एक आध्यात्मिक पुनर्जन्म
याँग झेंग हीलोंगजियाँग प्रांत मैं एक गरीब ग्रामीण परिवार में पैदा हुआ था जो अपनी सोच में पिछड़ा हुआ था। मैं छोटी उम्र से ही घमंडी था और...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
2019 में मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया। उस वक्त मैं मुख्य रूप से वीडियो कार्य देखता था। कुछ टीम अगुआओं से सीखकर मैं धीरे-धीरे वीडियो बनाने के कुछ सिद्धांतों में माहिर हो गया और अपना नजरिया भी विकसित कर लिया। चर्चा के दौरान मेरी कुछ बातों को सबकी स्वीकृति मिल जाती। जैसे-जैसे हमारे वीडियो बेहतर होते गए, दूसरी कलीसियाओं के भाई-बहन भी हमसे सीखने आने लगे। मुझे एक बड़ी उपलब्धि की भावना महसूस हुई, मैं सोचने लगा, “मैं न केवल कलीसिया का कार्य सँभाल सकता हूँ, बल्कि पेशेवर कार्य को भी समझता हूँ और वीडियो निर्माण में समस्याओं का भी पता लगा सकता हूँ। जब सभी किसी चीज पर अटकते हैं तो अक्सर मुझसे सलाह माँगने आते हैं। कुल मिलाकर, सोचता हूँ कि मैं एक योग्य अगुआ हूँ।” बाद में काम न सँभाल पाने पर मेरे सहयोगी भाई को बर्खास्त कर दिया गया और कलीसिया का कार्य करने के लिए बहन लीसा मेरी नई सहयोगी बन गई। मैं हिसाब-किताब लगाने लगा : लीसा सत्य के बारे में मुझसे कहीं ज्यादा अंतर्दृष्टिपूर्ण संगति करती है, लेकिन वीडियो निर्माण कार्य की निगरानी मैं ज्यादा समय से कर रहा हूँ और मुझे अनुभव भी अधिक है। वह मेरे हुनर की बराबरी नहीं कर सकती, वह अपनी कथनी और करनी में भी कुछ ढीली है। कुल मिलाकर बढ़त अब भी मेरे पास थी और अपने काम में मुख्य रूप से मुझे ही मार्गदर्शन करना था। लेकिन लीसा जैसे-जैसे कलीसिया का कार्य समझती गई, वैसे-वैसे वह संगति करने और समस्याओं का समाधान करने में ज्यादा प्रभावी होती गई। भाई-बहन अपने सारे सवाल लेकर उसके पास जाने लगे। जब मैंने देखा कि लीसा अपने काम में मेहनती और जिम्मेदार है और परमेश्वर के वचनों की मुझसे ज्यादा वास्तविक संगति करती है तो मैं अनजाने में ही असुरक्षित महसूस करने लगा। खासकर जब टीम के अगुआ उसके विचारों को अक्सर मंजूरी देने लगे तो मैं उससे और भी ज्यादा जलने लगा। अगर चीजें इसी तरह चलती रहीं तो देर-सबेर सारा ध्यान वही बटोर लेगी और मेरी अहमियत घटती चली जाएगी। मैंने सोचा, ऐसे नहीं चल सकता। उसे मात देने की तरकीब निकालनी जरूरी है। उसके बाद जब हम टीम अगुआओं के साथ कार्य पर चर्चा करते तो मैं सबसे पहले अपने विचार साझा कर देता।
एक बार जब हम वीडियो में किसी समस्या पर चर्चा कर रहे थे तो मैंने सलाह दे डाली, लेकिन दूसरों ने इसे सिद्धांत का मसला नहीं माना और मेरा विचार सिरे से खारिज कर विषय ही बदल दिया। मैंने थोड़ा अपमानित महसूस किया। मैं मूलतः यह दिखाना चाहता था कि मेरा विचार उम्दा और अंतर्दृष्टि युक्त था, मगर अपनी बात समझा क्यों नहीं सका? सबसे अहम मौके पर मैं चूक गया। अपने ही हाथों मात खाकर मैंने दिखा दिया कि मैं लीसा के बराबर भी नहीं हूँ। जब लीसा ने संगति की पेशकश की तो लगा कि मेरी रही-सही इज्जत भी नहीं बची है और मेरी ईर्ष्या बढ़ गई। एक बार चर्चा के बाद, एक टीम अगुआ चुपके से मेरे पास आया और बोला : “इन दिनों तुम थोड़े-से हड़बड़ाए दिखते हो। तुम चर्चा का मुद्दा समझने से पहले ही सबसे पहले बोलने पर तुले रहते हो, इससे हमारी सोच-विचार की प्रक्रिया गड़बड़ा रही है। तब तुम्हें सब कुछ दोबारा समझाना पड़ता है और इससे हमारे काम की प्रगति में देरी हो जाती है। तुम्हें इस पर सोच-विचार करना चाहिए।” यह सुनकर मैं बहुत निराश हुआ। पहले टीम अगुआओं के साथ चर्चा में मेरे ज्यादातर विचार मंजूर कर लिए जाते थे। लेकिन लीसा के आने के बाद से, दूसरों के बीच मेरा दर्जा धीरे-धीरे कम हो चुका था, मेरे कहे की कोई परवाह नहीं करता था और मैं कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी तक पैदा कर रहा था। अगर यह सब चलता रहा तो क्या मैं मुँह दिखाने लायक भी रहूँगा? मैंने आत्म-चिंतन तो किया नहीं, सारा दोष लीसा के सिर पर मढ़ दिया। कई दिनों तक मैं कुढ़ता रहा और मायूसी में डूबता गया और मेरे काम का असर घटता चला गया। एक दिन एक बड़ा अगुआ मुझे बताने आया कि मेरी निगरानी वाले काम का एक हिस्सा लीसा को सौंपा जाएगा। मैं इससे खुश नहीं था, लेकिन कहा कुछ नहीं। मैंने सोचा : “यह काम मिलने के बाद लीसा स्पष्टतया कलीसिया के अधिकांश कार्य की निगरानी कर रही होगी और मैं एक सहायक रहूँगा। कहीं लोग यह न सोचें कि मैं यह काम सँभाल नहीं पाया, इसलिए दूसरे को सौंपा गया? मैं कलीसिया के सारे कार्यों का मुखिया और भागीदार हुआ करता था, लेकिन अब सारा ध्यान लीसा ने खींच लिया है। जब तक वह यहाँ है, मैं हाशिये पर ही रहूँगा।” मैंने इस बारे में जितना सोचा, उतना ही बुरा लगा। मैं भरे मन से अपने कमरे में वापस लौटा और बिस्तर पर निढाल होकर लेट गया, इस नई हकीकत को गले नहीं उतार पाया। लीसा की काबिलियत और कार्यक्षमता मुझसे बेहतर तो नहीं थी। मैंने काफी समय तक वीडियो कार्य की निगरानी की थी और इसमें अनुभवी था तो फिर वह मुझसे बेहतर कैसे साबित हो रही है? मुझे इस तरह नहीं दबाया जा सकता। चाहे जो हो, मुझे अपनी इज्जत और रुतबा दोबारा हासिल करना था! उसके बाद से मैं