मूल्यांकन लिखते समय के सरोकार

13 मार्च, 2026

वू शिन, चीन

2021 में, जब कलीसिया स्वच्छता का कार्य कर रही थी, मैंने पाया कि जब जिला अगुआ ली जिंग किसी को भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हुए देखती थी—जैसे घमंडी और आत्मतुष्ट होना, स्वार्थी होना, अपनी देह के प्रति विचारशील होना या बहसबाज होना—तो वह उसकी मदद करने के लिए संगति नहीं करती थी और कसीलिया के 80 प्रतिशत से ज्यादा सदस्यों की लिखित मंजूरी लिए बिना उन्हें बाहर निकाल देती थी। वह उनकी परमेश्वर के वचनों की किताबें भी जब्त कर लेती थी। सभी भाई-बहन डर के साये में जी रहे थे। मैं अपनी स्थिति को लेकर भी चिंतित थी। मैं जानती थी कि मेरा स्वभाव काफी घमंडी था और मुझमें अपने कर्तव्य के प्रति बोझ की कमी थी। कभी-कभी मैं भी अपनी देह के प्रति विचारशील और लापरवाह होती थी। जिस तरह से ली जिंग लोगों की जाँच कर रही थी, मुझे लगा कि न जाने कब मेरी बारी आ जाए। एक बार, मैंने ली जिंग को अपनी दशा के बारे में खुलकर बताया और उसने कहा, “यह परमेश्वर के कार्य का एक चरण है। हर किसी को बाहर निकाले जाने का अनुभव करना ही होगा। डरने का कोई फायदा नहीं!” जब मैंने उसे ऐसा कहते सुना, तो मुझे लगा कि कुछ तो गड़बड़ है। जिस दौरान परमेश्वर कार्य करता है और मानवजाति को बचाता है, हर व्यक्ति कुछ भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करेगा। लेकिन अगर कोई सत्य को स्वीकार कर सकता है और पश्चात्ताप करने और खुद को बदलने में समर्थ है तो वह बचाए जाने के योग्य है। परमेश्वर किसी व्यक्ति की भ्रष्टता के क्षणिक प्रकाशनों को नहीं देखता; वह उनके निरंतर व्यवहार और उनके प्रकृति सार के आधार पर उन्हें मापता और निरूपित करता है। जो लोग निरंतर रूप से कलीसिया में गड़बड़ी और बाधा उत्पन्न करते हैं, जो काफी बुराई करते हैं और पश्चात्ताप करने से इनकार कर देते हैं—उनका सार एक बुरे व्यक्ति का सार होता है और उन्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए और हटा दिया जाना चाहिए। सिर्फ भ्रष्टता के क्षणिक प्रकाशन की वजह से किसी को बाहर निकाल देना सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है! लेकिन फिर मेरे मन में एक और विचार आया : “आखिरकार, मैं उस तरह का कर्तव्य नहीं निभा रही हूँ, इसलिए मैं बहुत-से सिद्धांतों को नहीं समझती हूँ। अगर मैं लापरवाही से बोलती हूँ, तो अगली जाँच मेरी हो सकती है। अगर मुझे बाहर निकाल दिया गया तो क्या होगा? मेरी आस्था की यात्रा तो वहीं खत्म हो जाएगी। ‘परेशानी जितनी कम हो उतना अच्छा है’; ‘सावधानी ही सुरक्षा की जननी है।’ ली जिंग और बाकी लोग इससे कैसे निपटते हैं, यह उनका काम है; इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है। अगर मेरी जाँच नहीं होती है तो मेरे लिए यही काफी है।” इसलिए, मैंने एक शब्द भी नहीं कहा। तब से, जब भी कोई लोगों को बाहर निकालने की बात करता, मैं उस विषय से बचती थी, मैं इस बात से भयाकुल थी कि गलत चीज कहने से मैं जाँच का निशाना बन जाऊँगी।

एक दिन, मुझे ली जिंग का एक पत्र मिला; इसमें उसने सत्य का अनुसरण न करने वाले व्यक्ति की कई अभिव्यक्तियों का सारांश लिखा था और मुझसे कहा था कि इसके आधार पर मैं वांग यू का मूल्यांकन लिखूँ। जब मैंने इसे पढ़ा तो मैं काफी हैरान थी। मैंने वांग यू के साथ तीन साल से ज्यादा समय तक सहयोग किया था। वह अपने कर्तव्य में हमेशा बहुत सक्रिय रहती थी और उसमें थोड़ा-सा घमंडी स्वभाव अवश्य था, लेकिन वह कभी किसी को बाधित नहीं करती थी या कलीसिया के कार्य को बाधा नहीं पहुँचाती थी। उसकी जाँच क्यों की जा रही थी? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पत्र में मुझे यह निर्देश दिया गया था कि मैं वांग यू की सत्य का अनुसरण न करने की अभिव्यक्तियों के बारे में लिखूँ, जिसमें काट-छाँट को स्वीकार न करना, बहसबाज होना और उसका अपने हितों की रक्षा करना शामिल था। इसमें यह भी कहा गया था कि मैं और किसी चीज के बारे में नहीं लिख सकती। मैंने मन ही मन सोचा, “हर कोई कुछ हद तक इस तरह की भ्रष्टता प्रकट करता है। अगर मैं सिर्फ इसके आधार पर मूल्यांकन लिखती हूँ, तो यह पूरी तरह से नकारात्मक होगा। यह सही नहीं है! क्या मूल्यांकन उस पर आधारित नहीं होना चाहिए जो तुमने खुद देखा है, किसी की खूबियों और कमजोरियों का एक निष्पक्ष और सही विवरण? मुझे सिर्फ उसकी कमियों के बारे में क्यों लिखने दिया जा रहा है लेकिन उसकी खूबियों के बारे में नहीं? लगता है अगुआ की वांग यू के बारे में अच्छी राय नहीं है। इस बार वह बाहर निकाले जाने के वास्तविक खतरे में है।” यह सोचकर, मुझे वांग यू के लिए चिंता होने लगी। मैंने पत्र बार-बार पढ़ा, मन ही मन सोचा, “ली जिंग ही मुख्य रूप से इस कार्य का अनुवर्तन कर रही है। वह जिला अगुआ है और मैं सिर्फ एक साधारण विश्वासी हूँ। मैं उसके सामने कहीं नहीं ठहरती हूँ। ऐसे नाजुक समय में मैं मुसीबत खड़ी करने का जोखिम नहीं उठा सकती हूँ। बेहतर होगा कि मैं इसे लिख ही दूँ।” लेकिन जब मैंने लिखना शुरू किया, तो मैं अटक गई। मैंने याद किया कि कैसे जब वांग यू की काट-छाँट होती थी, तो वह कभी-कभार रक्षात्मक होती थी और उलटे बहस करती थी, लेकिन बाद में वह सत्य खोजने, आत्म-चिंतन करने और कुछ आत्म-ज्ञान पाने में सफल रहती थी। उसने कुछ बदलाव और प्रवेश भी दिखाया था और वह आम तौर पर कलीसिया के हितों की रक्षा करती थी। क्या ये सब सत्य का अनुसरण करने की अभिव्यक्तियाँ नहीं थीं? लेकिन ली जिंग सिर्फ यह चाहती थी कि मैं सत्य का अनुसरण न करने की वांग यू की अभिव्यक्तियों के बारे में लिखूँ। मैं यह कैसे लिख सकती थी? फिर मेरे मन में एक और विचार आया : “ली जिंग वांग यू को अच्छी तरह जानती है। क्या वह मुझसे यह जानकारी इसलिए मांग रही है क्योंकि उसने उसमें कोई समस्या देखी है? वरना वह उसकी जाँच क्यों कर रही होती? मैं सत्य को बहुत कम समझती हूँ, मेरी विवेकशीलता कमजोर है और मेरा नजरिया अनिवार्य रूप से सटीक नहीं होता है। बेहतर होगा कि मैं लापरवाही से अपनी राय न दूँ। वह एक उच्चतर स्तर की अगुआ है; वह अधिक मसले निपटा चुकी है और अधिक लोगों के बीच रही है। शायद वह चीजों को मुझसे अलग नजरिए से देखती है। इसके अलावा, अगर मैंने कुछ गलत कह दिया तो क्या होगा? ली जिंग कहेगी, ‘तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए इतने साल हो गए और तुम अभी भी सत्य को नहीं समझती हो। तुमने वांग यू के साथ इतने लंबे समय तक सहयोग किया है और तुममें इतनी रत्तीभर भी विवेकशीलता नहीं है? तुम इतनी भ्रमित हो!’ अभी, ली जिंग हर उस व्यक्ति की जाँच कर रही है जो भ्रष्टता प्रकट करता है। अगर वह मुझे भ्रमित और विवेकशीलता की कमी वाली मानती है, तो क्या वह मेरी भी जाँच करेगी? क्या तब मैं खतरे में नहीं पड़ जाऊँगी? मुझे किसी भी पल बाहर निकाला जा सकता है और मेरे उद्धार का मौका बर्बाद हो जाएगा। मुझे सावधान रहना होगा! अभी सबसे जरूरी चीज है अपना बचाव करना और अपनी राय न देना। अगर मैं अपनी खुद की समस्याएँ उजागर करती हूँ और बाहर निकाल दी जाती हूँ तो मेरे पास एक अच्छा परिणाम नहीं होगा।” इसलिए, मैंने यह पता लगाने की कोशिश की कि वांग यू द्वारा सत्य का अनुसरण न करने की अभिव्यक्तियों के बारे में कैसे लिखा जाए, जैसा कि चिट्ठी में मांग की गई थी। लेकिन मैं जितना ज्यादा लिखती, मुझे उतना ही ज्यादा लगता कि वांग यू बस कुछ भ्रष्टता प्रकट कर रही थी और बाद में उसने चिंतन किया और खुद को जान लिया। मैं बीच में ही रुक गई, सोच रही थी, “ये चीजें जिनके बारे में मैं लिख रही हूँ उसके सत्य का अनुसरण न करने की अभिव्यक्तियाँ नहीं हैं। क्या यह बस ली जिंग का खंडन करना नहीं है?” इसलिए, मैंने समझौता कर लिया और वांग यू के भ्रष्टता के प्रकाशनों के बारे में थोड़ा और लिखा। लेकिन जब बात समापन पर पहुँची जहाँ मुझे अपना दृष्टिकोण व्यक्त करना था, मैं फिर से झिझक गई। “अगर मैं कहती हूँ कि वांग यू सत्य का अनुसरण नहीं करती है, तो यह मेरी अंतरात्मा के खिलाफ जाएगा। अपनी अंतरात्मा का गला घोंटना और सत्य न बोलना परमेश्वर के सामने एक अपराध होगा! लेकिन अगर मैं कहती हूँ कि वह सत्य का अनुसरण तो करती है, यह ली जिंग के दृष्टिकोण से भिन्न होगा। अगर वह मेरे बारे में कोई राय बना लेती है और फिर मेरी जाँच करती है, तो मैं खतरे में पड़ जाऊँगी। बेहतर होगा कि मैं अपना बचाव करूँ और इसमें न फँसूँ।” और इसलिए, मैंने ये शब्द लिख दिए : “मैं उसके बारे में स्पष्ट नहीं हूँ।” मैंने सोचा, “वांग यू सत्य का अनुसरण करती है या नहीं, इसका विश्लेषण और फैसला करना ली जिंग पर निर्भर है। मैं जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचने वाली हूँ।” उस समय, मैंने यह भी सोचा कि मैं काफी चालाक बन रही हूँ। और बस ऐसे ही, मैंने मूल्यांकन जमा कर दिया। इसके तुरंत बाद, वांग यू को अज्ञात कारणों से सुसमाचार प्रचार करने के उसके कर्तव्य से हटा दिया गया। उस दौरान, मैंने देखा कि वह थोड़ी नकारात्मक थी और ज्यादा बात नहीं करती थी। मैंने थोड़ा-सा असहज महसूस किया, लेकिन फिर मैंने सोचा, “यह सिर्फ मेरे मूल्यांकन की वजह से नहीं हुआ है,” इसलिए मैंने अपनी समस्या पर आत्म-चिंतन नहीं किया।

कुछ समय बाद, एक उच्चतर स्तर का अगुआ स्वच्छता कार्य की स्थिति जाँचने आया। उसने पाया कि कुछ भाई-बहनों को केवल कुछ भ्रष्टता प्रकट करने के कारण बाहर निकाल दिया गया था और यह जिला अगुआ ली जिंग और स्वच्छता कार्य के प्रभारी लोगों द्वारा मनमाने ढंग से और जानबूझकर कार्य करने का नतीजा था, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का नहीं। गलत तरीके से बाहर निकाल दिए गए इन भाई-बहनों को सत्यापन के बाद वापस कलीसिया में स्वीकार कर लिया गया। जहाँ तक ली जिंग की बात है, उसने अपने किए के लिए कोई पछतावा नहीं दिखाया और यहाँ तक कि उल्टे बहस की और अपने क्रियाकलापों को सही ठहराने की कोशिश की। अंत में, उसे मसीह-विरोधी ठहराया गया और निष्कासित कर दिया गया। स्वच्छता कार्य के लिए जिम्मेदार कुछ कर्मचारियों को भी बर्खास्त कर दिया गया। कलीसिया में लौटने के बाद, वांग यू ने लिखने-पढ़ने का कर्तव्य संभाला। एक सभा के दौरान, वांग यू ने उस अवधि की अपनी अनुभवजन्य समझ साझा की। उसने कहा कि जब उसने शुरुआत में देखा कि उसके प्रति भाई-बहनों का रवैया बदल गया है, तो वह जान गई कि उसकी जाँच की जा रही है। इस विचार ने उसे पूरी तरह निराश, दुखी और संत्रस्त कर दिया कि इतने वर्षों की आस्था के बाद अब वह बाहर निकाले जाने का सामना कर रही है, कि उसकी आस्था की यात्रा खत्म होने वाली है। वह न खा पा रही थी, न सो पा रही थी। लेकिन वह जानती थी कि ऐसी स्थिति का सामना करना कोई संयोग नहीं था और वह समर्पण करने, अपने सबक सीखने और आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने के लिए तैयार थी। बाद में, उसने सत्य को स्वीकार न करने और घमंडी स्वभाव होने की अपनी कुछ अभिव्यक्तियों पर चिंतन किया। उसने कहा कि वह सोचा करती थी कि वह दूसरों से ज्यादा कर्तव्य करती है, उनसे ज्यादा सत्य समझती है और हमेशा महसूस करती थी कि वह काफी अच्छी है। जब वह भाई-बहनों के कर्तव्यों में विचलन देखती थी, तो वह उन्हें नीची नजर से भी देखती थी। उसने कहा कि अगर उसे इस बार उसके कर्तव्य से नहीं हटाया गया होता, तो वह कभी भी खुद पर सच्चे मन से चिंतन नहीं करती। उसे लगा कि इतना भ्रष्ट और विद्रोही होने के कारण, भले ही उसे बाहर निकाल दिया गया होता, तो भी यह परमेश्वर की धार्मिकता होती और उसे कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए...। उसकी संगति सुनकर, मैं लंबे समय तक बहुत बेचैन रही और मुझे गहरी आत्म-ग्लानि महसूस हुई। मैंने खुद से पूछा, “क्या इस दौरान वांग यू ने जो पीड़ा सही उसके लिए आंशिक रूप से मैं जिम्मेदार नहीं हूँ? मैंने इस मामले में कैसा व्यवहार किया? मैंने अपने असली विचार क्यों नहीं लिखे? मैंने ये शब्द क्यों लिखे, ‘मैं उसके बारे में स्पष्ट नहीं हूँ?’ मुझमें न्याय की भावना क्यों नहीं है? परमेश्वर इस तरह के व्यवहार को कैसे निरूपित करता है?” जैसे ही मैंने इन चीजों के बारे में सोचा, ऐसा लगा जैसे मेरे दिल में कोई सुई चुभ रही हो। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं साफ तौर पर जानती थी कि वांग यू ऐसी इंसान नहीं है जो सत्य का अनुसरण नहीं करती, फिर भी मैंने अपना विचार स्पष्ट रूप से नहीं बताया। कौन सा भ्रष्ट स्वभाव मुझे नियंत्रित कर रहा है? हे परमेश्वर, कृपया मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं खुद को जान सकूँ।”

