पौलुस के प्रकृति सार को कैसे पहचानें (भाग दो)

पौलुस का एक और प्रसिद्ध वाक्यांश है—वह क्या है? (“क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1:21)।) उसने प्रभु यीशु मसीह की इस पहचान को स्वीकार नहीं किया कि प्रभु यीशु मसीह पृथ्वी पर सजीव देहधारी परमेश्वर था, न ही इस तथ्य को स्वीकार किया कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का मूर्तरूप था। इसके विपरीत, पौलुस स्वयं को मसीह के रूप में देखता था। क्या यह घृणास्पद नहीं है? (बिल्कुल है।) यही घृणास्पद है और इस समस्या का सार बहुत गंभीर है। पौलुस के मन में मसीह वास्तव में कौन था? उसकी पहचान क्या थी? पौलुस में मसीह होने की इतनी तीव्र इच्छा कैसे पैदा हुई थी? अगर पौलुस के मन में मसीह भ्रष्ट स्वभाव वाला कोई सामान्य व्यक्ति, या साधारण भूमिका निभाने वाला कोई महत्वहीन या कोई शक्तिहीन व्यक्ति, किसी तरह की श्रेष्ठ पहचान न रखने वाला, सामान्य लोगों की सीमा से परे कोई क्षमता या कौशल न रखने वाला व्यक्ति होता, तो क्या पौलुस तब भी मसीह बनना चाहता? (नहीं, वह ऐसा नहीं करना चाहता।) निश्चित रूप से वह ऐसा नहीं करता। वह स्वयं को सुशिक्षित समझता था और वह सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि अतिमानव या महान व्यक्ति बनना और दूसरों से आगे निकलना चाहता था—वह ऐसा मसीह कैसे बनना चाहता जिसे दूसरे लोग विनम्र और मामूली समझते हों? इसके मद्देनजर पौलुस के दिल में मसीह की क्या स्थिति और भूमिका रही होगी? मसीह होने के लिए किसी की क्या पहचान और स्थिति होनी चाहिए, और उसे कौन-से अधिकार, सामर्थ्य और प्रभाव प्रदर्शित करने चाहिए? इससे जाहिर होता है कि पौलुस ने मसीह के कैसा होने की कल्पना की थी, और वह मसीह के बारे में क्या जानता था, अर्थात्, वह मसीह को कैसे परिभाषित करता था। यही कारण है कि पौलुस में मसीह बनने की महत्वाकांक्षा और इच्छा थी। इसका एक निश्चित कारण है कि पौलुस मसीह क्यों बनना चाहता था, और यह उसके पत्रों में आंशिक रूप से प्रकट होता है। आओ, कुछ मामलों का विश्लेषण करें। जब प्रभु यीशु काम कर रहा था, तो उसने कुछ ऐसी चीजें कीं जो मसीह के रूप में उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व करती थीं। ये चीजें वे प्रतीक और अवधारणाएँ हैं जिन्हें पौलुस ने मसीह की पहचान के रूप में देखा। ये कौन-सी चीजें थीं? (संकेत और चमत्कार दिखाना।) बिल्कुल ठीक। ये चीजें थीं मसीह का लोगों की बीमारियाँ ठीक करना, दानवों को बाहर करना और संकेत दिखाना, आश्चर्यजनक काम और चमत्कार करना। भले ही पौलुस ने माना था कि प्रभु यीशु मसीह था, यह सिर्फ उसके द्वारा प्रदर्शित संकेतों और चमत्कारों के कारण हुआ था। इसलिए, जब पौलुस प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रचार करता था, तो वह कभी भी प्रभु यीशु के बोले वचनों या उसके दिए उपदेशों के बारे में बात नहीं करता था। छद्म-विश्वासी पौलुस की निगाह में प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति के प्रति एक निश्चित सम्मान इस तथ्य ने पैदा किया कि मसीह इतनी सारी बातें बोल सकता था, इतने अधिक उपदेश दे सकता था, इतने ज्यादा काम कर सकता था और इतने सारे लोगों को अपना अनुगामी बना सकता था; उसमें अनंत महिमा और श्रेष्ठता थी जिससे मनुष्यों के बीच प्रभु यीशु की स्थिति विशेष रूप से महान और प्रतिष्ठित हो गई थी। यही वह बात थी जिसे पौलुस ने देखा। अपने काम करते समय प्रभु यीशु मसीह ने जो व्यक्त और प्रकट किया, उसके साथ ही उसकी पहचान और सार से पौलुस ने जो देखा वह परमेश्वर का सार, सत्य, मार्ग या जीवन नहीं था, न ही परमेश्वर की मनोहरता या बुद्धि थी। पौलुस ने क्या देखा? आधुनिक शब्दों में कहें, तो उसे जो दिखा वह प्रसिद्धि की चमक थी, और वह प्रभु यीशु का प्रशंसक बनना चाहता था। जब प्रभु यीशु कुछ कहता या कोई काम करता था, तो बहुत-से लोग ध्यान से सुनते थे—वह सब कितना भव्य रहा होगा! यह कुछ ऐसी बात थी जिसकी पौलुस ने लंबे समय तक प्रतीक्षा की थी, उसे इस क्षण के आगमन की तीव्र लालसा थी। वह उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा था जब वह प्रभु यीशु की तरह अंतहीन उपदेश दे सके, जिसकी ओर बहुत-से लोग पूरे ध्यान से, आँखों में प्रशंसा और तीव्र लालसा के भाव के साथ देखते थे और उसका अनुसरण करना चाहते थे। पौलुस प्रभु यीशु के असरदार प्रभाव के सामने नतमस्तक हो गया था। दरअसल, वह वास्तव में इससे प्रभावित नहीं हुआ था, बल्कि वह ऐसी पहचान और स्वरूप के प्रति ईर्ष्यालु था जिसे लोग आदर देते थे, जिस पर ध्यान देते थे, जिसे आदर्श मानते थे और जिसके बारे में ऊँचा सोचते थे। इसी बात से उसे ईर्ष्या थी। तो वह इसे कैसे हासिल कर सका? उसे विश्वास नहीं था कि प्रभु यीशु मसीह ने ये चीजें अपने सार और पहचान के माध्यम से हासिल की हैं, बल्कि उसका मानना था कि यह उसकी उपाधि के कारण था। इसलिए, पौलुस बड़े व्यक्तित्व वाला बनने और कोई ऐसी भूमिका निभाने की इच्छा रखता था जिससे कि वह मसीह का नाम धारण कर सके। पौलुस ने खुद को ऐसी भूमिका में ढालने के लिए बहुत प्रयास किया, है ना? (हाँ।) उसने क्या प्रयास किए? उसने हर जगह उपदेश दिए और चमत्कार भी दिखाए। अंततः, उसने खुद की विशिष्टता का वर्णन करने के लिए एक ऐसे वाक्यांश का इस्तेमाल किया जो उसकी आंतरिक इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को संतुष्ट करता था। उसने खुद की विशिष्टता का वर्णन करने के लिए किस वाक्यांश का प्रयोग किया? (“क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।”) जीवित रहना मसीह है। यही वह मुख्य चीज है जिसे वह पाना चाहता था; उसकी मुख्य इच्छा मसीह बनने की थी। इस इच्छा का उसके व्यक्तिगत अनुसरणों और जिस रास्ते पर वह चला, उससे क्या संबंध है? (वह ताकत का सम्मान करता था और चाहता था कि लोग उसे सम्मान से देखें।) यह सिद्धांत भर है; तुम्हें कुछ तथ्य बताने चाहिए। पौलुस ने मसीह बनने की अपनी इच्छा व्यावहारिक तरीकों से प्रकट की; उसके बारे में मेरी विशिष्टता का वर्णन उसके कहे केवल एक वाक्यांश पर आधारित नहीं है। उसके क्रियाकलापों की शैली, तरीकों और सिद्धांतों से, हम देख सकते हैं कि उसने जो कुछ भी किया वह सब मसीह बनने के उसके लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमता था। यही इस बात का मूल और सार है कि पौलुस ने इतनी सारी चीजें क्यों कहीं और कीं। पौलुस मसीह बनना चाहता था, और इस बात ने उसके अनुसरणों, जीवन में उसके मार्ग और उसके विश्वास को प्रभावित किया। यह प्रभाव किस प्रकार व्यक्त हुआ? (पौलुस ने अपने सभी कार्यों और उपदेशों में दिखावा किया और अपनी गवाही दी।) यह एक तरीका है; पौलुस ने हर मोड़ पर दिखावा किया। उसने लोगों को साफ तौर पर बताया कि उसने कैसे कष्ट सहे, कैसे काम किए और उसके इरादे क्या थे, ताकि जब लोग वे बातें सुनें तो सोचें कि वह बिल्कुल मसीह जैसा दिखता है और वे वास्तव में उसे मसीह कहना चाहें। यही उसका लक्ष्य था। यदि लोग सचमुच उसे मसीह कहते, तो क्या उसने इससे मना किया होता? क्या उसने इसे अस्वीकार कर दिया होता? (नहीं, उसने ऐसा नहीं किया होता।) निश्चय ही उसने अस्वीकार न किया होता—वह निश्चित रूप से अति प्रसन्न होता। यह उसके अनुसरणों से व्यक्त हुए प्रभाव का एक तरीका है। और क्या तरीके थे? (उसने पत्र लिखे।) हाँ, उसने कुछ पत्र लिखे ताकि वे युगों-युगों तक चलते रहें। अपने पत्रों, काम और कलीसियाओं की चरवाही की पूरी प्रक्रिया में उसने एक बार भी प्रभु यीशु मसीह के नाम का उल्लेख नहीं किया, न ही प्रभु यीशु मसीह के नाम पर कुछ काम किया, न प्रभु यीशु मसीह के नाम का उत्कर्ष ही किया। हमेशा इस तरह से काम करने और बोलने का क्या नकारात्मक प्रभाव हुआ? प्रभु यीशु का अनुसरण करने वाले लोगों को इसने कैसे प्रभावित किया? इसने लोगों से प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकृत करवाया और पौलुस ने उनका स्थान ले लिया। उसकी तीव्र इच्छा थी कि लोग पूछें, “प्रभु यीशु मसीह कौन है? मैंने उसके बारे में कभी नहीं सुना। हम पौलुस मसीह में विश्वास करते हैं।” इस तरह से वह खुश होगा। यह उसका