इसी ताक में रहता कि कब लीसा के काम में कोई विचलन हो और कब मैं अपना पुराना प्रभाव फिर से हासिल करूँ। एक बार टीम अगुआओं के साथ कार्य की चर्चा से पहले लीसा ने मुझसे संपर्क नहीं किया, मुझे बताए बिना काम शुरू कर दिया। मैंने इस मौके का फायदा उठाया और उसके मनमाने क्रियाकलापों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हमला करके अपनी सारी दबी हुई भड़ास निकाल दी। मैंने कहा कि मैं तो मुखौटा भर हूँ, टीम अगुआओं के कार्य में मेरा कोई दखल नहीं बचा है। मेरे बोलते ही, लीसा का चेहरा लाल पड़ गया। इस मौके का इस्तेमाल अपनी भड़ास निकालने के लिए करने के बावजूद मैं अब भी अंदर से बहुत अंधकारमय था। लगभग उसी समय हमारे अगुआ ने एक प्रोजेक्ट की व्यवस्था की, लेकिन कई कारणों से इसमें बहुत कम प्रगति हुई। हकीकत में, इसमें मदद करने के लिए मेरे पास काफी वक्त था, लेकिन मैंने सोचा : “इस प्रोजेक्ट की मुख्य पर्यवेक्षक लीसा है, इसलिए अगर यह ठीक से पूरा हो भी गया तो इसके लिए मुझे कोई श्रेय नहीं मिलेगा। इसलिए लीसा का काम लीसा ही जाने। अगर वह नाकाम हो जाती है तो और भी अच्छा रहेगा—इस तरह लोग उसकी इज्जत करना बंद कर देंगे।” उस दौरान मैं लगातार शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करता रहता था। मैं कलीसिया के कार्य में कोई बोझ नहीं उठाता था और बस खानापूरी करता था। मैं अपने काम में मसले भी हल नहीं कर पाया और इसमें ज्यादा से ज्यादा समस्याएँ आने लगीं। इनका सामना होने पर भी मैंने आत्म-चिंतन नहीं किया और मेरी हताशा बढ़ती गई। मेरा सारा ध्यान अक्सर दूसरों की गलतियों पर लगा रहता था और मैं उन पर चिल्लाता रहता था, कार्य में बाधा डाल रहा था। बड़ी अगुआ को पता चला तो उसने संगति करके मेरी समस्या उजागर की। लेकिन अंदर से मैं बहस कर रहा था, “जिस काम में नतीजे नहीं निकल रहे हैं, उसके लिए अकेले मैं ही जिम्मेदार नहीं हूँ। मुझ पर ही उंगली क्यों उठाई जा रही है?” मुझे न सिर्फ अपने बारे में कोई ज्ञान नहीं था बल्कि मैंने सारा दोष लीसा के ऊपर डाल दिया। मैंने यह शिकायत भी की कि टीम अगुआ सिद्धांतों पर नहीं चले। अगुआ की बार-बार की संगति को स्वीकार न कर पाने और वास्तविक कार्य न करने पर उसने मुझे बर्खास्त कर दिया। बर्खास्त होने के बाद मैं अंदर से खालीपन, वेदना और निराशा से भर गया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और इस स्थिति से सबक लेने के लिए मार्गदर्शन माँगा।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े जिनसे मुझे कुछ आत्म-ज्ञान मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधी चाहे किसी भी समूह में हों, उनके आदर्श वाक्य क्या होते हैं? तुम लोग अपने विचार बताओ। (अन्य लोगों और स्वर्ग के साथ लड़कर बहुत मजा आता है।) क्या यह पागलपन नहीं है? यह पागलपन है। क्या कोई और भी है? (परमेश्वर, क्या वे यह नहीं सोचते कि : ‘सारे ब्रह्मांड का सर्वोच्च शासक बस मैं ही हूँ’? यानी कि वे सबसे ऊपर रहना चाहते हैं और चाहे वे किसी के भी साथ हों, हमेशा उनसे आगे निकलना चाहते हैं।) यह उनके कई विचारों में से एक है। कोई और विचार? (परमेश्वर, मुझे चार शब्द याद आते हैं : ‘विजेता राजा होता है।’ मुझे लगता है कि वे हमेशा दूसरों से बेहतर बनना चाहते हैं और अलग दिखना चाहते हैं, चाहे वे कहीं भी हों और वे सबसे ऊपर रहने की कोशिश करते हैं।) तुम लोगों ने जो कुछ भी कहा है उनमें से ज्यादातर विचारों के प्रकार हैं; किसी प्रकार के व्यवहार का इस्तेमाल करके उनका वर्णन करने की कोशिश करो। यह जरूरी नहीं कि मसीह-विरोधी जहाँ भी हों, वहाँ सबसे ऊँचा स्थान पाना चाहते हों। जब भी वे किसी स्थान पर जाते हैं तो उनके पास एक स्वभाव और एक मानसिकता होती है जो उन्हें इस तरह काम करने के लिए मजबूर करती है। वह मानसिकता क्या है? वह यह है, ‘मुझे प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए! प्रतिस्पर्धा! प्रतिस्पर्धा!’ तीन ‘प्रतिस्पर्धाएँ’ क्यों, एक ही ‘प्रतिस्पर्धा’ क्यों नहीं? (प्रतिस्पर्धा उनका जीवन बन गई है, वे इसी के सहारे जीते हैं।) यह उनका स्वभाव है। वे ऐसे स्वभाव के साथ पैदा हुए थे, जो बेतहाशा अहंकारी है और जिसे नियंत्रित करना मुश्किल है; यानी वे खुद को किसी से भी कम नहीं समझते और बेहद अहंकारी होते हैं। कोई भी उनके इस बेहद अहंकारी स्वभाव को रोक नहीं सकता; वे खुद भी इसे नियंत्रित नहीं कर सकते। इसलिए उनका जीवन लड़ने और प्रतिस्पर्धा करने वाला होता है। वे किसके लिए लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते हैं? स्वाभाविक रूप से, वे शोहरत, लाभ, रुतबे, नाम और अपने हितों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। चाहे उन्हें जिन भी तरीकों का इस्तेमाल करना पड़े, अगर हर कोई उनके प्रति समर्पण करता है और अगर उन्हें अपने लिए लाभ और रुतबा मिलता है तो उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है। प्रतिस्पर्धा करने की उनकी इच्छा कोई अस्थायी मनोरंजन नहीं होती; यह एक प्रकार का स्वभाव है, जो शैतानी प्रकृति से आता है। यह बड़े लाल अजगर के स्वभाव जैसा है, जो स्वर्ग से लड़ता है, पृथ्वी से लड़ता है और लोगों से लड़ता है। अब, जब मसीह-विरोधी कलीसिया