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे गहराई से प्रभावित किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हर कलीसिया में खुशामद करने वाले कुछ लोग होते हैं। ... ये लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं; वे सिर्फ एक आसान जीवन जीना चाहते हैं, और दैहिक सुख-सुविधाओं का लालच करते हैं। वे बेहद स्वार्थी और बेहद चालाक होते हैं। क्या समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं? चाहे कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में हो, चाहे पद सँभालने वाला व्यक्ति कोई भी हो, वे बहुत पसंद किए जाते हैं, वे अपने सामाजिक संबंधों को सफलतापूर्वक सँभाल सकते हैं, और बड़े आराम से रह सकते हैं; चाहे कोई भी राजनीतिक आंदोलन छिड़ जाए, वे उसमें नहीं उलझते हैं। ये किस किस्म के लोग हैं? ये सबसे धोखेबाज, सबसे चालाक लोग हैं, जिन्हें ‘धूर्त लोगों’ और ‘स्थितियों से निपटने में अभ्यस्त’ के रूप में जाना जाता है। वे शैतान के फलसफों के अनुसार जीवन जीते हैं, उनमें लेश मात्र भी सिद्धांत नहीं होता है। जो भी सत्ता में होता है, वे उसी की सेवा करते हैं, उसी की खुशामद करते हैं, उसी के गीत गाते हैं। वे अपने वरिष्ठों को बचाने के अलावा कुछ नहीं करते हैं, और उन्हें कभी भी नाराज नहीं करते हैं। उनके वरिष्ठ चाहे कितने भी बुरे कर्म क्यों न करें, वे न तो उनका विरोध करते हैं और न ही उनका समर्थन करते हैं, बल्कि अपने विचारों को अपने दिल की गहराइयों में छिपाए रखते हैं। चाहे सत्ता में कोई भी हो, उन्हें काफी पसंद किया जाता है। शैतान और शैतान राजा इस तरह के व्यक्ति को पसंद करते हैं। शैतान राजा इस तरह के व्यक्ति को क्यों पसंद करते हैं? क्योंकि वह शैतान राजाओं के मामलों को बिगाड़ता नहीं है और उनके लिए बिल्कुल भी खतरा नहीं बनता है। इस किस्म का व्यक्ति अपने स्व-आचरण में सिद्धांतहीन होता है, और अपने आचरण के लिए उसके पास कोई आधार नहीं होता, और उसमें ईमानदारी और गरिमा का अभाव होता है; वह बस समाज के रुझानों का अनुसरण करता है और शैतान राजाओं के सामने सिर झुकाता है, उनकी पसंद के अनुसार खुद को ढाल लेता है। क्या कलीसिया में ऐसे भी लोग नहीं हैं? क्या ऐसे लोग विजेता हो सकते हैं? क्या वे मसीह के अच्छे सैनिक हैं? क्या वे परमेश्वर के गवाह हैं? जब कुकर्मी और मसीह-विरोधी अपने सिर उठाते हैं और कलीसिया के कार्य में विघ्न डालते हैं, तो क्या ऐसे लोग उठ खड़े हो सकते हैं और उनके खिलाफ जंग छेड़ सकते हैं, उन्हें उजागर कर सकते हैं, पहचान सकते हैं और त्याग सकते हैं, उनके बुरे कर्मों का अंत कर सकते हैं और परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं? यकीनन वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। ये धूर्त लोग वे नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण बनाएगा या जिन्हें वह बचाएगा। वे कभी भी परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते हैं या उसके घर के हितों को बनाए नहीं रखते हैं। परमेश्वर की नजर में, ये उसका अनुसरण करने वाले या उसके प्रति समर्पण करने वाले लोग नहीं हैं, बल्कि वे लोग हैं जो आँख मूँदकर मुसीबत खड़ी करते हैं, और शैतान के गिरोह के सदस्य हैं—ये वही लोग हैं जिन्हें वह अपना कार्य पूरा करने के बाद हटा देगा। परमेश्वर ऐसे दुष्टों को सँजोकर नहीं रखता है। उनके पास न तो सत्य है और न ही जीवन है; वे जानवर और शैतान हैं; वे परमेश्वर के उद्धार के और उसके प्रेम का आनंद लेने के लायक नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर ऐसे लोगों को बड़ी आसानी से त्याग देता है और हटा देता है, और कलीसिया को उन्हें छद्म-विश्वासियों के रूप में फौरन बाहर निकाल देना चाहिए। ... इस किस्म के लोग सिर्फ जोश-खरोश को देखने और आँख मूँदकर मुसीबत खड़ी करने के लिए परमेश्वर के घर में घुसपैठ करते हैं। इनमें न्याय की भावना नहीं होती है और न ही जिम्मेदारी की कोई समझ होती है; यहाँ तक कि इनमें उन भले लोगों के लिए सहानुभूति तक नहीं होती है जो कुकर्मियों द्वारा चोट पहुँचाए गए होते हैं। ऐसे लोगों को राक्षस और शैतान बुलाना सबसे उपयुक्त है। अगर न्याय की भावना वाला कोई व्यक्ति कुकर्मियों को उजागर करता है, तो वे उसका हौसला भी नहीं बढ़ाएँगे या उसे नैतिक समर्थन भी नहीं देंगे। इसलिए, इन लोगों पर कभी भरोसा मत करो; ये धूर्त लोग, गिरगिट, स्थितियों से निपटने में अभ्यस्त हैं। ये परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं हैं, बल्कि ये शैतान के सेवक हैं। इन लोगों को कभी बचाया नहीं जा सकता है, और परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है; यह परमेश्वर की स्पष्ट इच्छा है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (19))। परमेश्वर उजागर करता है कि धूर्त लोग किसी के साथ भी ईमानदार नहीं होते; वे चालाक और कपटी होते हैं और वे हवा का रुख भांपने में माहिर होते हैं। उनके स्व-आचरण में कोई सिद्धांत या न्यूनतम मानक नहीं होता और वे गैरभरोसेमंद होते हैं। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “इन लोगों पर कभी भरोसा मत करो; ये धूर्त लोग, गिरगिट, स्थितियों से निपटने में अभ्यस्त हैं। ये परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं हैं, बल्कि ये शैतान के सेवक हैं। इन लोगों को कभी बचाया नहीं जा सकता है, और परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है; यह परमेश्वर की स्पष्ट इच्छा है।” इन वचनों ने मेरे दिल को गहराई तक बेध दिया। मुझे लगा कि मैं बिल्कुल वैसी ही इंसान हूँ। खुद पर चिंतन करते हुए, मैंने देखा कि जब ली जिंग ने उन भाई-बहनों को बाहर निकाल दिया जिन्होंने केवल कुछ भ्रष्टता प्रकट की थी, तो मुझे चिंता होने लगी कि एक दिन मुझे भी बाहर निकाल दिया जाएगा। इसलिए मैं यह देखने लगी कि हवा किस ओर बह रही थी। मैंने साफ देखा कि ली जिंग लोगों को बाहर निकालने में सिद्धांतों का पालन नहीं कर रही थी और जब मैंने उसके द्वारा फैलाई जा रही भ्रांतियाँ सुनीं तो मेरे दिल में शंकाएँ पैदा हुईं। फिर भी, मैं