लक्ष्य था और उनमें से एक चीज थी जिनका वह अनुसरण करता था। उसका प्रभाव प्रकट होने के तरीकों में एक था उसके काम करने का तरीका; वह खोखले विचारों की बकबक करता रहा और लोगों को अपनी कार्यक्षमता और आश्वस्त करने की क्षमता दिखाने के लिए खोखले सिद्धांतों के बारे में अंतहीन बातें करता रहा, यह दिखाता रहा कि उसने लोगों की कितनी मदद की और यह कि उसका एक निश्चित स्वरूप था मानो प्रभु यीशु मसीह फिर से प्रकट हो गया हो। वह प्रभाव प्रकट होने का एक अन्य तरीका यह था कि वह कभी भी प्रभु यीशु मसीह का उत्कर्ष नहीं करता था, और उसने निश्चित ही कभी उनके नाम का उत्कर्ष नहीं किया, न ही उसने प्रभु यीशु मसीह के वचनों और कार्यों की गवाही दी, या यह बताया कि उन चीजों से लोगों को कैसे लाभ हुआ। क्या पौलुस ने यह उपदेश दिया कि लोगों को किस प्रकार पश्चात्ताप करना चाहिए? निश्चय ही उसने ऐसा नहीं किया। पौलुस ने कभी भी प्रभु यीशु मसीह के किए कार्यों, उसके बोले वचनों या लोगों को उसके सिखाए सत्यों के बारे में उपदेश नहीं दिया—पौलुस अपने दिल में इन चीजों को नकारता था। पौलुस ने न केवल प्रभु यीशु मसीह के बोले वचनों और लोगों को सिखाए सत्यों से इनकार किया, बल्कि वह अपने शब्दों, कार्यों और शिक्षाओं को ही सत्य मानता था। इन चीजों का इस्तेमाल वह प्रभु यीशु के वचनों को प्रतिस्थापित करने के लिए करता था और लोगों से इस तरह अपने शब्दों का अभ्यास और पालन करवाता था मानो वे सत्य हों। इन अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों की वजह क्या थी? (उसकी मसीह बनने की इच्छा।) उसकी सभी गतिविधियाँ मसीह बनने के उसके इरादे, इच्छा और महत्वाकांक्षा से प्रेरित थीं। उसके अभ्यास और अनुसरणों से इसका नजदीक का संबंध था। यह पौलुस का छठा पाप है। क्या यह गंभीर मामला है? (हाँ, यह गंभीर है।) दरअसल, उसके सभी पाप गंभीर हैं। वे सभी मृत्यु की ओर ले जाते हैं।

अब मैं पौलुस के सातवें पाप पर संगति करूँगा। यह तो और भी गंभीर है। प्रभु द्वारा बुलाए जाने से पहले पौलुस यहूदी धर्म में विश्वास रखता था। यहूदी धर्म का विश्वास यहोवा परमेश्वर में है। जो लोग यहोवा परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनकी परमेश्वर के बारे में क्या अवधारणा है? इसका संबंध उन चीजों से है जिनका अनुभव उनके पूर्वजों ने तब किया था जब यहोवा परमेश्वर उन्हें मिस्र से बाहर कनान की उर्वर भूमि में ले गया था : यहोवा परमेश्वर ने कैसे मूसा को दर्शन दिए, कैसे उसने मिस्र पर दस बलाएँ भेजीं, कैसे उसने इस्राएलियों की अगुआई करने के लिए बादल और आग के स्तंभों का उपयोग किया, और कैसे उसने अपनी व्यवस्थाएँ दीं, इत्यादि। यहूदी धर्म में विश्वास करने वाले क्या उस समय इन सभी बातों को केवल कल्पना, धारणाएँ और किंवदंतियाँ समझते थे या कि उन्हें तथ्य मानते थे? उस समय, परमेश्वर के चुने हुए लोग और जो सच्चे अनुयायी थे, वे यह मानते और स्वीकारते थे कि स्वर्ग में परमेश्वर का अस्तित्व है और वह वास्तविक है। वे सोचते थे, “यह तथ्य सही है कि मानवजाति की रचना परमेश्वर ने की है। यह बात चाहे जितनी पहले की हो, पर तथ्य तो सही ही रहेगा। हमें इस पर न केवल विश्वास करना चाहिए, बल्कि हमें इस बारे में निश्चित होना चाहिए और इस तथ्य को फैलाना चाहिए। यह हमारी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व है।” परंतु, छद्म-विश्वासी लोगों के एक अन्य समूह को लगता था कि ये बातें संभवतः केवल किंवदंतियाँ थीं। किसी ने भी इन कहानियों को सत्यापित करने या यह शोध करने की कोशिश नहीं की कि वे वास्तविक थीं या काल्पनिक, उन्हें उन कहानियों पर आधा-अधूरा विश्वास था। उन्हें जब परमेश्वर की जरूरत होती थी, तो उन्हें उम्मीद होती थी कि वह वास्तविक है और वह उन्हें वो सब दे सकता है जिसकी उन्हें तलाश है, जिसके लिए वे प्रार्थना कर रहे हैं और लालायित हैं; वे जब कुछ पाने की आशा से परमेश्वर से प्रार्थना करते थे, तो उन्हें उम्मीद होती थी कि परमेश्वर का अस्तित्व होगा। ऐसा करके वे परमेश्वर को एक मनोवैज्ञानिक आधार की तरह इस्तेमाल करते थे। उन्होंने इस तथ्य को नहीं देखा कि परमेश्वर मनुष्य को बचाता है, न ही उन्होंने परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों को स्वीकारा। यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास नहीं था; वे पहले से ही छद्म-विश्वासी थे। सबसे निम्न स्तर के लोग अपने आप को कैसे अभिव्यक्त करते थे? वे केवल कलीसिया में परमेश्वर की सेवा करते थे, उसे भेंट चढ़ाते थे, सारे अनुष्ठानों का पालन करते थे और यहाँ तक कि सभी प्रकार की किंवदंतियों पर विश्वास करते थे। परंतु, परमेश्वर उनके हृदय में नहीं था, और उनकी धारणाओं और कल्पनाओं का परमेश्वर अज्ञात और खोखला था। ऐसा व्यक्ति किस चीज में विश्वास करता था? भौतिकवाद में। वे केवल दिखाई देने वाली चीजों पर विश्वास करते थे। उनकी नजर में किंवदंतियों की बातें, अस्पष्ट चीजें और आध्यात्मिक क्षेत्र की वह हर चीज अस्तित्वहीन थी जिसे वे अपने हाथों से नहीं छू सकते हों, अपनी आँखों से न देख सकते हों या अपने कानों से न सुन सकते हों। कुछ लोग कहते हैं, “तो फिर, क्या वे उन चीजों के अस्तित्व में विश्वास करते हैं जिन्हें वे नहीं देख सकते, जैसे सूक्ष्म जीव?” वे उन चीजों पर पूरा विश्वास करते हैं। वे विज्ञान, इलेक्ट्रॉन, सूक्ष्म जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान में पूर्ण विश्वास रखते हैं। छद्म-विश्वासियों का विश्वास है कि ये चीजें किसी भी अन्य चीज से कहीं अधिक सत्य हैं। वे सच्चे भौतिकवादी हैं। हम ये बातें इन तीन प्रकार के लोगों का विश्लेषण करने के लिए कर रहे हैं : सच्चे विश्वासी, वे जो आधा-अधूरा विश्वास करते हैं, और भौतिकवादी जो परमेश्वर के अस्तित्व में जरा भी विश्वास नहीं करते। कुछ लोग कहते हैं, “क्या सचमुच कोई परमेश्वर है? कहाँ है वह? वह कैसा दिखता है? मैंने सुना है कि परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में रहता है। तो, तीसरा स्वर्ग कितनी ऊँचाई पर है? यह कितनी दूर है और कितना बड़ा है? लोग यह भी कहते हैं कि कोई स्वर्ग है जिसके फर्श पर सोने की ईंटें और कीमती जेड पत्थर के टुकड़े लगे हैं और दीवारें भी सोने की हैं। ऐसी अद्भुत जगह का होना कैसे संभव है? ये बकवास है! मैंने सुना है कि व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने अपनी व्यवस्थाएँ अपने चुने हुए लोगों को दीं और जिन पट्टियों पर वे व्यवस्थाएँ लिखी गई थीं, वे पट्टियाँ अभी भी मौजूद हैं। शायद यह सब सिर्फ किंवदंती है, जिनका उपयोग शासक वर्ग जनता को नियंत्रित करने के लिए करता है।” क्या इस समूह के लोगों का परमेश्वर में सच्चा विश्वास है? (नहीं, उनका विश्वास नहीं है।) वे विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर का वास्तव में अस्तित्व है, या यह तथ्य कि उसने मनुष्यों को बनाया है और आज तक मानवजाति की अगुआई की है। तो, वे फिर भी कलीसिया में सेवा क्यों करते हैं? (क्योंकि वे परमेश्वर की सेवा को नौकरी के रूप में देखते हैं और उसे अपने भोजन की व्यवस्था का माध्यम मानते हैं।) सही है। वे इसे नौकरी और भोजन की व्यवस्था के साधन के रूप में देखते हैं। तो, पौलुस किस प्रकार का व्यक्ति था? (तीसरे प्रकार का।) यह उसके प्रकृति सार से संबंधित है। पौलुस को खोखले सिद्धांतों के बारे में बकबक करना पसंद था। उसे खोखली चीजें, अज्ञात चीजें और काल्पनिक चीजें पसंद थीं। उसे ऐसी चीजें पसंद थीं जो गहरी और समझने में कठिन हों और जिन्हें स्पष्ट शब्दों में व्यक्त न किया जा सके। उसे चीजों के बारे में बहुत सोच-विचार करना पसंद था, वह पूर्वाग्रही और जिद्दी था और उसकी समझ विकृत थी। इस तरह के लोग मनुष्य नहीं हैं। वह इसी प्रकार का व्यक्ति था। भले ही पौलुस कलीसिया में सेवा करता था और एक प्रसिद्ध शिक्षक का छात्र था, परंतु उसके स्वभाव और प्रकृति सार के साथ-साथ उसकी प्राथमिकताओं, आशाओं, अनुसरणों और आकांक्षाओं को देखते हुए लगता है कि उसने जो ज्ञान अर्जित किया था वह उसके लिए अपनी इच्छाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और