में दूसरों से लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते हैं तो वे क्या चाहते हैं? निस्संदेह, वे प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। लेकिन अगर वे रुतबा हासिल कर लेते हैं तो इससे उन्हें क्या फायदा होता है? अगर दूसरे उनकी बात सुनते हैं, उनकी प्रशंसा और आराधना करते हैं तो इसमें उनकी क्या भलाई है? खुद मसीह-विरोधी भी इसे स्पष्ट नहीं कर सकते। वास्तव में उन्हें प्रतिष्ठा और रुतबे का आनंद लेना, हर एक का उन्हें देखकर मुस्कुराना और चापलूसी और खुशामद के साथ अपना स्वागत किया जाना पसंद है। इसलिए हर बार जब कोई मसीह-विरोधी कलीसिया जाता है तो वह एक काम करता है : दूसरों से लड़ना और प्रतिस्पर्धा करना। सत्ता और रुतबा प्राप्त करने के बाद भी उनका काम पूरा नहीं होता। अपने रुतबे की सुरक्षा करने और अपनी सत्ता सुरक्षित रखने के लिए वे दूसरों से लड़ते और प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं। ऐसा वे मरते दम तक करते हैं। इसलिए मसीह-विरोधियों का फलसफा है, ‘जब तक तुम जीवित हो, लड़ना बंद मत करो।’ अगर इस तरह का कोई बुरा व्यक्ति कलीसिया के भीतर मौजूद है तो क्या इससे भाई-बहन के लिए विघ्न डालेगा? उदाहरण के लिए, मान लो कि हर कोई चुपचाप परमेश्वर के वचन खा-पी रहा है और सत्य पर संगति कर रहा है और माहौल शांतिपूर्ण और मनोदशा खुशनुमा है। ऐसे वक्त पर मसीह-विरोधी असंतोष से उबल रहा होगा। वह सत्य पर संगति करने वालों से ईर्ष्या और घृणा करेगा। वह उन पर आक्रमण करना और उनकी आलोचना करना शुरू कर देगा। क्या इससे शांतिपूर्ण माहौल बिगड़ेगा नहीं? वह एक बुरा व्यक्ति है, जो दूसरों को बाधा डालने और उन्हें घिन महसूस कराने आया है। मसीह-विरोधी ऐसे ही होते हैं। कभी-कभी मसीह-विरोधी उन लोगों को नष्ट या पराजित करने की कोशिश नहीं करते, जिनके साथ वे प्रतिस्पर्धा करते और जिन्हें दबाते हैं; अगर वे प्रतिष्ठा, रुतबा, अभिमान और गौरव हासिल कर लेते हैं और लोगों से अपनी प्रशंसा करवा लेते हैं तो उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया होता है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। “तुम प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के लिए जितनी ज़्यादा होड़ करोगे, तुम्हारा दिल उतना ही अंधकारमय होता जाएगा। तुम उनके लिए जितनी ज़्यादा होड़ करोगे, दूसरों के प्रति तुम्हारी ईर्ष्या और तुम्हारी घृणा उतनी ही ज़्यादा बढ़ती जाएगी। तुम उनके लिए और भी ज़्यादा लड़ना चाहोगे और जब तुम उन्हें पाने में असफल हो जाओगे, तो तुम और भी ज़्यादा नफ़रत महसूस करोगे। तुम जितनी ज़्यादा नफ़रत महसूस करोगे, तुम अंदर से उतने ही अधिक अंधकारमय होते जाओगे, तुम्हारे कर्तव्य का निर्वहन उतना ही बदतर होता जाएगा और तुम्हारे कर्तव्य का निर्वहन जितना बदतर होता जाएगा, परमेश्वर के घर के द्वारा तुम्हारा उतना ही कम इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह एक आपस में जुड़ा हुआ, दुष्चक्र है। अगर तुम अपना कर्तव्य कभी भी अच्छे से नहीं निभाते हो तो तुम धीरे-धीरे हटा दिए जाओगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार कर मैंने शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करने के अपने सारे व्यवहारों को याद किया। मैंने जो कुछ उजागर किया वह मसीह-विरोधी स्वभाव है जिसे परमेश्वर ने उजागर किया है। जब से मैंने देखा कि लीसा के नतीजे मुझसे बेहतर हैं और वह भाई-बहनों का सम्मान हासिल कर रही है तो मेरे अंदर यह साबित करने की इच्छा सुलगने लगी कि वह मुझसे बेहतर नहीं है इसलिए मैं उससे हार नहीं सकता था। मैं सिर्फ पासा पलटने की तरकीबें सोचता रहता था। कार्य की चर्चा के दौरान मैं अपने विचार बताने के लिए बीच में कूद पड़ता, खुद को बेहतर दिखाकर लीसा को मात देना चाहता था, यह भी नहीं सोचा कि इससे हमारे काम पर असर पड़ेगा या नहीं। और जब बड़े अगुआ ने मेरा कुछ काम लीसा को सौंप दिया तो मैं यह सोचकर और ज्यादा जलने लगा कि उसने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। फिर मेरा दुर्भावनापूर्ण इरादा दिखने लगा—मैं लीसा के विचलनों और चूकों को लपकने और अपने अंदर की कुंठाएँ निकालने के अवसरों की ताक में रहने लगा, ताकि महज अपने उद्देश्य हासिल कर सकूँ, फिर चाहे मैं उसे कितना ही नुकसान क्यों न पहुँचाऊँ। जब एक खास प्रोजेक्ट रुका पड़ा था तो समस्याएँ जानने और मदद के लिए समय होने के बावजूद मैंने दखल देने की जरूरत नहीं समझी क्योंकि इसकी निगरानी का जिम्मा लीसा के पास था। मैंने उसकी नाकामी और शर्मसार होने तक की तमन्ना की। मैंने देखा कि मुझमें इज्जत और रुतबे की बहुत ज्यादा इच्छा है, मुझमें दया का अभाव है और मैं कलीसिया के कार्य की सुरक्षा बिल्कुल भी नहीं कर रहा हूँ। मैं शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा था, हमेशा दूसरों को पछाड़ने की कोशिश करता था और अपने कर्तव्य में कोई दिमाग नहीं लगा रहा था। मैं जिस काम की निगरानी करता था वह बिल्कुल रुक चुका था और मैं अंधेरे में खो चुका था। इस “प्रतिस्पर्धा” ने मुझे एक दुष्चक्र में फँसा दिया था। जैसे कि परमेश्वर कहता है : “अगर तुम अपना कर्तव्य कभी भी अच्छे से नहीं निभाते हो तो