एक कायर की तरह पेश आई, अपने खोल में छिपी रही और मैंने आकलन नहीं किया कि क्या उचित है और क्या अनुचित है। जब भी मैं किसी को स्वच्छता कार्य पर चर्चा करते सुनती थी तो मैं उस विषय से बचती थी और सावधानीपूर्वक चुप रहती थी। जब ली जिंग ने मुझसे वांग यू का मूल्यांकन लिखने को कहा, जैसा मैं वस्तु स्थिति को समझती थी उसे सिद्धांतों के अनुसार लिखने के बजाय मैंने उसके बारे में ली जिंग की राय का अनुमान लगाने की कोशिश की। मुझे डर था कि अगर मेरा दृष्टिकोण उसके दृष्टिकोण से भिन्न हुआ तो मेरी भी जाँच की जाएगी। इसलिए मैंने बीच का रास्ता अपनाया, कुछ अच्छी बातें और कुछ बुरी बातें लिखीं, अपना दृष्टिकोण व्यक्त किए बिना केवल घटनाक्रम का वर्णन किया। मैं बिल्कुल अच्छी तरह जानती थी कि वांग यू को बाहर निकालने का निशाना नहीं होना चाहिए और मैं जानती थी कि ली जिंग लोगों की जाँच करने और उन्हें बाहर निकालने में सिद्धांतों का पालन नहीं कर रही थी। लेकिन मैंने ताकतवर की खुशामद की, “बुद्धिमान इंसान हालात के अनुसार अपना रुख बदलता है” और “समझदार लोग आत्म-रक्षा में अच्छे होते हैं” जैसे शैतानी फलसफों के अनुसार कार्य किया। अपनी सुरक्षा के लिए, मैंने बीच का रास्ता अपनाया, कोशिश की कि किसी को नुकसान न पहुँचाऊँ या नाराज न करूँ और बस कह दिया कि मैं उसके बारे में स्पष्ट नहीं हूँ। इस तरह, अगर वांग यू को बाहर निकालना गलत हुआ, तो यह ली जिंग की जिम्मेदारी होगी और इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं होगा। मैं कितनी चालाक थी! क्या मैं बस एक धूर्त इंसान नहीं थी? मूल्यांकन लिखने जैसी छोटी सी बात में, मैंने सबको खुश करने की कोशिश में अपना दिमाग खपा दिया। मैं कितनी चालाक और कपटी थी! अपने हितों का कोई भी नुकसान न होने देने के लिए, मैंने दांव-पेच खेले और चालबाजी की, जो मैं वास्तव में सोचती थी उसे कभी नहीं कहा और इसके बजाय गोलमोल और अस्पष्ट बातें कहीं। यह शैतान के बोलने के तरीके से कैसे अलग है? मैंने याद किया कि कैसे परमेश्वर ने शैतान से पूछा था : “तू कहाँ से आता है?(अय्यूब 1:7)। तब शैतान ने जवाब दिया, “पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ” (अय्यूब 1:7)। परमेश्वर के सवाल पर शैतान का जवाब गोलमोल था, जिससे उसकी सच्चाई को समझना नामुमकिन था। मैं भी बिल्कुल वैसी ही थी। मैं साफ तौर पर जानती थी कि वांग यू सत्य का अनुसरण करती है और मैंने उसकी सत्य का अनुसरण करने की कुछ अभिव्यक्तियों के बारे में लिखा भी था, फिर भी मैंने “मैं उसके बारे में स्पष्ट नहीं हूँ” जैसी गोलमोल और अस्पष्ट बातें कहीं। मैं कितनी धूर्त और कपटी थी! मैं जितना ज्यादा चिंतन करती, मुझे खुद से उतनी ही ज्यादा घृणा होती। मैंने इतना शर्मिंदा और कलंकित महसूस किया कि मैं वांग यू को देखने की हिम्मत नहीं कर सकी।

अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान, मैंने झूठे अगुआओं को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरी दशा के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ नकली अगुआ ऐसे भी हैं जिनमें थोड़ी बहुत काबिलियत होती है और वे थोड़ा बहुत काम कर सकते हैं, और जिन्हें हर तरह के व्यक्ति को सँभालने के लिए सिद्धांतों के बारे में थोड़ी समझ होती है। हालाँकि, वे लोगों को नाराज करने से डरते हैं, इसलिए जब वे बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को विघ्न-बाधा डालते हुए देखते हैं, तो वे उन्हें उजागर करने, रोकने या प्रतिबंधित करने का साहस नहीं करते हैं। वे शैतानी दर्शन के अनुसार जीते हैं, और वे उन मामलों पर आँखें मूँद लेते हैं जिनका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता है। उन्हें इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं होती कि कलीसिया के कार्य के क्या परिणाम होंगे, या परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा; उन्हें लगता है उनका इन चीजों से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, ऐसे नकली अगुआ के कार्यकाल के दौरान, कलीसियाई जीवन की सामान्य व्यवस्था कायम नहीं रह पाती है और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश की रक्षा नहीं हो पाती है। इस समस्या की प्रकृति क्या है? ऐसा नहीं है कि ये नकली अगुआ कार्य नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत खराब है; ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी मानवता कमजोर है, और उनमें जमीर और विवेक की कमी है, इसलिए वे वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। नकली अगुआ किस तरह से नकली हैं? उनमें मानवता के जमीर और विवेक की कमी है; इ‍सलिए, अगुआओं के रूप में काम करने की उनकी अवधि के दौरान, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी करने और बाधा डालने वाले बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों के मुद्दे का बिल्कुल भी समाधान नहीं हो पाया है। कुछ भाई-बहनों को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है, और कलीसिया के कार्य को भी भारी नुकसान पहुँचा है। जब इस तरह के नकली अगुआ को कोई समस्या दिखाई देती है, तो जब वह किसी बुरे व्यक्ति या मसीह-विरोधी को विघ्न-बाधा डालते हुए देखता है, तो उसे पता होता है कि उसकी जिम्मेदारी क्या है, उसे क्या करना चाहिए और उसे इसे कैसे करना चाहिए, फिर भी वह कुछ भी नहीं करता, और वह तो मूर्ख बनने का नाटक भी करता है, इसे पूरी तरह अनदेखा कर देता है, और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की रिपोर्ट नहीं करता है। वे बहाना बनाते हैं कि उन्हें कोई जानकारी नहीं है और उन्होंने कुछ नहीं देखा, और बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी करने और बाधा डालने देते हैं। क्या उनकी मानवता में कोई समस्या नहीं है? क्या वे बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों के खेमे के नहीं हैं? एक अगुआ के रूप में वे कौन-सा सिद्धांत अपनाते हैं? ‘मैं कोई व्यवधान या गड़बड़ी नहीं करता, लेकिन मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे किसी को ठेस पहुँचे, या जो दूसरों की गरिमा को नुकसान पहुँचाए। भले ही तुम मुझे एक नकली अगुआ के रूप में चित्रित करो, मैं फिर भी ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे किसी को ठेस पहुँचे। मुझे अपने लिए कोई रास्ता निकालना होगा।’ यह किस तरह का तर्क है? यह शैतान का तर्क है। और यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह बहुत ही धूर्ततापूर्ण और कपटपूर्ण नहीं है? ऐसा इंसान परमेश्वर के आदेश के प्रति अपने व्यवहार में जरा भी ईमानदार नहीं होता; वह अपने कर्तव्य के प्रदर्शन में हमेशा चालाक और धूर्त रहता है, कई ओछी गणनाएँ करते हुए वह सभी चीजों में अपने बारे में ही सोचता है। वह कलीसिया के कार्य पर जरा भी विचार नहीं करता और उसमें बिल्कुल भी कोई जमीर या विवेक नहीं होता। वह मूल रूप से कलीसिया के एक अगुआ के रूप में सेवा करने के योग्य नहीं है। ऐसे व्यक्ति के पास कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश के प्रति थोड़ा-सा भी बोझ नहीं होता है। वह केवल अपने हितों और आनंद की परवाह करता है; वह बिना इस बात की परवाह किए कि परमेश्वर के चुने हुए लोग किस स्थिति में हैं, केवल रुतबे के लाभों में लिप्त होने पर ध्यान केंद्रित करता है। क्या वह सबसे स्वार्थी और नीच व्यक्ति नहीं है? यहाँ तक कि जब वे बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हुए पाता है, तब भी वह इस पर ध्यान नहीं देता, मानो इन मामलों का उससे कोई लेना-देना ही न हो। ... अंततः, मैं इस तरह के व्यक्ति को ऐसे परिभाषित करूँगा : हो सकता है कि वे कोई बड़ी गलती न करें, पर वे बहुत धूर्त और धोखेबाज होते हैं; वे बिल्कुल भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेते, न ही वे कलीसिया का कार्य बिल्कुल भी कायम रखते हैं। उनमें कोई मानवता नहीं होती। मुझे लगता है कि वे किसी जानवर जैसे होते हैं—चालाकी में वे कुछ लोमड़ी की तरह होते हैं। लोग कहते हैं कि लोमड़ी चालाक होती है, लेकिन असल में ये लोग लोमड़ियों से भी ज्यादा चालाक होते हैं(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (20))। खुद को परमेश्वर के वचनों से मापकर, मैंने थोड़ा आत्म-ज्ञान पाया। मैंने मूल्यांकन में यह क्यों लिखा कि मैं उसे स्पष्ट रूप से देख नहीं सकी हूँ? क्या वाकई इसलिए कि मैं उसे देख नहीं सकी थी? नहीं, ऐसा नहीं था। मैं स्पष्ट रूप से देख चुकी थी कि लोगों की जाँच करने के ली जिंग के तरीके में विचलन थे और मैंने यह भी देखा था कि वांग यू केवल थोड़ी-सी भ्रष्टता प्रकट कर रही थी और वह स्वच्छ किए जाने का निशाना नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन मुझे डर था कि मैं फँसाई जा सकती हूँ और मेरी जाँच की जा सकती है, इसलिए मैंने सच बोलने की हिम्मत नहीं की। मैंने तब एक भी शब्द कहने की हिम्मत नहीं की जब मेरा सामना ऐसी चीज से हुआ जो सिद्धांतों के अनुसार नहीं थी। मुझमें न्याय की कोई भावना नहीं थी। मैंने देखा कि मेरी प्रकृति वाकई स्वार्थी और नीच, धूर्त और कपटी थी और मैं जरा-सी भी अंतरात्मा और विवेक से रहित थी। मैंने सोचा कि परमेश्वर ईमानदार लोगों को क्यों पसंद करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ईमानदार लोग दयालु और खरे होते हैं। वे अपनी कथनी-करनी में निष्पक्ष और न्यायसंगत होते हैं, उनमें न्याय की भावना होती है, वे अपने हितों के बारे में नहीं सोचते और वे ताकत या रुतबे से नहीं डरते। नाजुक मौकों पर, वे सिद्धांतों को कायम रखने और जो उचित है उसकी रक्षा करने के लिए खड़े हो सकते हैं। ऐसे लोगों में मानवता होती है और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है। लेकिन मेरे क्रियाकलापों और व्यवहार में एक ईमानदार इंसान की समानता रत्ती भर भी नहीं थी। मैं दूसरों की परवाह किए बिना केवल अपने हितों की रक्षा करने के बारे में सोचती थी। मैंने वांग यू को उसके कर्तव्य से हटाए जाते और पीड़ा में जीते हुए देखा, फिर भी मैं उदासीन बनी रही, मुझमें दया या सहानुभूति का एक अंश भी नहीं था। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ, वह रेत नहीं, शुद्ध, परिष्कृत सोना है। कुकर्मी मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवियों की तरह कैसे जीने दे सकता हूँ(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सात गर्जनाएँ गरजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य का सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएगा)। परमेश्वर पवित्र है और वह किसी भी धूर्त और कपटी स्वभाव वाले व्यक्ति को अपने घर में बिल्कुल भी नहीं रहने देगा। पहले, मैं नहीं समझती थी कि परमेश्वर के वचनों में “लोमड़ियाँ” किसे कहा गया है। लेकिन आज, तथ्यों के प्रकाशन के माध्यम से, मैंने देखा कि मेरी खुद की प्रकृति विश्वासघाती और धूर्त थी और मैं बिल्कुल उसी तरह की इंसान थी जिसे परमेश्वर “लोमड़ी” के रूप में उजागर करता है। तभी मैंने अपनी कुरूप आत्मा को देखा, जिसमें कोई भी मानवीय विवेक नहीं था। मैंने शर्मिंदा और अपमानित महसूस किया और चाहा कि जमीन मुझे निगल ले। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं तुझमें विश्वास करती हूँ, लेकिन मैं तेरे वचनों का अभ्यास करने में नाकाम हूँ। मेरे क्रियाकलापों ने तेरे नाम को कलंकित किया है। हे परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने और एक सच्चे मनुष्य जैसा जीने के लिए तैयार हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और मैं समझ गई कि मुझे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के साथ कैसे पेश आना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “किसी अगुआ या कार्यकर्ता के साथ पेश आने के तरीके के संबंध में लोगों का क्या रवैया होना चाहिए? कोई अगुआ या कार्यकर्ता जो करता है, अगर वह सही और सत्य के अनुरूप हो, तो तुम उसका आज्ञा पालन कर सकते हो; अगर वह जो करता है वह गलत है और सत्य के अनुरूप नहीं है, तो तुम्हें उसका आज्ञा पालन नहीं करना चाहिए और तुम उसे उजागर कर सकते हो, उसका विरोध कर एक अलग राय रख सकते हो। अगर वह वास्तविक कार्य करने में असमर्थ हो या कलीसिया के कार्य में बाधा डालने वाले बुरे कार्य करता हो, और खुलासा हो जाता है कि वह एक नकली अगुआ, नकली कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी है, तो तुम उसे पहचानकर उजागर कर सकते हो और उसकी रिपोर्ट कर सकते हो। लेकिन, परमेश्वर के कुछ चुने हुए लोग सत्य नहीं समझते और विशेष रूप से कायर होते हैं। वे नकली अगुआओं और मसीह-विरोधियों द्वारा दबाए और सताए जाने से डरते हैं, इसलिए वे सिद्धांत पर बने रहने की हिम्मत नहीं करते। वे कहते हैं, ‘अगर अगुआ मुझे निष्कासित कर दे, तो मैं खत्म हो जाऊँगा; अगर वह सभी लोगों से मुझे उजागर करवा दे या मेरा त्याग करवा दे, तो फिर मैं परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाऊँगा। अगर मुझे कलीसिया से निष्कासित कर दिया गया, तो फिर परमेश्वर मुझे नहीं चाहेगा और मुझे नहीं बचाएगा। और क्या मेरी आस्था व्यर्थ नहीं चली जाएगी?’ क्या ऐसी सोच हास्यास्पद नहीं है? क्या ऐसे लोगों की परमेश्वर में सच्ची आस्था होती है? कोई नकली अगुआ या मसीह-विरोधी जब तुम्हें निष्कासित कर देता है, तो क्या वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है? जब कोई नकली अगुआ या मसीह-विरोधी तुम्हें पीड़ा देकर निष्कासित कर देता है, तो यह शैतान का काम होता है और इसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं होता; जब लोगों को कलीसिया से निकाला या निष्कासित किया जाता है, तो यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सिर्फ तभी होता है, जब यह कलीसिया और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच एक संयुक्त निर्णय होता है, और जब निकालना या निष्कासन पूरी तरह से परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाओं और परमेश्वर के वचनों के सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होता है। किसी नकली अगुआ या मसीह-विरोधी द्वारा निष्कासित किए जाने का यह अर्थ कैसे हो सकता है कि तुम्हें बचाया नहीं जा सकता? यह शैतान और मसीह-विरोधी द्वारा किया जाने वाला उत्पीड़न है, और इसका यह मतलब नहीं कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें बचाया नहीं जाएगा। तुम्हें बचाया जा सकता है या नहीं, यह परमेश्वर पर निर्भर करता है। कोई इंसान यह निर्णय लेने के योग्य नहीं कि तुम्हें परमेश्वर द्वारा बचाया जा सकता है या नहीं। तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। और नकली अगुआ और मसीह-विरोधी द्वारा तुम्हारे निष्कासन को परमेश्वर द्वारा किया गया निष्कासन मानना—क्या यह परमेश्वर की गलत व्याख्या करना नहीं है? बेशक है। और यह परमेश्वर की गलत व्याख्या करना ही नहीं है, बल्कि परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करना भी है। यह एक तरह से परमेश्वर की निंदा भी है। ... यह साबित करता है कि तुम्हें इस बात पर विश्वास नहीं है कि परमेश्वर के घर में सत्य सर्वोच्च है, यह दर्शाता है कि तुम्हें परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं है, कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करता है। अगर तुम परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर भरोसा करते हो, तो तुम नकली अगुआ या मसीह-विरोधी के प्रतिशोध से क्यों डरते हो? क्या वे तुम्हारे भाग्य का निर्धारण कर सकते हैं? अगर तुम भली-भाँति भेद पहचानने और यह पता लगाने में सक्षम हो कि उनके कार्य सत्य के विपरीत हैं, तो परमेश्वर के उन चुने हुए लोगों के साथ संगति क्यों नहीं करते जो सत्य समझते हैं? तुम्हारे पास मुँह है, तो तुम बोलने की हिम्मत क्यों नहीं करते? तुम नकली अगुआ या मसीह-विरोधी से इतना क्यों डरते हो? यह साबित करता है कि तुम कायर, बेकार, शैतान के अनुचर हो(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद तीन : सत्य का अनुसरण करने वालों को वे अलग कर देते हैं और उन पर आक्रमण करते हैं)। परमेश्वर के वचन इसे इतने स्पष्ट रूप से कहते हैं! परमेश्वर के घर में, सत्य का शासन है; अंतिम फैसला किसी भी स्तर के अगुआ के हाथ में नहीं है। अगर किसी अगुआ के क्रियाकलाप सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं, तो हमें स्वीकार और समर्पण करना चाहिए। लेकिन अगर कोई अगुआ सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करता और इसके बजाय सत्य का उल्लंघन करता है, तो हमें सत्य सिद्धांतों को कायम रखना चाहिए, उसे उजागर करना और रोकना चाहिए और अपनी जिम्मेदारी उचित रूप से निभानी चाहिए। मैं परमेश्वर के घर की एक सदस्य हूँ और इसके हितों की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी और कर्तव्य है। जब मैं किसी अगुआ को सिद्धांतों के खिलाफ कार्य करते देखूँ तो मुझे मूकदर्शक नहीं बनना चाहिए। मुझे सत्य और न्याय को कायम रखना चाहिए, सत्य का अभ्यास करने की हिम्मत रखनी चाहिए और अपनी जिम्मेदारी उचित ढंग से निभानी चाहिए। वरना, मैं बस एक कायर और निकम्मी हूँ। इतने सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी, मुझे विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है। मुझे परमेश्वर में कोई सच्ची आस्था नहीं थी। जब मैंने भाई-बहनों को एक क्षणिक अपराध या भ्रष्टता के प्रकाशन की वजह से बाहर निकाले जाते देखा, तो मैंने गलती से यह मान लिया कि अगुआ किसी व्यक्ति के भविष्य, भाग्य, परिणाम और मंजिल को तय कर सकते हैं। मैं बहुत डरी हुई थी कि अगर मैं थोड़ी-सी भी लापरवाह हुई, तो ली जिंग मेरी भ्रष्टता के किसी प्रकाशन को पकड़ लेगी और मुझे बाहर निकाल देगी, उद्धार की मेरी उम्मीद को नष्ट कर देगी। मैं मुँह से तो परमेश्वर को मानने की बात करती थी, लेकिन मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। मैं अनुचित रूप से एक अगुआ को मेरा भाग्य तय करने वाला संप्रभु मानकर उसके साथ पेश आती थी और मैं ताकत और रुतबे को किसी भी अन्य चीज से बढ़कर देखती थी। मैं खुद को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसकी सर्वशक्तिमत्ता और संप्रभुता में विश्वास करने के लिए तैयार नहीं कर पाई। मैं इतनी मूर्ख और अंधी थी, ऐसी भ्रमित इंसान थी! दरअसल, कोई भी कुकर्मी परमेश्वर के घर में टिक नहीं सकता; देर-सबेर वह बेनकाब कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। परमेश्वर के घर में सत्य का शासन है। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी अच्छे इंसान के साथ अन्याय नहीं करेगा, न ही किसी बुरे को छोड़ेगा। परमेश्वर के घर में जो भी काफी अधिक बुराई करता है और सत्य को स्वीकार करने से इनकार कर देता है, चाहे वह अगुआ हो या साधारण विश्वासी, आखिरकार बेनकाब कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। लेकिन जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, भले ही उन्हें झूठे अगुआओं और मसीह-विरोधियों द्वारा अस्थायी रूप से गलत तरीके से बाहर निकाल दिया जाए, इसका मतलब यह नहीं है कि उनके उद्धार की उम्मीद खत्म हो गई है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो लोग परमेश्वर में सच्चा विश्वास रखते हैं और सत्य का अनुसरण करते हैं, वे कभी भी परमेश्वर को नहीं नकारेंगे या उससे दूर नहीं जाएँगे, चाहे उनके हालात कैसे भी हों। भले ही उन्हें बाहर निकाल दिया जाए, वे परमेश्वर में विश्वास करना जारी रखेंगे, अपने कर्तव्य निभाएंगे और अपने सबक सीखने के लिए सत्य खोजेंगे। अंत में, उन्हें अभी भी कलीसिया में फिर से स्वीकार कर लिया जाएगा। भले ही उन पर आपदाएँ आ पड़ें, उन्हें परमेश्वर की सुरक्षा मिलेगी। मैंने देखा कि हर इंसान का परिणाम और मंजिल परमेश्वर के हाथों में है और यह बिल्कुल भी किसी अगुआ के फैसले पर निर्भर नहीं करता। इस अनुभव ने मुझे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की सच्ची समझ और सराहना दी। इससे भी बढ़कर, मैंने देखा कि मैं कितनी दीन और दयनीय थी, मुझमें जरा भी सत्य वास्तविकता नहीं थी। एक छोटी-सी घटना ने मेरी घिनौनी मानवता को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया था, मुझे दिखाया कि मेरा चरित्र कितना गिरा हुआ था, कि मैं अपने हितों की खातिर ऐसी घिनौनी चीज कर सकती थी। मैंने सत्य का अनुसरण न करने और किसी भी मानव की समानता के बिना शैतानी जहरों के सहारे जीने के लिए खुद से नफरत की। मैंने पश्चात्ताप में परमेश्वर से सच्चे दिल से प्रार्थना की, अब से सत्य खोजने और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार आचरण और कार्य करने का संकल्प लिया।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा और इस चीज की कुछ समझ हासिल की कि परमेश्वर लोगों के परिणाम कैसे निर्धारित करता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अंत के दिनों के अपने कार्य में परमेश्वर लोगों की अभिव्यक्तियों के आधार पर उनके परिणाम निर्धारित करता है। क्या तुम लोग जानते हो कि यहाँ ‘अभिव्यक्तियाँ’ क्या दर्शाती हैं? तुम्हें लगता होगा कि ये उन भ्रष्ट स्वभावों को दर्शाती हैं जिन्हें लोग चीजें करते हुए प्रकट करते हैं, लेकिन असल में इसका यह मतलब नहीं है। यहाँ अभिव्यक्तियाँ दर्शाती हैं कि तुम सत्य का अभ्यास करते हो कि नहीं; अपना कर्तव्य निभाते समय तुम समर्पित हो या नहीं; परमेश्वर पर विश्वास करने के पीछे तुम्हारा दृष्टिकोण, परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया, कष्ट सहने का तुम्हारा संकल्प कैसा है; न्याय, ताड़ना और काट-छाँट स्वीकारने को लेकर तुम्हारा रवैया क्या है; तुम्हारे किए गंभीर अपराधों की संख्या क्या है; और तुम आखिर किस हद तक पश्चात्ताप कर पाते हो और खुद में बदलाव ला पाते हो। ये सभी चीजें मिलकर तुम्हारी अभिव्यक्तियाँ बनती हैं। यहाँ अभिव्यक्तियाँ यह नहीं दर्शातीं कि तुमने कितने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए या कितनी खराब चीजें की हैं, बल्कि इसका मतलब यह है कि तुम्हें अपनी आस्था में कितने नतीजे मिल चुके हैं और तुम खुद में कितना सच्चा बदलाव लाए हो। यदि लोगों के परिणाम इस से निर्धारित किए जाते कि उनकी प्रकृति में कितनी ज्यादा भ्रष्टता प्रकट होती है तो कोई भी उद्धार प्राप्त नहीं कर पाता क्योंकि सारे मनुष्य गहराई तक भ्रष्ट हैं, सबमें शैतानी प्रकृति है और वे सब परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। परमेश्वर उन लोगों को बचाना चाहता है जो सत्य को स्वीकार और उसके कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं। वे चाहे जितनी भ्रष्टता प्रकट करें, अगर वे अंततः सत्य को स्वीकार कर सकते हैं, सच्चा पश्चात्ताप कर सकते हैं और खुद में सच्चा बदलाव ला सकते हैं तो वे ऐसे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया जाता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम और गंतव्य यह देखकर निर्धारित नहीं करता कि वह कितनी भ्रष्टता प्रकट करता है, बल्कि यह देखकर करता है कि इसे प्रकट करने के बाद क्या उसे सच्चा पश्चात्ताप है और उसमें बदलाव होता है। चाहे कोई व्यक्ति कितनी भी भ्रष्टता प्रकट करे, अगर वह सत्य को स्वीकार कर सकता है और वाकई पश्चात्ताप कर सकता है तो उसे बचाया जाएगा। परमेश्वर इंसान को हरसंभव सीमा तक बचाता है। परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हम में से हर कोई बहुत अधिक भ्रष्टता प्रकट करेगा। अगर परमेश्वर हमारे परिणामों को हमारे द्वारा प्रकट की गई भ्रष्टता की मात्रा के आधार पर निर्धारित करता, तो हम में से कोई भी नहीं बचाया जा सकता था। जब मैंने चीजों का सामना किया तो सत्य सिद्धांत नहीं खोजे। मूल्यांकन लिखते समय, मैं जानती थी कि वांग यू का व्यवहार भ्रष्टता का प्रकाशन था और उसे जाँच का निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए था। लेकिन मुझे अगुआ के नाराज होने का डर था और मैंने अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने की हिम्मत नहीं की। अपने अच्छे परिणाम और गंतव्य की खातिर मैंने परवाह नहीं की कि दूसरे जिएँ कि मरें, परमेश्वर के सामने एक अपराध और कलंक छोड़ दिया। इन चीजों के बारे में सोचकर, मैंने अपने दिल में संकल्प लिया कि अब मैं अपनी कपटी प्रकृति के अनुसार नहीं जिऊँगी।

