सत्य का अभ्यास करके ही व्यक्ति भ्रष्ट स्वभाव की बेड़ियाँ तोड़ सकता है (भाग दो)
क्या सत्य का अनुसरण करना उतना ही जटिल या उतना ही कठिन है, जितना कि विद्वत्ता की किसी शाखा का अनुसरण करना? यह वास्तव में उतना कठिन नहीं है, यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है या नहीं। सत्य का अनुसरण करना अपने आप में कठिन नहीं है; इसमें विज्ञान के किसी विशेषज्ञता के क्षेत्र का अध्ययन करने की तुलना में कम प्रयास करने की आवश्यकता होती है—यहाँ तक कि यह जीविकोपार्जन से भी आसान है। ऐसा क्यों है? सत्य की वास्तविकता वह है, जिसे सामान्य मानवता वाले लोगों को जीना चाहिए और जो उनमें होनी चाहिए। यह लोगों की सामान्य मानवता से संबंधित है, इसलिए यह उनके विचारों और भावों से, जो कुछ भी वे सोचते हैं उससे, उन सभी कार्यों और व्यवहारों से जो वे अपने दैनिक जीवन में करते हैं, या उनके मन से अलग नहीं है। सत्य कोई सिद्धांत नहीं है, न यह शिक्षा का कोई क्षेत्र है, न ही यह कोई पेशा है। सत्य खोखला नहीं है। सत्य का सामान्य मानवता से गहरा संबंध है—सत्य वह जीवन है, जो सामान्य मानवता वाले व्यक्ति में होना चाहिए। यह तुम्हारी तमाम खामियाँ, तुम्हारी बुरी आदतें और तुम्हारे नकारात्मक और गलत विचार ठीक कर सकता है। यह तुम्हारा शैतानी स्वभाव बदल सकता है, तुम्हारा जीवन बन सकता है, तुम्हें मानवता और तार्किकता रखने में सक्षम कर सकता है, तुम्हारे विचारों और तुम्हारी मानसिकता को सामान्य कर सकता है—यह तुम्हारे हर अंश को सामान्य बना सकता है। अगर सत्य तुम्हारा जीवन बन जाता है, तो तुम जो जीते हो और मानवता के तुम्हारे सभी प्रकाशन सामान्य होंगे। इसलिए, सत्य का अनुसरण और अभ्यास कोई अस्पष्ट, अथाह चीज नहीं है, न ही यह कोई खास तौर से कठिन चीज है। अभी, हालाँकि तुम लोग सत्य से थोड़ा प्रेम करते हो और बेहतर बनने के लिए प्रयास करने को तैयार हो, फिर भी तुम्हें अभी तक मार्ग बिल्कुल नहीं मिला है। पहला कदम हमेशा सबसे कठिन होता है। अगर तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो और उसकी मिठास का स्वाद ले सकते हो, तो तुम्हें लगेगा कि सत्य का अनुसरण करना एक आसान मामला है।
अगर व्यक्ति के जीवन के रूप में सत्य नहीं है और हमेशा भ्रष्ट स्वभाव में जीता है, तो यह कैसे प्रकट होता है? जब व्यक्ति ने सत्य प्राप्त नहीं किया होता, तो उसके पास स्वाभाविक रूप से अपनी शैतानी प्रकृति की बाधाएँ और बेड़ियाँ हटाने का कोई तरीका नहीं होता। वह जो भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करता है, वे स्वाभाविक रूप से अहंकार और दंभ, मनमानी करना, मनमानापन और लापरवाही, झूठ बोलना और धोखा देना, कपट और छल, शोहरत और लाभ के लिए लालच दिखाना, फायदे के अलावा और कुछ न चाहना और स्वार्थ और नीचता होते हैं। इसके अलावा, अन्य लोगों के साथ अपने व्यवहार में वह अविश्वास करने, आलोचना करने और दूसरों पर हमला करने की ओर प्रवृत्त होता है। वह हमेशा अपनी पसंद के आधार पर बोलता और कार्य करता है; उसके हमेशा व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य होते हैं, और दूसरों को लेकर पूर्वाग्रह होते हैं। गतिरोधों या असफलता का सामना करने पर वह हमेशा नकारात्मक हो जाता है। कभी-कभी वह अत्यधिक अहंकारी होता है; कभी-कभी वह इतना नकारात्मक होता है कि खुद को जमीन में गड्ढा खोदकर दबा सकता है। वह हमेशा अतियों पर चला जाता है—अगर वह अपने दाँत नहीं दिखा रहा होता और पंजे नहीं लहरा रहा होता, तो वह नकारात्मक होता है और दयनीय