कर्तव्य से मुँह मोड़ते समय मुझे क्या चिंता थी?

21 फ़रवरी, 2026

बारबरा, लाओस

2022 में, मैं एक जिला निर्णायक समूह की सदस्य चुनी गई और मुझ पर कई कलीसियाओं के काम की जिम्मेदारी थी। क्योंकि मैं म्याओ और चीनी भाषा बोल सकती थी, इसलिए मैं अक्सर अनुवाद करने में भाई-बहनों की मदद करती थी और इसलिए मेरे पास कलीसिया के काम का जायजा लेने के लिए ज्यादा समय नहीं होता था। मैं बहुत बेचैन थी। कुछ कलीसिया अगुआओं ने अभी-अभी प्रशिक्षण लेना शुरू किया था और उन्हें अपना काम करना नहीं आता था। अगर मैं जल्द से जल्द कलीसिया अगुआओं को विकसित नहीं करती, तो ज्यादातर काम मुझे खुद ही करना पड़ता, जो बहुत व्यस्त और थकाऊ होता। मैंने बहुत प्रतिरोधी महसूस किया। जब कोई मुझसे अनुवाद करने के लिए कहता, अगर वह उन कलीसियाओं के काम से जुड़ा नहीं होता जिनकी मैं जिम्मेदार थी, तो मैं उसे अनदेखा कर देना चाहती थी।

