परमेश्वर के प्रति समर्पण सत्‍य प्राप्‍त करने में बुनियादी सबक है (भाग तीन)

जब लोग किसी मुसीबत में नहीं होते तब उनके लिए समर्पण करना आसान होता है। लेकिन जब मुसीबत आती है, वे समर्पण नहीं कर पाते। इस मामले में क्या किया जा सकता है? इस कठिनाई को हल करने के लिए प्रार्थना करना और सत्य खोजना आवश्यक है। किसी व्यक्ति का यह महसूस करना कि वह श्रेष्ठ है और परमेश्वर ने उसका उत्थान किया है, से यह महसूस करना कि वह ऐसा निकृष्ट खिलौना है जो परमेश्वर की नजर में अयोग्य, तुच्छ और बेकार है, और खुशी-खुशी परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाना और उससे कोई माँग न करना—अनुभव के इस स्तर तक पहुँचने के लिए कितना समय लगना आवश्यक है? (पतरस ने अपने अंतिम सात वर्षों में सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव किया। अगर कोई सत्य का अनुसरण न करे तो वह चाहे कितने ही वर्षों तक विश्वास कर ले, इसे हासिल नहीं कर पाएगा।) बात यह नहीं है कि कोई कितने साल से विश्वास कर रहा है—बल्कि यह इस पर निर्भर करता है कि वह सत्य का अनुसरण करता है या नहीं, और वह भ्रष्ट स्वभाव की समस्या हल करने के लिए सत्य का उपयोग कर पाता है या नहीं। यह सब तुम्हारे अनुसरण पर निर्भर करता है। कुछ लोग केवल प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागते हैं, हमेशा भीड़ से अलग खड़े होकर खुद को दिखाना चाहते हैं। वे छोटा-सा झटका लगने या असफलता मिलने पर टूट जाते हैं, नकारात्मक और पंगु हो जाते हैं। कुछ लोग अनुचित लाभ लेना पसंद करते हैं, लेकिन सत्य से प्रेम नहीं करते; दूसरों का फायदा उठाकर वे खुश होते हैं, और अगर उन्हें सत्य नहीं मिलता तो इससे दुखी या परेशान नहीं होते। किसी व्यक्ति के पास अगर कोई रुतबा नहीं होता तो वह अपनी आस्था में निरुत्साही रहता है, और रुतबा मिलते ही वह दूसरों से भी अधिक उत्साही हो जाता है; फिर वह कभी भी नकारात्मक महसूस नहीं करता और खुशी-खुशी अपनी जान लगाने तक काम करता है। वह बस सत्य का अभ्यास करने और सिद्धांतों के अनुसार चीजें करने पर कोई ध्यान नहीं देता, और इसके परिणामस्वरूप कई वर्षों की आस्था के बाद भी उसके पास अनुभवजन्य गवाही नहीं होती है। वह यह देखकर जलने और पछताने लगता है कि दूसरे लोगों के पास चंद साल विश्वास करके ही अद्भुत अनुभवजन्य गवाही है, लेकिन यह एहसास खत्म होने के बाद भी वह सत्य का अनुसरण नहीं करता है। अगर कोई सत्य के लिए प्रयास करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करता, समस्याएँ हल करने के लिए सत्य का उपयोग नहीं करता तो उसकी आस्था को चाहे कितने ही साल हो चुके हों, यह किसी काम की नहीं है। जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्हें परमेश्वर कभी भी पूर्ण नहीं बना सकता। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरकर पूर्ण बना था—क्या तुम लोगों को भी सैकड़ों परीक्षणों से नहीं गुजरना होगा? तुम लोग अब तक कितने परीक्षणों से गुजर चुके हो? अगर सैकड़ों नहीं, तो क्या लगभग एक सौ? (नहीं। अभी नहीं।) पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरकर पूर्ण बना, इसलिए अगर तुम लोग अभी तक एक भी परीक्षण से नहीं गुजरे या सौ परीक्षणों से गुजरे हो, तो फिर तुम्हारा अनुभव उसके आसपास कहीं नहीं ठहरता है। तुम्हारा आध्यात्मिक कद कम है। क्या तुम्हें सत्य के अनुसरण के लिए प्रयास करने की जरूरत नहीं है? और