वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

हमने बस अभी अभी उस समस्त कार्य के बारे में बात की है जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया गया था, ऐसी चीज़ों का क्रम जिसे उसने पहली बार किया था। इन चीज़ों में से प्रत्येक परमेश्वर के प्रबन्धकीय योजना, और परमेश्वर की इच्छा से सम्बन्धित है। वे स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार से सम्बन्धित हैं। यदि हम और अच्छे से जो परमेश्वर के पास है तथा जो परमेश्वर है उसे समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग तक नहीं रूकेंगे, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का शुभारम्भ किया है, तो हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में पधार चुके हैं—एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है। इस युग में, परमेश्वर ने एक बार फिर कुछ ऐसा किया जो पहली बार था। इस नए युग का कार्य परमेश्वर और मानव जाति दोनों के लिए एक शुरूआती बिन्दु था। यह नया शुरूआती बिन्दु एक बार फिर से एक नया कार्य था जिसे परमेश्वर ने पहली बार किया था। यह नया कार्य पहले से पूर्वानुमानित नहीं था जिसे परमेश्वर ने किया था जिस की कल्पना मनुष्यों, एवं सभी जीवधारियों के द्वारा नहीं की जा सकती थी। यह कुछ ऐसा है जिसे अब सभी लोग जानते हैं—यह पहली बार हुआ जब परमेश्वर एक मानव बन गया, पहली बार उस ने मानव के रूप, और एक मानव की पहचान के साथ अपना कार्य प्रारम्भ किया था। यह नया कार्य इस बात का द्योतक है कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपने कार्य को पूर्ण किया था, और यह कि वह आगे से व्यवस्था के अधीन कुछ नहीं करेगा और कुछ नहीं बोलेगा। ना ही वह व्यवस्था के रूप में या व्यवस्था के नियमों और सिद्धांतों के अनुसार कुछ बोलेगा या करेगा। अर्थात्, व्यवस्था पर आधारित उसके सभी कार्य हमेशा हमेशा के लिए रूक गए और जारी नहीं रहेंगें, क्योंकि परमेश्वर नया कार्य और नई चीज़ों को प्रारम्भ करना चाहता था, और एक बार फिर उसकी योजनाओं का एक नया शुरूआती बिन्दु था। इस प्रकार, परमेश्वर को मानव जाति की अगुवाई एक नए युग में करना था।

चाहे यह मनुष्य के लिए एक आनन्ददायक समाचार हो या अशुभ समाचार यह इस पर निर्भर है कि उनका सार क्या था। ऐसा कहा जा सकता है कि यह एक आनन्ददायक समाचार नहीं था, किन्तु यह कुछ लोगों के लिए एक अशुभ समाचार था, क्योंकि जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य शुरू किया, तो वे लोग जिन्होंने बस व्यवस्थाओं और नियमों का अनुसरण किया था, और जिन्हों ने बस सिद्धांतों का अनुसरण किया था लेकिन परमेश्वर का भय नहीं माना था वे परमेश्वर के नए कार्य पर दोष लगाने के लिए उसके पुराने कार्य के प्रयोग की ओर झुकने लगे। इन लोगों के लिए, यह एक अशुभ समाचार था; परन्तु प्रत्येक व्यक्ति जो निर्दोष और खुले हृदय का था, जो परमेश्वर के प्रति ईमानदार था और उसके छुटकारे को पाने की इच्छा करता था, उसके लिए परमेश्वर का पहला देहधारण एक आनन्ददायक समाचार था। जब से मनुष्य अस्तित्व में आए हैं, यह पहली बार था जब परमेश्वर एक ऐसे रूप में जो आत्मा नहीं था मानव जाति के बीच प्रकट हुआ और जीया था, उस के बजाए, वह मनुष्य से जन्मा और मनुष्य के पुत्र के रूप में लोगों के बीच प्रकट हुआ और जीया, और उनके बीच काम किया था। इस "पहली बार" ने