तुम धीरे-धीरे हटा दिए जाओगे।” मैंने कलीसिया का कार्य अस्त-व्यस्त कर दिया और आत्म-चिंतन करने की भी नहीं सोची। अगर मैं इसी तरह रहता तो कौन जानता है मैं गड़बड़ी करने वाले किस व्यवहार में सक्षम हो सकता था। हद से हद, मुझे हटाया जा सकता था। शुक्र है बर्खास्त होने के कारण मेरे कुकर्म समय रहते रुक गए। इसके जरिए परमेश्वर मुझे आत्म-चिंतन कर खुद को जानने का अवसर भी दे रहा था और शोहरत, लाभ और रुतबा पाने की मेरी लालसा और महत्वाकांक्षा के लिए मेरी काट-छाँट कर रहा था। मुझे एहसास हुआ कि यह परमेश्वर का उद्धार था और मेरी रक्षा करने का उसका तरीका था। मैंने परमेश्वर को धन्यवाद कहा और मेरी मनोदशा काफी सुधर गई। मैंने यह व्यक्तिगत संकल्प लिया कि अपना कर्तव्य व्यावहारिक रूप से अच्छी तरह निभाऊँगा और शोहरत के लिए स्पर्धा करना बंद कर दूँगा।
उसके बाद मैं अपने कर्तव्य में और अधिक विनम्र रहने लगा। यहाँ तक कि जब मुझे सामान्य मामलों का कार्य सौंपा जाता था और मामूली-से, अटपटे काम करने होते थे, मैं समर्पण के लिए तैयार रहता, यह जानता था कि परमेश्वर ने पश्चात्ताप करने के लिए मुझे यह अवसर दिया है, इसलिए मुझे जमीन से जुड़कर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। बहुत जल्द, एक नया वीडियो प्रोजेक्ट शुरू किया गया और मैं चौंक पड़ा क्योंकि इसे बनाने के लिए हर किसी ने मुझे ही चुना। मैंने इस अवसर को संजो कर मेहनत और शोध करके संबंधित सिद्धांतों की खोज की। कुछ समय में ही, वीडियो की मूल संरचना अच्छे से बनने लगी और इसे देखकर मैं खुद से काफी खुश रहने लगा। प्रतिष्ठा और रुतबा पाने की मेरी इच्छा ने एक बार फिर जोर मारा। मैंने सोचा : “भले ही मुझे अगुआ के रूप में बर्खास्त कर दिया गया हो, मगर एक प्रतिभाशाली व्यक्ति का दिन जरूर आता है। मुझे इस मौके का फायदा उठाना होगा और अपनी खूबियाँ दिखाकर प्रतिभा साबित करनी होगी। लीसा भले ही सत्य की संगति और समस्याएँ हल करने में मुझसे बेहतर हो, लेकिन पेशेवर हुनर के मामले में तो मैं ही आगे हूँ। अगर मैं समय लगाता हूँ और इस वीडियो को ठीक से बना देता हूँ, तो हर कोई मेरे सुधार को देख लेगा और शायद मैं फिर से अगुआ चुन लिया जाऊँ और लीसा को पीछे छोड़ दूँ।” एक दिन मैंने सुना कि पूरे काम की प्रगति बहुत धीमी है और वीडियो में सिद्धांतों का उल्लंघन होने पर अगुआ ने लीसा की काट-छाँट की है। यह सुनकर मुझे दूसरों के दुःख में सुख मिला, सोचा, “देख लो, मेरी बर्खास्तगी के बाद से वीडियो कार्य में सुधार नहीं है। यह पहले से बिगड़ चुका है। पहले, मैं समस्याओं का पता लगाकर अपने विचार देता था, लिहाजा अगर उनकी रफ्तार रुक जाती है तो अच्छा ही रहेगा। वे समझ जाएँगे कि मैं ही नहीं, लीसा भी अपना काम ठीक से नहीं कर रही थी।” बाद में, मैंने सुना कि लीसा हाल-फिलहाल खराब मनोदशा में थी—सभाओं में उसकी संगति में कोई रोशनी नहीं होती थी और दूसरे लोग समस्याओं से घिरे हुए थे और नकारात्मक हो चुके थे। मैंने मन ही मन सोचा : “अगर ऐसा ही चलता रहा तो शायद वीडियो कार्य में गंभीर समस्या आने से लीसा को बर्खास्त कर दिया जाएगा। हो सकता है कि मुझे अगुआ चुन लिया जाए और मैं इस काम की निगरानी जारी रखूँ।” इसलिए वीडियो कार्य करते हुए मैंने लीसा की स्थिति पर भी करीबी निगाह बनाए रखी। जब मैंने सुना कि काट-छाँट होने से लीसा ने सबक ले लिया है, उसकी दशा सुधर चुकी है, भाई-बहनों ने नाकामियों और झटकों के जरिए कुछ सिद्धांत समझ लिए हैं और अब वे बेहतर नतीजे पा रहे हैं तो मैं बहुत ही निराश और उदास हुआ। खासकर जब एक सभा में, लीसा ने यह संगति की कि उसे इस सबसे क्या लाभ और अनुभव हुआ था और सबकी स्वीकृति प्राप्त कर ली तो मैं और भी अधिक अप्रसन्न हो गया। ईर्ष्या और घृणा भरे विचारों का सैलाब आ गया। ऐसा लगा कि मेरी वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। उसके बाद मेरा उत्साह जाता रहा और वीडियो बनाते हुए मैं खोया-खोया रहने लगा। कुछ दिनों बाद वीडियो बन गया। लेकिन मैं हैरान रह गया जब इसकी समीक्षा के दौरान मेरी अगुआ ने एक बड़ी गलती पकड़ ली। उसने तब इसके संपादन का जिम्मा किसी और को सौंपा और मुझे वीडियो निर्माण जारी नहीं रखने दिया या मुझे अब और कर्तव्य नहीं सौंपे। मुझे काटो तो खून नहीं। वीडियो बनाने के काम के इस मौके के छिन जाने से मेरे दिखावे का साधन भी छिन गया। एक ओर जहाँ बाकी सारे भाई-बहन अपने कर्तव्यों में व्यस्त थे, मेरे पास करने के लिए कुछ नहीं होता था और मैं अजीब ढंग से अलग बैठा रहता था। मुझे बहुत बुरा लगता था—मैं अकेला, मायूस, व्यथित और कष्टों का मारा था। मैंने रोते हुए प्रार्थना की : “प्रिय परमेश्वर, जानता हूँ कि तुम्हारी धार्मिकता के कारण ही मुझे इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। बर्खास्त होने के बाद मैंने सचमुच आत्म-चिंतन करके खुद को नहीं जाना, बल्कि वापसी करने और अपनी अलग पहचान बनाने के तरीके खोजता रहा। मैं दुर्भावनायुक्त और अहंकारी रहा हूँ और मैंने तुममें जुगुप्सा पैदा कर दी है। अब मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा सकता हूँ और कलीसिया में एक मुफ्तखोर बन गया हूँ। हे परमेश्वर, मैं अब शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं रखना चाहता। मुझे प्रबुद्ध करो और अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल करने दो, ताकि मैं खुद से नफरत करके अपने विरुद्ध विद्रोह करूँ और पुराने रास्तों पर चलना छोड़ दूँ।”
