ दिया है, और वह व्यक्ति यह बात जानता ही नहीं! धार्मिक जगत के मसीह-विरोधी देहधारी परमेश्वर के वचनों और कार्य की आलोचना करते हुए, परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली बहुत-सी बुरी चीजें करते हुए अपना सारा दिन बिता देते हैं। हालाँकि अब उन्हें अनुशासन या फटकार नहीं मिलती, क्योंकि परमेश्वर उन्हें त्याग चुका है, और अंत में वे सब बहुत बड़े दंड के भागी होंगे, जिससे उनमें से एक भी बचकर निकल नहीं पाएगा। इस मामले से, क्या तुम परमेश्वर के इरादे और रवैये को समझ सकते हो? (बिल्कुल।) अगर अब परमेश्वर का अनुसरण करते समय तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो तुम भी उस जैसे मुकाम पर पहुँच सकते हो, और तब तुम खतरे में पड़ जाओगे; यह तय है कि तुम्हारा अंतिम परिणाम भी उस जैसा ही होगा। इसलिए अभी सबसे जरूरी क्या काम है जो लोगों को करना चाहिए ताकि वे उस रसातल तक न डूबें, जहाँ परमेश्वर उन्हें त्याग दे? (हमें सत्य का अनुसरण करना चाहिए और उचित ढंग से अपना कर्तव्य निभाना चाहिए।) अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाने के अलावा, तुम्हें अक्सर परमेश्वर के सम्मुख आना चाहिए, उसके वचनों का खान-पान कर उस पर चिंतन-मनन करना चाहिए, उसके अनुशासन और मार्गदर्शन को स्वीकार करना चाहिए, और समर्पण का सबक सीखना चाहिए—यह बहुत जरूरी है। तुम्हें परमेश्वर द्वारा इंतजाम किए गए हर तरह के परिवेश, लोगों, घटनाओं और चीजों के सामने समर्पण करने में सक्षम होना चाहिए, और जब बात ऐसे मामलों की आए जिसकी थाह तक तुम न पहुँच सको तो तुम्हें सत्य खोजते समय अक्सर प्रार्थना करनी चाहिए; केवल परमेश्वर के इरादे समझकर ही तुम आगे का रास्ता पा सकते हो। तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए। तुम्हें जो करना चाहिए वो सावधानी और सतर्कता से करना चाहिए, और परमेश्वर के सामने समर्पण करने वाले दिल के साथ जीना चाहिए। उसके सामने अक्सर शांतचित्त होकर बैठो, स्वच्छंद मत बनो। कम-से-कम, तुम्हारे साथ कुछ घटने पर, पहले मन को शांत करो, फिर फौरन प्रार्थना करो, और प्रार्थना, खोज और प्रतीक्षा करके परमेश्वर के इरादे समझो। क्या यह परमेश्वर का भय मानने का रवैया नहीं है? अगर तुम दिल से परमेश्वर का भय मानकर उसके सामने समर्पण करते हो, और उसके सामने शांतचित्त होने और उसके इरादे समझने में सक्षम हो, तो इस तरह के सहयोग और अभ्यास से तुम्हारी रक्षा होगी, तुम प्रलोभित नहीं होगे, न ही ऐसा कुछ करोगे जिससे कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी या बाधा पैदा हो। जिन मामलों को तुम स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, उनका सत्य खोजो। आँखें बंद करके आलोचना या निंदा मत करो। इस प्रकार परमेश्वर तुमसे घृणा नहीं करेगा, या वह तुम्हें नहीं ठुकराएगा। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है तो तुम उसका अपमान करने से डरोगे, और तुम्हारे सामने कोई प्रलोभन आए, तो तुम परमेश्वर के सामने भय और आशंका के साथ जियोगे, और हर चीज में उसके सामने समर्पण करने और उसे संतुष्ट करने की लालसा रखोगे। जब एक बार तुम ऐसा अभ्यास करके अक्सर ऐसी दशा में जीने में सक्षम हो जाओगे, अक्सर परमेश्वर के सामने शांतचित्त हो सकोगे, और अक्सर उसके सामने आ सकोगे, तो तुम अनजाने ही प्रलोभन और बुराइयों से दूर रहोगे। परमेश्वर का भय मानने वाले दिल के बिना, या ऐसे दिल के साथ जो उसके सामने नहीं है, तुम कुछ बुराई करने में सक्षम हो। तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है और तुम उसे काबू में नहीं रख सकते, तो तुम बुराई करने में सक्षम होगे। अगर तुम गड़बड़ी या बाधा खड़ी करने वाली बुराई करते हो, तो क्या उसके परिणाम गंभीर नहीं होंगे? कम-से-कम, तुम्हें काटा-छाँटा जाएगा, और अगर जो तुमने किया वह गंभीर है, तो परमेश्वर तुम्हें ठुकरा देगा, और तुम्हें कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाएगा। लेकिन, अगर तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाला दिल है, और तुम्हारा दिल अक्सर परमेश्वर के सामने शांतचित्त हो सकता है, और अगर तुम परमेश्वर का भय मानते हो और उससे डरते हो, तो तब क्या तुम बहुत-सी बुराइयों से बहुत दूर नहीं रह सकोगे? अगर तुम परमेश्वर का भय मानकर कहोगे, “मैं परमेश्वर से डरता हूँ; मैं उसका अपमान करने से डरता हूँ, उसके कार्य को बाधित करने और उसकी घृणा का पात्र बनने से डरता हूँ,” तो क्या यह तुम्हारे अपनाने के लिए एक सामान्य रवैया, एक सामान्य दशा नहीं है? वह क्या चीज है जिसने तुम्हारे मन में डर को जन्म दिया होगा? तुम्हारा डर परमेश्वर का भय मानने वाले दिल से उपजा होगा। अगर तुम्हारा दिल परमेश्वर से डरता है, तो सामने दिखाई पड़ने पर तुम बुरी चीजों से दूर रहोगे, उनसे बचोगे, और इस तरह तुम्हारी रक्षा होगी। क्या कोई व्यक्ति जिसका दिल परमेश्वर से नहीं डरता उसका भय मानेगा? क्या वह बुराई से दूर रहेगा? (नहीं।) क्या परमेश्वर का भय न मान सकने वाले और उससे न डरने वाले लोग धृष्ट लोग नहीं हैं? क्या धृष्ट लोग संयमित रह सकते हैं? (नहीं।) और जो लोग संयम में नहीं रह सकते, क्या वे क्षणिक आवेश में आकर जो भी मन में आता है, वह नहीं कर गुजरते? जब लोग अपनी इच्छा, अपने उत्साह, और अपने भ्रष्ट स्वभाव से कर्म करते हैं, तो वे क्या-क्या चीजें करते हैं? परमेश्वर की दृष्टि में वे बुरी चीजें हैं। तो, तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि मनुष्य के दिल में परमेश्वर का डर होना एक अच्छी बात है—इसके साथ वह परमेश्वर का भय मानने लग सकता है। जब किसी के दिल में परमेश्वर होता है, और वह परमेश्वर का भय मान सकता है, तो वह बुरी चीजों से बहुत दूर रहने में सक्षम होगा। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें बचाए जाने की आशा होती है।

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