लोगों की धारणाओं को तोड़ डाला और जो सभी कल्पनाओं से परे था। इस के अतिरिक्त, परमेश्वर के सभी अनुयायियों को एक स्पर्शयोग्य लाभ मिला। परमेश्वर ने ना केवल पुराने युग को खत्म कर दिया, परन्तु उसने काम करने की पुरानी पद्धतियों, और कार्यशैली को भी समाप्त कर दिया था। उसने आगे से अपने सन्देशवाहकों को अपनी इच्छा को संप्रेषित करने की अनुमति नहीं दी, और वह आगे से बादलों पर छिपा हुआ नहीं था, और न ही फिर वह बादलों के गर्जन के बीच आज्ञा देते हुए मनुष्य के समक्ष प्रकट हुआ या उनसे बोला. पहले की किसी भी चीज़ से अलग, एक ऐसी रीति के द्वारा जो मनुष्यों के लिए अकल्पनीय है और जो उनके लिए समझना और स्वीकार करना कठिन था—देहधारण करना—उस युग के कार्य को विकसित करने के लिए वह मनुष्य का पुत्र बन गया था। इस कदम से मानव जाति भौंचक्की हो गयी, और यह उन के लिए बहुत असुविधाजनक था, क्योंकि परमेश्वर ने एक बार फिर एक नया कार्य शुरू किया था जिसे उसने पहले कभी नहीं किया था। आज, हम एक नज़र देखेंगे कि परमेश्वर ने इस नए युग में कौन सा नया कार्य शुरू किया था, और इस पूरे नए कार्य में, क्या हम परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझ सकते हैं?

निम्नलिखित वचन बाइबल के नए नियम में दर्ज़ हैं

1. (मत्ती 12:1) उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उसके चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।

2. (मत्ती12:6-8) पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, 'मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,' तो तुम निर्दोष को दोषी न ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।

आओ पहले हम इस अंश को देखें: "उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से हो कर जा रहा था, और उस के चेलों को भूख लगी तो वे बालें तोड़-तोड़कर खाने लगे।"

हमने इस अंश को क्यो चुना है? इसका परमेश्वर के स्वभाव से क्या सम्बन्ध है? इस पाठ में, पहली चीज़ जो हम जानते हैं वह यह है कि वह सब्त का दिन था, परन्तु प्रभु यीशु बाहर गया और अपने चेलों को अनाज के खेतों में ले गया। इस से ज्यादा "उग्र" क्या हो सकता है कि वे "बालें तोड़-तोड़ कर खाने लगे।" व्यवस्था के युग में, यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था थी कि वे सब्त के दिन यों ही बाहर नहीं जा सकते थे और किसी गतिविधि में भाग नहीं ले सकते थे—बहुत सी ऐसी चीज़ें थीं जिन्हें सब्त के दिन नहीं किया जा सकता था। प्रभु यीशु की तरफ से यह कार्य उनके लिए पेचीदा था जो एक लम्बे समय से व्यवस्था के अधीन जीवन बिता रहे थे, और इस ने आलोचना को भी भड़काया था। उनके भ्रम और जो यीशु ने किया था उस पर उन्हों ने किस प्रकार बात की उस के विषय में, हम फिलहाल उसे दर किनार करेंगे और पहले यह चर्चा करते हैं कि प्रभु यीशु ने, सभी दिनों को छोड़कर, सिर्फ सब्त के दिन ही ऐसा करने का चुनाव क्यों किया था, और वह इस कार्य के द्वारा लोगों से क्या कहना चाहता था जो व्यवस्था के अधीन रहते थे। यह इस अंश और परमेश्वर के स्वभाव के बीच एक मेल है जिसके बारे में मैं तुम से बात करना चाहता हूँ।