व्यवहार करने की कोशिश कर रहा होता है। वह कभी सामान्य नहीं होता। तुम लोग अभी इसी अवस्था में हो। तुम पीड़ा सहने और कीमत चुकाने को तैयार हो, और संकल्प और दृढ़निश्चय से भरे हुए हो, पर तुममें सत्य वास्तविकता नहीं है। अगर व्यक्ति सत्य वास्तविकता को अपना जीवन मान ले, तो यह कैसे अभिव्यक्त होगा? सबसे पहले, वह परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाएगा और मानव के समान जी पाएगा; वह एक ईमानदार व्यक्ति होगा, ऐसा व्यक्ति जिसका जीवन स्वभाव बदल चुका है। जीवन-स्वभाव में परिवर्तन की कई विशेषताएँ होती हैं। पहली विशेषता उन चीजों के प्रति समर्पण करने में सक्षम होना है, जो सही और सत्य के अनुरूप हैं। चाहे कोई भी राय दे, चाहे वह बूढ़ा हो या जवान, तुम उसके साथ निभा पाओ या नहीं, तुम उसे जानते हो या नहीं, तुम उससे परिचित हो या नहीं, उसके साथ तुम्हारा संबंध अच्छा हो या बुरा, अगर वह जो कहता है वह सही है, सत्य के अनुरूप है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए फायदेमंद है, तो तुम किन्हीं अन्य कारकों से प्रभावित हुए बिना उसे सुन पाओगे, अपना पाओगे और स्वीकार पाओगे। सही और सत्य के अनुरूप चीजों को स्वीकार कर उनके प्रति समर्पित होने में सक्षम होना पहली विशेषता है। दूसरी विशेषता है कुछ घटित होने पर सत्य की खोज करने में सक्षम होना; यह न केवल सत्य को स्वीकारने में सक्षम होने के बारे में है, बल्कि सत्य का अभ्यास करने और मामले अपनी इच्छा के अनुसार न सँभालने के बारे में भी है। तुम्हारे साथ चाहे कुछ भी हो, चीजें स्पष्ट रूप से न देख पाने पर तुम खोज पाओगे और यह देख पाओगे कि समस्या कैसे सँभालनी है और कैसे उस तरह से अभ्यास करना है, जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करे। तीसरी विशेषता है किसी भी समस्या का सामना करने पर परमेश्वर के इरादों पर विचार करना और परमेश्वर के प्रति समर्पण हासिल करने के लिए देह के प्रति विद्रोह करना। तुम चाहे जो भी कर्तव्य निभा रहे हो, परमेश्वर के इरादों पर विचार करोगे, और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाओगे। तुम कर्तव्य निभाते समय उस कर्तव्य के लिए परमेश्वर की जो भी अपेक्षाएँ हों, उन अपेक्षाओं के अनुसार और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करोगे। तुम्हें यह सिद्धांत समझना चाहिए, और अपना कर्तव्य जिम्मेदारी और समर्पण से निभाना चाहिए। परमेश्वर के इरादों पर विचार करने का यही अर्थ है। अगर तुम नहीं जानते कि किसी विशेष मामले में परमेश्वर के इरादों पर कैसे विचार किया जाए या परमेश्वर को संतुष्ट कैसे किया जाए, तो तुम्हें खोज करनी चाहिए। तुम लोगों को स्वभावगत परिवर्तन के इन तीन लक्षणों से अपनी तुलना करनी चाहिए, और देखना चाहिए कि तुममें ये लक्षण हैं या नहीं। यदि तुम्हारे पास इन तीन क्षेत्रों में व्यावहारिक अनुभव और अभ्यास के मार्ग हैं, तो तुम मामले सिद्धांतों के साथ सँभालोगे। चाहे तुम पर कुछ भी आ पड़े या तुम जिस भी समस्या से जूझ रहे हो, तुम्हें हमेशा खोजना चाहिए कि अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं, प्रत्येक सत्य सिद्धांत के भीतर कौन-से विवरण शामिल हैं और सिद्धांतों का उल्लंघन किए बिना अभ्यास कैसे करें। जब तुम इन मुद्दों पर स्पष्टता प्राप्त कर लोगे, तो तुम स्वाभाविक रूप से जान जाओगे कि सत्य का अभ्यास कैसे करना है।
