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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन

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भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण सारी मानवजाति के वास्ते है, और समूची मानवजाति की ओर निर्देशित है। यद्यपि यह देह में उसका कार्य है, फिर भी इसे अब भी सारी मानवजाति की ओर निर्देशित किया गया है; वह सारी मानवजाति का परमेश्वर है, वह सभी सृजे गए और न सृजे गए प्राणियों का परमेश्वर है। यद्यपि देह में उसका कार्य एक सीमित दायरे के भीतर होता है, और इस कार्य का विषय भी सीमित होता है, फिर भी हर बार जब वह अपना कार्य करने के लिए देह धारण करता है तो वह अपने कार्य का एक विषय चुनता है जो अत्यंत प्रतिनिधिक है; वह सामान्य एवं मामूली लोगों के एक समूह को नहीं चुनता है कि उन पर कार्य करे, किन्तु इसके बजाए अपने कार्य के विषय के रूप में लोगों के ऐसे समूह को चुनता है जो देह में उसके कार्य के प्रतिनिधि होने में सक्षम हैं। लोगों के ऐसे समूह को चुना गया है क्योंकि देह में उसके कार्य का दायरा सीमित होता है, और इसे विशेष रूप से उसके देहधारी शरीर के लिए तैयार किया गया है, और इसे विशेष रूप से देह में उसके कार्य के लिए चुना गया है। परमेश्वर के द्वारा अपने कार्य के विषयों का चुनाव बेबुनियाद नहीं होता है, परन्तु सिद्धान्त के अनुसार होता हैः कार्य का विषय देहधारी परमेश्वर के कार्य के लिए अवश्य लाभदायक होना चाहिए, और उसे सम्पूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधित्व करने में अवश्य सक्षम होना चाहिए। उदाहरण के लिए, यीशु के व्यक्तिगत छुटकारे को स्वीकार करने के द्वारा यहूदी समस्त मानवजाति का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम थे, और देहधारी परमेश्वर के व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने के द्वारा चीनी लोग समस्त मानवजाति का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हैं। समस्त मानवजाति के विषय में यहूदियों के प्रतिनिधित्व का एक आधार है, और परमेश्वर के व्यक्तिगत विजय को स्वीकार करने के द्वारा समस्त मानवजाति के विषय में चीनियों के प्रतिनिधित्व का भी एक आधार है। यहूदियों के बीच किए गए छुटकारे के कार्य से अधिक कोई भी चीज़ छुटकारे के महत्व को प्रगट नहीं करती है, और चीनी लोगों के बीच विजय के कार्य से अधिक कोई भी चीज़ विजय के कार्य की सम्पूर्णता एवं सफलता को प्रगट नहीं करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि देहधारी परमेश्वर के कार्य एवं वचन का लक्ष्य केवल लोगों का एक छोटा समूह ही है, परन्तु वास्तव में, ऐसे छोटे समूह के बीच उसका कार्य समूचे विश्व का कार्य है, और उसके वचन को समस्त मानवजाति की ओर निर्देशित किया गया है। जब देह में उसका कार्य समाप्त हो जाता है उसके बाद, ऐसे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं वे उस कार्य को फैलाना शुरू कर देते हैं जिसे उसने उनके बीच किया है। देह में किए गए उसके कार्य के विषय में सबसे अच्छी बात यह है कि वह सटीक वचनों एवं उपदेशों को, और मानवजाति के लिए अपनी सटीक इच्छा को उन लोगों के लिए छोड़ सकता है जो उसका अनुसरण करते हैं, ताकि बाद में उसके अनुयायी देह में किए गए उसके समस्त कार्य और समूची मानवजाति के लिए उसकी इच्छा को अत्यधिक सटीकता एवं अत्यंत