जब प्रभु यीशु मसीह आया, तो उसने लोगों से बात करने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का प्रयोग कियाः परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा किया और नए कार्य का प्रारम्भ किया, और इस नए कार्य को सब्त का पालन करने की जरूरत नहीं थी; जब परमेश्वर सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आ गया, तो यह उसके नए कार्य का बस एक पूर्वानुभव था, और सचमुच में उसका महान कार्य लगातार जारी रहने वाला था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया था, तो उसने पहले से ही व्यवस्था की जंज़ीरों को पीछे छोड़ दिया था, और उस युग की विधियों और सिद्धांतों को तोड़ दिया था। उस में, व्यवस्था से जुड़ी किसी भी चीज़ का निशान नहीं था; उसने उसे पूर्णत: उतार कर फेंक दिया था और आगे से उसका अनुसरण नहीं किया था, और उसने आगे से मानव जाति से उस का अनुसरण करने की अपेक्षा नहीं की थी। इस प्रकार तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन अनाज के खेतों से होकर गुज़रा, और प्रभु ने आराम नहीं किया, किन्तु बाहर काम कर रहा था। उसका यह कार्य लोगों की धारणाओं के लिए एक आघात था और उन्हें यह सन्देश दिया कि वह आगे से व्यवस्था के अधीन जीवन नहीं बिताएगा, और यह कि उसने सब्त की सीमाओं को छोड़ दिया है और उसने मानव जाति के सामने और उनके मध्य एक नई तस्वीर को, एक नए कार्यशैली के साथ प्रकट किया है। उसके इस कार्य ने लोगों को यह बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लेकर आया है जो व्यवस्था से दूर जाने और सब्त से बाहर जाने से प्रारम्भ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य प्रारम्भ किया, तो वह आगे से भूतकाल से चिपका नहीं रहा, और वह आगे से व्यवस्था के युग की विधियों के विषय में चिन्तित नहीं था। ना ही वह पिछले युग के अपने कार्य से प्रभावित हुआ था, परन्तु उसने सब्त के दिन में भी सामान्य रूप से कार्य किया था और जब उसके चेले भूखे थे, वे अनाज की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब कुछ परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर के पास बहुत सारे कार्यों के लिए जिन्हें वह करना चाहता है और बहुत सारी चीज़ों के लिए जिन्हें वह कहना चाहता है एक नई शुरूआत हो सकती है। एक बार जब उसने एक नई शुरूआत कर दी, वह ना तो फिर से अपने पिछले कार्य का जिक्र करता है और ना ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के लिए स्वयं के सिद्धांत हैं। जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानव जाति को अपने कार्य के एक नए स्तर में पहुँचाना चाहता है, और जब उसका कार्य सब से ऊँचे मुकाम में प्रवेश कर लेता है। यदि लोग लगातार पुरानी कहावत या विधियों के अनुसार काम करते रहेंगे या उन्हें निरन्तर मज़बूती से पकड़ें रहेंगे, तो वह इसका उत्सव नहीं मनाएगा और इस की प्रशंसा नहीं करेगा। यह इसलिए है क्योंकि वह पहले से ही एक नए कार्य को लेकर आ चुका है, और अपने कार्य में एक नए मुकाम में पहुँच चुका है। जब वह एक नए कार्य को आरम्भ करता है, वह मानव जाति को पूर्णतः नए रूप में दिखाई देता है, पूर्णतः नए कोण से, और पूर्णतः नए तरीके से ताकि लोग उसके स्वभाव के भिन्न भिन्न पहलुओं और जो उसके पास है तथा जो वह है उस को देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके अनेक लक्ष्यों में से एक लक्ष्य है। परमेश्वर पुराने को थामे नहीं रहता है या जर्जर मार्ग को नहीं लेता है; जब वह कार्य करता है और बोलता है तो यह उतना निषेधात्मक नहीं होता है जितना लोग कल्पना