आराम की लालसा करने से कुछ हासिल नहीं होता
क्रिस्टन, स्वीडनजुलाई 2021 में, मुझे वीडियो के काम का प्रभारी बनाया गया। शुरू में, मैं अक्सर भाई-बहनों को कर्तव्य निभाने में होने वाली...
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जुलाई 2024 में मैं कलीसिया में पाठ आधारित कार्य की पर्यवेक्षक थी। चूँकि एक अगुआ को गिरफ्तार किया जा चुका था तो मुझे और मेरी साथी को परिवेशी खतरे उठाने पड़े, इसलिए हमें घर पर ही रहकर पत्रों के माध्यम से कार्य का जायजा लेना पड़ा। शुरुआत में तो मैं फिर भी सक्रिय रूप से कार्य का जायजा लेने में और टीम की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए पत्र लिखने में सक्षम थी। मैं टीम सदस्यों की दशाओं के समाधान के लिए परमेश्वर के वचन भी ढूँढ़ पा रही थी और जब किसी कार्य को कार्यान्वित करने की आवश्यकता होती थी तो मैं उसे तुरंत कार्यान्वित कर लेती थी। हालाँकि मैं थोड़ा व्यस्त रहती थी, पर मेरे दिल को उतनी थकान महसूस नहीं होती थी। जैसे-जैसे मेरा कार्यभार बढ़ा और कई समूहों में ऐसी समस्याएँ आईं जिनका समाधान जरूरी था, मैंने मन ही मन सोचा, “अगर हर कार्य में जायजा लेना और विस्तृत संचार शामिल है तो इसमें कितना विचार और मानसिक प्रयास लगेगा? इसके अलावा इतने सारे कार्य के सभी विवरणों का जायजा लेना क्या बहुत अधिक नहीं हो जाएगा?” मैंने सोचा कि कैसे एक समूह के सदस्य कई सालों से पाठ आधारित कार्य कर रहे थे, कुछ सिद्धांतों में निपुणता ले चुके थे और अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे हासिल कर चुके थे। मुझे लगा कि मुझे उस समूह के बारे में इतनी चिंता करने की जरूरत नहीं है और इसलिए उसके बाद मैंने उनके कार्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कभी-कभी मैं जरूर सोचती थी कि विवरणों में जाकर देखूँ कि क्या उन्हें अपने कर्तव्य निभाने में कोई कठिनाई तो नहीं हो रही है, लेकिन फिर मैं सोचती थी, “इन विवरणों को समझने के लिए बहुत प्रयास और सोच-विचार की जरूरत है। छोड़ो भी। इन लोगों के पास काफी अच्छे पेशेवर कौशल हैं और कुछ कार्य अनुभव भी है, इसलिए उन्हें खुद ही करने दो।” उसके बाद मैंने उस समूह के काम पर फिर विस्तार से गौर नहीं किया और न ही उसका जायजा लिया। कुछ समय बाद मैंने देखा कि इस समूह ने कई दिनों तक कोई धर्मोपदेश प्रस्तुत नहीं किया था, इसलिए मैंने जल्दी से उन्हें पत्र लिखकर पता लगाया कि क्या हो रहा है। समूह अगुआ ने बताया कि हाल ही में उन्हें मिले धर्मोपदेशों की गुणवत्ता खराब थी और कई धर्मोपदेश प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यह देखकर कि कार्य के नतीजे खराब हैं, उसकी दशा थोड़ी निराशाजनक थी। मैंने समूह अगुआ के साथ थोड़ी देर संगति की और उससे अनुरोध किया कि वह जिम्मेदारी उठाए और विचलनों का सारांश तैयार करने में सभी की अगुआई करे। बाद में मैं मूल रूप से इस समूह के काम को और अधिक गौर से देखना चाहती थी, लेकिन फिर मैंने सोचा, “मेरे पास अभी भी करने के लिए कुछ काम है। इन समस्याओं को समझने और हल करने के लिए बहुत सोच-विचार और प्रयास की जरूरत होगी। समूह अगुआ कुछ सिद्धांत जानती है और अगुआओं ने भी हमारे द्वारा प्रस्तुत धर्मोपदेशों में समस्याओं का सारांश प्रस्तुत किया है। उन्होंने जिस मार्ग की चर्चा की, वह बहुत स्पष्ट था, इसलिए मैं उन्हें खुद अध्ययन करने और इसमें शामिल होने दे सकती हूँ।” इस प्रकार मैं केवल अगुआओं के पत्रों को समूह तक पहुँचाकर ही संतुष्ट थी और समस्याओं और विचलनों का सारांश तैयार करने में उनकी अगुआई नहीं की। मैंने काम के विवरण के बारे में नहीं पूछा, जैसे कि वे कैसे अध्ययन कर रहे हैं और क्या वे सीखी हुई बातें लागू कर पा रहे हैं।