ठोस रूप में उन लोगों तक पहुंचा सकते हैं जो इस मार्ग को स्वीकार करते हैं। केवल मनुष्य के बीच देह में प्रगट परमेश्वर का कार्य ही सचमुच में परमेश्वर के अस्तित्व और मनुष्य के साथ रहने के तथ्य को पूरा करता है। केवल यह कार्य ही परमेश्वर के मुख को देखने, परमेश्वर के कार्य की गवाही देने, और परमेश्वर के व्यक्तिगत वचन को सुनने हेतु मनुष्य की इच्छा को पूरा करता है। देहधारी परमेश्वर उस युग को अन्त की ओर लाता है जब सिर्फ यहोवा की पीठ ही मानवजाति को दिखाई दी थी, और साथ ही अस्पष्ट परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास का भी समापन करता है। विशेष रूप में, अंतिम देहधारी परमेश्वर का कार्य सारी मानवजाति को एक ऐसे युग में लाता है जो और अधिक वास्तविक, और अधिक व्यावहारिक, एवं और अधिक मनोहर है। वह न केवल व्यवस्था एवं सिद्धान्त के युग का अन्त करता है; बल्कि अति महत्वपूर्ण रूप से, वह मानवजाति पर ऐसे परमेश्वर को प्रगट करता है जो वास्तविक एवं साधारण है, जो धर्मी एवं पवित्र है, जो प्रबंधकीय योजना के कार्य को चालू करता है और मानवजाति के रहस्यों एवं मंज़िल को प्रदर्शित करता है, जिसने मानवजाति को सृजा था और प्रबंधकीय कार्य को अन्त की ओर ले जाता है, और जो हज़ारों वर्षों से छिपा हुआ है। वह अस्पष्टता के युग को सम्पूर्ण अन्त की ओर ले जाता है, वह उस युग का अन्त करता है जिसमें समूची मानवजाति परमेश्वर के मुख को खोजने की इच्छा करती थी परन्तु वह ऐसा करने में असमर्थ थी, वह ऐसे युग का अन्त करता है जिसमें समूची मानवजाति शैतान की सेवा करती थी, और समस्त मानवजाति की अगुवाई पूरी तरह से एक नए विशेष काल (युग) में करता है। यह सब परमेश्वर के आत्मा के बजाए देह में प्रगट परमेश्वर के कार्य का परिणाम है। जब परमेश्वर अपनी देह में कार्य करता है, तो ऐसे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं वे आगे से उन अस्पष्ट एवं संदिग्ध चीज़ों को खोजते एवं टटोलते नहीं हैं, और अस्पष्ट परमेश्वर की इच्छा का अन्दाज़ा लगाना बन्द कर देते हैं। जब परमेश्वर देह में अपने कार्य को फैलाता है, तो ऐसे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं वे उस कार्य को सभी मसीही समुदायों एवं मतों में आगे पहुंचाएंगे जिसे उसने देह में किया है, और वे उसके सभी वचनों को समूची मानवजाति के युगों से कहेंगे। सब कुछ जिसे उन लोगों के द्वारा सुना गया है जिन्होंने उसके सुसमाचार को प्राप्त किया है वे उसके कार्य के तथ्य होंगे, ऐसी चीज़ें होंगीं जिन्हें मनुष्य के द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा एवं सुना गया है, और तथ्य होंगे और झूठी शिक्षा नहीं होगी। ये तथ्य ऐसे प्रमाण हैं जिनके तहत वह उस कार्य को फैलाता है, और वे ऐसे यन्त्र हैं जिन्हें वह उस कार्य को फैलाने में इस्तेमाल करता है। तथ्यों की मौजूदगी के बगैर, उसका सुसमाचार सभी देशों एवं सभी स्थानों तक नहीं फैलेगा; तथ्यों के बिना किन्तु केवल मनुष्यों की कल्पनाओं के साथ, वह समूचे संसार पर विजय पाने के कार्य को करने में कभी सक्षम नहीं होगा। आत्मा मनुष्य के लिए अस्पृश्य है, और मनुष्य के लिए अदृश्य है, और आत्मा का कार्य मनुष्य के लिए परमेश्वर के कार्य के विषय में और कोई प्रमाण एवं तथ्यों को छोड़ने में असमर्थ है। मनुष्य परमेश्वर के सच्चे चेहरे को कभी नहीं देख पाएगा, और वह हमेशा ऐसे अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास करता रहेगा जो अस्तित्व में है ही नहीं। मनुष्य कभी परमेश्वर के मुख को नहीं देख पाएगा, न ही मनुष्य परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचनों को कभी सुन पाएगा। मनुष्य की कल्पनाएं, आखिरकार, खोखली होती हैं, और परमेश्वर के सच्चे चेहरे का स्थान नहीं ले सकती हैं; मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के कार्य की नकल (रूप धारण) नहीं की जा सकती है। स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर और उसके कार्य को केवल देहधारी परमेश्वर के द्वारा ही पृथ्वी पर लाया जा सकता है जो मनुष्य के बीच में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करता है। यह सबसे आदर्श तरीका है जिसके अंतर्गत परमेश्वर मनुष्य पर प्रगट होता है, जिसके अंतर्गत मनुष्य परमेश्वर को देखता है और परमेश्वर के असली चेहरे को जानने लगता है, और इसे किसी देह रहित परमेश्वर के द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर के द्वारा इस चरण के अपने कार्य को सम्पन्न करने के बाद, उसके कार्य ने पहले से ही सर्वोत्तम प्रभाव को हासिल लिया है, और पूरी तरह सफल रहा है। देह में प्रगट परमेश्वर के व्यक्तिगत कार्य ने पहले से ही परमेश्वर के समूचे प्रबंधन के कार्य का नब्बे प्रतिशत कार्य पूरा कर लिया है। इस देह ने उसके समस्त कार्य को एक बेहतर शुरूआत, और उसके समस्त कार्य के लिए एक सारांश प्रदान किया है, और उसके समस्त कार्य की घोषणा की है, और इस समस्त कार्य के लिए फिर से सम्पूर्ण आपूर्ति की है। इसके पश्चात्, परमेश्वर के कार्य के चौथे चरण को करने के लिए और कोई दूसरा देहधारी परमेश्वर नहीं होगा, और परमेश्वर के तीसरे देहधारण का और कोई चमत्कारीय कार्य नहीं होगा।

देह में परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण समूचे युग के उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करता है, और मनुष्य के काम के समान किसी निश्चित समय अवधि का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। और इस प्रकार उसके अंतिम देहधारण के कार्य के अन्त का अभिप्राय यह नहीं है कि उसका कार्य पूर्ण समापन की ओर आ गया है, क्योंकि देह में उसका कार्य समूचे युग का प्रतिनिधित्व करता है, और केवल उसी समय अवधि का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता है जिसमें वह देह में कार्य करता है। यह ठीक ऐसा है कि वह उस समय के दौरान जब वह देह में है समूचे युग के अपने कार्य को पूरा करता है, उसके पश्चात् यह सभी स्थानों में फैल जाता है। देहधारण के पश्चात् परमेश्वर अपनी सेवकाई को पूरा करता है, वह अपने भविष्य के कार्य को उन्हें सौंपेगा जो उसका अनुसरण करते हैं। इस रीति से, समूचे युग के उसके कार्य को सही सलामत सम्पन्न किया जाएगा। देहधारण के समूचे युग के कार्य को केवल तभी सम्पूर्ण माना जाएगा जब एक बार यह समूचे संसार के आर पार फैल जाए। देहधारी परमेश्वर का कार्य एक नये विशेष युग (काल) को प्रारम्भ करता है, और ऐसे लोग जो उसके कार्य को निरन्तर जारी रखते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें उसके द्वारा उपयोग किया जाता है। मनुष्य के द्वारा किया गया समस्त कार्य देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के अन्तर्गत होता है, और इस दायरे के परे जाने में असमर्थ होता है। यदि देहधारी परमेश्वर अपने कार्य को करने के लिए नहीं आता, तो मनुष्य पुराने युग को समापन की ओर लाने में समर्थ नहीं होता, और नए विशेष युग की शुरुआत करने के समर्थ नहीं होता। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य महज उसके कर्तव्य के दायरे के भीतर होता है जो मानवीय रूप से संभव है, और परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही आ सकता है और उस कार्य को पूरा कर सकता है जो उसे करना चाहिए, और उसके अलावा, कोई भी उसके स्थान पर इस कार्य को नहीं कर सकता है। निश्चित रूप से, जो कुछ मैं कहता हूँ वह देधारण के कार्य के सम्बन्ध में है। यह देहधारी परमेश्वर पहले कार्य के प्रथम चरण को क्रियान्वित करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, उसके पश्चात् वह और अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है। उस कार्य का लक्ष्य है मनुष्य पर विजय। एक लिहाज से, परमेश्वर का देहधारण मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, जिसके साथ ही वह और भी अधिक कार्य करता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, और इस प्रकार मनुष्य उसके विषय में और भी अधिक आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है। वह सिर्फ मनुष्यों के बीच में विजय का कार्य करता है जिनके पास उसके प्रति असंख्य धारणाएं होती हैं। इसकी परवाह किए बगैर कि वे किस प्रकार उससे व्यवहार करते हैं, जब एक बार वह अपनी सेवकाई को पूरा कर लेता है, तो सभी मनुष्य उसके प्रभुत्व के अधीन हो चुके होंगे। इस कार्य की सच्चाई न केवल चीनी लोगों के बीच में प्रतिबिम्बित हुई है, बल्कि यह दर्शाती है कि किस प्रकार सम्पूर्ण मानवजाति को जीत लिया जाएगा। ऐसे प्रभाव जिन्हें इन लोगों के ऊपर हासिल किया गया है वे उन प्रभावों के एक अग्रदूत होते हैं जिन्हें समूची मानवजाति पर हासिल किया जाएगा, और उस कार्य के प्रभाव जिन्हें वह भविष्य में करता है वे उन लोगों पर प्रभावों को तेजी से बढ़ा देंगे। देह में प्रगट परमेश्वर का कार्य किसी बड़े स्वागत ध्वनी को शामिल नहीं करता है, न ही यह रहस्य में ढंका होता है। यह यथार्थ एवं वास्तविक है, और यह ऐसा कार्य है जिसमें एक और एक दो के बराबर होते हैं। यह किसी से छिपा हुआ नहीं है, न ही यह किसी को धोखा देता है। जो कुछ लोग देखते हैं वे वास्तविक एवं विशुद्ध चीजें हैं, और जो कुछ मनुष्य अर्जित करता है वह वास्तविक सत्य एवं ज्ञान है। जब कार्य समाप्त होता है, तब मनुष्य के पास उसका नया ज्ञान होगा, और ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर को खोजते हैं उनके पास आगे से उसके विषय में कोई धारणाएं नहीं होंगीं। यह सिर्फ चीनी लोगों पर उसके कार्य का प्रभाव नहीं है, बल्कि साथ ही सम्पूर्ण मानवजाति को जीतने में उसके कार्य के प्रभाव को भी दर्शाता है, क्योंकि इस देह, एवं इस देह के कार्य, एवं इस देह की हर एक चीज़ की अपेक्षा कोई भी चीज़ सम्पूर्ण मानवजाति पर विजय पाने के कार्य के लिए अत्यधिक लाभदायक नहीं है। वे आज उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं, और भविष्य में उसके कार्य के लिए लाभदायक हैं। यह देह समस्त मानवजाति को जीत लेगा और समस्त मानवजाति को अर्जित कर लेगा। ऐसा कोई बेहतर कार्य नहीं है जिसके माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति परमेश्वर को निहारेगी, एवं परमेश्वर की आज्ञा मानेगी, एवं परमेश्वर