इसके बाद, मुझे परमेश्वर के वचनों का एक और अंश मिला : “मसीह-विरोधी अपने रुतबे और प्रतिष्ठा को किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। ये लोग कपटी, चालाक और दुष्ट ही नहीं, बल्कि अत्यधिक क्रूर भी होते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि उनका रुतबा खतरे में है या जब वे लोगों के दिलों में अपना स्थान खो देते हैं, जब वे इन लोगों का समर्थन और स्नेह खो देते हैं, जब लोग उनका आदर-सम्मान नहीं करते और वे बदनामी के गर्त में गिर जाते हैं तो वे क्या करते हैं? वे अचानक शत्रुतापूर्ण हो जाते हैं। जैसे ही वे अपना रुतबा खो देते हैं, वे कोई भी कर्तव्य निभाने के लिए तैयार नहीं होते, वे जो कुछ भी करते हैं अनमने होकर करते हैं और उनकी कुछ भी करने में कोई दिलचस्पी नहीं रहती। लेकिन यह सबसे खराब अभिव्यक्ति नहीं होती। सबसे खराब अभिव्यक्ति क्या होती है? जैसे ही ये लोग अपना रुतबा खो देते हैं और कोई उनका आदर नहीं करता, कोई भी उनसे गुमराह नहीं होता तो उनकी घृणा, ईर्ष्या और प्रतिशोध बाहर आ जाता है। उनके पास न केवल परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं रहता, बल्कि उनमें समर्पण का कोई अंश भी नहीं होता। इसके अतिरिक्त, अपने दिलों में, वे परमेश्वर के घर, कलीसिया, अगुआओं और कार्यकर्ताओं से घृणा करेंगे; वे दिल से चाहते हैं कि कलीसिया के कार्य में समस्याएँ आ जाएँ या वह ठप हो जाए; वे कलीसिया और भाई-बहनों पर हँसना चाहते हैं। वे हर उस व्यक्ति से भी घृणा करते हैं जो सत्य का अनुसरण करता है और परमेश्वर का भय मानता है। वे हर उस व्यक्ति पर हमला करते हैं और उसका मजाक उड़ाते हैं जो अपने कर्तव्य में निष्ठावान है और कीमत चुकाने को तैयार है। यह मसीह-विरोधियों का स्वभाव है—और क्या यह क्रूर नहीं है? ये स्पष्ट रूप से बुरे लोग हैं; मसीह-विरोधी अपने सार में बुरे लोग होते हैं। यहाँ तक कि जब सभाएँ ऑनलाइन आयोजित की जाती हैं और अगर वे देखते हैं कि इंटरनेट सिग्नल अच्छा है, तो वे मन-ही-मन कोसते हैं और कहते हैं : ‘काश, सिग्नल चला जाए! काश, सिग्नल चला जाए! बेहतर है, कोई धर्मोपदेश न सुन पाए!’ ये लोग क्या हैं? (दानव।) वे दानव हैं! वे निश्चित रूप से परमेश्वर के घर के लोग नहीं हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। परमेश्वर उजागर करता है कि कैसे मसीह-विरोधी की प्रकृति क्रूर होती है। ऐसे लोग जैसे ही अपना रुतबा और दूसरों का सहारा गँवाते हैं, वे अपने कर्तव्यों में न केवल खानापूरी करने लगते हैं, बल्कि वे घृणा, ईर्ष्या और प्रतिशोध से भी भर उठते हैं, तड़पते हैं कि कलीसिया के कार्य में समस्याएँ आएँ ताकि वे परमेश्वर के घर और दूसरों पर दुर्भावना के साथ हँस सकें। मैंने देखा कि मेरा व्यवहार भी ठीक वैसा ही था, जैसा परमेश्वर ने उजागर किया। जब मैंने सुना कि लीसा की निगरानी वाले कार्य में मसले पैदा हुए हैं और उसकी काट-छाँट की गई है तो मैंने गुपचुप खुशी मनाई और मैं इस चीज के लिए इंतजार नहीं कर सकता था कि वीडियो निर्माण कार्य में ऐसी कोई गंभीर समस्या आए जो लीसा को बर्खास्त करा दे ताकि मैं उसकी जगह सँभाल सकूँ। जब मैंने सुना कि लीसा की दशा में सुधार आया है, दूसरों ने भी कुछ सीखा है और कलीसिया के कार्य में अनुकूल मोड़ आया है तो मैं नाखुश हो गया। मैं बस मसीह-विरोधी का स्वभाव प्रकट कर रहा था! मसीह-विरोधी, दानव और शैतान ही परमेश्वर और सत्य से घृणा करते हैं, यह चाहते हैं कि कलीसिया का कार्य ठप पड़ जाएगा, हर कोई नकारात्मक हो जाएगा, अपने कर्तव्य छोड़ देगा, परमेश्वर का उद्धार गँवा बैठेगा और आखिरकार उनके साथ नरक में जाएगा। मैं कलीसिया का ऐसा सदस्य हूँ जिसे परमेश्वर के वचनों का इतना अधिक सिंचन और पोषण मिला है, फिर भी मैं सत्य की जगह प्रतिष्ठा और रुतबे को खोजता था, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी की और पश्चात्ताप करने में नाकाम रहा। चूँकि रुतबे के लिए मेरी हवस तृप्त नहीं हुई थी, इसलिए मैंने चाहा कि कलीसिया के कार्य में समस्याएँ उठें ताकि लीसा मुझसे बेहतर नजर न आए। ये दुर्भावनापूर्ण और घिनौने विचार थे। परमेश्वर के घर के लोग परमेश्वर के साथ एकदिल होने चाहिए। और अधिक लोगों को सत्य का अनुसरण करते, अपने कर्तव्य ठीक से निभाते और परमेश्वर के इरादे पर विचार करते देखकर वे खुश होते हैं। जब कलीसिया के कार्य में बाधा आती है तो वे कार्य कायम रखने के लिए एक रुख अपनाते हैं। लेकिन जब मैंने वीडियो निर्माण कार्य में मसले उठते देखे और दूसरों को निराश होते देखा तो मैंने उनके मसलों का समाधान करने में उनकी मदद नहीं की और यहाँ तक कि दुर्भावना से उन पर हँसा। जब उनकी मनोदशाएँ सुधर गईं और वीडियो निर्माण कार्य ने तेजी पकड़ी तो मैं असल में नाखुश था। मेरे विचार वाकई दुर्भावनापूर्ण थे। मैं कलीसिया के कार्य की सुरक्षा बिल्कुल नहीं कर रहा था और परमेश्वर के घर का हिस्सा बनने लायक नहीं था। मैं कैसा बेशर्म था जो अगुआ बनने की सोचता था!
