मैं आखिरकार हीनता की परछाईं से निकली

30 दिसम्बर, 2025

शिमाई, चीन

बचपन से ही, मेरी प्रतिक्रिया और समझने की क्षमता काफी धीमी रही है। जब मैं स्कूल में थी और शिक्षक कुछ जटिल सवाल पूछते थे, तो मैं जल्दी से प्रतिक्रिया नहीं दे पाती थी और अक्सर गलत जवाब देती थी। इसलिए, मेरे सहपाठी अक्सर मुझ पर हँसते थे और मेरे शिक्षक मुझे मूर्ख कहते थे। उस समय से, मुझे लगने लगा कि मैं अपने साथियों में सबसे कम बुद्धिमान हूँ। शिक्षकों ने यह भी कहा कि मुझ जैसे छात्र जो पढ़ाई में कमजोर थे, वे बड़े होकर केवल दूसरों के लिए काम कर सकते हैं या किसान बन सकते हैं, जबकि जो पढ़ाई में अच्छे थे, वे अगुआ या प्रबंधक बन सकते थे। इन बातों ने मुझे बहुत ठेस पहुँचाई। मैं धीरे-धीरे अंतर्मुखी होती गई, बोलने की अनिच्छुक हो गई और दूसरों से बातचीत करने से डरने लगी।

2006 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया। जब मैंने सभाओं में जाना शुरू किया, तो मुझे हँसी का पात्र बनने का डर था, इसलिए मैंने संगति करने की हिम्मत नहीं की। ज्यादातर समय, मैं अपनी बात साझा करने वाली आखिरी व्यक्ति होती थी। हालाँकि, मैंने पाया कि मेरे भाई-बहनों ने मुझे नीची नजर से नहीं देखा, बल्कि मुझे और संगति करने के लिए प्रोत्साहित किया, इसलिए मैंने दिल से बेबस महसूस करना बंद कर दिया। बाद में, मुझे अपने कर्तव्य करने को मिले। लेकिन, मैं अपनी धीमी प्रतिक्रियाओं और खराब काबिलियत के कारण लगातार हीन महसूस करती थी और अपना कर्तव्य करते समय मेरी दशा अक्सर प्रभावित होती थी। शुरुआत में, मैं छवि-आधारित कर्तव्य कर रही थी। हर बार जब मैं अपनी सहयोगी बहनों के साथ छवियों पर चर्चा करती थी, तो वे बहुत जल्दी छवियों में समस्याएँ देख लेती थीं और बदलाव के लिए सुझाव दे सकती थीं। लेकिन, मेरी प्रतिक्रियाएँ धीमी थीं और मुझे समस्याएँ खोजने से पहले उन्हें कई बार देखना पड़ता था। कभी-कभी, जब हम छवियाँ बनाने पर विचार-विमर्श कर रहे होते थे, तो मैं अपने विचार और सोच के बारे में बात करना चाहती थी, लेकिन मुझे लगा कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं मुख्य समस्याएँ नहीं देख सकती, इसलिए मेरे कुछ भी कहने का कोई खास फायदा नहीं होगा और अगर मैंने कुछ गलत कह दिया तो मेरा सम्मान भी चला जाएगा। इसलिए, मैं शायद ही कभी अपनी राय व्यक्त करती थी।

एक बार, मेरी एक सहयोगी बहन ने मुझसे यह मूल्यांकन करने के लिए कहा कि क्या एक छवि को फिर से बनाने की जरूरत है। उसे देखने के बाद, मुझे लगा कि छवि का दृश्य प्रभाव बहुत अच्छा है और इसे फिर से करने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन, फिर मैंने सोचा कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं जरूरी नहीं कि समस्याओं को सटीक रूप से देख पाऊँ, इसलिए मैंने टीम अगुआ से एक नजर डालने को कहा। अंत में, टीम अगुआ की राय मुझसे अलग थी और उसने सोचा कि छवि की अवधारणा में कुछ गड़बड़ है और इसे फिर से बनाने की जरूरत है। मैं अपनी राय व्यक्त करना चाहती थी, लेकिन मैंने सोचा, “टीम अगुआ की काबिलियत अच्छी है, उसने कई सिद्धांतों में महारत हासिल कर ली है और उसके पेशेवर कौशल मुझसे बेहतर हैं। मैं बचपन से ही मूर्ख रही हूँ और चीजों को समझने की मेरी क्षमता अच्छी नहीं है। शायद मैंने ही छवि का गलत आकलन किया है। मैं जिद नहीं करूँगी। मेरी काबिलियत वैसे भी खराब है। अगर मैं इसके ऊपर से दूसरों के सुझाव स्वीकार नहीं करती, तो यह और भी शर्मनाक होगा। जाने दो, चलो टीम अगुआ के सुझाव के अनुसार छवि को फिर से बनाते हैं।” मुझे उम्मीद नहीं थी कि अगले दिन, पर्यवेक्षक यह कह देगी कि छवि की अवधारणा उपयुक्त थी और इसे फिर से करने की कोई जरूरत नहीं है। उसने प्रासंगिक सिद्धांत भी खोजे और हमारे विचलनों की ओर इशारा किया। मैंने मन ही मन सोचा कि उस समय मैंने भी पर्यवेक्षक द्वारा खोजे गए सिद्धांतों के बारे में सोचा था। अगर मैंने जिद की होती, तो बेहतर होता। मेरी सहयोगी ने छवि को संपादित करने में लंबा समय बिताया, लेकिन अंत में यह सब व्यर्थ प्रयास था और इससे दूसरे काम में भी देरी हुई। मुझे थोड़ी असहजता और आत्म-ग्लानि महसूस हुई, लेकिन मैंने बाद में आत्म-चिंतन नहीं किया। एक और बार, जब मैं एक छवि की समीक्षा कर रही थी, मैंने