जब सब कुछ ठीक होता है, तो कुछ लोग कोई स्पष्ट भ्रष्ट स्वभाव दिखाते प्रतीत नहीं होते, और इस वजह से, वे सोचते हैं कि वे अच्छे हैं, कि वे बदल गए हैं, और उन्हें सत्य वास्तविकता प्राप्त है। लेकिन जब प्रलोभन या सत्य सिद्धांतों से जुड़े महत्वपूर्ण मामले उन पर आ पड़ते हैं, तो उनका भ्रष्ट स्वभाव अपने आप प्रकट हो जाता है। वे नकारात्मकता और भ्रम में पड़ जाते हैं, अभ्यास करने का उचित तरीका नहीं जानते, कठिनाइयों से घिर जाते हैं। उदाहरण के लिए, ईमानदार व्यक्ति होना और सच्चाई के साथ बोलना सत्य का अभ्यास करना है। सच्चाई से बोलने की कोशिश करने पर तुम किन कठिनाइयों का सामना करते हो? तुम किन बाधाओं का सामना करते हो? कौन-सी चीजें तुम्हें बाधित करती हैं, बाँधे रखती हैं और सच्चाई से बोलने से रोकती हैं? अभिमान, रुतबा, घमंड, साथ ही तुम्हारी भावनाएँ और निजी पसंद—ये सभी चीजें किसी भी क्षण उत्पन्न हो सकती हैं, और ये लोगों को पीछे रोके रखती हैं और उन्हें सत्य का अभ्यास करने से बाधित करती हैं। ये चीजें भ्रष्ट स्वभाव हैं। चाहे तुम किसी भी स्थिति में हो, भ्रष्ट स्वभाव तुम्हारी अवस्था को असामान्य बना सकते हैं, तमाम तरह की नकारात्मक चीजें उत्पन्न कर सकते हैं, तुम्हें हर तरह से बाधित और नियंत्रित कर सकते हैं, तुम्हें रोक सकते हैं और तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर की सेवा करना कठिन बना सकते हैं। इन सबसे तुम बेहद थका हुआ महसूस करोगे। ऊपर से, लोग स्वतंत्र प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों से कसकर बँधे होते हैं। उनके पास चुनाव की कोई स्वतंत्रता नहीं होती है, उनके लिए एक कदम भी उठाना बेहद मुश्किल होता है, और वे थका देने वाला जीवन जीते हैं। अक्सर, उन्हें सच्चाई से बोलने या कोई भी व्यावहारिक कार्य करने के लिए बहुत प्रयास करना पड़ता है। वे अपने कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभा सकते या परमेश्वर के प्रति निष्ठावान नहीं हो सकते, भले ही वे ऐसा करना चाहते हों, और अगर वे सत्य का अभ्यास करना चाहें या परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहें, तो यह और भी कठिन होगा। उनके लिए यह कितना मुश्किल है! क्या वे अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के पिंजरे में नहीं जी रहे हैं? क्या वे शैतान के अंधकारमय प्रभाव में नहीं जी रहे हैं? (जी रहे हैं।) तो फिर लोग इसे कैसे त्याग सकते हैं? सत्य का अभ्यास करने और जीवन प्रवेश प्राप्त करने के अलावा क्या कोई और मार्ग भी है? बिल्कुल नहीं है। क्या परंपरागत संस्कृति का ज्ञान लोगों को बचा सकता है और उन्हें शैतान के प्रभाव से मुक्त कर सकता है? बाइबल के ज्ञान की समझ के बारे में क्या खयाल है? आध्यात्मिक धर्म-सिद्धांत बताने में सक्षम होने के बारे में क्या ख्याल है? नहीं, इनमें से कोई भी चीज लोगों को नहीं बचा सकती और उन्हें शैतान के प्रभाव से मुक्त नहीं कर सकती। केवल परमेश्वर का कार्य और परमेश्वर द्वारा व्यक्त समस्त सत्य स्वीकारने से ही भ्रष्ट स्वभावों की समस्या का समाधान किया जा सकता है; केवल तभी लोग सत्य की समझ प्राप्त कर सकते हैं, सत्य प्राप्त कर सकते हैं और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति अच्छा इंसान बनने का प्रयास करे और कुछ भी बुरा न करे, लेकिन वह अपना स्वभाव न बदले, तो क्या वह शैतान के प्रभाव से मुक्त हो सकता है? क्या कोई व्यक्ति “ताओ ते चिंग”, बौद्ध धर्मग्रंथों या परंपरागत संस्कृति का अध्ययन करके सत्य प्राप्त कर सकता है? क्या वह परमेश्वर को जान सकता है? अगर वह परंपरागत संस्कृति से चिपका रहता है और सत्य का अनुसरण नहीं करता, तो क्या