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा जिससे मुझे अपना शैतानी स्वभाव समझने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “लोगों को स्वयं को बहुत पूर्ण, बहुत प्रतिष्ठित, बहुत कुलीन या दूसरों से बहुत भिन्न नहीं समझना चाहिए; यह सब मनुष्य के अभिमानी स्वभाव और अज्ञानता से उत्पन्न होता है। हमेशा अपने आप को दूसरों से अलग समझना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी अपनी कमियाँ स्वीकार न कर पाना और कभी भी अपनी भूलों और असफलताओं का सामना न कर पाना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी भी दूसरों को अपने से श्रेष्ठ नहीं होने देना या अपने से बेहतर नहीं होने देना—ऐसा अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; दूसरों की खूबियों को कभी खुद से श्रेष्ठ या बेहतर न होने देना—यह अभिमानी स्वभाव के कारण होता है; कभी दूसरों को अपने से बेहतर विचार, सुझाव और दृष्टिकोण न रखने देना और दूसरे लोगों के बेहतर होने का पता चलने पर खुद नकारात्मक हो जाना, बोलने की इच्छा न रखना, व्यथित और निराश महसूस करना और परेशान हो जाना—ये सभी चीजें अभिमानी स्वभाव के ही कारण होती हैं। अभिमानी स्वभाव तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा के प्रति रक्षात्मक होने के कारण दूसरों के सुधारों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है, अपनी कमियों का सामना करने तथा अपनी असफलताओं और गलतियों को स्वीकार करने में असमर्थ बना सकता है। इसके अतिरिक्त, जब कोई व्यक्ति तुमसे बेहतर होता है, तो यह तुम्हारे दिल में घृणा और जलन पैदा कर सकता है, और तुम स्वयं को बाधित महसूस कर सकते हो, यहाँ तक कि तुम अपना कर्तव्य करना नहीं चाहते और इसे निभाने में अनमने हो जाते हो। अभिमानी स्वभाव के कारण तुम्हारे अंदर ये व्यवहार और आदतें प्रकट हो जाती हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचनों की रोशनी में मैंने आत्म-चिंतन किया : मेरा हमेशा खुद को काबिल समझने और लीसा से हमेशा होड़ करने का कारण यह था कि मैं बहुत अहंकारी था और मुझमें विवेक नहीं था और नहीं जानता था कि मैं वास्तव में किस मिट्टी का बना हूँ। अब तक यही माना था कि मुझमें पेशेवर ज्ञान था और मैं बहुत अनुभवी हूँ। मुझे इस पर घमंड था और खुद को लीसा से मजबूत मानता था। मुझे लगता था कि काम ठीक से पूरे करने के लिए ये योग्यताएँ काफी हैं, इसलिए जब लीसा को अपने कर्तव्य में मुझसे बेहतर नतीजे मिले और उच्चतर अगुआ ने मेरे कुछ कर्तव्य उसे सौंप दिए तो मैं असंतोष से भर गया, सोचने लगा कि वह मुझसे बिल्कुल भी बेहतर नहीं है। बर्खास्त होने के बाद भी मैंने वापसी करनी चाही। दोबारा सोचने पर, मैंने देखा कि काम में मैं बस थोड़ा-सा ज्यादा जानकार और अनुभवी हूँ और वीडियो बनाने में सलाह दे सकता हूँ, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि मैं अगुआ के कार्य के लिए उपयुक्त था। एक अगुआ का मुख्य काम दूसरों को परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की राह दिखाना और कलीसिया में होने वाली सभी समस्याओं को हल करना है ताकि इसका काम सामान्य गति से चलता रहे। लेकिन मैं वह वास्तविक कार्य नहीं कर सका जो एक अगुआ को करना चाहिए। जब टीम अगुआ आपस में उलझते, अक्सर बहस करते और कोई भी झुकने को राजी नहीं होता तो मैं समस्या हल करने और सद्भावनापूर्ण ढंग से सहयोग करने के लिए मदद करने के लिए सत्य की संगति करना नहीं जानता था। यही नहीं, जब कुछ भाई-बहन अपने कर्तव्यों में नकारात्मक और निष्क्रिय हो गए और उन्हें सहारा देने के लिए परमेश्वर के वचनों की संगति की जरूरत थी तो मेरे अनुभव में कमी थी, मेरी संगति में गहराई की कमी थी और मैं उनके मसलों का समाधान नहीं करता था। कलीसिया के काम के सभी पहलुओं में मैं मानकों पर खरा नहीं उतरता था। हो सकता है कि लीसा की पेशेवर कुशलता में कुछ कमियाँ रही हों, लेकिन वह कलीसिया के काम में आने वाली कुछ दिक्कतें हल कर सकती थी। बड़े अगुआ ने कलीसिया की खातिर ही उसे कुछ काम सौंपा था, लेकिन मैं बड़ा अहंकारी था और मुझे अपनी क्षमताओं की अच्छी समझ नहीं थी। मैं लीसा के आसपास कहीं नहीं टिकता था, फिर भी खुद को बेहतर मानकर पीछे हटने को तैयार नहीं था और हमेशा होड़ करता रहता था। मैं ऐसा मतिहीन अहंकारी था! उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को पढ़ा : “जब लोग रुतबे के पीछे भागते हैं तो परमेश्वर को इससे सबसे अधिक घृणा होती है, क्योंकि रुतबे के पीछे भागना शैतानी स्वभाव है, यह एक गलत मार्ग है, यह शैतान की भ्रष्टता से पैदा होता है, परमेश्वर इसे दोषी ठहराता है और परमेश्वर इसी चीज का न्याय और शुद्धिकरण करेगा। लोगों के रुतबे के पीछे भागने से परमेश्वर को सबसे ज्यादा घृणा है और फिर भी तुम अड़ियल बनकर रुतबे के लिए होड़ करते हो, उसे हमेशा सँजोए और संरक्षित किए रहते हो, उसे हासिल करने की कोशिश करते रहते हो। क्या इन सभी में थोड़ा-सा परमेश्वर-विरोधी होने का गुण नहीं है? लोगों के लिए रुतबे को परमेश्वर ने नियत नहीं किया है; परमेश्वर लोगों को सत्य, मार्ग और जीवन प्रदान करता है, ताकि वे अंततः मानक स्तर के सृजित प्राणी, एक छोटा और नगण्य सृजित प्राणी बन जाएँ—वह इंसान को ऐसा व्यक्ति नहीं बनाता जिसके पास रुतबा और प्रतिष्ठा हो और जिस पर हजारों लोग श्रद्धा रखें। और इसलिए इसे चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से देखा जाए, रुतबे के पीछे भागने का मतलब बरबादी के रास्ते पर चलना है। रुतबे के पीछे भागने का तुम्हारा बहाना चाहे जितना भी उचित हो, यह मार्ग फिर भी गलत है और परमेश्वर इसे स्वीकृति नहीं देता। तुम चाहे कितना भी प्रयास करो या कितनी