को जानेगी। मनुष्य के द्वारा किया गया कार्य मात्र एक सीमित दायरे को दर्शाता है, और जब परमेश्वर अपना कार्य करता है तो वह किसी निश्चित व्यक्ति से बात नहीं करता है, परन्तु सम्पूर्ण मानवजाति, एवं उन सभी लोगों से बात करता है जो उसके वचनों को स्वीकार करते हैं। वह अन्त जिसकी वह घोषणा करता है वह सभी मनुष्यों का अन्त है, और सिर्फ किसी निश्चित व्यक्ति का अन्त नहीं है। वह किसी के साथ खास व्यवहार नहीं करता है, न ही किसी को पीड़ित करता है, और वह सम्पूर्ण मानवजाति के लिए कार्य करता है, और उससे बोलता है। और इस प्रकार इस देहधारी परमेश्वर ने समस्त मानवजाति को उसके किस्म (वर्ग) के अनुसार पहले से ही वर्गीकृत कर दिया है, समस्त मानवजाति का पहले से ही न्याय कर दिया है, समस्त मानवजाति के लिए पहले से ही उपयुक्त मंज़िल का इंतज़ाम कर लिया है। यद्यपि परमेश्वर सिर्फ चीन में ही अपना कार्य करता है, फिर भी वास्तव में उसने तो पहले से ही सम्पूर्ण विश्व के कार्य का दृढ़ निश्चय कर लिया है। अपने कथनों एवं इंतज़ामों को कदम दर कदम करने से पहले वह तब तक इंतज़ार नहीं कर सकता है जब तक उसका कार्य समस्त मानवजाति में फैल न जाए। क्या बहुत देर न हो जाएगी? अब वह भविष्य के कार्य को समय से पहले पूरा करने में पूरी तरह से सक्षम है। क्योंकि वह परमेश्वर जो कार्य कर रहा है वह देहधारी परमेश्वर है, वह सीमित दायरे में असीमित कार्य कर रहा है, और इसके पश्चात् वह मनुष्य से उस कर्तव्य का पालन करवाएगा जिसे मनुष्य को करना चाहिए; यह उसके कार्य का सिद्धान्त है। वह केवल कुछ समय के लिए ही मनुष्य के साथ जीवन बिता सकता है, और समूचे युग के कार्य के समाप्त होने तक उसके साथ नहीं रह सकता है। यह इसलिए है क्योंकि वह ऐसा परमेश्वर है जो समय से पहले ही अपने भविष्य के कार्य की भविष्यवाणी करता है। उसके पश्चात्, वह अपने वचनों के द्वारा सम्पूर्ण मानवजाति को उसके किस्म के अनुसार वर्गीकृत करेगा, और मानवजाति उसके वचनों के अनुसार उसके कदम दर कदम कार्य में प्रवेश करेगी। कोई भी नहीं बचेगा, और सभी को इसके अनुसार अभ्यास करना होगा। अतः, भविष्य में युग को उसके वचनों के अनुसार मार्गदर्शन दिया जाएगा, और आत्मा के द्वारा मार्गदर्शन नहीं दिया जाएगा।

देह में प्रगट परमेश्वर के कार्य को देह में अवश्य किया जाना चाहिए। यदि इसे सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया जाता है तो उसके कोई प्रभाव नहीं होंगे। भले ही इसे आत्मा के द्वारा किया गया होता, फिर भी वह कार्य किसी बड़े महत्व का नहीं होता, और अन्ततः रज़ामन्द करनेवाला (मनाने वाला) नहीं होता। सभी जीवधारी जानना चाहते हैं कि सृष्टिकर्ता के कार्य का महत्व है या नहीं, और यह क्या दर्शाता है, और यह किस के लिए है, और परमेश्वर का कार्य अधिकार एवं बुद्धि से भरा हुआ है या नहीं, और यह अत्यंत मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण है या नहीं। वह कार्य जिसे वह करता है वह सम्पूर्ण मानवजाति के उद्धार के लिए है, शैतान को हराने के लिए है, और सभी चीज़ों के मध्य स्वयं की गवाही देने के लिए है। उसी रूप में, वह कार्य जिसे वह करता है वह अवश्य ही बड़े महत्व का होगा। मनुष्य की देह को शैतान के द्वारा भष्ट किया गया है, और बिलकुल अन्धा कर दिया गया है, और गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया गया है। परमेश्वर किस लिए व्यक्तिगत रूप से