खोखले मान-सम्मान को संतुष्ट करने तथा भोजन, रुतबा और समाज में प्रतिष्ठा पाने का साधन मात्र था। पौलुस के प्रकृति सार और अनुसरणों को देखें तो उसे यहोवा पर कितनी आस्था रही होगी? उसकी आस्था कोई पक्की बात नहीं, केवल खोखले शब्द थे। वह छद्म-विश्वासी, अनीश्वरवादी और भौतिकवादी था। कुछ लोग पूछते हैं, “यदि पौलुस छद्म-विश्वासी था तो वह प्रभु यीशु मसीह का प्रेरित क्यों बना और उसने अनुग्रह के युग के सुसमाचार का प्रसार क्यों किया?” मुझे बताओ, वह इस मार्ग पर कैसे चल सका? किस बात ने उसे प्रेरित किया? उसके लिए वह निर्णायक मोड़ कौन-सा था जिसने उससे यह भूमिका ग्रहण करवाई और उसके जैसे छद्म-विश्वासी व्यक्ति को ऐसी राह पर चलने और जीवन को पूरी तरह से दूसरी दिशा में मोड़ने में सक्षम बनाया? जब मैं “पूरी तरह से दूसरी दिशा में मोड़ने” के बारे में बात करता हूँ तो मैं किस बात को संदर्भित कर रहा हूँ? यह तब हुआ जब पौलुस को दमिश्क की सड़क पर मार गिराया गया था—यही उसके जीवन की दिशा उलट देने वाला समय था। उसने दो प्रकार के पूर्ण दिशा-परिवर्तन का अनुभव किया : एक यह कि वह परमेश्वर में विश्वास न करने वाले से बदलकर यह विश्वास करने वाला बन गया कि निश्चित रूप से परमेश्वर का अस्तित्व है क्योंकि प्रभु यीशु, जिसे वह शुरू में सता रहा था, दमिश्क की सड़क पर उसके सामने प्रकट हुआ। पौलुस ने ऊँची आवाज में कहा, “हे प्रभु, तू कौन है?” दरअसल, अंदर ही अंदर पौलुस को विश्वास नहीं था कि इस प्रभु और परमेश्वर का कोई अस्तित्व है, लेकिन वह खुद को यह कहने से नहीं रोक सका, “हे प्रभु, तू कौन है?” प्रभु यीशु ने क्या कहा? (“मैं यीशु हूँ, जिसे तू सताता है” (प्रेरितों 9:5)।) जिस क्षण प्रभु यीशु ने ऐसा कहा, पौलुस को इस तथ्य पर विश्वास हो गया : कोई प्रभु प्रकट हुआ है जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था, जिसकी कल्पना करने में वह असमर्थ था और जो उसकी कल्पना से भी अधिक सामर्थ्यवान है। वह कैसे आश्वस्त हुआ कि प्रभु उसकी कल्पना से भी अधिक सामर्थ्यवान है? क्योंकि जब पौलुस को इसकी कोई आशा नहीं थी तब वह यीशु, जिसके बारे में उसे बिल्कुल भी विश्वास नहीं था कि वह परमेश्वर है, ठीक उसके सामने प्रकट हो गया। प्रभु यीशु कितना सामर्थ्यवान है? पौलुस को तब उसकी सामर्थ्य की विराटता का विश्वास हो गया जब पौलुस की आँखें यीशु के प्रकाश से चौंधिया गईं। तब क्या वह आश्वस्त हो सका कि प्रभु यीशु ही परमेश्वर है? (नहीं।) क्यों नहीं हो सका? (क्योंकि पहली बात तो यही है कि पौलुस को परमेश्वर के अस्तित्व का विश्वास ही नहीं था।) बिल्कुल ठीक, क्योंकि वह परमेश्वर के अस्तित्व पर जरा भी विश्वास नहीं करता था। अभी, तुम सभी के हृदय में आस्था और एक आधार है, इसलिए यदि परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट हो जाए, भले ही सिर्फ उसकी आवाज आए या तुम्हारी ओर उसकी पीठ हो, और अगर वह तुमसे बात करे या तुम्हारा नाम पुकारे, तो तुम इस तथ्य से आश्वस्त हो जाओगे : “यही वह परमेश्वर है जिस पर मैं विश्वास करता हूँ। मैंने उसे देखा है और मैंने उसकी आवाज सुनी है। परमेश्वर मेरे पास आया है।” तुम आश्वस्त होगे क्योंकि तुम्हारे हृदय में आस्था है, तुमने इस पल का सपना देखा है, और तुम्हें डर नहीं लगता। लेकिन क्या पौलुस ने यही सोचा था? (नहीं।) उसके हृदय में कभी आस्था नहीं थी। उसका पहला विचार क्या था? (डर।) वह डर गया था क्योंकि वह सामने खड़ा व्यक्ति उसे मार गिराने और उसकी हत्या कर देने में सक्षम था! इससे वह नरक से भी ज्यादा भयभीत और आतंकित हो गया, जो वह देख नहीं सका। वह बहुत अधिक डर गया। उसके हृदय में परमेश्वर पर जरा भी विश्वास नहीं था—तुम कह सकते हो कि उसके मन में परमेश्वर के बारे में कोई अवधारणा ही नहीं थी। इसलिए, जब प्रभु यीशु अपना कार्य करता था, चाहे वह संकेत और चमत्कार दिखाना हो या उपदेश देना हो, चाहे कितने भी लोग उसका अनुसरण कर रहे हों, वह कितना ही प्रभावशाली हो, या वह कितना ही बड़ा दृश्य हो, पौलुस के मन में प्रभु यीशु एक सामान्य व्यक्ति से ज्यादा कुछ नहीं था। वह प्रभु यीशु को नीची निगाह से देखता था और प्रभु यीशु के प्रति उसके मन में कोई सम्मान नहीं था। परन्तु अब, वही साधारण मनुष्य का पुत्र, जिसे वह तुच्छ समझता था, उसके ठीक सामने खड़ा था, अब वह किसी साधारण व्यक्ति के शरीर में नहीं था, और उसके पास केवल एक आवाज ही नहीं, बल्कि प्रकाश का एक स्तंभ भी था! उसके लिए वह ऐसा क्षण था जिसे वह लाखों वर्षों में कभी नहीं भूलेगा। वहाँ फैला प्रकाश चकाचौंध कर देने वाला था! परमेश्वर ने पौलुस को कैसे नीचे गिराया था? जब परमेश्वर पौलुस के पास आया, तो पौलुस क्षण भर में अंधा हो गया और भूमि पर गिर पड़ा। यह क्या हो रहा था? क्या वह स्वेच्छा से और अपनी मर्जी से गिरा था, या वह इसके लिए पहले से ही तैयार था? (नहीं, वह इसे सहन ही नहीं कर सका था।) मनुष्य का शरीर तो केवल मांस है; यह इसे सहन नहीं कर सकता। जब परमेश्वर वास्तव में तुम्हारे पास आएगा, तो वह उस साधारण भौतिक शरीर में नहीं होगा जिसमें तुमने प्रभु यीशु को देखा था—इतना सुखद और सुलभ, इतना विनम्र और सामान्य, मांस और रक्त का बना कोई ऐसा व्यक्ति जो तुम्हें साधारण लगता हो और जिसके बारे में तुम कुछ और नहीं सोचते। जब परमेश्वर वास्तव में तुम्हारे पास आता है, तो भले ही वह तुम्हें न मार गिराए, तुम उसे सहन नहीं कर पाओगे! पौलुस ने दिल की गहराई में जो पहली बात महसूस की वह थी, “प्रभु यीशु मेरे पास आया है, जिसे मैं सताता था और हेय दृष्टि से देखता था। यह प्रकाश बहुत शक्तिशाली है!” क्या परमेश्वर ने उससे कहा था कि वह झुके? क्या उसने कहा, “तुम्हें मेरे सामने सिर झुकाना चाहिए”? (नहीं, उसने ऐसा नहीं किया।) तो पौलुस जमीन पर औंधे मुंह क्यों गिर पड़ा था? (वह डरा हुआ था।) नहीं। मानवजाति को परमेश्वर ने बनाया, और मनुष्य इतने छोटे और कमजोर हैं कि जब परमेश्वर का प्रकाश उनके शरीर को छूता है, तो वे खुद को जमीन पर गिरने से रोक नहीं पाते। परमेश्वर बहुत बड़ा और शक्तिशाली है; उसे सँभाल पाना मनुष्यों की क्षमताओं और साहस की बात नहीं है। पौलुस प्रभु यीशु को परमेश्वर या प्रभु नहीं मानता था, तो वह अपनी इच्छा से क्यों झुकेगा? वह मुँह के बल गिर पड़ा था क्योंकि वह पूरी तरह से अक्षम और पंगु हो गया था। उसका आरंभिक अभिमान, अहंकार, ढिठाई, आत्म-तुष्टि और खुदगर्जी उसी क्षण गायब हो गए। पौलुस के सामने तो परमेश्वर अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट भी नहीं हुआ; यह केवल उसका प्रकाश था जो पौलुस पर पड़ा था, और जब पौलुस ने उस प्रकाश को देखा तो उसका परिणाम यह हुआ; इसका उस पर इतना अधिक असर पड़ा। यहीं से पौलुस पूरी तरह बदल गया। यदि इस पूर्ण दिशा-परिवर्तन के पीछे कोई अनोखा संदर्भ नहीं था, या यह कोई खास बात नहीं थी, तो सकारात्मक चीजों का अनुसरण करने वाले, सत्य का अनुसरण करने वाले, मानवता और अंतरात्मा वाले किसी सामान्य व्यक्ति के लिए तो यह अच्छी बात होगी क्योंकि जब कोई व्यक्ति परमेश्वर को देखता है तो इसका प्रभाव उसके पूरे जीवन के अनुसरण पर होता है। बाइबल में जो दर्ज है उसके मुताबिक बीती सदियों से किसी व्यक्ति के लिए परमेश्वर को बोलते हुए सुनना दुर्लभ था। अय्यूब ने अपने परीक्षण के बाद परमेश्वर को एक बवंडर में बात करते हुए सुना था। अय्यूब ने अपना पूरा जीवन परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर की संप्रभुता को समझने के प्रयास में बिताया, लेकिन अय्यूब सत्तर वर्ष की आयु तक कभी परमेश्वर को नहीं देख सका था; उसने केवल परमेश्वर की संप्रभुता का अनुभव किया था, फिर भी अय्यूब की आस्था बरकरार रही। जब उसने अपने कानों से परमेश्वर को बात करते हुए सुना, तो क्या यह उसकी आस्था में एक बड़ा मोड़ नहीं था? (हाँ, ऐसा ही था।) यह मोड़ ऊँचाई देने वाला था, एक ऐसा मोड़ जिस पर उसका विश्वास और भी बढ़ गया था। इससे उसे पहले से ज्यादा पुष्टि हुई कि जिस परमेश्वर में वह विश्वास करता था और जिसके प्रति वह समर्पण करता था, उसने लोगों के बीच जो कार्य किया वह सही और अच्छा था और लोगों को उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। यह किसी औसत व्यक्ति के अनुभवों की तरह कोई छोटा-सा बदलाव नहीं था जिसमें वे धीरे-धीरे संदेह युक्त आस्था से संदेह मुक्त सच्ची आस्था की ओर बढ़ते हैं। बल्कि, यह एक उन्नयन था जिसके माध्यम से उसकी आस्था ऊँचे स्तर पर पहुँच गई। पौलुस के संबंध में, उसे मार गिराने वाले रूप में परमेश्वर के प्रकट होने से क्या बदलाव आना चाहिए था? निश्चित रूप से यह उन्नयन नहीं था, क्योंकि इससे पहले उसने कभी परमेश्वर में विश्वास नहीं किया था, इसलिए इसे उन्नयन नहीं कहा जा सकता। तो, इसका उस पर क्या प्रभाव पड़ा? यह एक बार फिर उसके अनुसरणों से जुड़ा मामला है। मुझे बताओ। (अपना जीवन बचाए रखने को पौलुस अपने पापों के प्रायश्चित के लिए सुसमाचार का प्रचार करने के माध्यम से श्रम करना चाहता था।) यह बिल्कुल सही है। वह मृत्यु से भी डरता था और बहुत धूर्त था। जब उसे पता चला कि जिस यीशु को उसने सताया था वह वास्तव में परमेश्वर था, तो वह अपनी बुद्धि की सीमा से ज्यादा भयभीत हो गया और उसने सोचा, “मैं क्या करूँ? मैं बस इतना कर सकता हूँ कि प्रभु के आदेशों को मानूँ, नहीं तो मैं मर जाऊँगा!” उस समय से उसने परमेश्वर के आदेश को स्वीकार किया और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए सुसमाचार का प्रचार करने के लिए श्रम करना शुरू कर दिया। उसने सोचा, “अगर मैं वास्तव में सुसमाचार प्रचार में सफल रहा और प्रभु यीशु संतुष्ट हो गया तो मुझे मुकुट और इनाम तक मिल सकता है!” यह हिसाब-किताब उसके हृदय की गहराई में था। उसने सोचा कि आखिरकार उसे आशीष प्राप्त करने का एक बेहतर मौका मिल गया है। पौलुस ने अपने पापों का प्रायश्चित करने और अपना जीवन बचाने के लिए प्रभु के आदेश को स्वीकार किया; प्रभु में विश्वास करने और उसे स्वीकार करने के पीछे उसका यही इरादा और लक्ष्य था। दमिश्क की सड़क पर प्रभु यीशु से मुलाकात होने और मार गिराए जाने के बाद वह पूरी तरह से बदल गया, जो उसके अनुसरणों और परमेश्वर में विश्वास के जीवन की एक नई शुरुआत को चिह्नित करता है। यह नई शुरुआत सकारात्मक थी या नकारात्मक? (यह नकारात्मक थी।) उसने परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं पहचाना, और उसने प्रभु यीशु के आदेशों को लेन-देन की एक ऐसी पद्धति का उपयोग करते हुए स्वीकारा जो और भी अधिक फिसलन भरी, अकथनीय और कपटपूर्ण थी। ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उसे परमेश्वर के प्रताप और मार गिराए जाने का डर था। ये तो और भी घृणित है। किंतु, आज मेरी संगति का मुद्दा यह नहीं है। परमेश्वर के महान प्रकाश का सामना करने के बाद पौलुस के पूरी तरह बदल जाने से और जिन विभिन्न तरीकों से उसने स्वयं को व्यक्त किया, हम स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि पौलुस किस रास्ते पर था, और उसका प्रकृति सार उसे किस प्रकार के व्यक्ति के रूप में दिखाता है। ये बातें पूरी तरह से स्पष्ट हैं।

आघात से गिराए जाने के बाद से ही पौलुस यह मानता था कि प्रभु यीशु मसीह का अस्तित्व है और प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर है। वह जिस परमेश्वर पर विश्वास करता था वह तत्काल स्वर्ग में रहने वाले परमेश्वर से प्रभु यीशु मसीह में बदल गया था—वह पृथ्वी पर स्थित परमेश्वर में बदल गया था। उस क्षण से वह प्रभु यीशु के आदेश को मानने से इनकार नहीं कर सका और देहधारी परमेश्वर—प्रभु यीशु—के प्रति बिना थके श्रम करने लगा। बेशक, उसके श्रम का लक्ष्य आंशिक रूप से खुद को पापों से मुक्त करने के साथ ही आंशिक रूप से आशीष पाने की अपनी इच्छा पूरी करना और अपनी इच्छित मंजिल प्राप्त करना भी था। जब पौलुस ने कहा “परमेश्वर की इच्छा से,” तो वहाँ “परमेश्वर” का तात्पर्य यहोवा से था या यीशु से? वह थोड़ा भ्रमित हो गया और सोचने लगा, “मैं यहोवा में विश्वास करता हूँ, तो यीशु ने मुझे क्यों मार गिराया? जब उसने मुझे मार गिराया तो यहोवा ने यीशु को रोका क्यों नहीं? उनमें से कौन वास्तव में परमेश्वर है?” वह इसका पता नहीं लगा सका। जो भी हो, वह कभी भी प्रभु यीशु को अपने परमेश्वर के रूप में नहीं देखेगा। भले ही उसने यीशु को मौखिक रूप से स्वीकार लिया था, पर अभी भी उसके मन में संदेह था। जैसे-जैसे समय बीता, वह धीरे-धीरे अपने इस विश्वास पर लौट गया कि “केवल यहोवा ही परमेश्वर है,” इसलिए उसके बाद पौलुस के सभी पत्रों में जब उसने “परमेश्वर की इच्छा से” लिखा तो संभवतः वहाँ “परमेश्वर” मुख्य रूप से यहोवा परमेश्वर को संदर्भित करता था। क्योंकि पौलुस ने कभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि प्रभु यीशु यहोवा है, उसने हमेशा प्रभु यीशु को परमेश्वर के पुत्र के रूप में देखा, उसे “पुत्र” के रूप में संदर्भित किया, और कभी भी “पुत्र और पिता एक हैं” जैसी कोई बात नहीं कही। इससे साबित होता है कि पौलुस ने कभी प्रभु यीशु को एक सच्चे परमेश्वर के रूप में पहचाना ही नहीं; उसके मन में संदेह था और वह इस पर केवल आधा-अधूरा ही विश्वास करता था। परमेश्वर के प्रति उसके इस दृष्टिकोण और उसके अनुसरण के तरीके को देखते हुए कहा जा सकता है कि पौलुस कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो सत्य का अनुसरण करता रहा हो। उसने कभी भी देहधारण के रहस्य को नहीं समझा, और प्रभु यीशु को कभी एक सच्चा परमेश्वर नहीं माना। इससे यह कहना मुश्किल नहीं है कि पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो ताकत का पुजारी था, वह धूर्त और चालाक था। पौलुस के दुष्टता, ताकत और रुतबे का आराधक होने का तथ्य हमें उसके विश्वास के बारे में क्या दिखाता है? क्या उसे सच्चा विश्वास था? (नहीं।) उसका कोई सच्चा विश्वास नहीं था, तो क्या वह जिस परमेश्वर को परिभाषित करता था वह वास्तव में उसके हृदय में मौजूद था? (नहीं।) फिर भी वह क्यों घूमता रहा, खुद को खपाता रहा, और प्रभु यीशु मसीह के लिए काम करता रहा? (आशीष प्राप्त करने का उसका इरादा उसे नियंत्रित करता था।) (वह दंडित होने से डरता था।) हम चक्कर काटकर फिर से इसी बिंदु पर वापस आ गए हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि वह दंडित होने से डरता था, और क्योंकि उसके शरीर में एक काँटा था जिसे वह निकाल नहीं सका था, इसलिए उसे हमेशा इधर-उधर यात्राएँ करनी पड़ती थीं और काम करना पड़ता था, ताकि उसके भीतर का काँटा उसके सहन करने की क्षमता से अधिक पीड़ा न दे। उसकी इन अभिव्यक्तियों से, उसके शब्दों से, दमिश्क के रास्ते में जो कुछ हुआ उस पर उसकी प्रतिक्रिया से, और दमिश्क को जाने वाली सड़क पर मार गिराए जाने की तथ्यात्मक घटना के बाद उसके ऊपर पड़े प्रभाव से हम देख सकते हैं कि उसके हृदय में कोई विश्वास नहीं था; इससे कमोबेश आश्वस्त हुआ जा सकता है कि वह छद्म-विश्वासी और नास्तिक था। उसका दृष्टिकोण था कि “जिसके पास ताकत होगी, मैं उसी पर विश्वास करूँगा। जिसके भी पास मुझे वश में करने की ताकत होगी, मैं उसके लिए काम करूँगा और अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता से सेवा करूँगा। जो कोई भी मुझे एक मंजिल दे सके, मुकुट दे सके और आशीष पाने की मेरी इच्छा पूरी कर सके, मैं उसी का अनुसरण करूँगा। मैं अंत तक उसका अनुसरण करूँगा।” उसके हृदय में परमेश्वर कौन था? उससे अधिक ताकतवर और उसे अपने वश में कर सकने वाला कोई भी उसका परमेश्वर हो सकता था। क्या यह पौलुस का प्रकृति सार नहीं था? (बिल्कुल था।) तो, वह कौन-सी सत्ता थी जिस पर उसने अंततः विश्वास किया, जो दमिश्क के रास्ते में उस पर आघात कर उसे गिरा सकी थी? (प्रभु यीशु मसीह।) “प्रभु यीशु मसीह” वह नाम था जिसका उसने उपयोग किया था, लेकिन जिस सत्ता पर वह वास्तव में विश्वास करता था वह उसके हृदय में स्थित परमेश्वर था। उसका परमेश्वर कहाँ है? यदि तुम उससे पूछते कि, “तुम्हारा परमेश्वर कहाँ है? क्या वह स्वर्ग में है? क्या वह सभी चीजों में है? क्या वह वही है जिसकी समस्त मानवजाति पर संप्रभुता है?” तो वह कहता, “नहीं, मेरा परमेश्वर दमिश्क के रास्ते पर है।” वास्तव में वही उसका परमेश्वर था। क्या यही कारण है कि पौलुस प्रभु