बड़ी कीमत चुकाओ, अगर तुम रुतबा चाहते हो तो परमेश्वर तुम्हें वह नहीं देगा; अगर परमेश्वर तुम्हें यह नहीं देता है तो तुम उसे पाने की लड़ाई में नाकाम रहोगे और अगर तुम लड़ाई करते ही रहोगे तो उसका केवल एक ही परिणाम होगा : तुम्हें बेनकाब करके हटा दिया जाएगा—तुम बरबादी के रास्ते पर चल पड़ोगे” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। इसे पढ़कर मैं अपनी करतूतों से डर गया, खास तौर पर यह अंश पढ़ने के बाद : “अगर तुम रुतबा चाहते हो तो परमेश्वर तुम्हें वह नहीं देगा; अगर परमेश्वर तुम्हें यह नहीं देता है तो तुम उसे पाने की लड़ाई में नाकाम रहोगे और अगर तुम लड़ाई करते ही रहोगे तो उसका केवल एक ही परिणाम होगा : तुम्हें बेनकाब करके हटा दिया जाएगा—तुम बरबादी के रास्ते पर चल पड़ोगे।” परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि कैसे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अपमान नहीं किया जा सकता। कलीसिया ने मुझे यह कर्तव्य निभाने का मौका दिया था, ताकि मैं अपने कर्तव्य में सत्य का अनुसरण करूँ और आखिर में एक मानक स्तर का सृजित प्राणी बनूँ। लेकिन मैं लगातार रुतबे की होड़ में लगा रहा। क्या मैं जानबूझकर परमेश्वर की अपेक्षाओं के विरुद्ध नहीं जा रहा था? परमेश्वर इससे अधिक घृणा और किसी से नहीं करता। लंबे समय से वीडियो-कार्य के लिए जिम्मेदार होने के बावजूद, मेरे पास बस कार्य के तकनीकी पहलू के बारे में सैद्धांतिक आधार था और मैं इसमें बहुत कुशल नहीं था, इसलिए जब मुझे वास्तव में वीडियो बनाने को कहा गया तो मैं इसे ठीक से नहीं बना सका। मेरे अगुआ रहते जब हमें वीडियो कार्य में अच्छे नतीजे मिले तो यह सब पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और हमारी टीम के प्रयासों का फल था, मेरे योगदान का नतीजा नहीं। लेकिन मैं इन उपलब्धियों को ताज की तरह सिर पर सजाए रखता था ताकि लोग मेरी चमक न छीन लें, मैं हमेशा शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करता रहा और कलीसिया का काम पूरी तरह बिगाड़ दिया। मैंने जो कुछ किया वह बुरा था, परमेश्वर के विरुद्ध और घिनौना था। तभी, मैंने एक बहन को याद किया जो साल भर पहले मेरी सहयोगी थी। उसमें रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए तीव्र इच्छा थी और अपने सामर्थ्य से चिपकी रहती थी। जो कोई उसके रुतबे के लिए खतरा बनता, वह उसे दबा देती और उसे सताती थी और वह अपने रुतबे की रक्षा के लिए कलीसिया का कार्य बिगाड़ने में भी देर नहीं लगाती थी। बदले में, वह अपनी सभी बुराइयों के लिए मसीह-विरोधी के रूप में प्रकट की गई थी और निष्कासित कर दी गई थी। जहाँ तक मेरी बात है, मैं साफ तौर पर वास्तविक कार्य न करके भी होड़ करना चाहता था, जिससे कलीसिया के काम में विघ्न-बाधा आई। अगर मैं पश्चात्ताप न करता और इसी तरह जीता रहता तो परमेश्वर के हाथों निकाले जाने की पूरी संभावना थी। यह बोध होने पर मैंने प्रार्थना की : “हे परमेश्वर, कलीसिया ने मुझे अगुआ के रूप में प्रशिक्षण पाने का अवसर दिया, लेकिन मैंने अपने कर्तव्य नहीं निभाए, सही रास्ते पर नहीं चला, बल्कि शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करता रहा। मेरे सभी विचार और कर्म बुराई से भरे हैं और अगर मुझे दंडित किया जाता है तो मैं इसका पूरा हकदार होऊँगा। प्यारे परमेश्वर, मैं ऐसी घिनौनी जिंदगी नहीं जीना चाहता। मैं पश्चात्ताप करके नई शुरुआत करने को तैयार हूँ।”
कई दिनों बाद, अगुआ ने संदेश भेजा कि मुझे एक भजन के वीडियो में एक भूमिका सौंपी गई है और पहले मुझे भजन सीख लेना चाहिए। संदेश देखकर मैं बहुत खुश हो गया। मैंने एक और मौका देने पर तहेदिल से परमेश्वर को धन्यवाद कहा। मुझे जो भजन याद करना था उसका नाम है “परमेश्वर का मानवजाति को सँजोना।” मैंने भजन में परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “यद्यपि जिन लोगों से नीनवे का नगर भरा हुआ था वे बिल्कुल सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, दुष्ट और हिंसक थे, किंतु उनके पश्चात्ताप के कारण परमेश्वर का मन बदल गया और उसने उन्हें नष्ट न करने का फैसला किया। क्योंकि वे परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति जिस तरीके से पेश आते थे वह एक ऐसे रवैये को दर्शाता था जो सदोम के नागरिकों के रवैये के बिल्कुल विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके वास्तविक समर्पण और वास्तविक पश्चात्ताप और साथ ही साथ समस्त पहलुओं में उनके सच्चे और हार्दिक व्यवहार के कारण, उनके लिए परमेश्वर का स्नेह एक बार फिर उसके दिल से आया और उसने यह उन्हें प्रदान कर दिया। परमेश्वर मानवजाति को जो प्रदान करता है उस चीज को दोहरा पाना और उसके मानवजाति को संजोए जाने को दोहरा पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है; किसी भी व्यक्ति में परमेश्वर की दया, उसकी सहिष्णुता या मानवजाति के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ नहीं होती हैं” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। परमेश्वर के वचनों से मैंने मानवजाति को बचाने के उसके इरादे जाने। नीनवे के लोगों की भ्रष्टता और बुराई से क्रुद्ध होकर परमेश्वर उन्हें नष्ट करने चला था, लेकिन जब नीनवे वासियों ने सच्चे मन से पश्चात्ताप किया तो परमेश्वर ने अपना कोप शांत कर उन्हें नष्ट नहीं किया। इससे मुझे बोध हुआ कि परमेश्वर लोगों के सच्चे पश्चात्ताप को अहमियत देता है। कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी करने और उसे बाधित करने का अपराध करने के बावजूद परमेश्वर ने मुझे नहीं हटाया। उसने मेरी बर्खास्तगी और काट-छाँट का प्रयोग मुझे आत्म-चिंतन के लिए बाध्य करने में किया। यह सब परमेश्वर का उद्धार था। मैं पछतावे और निराशा की जिंदगी जीते रहना नहीं चाहता था। मुझे परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप कर सत्य खोजना था और अपना भ्रष्ट स्वभाव दूर करना था ताकि आगे से कोई बुरा कर्म न करूँ और परमेश्वर का विरोध न करूँ।