देह में कार्य करता है उसका अत्यंत मौलिक कारण है क्योंकि उसके उद्धार का विषय है मनुष्य, जो देह से है, और क्योंकि शैतान भी परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मनुष्य पर विजय पाने का कार्य है, और ठीक उसी समय, मनुष्य भी परमेश्वर के उद्धार का विषय है। इस रीति से, देहधारी परमेश्वर का कार्य परम आवश्यक है। शैतान ने मनुष्य की देह को भ्रष्ट कर दिया है, और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, और ऐसा विषय बन गया है जिसे परमेश्वर के द्वारा हराया जाना है। इस रीति से, शैतान से युद्ध करने और मनुष्य को बचाने का कार्य पृथ्वी पर घटित होता है, और शैतान से युद्ध करने के लिए परमेश्वर को अवश्य मनुष्य बनना होगा। यह अत्यंत व्यावहारिकता का कार्य है। जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आत्मिक आयाम में अपना कार्य कर रहा है, और आत्मिक आयाम में अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर वास्तविक करता है। वह प्राणी जिस पर विजय पाया जाता है वह मनुष्य है, जो उसके प्रति अनाज्ञाकारी है, वह प्राणी जिसे पराजित किया गया है वह शैतान का मूर्त रूप है (निश्चित रूप से, यह भी मनुष्य ही है), जो परमेश्वर से शत्रुता में है, और वह प्राणी है जिसे अन्ततः बचाया जाता है वह भी मनुष्य ही है। इस रीति से, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक ज़रूरी हो जाता है कि ऐसा मनुष्य बने जिसके पास एक जीवधारी का बाहरी आवरण हो, ताकि वह शैतान के साथ वास्तविक युद्ध करने में सक्षम हो, एवं मनुष्य पर विजय पाए, जो उसके प्रति अनाज्ञाकारी है और उसके समान ही बाहरी आवरण धारण किए हुए है, जो उसके समान ही बाहरी आवरण का हो और जिसे शैतान के द्वारा नुकसान पहुंचाया गया हो। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का विषय मनुष्य है, और उसके उद्धार का विषय मनुष्य है, जिसे उसके द्वारा सृजा गया था। अतः उसे अवश्य मनुष्य बनना होगा, और इस रीति से, उसका कार्य और अधिक आसान हो जाता है। वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और, उसके अतिरिक्त, मनुष्य को बचाने में समर्थ है। यद्यपि यह देह सामान्य एवं वास्तविक है, फिर भी यह आम देह नहीं है: यह ऐसी देह नहीं है जो महज मानवीय है, परन्तु ऐसी देह है मानवीय एवं ईश्वरीय दोनों है। यह मनुष्य से उसका अन्तर है, और परमेश्वर की पहचान का चिन्ह है। केवल ऐसी देह ही वह काम कर सकता है जिसे वह करने का इरादा करता है, और देह में परमेश्वर की सेवा को पूरा कर सकता है, और मनुष्यों के बीच में अपने कार्य को पूरी तरह से पूर्ण कर सकता है। यदि यह ऐसा नहीं होता, तो उसका कार्य हमेशा मनुष्य के मध्य खोखला एवं त्रुटिपूर्ण होता। यद्यपि परमेश्वर शैतान के आत्मा के साथ युद्ध कर सकता है और विजयी होकर उभर सकता है, फिर भी भ्रष्ट हो चुके मनुष्य के पुराने स्वभाव का समाधान कभी नहीं किया जा सकता है, और ऐसे लोग जो उसके प्रति अनाज्ञाकारी हैं और उसका विरोध करते हैं वे उसके प्रभुत्व के अधीन कभी नहीं हो सकते हैं, कहने का तात्पर्य है, वह कभी मानवजाति को जीत नहीं सकता है, और समूची मानवजाति को दोबारा कभी अर्जित नहीं कर सकता है। यदि पृथ्वी पर उसके कार्य का समाधान नहीं किया जा सकता है, तो उसके प्रबन्धन को कभी भी समाप्ति की ओर नहीं लाया जाएगा, और समूची मानवजाति विश्राम में प्रवेश करने में सक्षम नहीं