तुम्हें यह कैसे करना चाहिए? तुम्हें सत्य को समझने और इसका अभ्यास करने के लिए प्रयास करना होगा। किसी भी चीज पर गंभीर विचार न कर, चिंतामुक्त जीवन जीकर और दिनभर केवल कार्यों में व्यस्त रहकर लापरवाह और भ्रमित मत बनो। इसका यह मतलब नहीं है कि व्यस्त रहना कोई समस्या है—अगर तुम्हारे पास करने के लिए बहुत-सी चीजें हैं, तो तुम्हें व्यस्त रहना ही होगा; व्यस्त न रहना हमेशा एक विकल्प नहीं होता। लेकिन जब तुम सब कुछ सँभालने में व्यस्त रहते हो, तब भी तुम्हें सत्य और सिद्धांतों के लिए प्रयास करते रहना चाहिए; तुम्हें अभी भी चीजों को समझने-बूझने की कोशिश करनी चाहिए और अपने में जो भी कमी लगे उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए। तुम परमेश्वर से कोई चीज कैसे माँगते हो? तुम हर दिन दिल-ही-दिल में परमेश्वर से उस चीज के लिए प्रार्थना करते हो। यह दिखाता है कि तुम्हारे दिल में सत्य के लिए ललक है और तुम चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारा संकल्प पूरा करे। अगर तुम्हारा दिल सच्चा है, तो परमेश्वर तुम्हारी प्रार्थनाएँ सुनेगा; वह तुम्हारे लिए उपयुक्त स्थितियों की व्यवस्था और तैयारी करेगा ताकि तुम सबक सीख सको। तुम कह सकते हो, “मेरा आध्यात्मिक कद वास्तव में कम है। क्या परमेश्वर मुझे किसी ऐसे बड़े परीक्षण से गुजारेगा जो मुझे पस्त कर दे?” नहीं, ऐसा असंभव है। परमेश्वर ऐसा कुछ बिल्कुल नहीं करेगा। परमेश्वर बखूबी जानता है कि किसी की आस्था कितनी अधिक है और उसका असली आध्यात्मिक कद क्या है। तुम्हें इस पर आस्था रखनी होगी। परमेश्वर तीन साल के बच्चे पर किसी वयस्क का बोझ कभी नहीं डालेगा—कभी भी नहीं! तुम्हें दिल से यह यकीन करना होगा। लेकिन तुम्हें इसके लिए परमेश्वर से विनती करनी होगी। तुममें ऐसी इच्छा और ऐसा संकल्प होना चाहिए, और तभी परमेश्वर तुम्हारे अनुरोध पर कार्य करेगा। अगर तुम हमेशा डरे-छिपे रहते हो, परीक्षण किए जाने से डरते हो, हमेशा शांतिपूर्ण और चिंतामुक्त दिन बिताना चाहते हो तो परमेश्वर तुममें कार्य नहीं करेगा। इसलिए तुम्हें सिर्फ मुक्त भाव से और साहसपूर्वक परमेश्वर से विनती करनी होगी, खुद को वास्तव में समर्पित कर सब कुछ परमेश्वर को सौंपना होगा, और तभी परमेश्वर तुम पर कार्य करेगा। परमेश्वर निश्चित रूप से लोगों को मनमाने ढंग से यातना देने के लिए नहीं, बल्कि परिणाम और लक्ष्य हासिल करने के लिए कार्य करता है। परमेश्वर व्यर्थ का काम नहीं करेगा या तुम पर ऐसा बोझ नहीं डालेगा जिसे तुम सह न सको—तुम्हें इस पर आस्था रखनी होगी। पूर्ण किए जाने का प्रयास करने, परमेश्वर को संतुष्ट करने और एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बनने के लिए व्यक्ति में संकल्प होना चाहिए। यह संकल्प क्या है? पूर्ण किए जाने का प्रयास करने का संकल्प, ऐसा व्यक्ति बनने का प्रयास जिसके पास सत्य और मानवता हो, जो परमेश्वर से प्रेम करे और उसकी गवाही दे। इसी में परमेश्वर को सबसे अधिक आनंद आता है। अगर तुम्हारे पास ऐसा संकल्प नहीं है, बल्कि तुम केवल यह कहकर संतुष्ट हो : “मैं अपने कर्तव्य में व्यस्त हूँ। मैं बोझ उठा रहा हूँ, श्रम कर रहा हूँ और उपदेश सुन रहा हूँ। मैं किसी और से पीछे नहीं हूँ,” तो तुम्हारे पास कोई भविष्य नहीं है। ज्यादा से ज्यादा तुम एक श्रमिक हो, लेकिन तुम परमेश्वर के लोग नहीं बनोगे। क्या तुम प्रगति की इच्छा किए बिना बस यूँ ही यथास्थिति