उसे कई बार देखा और मुझे लगा कि उसका दृश्य प्रभाव उपयुक्त है और इसमें केवल थोड़े से संशोधन की जरूरत थी। लेकिन, कई बहनों ने इस छवि को देखा और कहा कि इसका विषय अस्पष्ट है और इसका कोई मूल्य नहीं है। मेरे दिल में, मैं उनके दृष्टिकोण से सहमत नहीं थी और अपनी राय बताना चाहती थी। हालाँकि, फिर मैंने सोचा, “उनकी काबिलियत बेहतर है, सिद्धांतों पर उनकी पकड़ मुझसे बेहतर है और वे समस्याओं को मुझसे ज्यादा गहराई से देखती हैं। मैं बचपन से ही मूर्ख रही हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, इसलिए मैंने ही इसे गलत देखा होगा।” मुझे थोड़ा नकारात्मक भी महसूस हुआ, “दूसरे सभी लोग समस्याओं और कमियों को देख सकते हैं, लेकिन मैंने इसे कई बार देखा और मुझे समस्याएँ नहीं दिखीं। मेरी काबिलियत बहुत ही खराब है। ऐसा लगता है कि मैं सच में यह कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त नहीं हूँ।” लेकिन, अप्रत्याशित रूप से, पर्यवेक्षक ने इस छवि को देखा और कहा कि थोड़े से संशोधन के बाद इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। तब मुझे उस समय जिद न करने का पछतावा हुआ। बाद में, पर्यवेक्षक ने मुझसे पूछा, “तुम अपने दृष्टिकोण पर क्यों नहीं टिकी रहीं? एक मूल्यवान छवि खारिज ही होने वाली थी! अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा दृष्टिकोण सही है, तो कृपया अपनी राय साझा करो और सबके साथ इस पर चर्चा करो। अगर तुम कुछ गलत कह भी देती हो, तो बाद में उसे सही करना ठीक है।” जब मैंने पर्यवेक्षक की बात सुनी, तो मुझे बहुत असहज महसूस हुआ। लेकिन, मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव से बहुत कसकर बंधी हुई थी और बाद में जब स्थितियों से सामना हुआ, तब भी मैंने अपने दृष्टिकोण पर टिके रहने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि मैं अपनी खराब काबिलियत के कारण लगातार नकारात्मक दशा में जी रही थी और अपना कर्तव्य करते समय कभी भी अपनी राय व्यक्त करने को तैयार नहीं थी, मैंने लंबे समय तक कोई प्रगति नहीं की और अंततः मुझे बरखास्त कर दिया गया। लेकिन, मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया; इसके बजाय, इससे मुझे बस यह पक्का हो गया कि मेरी काबिलियत खराब है।

जुलाई 2022 में, कलीसिया ने मेरे लिए सामान्य मामलों का कर्तव्य करने की व्यवस्था की। मैंने देखा कि जिस बहन के साथ मैं सहयोग करती थी, वह भले ही ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, उसकी प्रतिक्रियाएँ तेज थीं और वह चीजों को जल्दी सीख लेती थी। वह अपना कर्तव्य करने में मुझसे ज्यादा कुशल भी थी। उसके साथ सहयोग करते समय भी मैंने सक्रिय रूप से अपनी राय व्यक्त करने की हिम्मत नहीं की। कभी-कभी, मैं बेमन से कुछ शब्द कह देती थी, लेकिन अगर मेरी बहन कोई अलग दृष्टिकोण रखती, तो मैं बिना सोचे-समझे अपना दृष्टिकोण छोड़ देती थी। मैं अपनी बहन के सामने लगातार डरपोक और संकोची बनी रहती थी, इस डर से कि वह कहेगी कि मुझे कुछ भी समझ नहीं आता, फिर भी मैं बकवास करती हूँ और चीजों को गड़बड़ कर देती हूँ, इसलिए मैं अपने कर्तव्य में बहुत निष्क्रिय थी।

मैं अक्सर सोचती थी, “मैं इतना दयनीय और थकाऊ जीवन क्यों जीती हूँ?” नवंबर 2022 में जाकर, जब मैंने हीनता की भावनाओं को हल करने पर परमेश्वर की संगति पढ़ी, तब मुझे अपनी दशा समझ में आने लगी। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “सतह पर तो हीनभावना एक भावना है जो लोगों में अभिव्यक्त होती है; लेकिन दरअसल इसका मूल कारण शैतान की भ्रष्टता, लोगों के जीवन का परिवेश, और लोगों के अपने वस्तुनिष्ठ कारण हैं। पूरी मानवजाति उस बुरे की शक्ति के अधीन है, शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट की जा चुकी है, और कोई भी अगली पीढ़ी को सत्य के अनुसार, परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं सिखाता; इसके बजाय वे शैतान से आई चीजों के अनुसार सिखाते हैं। इसलिए, लोगों के स्वभाव और सार को भ्रष्ट करने के अलावा अगली पीढ़ी और मानवजाति को शैतान की चीजों की शिक्षा देने का परिणाम यह है कि इससे लोगों में नकारात्मक भावनाएँ पैदा होती हैं। ... उदाहरण के रूप में हीनभावना के भाव को ही लेते हैं। तुम्हारे