उसका भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध किया जा सकता है? क्या वह परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकता है? जो लोग ऐसा करते हैं, वे खुद को धोखा दे रहे हैं, और वे अपनी किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। ऐसे बहुत-से लोग हैं, जिन्होंने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, लेकिन उनका विश्वास अभी भी भ्रमित है। सत्य का अनुसरण करने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है; वे केवल अपना कर्तव्य निभाने से ही संतुष्ट हैं। वे सोचते हैं कि अगर वे कोई बुराई नहीं करते, या कम बुराई करते हैं, और अगर वे ज्यादा अच्छे और परोपकारी कार्य करते हैं, अगर वे दूसरों की प्रेमपूर्ण मदद करने का ज्यादा प्रयास करते हैं, अगर वे कलीसिया को कभी नहीं छोड़ते या परमेश्वर को धोखा नहीं देते, तो यह दूसरे लोगों को प्रसन्न करेगा, और परमेश्वर को भी प्रसन्न करेगा, और परमेश्वर के राज्य में उनका हिस्सा होगा। क्या इस विचार में कोई दम है? क्या एक अच्छा इंसान होने से व्यक्ति अपना भ्रष्ट स्वभाव त्यागने में सक्षम हो सकता है? क्या वह इस तरह उद्धार प्राप्त कर सकता है? क्या उसका राज्य में हिस्सा होगा? तुम सभी लोग देख सकते हो कि दुनिया में कई तथाकथित “अच्छे लोग” हैं जो उच्च आशय वाली बातें करते हैं—हालाँकि सतह पर, ऐसा लगता है कि उन्होंने कोई बड़ी बुराई नहीं की है, लेकिन वास्तव में वे खास तौर से धोखेबाज और धूर्त होते हैं। मिठास और चालाकी से बोलते हुए वे बहती हवा के साथ चलने में बहुत कुशल होते हैं। वे नकली अच्छे लोग और पाखंडी हैं—वे सिर्फ अच्छे होने का ढोंग करते रहे हैं। जो लोग मध्यम मार्ग पर चलते हैं, वे सबसे कपटी लोग होते हैं। वे किसी का अपमान नहीं करते, मिठबोले और चालाक होते हैं, तमाम परिस्थितियों में दिखावा करने में अच्छे होते हैं, और कोई भी उनकी कमियाँ नहीं देख सकता। वे जीवित शैतान हैं! क्या तुम लोगों के बीच ऐसे लोग हैं? (हाँ।) क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इस तरह से जीना थका देने वाला है? (हाँ, यह थका देने वाला है।) तो क्या तुमने बदलने का कोई तरीका सोचा है? तुम कैसे बदलते हो? कहाँ से आगे बढ़ना चाहिए? (सत्य का अभ्यास करने से।) “सत्य का अभ्यास करने से,” या “सत्य समझने से,” या “सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने से” मत कहो। यह शेखी है, और यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है, इसलिए ये शब्द खोखले लगते हैं। इसके बजाय हमें विवरणों से शुरुआत करनी चाहिए। (एक ईमानदार व्यक्ति बनने से।) यह एक ठोस अभ्यास है। एक ईमानदार व्यक्ति बनो, या थोड़ा और विस्तार में जाएँ तो : एक सरल और खुले व्यक्ति बनो, जो कुछ भी छिपाता नहीं, जो झूठ नहीं बोलता, जो बेबाकी से बोलता है, और एक स्पष्टवादी व्यक्ति बनो जिसमें न्याय की भावना हो, जो सत्य बोल सकता हो। लोगों को पहले इसे हासिल करना चाहिए। मान लो, एक बुरा व्यक्ति है, जो कुछ ऐसा करता है जिससे कलीसिया का काम बाधित हो जाता है, और स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक अगुआ तुम्हारे पास आता है। तुम जानते हो कि यह किसने किया, लेकिन चूँकि उस व्यक्ति के साथ तुम्हारे अच्छे संबंध हैं और तुम उसे अपमानित नहीं करना चाहते, इसलिए तुम झूठ बोल देते हो और कहते हो कि तुम नहीं जानते। अगुआ और अधिक विवरण माँगता है, तो तुम उस बुरे व्यक्ति के किए पर पर्दा डालने के लिए बहाना बनाते हुए इधर-उधर की हाँकने