कुछ ही समय बाद अगुआओं का एक पत्र आया जिसमें कहा गया था कि धर्मोपदेश टीम की प्रगति धीमी है और उनके द्वारा प्रस्तुत धर्मोपदेशों की गुणवत्ता भी खराब है। उन्होंने मुझसे तत्काल इसका कारण जानने को कहा। जब मैंने यह पत्र पढ़ा तो मुझे अपने दिल में ग्लानि हुई। मैंने काम की प्रगति में देरी की थी क्योंकि मैं और अधिक प्रयास करने को तैयार नहीं थी और अपने कर्तव्य निभाने में गैर-जिम्मेदार थी। मुझे अपराध-बोध और ऋणी होने का एहसास हुआ। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और विचार करने के बाद मुझे वास्तविक कार्य न करने के अपने व्यवहार की कुछ समझ प्राप्त हुई। परमेश्वर कहता है : “नकली अगुआओं के काम की मुख्य विशेषता है धर्म-सिद्धांतों के बारे में बकवास करना और तोते की तरह नारे लगाना। अपने आदेश जारी करने के बाद वे बस मामले से पल्ला झाड़ लेते हैं। वे कार्य के आगे की प्रगति के बारे में कोई सवाल नहीं पूछते; वे यह नहीं पूछते कि कोई समस्या, विचलन या कठिनाई तो उत्पन्न नहीं हुई। वे दूसरों को कोई काम सौंपते ही अपना काम समाप्त हुआ मान लेते हैं। ... काम की खोज-खबर न लेना, काम दूसरे को सौंपने के बाद और कुछ न करना—उससे पल्ला झाड़ लेना—यह नकली अगुआओं के कार्य करने का तरीका है। कार्य की खोज-खबर न लेना या कार्य के बारे में मार्गदर्शन न देना, आने वाली समस्याओं के बारे में पूछताछ न करना या उनका समाधान न करना और काम की प्रगति या उसकी दक्षता पर पकड़ न रखना—ये भी नकली अगुआओं की अभिव्यक्तियाँ हैं” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (4))। “नकली अगुआ वास्तविक कार्य करने में असमर्थ होते हैं—वे जो कुछ भी करते हैं उसकी शुरुआत मजबूत होती है, लेकिन अंत में यह टाँय-टाँय फिस्स हो जाता है। वे जो भूमिका निभाते हैं वह समारोह के प्रारंभकर्ता की होती है : वे नारे लगाते हैं, धर्म-सिद्धांतों का उपदेश देते हैं और दूसरों को कार्य सौंप देने और यह व्यवस्थित कर देने के बाद कि इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा, वे इतिश्री कर लेते हैं। वे चीन के ग्रामीण इलाकों में दिखने वाले शोर मचाते लाउडस्पीकरों के समान होते हैं—वे इसी सीमा तक भूमिका निभाते हैं। वे बस थोड़ा-सा प्रारंभिक कार्य करते हैं; बाकी काम के लिए वे कहीं नजर नहीं आते। जहाँ तक विशिष्ट प्रश्नों की बात है कि कार्य की प्रत्येक मद कैसी चल रही है, क्या यह सिद्धांतों के अनुरूप है और क्या यह प्रभावी है—उनके पास उत्तर नहीं होते। वे कार्य की प्रत्येक मद की प्रगति और उसकी विशेषताओं को समझने और उन पर पकड़ हासिल करने के लिए कभी भी जमीनी स्तर पर गहराई से नहीं जुड़ते और कार्यस्थल का दौरा नहीं करते। इसलिए संभव है नकली अगुआ अपने अगुआ के कार्यकाल में गड़बड़ी और बाधाएँ पैदा करने के कदम न उठाएँ या तमाम बुराई न करें, मगर सच्चाई यह है कि वे कार्य को पंगु बना देते हैं, कलीसियाई कार्य की प्रत्येक मद की प्रगति को लंबित कर देते हैं और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना और जीवन प्रवेश प्राप्त करना नामुमकिन कर देते हैं। इस तरह कार्य करके वे परमेश्वर में आस्था के सही मार्ग पर परमेश्वर के चुने हुए लोगों की अगुआई भला कैसे कर सकेंगे? यह दर्शाता है कि नकली अगुआ कोई वास्तविक कार्य नहीं करते। यह सुनिश्चित करने के लिए कि कलीसियाई कार्य सामान्य रूप से प्रगति करे, वे जिस कार्य के लिए जिम्मेदार हैं उसकी खोज-खबर लेने या उसके लिए मार्गदर्शन देने और निरीक्षण करने में वे विफल रहते हैं; वे अगुआओं और कार्यकर्ताओं के वांछित कर्म करने में विफल रहते हैं, और वे अपनी वफादारी और जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहते हैं। इससे यह पुष्टि होती है कि नकली अगुआ जिस प्रकार अपने कर्तव्य निभाते हैं उसमें वे वफादार नहीं होते, कि वे निरे लापरवाह होते हैं; परमेश्वर के चुने हुए लोगों और स्वयं परमेश्वर दोनों को ही धोखा देते हैं और वे उसकी इच्छा का पालन करने पर असर और अड़चन डालते हैं। यह सच्चाई सबके सामने है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (4))। जब मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े जिनमें झूठे अगुआओं का पर्दाफाश किया गया था तो मुझे लगा मेरी ही आलोचना हो रही है। अपना कर्तव्य निभाते समय झूठे अगुआ अपनी देह में लिप्त रहते हैं, लापरवाही बरतते हैं और कार्य शुरू तो कर देते हैं लेकिन उसे ठीक से पूरा नहीं करते। जब वे काम को अंजाम देते हैं तो वे सिर्फ आदेश देने और निर्देश देने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, वे काम के विवरणों