माता-पिता, शिक्षकों, तुम्हारे बड़े-बुजुर्गों और तुम्हारे आसपास के दूसरे लोगों के पास तुम्हारी काबिलियत, मानवता और सत्यनिष्ठा का एक अवास्तविक आकलन होता है, और अंततः यह तुम्हारे साथ जो करता है वह है तुम पर हमला, तुम्हारा उत्पीड़न, तुम्हारा दम घोटना, तुम्हें जंजीर में जकड़ना और तुम्हें बाँधना। आखिर जब तुममें और अधिक प्रतिरोध करने की शक्ति नहीं होती है तो तुम्हारे पास एक ऐसा जीवन चुनने के सिवा कोई और विकल्प नहीं बचता कि तुम खामोशी से अपमान और निरादर स्वीकारते रहो, अपनी समझ के विरुद्ध जाकर खामोशी से इस प्रकार की अनुचित और अन्यायपूर्ण वास्तविकता को स्वीकारते रहो। जब तुम इस वास्तविकता को स्वीकार करते हो तो आखिरकार तुममें जो भावनाएँ पैदा होती हैं, वे सुखद, संतुष्टिप्रद, सकारात्मक या प्रगतिशील नहीं होतीं; तुम मानव जीवन के सटीक और सही लक्ष्यों का अनुसरण करना तो दूर रहा, तुम और अधिक अभिप्रेरणा और दिशा सहित भी नहीं जीते, बल्कि तुम्हारे भीतर एक गहन हीनभावना का भाव पैदा हो जाता है। जब तुममें यह भावना पैदा होती है तो तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास अब कोई रास्ता नहीं रहा। जब तुम्हारा सामना किसी ऐसे मसले से होता है जिस पर तुमसे दृष्टिकोण व्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है तो तुम अपने अंतरतम में न जाने कितनी बार विचार करोगे कि तुम क्या कहना चाहते हो और कौन-सा दृष्टिकोण व्यक्त करना चाहते हो, फिर भी तुम इसे पुरजोर ढंग से कह डालने का साहस नहीं जुटा पाते हो। जब कोई ठीक वही दृष्टिकोण व्यक्त कर देता है जो तुम्हारा है तो तुम अपने भीतर इस बात की पुष्टि महसूस होने दोगे कि तुम दूसरे लोगों से बदतर नहीं हो। लेकिन जब वही स्थिति दोबारा आती है तो तुम अभी भी खुद से कहते हो, ‘मैं हल्केपन में नहीं बोल सकता, कुछ भी उतावलेपन में नहीं कर सकता या खुद को हँसी का पात्र नहीं बना सकता। मैं अच्छा नहीं हूँ, बेवकूफ हूँ, मूर्ख हूँ, जड़बुद्धि हूँ। मुझे सीखने की जरूरत है कि कैसे छुपकर रहूँ और बस सुनूँ, बोलूँ नहीं।’ इससे हम देख सकते हैं कि हीनभावना का भाव पैदा होने के बिंदु से लेकर उसके व्यक्ति के अंतरतम में गहराई से पैठने तक क्या व्यक्ति को अपनी स्वतंत्र इच्छा और परमेश्वर के दिए वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया गया है? (हाँ।) उसे इन चीजों से वंचित कर दिया गया है। उसे इन चीजों से वास्तव में किसने वंचित किया है? तुम निश्चित रूप से नहीं कह सकते, है न? तुममें से कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया में तुम पीड़ित ही नहीं उत्पीड़क भी हो—तुम दूसरे लोगों से पीड़ित हो और अपने से भी पीड़ित हो। ऐसा क्यों है? मैंने अभी-अभी कहा कि तुममें पैदा होने वाली हीनभावना का एक कारण तुम्हारे अपने वस्तुपरक कारणों से आता है। जब से तुम्हें स्वायत्तता का बोध होने लगा था, घटनाओं और चीजों के बारे में राय बनाने के तुम्हारे आधार का स्रोत शैतान की भ्रष्टता में था और तुममें ये दृष्टिकोण समाज और मानवजाति ने बिठाए हैं, ये तुम्हें परमेश्वर ने नहीं सिखाए हैं। इसलिए तुम्हारी हीनभावना का भाव चाहे जब और जिस संदर्भ में पैदा हुआ हो, तुम्हारी हीनभावना का भाव चाहे जिस हद तक विकसित हुआ हो, तुम असहाय ढंग से इस भाव से बंधे हुए और नियंत्रित हो, और तुम लोगों, घटनाओं और अपने आसपास की चीजों से पेश आने में इन तरीकों का इस्तेमाल करते हो जो तुममें शैतान ने बिठाए हैं। जब हीनभावना का भाव तुम्हारे दिल में गहराई बिठा दिया जाता है, तो इसका असर सिर्फ तुम्हारे ऊपर ही नहीं पड़ता, बल्कि यह लोगों और चीजों के प्रति तुम्हारे विचारों, और तुम्हारे स्व-आचरण और कार्यों पर भी हावी हो जाता है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (1))। परमेश्वर सच में लोगों की दशाओं को समझता है। मेरा व्यवहार बिल्कुल ऐसा ही था। बचपन से लेकर बड़े होने तक, मुझे लगता था कि मैं धीमी प्रतिक्रिया वाली, मूर्ख और खराब काबिलियत वाली हूँ, इसलिए मैं अपनी राय व्यक्त करने की हिम्मत नहीं करती थी, हमेशा पीछे हट जाती थी और हमेशा गलतियाँ करने से डरती थी। जब मैं स्कूल में थी, मेरी समझने की खराब क्षमता और धीमी प्रतिक्रियाओं के कारण और क्योंकि मैं अपने होशियार सहपाठियों की तरह