लगते हो। क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? तुमने अगुआ को स्थिति के बारे में सच नहीं बताया, बल्कि उसे छिपा लिया। तुम ऐसा क्यों करोगे? क्योंकि तुम किसी को नाराज नहीं करना चाहते थे। तुमने आपसी संबंधों की रक्षा करने और किसी को ठेस न पहुँचाने को पहले रखा, और सच्चाई के साथ बोलने और सत्य का अभ्यास करने को अंत में। तुम किससे नियंत्रित हो रहे हो? तुम अपने शैतानी स्वभाव से नियंत्रित हो रहे हो, उसने तुम्हारे मुँह पर ताला लगा दिया है और तुम्हें सच्चाई के साथ बोलने से रोक दिया है—तुम केवल अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार जी पाते हो। भ्रष्ट स्वभाव क्या है? भ्रष्ट स्वभाव एक शैतानी स्वभाव है, और जो व्यक्ति अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीता है, वह एक जीवित शैतान है। उसकी बातों में हमेशा परीक्षाएँ होती हैं, वे हमेशा घुमावदार होती हैं, और कभी सीधी नहीं होतीं; यहाँ तक कि अगर उसे पीट-पीटकर मार भी डाला जाए, तो भी वह सच्चाई के साथ नहीं बोलेगा। यही होता है जब किसी व्यक्ति का भ्रष्ट स्वभाव बहुत गंभीर हो जाता है; अपनी मानवता पूरी तरह से खोकर वह दानव बन जाता है। तुम लोगों में से बहुत-से लोग दूसरों के साथ अपने संबंध और अन्य लोगों के बीच अपने रुतबे और प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए परमेश्वर को अपमानित करना और धोखा देना पसंद करेंगे। क्या इस तरह से कार्य करने वाला व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है? क्या वह ऐसा व्यक्ति है, जो सत्य का अनुसरण करता है? वह ऐसा व्यक्ति है, जो जानबूझकर परमेश्वर को धोखा देता है, जिसके दिल में परमेश्वर का लेशमात्र भी भय नहीं है। वह परमेश्वर को धोखा देने का साहस करता है; उसकी महत्वाकांक्षा और विद्रोहशीलता सचमुच विशाल होनी चाहिए! फिर भी ऐसे लोगों को आम तौर पर यही लगता है कि वे परमेश्वर से प्रेम करते और उसका भय मानते हैं, और अक्सर कहते हैं : “हर बार जब मैं परमेश्वर के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे यही लगता है कि वह कितना विशाल, कितना महान और कितना अथाह है! परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, उसका प्रेम अत्यंत वास्तविक है!” तुम अच्छे-अच्छे शब्द बोल सकते हो, लेकिन किसी बुरे व्यक्ति को कलीसिया के काम में बाधा डालते देखकर भी उसे उजागर नहीं करोगे। तुम खुशामदी हो, परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने के बजाय सिर्फ अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की रक्षा करते हो। सही परिस्थिति जान कर भी तुम सच्चाई के साथ नहीं बोलते, इधर-उधर की हाँककर बुरे व्यक्तियों की रक्षा करते हो। अगर तुमसे सच्चाई के साथ बोलने को कहा जाए, तो यह तुम्हारे लिए बहुत कठिन होगा। सिर्फ सच बोलने से बचने के लिए तुम इतनी बकवास करते हो! जब तुम बोलते हो, तो घुमा-घुमाकर बोलते रहते हो, बहुत सोच खपाते हो, और बेहद थकाऊ तरीके से जीते हो, सब कुछ अपनी प्रतिष्ठा और गौरव की रक्षा के लिए! क्या परमेश्वर तुम्हारे इस तरह के आचरण से प्रसन्न होता है? परमेश्वर सबसे ज्यादा धोखेबाज लोगों से घृणा करता है। अगर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो कर उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें सत्य स्वीकारना चाहिए। तुम्हें पहले एक ईमानदार व्यक्ति बनने से शुरुआत करनी चाहिए। स्पष्टवादी बनो, सच बोलो, अपनी भावनाओं से बाधित मत होओ, अपने ढोंग और चालाकी को त्याग