करते हैं। परमेश्वर में, सभी आज़ाद और छुड़ाए गए हैं, और कुछ भी निषेधात्मकता, या विवशता नहीं है—जो वह मानव जाति के लिए लेकर आता है वह सम्पूर्ण आज़ादी और छुटकारा है। वह एक जीवित परमेश्वर है, एक ऐसा परमेश्वर जो विशुद्ध रूप से, और सचमुच में अस्तित्व में है। वह एक कठपुतली या मिट्टी की कारीगरी नहीं है, और वह उन मुर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग पवित्र मानते हैं और उन की पूजा करते हैं। वह जीवित और जीवन्त है और उसके कार्य और वचन मनुष्यों के लिए जो लेकर आते हैं वे हैं सम्पूर्ण जीवन और ज्योति, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता और छुटकारा, क्योंकि वह उस सच्चाई, जीवन, और मार्ग को थामे रहता है—और उसके किसी भी कार्य में उसे किसी भी चीज़ के द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या कहते हैं और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे उसके नए कार्य को किस प्रकार देखते हैं या किस प्रकार उस का आँकलन करते हैं, वह बिना किसी पछतावे के अपने कार्य को पूरा करेगा। वह किसी की विचार धारणा या उसके कार्य और वचनों की ओर उठती हुई ऊँगलियों, या अपने नए कार्य के लिए उनके कठोर विरोध और प्रतिरोध की भी चिन्ता नहीं करेगा। समूची सृष्टि में कोई भी नहीं है जो उसके कार्य को कलंकित करने, या छिन्न भिन्न या तोड़फोड़ करने के लिए या जो परमेश्वर करता है उसे नापने या उसे परिभाषित करने के लिए मानवीय तर्क, या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान, या नैतिकता का प्रयोग कर सके। उसके कार्य में कोई निषेधात्मकता नहीं है, और किसी मनुष्य, चीज़ या पदार्थ के द्वारा उसे बाध्य नहीं किया जाएगा, और उसे किसी प्रचण्ड शक्ति के द्वारा छिन्न भिन्न नहीं किया जाएगा। अपने इस नए कार्य में, वह सर्वदा के लिए एक विजयी राजा है, और किसी भी प्रकार की प्रचण्ड ताकतों और झूठी शिक्षाओं और मानव की अशुद्धियों को उसके चरणों की चौकी के नीचे कुचल दिया गया है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह अपने कार्य के किस नए स्तर पर काम कर रहा है, इसे मानव जाति के बीच में विकसित एवं विस्तारित करना होगा, उसे समूचे विश्व में तब तक बिना किसी बाधा के पूरा करना होगा जब तक उसका महान कार्य पूर्ण ना हो जाए। यह परमेश्वर की सर्वसामर्थता और बुद्धिमत्ती है, और उस का अधिकार और सामर्थ है। इस प्रकार, प्रभु यीशु मसीह खुलकर बाहर जा सकता था और सब्त के दिन कार्य कर सकता था क्योंकि उसके हृदय में कोई नियम नहीं थे, और वहाँ मानव जाति से उत्पन्न कोई ज्ञान और सिद्धांत नहीं था। जो उसके पास था वह परमेश्वर का नया कार्य और उस का मार्ग था, और उस का कार्य मानव जाति को स्वतन्त्र करना था, उसे मुक्त करना था, उन्हें ज्योति में बने रहने की अनुमति देना था, और उन्हें जीने की अनुमति देना था। और वे जो मूर्तियों या झूठे ईश्वरों की पूजा करते हैं हर दिन शैतान के बन्धनों में जीते हैं, सभी प्रकार के नियमों और समाज से बहिष्कृत जीवनशैलियों के द्वारा बन्धे हुए हैं—आज एक चीज़ प्रतिबन्धित है, कल कोई दूसरी चीज़ होगी—उन के जीवन में कोई स्वतन्त्रता नहीं है। वे जंज़ीरों में जकड़े हुए कैदियों के समान हैं जिन के पास बोलने की कोई आज़ादी नहीं है। "निषेध" किसे दर्शाता है? यह विवशता, बन्धनों, और बुराई को दर्शाता है। जैसे ही एक व्यक्ति एक