यीशु मसीह पर अत्याचार करने से लेकर उसका काम करने तक, खुद को खपाने तक और यहाँ तक कि प्रभु यीशु मसीह के लिए अपने जीवन का बलिदान करने में सक्षम था—जिस कारण वह इतना बड़ा बदलाव करने में सक्षम हुआ—वह यह था कि उसका विश्वास बदल गया था? क्या इसलिए ऐसा हुआ कि उसकी अंतरात्मा जाग उठी थी? (नहीं।) तो, ऐसा किस कारण से हुआ? क्या बदला? उसका मनोवैज्ञानिक सहारा बदल गया था। पहले उसका मनोवैज्ञानिक सहारा स्वर्ग में था; वह एक खोखली, अस्पष्ट चीज थी। यदि इस आधार को यीशु मसीह से बदला जाता, तो पौलुस सोचता कि वह बहुत महत्वहीन है—यीशु एक सामान्य व्यक्ति मात्र था, वह मनोवैज्ञानिक आधार नहीं हो सकता था—और पौलुस के मन में तो प्रसिद्ध धार्मिक हस्तियों के प्रति और भी कम सम्मान था। पौलुस बस किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना चाहता था जिस पर वह भरोसा कर सके, जो उसे वश में करने और आशीष दिलाने में सक्षम हो। उसे लगा कि दमिश्क के रास्ते पर उसे जिस सत्ता का सामना करना पड़ा था वह सबसे शक्तिशाली थी, और वह वही सत्ता थी जिस पर उसे विश्वास करना चाहिए। उसका मनोवैज्ञानिक सहारा उसी समय बदल गया जब उसका विश्वास बदला। इसके आधार पर, पौलुस सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता था या नहीं? (नहीं।) आओ, अब इसे एक वाक्य में संक्षेपित करें कि किस चीज ने पौलुस के अनुसरणों को और वह जिस रास्ते पर चल रहा था, उसे प्रभावित किया। (उसके मनोवैज्ञानिक सहारे ने।) तो फिर हमें पौलुस के सातवें पाप को कैसे निरूपित करना चाहिए? सभी संदर्भों में, पौलुस का विश्वास एक मनोवैज्ञानिक आधार था; जो खाली और अस्पष्ट था। वह शुरू से आखिर तक छद्म-विश्वासी और नास्तिक था। उसके जैसे छद्म-विश्वासी और नास्तिक ने धार्मिक दुनिया को क्यों नहीं छोड़ा? एक तो उसकी अस्पष्ट कल्पना में मंजिल पाने का मुद्दा था। दूसरी बात यह कि उसके सामने जीवन में भोजन की व्यवस्था करने का मुद्दा था। प्रसिद्धि, लाभ, रुतबा और भोजन की व्यवस्था उसके इस जीवन के मुख्य अनुसरणों में शामिल थीं, और आने वाले संसार में एक मंजिल पाने का विचार उसके लिए एक राहत थी। ये चीजें ही इस तरह के लोगों के अनुसरण और खुलासे के साथ-साथ वे जिस रास्ते पर चलते हैं उनकी जड़ों और बैसाखी का काम करती हैं। इस परिप्रेक्ष्य से पौलुस क्या था? (छद्म-विश्वासी। अज्ञात परमेश्वर में विश्वास करने वाला।) (नास्तिक।) यह कहना सही है कि वह एक नास्तिक था, वह छद्म-विश्वासी और अवसरवादी था जो ईसाई धर्म में घात लगा कर बैठ गया था। यदि तुम उसे केवल फरीसी कहते हो, तो क्या यह उसे कम आँकना नहीं है? अगर तुम पौलुस द्वारा लिखे गए पत्रों को देखो, और पाओ कि ऊपरी तौर पर वे कहते हैं “परमेश्वर की इच्छा से,” तो तुम्हें लग सकता है कि पौलुस स्वर्ग में स्थित परमेश्वर को सर्वोच्च मानता था और यह केवल लोगों की धारणाओं के कारण या उनकी अज्ञानतावश और परमेश्वर को न समझने के कारण हुआ कि उन्होंने परमेश्वर को तीन स्तरों में विभाजित कर दिया : पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, और यह सिर्फ मनुष्य की मूर्खता है और कोई बहुत गंभीर समस्या नहीं है, क्योंकि संपूर्ण धार्मिक जगत भी ऐसा ही सोचता है। परंतु, इसका विश्लेषण करने के बाद अब क्या यह वही मामला है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) पौलुस ने परमेश्वर के अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं किया। यह नास्तिक और छद्म-विश्वासी होना है, उसे नास्तिकों और गैर-विश्वासियों की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए।

मैंने पौलुस के सात पापों को सारांशित करने का काम पूरा कर लिया है। मुझे संक्षेप में बताओ कि वे क्या हैं। (पहला पाप यह है कि पौलुस ने धर्म के मुकुट और आशीष की तलाश को उचित उद्देश्यों की श्रेणी में रखा; दूसरा पाप यह है कि पौलुस ने अपनी कल्पनाओं और अपनी धारणा में जिन चीजों को सही समझा, उन्हें ही सत्य माना और लोगों को गुमराह करते हुए हर जगह उनका प्रचार किया; तीसरा पाप, यह कि पौलुस ने अपने गुणों और ज्ञान को जीवन के रूप में ग्रहण किया; चौथा, यह कि पौलुस ने प्रभु यीशु मसीह की पहचान और सार को नकार दिया, और प्रभु यीशु के छुटकारा दिलाने के कार्य को नकार दिया; पाँचवाँ पाप यह था कि पौलुस उपदेश देता था कि “मेरे लिए धार्मिकता का एक मुकुट रखा हुआ है,” और खुले तौर पर लोगों को उकसाता और गुमराह करता था, जिससे वे परमेश्वर पर दबाव डालने और उसके खिलाफ हो-हल्ला करने और विरोध करने की कोशिश करें; छठा पाप यह है कि पौलुस का मानना था उसके लिए जीवित रहना ही मसीह होना है। उसने प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों को नकार दिया, प्रभु यीशु के वचनों की जगह अपने शब्दों का इस्तेमाल किया और लोगों से उनका अभ्यास और पालन कराया। पौलुस का सातवां पाप यह है कि उसने परमेश्वर में विश्वास को एक मनोवैज्ञानिक सहारे की तरह इस्तेमाल किया और वह सिरे से नास्तिक और छद्म-विश्वासी था।) पौलुस से जुड़े इन मुद्दों पर हमारा विश्लेषण इतना विस्तृत है कि यह पौलुस की पूजा करने वाले हर व्यक्ति को होश में ला सकता है। यह सार्थक है। पौलुस द्वारा अभिव्यक्त और खुलासा किए गए इन स्वभावों और सारों में से तथा अनुसरण करने के उसके व्यक्तिगत तरीकों में से, किन-किन बातों का तुम लोगों के साथ स्पष्ट सह-संबंध है? (उन सभी का।) पहला पाप है धार्मिकता के मुकुट और आशीष की तलाश को उचित उद्देश्य मानना। मैं यह क्यों कहता हूँ कि यह गलत है और लोगों को इस पर विचार करके इसे बदलना चाहिए? जब पौलुस धार्मिकता के मुकुट की तलाश में लगा, आशीष पाने के पीछे पड़ा और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की कोशिश की, तो वह इन लाभों की खोज को उचित मानता था। तो, वास्तविक जीवन में तुम लोगों के कौन-से खुलासे और अभिव्यक्तियाँ इस मनोदशा से मेल खाती हैं? (कभी-कभी मैं महत्वपूर्ण कार्य करना चाहती हूँ और परमेश्वर के घर में योगदान देना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि इन चीजों का अनुसरण करने से परमेश्वर अंततः मुझे पूर्ण बना देगा। मैं जो काम करती हूँ और जो कर्तव्य निभाती हूँ उन्हें मैं उपलब्धियों के रूप में मानती हूँ।) यह इसी का एक भाग है। निभाए गए कर्तव्यों को उपलब्धियों के रूप में मानना धार्मिकता का मुकुट हासिल करने की कोशिश के समान है; यह वैसी ही चीज है; यह वही मनोदशा है। तुम इसी के लिए काम करते हो और कष्ट सहते हो। यही वह चीज है जो तुम्हारे दुःख के स्रोत को निर्देशित करती है और तुम्हारे दुःखों की प्रेरक है। यदि ये चीजें तुम्हें निर्देशित नहीं कर रही होतीं, तो तुम ऊर्जाहीन होते; पूरी तरह से पस्त होते। क्या किसी के पास कहने को कुछ और है? (अतीत की घटनाओं जैसे किन्हीं चीजों को छोड़ना, खुद को खपाना, पीड़ा सहन करना, गिरफ्तार होकर जेल में समय बिताना और इस तरह की चीजों को व्यक्तिगत पूँजी के रूप में देखना और उन्हें आशीष प्राप्ति का आधार और कारण मानना।) यह सिर्फ एक विवरण है। यहाँ अंतर्निहित मनोदशा क्या है? किस प्रकार की परिस्थिति तुम्हें ऐसी मनोदशा में लाती है? तुम अकारण ही तो इस तरह से नहीं सोचोगे। ऐसी कोई वजह नहीं है कि तुम खाते हुए, सोते हुए या अपने दैनिक कार्यों को करते हुए हमेशा यही सोचते रहो। तुम्हें यह जानना चाहिए कि कौन-सी पृष्ठभूमि और परिस्थितियाँ तुम्हें इस मनोदशा में लाती हैं। मुझे बताओ। (जब मैं अपने कर्तव्यों में थोड़ा प्रभावी होती हूँ, तो मुझे लगता है कि मैंने परमेश्वर के लिए यात्राएँ की हैं, उसके लिए खुद को खपाया है, कड़ी मेहनत की है और उसके लिए बहुत कुछ किया है। बिल्कुल पौलुस की तरह, मुझे लगता है कि मैंने परमेश्वर के लिए अच्छी लड़ाई लड़ी है, और अच्छा योगदान किया है। ऐसा तभी होता है जब मेरी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ सिर उठाती हैं।) दरअसल, तुम मूल रूप से महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से मुक्त नहीं थे; वे शुरू से ही तुम्हारे हृदय के अंदर छिपी हुई थीं, और अब वे सतह पर आ रही हैं और खुद को प्रकट कर रही