की पर्यवेक्षण नहीं करते या उसका जायजा नहीं लेते और वे काम में आने वाली समस्याओं को नहीं समझते या उन्हें नहीं पकड़ते। जब उन्हें समस्याएँ मिलती भी हैं तो वे उनका तुरंत समाधान नहीं करते जिससे काम की प्रगति में भारी देरी हो जाती है। हालाँकि मैं कोई अगुआ नहीं थी, क्या मेरा व्यवहार भी बिल्कुल ऐसा ही नहीं था? मैं लगातार अपने कर्तव्य में मेहनत करने और थक जाने से डरती रहती थी और मुझे जिम्मेदारी का बिल्कुल भी एहसास नहीं था। मैं टीम के काम का जायजा लेने से बचने के लिए व्यस्त होने का बहाना बनाती थी। जब मैंने देखा कि एक समूह में धर्मोपदेश के कार्य के नतीजे नहीं मिल रहे हैं तो मैंने कार्य के बारे में पूछताछ करने की खानापूर्ति की और समूह अगुआ से उसकी दशा के बारे में संक्षेप में संगति की, उससे समूह के सदस्यों के विचलनों और समस्याओं का सारांश बताने में अगुआई करने के लिए कहा। यहाँ तक कि बाद में जब मुझे पता चला कि समूह के सदस्य अभी भी मुश्किलों में जी रहे हैं, तब भी मैं इसे सुलझाने के लिए और अधिक मेहनत नहीं करना चाहती थी या कीमत नहीं चुकाना चाहती थी। मैंने उन्हें बस अगुआओं के पत्र भेजे और कार्य की समस्याओं का समाधान किए बिना ही उनसे कहा कि वे खुद अध्ययन करके उसमें शामिल हो जाएँ। मैंने देखा कि अपने कर्तव्य में मैं भी एक झूठे अगुआ की तरह ही गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार कर रही थी और मैं असली कार्य किए बिना बस औपचारिकता निभा रही थी। मैंने अपने कर्तव्य में असली कठिनाइयों का समाधान नहीं किया जिसका मतलब था कि किसी को भी अपने कर्तव्यों में आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिला और काम ठप पड़ गया। ये सब मेरे असली कार्य न करने के परिणाम थे। मैंने सोचा कि एक पर्यवेक्षक का कर्तव्य निभाने को लेकर मेरे लिए परमेश्वर का इरादा यह था कि मैं टीम के काम के विवरणों का जायजा लूँ, उनका पर्यवेक्षण करूँ और उसमें खुद को शामिल रखूँ और टीम सदस्यों की दशाओं पर ध्यान दूँ और उन्हें समझूँ, उनके कर्तव्यों में आने वाले विचलनों और समस्याओं का पता लगाऊँ और इन समस्याओं को तुरंत हल करने के लिए सत्य की संगति कर सकूँ ताकि कार्य सामान्य रूप से आगे बढ़ सके। लेकिन मैंने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं। अपने कर्तव्य में मैं सिर्फ आदेश देकर संतुष्ट थी और सोचती थी कि जब तक कार्य पूरा हो रहा है, तब तक सब ठीक है। मैंने यह भी सोचा कि चूँकि उस समूह के सभी सदस्य कई वर्षों से पाठ आधारित कर्तव्य निभा रहे थे और कुछ सिद्धांतों में निपुणता प्राप्त कर चुके थे, इसलिए मुझे और अधिक विचार या प्रयास खपाने की आवश्यकता नहीं है। मैंने सारा काम उन पर ऐसे थोप दिया जैसे यह कोई सामान्य बात हो और ऐसी बॉस बन गई जो काम से दूर रहता है। इस पर सोचें तो हालाँकि उन्हें अपने कर्तव्यों का कुछ अनुभव था, सभी में कुछ विचलन और कमियाँ होती हैं और हो सकता है कि वे कभी-कभी भ्रष्ट स्वभावों में रहते हों, इसलिए मुझे उनके कर्तव्यों के प्रति उनके रवैये पर लगातार नजर रखनी चाहिए थी, कार्य में आने वाली समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना चाहिए था और इन चीजों का तुरंत समाधान करना चाहिए था। ये मेरी जिम्मेदारियाँ थीं। लेकिन मैंने हमेशा यही सोचा कि अपनी देह की पीड़ा को कैसे कम करूँ। मैंने परमेश्वर के इरादे की जरा भी परवाह नहीं की! हालाँकि मैंने कम मानसिक प्रयास खपाया था और मेरी देह भी उतनी थकी हुई नहीं थी, फिर भी मैंने देह को ध्यान में रखकर और लापरवाही बरतकर कार्य की प्रगति में देरी की और मैंने परमेश्वर के सामने अपराध किया। जब मैंने यह सोचा, तो मुझे गहरा पछतावा हुआ और मैं परमेश्वर की ऋणी हो गई।