चीजों को तुरंत नहीं समझ पाती थी, शिक्षकों ने मेरा मूल्यांकन कर मुझे मूर्ख और नासमझ कहा। शिक्षकों के ताने और मेरे सहपाठियों के उपहास ने मुझे बहुत हीन महसूस कराया। जब मैंने परमेश्वर में विश्वास करना और अपना कर्तव्य निभाना शुरू किया, जब भी मैं हाज़िर-जवाब भाई-बहनों के संपर्क में आती थी, तो मैं सोचती थी कि इस तरह के व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है और परमेश्वर निश्चित रूप से उन्हें पसंद करेगा। इसके विपरीत, मेरा मानना था कि मेरी काबिलियत खराब है क्योंकि मैं मंदबुद्धि थी। मैं लगातार नकारात्मक दशा में जीती थी और अपना कर्तव्य करने में बहुत निष्क्रिय थी। ज्यादातर समय मैं अपना दृष्टिकोण व्यक्त करने की हिम्मत नहीं करती थी और जब कभी-कभी मैं ऐसा करती भी थी और कोई आपत्ति उठाता था, तो भले ही मैं उनसे पूरी तरह सहमत नहीं होती थी, अपनी हीनता की भावनाओं के कारण मैं उनके साथ अपने विचारों पर चर्चा करने की हिम्मत नहीं करती थी। मुझे लगता था कि दूसरी बहनें होशियार थीं और उनकी काबिलियत अच्छी थी, इसलिए वे निश्चित रूप से चीजों को मुझसे ज्यादा सटीक रूप से देखती होंगी और मैं अपने सभी विचारों को खारिज कर देती थी। यह नकारात्मक भावना एक अदृश्य रस्सी की तरह थी, जो मुझे कसकर बाँध रही थी और इसकी वजह से मेरी राय व्यक्त करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मैं स्वेच्छा से अपनी हीनता की भावनाओं से नियंत्रित हो रही थी और एक विशेष रूप से दयनीय जीवन जी रही थी और मैं वे काम नहीं कर पाती थी जिन्हें करने में मैं सक्षम थी। आखिरकार मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में असफल रही और मुझे बरखास्त कर दिया गया। इस नकारात्मक भावना ने मुझे बहुत बड़ा नुकसान पहुँचाया था!

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “हीनता हो या कोई और नकारात्मक भावना, तुम्हें उन व्याख्याओं के प्रति सही समझ रखनी चाहिए जिनके कारण यह भावना पैदा होती है। अव्वल तो तुम्हें समझ लेना चाहिए कि ये व्याख्याएँ गलत हैं, और चाहे ये तुम्हारी काबिलियत, प्रतिभा या तुम्हारे चरित्र के बारे में हों, तुम्हारे बारे में किए गए उनके आकलन और निष्कर्ष हमेशा गलत होते हैं। तो फिर तुम स्वयं का सही आकलन कर स्वयं को कैसे जान सकते हो, और हीनभावना के भाव से कैसे दूर हो सकते हो? तुम्हें स्वयं के बारे में ज्ञान प्राप्त करने, अपनी मानवता, योग्यता, प्रतिभा और खूबियों के बारे में जानने के लिए परमेश्वर के वचनों को आधार बनाना चाहिए। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम्हें गाना पसंद था और तुम अच्छा गाते थे, मगर कुछ लोग यह कहकर तुम्हारी आलोचना करते और तुम्हें नीचा दिखाते थे कि तुम तान-बधिर हो, और तुम्हारा गायन सुर में नहीं है, इसलिए अब तुम्हें लगने लगा है कि तुम अच्छा नहीं गा सकते और फिर तुम दूसरों के सामने गाने की हिम्मत नहीं करते। उन सांसारिक लोगों, उन भ्रमित लोगों और औसत दर्जे के लोगों ने तुम्हारे बारे में गलत आकलन कर तुम्हारी आलोचना की, इसलिए तुम्हारी मानवता को जो अधिकार मिलने चाहिए थे, उनका हनन किया गया और तुम्हारी प्रतिभा दबा दी गई। नतीजा यह हुआ कि तुम गाना गाने की हिम्मत नहीं करते, और सिर्फ तब ही खुलकर गाने और मन बहलाने की हिम्मत करते हो जब तुम अकेले होते हो। चूँकि तुम साधारण तौर पर बहुत अधिक दबा हुआ महसूस करते हो, इसलिए अकेले न होने पर गाना गाने की हिम्मत नहीं कर पाते; तुम अकेले होने पर ही गाने की हिम्मत कर पाते हो, उस समय का आनंद लेते हो जब तुम खुलकर साफ-साफ गा सकते हो, यह समय कितना अद्भुत और मुक्ति देनेवाला होता है! क्या ऐसा नहीं है? लोगों ने तुम्हें जो हानि पहुँचाई है, उस कारण से तुम नहीं जानते या साफ तौर पर नहीं देख सकते कि तुम वास्तव में क्या कर सकते हो, तुम किस काम में अच्छे हो, और किसमें अच्छे नहीं हो। ऐसी स्थिति में, तुम्हें सही आकलन करना चाहिए, और परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को सही मापना चाहिए। तुमने जो सीखा है और जिसमें तुम्हारी खूबियाँ हैं, उसे तय करना चाहिए, और जाकर वह काम करना चाहिए जो तुम कर सकते हो; वे काम जो तुम नहीं कर सकते, तुम्हारी जो कमियाँ और खामियाँ हैं, उनके बारे में आत्म-चिंतन कर उन्हें