होगी। यदि परमेश्वर अपने सभी जीवधारियों के साथ विश्राम में प्रवेश नहीं कर सकता है, तब ऐसे प्रबंधकीय कार्य का कभी कोई परिणाम नहीं होगा, और फलस्वरूप परमेश्वर की महिमा विलुप्त हो जाएगी। यद्यपि उसकी देह के पास कोई अधिकार नहीं है, फिर भी वह कार्य जिसे वह करता है अपने प्रभाव को हासिल कर चुका होगा। यह उसके कार्य का अनिवार्य निर्देशन है। इस बात की परवाह किए बगैर कि उसकी देह अधिकार को धारण करता है या नहीं, जब तक वह स्वयं परमेश्वर के कार्य को करने में सक्षम है, तब तक वह स्वयं परमेश्वर है। इसकी परवाह किए बगैर कि यह देह कितना सामान्य एवं साधारण है, वह उस कार्य को कर सकता है जिसे उसे करना चाहिए, क्योंकि यह देह परमेश्वर है और मात्र एक मनुष्य नहीं है। वह कारण कि देह वह कार्य कर सकता है जिसे मनुष्य नहीं कर सकता है क्योंकि उसका भीतरी मूल-तत्व किसी भी मनुष्य के समान नहीं है, और वह कारण कि वह मनुष्य का उद्धार कर सकता है क्योंकि उसकी पहचान किसी भी मनुष्य से अलग है। यह देह मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह मनुष्य है और उससे भी बढ़कर परमेश्वर है, क्योंकि वह ऐसा काम कर सकता है जिसे हाड़-मांस का कोई सामान्य मनुष्य नहीं कर सकता है, और क्योंकि वह भ्रष्ट मनुष्य का उद्धार कर सकता है, जो पृथ्वी पर उसके साथ मिलकर रहता है। यद्यपि वह मनुष्य के समान है, फिर भी देहधारी परमेश्वर किसी भी बेशकीमती व्यक्ति की अपेक्षा मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह ऐसा कार्य कर सकता है जिसे परमेश्वर के आत्मा के द्वारा नहीं किया जा सकता है, वह स्वयं परमेश्वर की गवाही देने के लिए परमेश्वर के आत्मा की अपेक्षा अधिक सक्षम है, और मानवजाति को सम्पूर्ण रीति से अर्जित करने के लिए परमेश्वर के आत्मा की अपेक्षा अधिक सक्षम है। परिणामस्वरूप, यद्यपि यह देह सामान्य एवं साधारण है, फिर भी मानवजाति के निमित्त उसका योगदान और मानवजाति के अस्तित्व के निमित्त उसका महत्व उसे अत्यंत बहुमूल्य बना देता है, और इस देह का वास्तविक मूल्य एवं महत्व किसी भी मनुष्य के लिए अतुलनीय है। यद्यपि यह देह सीधे तौर पर शैतान का नाश नहीं कर सकता है, फिर भी वह मानवजाति को जीतने के लिए और शैतान को हराने के लिए अपने कार्य का उपयोग कर सकता है, और शैतान को सम्पूर्ण रीति से अपनी प्रभुता के अधीन कर सकता है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने देह धारण किया है इसलिए वह शैतान को हरा सकता है और वह मानवजाति का उद्धार करने में सक्षम है। वह सीधे तौर पर शैतान का विनाश नहीं करता है, परन्तु देह धारण करता है ताकि मानवजाति को जीतने के लिए कार्य करे, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है। इस रीति से, वह सभी प्राणियों के मध्य स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही देने में सक्षम है, और वह भ्रष्ट हो चुके मनुष्य को बेहतर ढंग से बचाने में सक्षम है। परमेश्वर के आत्मा के द्वारा शैतान के प्रत्यक्ष विनाश की अपेक्षा देहधारी परमेश्वर के द्वारा शैतान की पराजय बड़ी गवाही देती है, तथा यह और अधिक रज़ामन्द करने वाली बात है। देह में प्रगट परमेश्वर सृष्टिकर्ता को जानने के लिए मनुष्य की बेहतर ढंग से सहायता करने में सक्षम है, और सभी प्राणियों के मध्य स्वयं की बेहतर ढंग से गवाही देने में सक्षम है।

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