से संतुष्ट होकर नहीं जी रहे हो? तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, सभाओं में सत्य पर संगति नहीं करते और उपदेश सुनते ही ऊँघने लगते हो। लेकिन सांसारिक मामलों पर चर्चा करते ही तुम बोलते जाते हो और तुम्हारी आँखें चमक उठती हैं—ये एक श्रमिक के व्यवहार हैं। कुछ लोगों की आँखें सत्य का उल्लेख करते ही चमक उठती हैं; उन्हें लगता है कि उनमें बहुत कमी है, और कुछ अच्छा और व्यावहारिक सुनते ही वे तुरंत उसे नोट कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि वे परमेश्वर की अपेक्षाओं से कोसों दूर हैं और उनके दिल में पर्याप्त सकारात्मक चीजें नहीं हैं। उन्हें लगता है कि उनमें शैतान का जहर बहुत अधिक है और वे परमेश्वर के प्रति बहुत विद्रोही हैं। वे सोचते हैं : “कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर मुझसे संतुष्ट नहीं है। मैं उसकी अपेक्षाओं से बहुत दूर हूँ, मैं किसी भी तरह परमेश्वर के अनुरूप नहीं हूँ, और मैं उसे बहुत गलत समझता हूँ। मैं कब परमेश्वर के इरादे पूरे कर सकूँगा?” वे अपने कर्तव्य में इन चीजों को पता लगाने के प्रयास में देर नहीं करते और अक्सर परमेश्वर के सामने आकर मन-ही-मन प्रार्थना करते हैं : “हे परमेश्वर, मेरा परीक्षण करो। मैं तुमसे विनती करता हूँ मुझे प्रकट करो, मुझे सत्य को समझने दो, सत्य वास्तविकता प्राप्त करने दो और तुम्हें जानने दो। मुझे अनुशासित करो, मेरा न्याय करो और मुझे ताड़ना दो।” जब वे इसके साथ कोई बोझ उठाते हैं तो हमेशा इसे ध्यान में रखते हैं। वे हमेशा सत्य के लिए प्यासे रहते हैं और इस प्रकार परमेश्वर उन पर कार्य शुरू करता है। वह कुछ लोगों, घटनाओं, और चीजों, तमाम तरह की स्थितियों की व्यवस्था करता है ताकि वे हर दिन उनसे कुछ सीख सकें। तब क्या वे असाधारण लाभ नहीं प्राप्त करते हैं? पतरस सैकड़ों परीक्षण क्यों देख पाया? क्योंकि उसने सत्य का अनुसरण किया, परमेश्वर के परीक्षणों से नहीं डरा और वह मानता था कि परमेश्वर के परीक्षण लोगों को शुद्ध करने के लिए होते हैं। वह मानता था कि यह मार्ग लोगों को पूर्ण बना सकता है, और यही एकमात्र सच्चा मार्ग है। उसने इसके लिए प्रार्थना की, खुद को खपाया और समर्पित किया; इसीलिए परमेश्वर ने उसमें कार्य किया। क्या इसका यह मतलब है कि परमेश्वर ने उसे कृपा की दृष्टि से देखा, कि वह पतरस का परीक्षण करने और उसे पूर्ण बनाने की ठान चुका था? बिल्कुल सही। जब परमेश्वर किसी व्यक्ति को कृपा की दृष्टि से देखता है तो उसके मन में एक लक्ष्य के साथ ही सिद्धांत भी होते हैं—यह निश्चित है। अधिकतर लोग परमेश्वर से इस तरह का कार्य प्राप्त क्यों नहीं कर पाते हैं? क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, उनमें इस संकल्प की कमी होती है, और इसीलिए परमेश्वर उनमें कार्य नहीं करता है। परमेश्वर किसी को मजबूर नहीं करता है। जब परमेश्वर किसी को पूर्ण बनाना चाहता है, तो यह एक अत्यंत अद्भुत बात है, और इसके लिए कितनी भी पीड़ा झेली जा सकती है। लेकिन अधिकतर लोगों में यह संकल्प नहीं होता है, और वे परीक्षणों और क्लेशों का सामना होते ही भाग जाते हैं और छिप जाते हैं। क्या परमेश्वर ऐसे किसी व्यक्ति को बाध्य करेगा? कुछ लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, और उनमें मसीह का आमना-सामना करने का साहस भी नहीं होता है। वे कहते हैं : “अगर मैंने मसीह को देख लिया, तो मुझे नहीं