मूर्ति की पूजा करता है, वे एक झूठे ईश्वर की पूजा कर रहे हैं, वे एक बुरी आत्मा की पूजा कर रहे हैं। प्रतिबन्ध इस के साथ आता है। तुम इसे या उसे नहीं खा सकते हो, आज तुम बाहर नहीं जा सकते हो, कल तुम अपना चूल्हा नहीं जला सकते हो, अगले दिन तुम नए घर में नहीं जा सकते हो, शादी ब्याह तथा अन्तिम क्रिया, और यहाँ तक कि बच्चे को जन्म देने के लिए भी कुछ निश्चित दिनों को ही चुनना होगा। इसे क्या कहते हैं? इसे ही प्रतिबन्ध कहते हैं; यह मानवजाति का बंधन है, और ये शैतान की जंज़ीरें हैं और दुष्ट आत्माएँ इन्हें नियन्त्रित करते हैं, और उनके हृदयों और शरीरों को बन्धनों में बाँधते हैं। क्या ऐसे प्रतिबन्ध परमेश्वर के साथ साथ बने रहते हैं? जब परमेश्वर की पवित्रता की बात करते हैं, तो तुम्हें पहले यह सोचना चाहिएः कि परमेश्वर के साथ कुछ भी प्रतिबन्धित नहीं है। परमेश्वर के पास उसके वचनों और कार्य के लिए सिद्धांत हैं, परन्तु कुछ भी प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं सत्य, मार्ग, और जीवन है।

आओ हम निम्नलिखित अंश को देखें: "पर मैं तुम से कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है। यदि तुम इसका अर्थ जानते, ‘मैं दया से प्रसन्न होता हूँ, बलिदान से नहीं,’ तो तुम निर्दोष को दोषी ना ठहराते। मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है" (मत्ती12: 6-8)। यहाँ "मन्दिर" किस को दर्शाता है? सरल रीति से कहें, "मन्दिर" एक शोभायमान, ऊँची इमारत को दर्शाता है, और व्यवस्था के युग में, मन्दिर वह जगह थी जहाँ याजक परमेश्वर की आराधना करते थे। जब प्रभु यीशु ने कहा, "कि यहाँ वह है जो मन्दिर से भी बड़ा है," यहाँ "वह" किस की ओर संकेत करता है? स्पष्ट रूप से "वह" प्रभु यीशु है जो देह में है, क्योंकि केवल वह ही मन्दिर से बड़ा था। उन शब्दों ने लोगों से क्या कहा? उन्हों ने लोगों से मन्दिर से बाहर आने से कहा—परमेश्वर पहले ही बाहर आ चुका है और आगे से उस में काम नहीं कर रहा है, इस प्रकार लोगों को मन्दिर के बाहर परमेश्वर के कदमों के निशानों को ढूँढ़ना चाहिए और उसके नए कार्य में उसके कदमों का अनुसरण करना चाहिए। प्रभु यीशु मसीह के इस कथन की पृष्ठभूमि यह थी कि व्यवस्था के अधीन, लोग मन्दिर को देखने के लिए आए हैं, मानो वह कुछ ऐसा है जो स्वयं परमेश्वर से भी बड़ा है। अर्थात्, लोग परमेश्वर की आराधना करने के बजाए मन्दिर की आराधना कर रहे थे, इसलिए प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें सावधान किया कि वे मूरतों की आराधना ना करें, परन्तु परमेश्वर की आराधना करें क्योंकि वह सर्वोच्च है। इस प्रकार उसने कहाः "मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूँ।" यह प्रकट है कि प्रभु यीशु की नज़रों में, व्यवस्था के अधीन बहुत से लोग अब यहोवा की आराधना नही करते थे, और बस यों ही बलिदान की प्रक्रिया से होकर जाते थे, और प्रभु यीशु ने यह बताया कि यह "मूर्ति पूजा" की एक प्रक्रिया है। इन मूर्ति पूजकों ने मन्दिर को परमेश्वर से भी महान और बड़ी चीज़ के रूप में देखा था। उनके हृदय में केवल मन्दिर था, ना कि परमेश्वर, और यदि वे मन्दिर को खो देंगे, तो वे अपने निवास स्थान को भी खो देंगे। मन्दिर के बिना उनके पास आराधना के लिए कोई जगह नहीं थी और वे बलिदानों को नहीं चढ़ा सकते थे। उनका तथाकथित निवास स्थान वहाँ है जहाँ से वे