2022 के अंत में, जिला निर्णायक समूह के अगुआ और उप-अगुआ के पदों के लिए चुनाव होने थे। मैंने मन ही मन सोचा : “इन कलीसियाओं के काम की जिम्मेदारी पहले से ही मेरे लिए बहुत ज्यादा है। अगर मुझे समूह अगुआ चुन लिया गया, तो मेरी जिम्मेदारी का दायरा और भी बड़ा हो जाएगा और तब क्या मेरा काम और भी व्यस्त नहीं हो जाएगा? अगर मैं न चुनी गई, तो अच्छा होगा। इस तरह मुझे ज्यादा चिंता नहीं करनी पड़ेगी और मेरी देह इतनी नहीं थकेगी।” लेकिन जब वोटों की घोषणा हुई, तो मैं जिला निर्णायक समूह की अगुआ चुनी गई थी। मैंने तुरंत बहाने बनाते हुए कहा : “मैं बोझ उठाने वाली इंसान नहीं हूँ। मैं आलसी हूँ और वास्तविक काम नहीं करती। मैं काफी धोखेबाज भी हूँ।” मैंने तो यह भी उदाहरण दिए कि मैं कैसे धोखेबाज थी। फिर मैंने कहा : “मैं जवान और अस्थिर हूँ और समूह अगुआ बनने के लायक नहीं हूँ। यह काम किसी और भाई या बहन को करने दो।” एक बहन ने कहा : “तुमने अपना कर्तव्य शुरू करने से पहले ही समझौता करना शुरू कर दिया है। तुम अभी से देह से बेबस और बँधी हुई हो।” जब मैंने बहन को यह कहते सुना तो उसकी बात मेरे दिल में चुभ गई। सभा के बाद, मुझे दिल में बहुत दुख हुआ। मैं जानती थी कि कर्तव्य से मुँह मोड़ना परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना है और उसके प्रति समर्पण करने वाला दिल न रखना है। बाद में, मैंने आत्म-चिंतन किया। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “एक ईमानदार व्यक्ति की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है सभी मामलों में सत्य की खोज और उसका अभ्यास करना—यह सबसे महत्वपूर्ण है। तुम कहते हो कि तुम ईमानदार हो, लेकिन तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों को अपने मस्तिष्क के कोने में धकेल देते हो और वही करते हो जो तुम चाहते हो। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? तुम कहते हो, ‘भले ही मेरी योग्यता कम है, लेकिन मेरे पास एक ईमानदार दिल है।’ फिर भी, जब तुम्हें कोई कर्तव्य मिलता है, तो तुम इस बात से डरते हो कि अगर तुमने इसे अच्छी तरह से नहीं किया तो तुम्हें पीड़ा सहनी और इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी, इसलिए तुम अपने कर्तव्य से बचने के लिए बहाने बनाते हो या फिर सुझाते हो कि इसे कोई और करे। क्या यह एक ईमानदार व्यक्ति की अभिव्यक्ति है? स्पष्ट रूप से, नहीं है। तो फिर, एक ईमानदार व्यक्ति को कैसे व्यवहार करना चाहिए? उसे परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए, जो कर्तव्य उसे निभाना है उसके प्रति समर्पित होना चाहिए और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। यह कई तरीकों से व्यक्त होता है : एक तरीका है अपने कर्तव्य को ईमानदार हृदय के साथ स्वीकार करना, अपने दैहिक हितों के बारे में न सोचना, और इसके प्रति अधूरे मन का न होना या अपने लाभ के लिए साजिश न करना। ये ईमानदारी की अभिव्यक्तियाँ हैं। दूसरा है अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने के लिए अपना तन-मन झोंक देना, चीजों को ठीक से करना, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य में अपना हृदय और प्रेम लगा देना। अपना कर्तव्य निभाते हुए एक ईमानदार व्यक्ति की ये अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए। अगर तुम जानते और समझते हो कि क्या करना है, लेकिन तुम इसे करते नहीं हो, तो तुम अपने कर्तव्य में अपना पूरा दिल और अपनी सारी शक्ति नहीं लगा रहे हो। बल्कि तुम धूर्त और काहिल