बाद में मैंने अपने आप पर विचार किया। अपने कर्तव्य में मैं अधिक प्रयास करने को तैयार क्यों नहीं थी और मैं लगातार लापरवाह और गैर-जिम्मेदार क्यों बन रही थी? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “एक और प्रकार का नकली अगुआ होता है, जिसके बारे में हमने अक्सर ‘अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ’ विषय पर संगति करते समय बात की है। इस प्रकार के अगुआओं में कुछ काबिलियत होती है, वे बेवकूफ नहीं होते हैं, उनके पास अपने कार्य करने के तौर-तरीके और विधियाँ होती हैं, और समस्याएँ हल करने के लिए योजनाएँ होती हैं, और जब उन्हें कार्य का कोई अंश दिया जाता है, तो वे उसे अपेक्षित मानकों के लगभग अनुरूप कार्यान्वित कर सकते हैं। वे कार्य के दौरान उत्पन्न होने वाली किसी भी समस्या का पता लगाने में समर्थ होते हैं और उनमें से कुछ समस्याएँ हल भी कर सकते हैं; जब वे कुछ लोगों द्वारा सूचित की गई समस्याएँ सुनते हैं, या वे कुछ लोगों के व्यवहार, अभिव्यक्तियों, बातों और कार्य की जाँच-परख करते हैं, तो उनके दिल में प्रतिक्रिया होती है, और उनकी अपनी राय और एक रवैया होता है। यकीनन, अगर ये लोग सत्य का अनुसरण करें और उनमें दायित्व की भावना हो, तो ये सभी समस्याएँ हल हो सकती हैं। लेकिन, आज हम जिस प्रकार के व्यक्ति पर संगति कर रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी के अंतर्गत आने वाले कार्य में समस्याएँ अप्रत्याशित रूप से अनसुलझी रह जाती हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये लोग वास्तविक कार्य नहीं करते हैं। वे आराम से प्रेम और कड़ी मेहनत से नफरत करते हैं, वे बस ऊपरी तौर पर लापरवाही से प्रयास करते हैं, उन्हें निठल्ला रहना और रुतबे के फायदों का आनंद लेना पसंद है, उन्हें लोगों पर हुक्म चलाना अच्छा लगता है, और वे बस थोड़े-से होंठ हिलाते हैं और कुछ सुझाव देते हैं और फिर मान लेते हैं कि उनका कार्य पूरा हो गया है। वे कलीसिया के किसी भी वास्तविक कार्य या परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं—उनमें दायित्व की यह भावना नहीं होती है, और भले ही परमेश्वर का घर बार-बार इन बातों पर जोर देता रहे, फिर भी वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं। मिसाल के तौर पर, वे परमेश्वर के घर के फिल्म निर्माण कार्य या पाठ आधारित कार्य में दखल देना या उसके बारे में पूछताछ करना नहीं चाहते हैं, और ना ही वे इस बात की छान-बीन करना चाहते हैं कि इस प्रकार के कार्य किस तरह से प्रगति कर रहे हैं और वे क्या परिणाम हासिल कर रहे हैं। वे बस अप्रत्यक्ष रूप से कुछ पूछताछ कर लेते हैं, और एक बार जब वे जान जाते हैं कि लोग इस कार्य में व्यस्त हैं और यह कार्य कर रहे हैं, तो वे आगे इस पर और ध्यान नहीं देते हैं। यहाँ तक कि जब उन्हें अच्छी तरह से यह मालूम भी होता है कि कार्य में समस्याएँ हैं, तो भी वे उन पर संगति करना और उन्हें हल करना नहीं चाहते हैं, और ना ही वे इस बारे में पूछताछ या छान-बीन करते हैं कि लोग अपने कर्तव्य कैसे कर रहे हैं। वे इन चीजों के बारे में पूछताछ क्यों नहीं करते हैं या इनकी छान-बीन क्यों नहीं करते हैं? उन्हें लगता है कि अगर वे उनकी छान-बीन करेंगे, तो ऐसी बहुत सी समस्याएँ सामने आ जाएँगी जो उनके द्वारा हल की जाने की प्रतीक्षा में होंगी, और वह बहुत ही चिंताजनक होगा। अगर उन्हें हमेशा समस्याएँ सुलझानी पड़ जाए, तो जीवन अत्यंत थकाऊ हो जाएगा! अगर वे बहुत ज्यादा चिंता करेंगे, तो भोजन उनके लिए बेस्वाद हो जाएगा, और वे ठीक से सो नहीं पाएँगे, उन्हें देह में थकावट महसूस होगी, और फिर जीवन तकलीफदेह हो जाएगा। इसीलिए, जब उन्हें कोई समस्या दिखाई पड़ती है, तो वे उससे बचते फिरते हैं और अगर हो सके, तो उसे नजरअंदाज कर देते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति में क्या समस्या है? (वह बहुत ही आलसी है।) मुझे बताओ, गंभीर समस्या किन्हें होती है : आलसी लोगों को या खराब काबिलियत वाले लोगों को? (आलसी लोगों को।) आलसी लोगों को गंभीर समस्या क्यों होती है? (खराब काबिलियत वाले लोग अगुआ या कार्यकर्ता नहीं बन सकते, लेकिन जब वे अपनी क्षमताओं के दायरे में आने वाला कोई कर्तव्य करते हैं, तो वे कुछ हद तक प्रभावी हो सकते हैं। लेकिन, आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं; अगर उनमें काबिलियत हो, तो भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।) आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे संक्षेप में प्रस्तुत करें, तो वे बेकार लोग हैं; उनमें एक द्वितीय-श्रेणी की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन उपयोगी कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे उन कष्टों को सहना नहीं चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; उन्हें सिर्फ सुख-सुविधाओं में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के समय का आनंद लेना और एक मुक्त और शांतिपूर्ण जीवन का आनंद लेना आता है। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। “शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। इसके बारे में सोचा तो मैं अधिक मानसिक ऊर्जा खर्च करने के लिए तैयार नहीं थी और अपने कर्तव्य के प्रति गैर-जिम्मेदार थी, एक झूठे अगुआ की तरह मैं बहुत आलसी और आराम में बहुत अधिक लिप्त रहती थी। परमेश्वर कहता है : “आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती” “वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है” और “उसे हटा देना चाहिए।” मैंने देखा कि परमेश्वर झूठे अगुआओं से कितनी नफरत करता है। झूठे अगुआओं की काबिलियत चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, चूँकि उनकी मानवता ठीक नहीं होती और वे बहुत आलसी होते हैं, वे अपने कर्तव्य के प्रति गैर-जिम्मेदार होते हैं और कार्य के विवरणों की निगरानी या उनका जायजा नहीं लेते तो वे श्रम करने के भी अयोग्य होते हैं और वे परमेश्वर की घिन और घृणा भी झेलते हैं। इन वचनों को पढ़कर मुझे ऐसा लगा जैसे परमेश्वर मेरा आमने-सामने न्याय कर रहा हो और हर पंक्ति मेरे दिल को छू गई। मैंने सोचा कि परमेश्वर को पाने से पहले मैं अक्सर लोगों को यह कहते सुनती थी, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “शराब का स्वाद चखते और संगीत का आनंद लेते हुए जीवन में सचमुच कितना समय मिलता है?” और “हर पल का मजा लो और सही-गलत पर ध्यान मत दो।” मैं शैतान द्वारा डाले गए इन बेतुके विचारों के प्रभाव में विषाक्त हो गई थी, इसलिए मुझे दैहिक सुखों में लिप्त रहना और एक स्वतंत्र और आरामदेह जीवन जीना पसंद था। मुझे लगता था कि केवल अच्छे दैहिक सुखों से ही कोई व्यक्ति स्वतंत्र और आसान जीवन जी सकता है। मैं अस्तित्व के बारे में इन शैतानी विचारों के अनुसार जीती थी और जैसे ही मेरे पास अपने कर्तव्य में बहुत कुछ करने को होता, मैं अपनी देह के बारे में सोचने और योजना बनाने लगती, यहाँ तक कि जो चीजें मेरी क्षमता के दायरे में होतीं, मैं वो भी न करती। मुझे अच्छी तरह पता था कि कार्य की प्रगति धीमी है और उस समूह के सदस्यों को अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, लेकिन मैं ये समस्याएँ सुलझाने के लिए कोई कीमत नहीं चुकाना चाहती थी। मैं बस यही सोचती थी कि मैं कैसे कम काम करूँ और कम कष्ट सहूँ। मेरी प्रकृति सचमुच स्वार्थी और घृणित थी और मुझमें जरा भी मानवता नहीं थी! मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर देहधारी हुआ और लोगों को बचाने और कार्य करने के लिए पृथ्वी पर आया। वह कभी नारे नहीं लगाता बल्कि लोगों की कमियों के अनुसार उन्हें प्रदान करने के लिए व्यावहारिक रूप से सत्य व्यक्त करता है। हम मनुष्यों के सामने जो भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हैं, मसीह बिना थके और धैर्यपूर्वक उन पर हमारे साथ संगति करता है, व्यावहारिक रूप से हमारे कर्तव्यों में विभिन्न समस्याओं और कठिनाइयों का समाधान करता है। मैंने देखा कि मसीह जिस ढंग से कार्य करता है, उसमें वह बहुत मेहनती और जिम्मेदार है। फिर मैंने खुद पर गौर किया। अपने कर्तव्यों में मैं जब भी संभव होता, लापरवाही बरतती थी और जितना हो सके कम कष्ट सहने की कोशिश करती थी। मैं बहुत आलसी और पतित थी और मैं बिना किसी ईमानदारी या गरिमा के जी रही थी। अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करती तो अंततः परमेश्वर द्वारा मुझे ठुकरा कर हटा दिया जाता और मैं अपने उद्धार का अवसर गँवा देती, जिस समय परमेश्वर का कार्य समाप्त होता, उसी समय मुझे भी दंड मिलता। जब मैंने यह सोचा, तो मुझे बहुत दुःख और ग्लानि महसूस हुई। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अपने कर्तव्य में निरंतर अपनी देह का खयाल रखती हूँ और मैं और अधिक प्रयास नहीं करना चाहती। मैं बस नारे लगाती हूँ और कोई असली कार्य नहीं करती। मैंने अपने कर्तव्य को नुकसान पहुँचाया है और अपने पीछे पछतावा छोड़ा है। मैं तुम्हारी घृणा की पात्र हूँ। परमेश्वर, मैं तुम्हारे सामने पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। आगे बढ़ते हुए मैं अपनी देह के विरुद्ध विद्रोह करने और टीम की सभी असली समस्याओं को दृढ़तापूर्वक हल करने, तुम्हें संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने को तैयार हूँ।”