यहोवा परमेश्वर की आराधना के झण्डे तले संचालन करते थे, जिस ने उन्हें मन्दिर के टिके रहने और अपने क्रियाकलापों को करने की अनुमति दी थी। उनके तथाकथित बलिदानों का चढ़ाया जाना मन्दिर के प्रति उनकी सेवा के आयोजन के बहाने उनके स्वयं के शर्मनाक कार्यों को पूरा करने के लिए था। यही वह कारण है कि उस समय लोग मन्दिर को परमेश्वर से भी बढ़कर देखते थे। क्योंकि वे मन्दिर को एक छत्रछाया के रूप में, और बलिदानों को लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को धोखो देने के लिए एक बहाने के रूप में प्रयोग करते थे, प्रभु यीशु ने लोगों को चेतावनी देने के लिए ऐसा कहा था। यदि तुम लोग इन वचनों को वर्तमान में लागू करते हो, तब भी वे उतने ही प्रमाणिक और उतने ही उचित हैं। यद्यपि आज लोगों ने व्यवस्था के युग के लोगों के अनुभव से अलग परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, फिर भी उनके स्वभाव का सार एक समान है। आज के कार्य के सन्दर्भ में, लोग फिर भी उसी प्रकार के कार्य करेंगे "मन्दिर परमेश्वर से बड़ा है।" उदाहरण के लिए, लोग अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपनी नौकरी के रूप मे देखते हैं; वे परमेश्वर के लिए गवाही देने और मानवाधिकार के बचाव में एक राजनैतिक आन्दोलन के रूप में लाल अजगर से युद्ध करने को जनतंत्र और स्वतन्त्रता के रूप में देखते हैं; उन्होंने अपने कर्तव्यों को अपनी कुशलताओं का उपयोग करके अपनी जीवंवृत्यों के निमार्ण की ओर मोड़ दिया है, परन्तु वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को और कुछ नहीं बल्कि धार्मिक सिद्धांत के पालन के एक टुकड़े के रूप में लेते हैं; और इत्यादि। क्या मनुष्यों की ओर से ये प्रकटीकरण मुख्य रूप से इस के समान नहीं हैं "मन्दिर परमेश्वर से बढ़कर है?" इस बात को छोड़कर कि दो हज़ार साल पहले, लोग भौतिक मन्दिर में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय को कर रहे थे, परन्तु आज, लोग अस्पृश्य मन्दिरों में अपने व्यक्तिगत व्यवसाय कर रहे हैं। वे लोग जो नियमों को सहेज कर रखते हैं इन नियमों को परमेश्वर से बढ़कर देखते हैं, वे लोग जो ऊँचे दर्जे से प्रेम करते हैं वे ऊँचे दर्जे को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, वे लोग जो अपने जीवनवृत्ति से प्रेम करते हैं वे जीवनवृत्ति को परमेश्वर से बढ़कर मानते हैं, और इत्यादि—उन के सभी प्रकटीकरण मुझे यह कहने में अगुवाई देते हैं: "लोग अपने शब्दों से सब से बढ़कर परमेश्वर की स्तुति करते हैं, किन्तु उन की नज़रों में हर चीज़ परमेश्वर से बढ़कर है।" यह इसलिए है क्योंकि जैसे ही लोगों को परमेश्वर का अनुसरण करने के उनके मार्ग के साथ-साथ अपने वरदानों, या अपने व्यवसाय या अपनी स्वयं की जीवनवृत्ति के प्रदर्शन का अवसर मिलता है, तो वे अपने आप को परमेश्वर से दूर कर देते हैं और अपने आप को उस जीवनवृत्तियों में झोंक देते हैं जिन से वे प्रेम करते हैं। जो कुछ परमेश्वर ने उन्हें सौंपा है, और उसकी इच्छा के विषय में यह कहा जा सकता है कि, उन चीज़ों को बहुत पहले ही फेंक दिया गया है। इस दृश्यलेख में, इन लोगों के विषय में और जो मन्दिर में दो हज़ार साल पहले अपने स्वयं का व्यवसाय कर रहे थे क्या अन्तर है?

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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