हो। क्या इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने वाले लोग ईमानदार होते हैं? बिल्कुल नहीं। परमेश्वर के पास ऐसे धूर्त और धोखेबाज लोगों का कोई उपयोग नहीं है; उन्हें निकाल देना चाहिए। परमेश्वर कर्तव्य निभाने के लिए सिर्फ ईमानदार लोगों का उपयोग करता है। यहाँ तक कि निष्ठावान मजदूर भी ईमानदार होने चाहिए। जो लोग हमेशा अनमने और धूर्त होते हैं और ढिलाई के तरीके तलाशते रहते हैं—वे सभी लोग धोखेबाज हैं, वे सभी राक्षस हैं। उनमें से कोई भी वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता और वे सभी निकाल दिए जाएँगे। कुछ लोग सोचते हैं, ‘ईमानदार व्यक्ति होने का मतलब बस सच बोलना और झूठ न बोलना है। ईमानदार व्यक्ति बनना तो वास्तव में आसान है।’ तुम इस भावना के बारे में क्या सोचते हो? क्या ईमानदार व्यक्ति होने का दायरा इतना सीमित है? बिल्कुल नहीं। तुम्हें अपना हृदय प्रकट करना होगा और इसे परमेश्वर को सौंपना होगा, यही वह रवैया है जो एक ईमानदार व्यक्ति में होना चाहिए। इसलिए एक ईमानदार हृदय अनमोल है। इसका तात्पर्य क्या है? इसका तात्पर्य है कि एक ईमानदार हृदय तुम्हारे व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है और तुम्हारी दशा बदल सकता है। यह तुम्हें सही विकल्प चुनने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और उसकी स्वीकृति प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर सकता है। ऐसा हृदय सचमुच अनमोल है। यदि तुम्हारे पास इस तरह का ईमानदार हृदय है, तो तुम्हें इसी स्थिति में रहना चाहिए, तुम्हें इसी तरह व्यवहार करना चाहिए, और इसी तरह तुम्हें खुद को समर्पित करना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि एक ईमानदार व्यक्ति को चाहे कोई भी कर्तव्य क्यों न सौंपा जाए, चाहे वह उसके लिए फायदेमंद हो या न हो, चाहे उसकी देह को कितना भी कष्ट क्यों न सहना पड़े, वह उसे एक ईमानदार दिल से स्वीकार करेगा। फिर, वह अपने हितों पर विचार किए बिना वह सब कुछ करने के लिए अपना सब कुछ दे देगा जो वह कर सकता है, केवल यह सोचेगा कि परमेश्वर को कैसे संतुष्ट किया जाए। केवल इसी तरह का व्यक्ति परमेश्वर का प्रिय एक ईमानदार व्यक्ति होता है। मैं चुनाव से बचना और खुद को इससे बाहर निकालना चाहती थ क्योंकि मैं कष्ट सहना या कीमत चुकाना नहीं चाहती थी। समूह अगुआ चुने जाने के बाद, मेरा इसे करने का मन नहीं हुआ क्योंकि मैं जानती थी कि यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण कर्तव्य था और मुझ पर बहुत सारे कामों की जिम्मेदारी होगी, इसे अच्छी तरह से करने के लिए मेरी देह को बहुत कष्ट सहना पड़ेगा और मुझे बहुत चिंता करनी पड़ेगी। फिर मैंने इससे मुँह मोड़ने की कोशिश की और अपनी जवानी, अस्थिरता और धोखेबाज स्वभाव का बहाना बनाया, यह कहते हुए कि मैं समूह अगुआ बनने के लायक नहीं थी। परमेश्वर के घर ने मुझे इतने लंबे समय तक विकसित किया था, लेकिन नाजुक समय पर मैंने अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ लिया। मुझमें सचमुच जरा भी अंतरात्मा या विवेक नहीं था। मैं सचमुच बहुत स्वार्थी और धोखेबाज थी! एक सृजित प्राणी के रूप में, मैं वह कर्तव्य भी नहीं करना चाहती थी जो मुझे करना चाहिए था। इस तरह जीने का क्या मतलब है? उस समय, मुझे एक भजन की कुछ पंक्तियाँ याद आईं : “लोग परमेश्वर को जरा-सा आराम भी नहीं पहुँचाते, और अब तक मनुष्यजाति से उसे सच्चा प्रेम नहीं मिला।” मेरे आँसू बहने लगे और मैंने परमेश्वर के वचनों का यह भजन ढूँढ़कर निकाला।