पता मैं क्या कहूँगा। मैं न कोई सत्य जानता हूँ, न संगति जानता हूँ। अगर मसीह ने यह देख लिया कि मेरे साथ क्या दिक्कत है तो क्या यह शर्मनाक नहीं होगा? अगर मुझे काट-छाँट का सामना करना पड़ा तो मैं इसे सँभाल नहीं पाऊँगा। मुझे परमेश्वर से बचना चाहिए और उससे सम्मानजनक दूरी बनाए रखनी चाहिए। अगर मैं हमेशा परमेश्वर के संपर्क में रहता हूँ और उसके सामने जीवन जीता हूँ, तो वह मेरी असलियत जान लेगा और मुझसे घृणा करेगा। मुझे निकाल दिया जाएगा और मेरे पास फिर कोई अच्छी मंजिल नहीं रहेगी।” क्या ऐसा ही होता है? (नहीं।) कुछ लोग इस प्रकार के विचार पालते हैं। क्या परमेश्वर किसी ऐसे व्यक्ति से कुछ माँगेगा? (नहीं, वह नहीं माँगेगा।) इसलिए तुम जो भी अनुसरण करोगे, तुम्हारा संकल्प जितनी दूर तक का होगा, परमेश्वर तुम्हें उस बिंदु तक पूर्ण बना देगा। यदि तुम सत्य का अनुसरण न करके हमेशा परमेश्वर से छिपते फिरते और दूर रहते हो, हमेशा अपने विचारों को परमेश्वर से छिपाते हो, तो परमेश्वर ने तुम जैसे लोगों के बारे में क्या कहा है? (“पवित्र वस्तु कुत्तों को न दो, और अपने मोती सूअरों के आगे मत डालो” (मत्ती 7:6)।) तुम सत्य से प्रेम नहीं करते और परमेश्वर से छिपते हो, फिर भी सोचते हो कि वह तुम्हारा परीक्षण करने और पूर्ण बनाने पर जोर देगा? तुम गलत हो। यदि तुम सही व्यक्ति नहीं हो, तो चाहे कितनी भी विनती और प्रार्थना कर लो, कोई लाभ नहीं होगा। परमेश्वर ऐसा नहीं करेगा; परमेश्वर लोगों को मजबूर नहीं करता। यह उसके स्वभाव का एक पहलू है। लेकिन वह चाहता है कि सत्य का अनुसरण करने वाले लोग पतरस, अय्यूब या अब्राहम जैसे हो सकें; वे परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार जीवन में सही रास्ते पर कदम रख सकें; वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना शुरू कर सकें और अंततः सत्य प्राप्त कर पूर्ण बन सकें। परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को प्राप्त करने की आशा करता है, परंतु यदि तुम खुद इसका अनुसरण नहीं करते तो क्या परमेश्वर तुम्हें बाध्य करेगा? नहीं। परमेश्वर ने कभी किसी को बाध्य नहीं किया। ऐसा नहीं है कि पवित्र आत्मा तुम्हें लगातार प्रेरित करेगा, दामन पकड़कर तुम्हें छोड़ेगा नहीं, तुम्हें पूर्ण बनाने पर तुला रहेगा और ऐसा करने से पहले नहीं रुकेगा। सच बताएँ तो परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करेगा। यही उसका रवैया है। परमेश्वर बस यह आशा करता है कि अंत में जब उसका कार्य पूरा हो जाए, तो वह अय्यूब, पतरस और अब्राहम जैसे और अधिक लोगों को प्राप्त कर ले। लेकिन ठीक कितने लोग सत्य का अनुसरण कर अंत में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, इसके लिए वह मजबूर नहीं करेगा। वह चीजों को अपने आप घटित होने देगा—यह परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य का एक पक्ष है। परमेश्वर ने कोई विशेष संख्या तय नहीं की है—कि यह 10, 20, 1,000 या 2,000, या फिर 10,000 होनी चाहिए। उसने इस बारे में कोई निर्धारण नहीं किया है। परमेश्वर बस इसी तरह आगे बढ़ रहा है, व्यावहारिक तरीके से कार्य कर रहा है, और व्यावहारिक रूप से लोगों के बीच चल-फिर रहा है। वह इसी तरह कार्य करता और बोलता है, सत्य से संबंधित कार्य के हर पहलू को अंजाम देता है, ऐसा कार्य जो मानवजाति के लिए लाभदायक होता है। यही वह कार्य है जो वह सही लोगों के बीच करता