हैं। जब ऐसा होता है, तो तुम विनम्र नहीं रह जाते, तुम्हारे शब्द अप्रत्यक्ष नहीं होते और तुम ढीठ बन जाते हो। पौलुस ने जो कुछ भी किया उसके मूल में उसके गलत विचार थे। चूँकि परमेश्वर में उसके विश्वास के पीछे के विचार गलत थे, इससे यह सुनिश्चित हो गया कि उसके कार्यों का मूल गलत था। यद्यपि, वह इस बात को समझा नहीं और इसे उचित भी मानता रहा, इसलिए वह गलत दिशा का अनुसरण करता रहा। इसके कारण उसके अनुसरण के परिणाम उसके इरादों के विपरीत चले गए; उनका परिणाम अच्छा नहीं हुआ और उसे सत्य नहीं प्राप्त हुआ। आजकल लोग वैसे ही हैं। यदि तुम्हारे अनुसरण के पीछे के परिप्रेक्ष्य और अनुसरण की दिशा हमेशा गलत हो, फिर भी तुम इससे अनुसरण के एक सही तरीके के रूप में पेश आते हो तो अंततः तुम्हें क्या हासिल होगा? यह तुम्हें निराश ही करेगा या तुम्हारी प्रकृति को अहंकारी बना देगा। उदाहरण के लिए, यदि परमेश्वर तुमको किसी खास तरीके से आशीष देता है या अकेले तुमको कुछ प्रदान करता है तो तुम सोचोगे, “देखो, परमेश्वर मेरे प्रति कृपालु है। इससे यह सिद्ध होता है कि मैंने जो कुछ भी किया है परमेश्वर उसे स्वीकृति देता है। परमेश्वर ने उसे स्वीकार लिया है। जो कीमतें मैंने चुकाई हैं और अपने दिल का जो खून खपाया है वे व्यर्थ नहीं रहे हैं परमेश्वर लोगों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता।” इस तरीके से तुम समझते हो कि परमेश्वर लोगों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता, इसी तरीके से तुम उसकी आशीषों और स्वीकृति को समझते हो, लेकिन यह समझ गलत और विकृत है। अब मुख्य बात यह है कि इन गलत और विकृत इरादों, दृष्टिकोणों और अनुसरणों को सही और शुद्ध विचारों और दृष्टिकोणों में कैसे बदला जाए। केवल सही विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार कार्य करना ही सत्य का अभ्यास करना है, और यही एकमात्र तरीका है जिससे तुम सत्य प्राप्त कर सकते हो। यही कुंजी है।

बार-बार उपदेश सुनने पर लोग अब आत्म-चिंतन करने लगे हैं और अपनी तुलना परमेश्वर के वचनों से कर रहे हैं। वे अपने कर्तव्यों का पालन करने में आने वाली समस्याओं को पहचानने लगे हैं, और अपने भीतर की असामान्य दशाओं, असंयमित इच्छाओं और भ्रष्टता के खुलासों का पता लगाने में सक्षम हैं। वे पूरी तरह से अबोध नहीं हैं। एकमात्र समस्या यह है कि जब उन्हें पता चलता है कि वे गलत मनोदशा में हैं, या भ्रष्टता दिखा रहे हैं, तो भी उनमें इसे रोकने की क्षमता नहीं होती और वे इसे हल करने के लिए सत्य की खोज नहीं करते। कभी-कभी वे शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं, किसी को ठेस नहीं पहुँचाते, और सोचते हैं कि वे बहुत अच्छे हैं। परंतु, वे किसी भी वास्तविक तरीके से नहीं बदले हैं; वे अपने दिन बर्बाद करने में उलझे हुए हैं और इसके परिणामस्वरूप एक दशक तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी उनके पास बताने के लिए कोई वास्तविक अनुभवात्मक गवाही नहीं है और वे शर्मिंदा महसूस करते हैं। मुख्य समस्या जिसे अब हल करने की आवश्यकता है, वह यह है कि तुम्हारे अनुसरणों की गलत दिशा कैसे बदली जाए। तुम साफ-साफ जानते हो कि सत्य का अनुसरण करने का मार्ग सही है, फिर भी तुम प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करने पर जोर देते हो। इस समस्या को कैसे पलटा जा सकता है ताकि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर आ सको? यह ऐसी वास्तविक समस्या है जिसका समाधान विश्वासियों को अवश्य करना चाहिए। तुम लोगों को अक्सर इस बारे में संगति करनी चाहिए कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और देखना चाहिए कि किसके पास सत्य का अनुसरण करने की अनुभवात्मक गवाही है, और किसकी अनुभवात्मक गवाही अच्छी है, फिर उसे स्वीकार करते हुए तुम भी वैसा ही करने लगो ताकि तुम इससे लाभान्वित हो सको और अपने भ्रष्ट स्वभाव की बाधाओं से मुक्त हो सको। सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना कोई आसान बात नहीं है—तुम्हें स्वयं ही समझना होगा, और न केवल अपने अपराधों को समझना होगा बल्कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझना होगा, अपनी प्राथमिकताओं और अनुसरणों में जो गलत है उसे और उसके संभावित परिणामों को समझना होगा। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। ज्यादातर लोग प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करते हैं। हर दिन वे सोचते हैं कि अगुआ कैसे बनें, दूसरों से सम्मान कैसे पाएँ, अपना दिखावा कैसे किया जाए और गरिमापूर्ण जीवन कैसे जिया जाए। यदि लोग इन चीजों पर गहन विचार करने में असमर्थ रहें, इस तरह के जीवन का सार स्पष्ट रूप से न देख सकें, और इन चीजों में तब तक भ्रमित रहें जब तक कि बहुत वर्ष बीतने पर ईंट की किसी दीवार से टकराकर लड़खड़ाने के बाद अंततः होश में आएँ, तो क्या उनके जीवन की आध्यात्मिक प्रगति के महत्वपूर्ण मामले में देरी नहीं होगी? केवल अपने भ्रष्ट स्वभाव और अपने चुने मार्ग पर स्पष्ट दृष्टि डालकर ही लोग सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर कदम बढ़ा सकते हैं। यदि यही वह प्रभाव है जो वे पाना चाहते हैं, तो क्या स्वयं को समझना महत्वपूर्ण नहीं है? कुछ लोग खुद को जरा भी नहीं समझते, पर दूसरों के मामलों की छोटी से छोटी बातों के बारे में एकदम साफ जानकारी रखते हैं, और विशेष रूप से समझदार होते हैं। जब वे दूसरों का भेद पहचानते हैं, तो स्वयं को जाँचने के लिए दर्पण के रूप में इसका उपयोग क्यों नहीं करते? यदि तुम हमेशा कहते हो कि दूसरे लोग अहंकारी, आत्म-तुष्ट, धोखेबाज, और सत्य के प्रति समर्पण नहीं करते, लेकिन यह नहीं देख सकते कि तुम भी वैसे ही हो, तो तुम मुश्किल में हो। यदि तुम्हें कभी अपनी समस्याओं का पता नहीं चलता और सत्य पर चाहे जितने उपदेश सुन लो, उसे समझते हुए भी तुम उनसे अपनी तुलना नहीं करते, अपनी मनोदशा की जाँच करने के इच्छुक नहीं हो, और अपनी समस्याओं से गंभीरता से निपटने और उनका समाधान करने में असमर्थ हो, तो तुम्हें जीवन प्रवेश नहीं मिलेगा। यदि लोग सदैव सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने में असमर्थ रहेंगे, तो क्या उनके हृदय में खालीपन की अनुभूति नहीं होगी? उन्हें इस बात का बोध नहीं होगा कि परमेश्वर ने उनमें क्या कार्य किया है, जैसे कि उनमें कोई धारणा ही न हो। उनकी मनोदशा हमेशा धुंधलाई रहेगी, और उनके अनुसरण किसी सही उद्देश्य या दिशा की ओर नहीं होंगे। वे केवल अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार अनुसरण करेंगे और अपनी मर्जी के रास्ते पर चलेंगे। यह बात बिल्कुल पौलुस जैसी है जो केवल पुरस्कार और मुकुट पाने को महत्व देते हुए सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता था और उसका अभ्यास नहीं करता था। यदि तुम्हारा मन हमेशा अस्पष्ट दशा में रहता है, और तुम्हारे पास अनुसरण का सही मार्ग नहीं है, तो कई वर्षों तक उपदेश सुनने के बाद भी तुम पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है, और तुम्हारे हृदय में सच्चे मार्ग की जड़ें ही नहीं बन सकी हैं। यद्यपि तुम बहुत सारे धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करना जान सकते हो, लेकिन वह क्षमता तुम्हारी नकारात्मक मनोदशा या भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करने में बिल्कुल असमर्थ है। जब तुम किसी तरह की कठिनाई का सामना करते हो, तो जिन धर्म-सिद्धांत की तुम्हें समझ है वह उस कठिनाई से उबरने में, या उससे आसानी से गुजरने में मदद नहीं करेगा; यह तुम्हारी मनोदशा को बदलने या सही करने में मदद नहीं करेगा, तुम्हें अंतरात्मा के बोध के साथ जीने नहीं देगा, स्वतंत्रता और मुक्ति नहीं देगा, न ही तुम्हें किसी भी चीज से विवश होने से रोकेगा। तुम पहले कभी भी ऐसी मनोदशा में नहीं रहे हो, इससे यह साबित होता है कि तुमने मौलिक रूप से सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं किया है। यदि तुम सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करना चाहते हो, परमेश्वर के वचनों को समझना चाहते हो, परमेश्वर में सच्ची आस्था पाना चाहते हो, परमेश्वर को जानना चाहते हो, और सुनिश्चित करना चाहते हो कि परमेश्वर वास्तव में मौजूद है, तो तुमको अपनी मनोदशा की तुलना परमेश्वर के वचनों से करनी चाहिए और उसके बाद परमेश्वर के वचनों में अभ्यास और प्रवेश का मार्ग ढूँढ़ना चाहिए। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी तुलना करना चाहते हैं, लेकिन वे चाहे जितनी भी कोशिश करें, ऐसा करने में सक्षम नहीं होते। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर यह उजागर करता है कि मनुष्य का स्वभाव बहुत अहंकारी है, तो वे सोचते हैं, “मैं बहुत विनम्र हूँ और परदे के पीछे रहता हूँ। मैं अहंकारी नहीं हूँ।” परमेश्वर जिसकी बात करता है वह अहंकार क्या है? यह एक प्रकार का स्वभाव है, न कि किसी घमंडी व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति, या ऊँची आवाज में बोलना या किसी खास तरीके से ढिठाई दिखाना। बल्कि, यह तुम्हारे स्वभाव की किसी बात को संदर्भित करता है—ऐसा स्वभाव जिसमें तुम किसी भी बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते, हर चीज का तिरस्कार करते हो, हेय दृष्टि से देखते हो और किसी भी चीज की परवाह नहीं करते। तुम अहंकारी, दंभी, आत्मतुष्ट होते हो, हमेशा सोचते हो कि तुम सक्षम हो और किसी की नहीं सुनते। तुम सत्य वचन सुनते हो, फिर भी उनकी परवाह नहीं करते और तुम सत्य को महत्वहीन समझते हो। जब तुम भ्रष्ट स्वभाव दिखाते हो तब भी उसे कोई समस्या नहीं मानते और यहाँ तक सोचते हो कि कोई भी तुम्हारे बराबर नहीं है, हमेशा सोचते हो कि तुम बाकी लोगों से बेहतर हो, और चाहते हो कि दूसरे लोग तुम्हारी बात ध्यान से सुनें। ऐसा व्यक्ति अहंकारी और आत्मतुष्ट होता है। इस तरह के लोगों के पास न कोई जीवन प्रवेश होता है, और न ही सत्य वास्तविकताएँ।

किसी व्यक्ति में सत्य वास्तविकताएँ हैं या नहीं, इसका मूल्यांकन कैसे करना चाहिए? निःसंदेह, परमेश्वर के वचनों के अनुसार सटीक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सबसे पहले, यह देखो कि क्या तुम वास्तव में स्वयं को समझते हो, और क्या तुम वास्तव में अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझते हो। उदाहरण के लिए, क्या तुम्हारा स्वभाव अहंकारी है? क्या तुम काम करते समय अहंकारपूर्ण स्वभाव दिखाते हो? यदि तुम यह नहीं जानते, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो स्वयं को नहीं समझता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी मनोदशा को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकता, उसे अपने द्वारा दिखाई भ्रष्टता की थोड़ी-सी भी समझ नहीं है, वह अपने शब्दों और कार्यों का आधार सत्य को नहीं बनाता, सामने आने वाली स्थितियों में विवेक नहीं रखता और हर मामले को देखते समय आँख बंद करके विनियमों को लागू करता है, लेकिन यह नहीं जानता कि क्या सही है या क्या गलत, तो वह ऐसा व्यक्ति है जिसे सत्य की कोई समझ नहीं है। यदि तुम सत्य को समझते हो, तो तुम अपने आप को समझने में सक्षम होगे, यह जान पाओगे कि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी है, अपनी वास्तविक मनोदशा को समझ सकोगे, वास्तव में पश्चाताप करने और बदलने में समर्थ होगे और यह जान सकोगे कि सत्य का अभ्यास कैसे करना है। परंतु, यदि तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, परमेश्वर के वचनों के सत्य के व्यावहारिक पक्ष की कोई समझ नहीं रखते, परमेश्वर द्वारा उजागर किए गए लोगों के भ्रष्ट सार पर विचार नहीं करते, या उनसे अपनी तुलना नहीं करते, तो तुम हमेशा भ्रमित व्यक्ति बने रहोगे। केवल सत्य ही तुम्हें विवेकशील बनाने और सही-गलत तथा काले-सफेद के बीच अंतर करने में सक्षम बना सकता है; केवल सत्य ही तुम्हें चतुर और तर्कसंगत बना सकता है, बुद्धि दे सकता है, और तुम्हें सकारात्मक एवं नकारात्मक चीजों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर करने की क्षमता दे सकता है। यदि तुम इन चीजों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा भ्रमित व्यक्ति बने रहोगे; तुम हमेशा उलझन में, अनजान और गड्ड-मड्ड स्थिति में रहोगे। इस तरह के लोगों के पास सत्य को समझने का कोई तरीका नहीं होता और वे चाहे जितने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करें, परंतु वे सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने में असमर्थ होते हैं। यदि उनका श्रम मानक के अनुरूप नहीं है, तो उन्हें बस हटाया जाना ही बाकी होता है। उदाहरण के लिए, कोई अत्यंत प्रसिद्ध व्यक्ति कुछ करता है जिसे अधिकांश लोग एक अच्छी बात के रूप में देखते हैं, लेकिन यदि सत्य को समझने वाला कोई व्यक्ति उसे देखता है, तो उसे इसके भेद की पहचान होगी और वह तय कर सकेगा कि उस व्यक्ति के कार्यकलाप में बुरे इरादे छिपे हुए हैं—उसकी अच्छाई नकली है, चालबाजी और धोखे से भरी है और यह कि केवल कोई बुरा व्यक्ति या शैतानों का बादशाह ही ऐसा कुछ कर सकता है। ऐसा कहने का आधार क्या है? इस “अच्छी चीज” के सार को सत्य के अनुसार निरूपित किया गया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोग क्या कहते हैं, केवल सत्य का उपयोग करते हुए इसका मूल्यांकन करके ही तुम इसका सार स्पष्ट रूप से देख सकते हो : यदि यह अच्छा है, तो यह अच्छा है; बुरा है, तो यह बुरा है। परमेश्वर के वचनों के अनुसार इसका मूल्यांकन करना बिल्कुल सटीक होगा। किंतु, यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम्हारे अंदर धारणाएँ उत्पन्न होंगी और तुम कहोगे, “कुछ भला काम कर रहे व्यक्ति को क्यों उजागर किया जा रहा है और क्यों उसकी निंदा की जा रही है? उसके साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा है!” तुम इस तरीके से इसका मूल्यांकन करोगे। इस मामले के मूल्यांकन के लिए तुम्हारा आधार सत्य नहीं है, बल्कि तुम्हारे मन में कल्पित चीजें हैं। यदि तुम हमेशा चीजों को मानवीय धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार देखते हो, तो तुम कभी भी समस्याओं के सार को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाओगे; तुम केवल बाहरी दिखावों से गुमराह हो जाओगे। जब तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तो तुम चाहे जो कुछ देखो तुम्हारा दृष्टिकोण हमेशा भ्रमित, धुंधला, कोहरे में लिपटा और अस्पष्ट रहेगा, फिर भी तुम सोचोगे कि तुम्हारे पास अंतर्दृष्टि और वैचारिक गहराई है। यह पूरी तरह से आत्म-जागरूकता की कमी है। उदाहरण के लिए, यदि परमेश्वर कहता है कि कोई व्यक्ति बुरा है और उसे दंडित किया जाना चाहिए, लेकिन तुम कहते हो कि वह अच्छा व्यक्ति है और उसने अच्छे काम किए हैं, तो क्या तुम्हारे शब्द परमेश्वर के वचनों के बिल्कुल विरुद्ध और विपरीत नहीं हैं? ऐसा तब होता है जब लोग सत्य को नहीं समझते और उनमें विवेक नहीं होता। कुछ लोग बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं, किंतु सत्य को नहीं समझते हैं। वे किसी भी मामले में सावधानी नहीं बरतते और कई मामले ऐसे होते हैं जिन्हें वे साफ तौर पर नहीं देख पाते। वे नकली अगुआओं और मसीह-विरोधियों से आसानी से गुमराह हो जाते हैं; चाहे जो भी परिस्थिति उत्पन्न हो, अगर कोई बुरा व्यक्ति गड़बड़ी पैदा कर रहा होता है, वे सारे भ्रमित हो जाते हैं और बिना जाने ही उस बुरे व्यक्ति की तरह बोलने लगते हैं। उन्हें तब होश आता है जब बुरे व्यक्ति को उजागर करके उसका खुलासा कर दिया जाता है। इस तरह के लोग अक्सर कुछ न समझ पाने की मानसिकता में जीते हैं और उनका सार किसी भ्रमित व्यक्ति जैसा होता है। इस तरह के लोगों में रत्ती भर भी काबिलियत नहीं होती; वे न केवल सत्य को नहीं समझते, बल्कि उन्हें किसी भी समय गुमराह किया जा सकता है और इसलिए उनके पास सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने का कोई रास्ता नहीं होता है। हर कलीसिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं—जब कोई नकली अगुआ कोई काम करता है, तो वे उसका अनुसरण करते हैं; जब कोई मसीह-विरोधी लोगों को गुमराह कर