उस दौरान, मैंने विचार किया कि मैं अपने धूर्त और कपटी भ्रष्ट स्वभाव को कैसे उतार फेंक सकती हूँ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे विनती की कि वह अभ्यास का मार्ग खोजने में मेरा मार्गदर्शन करे। एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा : “परमेश्वर में विश्वास करने और जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए तुम्हें, कम से कम, गरिमा और मानव के समान जीना चाहिए, तुम्हें लोगों के भरोसे के योग्य होना चाहिए और मूल्यवान माना जाना चाहिए, लोगों को लगना चाहिए कि तुम्हारे चरित्र और सत्यनिष्ठा में दम है, कि तुम जो कुछ भी कहते हो उसे पूरा करते हो और अपने वचन पर कायम रहते हो। ... समस्त गरिमामय लोगों में कुछ न कुछ व्यक्तित्व होता है, वे कभी-कभी दूसरों के साथ निभा नहीं पाते, लेकिन वे ईमानदार होते हैं और उनमें कोई झूठ या चालाकी नहीं होती। दूसरे लोग अंततः उनका बहुत आदर करते हैं, क्योंकि वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं, वे ईमानदार होते हैं, उनमें गरिमा, सत्यनिष्ठा और चरित्र होता है, वे कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाते, जब लोग मुसीबत में होते हैं तो वे उनकी मदद करते हैं, वे लोगों से जमीर और सूझ-बूझ के साथ व्यवहार करते हैं, और उनके बारे में कभी मनमानी राय नहीं बनाते। दूसरे लोगों का मूल्यांकन या उनकी चर्चा करते समय ये व्यक्ति जो कुछ भी कहते हैं वह सटीक होता है, वे वही कहते हैं जो वे जानते हैं और जो वे नहीं जानते उसके बारे में अपना मुँह नहीं खोलते, वे नमक-मिर्च नहीं लगाते, और उनके शब्द साक्ष्य या संदर्भ का काम दे सकते हैं। लोग जब बोलते और कार्य करते हैं तो जिनके पास चरित्र होता है वे अपेक्षाकृत व्यावहारिक और भरोसेमंद होते हैं। जिन लोगों के पास कोई चरित्र नहीं होता है उन्हें कोई भी मूल्यवान नहीं मानता, उनकी कथनी और करनी पर कोई भी ध्यान नहीं देता या उनके शब्दों और कार्यों को महत्वपूर्ण नहीं मानता, और कोई उन पर भरोसा नहीं करता। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे बहुत ज्यादा झूठ बोलते हैं और ईमानदार शब्द बहुत कम बोलते हैं, ऐसा इसलिए है क्योंकि जब वे लोगों के साथ मिलते-जुलते हैं या उनके लिए कुछ करते हैं तो उनमें सच्चा दिल नहीं होता है, वे सभी को धोखा देने और मूर्ख बनाने की कोशिश करते हैं और कोई उन्हें पसंद नहीं करता। क्या तुम लोगों को कोई ऐसा व्यक्ति मिला है, जो तुम लोगों की नजर में भरोसेमंद हो? क्या तुम लोग खुद को दूसरे लोगों के भरोसे के काबिल समझते हो? क्या दूसरे लोग तुम पर भरोसा कर सकते हैं? अगर कोई तुमसे किसी दूसरे व्यक्ति की स्थिति के बारे में पूछता है तो तुम्हें अपनी इच्छा के अनुसार न तो उस व्यक्ति का मूल्यांकन करना चाहिए, न ही उसके बारे में राय बनानी चाहिए, तुम्हारे शब्द वस्तुपरक, सटीक और तथ्यों के अनुरूप होने चाहिए। तुम्हें उसी के बारे में बात करनी चाहिए जो तुम समझते हो, और उन चीजों के बारे में बात नहीं करनी चाहिए जिनकी असलियत तुम नहीं देख पाते हो। तुम्हें उस व्यक्ति के प्रति न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होना चाहिए। यही कार्य करने का जिम्मेदारी भरा तरीका है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई सच्चे मानव के समान जी सकता है)। उसके वचनों पर विचार करते हुए, मैं समझ गई कि जिस सामान्य मानवता को जीने की परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है, वह ऐसी है जिसमें हमारे पास सत्यनिष्ठा, गरिमा हो, हम तथ्यों के आधार पर बोलें, न बढ़ा-चढ़ाकर बोलें और न घटाकर, और अपने क्रियाकलापों में जिम्मेदार हों। ऐसे लोग ईमानदार और दयालु होते हैं, वे कभी दांव-पेच नहीं खेलते या चालबाजी नहीं करते, लोगों और मामलों के प्रति उनका रवैया सच्चा होता है और उन पर भरोसा किया जा सकता है। परमेश्वर के वचनों से, मुझे आचरण करने के तरीके के लिए एक दिशा मिली। मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार ईमानदारी से बोलना और काम करना चाहिए, ताकि दूसरों के लिए भरोसेमंद बन सकूँ और परमेश्वर के मन को निश्चिंत कर सकूँ। जब मुझे अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने की जरूरत हो, मुझे सत्य बोलना चाहिए और अपनी असली राय और अपने असली विचार लोगों को जानने देने चाहिए।

उसके बाद, मैं अपने कर्तव्य में एक ईमानदार इंसान बनने के पहलू के सत्य में प्रवेश करने पर ध्यान देने लगी। एक बार, पर्यवेक्षक ने मुझसे मेरी टीम के दो सदस्यों की स्थिति के बारे में पूछा और कहा कि अगर वे उपयुक्त नहीं हैं, तो उन्हें समय रहते दूसरे कर्तव्य में लगाने की जरूरत है। मैंने मन ही मन सोचा, “पर्यवेक्षक को भी अंदाजा है कि ये दोनों हाल ही में अपने कर्तव्यों में कैसा कर रहे हैं। अगर मेरा दृष्टिकोण उसके दृष्टिकोण से अलग हुआ, तो क्या वह यह नहीं कहेगी कि मुझमें विवेकशीलता का अभाव है और मैं यह नहीं जानती कि लोगों या मामलों को कैसे देखा जाए? क्या वह यह कह सकती है कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं टीम अगुआ बनने के लायक नहीं हूँ? छोड़ो। बेहतर होगा कि मैं कुछ न कहूँ। या शायद मैं बस कह दूँगी कि मैं अभी तक पता नहीं लगा पाई हूँ।” उसी पल, मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से कपटी बनने की कोशिश कर रही थी। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी बात में परमेश्वर के प्रति झूठा न होना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर वाले लोगों को कभी भी धोखा देने की कोशिश न करना और अपने से नीचे वालों से चीजें न छिपाना और ऐसी चीजें न करना जो मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने की कोशिशें हों। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने क्रियाकलापों और शब्दों में शुद्ध होना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ)। पढ़ने के बाद, मैंने चुपचाप प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं अब और कपटी नहीं बनना चाहती। मुझे एक ईमानदार इंसान बनना है, जो मैंने देखा है उसे सत्यतापूर्वक लिखना है और अपना दृष्टिकोण व्यक्त करना है।” इसे लिखने के बाद मैंने यह पर्यवेक्षक को भेज दिया और मेरा दिल पूरी तरह शांत था। उसके बाद से जब भी मुझे कोई मूल्यांकन लिखना होता था, मैं सच बोलती थी, अपने देखे हुए मसलों को और अपनी राय को विश्वसनीय ढंग से लिखती थी। मुझमें जो यह थोड़ा सा बदलाव और लाभ आया है, यह परमेश्वर के वचनों से हासिल हुआ नतीजा है। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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