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “परमेश्वर ने तुम्हें पर्याप्त काबिलियत और श्रेष्ठतर स्थितियाँ दी हैं जो तुम्हें कुछ चीजें स्पष्टता से देखने देती हैं और इस कार्य के लिए योग्य बनने देती हैं। लेकिन तुम सही रवैया नहीं रखते, तुममें कोई समर्पण और ईमानदारी नहीं है और तुम इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं करना चाहते हो। यह परमेश्वर को बहुत ही निराश करता है। इसलिए बहुत सी चीजों का सामना करने पर अगर तुम आलसी रहते हो, हमेशा परेशानी महसूस करते हो और उन्हें नहीं करना चाहते हो और तुम अंदर ही अंदर बड़बड़ाते हो कि, ‘मुझे ही क्यों यह सब करने को कहा जा रहा है, किसी और को क्यों नहीं?’ तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। जब तुम्हें कोई कर्तव्य दिया जाता है तो यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, यह एक सम्मान है और तुम्हें इसे खुशी से स्वीकार करना चाहिए। यह कार्य तुम्हें थका या मार नहीं डालेगा। बल्कि, अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हो, सत्य को समझते हो और समस्याओं का समाधान करते हो, तो तुम अपने मन में शांति और सुकून महसूस करोगे और तुमने परमेश्वर को निराश नहीं किया होगा। परमेश्वर के सामने, तुममें आस्था होगी और तुम सिर उठाकर आचरण कर सकोगे” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। “हम किसी बड़े लक्ष्य, कर्तव्य या जिम्मेदारी को पूरा करने की बात नहीं करेंगे; लेकिन कम से कम, तुम्हें कुछ तो हासिल करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कलीसिया में, कुछ लोग अपनी सारी कोशिश सुसमाचार फैलाने में लगा देते हैं, अपने पूरे जीवन की ऊर्जा समर्पित करते हैं, बड़ी कीमत चुकाते और कई लोगों को जीतते हैं। इस वजह से, उन्हें लगता है कि उनका जीवन व्यर्थ नहीं गया है, उसका मूल्य है और यह राहत देने वाला है। बीमारी या मृत्यु का सामना करते समय, जब वे अपने पूरे जीवन का सारांश निकालते हैं और उन सभी चीजों के बारे में सोचते हैं जो उन्होंने कभी की थीं, जिस रास्ते पर वे चले, तो उन्हें अपने दिलों में तसल्ली मिलती है। उन्हें किसी आत्मनिंदा या पछतावे का अनुभव नहीं होता। कुछ लोग कलीसिया में अगुआई करते समय या कार्य के किसी खास पहलू की अपनी जिम्मेदारी में कोई कसर नहीं छोड़ते। वे अपनी अधिकतम क्षमता का उपयोग करते हैं, अपनी पूरी ताकत लगाते हैं, अपनी सारी ऊर्जा खर्च करते हैं और जो काम करते हैं उसकी कीमत चुकाते हैं। अपने सिंचन, अगुआई, सहायता और समर्थन से, वे कई लोगों को उनकी कमजोरियों और नकारात्मकता के बीच मजबूत बनने और दृढ़ रहने में मदद करते हैं ताकि वे कलीसिया छोड़ने के बजाय परमेश्वर की उपस्थिति में वापस आएँ और सबसे अच्छा नतीजा यह है कि वे अंत में उसकी गवाही भी दें। इसके अलावा, अपनी अगुआई की अवधि के दौरान, वे कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे करते हैं, बहुत-से दुष्ट लोगों को कलीसिया से निकालते हैं, परमेश्वर के चुने हुए अनेक लोगों की रक्षा करते हैं और कई बड़े नुकसानों को वापस ठीक करने की कोशिश भी करते हैं। ये सभी चीजें उनकी अगुआई के दौरान ही हासिल होती हैं। वे जिस रास्ते पर चले, उसे पीछे मुड़कर देखते हुए, बीते बरसों में अपने द्वारा किए गए काम और चुकाई गई कीमत को याद करते हुए, उन्हें कोई पछतावा या आत्मग्लानि महसूस नहीं होती। उन्हें ये काम करने पर कोई पछतावा नहीं होता और वे मानते हैं कि उन्होंने एक सार्थक जीवन जिया है और उनके दिलों में स्थिरता और आराम है। यह कितना अद्भुत है! क्या यही वह