रहा होता है, तो वे उसका अनुसरण करते हैं। संक्षेप में, वे उसी अगुआ का अनुसरण करेंगे चाहे वह व्यक्ति जो भी हो; वे उस स्त्री के समान होते हैं जो अपने पति के हर काम में उसका अनुसरण करती है। यदि अगुआ अच्छा व्यक्ति है, तो वे एक अच्छे व्यक्ति का अनुसरण करते हैं; यदि अगुआ बुरा व्यक्ति है, तो वे बुरे व्यक्ति का अनुसरण करते हैं। उनकी अपनी कोई राय या दृष्टिकोण नहीं होता। इसीलिए, ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा न करो कि वह सत्य को समझने या वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होगा। वे यदि थोड़ा भी श्रम कर सकें तो अच्छा है। पवित्र आत्मा उन लोगों में कार्य करता है जो सत्य से प्रेम करते हैं। सत्य से प्रेम करने वाले सभी लोग काबिलियत वाले हैं जो कम से कम परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं और परमेश्वर के घर के उपदेशों और संगति को समझने योग्य हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि धार्मिक दुनिया कितने विधर्म और भ्रांतियों का प्रचार-प्रसार करती है और इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि मसीह-विरोधी दुष्ट ताकतें कलीसिया को कैसे बदनाम करती हैं, निंदा और उत्पीड़न करती हैं, जो लोग सत्य से प्यार करते हैं वे अभी भी आश्वस्त हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और वे विश्वास करते हैं कि धर्मोपदेश, संगति और परमेश्वर के घर की अनुभवात्मक गवाही सत्य के अनुरूप हैं और वास्तविक गवाहियाँ हैं। समझने की क्षमता होने का यही मतलब है। यदि तुम समझते हो कि परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचन ऐसे सत्य और जीवन वास्तविकताएँ हैं जिन्हें लोगों में होना चाहिए, तो यह समझ सिद्ध करती है कि तुम पहले से ही सत्य के एक अंश को समझते हो। यदि तुम समझते हो कि परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्य सकारात्मक चीजें हैं और सत्य वास्तविकताएँ हैं, और तुम्हें पूरी तरह से यकीन है कि यही असली मामला है और सौ प्रतिशत स्वीकार करते हो कि यही वह मसला है, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य की समझ है। सत्य को समझना कोई आसान बात नहीं है; यह कुछ ऐसी बात है जिसे केवल पवित्र आत्मा द्वारा प्रबोधित लोग ही हासिल कर सकते हैं। जो लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं वे पहले से ही अपने दिल में गहराई से स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज सकारात्मक है और वह सब सत्य है, और वह सब मानवजाति के लिए बहुत मूल्यवान है। जो लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं वे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि अविश्वासी दुनिया में सब कुछ नकारात्मक है और सत्य के विरुद्ध जाता है। उनके सिद्धांत चाहे जितने भी अच्छे क्यों न लगें, वे लोगों को गुमराह करते हैं और नुकसान पहुँचाते हैं। परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सकारात्मक है, सत्य है, और लोगों के लिए उद्धार है। शैतान और दानव जो कुछ भी करते हैं वह नकारात्मक, भ्रामक और बेतुका होता है, और लोगों को गुमराह करता और नुकसान पहुँचाता है; यह परमेश्वर जो कुछ करता है उसके बिल्कुल विपरीत है। यदि तुम इस बारे में पूरी तरह से स्पष्ट हो, तो तुम्हारे पास अच्छे-बुरे की पहचान है। यदि तुम सत्य का अनुसरण करने में भी सक्षम हो, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करते हो, स्वयं को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से समझते हो और उनसे अपनी तुलना करते हो, अपनी भ्रष्टता को उसके वास्तविक रूप में देखते हो, परमेश्वर द्वारा अपने लिए पैदा की गई हर परिस्थिति में अपने द्वारा दिखाए भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करते हो और अंततः न केवल खुद को समझने में सक्षम होते हो, बल्कि दूसरों के प्रति भी विवेकवान होते हो और यह पहचान सकते हो कि कौन वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता है, कौन छद्म-विश्वासी है, कौन नकली अगुआ है, कौन मसीह-विरोधी है, और कौन लोगों को गुमराह करता है—यदि तुम इन चीजों का सटीक मूल्यांकन करने और पहचानने में सक्षम हो—तो इसका मतलब है कि तुम सत्य को समझते हो और तुम्हारे पास कुछ वास्तविकता है। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम्हारे रिश्तेदार या माता-पिता परमेश्वर के विश्वासी हैं और उन्हें बुरे कर्म करने, रुकावटें पैदा करने या सत्य को जरा भी न स्वीकारने के कारण निकाल दिया जाता है। लेकिन तुम्हें उनके भेद की पहचान नहीं है, तुम नहीं जानते कि उन्हें क्यों निकाला गया है, तुम बेहद परेशान हो जाते हो और हमेशा यह शिकायत करते हो कि परमेश्वर के घर में प्रेम नहीं है और यह लोगों के प्रति निष्पक्ष नहीं है। ऐसे में तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करके सत्य खोजना चाहिए, फिर परमेश्वर के वचनों के आधार पर यह मूल्यांकन करना चाहिए कि ये रिश्तेदार किस तरह के लोग हैं। अगर तुम वाकई सत्य को समझते हो, तो तुम उन्हें सटीक रूप से परिभाषित कर लोगे और देखोगे कि परमेश्वर जो भी करता है वह सही होता है, और वह धार्मिक परमेश्वर है। फिर तुम्हें कोई शिकायत नहीं रहेगी, तुम परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सकोगे, और अपने रिश्तेदारों या माता-पिता का बचाव करने की कोशिश नहीं करोगे। यहाँ मुख्य बात अपनी रिश्तेदारी खत्म करना नहीं है, बल्कि बस यह निर्धारित करना है कि वे किस तरह के लोग हैं, और तुम्हें इस तरह का बनाना है कि तुम उनके प्रति विवेकशील हो जाओ, और जान सको कि उन्हें क्यों निकाला गया है। अगर ये चीजें तुम्हारे दिल में बिल्कुल स्पष्ट हो जाती हैं, और तुम्हारे दृष्टिकोण सही और सत्य के अनुरूप होते हैं, तो तुम परमेश्वर की तरफ खड़े होने में सक्षम होगे, और इस मामले में तुम्हारे दृष्टिकोण पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों से मेल खाएँगे। अगर तुम सत्य को स्वीकारने में सक्षम नहीं हो या लोगों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं देखते हो, और लोगों को देखने में अभी भी दैहिक संबंधों और परिप्रेक्ष्यों का पक्ष लेते हो, तो तुम इस दैहिक संबंध के बंधन से कभी नहीं निकल पाओगे, और अभी भी इन लोगों को अपने रिश्तेदार मानोगे—यहाँ तक कि उन्हें कलीसिया के अपने भाई-बहनों से भी अधिक करीब मानोगे, ऐसे में इस मामले में परमेश्वर के वचनों और अपने परिवार के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में विरोधाभास होगा—यहाँ तक कि टकराव भी होगा, और ऐसी परिस्थिति में तुम्हारे लिए परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना नामुमकिन हो जाएगा और तुम्हारे मन में उसके प्रति धारणाएँ और गलतफहमियाँ पैदा हो जाएँगी। इस प्रकार, अगर लोगों को परमेश्वर के साथ सुसंगत होना है, तो सबसे पहले मामलों को लेकर उनके दृष्टिकोण परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होने चाहिए; उन्हें परमेश्वर के वचनों के आधार पर लोगों और चीजों को देखने में सक्षम होना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को सत्य मानना चाहिए, और मनुष्य की पारंपरिक धारणाओं को दरकिनार करने में सक्षम होना चाहिए। तुम चाहे किसी भी व्यक्ति या मामले का सामना करो, तुम अपने दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य परमेश्वर के समान बनाए रखने में सक्षम होगे, और तुम्हारे दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य सत्य के साथ समन्वय में होंगे। इस तरह, तुम्हारे दृष्टिकोण और लोगों के साथ पेश आने का तुम्हारा तरीका, परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं होगा, तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाओगे और परमेश्वर के साथ अनुरूपता में होगे। ऐसे लोग फिर कभी परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर पाएँगे; यही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर पाना चाहता है।

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