इंसान के लिए परमेश्वर का प्रेम सच्चा और असली है

1  मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम मुख्य रूप से उसके देहधारी होकर किए गए कार्य में, व्यक्तिगत रूप से लोगों को बचाने, लोगों से आमने-सामने होकर बात करने और उनके साथ आमने-सामने जीने में अभिव्यक्त होता है। जरा-सी भी दूरी नहीं, जरा भी दिखावा नहीं; यह वास्तविक है। उसके द्वारा मानवजाति का उद्धार इस प्रकार का था कि वह देहधारी हो सका और दुनिया में इंसानों के साथ दुखदाई वर्ष बिता सका, इन सबका कारण मनुष्यजाति के प्रति उसका प्रेम और दया थी।

2  मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम बिना किसी शर्त के है और यह कुछ नहीं माँगता। वह उन लोगों से बदले में क्या पा सकता है? लोग परमेश्वर के प्रति उदासीन हैं। परमेश्वर से परमेश्वर जैसा बर्ताव कौन कर सकता है? लोग परमेश्वर को जरा-सा आराम भी नहीं पहुँचाते, और अब तक मनुष्यजाति से उसे सच्चा प्रेम नहीं मिला। परमेश्वर निःस्वार्थ भाव से देता रहता है, मुहैया कराता रहता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, क्या तुम मनुष्यजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम जानते हो?

भजन सुनने के बाद, मैं बहुत भावुक हो गई और मुझे थोड़ा अपराध-बोध हुआ। मेरे आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। परमेश्वर का प्रेम बहुत सच्चा और वास्तविक है। परमेश्वर इतना सर्वोच्च, पवित्र और महान है, फिर भी मानवजाति को बचाने के लिए, वह व्यक्तिगत रूप से देहधारी होकर मानव-संसार में आया, भ्रष्ट मानवजाति के साथ रहा, लोगों का पोषण देने और उनकी अगुआई करने के लिए सत्य व्यक्त किया, लोगों का शोधन करने और उन्हें शुद्ध करने के लिए विभिन्न परिवेशों का इंतजाम किया। परमेश्वर मनुष्य के प्रति पूरे दिल से समर्पित है। लेकिन, मैं अपना कर्तव्य निभाने में भारी बोझ उठाने को तैयार नहीं थी और जरा-सी भी कीमत चुकाने या थोड़ा-सा भी कष्ट सहने को तैयार नहीं थी। मुझे लगा कि मैं परमेश्वर की बहुत कर्जदार हूँ। परमेश्वर ने मुझे इतना कुछ दिया था, लेकिन मैंने उसके इरादे के प्रति विचारशीलता नहीं दिखाई और केवल अपने हितों के बारे में सोचा, इस चिंता में अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ लिया कि मेरी देह को कष्ट होगा। मुझमें सचमुच अंतरात्मा ही नहीं थी!

मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम चाहे जो कर्तव्य निभाओ या परमेश्वर से कोई भी आदेश स्वीकार करो, तुमसे उसकी अपेक्षाएँ नहीं बदलतीं। एक बार परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझ लेने के बाद, वह तुम्हारे साथ हो या न हो या वह तुम्हारी जाँच कर रहा हो या न कर रहा हो, तुम्हें उसकी अपेक्षाओं की अपनी समझ के अनुसार अभ्यास करना होगा, अपना कर्तव्य निभाना होगा, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए गए आदेश पूरे करने होंगे। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच उन सभी चीजों के मुखिया बन पाओगे, जिनसे परमेश्वर आश्वस्त है, और वह व्यक्ति बनोगे जो मानक पर खरा उतरता है और उसके आदेशों के लायक है। ... केवल परमेश्वर के वचनों और उसकी जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करो और सत्य के अनुसरण में लग जाओ और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाओ, परमेश्वर के इरादे पूरे करो और परमेश्वर की छह हजार वर्षों की प्रतीक्षा और छह हजार वर्षों की आशा को निराश मत करो। परमेश्वर को थोड़ा दिलासा दो; उसे तुम्हारे अंदर आशा दिखाई दे और उसकी इच्छाएँ तुम में पूरी हों। मुझे बताओ, अगर तुम ऐसा करोगे तो क्या परमेश्वर तुम्हारे साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार करेगा? बिल्कुल भी नहीं!(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, मनुष्य को सत्य का अनुसरण क्यों करना चाहिए)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने महसूस किया कि कैसे परमेश्वर का इरादा है कि हम सत्य का अनुसरण करें, अपने कर्तव्य अच्छी तरह से निभाएँ, परमेश्वर के प्रति समर्पण करें, अपने दिल परमेश्वर को सौंपें, उसके साथ एक मन वाले हों और मानक स्तर के सृजित प्राणी बनें। परमेश्वर सबसे ज्यादा यही देखना चाहता है। जब मैं जिला निर्णायक समूह की अगुआ चुनी गई थी, परमेश्वर को उम्मीद थी कि मैं अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य खोजूँगी और समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर संगति करने का अभ्यास करूँगी। इसके अलावा, उसे यह भी उम्मीद थी कि मैं काम को दिल से लगाऊँगी और जिम्मेदारियों का बोझ उठाऊँगी और अंततः अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाकर, सत्य प्राप्त करके परमेश्वर द्वारा बचाई जा सकूँगी। जब मैं यह समझ गई, तो मुझे गहरी आत्म-ग्लानि महसूस हुई। मुझे परमेश्वर द्वारा दिए गए अवसर को न सँजोने और अपने कर्तव्य को स्वीकार न करने का पछतावा हुआ। मैं कैसे उम्मीद कर रही थी कि परमेश्वर मुझे एक और मौका देगा! मैंने संकल्प लिया कि अगर मुझे एक और मौका मिला, तो मैं निश्चित रूप से समर्पण करूँगी और फिर कभी इस तरह से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह नहीं करूँगी। इसलिए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : “प्रिय परमेश्वर, मैं तुम्हारी सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार हूँ। भविष्य में, मैं कोई भी कर्तव्य स्वीकार करने और उसे अच्छी तरह से करने को तैयार हूँ।” बाद में, ऊपरी अगुआओं ने मेरा इस्तीफा मंजूर नहीं किया और मुझे समूह अगुआ बने रहने दिया। मैं बेहद खुश हुई। परमेश्वर मेरे दिल को जानता था और उसने मुझे एक और मौका दिया था—मुझे इसे सँजोना था! बाद में, मैंने सक्रिय रूप से काम का जायजा लेना शुरू कर दिया और हर रात सभाएँ खत्म होने के बाद, मैं निर्णायक समूह में अपने भाई-बहनों के साथ काम की समस्याओं का सारांश तैयार करती थी। हालाँकि कभी-कभी बहुत काम होता था और मेरी देह थोड़ी थक जाती थी, पर मैंने पहले की तरह अपने कर्तव्य से मुँह नहीं मोड़ा।

2023 में, कुछ कलीसियाओं के पुनर्गठन के कारण अगुआओं और उपयाजकों के लिए चुनाव हो रहे थे और मेरा काम का बोझ बहुत बढ़ गया। मैं हर दिन बहुत देर तक व्यस्त रहती थी। उस दौरान, मुझे बस यही लगा कि यह बहुत ज्यादा झंझट वाला और बहुत थकाऊ काम है। इसके तुरंत बाद, कलीसिया ने एक नए दौर के चुनाव करवाए और मैं इस अवसर का लाभ उठाकर जिला निर्णायक समूह में अपने पद को छोड़ना और इसके बजाय एक हल्का कर्तव्य करना चाहती थी। उस समय, मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपनी देह का खयाल रखना चाहती थी और मैंने अपने दिल में परमेश्वर को पुकारा कि वह मेरी अगुआई करे ताकि मैं सत्य का अभ्यास कर सकूँ। उस समय, परमेश्वर के वचनों के दो भजन मेरे मन में आए।

परमेश्वर मूल्यवान मानता है उनको जो उसकी सुनते और उसका आदेश मानते हैं

परमेश्वर को, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई व्यक्ति महान है या तुच्छ, अगर वह उसे सुन सकता है, उसके निर्देशों और आदेश के प्रति समर्पण करता है, उसके कार्य, उसके संकल्प और उसकी योजना के साथ सहयोग कर सकता है, ताकि उसका संकल्प और उसकी योजना अबाधित रूप से क्रियान्वित और पूरी की जा सके तो परमेश्वर ऐसे आचरण को अपने द्वारा याद रखने योग्य और अपना आशीष प्राप्त करने के योग्य पाता है। परमेश्वर ऐसे लोगों को सँजोता है और वह ऐसे व्यवहार को सँजोता है; वह अपने प्रति लोगों के इस स्नेह और अपने प्रति दिखाए गए इस हृदय को सँजोता है। यह परमेश्वर का रवैया है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