जानना चाहिए, और सही आकलन कर जानना चाहिए कि तुम्हारी योग्यता क्या है, यह अच्छी है या नहीं। अगर तुम अपनी समस्याओं को नहीं समझ सकते या उनका स्पष्ट ज्ञान नहीं पा सकते हो तो फिर अपने आसपास के उन लोगों से पूछो जिनमें तुम्हारा आकलन करने की समझ है। उनकी बातें सही हों या न हों, उनसे कम-से-कम तुम्हें एक संदर्भ मिल जाएगा जो तुम्हें इस योग्य बनाएगा कि स्वयं की बुनियादी परख या निरूपण कर सको। फिर तुम हीनभावना के नकारात्मक भाव की बुनियादी समस्या को सुलझा सकते हो और धीरे-धीरे इससे उबर सकते हो। हीनभावनाओं का भाव सुलझाना आसान है अगर कोई इसका भेद पहचान ले, इसके प्रति जागरूक हो जाए और सत्य खोजे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (1))। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि स्कूल में मेरे शिक्षकों का मेरे बारे में मूल्यांकन गलत था और मेरा खुद का मूल्यांकन भी वस्तुनिष्ठ नहीं था। अपनी हीनता की भावनाओं को हल करने के लिए, मुझे अपना सटीक मूल्यांकन करना था, परमेश्वर के वचनों के अनुसार खुद को आँकना था और अपने आस-पास के भाई-बहनों के मूल्यांकन और राय को सुनना था। केवल इसी तरह से अभ्यास करना ही सही होता। इसलिए, मैंने अपनी सहयोगी बहन से मेरा मूल्यांकन करने को कहा। उसने कहा, “असल में, तुम उतनी बुरी नहीं हो जितना तुम कहती हो। तुम कुछ समस्याएँ समझ भी सकती हो और तुम्हारे कुछ दृष्टिकोण और सुझाव भी उपयोगी होते हैं। कभी-कभी जब मैं तुमसे पूछती हूँ कि तुम्हारा कोई खास दृष्टिकोण क्यों है, तो मेरा यह मतलब नहीं होता कि तुम गलत हो। बल्कि, मैं बस यह जानना चाहती हूँ कि तुम किन सिद्धांतों के अनुसार यह कह रही हो। लेकिन, तुम हर बार खुद को ही खारिज कर देती हो। भविष्य में, अगर तुम्हें लगे कि तुम्हारा दृष्टिकोण सिद्धांत के अनुरूप है, तो तुम्हें जरूर बोलना चाहिए और सबके साथ संगति और चर्चा करनी चाहिए। यह भी अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार होना है।” बाद में, मैंने अपना कर्तव्य करते समय अपनी राय व्यक्त करने का अभ्यास किया। मेरी सहयोगी मेरे दिए गए ज्यादातर सुझावों को स्वीकार कर लेती थी। मेरी बहन सामान्य मामलों का काम करने में मुझसे तेज थी, लेकिन उसने कहा कि वह हमारे भाई-बहनों के साथ संगति करने के लिए पत्र लिखने में अच्छी नहीं है और मुझसे यह काम ज्यादा करने को कहा। परमेश्वर से प्रार्थना करके और प्रासंगिक सत्यों को खोजकर और उन पर विचार करके, मैं भी अपने भाई-बहनों की कुछ समस्याएँ हल करने में मदद कर पाई। उस पल, मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से बेकार नहीं थी : मैं सत्य को समझ सकती हूँ; हालाँकि मेरी प्रतिक्रियाएँ दूसरों से धीमी हैं, धीरे-धीरे विचार करके मैं भी कुछ सिद्धांत भी समझ सकती हूँ और अभ्यास के कुछ मार्ग खोज सकती हूँ। बाद में जब मैंने कर्तव्य किए, तो मेरा दिल पहले की तरह दबा हुआ नहीं था।

मई 2023 में, अगुआओं ने मुझे कला टीम का पर्यवेक्षक बनने के लिए कहा। मैं बहुत घबरा गई थी—अपनी खराब काबिलियत को देखते हुए, क्या मैं सचमुच एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य पूरा कर सकती थी? मैं मना करना चाहती थी, लेकिन फिर मैंने सोचा कि यह कर्तव्य करने में परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ थीं, इसलिए मैंने इसे स्वीकार कर लिया। कुछ समय के प्रशिक्षण के बाद, मैंने देखा कि जिन दो बहनों के साथ मैं सहयोग करती थी, वे न केवल हाज़िर-जवाब थीं और उनकी काबिलियत अच्छी थी, बल्कि उनकी कार्य क्षमता भी मजबूत थी। मुझे चिंता होने लगी कि मेरी बहनें धीमी प्रतिक्रिया के कारण मुझे नीची नजर से देख सकती हैं। मुझे लगा कि मैं एक पर्यवेक्षक की भूमिका नहीं निभा सकती और बेहतर होगा कि मैं बस चुपचाप एक टीम सदस्य बनी रहूँ। इस तरह, मैं इतनी बुरी नहीं दिखूँगी। मैं जितना इस बारे में सोचती, उतनी ही नकारात्मक होती गई। मैं अपने कर्तव्यों को करने में भी बहुत निष्क्रिय थी। मैं लगातार कहती रही कि मैं अच्छी नहीं हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, इस उम्मीद में कि अगुआ मेरी जगह अच्छी काबिलियत वाले किसी व्यक्ति की व्यवस्था करेंगे। इस नकारात्मक और निष्क्रिय दशा में जीते हुए मेरे दिल को बहुत असहज महसूस हुआ। मैंने सोचा कि काम कितना व्यस्त था, लेकिन मैं अभी भी निष्क्रिय थी और सुधार के लिए प्रयास नहीं कर रही थी। यह परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करना नहीं था! मुझे जल्दी से इस नकारात्मक और निष्क्रिय दशा को बदलना था।