रहता है, उन लोगों के बीच जिनमें सत्य के लिए ललक है। अंत में जिनके पास संकल्प होगा और जो सत्य का अनुसरण कर रहे होंगे, उन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। वे सबसे अधिक धन्य हैं और वे ही अनन्त जीवन प्राप्त करेंगे। इतना यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि परमेश्वर सबके प्रति धार्मिक है और किसी से अन्यायपूर्ण ढंग से पेश नहीं आता। आज तुम सभी लोग परमेश्वर का अनुसरण करने में सक्षम हो, यह कोई संयोगवश नहीं है—यह परमेश्वर ने बहुत पहले पूर्व-निर्धारित कर दिया था। परमेश्वर पहले ही ये सारी चीजें पूर्व-निर्धारित कर देता है कि लोग कब-किस परिवार में पैदा होंगे, किस माहौल में बड़े होंगे, उनकी काबिलियत, गुण, योग्यताएँ क्या होंगी और उनके आस-पास क्या कुछ होगा। अंत में लोग परमेश्वर की धार्मिकता को किस रूप में देखेंगे? आखिरकार जीवित रहने और एक सुंदर मंजिल पाने का आधार लोगों के अपने अनुसरण और चुकाई गई कीमत पर होता है। परमेश्वर का ये चीजें पूर्व-निर्धारित करना एक पहलू है, लेकिन लोगों का सहयोग भी अनिवार्य है। परमेश्वर इस आधार पर लोगों के परिणाम तय करता है कि वे किस मार्ग पर चलते हैं और उनके पास सत्य है या नहीं। यही उसकी धार्मिकता है।

हर किसी ने देहधारी परमेश्वर का व्यावहारिक पक्ष देखा है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति के साथ न्यायपूर्ण और तर्कसंगत तरीके से व्यवहार करता है। तुमने यह देखा है; दूसरों ने इसे देखा है; तुम सभी लोगों ने यह देखा है। देहधारी परमेश्वर एक साधारण व्यक्ति है। मसीह को देखकर कुछ लोगों के मन में धारणाएँ पैदा होती हैं और वे सोचते हैं, “वह इतना सामान्य, इतना मामूली दिखता है। क्या यह वास्तव में देहधारी हो सकता है? मैं उस पर विश्वास नहीं करता—मैं किसी भी सूरत में उस पर विश्वास नहीं कर सकता।” या वे बस अनिच्छा से उसका अनुसरण करते हैं, संदेह के साथ उस पर विश्वास करते हैं और अपनी धारणाओं को अपने साथ लिए फिरते हैं। मसीह को देखने वाले अन्य लोगों में कुछ तर्क होता है, और वे सोचते हैं : “देहधारी एक साधारण व्यक्ति है, लेकिन वह सत्य व्यक्त कर सकता है और लोगों को जीवन प्रदान कर सकता है, इसलिए मुझे उसके साथ परमेश्वर की तरह व्यवहार करना चाहिए। मैं उसके वचनों को सत्य के रूप में स्वीकार कर उन पर अमल करता हूँ, उन्हें सृष्टिकर्ता के वचन मानता हूँ। मैं उसका अनुसरण करूँगा।” ये लोग अंततः पूर्ण बनाए जाते हैं और सत्य प्राप्त करते हैं। अंत में किस प्रकार के लोग सत्य प्राप्त करते हैं? वही जो सत्य का अनुसरण करते हैं। परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों को रोज सींचता है, उनका पोषण करता है, उनकी चरवाही करता है, और उनमें कार्य करता है। मैं उपदेश और संगति साझा करता हूँ, पवित्र आत्मा परमेश्वर के चुने हुए लोगों में काम करता है, और हर कोई सिंचन और पोषण प्राप्त करता है। किसी के साथ भी विशेष व्यवहार नहीं किया जाता, कलीसियाई जीवन में भाग लेने वाला हर व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाता है और इस तरह रोजाना परमेश्वर के कार्य का आनंद उठाता है। मैं हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करता हूँ। चाहे कोई भी प्रश्न पूछे, मैं उत्तर देता हूँ, मैं कोई अतिरिक्त देखभाल नहीं करता, विशेष स्थितियाँ खड़ी नहीं करता, न किसी पर दबाव डालने या प्रोत्साहित करने की