फल नहीं जो उन्होंने प्राप्त किया है? (हाँ।) स्थिरता और राहत की यह भावना, पछतावे का न होना, ये सकारात्मक चीजों और सत्य का अनुसरण करने की फसल हैं। आओ, हम लोगों के लिए ऊँचे मानक न रखें। एक ऐसी स्थिति पर विचार करें जहाँ व्यक्ति को ऐसे कार्य का सामना करना पड़ता है जो उसे अपने जीवनकाल में करना चाहिए या वह करना चाहता है। अपनी जगह जान लेने के बाद, वह दृढ़ता से उस पर बना रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपने हृदय का पूरा रक्त और अपनी सारी ऊर्जा खपा देता है, जिस चीज पर काम करना चाहिए और जिसे पूरा करना चाहिए उसे हासिल और पूरा करता है। जब वह अंत में हिसाब देने के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो वह अपेक्षाकृत संतुष्ट महसूस करता है, उसके दिल में कोई आत्मग्लानि या पछतावा नहीं होता है। उसे राहत महसूस होता है और लगता है कि उसने कुछ प्राप्त किया है, उसने एक मूल्यवान जीवन जिया है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6))। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मुझे परमेश्वर का इरादा समझ में आया। परमेश्वर ने मुझे उपहार और काबिलियत प्रदान की और मुझे पर्यवेक्षक बनने का अवसर इस आशा में दिया कि मैं अपने कर्तव्य में मूल्य चुकाऊँगी, अपने कार्यों में गंभीर और जिम्मेदार रहूँगी और पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाऊँगी। केवल इसी तरह मेरे जीवन को अर्थ मिल सकता है। अगर मैं अपने कर्तव्य में लगातार आलसी रहूँगी और आराम में लिप्त रहूँगी, तो भले ही मेरी देह को ज्यादा कष्ट नहीं होगा, लेकिन मैं कार्य को नुकसान पहुँचाऊँगी। यह ऐसी चीज है जिससे परमेश्वर घृणा करता है। अब परमेश्वर का कार्य अपने अंतिम महत्वपूर्ण क्षण पर पहुँच गया है। अगर मैं देह के प्रति विचारशीलता दिखाती रहूँगी और अपने कर्तव्य पर अपना समय और ऊर्जा नहीं लगाऊँगी तो जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा तो मेरे पास हमेशा के लिए पछतावे रह जाएँगे। मुझे अपने कर्तव्य के प्रति अपना रवैया बदलना होगा; अपने कार्यों में गंभीर और जिम्मेदार रहना होगा और उनमें अपना दिल लगाना होगा; जब मुझे समस्याएँ दिखें, तो मैं परमेश्वर पर भरोसा रखूँ और उन्हें हल करने के लिए सत्य की खोज करूँ; और व्यावहारिक ढंग से कुछ वास्तविक कार्य करूँ। बाद में मुझे वास्तव में धर्मोपदेशों की खराब गुणवत्ता के कारण का पता चला और मैंने उसकी जाँच की। इसका प्राथमिक कारण यह था कि भाई-बहन धर्मोपदेशों की जाँच-पड़ताल के सिद्धांतों पर ठीक से पकड़ नहीं बना पाए थे और जो उन्होंने सीखा था उसे लागू नहीं कर पा रहे थे। मैंने इन समस्याओं के समाधान को लेकर कुछ धर्मोपदेशों की जाँच की और उनके साथ सिद्धांतों का अध्ययन किया और जब हमें समस्याएँ और विचलन मिले तो उन पर संगति कर उन्हें तुरंत ठीक किया। हमें अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे हासिल हुए। हालाँकि इसमें अधिक समय और ऊर्जा लगी और मेरी देह को थोड़ी ज्यादा तकलीफ हुई, फिर भी मेरे दिल को शांति और सुकून मिला। साथ ही टीम सदस्यों के साथ सिद्धांतों का अध्ययन करके मैंने भी उन्हें बेहतर ढंग से समझा। ये सभी नतीजे कार्य में असली भागीदारी से हासिल हुए थे।
बाद में मैंने धर्मोपदेश टीम के कार्य पर ध्यान देते हुए दूसरी टीम के कार्य का जायजा लिया। मैंने भाई-बहनों के साथ अगुआओं द्वारा लागू सिद्धांतों पर एक-एक करके विस्तार से चर्चा की और कार्य में मिले किसी भी विचलन पर समय रहते चर्चा की और उसका समाधान किया। एक बार अगुआओं ने बताया कि धर्मोपदेश टीम केवल प्रस्तुत किए जाने वाले धर्मोपदेशों की संख्या पर ध्यान केंद्रित करती है, उनकी गुणवत्ता पर नहीं। इसका मतलब था कि भले ही उन्होंने बहुत सारे धर्मोपदेश प्रस्तुत किए, लेकिन उनकी गुणवत्ता खराब थी। यह पत्र पढ़ने के बाद मैंने मन ही मन सोचा, “इस समय मुझे अभी भी कुछ कार्य क्रियान्वित करना है। धर्मोपदेश टीम को यह बताने के लिए पत्र लिखने में अधिक समय और ऊर्जा लगती और मेरी देह को और अधिक कष्ट होता। क्यों न मैं अगुआओं के पत्र को शामिल करते हुए उनसे संक्षेप में संवाद करूँ और उनसे भविष्य