बाद में, मैंने विचार किया। बचपन से लेकर बड़े होने तक, मैं हमेशा यह मानती रही कि मेरी धीमी प्रतिक्रियाओं का मतलब है कि मेरी काबिलियत खराब है, जिसके कारण मैं अपना कर्तव्य करने में हमेशा निष्क्रिय और नकारात्मक रहती थी। क्या इस तरह से चीजों को आँकना सत्य के अनुरूप था? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “हम लोगों की काबिलियत कैसे मापते हैं? यह काम करने का उचित तरीका सत्य के प्रति उनके रवैये को देखना और यह जानना है कि वे सत्य को अच्छी तरह से समझ सकते हैं या नहीं। कुछ लोग कुछ विशेषज्ञताएँ बहुत तेजी से हासिल कर सकते हैं, लेकिन जब वे सत्य को सुनते हैं, तो भ्रमित हो जाते हैं और झपकी लेने लगते हैं। अपने मन में वे उलझे हुए होते हैं, वे जो कुछ भी सुनते हैं वह उनके अंदर नहीं जाता, न ही वे जो सुन रहे हैं उसे समझ पाते हैं—यही खराब काबिलियत होती है। कुछ लोगों को जब तुम बताते हो कि उनकी काबिलियत खराब है, तो वे सहमत नहीं होते हैं। वे सोचते हैं कि ऊँची शिक्षा प्राप्त और जानकार होने का मतलब है कि वे अच्छी काबिलियत वाले हैं। क्या अच्छी शिक्षा ऊँचे दर्जे की काबिलियत दर्शाती है? ऐसा नहीं है। लोगों की काबिलियत कैसे मापी जानी चाहिए? इसे इस आधार पर मापा जाना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचनों और सत्य को किस सीमा तक गहराई से समझते हैं। मापन का यह सबसे सटीक तरीका है। कुछ लोग वाक्-पटु, हाजिर-जवाब और दूसरों को सँभालने में विशेष रूप से कुशल होते हैं—लेकिन जब वे धर्मोपदेश सुनते हैं, तो उनकी समझ में कभी भी कुछ नहीं आता, और जब वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो वे उन्हें नहीं समझ पाते हैं। जब वे अपनी अनुभवजन्य गवाही के बारे में बताते हैं, तो वे हमेशा शब्द और धर्म-सिद्धांत बताते हैं, और इस तरह खुद के महज नौसिखिया होने का खुलासा करते हैं, और दूसरों को इस बात का आभास कराते हैं कि उनमें कोई आध्यात्मिक समझ नहीं है। ये खराब काबिलियत वाले लोग हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्‍य सही ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य को समझना सबसे महत्वपूर्ण है)। पता चला कि शिक्षित, हाज़िर-जवाब और वाक्पटु होने का यह मतलब नहीं है कि किसी व्यक्ति की काबिलियत अच्छी है। परमेश्वर लोगों की काबिलियत को उनकी शिक्षा के स्तर या उनकी बुद्धि की गति को देखकर नहीं आँकता, बल्कि मुख्य रूप से यह देखकर आँकता है कि वे किस हद तक सत्य को समझते और स्वीकार करते हैं। अच्छी काबिलियत वाले लोगों को परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ और सूझबूझ होती है। वे अपनी भ्रष्ट प्रकृतियों पर विचार कर सकते हैं और उन्हें समझ सकते हैं और जब उन पर समस्याएँ या कठिनाइयाँ आती हैं तो वे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास के सटीक सिद्धांत खोज सकते हैं। खराब काबिलियत वाले लोग सत्य को नहीं समझ सकते और वे परमेश्वर के वचनों से अपनी तुलना नहीं कर सकते या खुद को नहीं जान सकते। जब उन पर चीजें आ पड़ती हैं, तो वे अभ्यास के सिद्धांत नहीं खोज पाते, बल्कि केवल धर्म-सिद्धांत बघार सकते हैं और विनियमों का पालन कर सकते हैं। जब मैंने इससे अपनी तुलना की, तो मैंने देखा कि ज्यादातर समय परमेश्वर के वचनों के बारे में मेरी समझ विकृत नहीं होती; बस कुछ मसलों पर मेरी समझ उथली है और मैं चीजों को उतनी जल्दी नहीं समझ पाती या उन्हें उतनी गहराई से नहीं समझ पाती जैसे अच्छी काबिलियत वाले लोग समझते हैं। हालाँकि, जब भाई-बहन मेरे साथ उनके बारे में संगति करते हैं तो मैं उन्हें समझ सकती हूँ। मेरी काबिलियत इतनी खराब नहीं है कि मैं सत्य को न समझ सकूँ और इसे औसत माना जा सकता है। अब मैं एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य कर रही थी और हालाँकि मैं कुछ सिद्धांतों को पूरी तरह से नहीं समझ पाई थी और मुझमें कुछ कमियाँ थीं, जिन बहनों के साथ मैं सहयोग करती थी, उनकी काबिलियत बेहतर थी और उनके साथ काम करके, मैं अभी भी कुछ कर्तव्य कर सकती थी। अतीत में, मैं किसी व्यक्ति की काबिलियत आँकने के सिद्धांतों को नहीं समझती थी और अपनी प्रतिक्रियाओं को धीमा देखकर मैंने खुद को खराब काबिलियत वाला मान लिया था। मैं एक नकारात्मक दशा में जीती थी और ऊपर उठने का प्रयास नहीं करना चाहती थी। न केवल मैं परमेश्वर का प्रबोधन और मार्गदर्शन पाने में असमर्थ थी, बल्कि मैंने काम में भी देरी की। एक बार जब मैं इस संबंध में सत्य को समझ गई, तो मैं अपनी काबिलियत को सही ढंग से देख पाई और तर्कसंगत रूप से अपनी कमियों का सामना कर पाई।