परमेश्वर का ध्यान मनुष्य के हृदय पर है

जब कोई व्यक्ति परमेश्वर का आदेश स्वीकार करता है तो परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे, उसने समर्पण किया है या नहीं, उसने परमेश्वर के इरादे पूरे किए हैं या नहीं और उसने जो किया वह मानक स्तर का है या नहीं। परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह है व्यक्ति का हृदय, न कि ऊपरी तौर पर किए गए उसके कार्य। ऐसी बात नहीं है कि परमेश्वर को किसी व्यक्ति को तब तक आशीष देना चाहिए जब तक वे कुछ करते हैं, इसकी परवाह किए बिना कि वे इसे कैसे करते हैं। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ चीजों के अंतिम नतीजे ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक ज़ोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीजों के आगे बढ़ने के दौरान किसी व्यक्ति का रवैया कैसा रहता है और वह यह देखता है कि उसके हृदय में समर्पण, लिहाज और परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I

परमेश्वर के वचनों ने सचमुच मेरे दिल को छू लिया, खासकर जब मैंने पढ़ा : “परमेश्वर सिर्फ चीजों के अंतिम नतीजे ही नहीं देखता, बल्कि इस पर अधिक ज़ोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है और चीजों के आगे बढ़ने के दौरान किसी व्यक्ति का रवैया कैसा रहता है और वह यह देखता है कि उसके हृदय में समर्पण, लिहाज और परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं।” मैं समझ गई कि परमेश्वर जिसकी परवाह करता है वह मनुष्य का दिल है। जब भी कोई बात होती है, तो परमेश्वर यह देखना चाहता है कि लोगों के दिल परमेश्वर के प्रति समर्पित और विचारशील हैं या नहीं, वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने हितों को छोड़ सकते हैं या नहीं। जब भी मुझ पर कोई महत्वपूर्ण काम आता या मुझे चुनावों का सामना करना पड़ता, तो मैं यह नहीं सोचती थी कि मैं परमेश्वर के इरादों को कैसे पूरा करूँ, केवल यह सोचती थी कि देह के कष्ट से कैसे बचा जाए और कैसे कम जिम्मेदारी ली जाए। मुझमें अंतरात्मा की बहुत कमी थी, मैं कितनी स्वार्थी और नीच थी! अब कलीसिया नए चुनाव करवा रही थी और मुझे कम से कम समर्पण का रवैया तो रखना ही था। अगर मैं चुन ली गई, तो यह परमेश्वर द्वारा मेरा उत्कर्ष होगा। अगर मैं नहीं चुनी गई, तो मेरे लिए सीखने को सबक होंगे। किसी भी हाल में, मुझे समर्पण करना चाहिए। जब मैंने यह सोचा, तो मेरा दिल काफी शांत हो गया और मैंने चुनाव में भाग लिया। अंत में, मैं जिला निर्णायक समूह की सदस्य चुनी गई और मेरा दिल समर्पण कर सका।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और समझ गई कि मैं क्यों लगातार देह का खयाल रखती थी और अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ती थी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “देह की बात करें तो, तुम उसके प्रति जितने अच्छे होगे, यह उतना ही अधिक लालची होगा। थोड़ा कष्ट उठाना उपयुक्त है। जो लोग थोड़ा कष्ट सहते हैं वे सही रास्ते पर चलते हैं और सही काम पर ध्यान देते हैं। यदि देह कष्ट नहीं सहता, आराम में लिप्त रहता है और आराम के माहौल में बढ़ता है, तो लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होगा और संभवतः सत्य भी नहीं मिलेगा। यदि लोगों को प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित आपदाओं का सामना करना पड़ता है, तो वे तर्कहीन और अविवेकपूर्ण हो जाएँगे। जैसे-जैसे समय बीतेगा, वे और अधिक पथभ्रष्ट होते जाएँगे। क्या इसके कई उदाहरण हैं? तुम देख सकते हो कि अविश्वासी दुनिया में कई गायक और फिल्मी सितारे हैं जो मशहूर होने से पहले कष्ट सहने को तैयार थे और उन्होंने खुद को अपने काम के प्रति समर्पित कर दिया था। लेकिन प्रसिद्धि हासिल कर लेने और काफी पैसा कमाना शुरू करने के बाद वे सही रास्ते पर नहीं चलते हैं। उनमें से कुछ नशीली दवाएँ लेते हैं, कुछ आत्महत्या कर लेते हैं और उनका जीवन कम हो जाता है। इसकी वजह क्या है? उनके भौतिक सुख बहुत ऊँचे हैं, वे बहुत आरामदायक हैं और नहीं जानते कि बड़ी खुशी या बड़ा उत्साह कैसे प्राप्त किया जाए। उनमें से कुछ लोग अत्यधिक उत्तेजना और आनंद की तलाश में नशीली दवाओं की ओर चल पड़ते हैं और जैसे-जैसे समय बीतता है वे इसे छोड़ नहीं पाते। कुछ लोग नशीली दवाओं के अत्यधिक सेवन से मर जाते हैं और कुछ लोग इससे छुटकारा पाने के तरीके की जानकारी न होने के कारण अंत में आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं। तुम कितना अच्छा खाते हो, कितने अच्छे कपड़े पहनते हो, कितने अच्छे से रहते हो, कितना आनंद लेते हो या तुम्हारा जीवन कितना आरामदायक है और चाहे तुम्हारी इच्छाएँ किसी भी तरह पूरी होती हों, अंत में सिर्फ खालीपन ही मिलता है और उसका परिणाम विनाश है। क्या अविश्वासी जिस खुशी का अनुसरण करते हैं, वह वास्तविक खुशी है? दरअसल वह खुशी नहीं है। यह एक मानवीय कल्पना है, यह एक प्रकार की पथभ्रष्टता है, यह लोगों को पथभ्रष्ट करने का एक तरीका है। लोग जिस तथाकथित खुशी को पाने की कोशिश करते हैं वह झूठी है। यह वास्तव में पीड़ा है। लोगों को ऐसे लक्ष्य को पाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और जीवन का मूल्य इसी में निहित भी नहीं है। शैतान जिन माध्यमों और तरीकों से लोगों को भ्रष्ट करता है वे उन्हें एक लक्ष्य के रूप में देह की संतुष्टि और