कोशिश करता हूँ, न पवित्र आत्मा से अतिरिक्त प्रबोधन या रोशनी दिलाता हूँ, न ही कोई संकेत या चमत्कार दिखाता हूँ। परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करता। परमेश्वर ने अनुग्रह के युग में अनेक संकेत और चमत्कार दिखाए थे, ताकि लोगों के पाप माफ कर उन्हें पश्चात्ताप के मार्ग पर लाया जा सके और वे परमेश्वर पर विश्वास करें, उस पर संदेह न करें। कार्य का वर्तमान चरण पूरी तरह से सत्य प्रदान करने से जुड़ा है, ताकि लोग सत्य को समझ सकें और सच्ची आस्था विकसित कर सकें। तुमने चाहे कितना भी दुख सहा हो, यदि अंततः सत्य प्राप्त कर लिया है, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो पूर्ण बनाया जा चुका है और जिसकी रक्षा की जाएगी। यदि तुम सत्य प्राप्त नहीं करते तो तुम चाहे जो भी कारण गिनाओ, सब व्यर्थ हैं। तुम कह सकते हो : “परमेश्वर ने कोई चमत्कार नहीं दिखाया, इसलिए मैं विश्वास नहीं कर सका,” “परमेश्वर हमेशा ऐसे सत्य व्यक्त करता रहा जो मेरी समझ से परे थे, इसलिए मैं विश्वास नहीं कर सका,” या “परमेश्वर इतना व्यावहारिक और सामान्य था कि मैं विश्वास नहीं कर सका।” ये सभी तुम्हारी समस्याएँ हैं। तुम्हें दूसरों की तरह ही सत्य प्रदान किया गया था—तो फिर वे पूर्ण क्यों बना दिए गए, जबकि तुम्हें निकाल दिया गया? तुमने सत्य क्यों नहीं प्राप्त किया? यह तुम्हारा न्याय है : ऐसा इसलिए है क्योंकि तुमने सत्य का अनुसरण नहीं किया। इस अंतिम चरण में, परमेश्वर केवल वचनों का कार्य करता है। वह व्यावहारिक रूप से मानवता का न्याय करने और उसे निर्मल बनाने के लिए वचनों का उपयोग करता है; वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता। यदि तुम परमेश्वर के चमत्कार देखना चाहते हो तो 2,000 साल पुराने युग में जाकर प्रभु यीशु के चमत्कार देखो। इस युग के विश्वासी मत बनो। तुमने परमेश्वर के न्याय का कार्य स्वीकार कर लिया है, इसलिए चमत्कारों की तलाश मत करो। परमेश्वर ये सब नहीं कर रहा है। क्या यह उचित है? (बिल्कुल।) यह उचित और तर्कसंगत है। यदि तुम सत्य का अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर तुमसे अन्यायपूर्ण ढंग से पेश नहीं आएगा। यदि तुम सत्य का अनुसरण न कर केवल श्रम करने का प्रयास करते हो और तुम अंत तक समर्पित रूप से श्रम करते रहने में सक्षम होते हो, तो परमेश्वर तुम्हें बने रहने देगा और तुम्हें अनुग्रह भी मिलेगा। लेकिन यदि तुम अंत तक श्रम करने में असमर्थ हो तो तुम्हें निकाल दिया जाएगा। निकाले जाने का क्या अर्थ है? इसका मतलब विनाश है! यह उचित और तर्कसंगत है, और इसमें लोगों के प्रति कोई अन्यायपूर्ण व्यवहार नहीं है। यह सब परमेश्वर के वचनों और सत्य पर आधारित है। इन सबके मद्देनजर क्या वह राह अत्यंत महत्वपूर्ण नहीं हो जाती जिसे लोग अपनाते हैं? तुम किस राह का अनुसरण करते हो, किस प्रकार के व्यक्ति बनना चाहते हो, किस प्रकार के अनुसरण में संलग्न रहते हो, क्या आशा रखते हो, परमेश्वर से क्या माँगते हो, परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया क्या है और जब तुम उसके सामने होते हो तो उसके वचनों के प्रति क्या रवैया अपनाते हो : ये सभी चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं। तुम्हीं बताओ—क्या संकेत और चमत्कार दिखाने से लोग पूर्ण बनाए जा सकते हैं? उदाहरण के लिए, अगर तुम्हारे साथ कोई सड़क हादसा हो जाता है और परमेश्वर तुम्हें