दो, और सिद्धांतों के साथ बोलो और मामले सँभालो—यह जीने का एक आसान और सुखद तरीका है, और तुम परमेश्वर के सामने जी पाओगे। अगर तुम हमेशा शैतानी फलसफों के अनुसार जीते हो, और अपने दिन बिताने के लिए हमेशा झूठ और चालाकी पर भरोसा करते हो, तो तुम शैतान की शक्ति के अधीन जियोगे और अंधकार में रहोगे। अगर तुम शैतान की दुनिया में रहते हो, तो तुम सिर्फ अधिकाधिक धोखेबाज बनोगे। तुमने इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, तुमने इतने सारे उपदेश सुने हैं, पर तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव अभी तक शुद्ध नहीं हुआ है, और अब भी तुम अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार ही जी रहे हो—क्या तुम्हें इससे घृणा नहीं होती? क्या तुम्हें शर्म नहीं आती? चाहे तुमने जितने भी समय तक परमेश्वर में विश्वास रखा हो, अगर तुम अभी भी किसी गैर-विश्वासी की तरह ही हो, तो तुम्हारे परमेश्वर में विश्वास रखने का क्या मतलब है? क्या तुम इस तरह से परमेश्वर में विश्वास रख कर वास्तव में उद्धार प्राप्त कर सकते हो? तुम्हारे जीवन लक्ष्य नहीं बदले हैं, न ही तुम्हारे सिद्धांत और तरीके बदले हैं; तुम्हारे पास सिर्फ एक ही चीज है जो किसी गैर-विश्वासी के पास नहीं है, वह है “विश्वासी” की उपाधि। हालाँकि तुम बाहर से परमेश्वर का अनुसरण करते हो, पर तुम्हारा जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदला है, और अंत में तुम उद्धार प्राप्त नहीं करोगे। क्या तुम अपनी आशाएँ व्यर्थ ही नहीं बढ़ा रहे हो? क्या परमेश्वर में इस तरह का विश्वास सत्य या जीवन प्राप्त करने में तुम्हारी मदद कर सकता है? बिल्कुल नहीं।
आज हमने स्वभावगत बदलाव की तीन विशेषताओं के बारे में संगति की है। उन तीन विशेषताओं को सारांशित करो। (पहली विशेषता है उन चीजों को स्वीकार करने और उनके प्रति समर्पित होने की क्षमता, जो सही हैं और सत्य के अनुरूप हैं। दूसरी विशेषता है अपने साथ कुछ होने पर सत्य खोजकर उसे अभ्यास में लाने और मामले अपनी इच्छा के आधार पर न सँभालने की क्षमता। तीसरी विशेषता है परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने, देह के खिलाफ विद्रोह करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण हासिल करने की क्षमता, चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी घटित हो।) तुम सभी लोगों को इन तीन विशेषताओं पर चिंतन और संगति करनी चाहिए। तुम्हें अपने वास्तविक जीवन में इनसे अपनी तुलना करनी चाहिए, और खुद को इनका अभ्यास करने और इनमें प्रवेश करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए—इस तरह तुम लोग सत्य प्राप्त करने और स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम हो जाओगे। चाहे सत्य के किसी भी पहलू पर संगति की जा रही हो, सत्य से प्रेम करने वालों के लिए उसे स्वीकारना आसान होगा। जो सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक हैं, वे सत्य प्राप्त करने में सक्षम होंगे, और सत्य प्राप्त करने वाले स्वभाव में बदलाव हासिल करने में सक्षम होंगे। जमीर या विवेक से रहित, सत्य से प्रेम न करने वाले लोग सत्य नहीं स्वीकार सकते या उसका अभ्यास नहीं कर सकते, इसलिए वे उसे प्राप्त नहीं कर पाएँगे। कोई व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है या नहीं, या स्वभाव में बदलाव प्राप्त कर सकता है या नहीं, यह उसके व्यक्तिगत अनुसरण पर निर्भर करता है।
16 अगस्त 2015
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?