वासना में लिप्त होने के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह, शैतान लोगों को सुन्न कर देता है, उन्हें लुभाता और भ्रष्ट कर देता है और उन्हें उस लक्ष्य की ओर ले जाता है जिसे वे खुशी मानते हैं। लोगों का मानना है कि उन चीजों को पाने का मतलब खुशी पाना है, इसलिए लोग उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सब कुछ करते हैं। फिर, जब वे इसे पा लेते हैं, तो उन्हें खुशी नहीं बल्कि खालीपन और दर्द महसूस होता है। इससे सिद्ध होता है कि यह सही मार्ग नहीं है; यह मृत्यु का रास्ता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैंने साझा कि मैं लगातार आराम का लालच इसलिए करती थी क्योंकि मेरे विचारों और दृष्टिकोणों में समस्या थी। छोटी उम्र से ही, मैं समाज और अपने परिवार से बहुत गहराई से प्रभावित हुई थी और उसी साँचे में ढल चुकी थी और मानती थी कि दैहिक सुखों का अनुसरण करना खुद के साथ अच्छा व्यवहार करना है। मैं अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुनती थी : “लोगों को अपने लिए जीना चाहिए, ताकि उनकी देह आरामदायक और सहज रहे। उन्हें दूसरों के लिए नहीं जीना चाहिए। इसी में समझदारी है।” मेरे माता-पिता भी अक्सर कहते थे, “हम चाहे जो भी करें, वह बिना कष्ट या थकान के एक आरामदायक जीवन का आनंद लेने के लिए है। क्या जीने का उद्देश्य जीवन का आनंद लेना नहीं है?” धीरे-धीरे, मैंने इन गलत दृष्टिकोणों को स्वीकार कर लिया। वे मेरे काम करने के सिद्धांत और मेरे अनुसरण के लक्ष्य बन गए। जब मैं स्कूल में थी, तो मैं केवल सरल चीजें पढ़ना चाहती थी। मैं ऐसा कुछ भी नहीं पढ़ना चाहती थी जिसमें दिमागी ताकत की जरूरत हो। उदाहरण के लिए, मैं गणित जैसे विषयों को सीखने में बहुत अनिच्छुक थी, जो मुझे मानसिक रूप से चुनौतीपूर्ण लगते थे। परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद, भले ही मैंने कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाए, फिर भी मैं दैहिक सुखों के पीछे ही भागती रही। मैं अपना कर्तव्य निभाने में भारी बोझ उठाने को तैयार नहीं थी और ऐसे कर्तव्य नहीं करना चाहती थी जिनमें मानसिक प्रयास या दैहिक कष्ट शामिल हो। मैं केवल आसान और हल्के कर्तव्य करना चाहती थी। जैसे ही कठिन कर्तव्य या भारी बोझ उठाने वाले कर्तव्य सौंपे जाते, मैं उनसे मुँह मोड़ना चाहती थी। उदाहरण के लिए, जब मैं पहली बार जिला निर्णायक समूह की अगुआ चुनी गई, क्योंकि मुझे डर था कि समूह अगुआ होने पर बहुत काम करना होगा और मैं शारीरिक रूप से थक जाऊँगी, इसलिए मैंने कई बहाने बनाए और जानबूझकर अपनी भ्रष्टता और कमियों का जिक्र किया ताकि हर कोई इस बात पर सहमत हो जाए कि मैं समूह अगुआ न बनूँ। अगले चुनाव में, मैंने फिर भी अपनी देह का ही खयाल रखा, मैं तो निर्णायक समूह में अपने पद से इस्तीफा देना चाहती थी। मैंने केवल अपने दैहिक हितों के बारे में सोचा, कभी परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता नहीं दिखाई और लगातार अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ती रही ताकि मेरी देह को कष्ट न हो। यह व्यवहार परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना था। अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करती, तो अंत में, न केवल मैं सत्य प्राप्त नहीं कर पाती या अपने भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदल पाती, बल्कि मैं केवल विपत्ति में पड़ जाती और नष्ट कर दी जाती। जैसा कि परमेश्वर ने कहा : “शैतान जिन माध्यमों और तरीकों से लोगों को भ्रष्ट करता है वे उन्हें एक लक्ष्य के रूप में देह की संतुष्टि और वासना में लिप्त होने के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह, शैतान लोगों को सुन्न कर देता है, उन्हें लुभाता और भ्रष्ट कर देता है और उन्हें उस लक्ष्य की ओर ले जाता है जिसे वे खुशी मानते हैं। लोगों का मानना है कि उन चीजों को पाने का मतलब खुशी पाना है, इसलिए लोग उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सब कुछ करते हैं। फिर, जब वे इसे पा लेते हैं, तो उन्हें खुशी नहीं बल्कि खालीपन और दर्द महसूस होता है। इससे सिद्ध होता है कि यह सही मार्ग नहीं है; यह मृत्यु का रास्ता है।” शैतान दैहिक सुखों के अनुसरण से लोगों को ललचाता और भ्रष्ट करता है, जिससे वे यह मानने लगते हैं कि केवल देह को संतुष्ट करने से ही खुशी मिल सकती है। वास्तव में, कोई व्यक्ति कितने भी आराम में क्यों न हो या वह देह का कितना भी आनंद क्यों न ले, वह फिर भी अपने दिल की गहराइयों में खालीपन और दुख महसूस करता है। मैंने हमेशा दैहिक सुखों का अनुसरण किया था और भारी बोझ उठाने वाले कर्तव्य नहीं करना चाहती थी। मैंने सोचा कि इस तरह, मेरे पास आराम करने या अपनी पसंद की चीजें करने के लिए ज्यादा समय होगा। लेकिन अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ने के बाद मेरा दिल बेचैन हो गया और इसके बजाय, मैं गहरे दुख और आत्म-ग्लानि में डूब गई। इस एहसास को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। मैं जानती थी कि मैंने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया था, इसलिए मैंने उसकी उपस्थिति खो दी थी। मैंने अनुभव किया कि दैहिक सुखों का अनुसरण करना सही मार्ग नहीं है और यह केवल लोगों को और अधिक भ्रष्ट बनाएगा और वे परमेश्वर का और अधिक प्रतिरोध करेंगे।