बाद में, मैंने यह भी विचार किया, “मैं बचपन से ही बहुत हीन महसूस करती रही हूँ। चीजों पर कुछ भ्रामक दृष्टिकोणों के अलावा, मुझमें कौन से भ्रष्ट स्वभाव हैं?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन होते हैं और वह लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार यही होता है : ‘मेरे रुतबे का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे अच्छी प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरा रुतबा बढ़ेगा?’ यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार होता है—और केवल इसी कारण वे चीजों को इस तरह से देखते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, ये कोई बाहरी चीज तो बिल्कुल भी नहीं है जिसके बिना उनका काम चल सकता हो। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर उजागर करता है कि मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को अपने जीवन का लक्ष्य मानकर उसके पीछे भागते हैं। सभी परिस्थितियों में, वे केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचते हैं। अपने व्यवहार को देखकर, मैंने पाया कि यह एक मसीह-विरोधी के व्यवहार जैसा ही था। मैं विशेष रूप से अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को सँजोकर रखती थी। बचपन से ही, मैं धीमी प्रतिक्रिया वाली रही हूँ और मेरी समझने की क्षमता खराब है। इस वजह से, मैंने गलत जवाब दिए और मेरे सहपाठियों ने मेरा मजाक उड़ाया। उसके बाद मैंने सवालों के जवाब देना बंद कर दिया और मुझे डर था कि अगर मैंने कुछ और गलत कहा, तो मुझे नीची नजर से देखा जाएगा। परमेश्वर में विश्वास करना और कर्तव्य निभाना शुरू करने के बाद भी, मैं वैसी ही थी। जब मेरे कर्तव्य में कुछ विचलन हुए और दूसरों ने उन पर ध्यान दिलाया, तो मुझे लगा कि मेरी काबिलियत खराब है और जब मैंने फिर से कर्तव्य किए तो मैं अपनी राय व्यक्त करने को तैयार नहीं थी और यहाँ तक कि अपने कर्तव्य से बचना चाहती थी। जब मैंने एक पर्यवेक्षक के रूप में अपना कर्तव्य किया और देखा कि मेरी प्रतिक्रियाएँ और कार्य क्षमता उन बहनों जितनी अच्छी नहीं थीं जिनके साथ मैं सहयोग करती थी, तो मैं चाहती थी कि अगुआ मुझे बरखास्त कर दें। असल में, मैं अपने अभिमान की रक्षा कर रही थी, इस बात से चिंतित थी कि अगुआ मेरी असलियत जान जाएँगे और काम के नतीजों के जरिए यह महसूस करेंगे कि मैं हर मामले में अपनी बहनों जितनी अच्छी नहीं थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं हर दिन केवल प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में ही सोचती थी। जब मैं जो कर्तव्य कर रही थी, उसका संबंध मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे से होता, तो मैं या तो नकारात्मक महसूस करती और ढीली पड़ जाती, या भागने और विश्वासघात करने के बारे में सोचती। भले ही इससे कलीसिया के कार्य में बाधा आती, मुझे कोई परवाह नहीं थी। मैं मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल रही थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तो, सत्य का अनुसरण करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है, चाहे तुम इसे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखो। तुम मानवता की खराबियों और कमियों से बच सकते हो, लेकिन सत्य का अनुसरण करने के मार्ग से कभी नहीं बच सकते। चाहे तुम्हारी मानवता कितनी भी पूर्ण या महान क्यों न हो या चाहे दूसरे लोगों की तुलना में तुममें कम खामियाँ और खराबियाँ हों और तुम्हारे पास ज्यादा शक्तियाँ हों, इससे यह प्रकट नहीं होता है कि तुम सत्य समझते हो और न ही यह सत्य