बचा लेता है, तो क्या इससे तुम पूर्ण बन सकते हो? यदि तुम एक बार मर गए और फिर से जी उठे तो क्या यह तुम्हें पूर्ण बना सकता है? या सपने में स्वर्ग के राज्य में जाकर परमेश्वर को देख लिया, तो क्या यह तुम्हें पूर्ण बना सकता है? (नहीं।) ये चीजें सत्य का स्थान नहीं ले सकतीं। इसलिए कार्य के इस अंतिम चरण में, जो परमेश्वर के प्रबंधन कार्य का समापन चरण है, वह लोगों को पूर्ण बनाने और प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों के माध्यम से पूर्ण बनाए जाते हो तो कोई यह शिकायत नहीं कर सकता कि तुम्हें परमेश्वर ने बचा रखा है, और शैतान तुम्हें बचाए रखने का आरोप नहीं लगा सकता है। ऐसे ही व्यक्ति को परमेश्वर चाहता है। परमेश्वर ने इतने सारे वचन उपलब्ध कराए हैं, इसलिए यदि तुम अंत में कुछ भी हासिल नहीं करते तो यह किसकी गलती होगी? (हमारी अपनी।) गलत रास्ता चुनना तुम्हारी अपनी गलती है। लोग कौन-सा रास्ता अपनाते हैं यह बहुत महत्वपूर्ण है। क्यों? क्योंकि इससे उनकी मंजिल तय होती है। इसलिए तुम्हें लगातार यह जानने में नहीं जुटे रहना चाहिए कि क्या भविष्यवाणियाँ पूरी हो गई हैं, क्या परमेश्वर ने कोई संकेत और चमत्कार दिखाए हैं, परमेश्वर वास्तव में पृथ्वी से कब जाएगा और क्या तुम उसे पृथ्वी छोड़ते समय देख सकोगे। उसे खोजने से तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा; इससे तुम्हारी मंजिल या तुम्हारे पूर्ण बनाए जाने पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तो फिर तुम्हारे लिए क्या मायने रखता है? (आस्था में चुना मेरा रास्ता।) तुम जो रास्ता अपनाते हो उससे इस बात पर फर्क पड़ता है कि क्या तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो। पूर्ण बनाए जाने की कोशिश में तुम्हें सबसे अधिक किस सत्य में प्रवेश करना चाहिए? परमेश्वर के प्रति समर्पण का सत्य। परमेश्वर के प्रति समर्पण करना सर्वोच्च, सबसे महत्वपूर्ण सत्य है, और सार रूप में सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के प्रति समर्पण का अनुसरण करना एक समान है। तुम्हें जीवन भर परमेश्वर के प्रति समर्पण का अनुसरण करने की आवश्यकता है, और परमेश्वर के प्रति समर्पण का यह मार्ग सत्य का अनुसरण करने का मार्ग है। तुम्हें अपने जीवन भर परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए? क्योंकि परमेश्वर के प्रति समर्पण की प्रक्रिया भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने की प्रक्रिया है। तुम्हें भ्रष्ट स्वभाव ठीक क्यों करना चाहिए? क्योंकि भ्रष्ट स्वभाव परमेश्वर के प्रतिकूल है। अगर तुम शैतानी स्वभाव के अनुसार जीते हो तो तुम्हारा सार शैतान का है, दानवों का है। परमेश्वर के प्रति समर्पण का अनुसरण करने के लिए तुम्हें अपने भ्रष्ट स्वभाव की समस्या दूर करनी होगी। यह अत्यावश्यक है! जब तक तुममें भ्रष्ट स्वभाव है और उसमें एक लेशमात्र भी अनसुलझा रह जाता है, तब तक तुम परमेश्वर के प्रतिकूल रहोगे, परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके प्रति समर्पण नहीं कर पाओगे। तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव जिस हद तक हल हो जाता है, उसी हद तक तुम परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हो; तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव का जितना प्रतिशत समाधान होता है, उतना प्रतिशत तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हो।