में और अधिक ध्यान देने का अनुरोध करूँ?” लेकिन बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जब कभी भी तुम शिथिल पड़ना चाहते हो और बिना रुचि के काम करना चाहते हो, जब कभी भी तुम धूर्तता से काम करना और आलसी बनना चाहते हो, और जब कभी तुम्हारा ध्यान बँट जाता है या तुम आनंद लेना चाहते हो, तो तुम्हें विचार करना चाहिए : ‘इस तरह व्यवहार करके, क्या मैं गैर-भरोसेमंद बन रहा हूँ? क्या यह कर्तव्य निर्वहन में अपना मन लगाना है? यह करके क्या मैं समर्पित होने में नाकाम रह रहा हूँ? ऐसा करने में, क्या मैं परमेश्वर के सौंपे आदेश पर खरा उतरने में विफल हो रहा हूँ?’ तुम्हें इसी तरह आत्म-चिंतन करना चाहिए। अगर तुम्हें पता चलता है कि तुम अपने कर्तव्य में हमेशा अनमने रहते हो, कि तुम समर्पित नहीं हो और यह भी कि तुमने परमेश्वर को चोट पहुँचाई है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, ‘जिस क्षण मुझे लगा कि यहाँ कुछ गड़बड़ है, लेकिन मैंने इसे समस्या नहीं माना; मैंने इसे बस लापरवाही से नजरअंदाज कर दिया। मुझे अब तक इस बात का एहसास नहीं हुआ था कि मैं वास्तव में अनमना रहता था, कि मैं अपनी जिम्मेदारी पर खरा नहीं उतरा था। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक की कमी है!’ तुमने समस्या का पता लगा लिया है और अपने बारे में थोड़ा जान लिया है—तो अब तुम्हें खुद को बदलना होगा! अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा रवैया गलत था। तुम उसके प्रति लापरवाह थे, मानो यह कोई अतिरिक्त नौकरी हो, और तुमने उसमें अपना दिल नहीं लगाया। अगर तुम फिर इस तरह अनमने रहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उसे तुम्हें अनुशासित करने और ताड़ना देने देना चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा ऐसा ही संकल्प होना चाहिए। तभी तुम सच्चा पश्चात्ताप कर सकते हो। जब तुम्हारी अंतरात्मा साफ होगी और अपना कर्तव्य निभाने के प्रति तुम्हारा रवैया बदल गया होगा, तभी तुम खुद को बदल पाओगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल परमेश्वर के वचन बार-बार पढ़ने और सत्य पर चिंतन-मनन करने में ही आगे बढ़ने का मार्ग है)। परमेश्वर के वचनों पर मनन करते हुए मैंने सोचा कि कैसे अतीत में मैं अपना कर्तव्य निभाने में बहुत आलसी रही थी और कष्ट सहने या बहुत अधिक मानसिक प्रयास करने को तैयार नहीं थी जिससे कार्य में देरी हुई थी। अब मुझे अपने कर्तव्य के प्रति अपना रवैया बदलना था और मैं अतीत की तरह लगातार आराम में नहीं रह सकती थी। मुझे देह के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करनी थी और उन जिम्मेदारियों को पूरा करना था जो मुझे पूरी करनी चाहिए। उसके बाद मैंने टीम के कार्य में आ रही कमियों के बारे में संगति के लिए एक पत्र लिखा और विस्तार से आगे बढ़ने का रास्ता बताया। कुछ समय बाद टीम में विचलन दूर हो गए और उनके कर्तव्यों का निर्वहन पहले की तुलना में बेहतर हो गया। हालाँकि अभी भी कार्य की कई मदें बाकी थीं, मैंने अपने कर्तव्य के प्रति अपना रवैया बदल लिया था और अपने कार्य को सही ढंग से प्राथमिकता दे रही थी, असल में टीम के कार्य में भाग ले रही थी, उसके ब्योरों का पर्यवेक्षण कर उनका जायजा ले रही थी। जब हमारे सामने कठिनाइयाँ आती थीं, तो मैं सत्य खोजने और उनका समाधान करने के लिए टीम के सदस्यों की अगुआई करती थी और धीरे-धीरे कार्य में सुधार होने लगा। हालाँकि मेरी देह ने ज्यादा कीमत चुकाई और थोड़ा ज्यादा कष्ट सहा, लेकिन मेरे दिल को शांति और सुकून मिला।
इस अनुभव के जरिए मैंने आत्म-चिंतन किया है और आराम और आलस्य में लिप्त रहने की अपनी प्रकृति को कुछ हद तक समझा है। भविष्य में मुझे टीम के कार्य के ब्योरों की निगरानी और उनका जायजा लेने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और परमेश्वर की संतुष्टि के लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
क्रिस्टन, स्वीडनजुलाई 2021 में, मुझे वीडियो के काम का प्रभारी बनाया गया। शुरू में, मैं अक्सर भाई-बहनों को कर्तव्य निभाने में होने वाली...
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