की तुम्हारी तलाश की जगह ले सकता है। इसके विपरीत, अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो, बहुत सारा सत्य समझते हो और तुम्हें इसकी पर्याप्त रूप से गहरी और व्यावहारिक समझ है, तो इससे तुम्हारी मानवता की कई खराबियों और समस्याओं की भरपाई हो जाएगी(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर कहता है कि सत्य का अनुसरण करना मनुष्य की कई कमियों की भरपाई कर सकता है। उदाहरण के लिए, जब मुझ पर चीजें आ पड़ती हैं तो मैं दूसरों से धीमी प्रतिक्रिया देती हूँ और मेरी काबिलियत बहुत अच्छी नहीं है। ये जन्मजात दोष हैं और इन्हें बदला नहीं जा सकता। लेकिन मेरे काम के खराब नतीजों की वजह, मेरी मानवता की खामियों के अलावा, मुख्य रूप से यह थी कि मैं सत्य को नहीं समझती थी और सिद्धांतों पर मेरी पकड़ नहीं थी। अगर मैं उन समस्याओं पर जिन्हें मैं नहीं समझती थी और अधिक सत्य सिद्धांत खोजती और अपने अभिमान को छोड़कर, भाई-बहनों के साथ संगति और चर्चा करती, तो मैं भी और अधिक सत्य समझ पाती। यह मेरे कर्तव्य के लिए भी फायदेमंद होता। जब मैं यह समझ गई, तो मैंने एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य करने से बचने की कोशिश नहीं की और उसके बाद मैं सक्रिय रूप से भी काम कर पाई।

एक बार, हम छवियाँ बनाने के नवीनतम सिद्धांतों पर संगति कर रहे थे और हमें उन पर चर्चा करने और उन्हें लागू करने के लिए अपने भाई-बहनों को एक पत्र लिखना था। मैंने सोचा, “पर्यवेक्षक बनने के बाद यह पहली बार है जब मुझे इतना महत्वपूर्ण पत्र लिखना है। अगर मैं इसे अच्छी तरह न लिख पाई और इसमें विचलन हुए तो?” मैं काफी घबरा गई थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से हीनता की भावनाओं के बीच जी रही थी और इसलिए मैंने अपनी मानसिकता को ठीक करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की। भले ही मैं शायद इतना व्यापक रूप से न लिख पाऊँ, मुझे पहले इस पर काम करने की पहल करनी चाहिए, फिर कोई कमी हुई तो बहनें बाद में उसे दूर कर सकती थीं। बाद में, मैं शांत हुई और लिखते हुए सोचा। लिखते समय, मैं परमेश्वर का मार्गदर्शन महसूस कर सकती थी और कुछ सिद्धांत तो मुझे तब से ज्यादा स्पष्ट हो गए थे जब हमने उन पर संगति की थी। मैंने अनुभव किया कि जब कोई अपने कर्तव्य में अपना दिल लगाता है, तो परमेश्वर उसे प्रबुद्ध करता है और उसकी अगुआई करता है।

अब, मुझे एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य करते हुए एक साल से ज्यादा हो गया है। जो बहन मूल रूप से मेरी सहयोगी थी, उसके कर्तव्य में फेरबदल हो गया, इसलिए बहन ली युए मेरे साथ सहयोग करने आई। जब मैं छवि-आधारित कर्तव्य कर रही थी, तब ली युए पहले मेरी टीम अगुआ थी। मैंने सोचा कि मैं पहले कितनी खराब थी और ली युए मुझे समझती थी। इस बार जब हम साथ काम करेंगे तो वह मेरे बारे में क्या सोचेगी? मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने अभिमान के बारे में नहीं सोचना चाहिए। चाहे मुझमें पहले कोई भी कमी रही हो, या साथ काम करने की इस अवधि के दौरान जो भी कमियाँ उजागर हों, मुझे उनका शांति से सामना करना था। बाद में, मैंने ली युए को कार्यप्रवाह समझाने की पहल की और काम पर चर्चा करते समय, मैंने अपनी राय व्यक्त करने की भी पहल की। इस अवधि के दौरान, जब ली युए और मैं असहमत होते थे, तो मैं बस अपने विचार व्यक्त कर देती थी। मेरी कुछ राय अपना ली गईं और कुछ उपयुक्त नहीं थीं। चाहे वे स्वीकार की गईं या नहीं, मैं संगति के माध्यम से कुछ सिद्धांत समझ पाई। एक दिन, ली युए ने कहा, “जब हम पहले एक साथ काम कर रहे थे, तो तुम कोई राय व्यक्त नहीं करती थीं और बस अपना काम करती थीं। लेकिन इस बार तुम्हारे साथ सहयोग करते समय, मैं देखती हूँ कि तुम बहुत बदल गई हो।” उसकी यह बात सुनकर, मैं काफी प्रभावित हुई। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन के बिना, मैं कभी भी हीनता की भावनाओं की पीड़ा से छुटकारा नहीं पा पाती और कभी भी अपना कर्तव्य उतनी सक्रियता से नहीं कर पाती जितना अब कर रही हूँ। ये सभी परमेश्वर के वचनों द्वारा प्राप्त किए गए नतीजे हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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