अप्रैल 2024 में, काम की जरूरतों के कारण, मेरी जिम्मेदारी के क्षेत्र से एक प्रचारक को अपना कर्तव्य निभाने के लिए दूसरी जगह भेज दिया गया। मुझे अस्थायी रूप से उसके द्वारा किए जा रहे काम का जायजा लेना था और मैं थोड़ी चिंतित थी। इतना सारा काम करना था—यह बहुत थकाऊ होने वाला था! मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपनी देह का खयाल रखना चाहती थी और मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि तुम मेरी अगुआई करो ताकि मैं समर्पण कर सकूँ। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अभ्यास का एक मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हर वयस्क को एक वयस्क की जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए, चाहे उन्हें कितने भी दबाव का सामना करना पड़े, जैसे मुसीबतें, बीमारियाँ, यहाँ तक कि विभिन्न कठिनाइयाँ भी—ये वे चीजें हैं जो सभी को अनुभव करनी और सहनी चाहिए। ये एक सामान्य व्यक्ति के जीवन का हिस्सा होती हैं। अगर तुम दबाव नहीं झेल सकते, पीड़ा नहीं सह सकते, या झटका नहीं झेल सकते तो इसका मतलब है कि तुममें कोई अटलता या संकल्प नहीं है और तुम बहुत नाजुक और बेकार हो। सभी को—चाहे वे समाज में हो या परमेश्वर के घर में—हर किसी को अपने जीवन में यह कष्ट उठाना ही पड़ता है। यह वह जिम्मेदारी है जो हर वयस्क को उठानी चाहिए, एक ऐसा बोझ जिसे उसे उठाना चाहिए, और इससे कोई नहीं बच सकता। न ही तुम्हें इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए। अगर तुम हमेशा इस सारे कष्ट से बचना या इससे मुक्त होना चाहते हो, तो तुम्हारी दमनकारी भावना उभर आएगी और तुम्हें हमेशा उलझाए रखेगी। हालाँकि अगर तुम यह सब ठीक से समझ और स्वीकार सको, और इसे अपने जीवन और अस्तित्व का एक आवश्यक हिस्सा मानो, तो इन मुद्दों के कारण तुम नकारात्मक भावनाएँ विकसित नहीं करोगे। एक लिहाज से तुम्हें वे जिम्मेदारियाँ और दायित्व निभाना सीखना चाहिए, जो वयस्कों को लेने और उठाने चाहिए। दूसरे लिहाज से तुम्हें अपने रहने और काम करने के परिवेश में दूसरों के साथ सामान्य मानवता के साथ सामंजस्यपूर्वक रहना सीखना चाहिए। बस जैसा चाहे वैसा मत करो। सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का क्या उद्देश्य होता है? यह कि उन कामों, दायित्वों और जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके जो तुम्हें एक वयस्क के रूप में पूरा करना चाहिए। चाहे तुम कोई भी काम या कोई भी कर्तव्य करो, जब खतरे का सामना हो, जब शैतान की शक्तियों की बाधाओं और नुकसान का सामना हो, तो तुम्हें नुकसान को कम-से-कम करने में सक्षम होना चाहिए, ताकि तुम्हारे काम और कर्तव्य के परिणाम बेहतर हों। यही वह चीज है जो संकल्प युक्त व्यक्ति को हासिल करना चाहिए। अगर तुममें सामान्य मानवता है, तो तुम्हें काम करते हुए इसे हासिल करना चाहिए। जहाँ तक काम के दबाव की बात है, चाहे यह ऊपरवाले से आता हो या परमेश्वर के घर से या अगर यह दबाव भाई-बहनों द्वारा तुम पर डाला गया हो, यह ऐसी चीज है जिसे तुम्हें सहन करना चाहिए। तुम यह नहीं कह सकते, ‘दबाव के कारण मैं यह काम नहीं करूँगा। मैं बस अपना कर्तव्य करने और परमेश्वर के घर में काम करने में फुरसत, सहजता, खुशी और आराम तलाश रहा हूँ।’ यह नहीं चलेगा, और यह ऐसा विचार नहीं है जो किसी सामान्य वयस्क में होना चाहिए और परमेश्वर का घर तुम्हारे आराम में लिप्त होने की जगह नहीं है। हर व्यक्ति अपने जीवन और कार्य में एक निश्चित मात्रा में दबाव और जोखिम उठाता है। किसी भी काम में, खास तौर से परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य करते हुए तुम्हें इष्टतम परिणामों के लिए प्रयास करना चाहिए। अधिक बड़े पैमाने पर यह परमेश्वर की शिक्षा और अपेक्षा है। छोटे पैमाने पर यह वह रवैया, दृष्टिकोण, मानक और सिद्धांत है, जो हर व्यक्ति के पास अपने स्व-आचरण और कार्यकलापों में होना चाहिए। जब तुम परमेश्वर के घर में कोई कर्तव्य करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के घर के अनुबंधों और प्रणालियों का पालन करना सीखना चाहिए, और तुम्हें नियम का अनुपालन करना सीखना चाहिए, तमीज के साथ आचरण करना चाहिए। यह व्यक्ति के स्व-आचरण का एक अनिवार्य हिस्सा है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि वयस्कों के रूप में, चाहे परमेश्वर के घर में हों या अविश्वासियों की दुनिया में, हम सभी की अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व होते हैं। यह वह जिम्मेदारी है जो एक सामान्य व्यक्ति को उठानी चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में, भले ही देह को कष्ट सहना पड़ता है, कीमत चुकानी पड़ती है और कुछ दबाव झेलना पड़ता है, ये सभी वे जिम्मेदारियाँ हैं जो वयस्कों को उठानी पड़ती हैं। मैं कष्ट सहने से नहीं डर सकती, न ही कर्तव्यों को कठिन देखकर उनसे मुँह मोड़ सकती हूँ। ऐसा करना तो अंतरात्मा और मानवता की बहुत बड़ी कमी है। इसलिए, मैंने सचेत रूप से देह के खिलाफ विद्रोह करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की और मैं धीरे-धीरे समर्पण करने में सक्षम हो गई।

इस अनुभव के माध्यम से, मैं समझ गई कि भले ही कलीसिया में काम सँभालते समय मेरी देह को कष्ट होता है और थकान महसूस होती है, पर मैंने बहुत कुछ पाया है। मुझे एहसास हुआ कि जब मेरे सामने चीजें आती हैं, तो मुझे सत्य सिद्धांतों को खोजना चाहिए और मेरी मानवता भी बहुत परिपक्व हुई। पहले मैं हमेशा दूसरों पर निर्भर रहती थी, पर अब मैंने स्वतंत्र रूप से काम करना सीख लिया है। जब भाई-बहनों को कठिनाइयाँ या धारणाएँ होती हैं, तो मैं संगति करने और उन्हें हल करने के लिए प्रासंगिक सत्य भी खोज सकती हूँ। भले ही मेरा काम का बोझ पहले से ज्यादा भारी है, पर मैंने बहुत कुछ हासिल किया है और पाया भी है। यह सब परमेश्वर का एक विशेष अनुग्रह है। परमेश्वर का धन्यवाद!

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