इस सभा में हमने परमेश्वर को जानने के बारे में बात नहीं की है। परमेश्वर को धीरे-धीरे जाना जाता है और इसकी प्रक्रिया यह है कि हम अपने भ्रष्ट स्वभाव को हल करते जाएँ और परमेश्वर के प्रति समर्पण तक पहुँचने के लिए पूर्ण किए जाने का प्रयास करते जाएँ। परमेश्वर को जानने की कोशिश अपने आप में एक बहुत गहन सबक होगा, यही कारण है कि हमने इसके बारे में बात नहीं की। अभी हमारी बातचीत के विषयों का निकट संबंध लोगों के अभ्यास, जीवन, अनुसरण और उनके द्वारा अपनाए जा रहे रास्तों से है। अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक करने की प्रक्रिया में तुम धीरे-धीरे परमेश्वर को समझते हो और उसके इरादों को जानने लगते हो। जब तुम परमेश्वर के इरादों को समझने लगते हो तो क्या तुम्हें उसका और अधिक ज्ञान नहीं मिल जाता है? (बिल्कुल।) तब तुम्हारे पास परमेश्वर का कुछ वास्तविक ज्ञान होता है। जब तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो तो उसके प्रति समर्पण करने में सफल क्यों हो जाते हो? क्योंकि तुम उसके हृदय को जानते हो और उसके इरादों को समझते हो; तुम समझते हो कि परमेश्वर तुमसे किन मानकों और सिद्धांतों की अपेक्षा करता है, और उसके लक्ष्य क्या हैं। क्या इस समझ में परमेश्वर का कुछ ज्ञान शामिल नहीं है? (बिल्कुल है।) यह धीरे-धीरे हासिल किया जाता है, और यह सब आपस में जुड़ा हुआ है। यदि तुम केवल परमेश्वर को जानने के पीछे भागोगे तो तुम्हें संघर्ष करना पड़ेगा। तुम कह सकते हो : “मैं दिन-रात परमेश्वर को जानने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं करूँगा। मैं देखूँगा कि फूल कहाँ से आते हैं, मेमने अपने दूध के लिए घुटने क्यों टेकते हैं जबकि बछड़े ऐसा नहीं करते। मैं यह सब अध्ययन करूँगा और इस तरह परमेश्वर को जानूँगा।” क्या तुम यह सब शोध करके परमेश्वर का ज्ञान पा सकते हो? बिल्कुल भी नहीं। सत्य शोध करने से नहीं आता बल्कि यह केवल अनुभव से ही जाना जाता है। शोध का कोई फायदा नहीं है। तुम जानते ही हो कि सभी चीजें परमेश्वर ने बनाईं, और क्या खूब बनाई हैं, और इस प्रकार तुम्हें पहले से ही परमेश्वर का कुछ ज्ञान है। लेकिन तुम्हें किस चीज पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए? तुम्हें सत्य का अनुसरण करना है, अपने भ्रष्ट स्वभाव का समाधान करना है और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना है। अनुसरण की इस प्रक्रिया में तुम धीरे-धीरे कई गौण प्रश्नों को समझने लगोगे और तुम्हें अपने अभ्यास और अपने प्रवेश के लिए एक मार्ग मिल जाएगा। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव का समाधान जितनी अच्छी तरह से किया जाएगा, तुम्हारे लिए सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना उतना ही आसान होगा। एक बार जब लोग अपने भ्रष्ट स्वभाव से बाधित नहीं रह जाते हैं, तो वे वास्तव में स्वतंत्र और मुक्त हो जाते हैं, और तब किसी भी सत्य को अभ्यास में लाना कठिन नहीं बल्कि बहुत आसान रहता है। सत्य का लोगों का जीवन बन जाना क्या यही नहीं है?

1 अक्टूबर 2017

The Bible verses found in this audio are from Hindi OV and the copyright to the Bible verses belongs to the Bible Society of India. With due legal permission, they are used in this production.

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