एक बार मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे अभ्यास मार्ग दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रतिष्ठा और रुतबे को त्यागना आसान नहीं है—लोग इसे केवल सत्य का अनुसरण करके हासिल कर सकते हैं। सत्य को समझकर ही वे खुद को जान सकते हैं, शोहरत, लाभ और रुतबे का अनुसरण करने का खोखलापन स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और मानवजाति की भ्रष्टता का सत्य साफ तौर पर देख सकते हैं। जब लोग सचमुच खुद को जान लेते हैं केवल तभी वे रुतबे और प्रतिष्ठा को त्याग सकते हैं। अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग पाना आसान नहीं है। अगर तुमने यह स्वीकार कर लिया है कि तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तुममें बहुत अधिक कमियाँ हैं और तुम बहुत अधिक भ्रष्टता प्रकट करते हो, फिर भी तुम सत्य का अनुसरण करने में कोई प्रयास नहीं झोंकते हो और तुम छद्मवेश धारण करते हो और पाखंड में लिप्त होते हो, इससे लोगों को यह गलत विश्वास दिलाते हो कि तुम कुछ भी कर सकते हो तो यह तुम्हें खतरे में डाल देगा और देर-सवेर एक ऐसा समय आएगा जब तुम दीवार से टकराओगे और गिर पड़ोगे। तुम्हें स्वीकारना चाहिए कि तुम्हारे पास सत्य नहीं है और तुम्हें वास्तविकता का सामना करने के लिए पर्याप्त बहादुर होना चाहिए। तुममें कमजोरी है, तुम भ्रष्टता प्रकट करते हो और तुममें तमाम तरह की कमियाँ हैं। यह सामान्य है, क्योंकि तुम एक सामान्य व्यक्ति हो, तुम अतिमानव या सर्वशक्तिमान नहीं हो और तुम्हें यह स्वीकार करना चाहिए। ... जब तुममें रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करने की निरंतर सोच और इच्छा होती है तो तुम्हें पता होना चाहिए कि अगर इस तरह की मनोदशा को अनसुलझा छोड़ दिया जाए तो कैसे बुरे परिणाम हो सकते हैं। इसलिए समय बर्बाद न करते हुए सत्य खोजो, रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करने की इच्छा पर प्रारंभिक अवस्था में ही काबू पा लो और इसके स्थान पर सत्य का अभ्यास करो। जब तुम सत्य का अभ्यास करने लगोगे तो रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा करने की तुम्हारी इच्छा और महत्वाकांक्षा कम हो जाएगी और तुम कलीसिया के काम में बाधा नहीं डालोगे। इस तरह परमेश्वर तुम्हारे क्रियाकलापों को याद रखेगा और उन्हें स्वीकृति देगा” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि प्रतिष्ठा और रुतबे की अपनी इच्छा को सचमुच दरकिनार करने के लिए पहले मेरे पास आत्म-ज्ञान होना चाहिए, मुझे अपनी गलतियाँ सक्रिय रूप से अनावृत्त और स्वीकार कर पाना चाहिए और दूसरों को मेरी असली स्थिति देखने देनी चाहिए। जब होड़ करने की इच्छा दोबारा जोर मारे तो मुझे सचेत होकर परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी, खुद के खिलाफ विद्रोह करना और दूसरों के साथ सहयोग करना होगा। तभी मैं अच्छे से अपना कर्तव्य निभा सकता हूँ। मुझे एहसास हुआ कि मैंने चिंतन और आत्म-ज्ञान पर ध्यान नहीं दिया। मैं बहुत ईर्ष्यालु बन गया और अपनी मनोदशा के बारे में खुलकर नहीं बताता था, समाधान के लिए सत्य भी नहीं खोजता था। लिहाजा, मैं शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करने की मनोदशा में जी रहा था, कलीसियाई जीवन में बाधाएँ खड़ी कर रहा था। आगे से मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार चलना था। उसके बाद से, मैं अपने कर्तव्य में अपनी मनोदशा के बारे में सचेत होकर खुलने लगा और अपने सहयोगियों से सीखने के लिए सक्रिय होकर प्रयास करने लगा। कुछ समय बाद, मैंने देखा कि भाई-बहनों में कुछ न कुछ ऐसी खूबियाँ थीं, जो मुझमें नहीं थीं। अपने अहंकार और अज्ञानता पर मुझे और भी शर्म आई। अतीत के बारे में सोचने लगा कि मैंने शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करने में लगे रहकर कैसे कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाया, इससे मुझे और अधिक पछतावा हुआ। मैंने शांत होकर प्रार्थना की : “हे परमेश्वर, प्रकट और बर्खास्त किए जाने के जरिए मैंने थोड़ी-सी जागरूकता प्राप्त की है। पहले, मैं शोहरत के लिए प्रतिस्पर्धा करने में लगा रहता था और कलीसिया के हितों की रक्षा नहीं करता था। मैंने कलीसिया के काम में बाधा डाली, अपने भाई-बहनों को भी नुकसान पहुँचाया। मैं सच में इंसान कहलाने लायक नहीं हूँ! आगे से अपने काम में, मैं तुम्हारे वचनों के अनुसार अभ्यास करने, दूसरों की खूबियों से सीखने और अपने कर्तव्य में दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण सहयोग करने के लिए तैयार हूँ।”
बाद में, एक नए वीडियो प्रोजेक्ट में कुछ समस्याएँ सामने आईं तो बड़े अगुआ ने मुझे और लीसा को मिलकर इनके समाधान का जिम्मा सौंपा। इस बार की साझेदारी में मैंने लीसा के साथ होड़ नहीं की। इसके बजाय, जब समस्याएँ आईं तो सक्रिय होकर उससे चर्चा की, राय ली और तभी आगे बढ़े जब हम दोनों सहमत हो गये। कभी-कभी जब लीसा की संगति मुझसे अधिक स्पष्ट और गहरी समझ वाली होती तो मैं अनजाने में ही खुद को साबित करने में जुट जाता था। लेकिन तुरंत ही मुझे फिर से होड़ करने का एहसास होता और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता और अपने खिलाफ विद्रोह करता था, लीसा के सुझाव स्वीकार करता था और उन पर लगनपूर्वक चिंतन और खोज करता था। मैंने जाना कि लीसा के विचार वाकई मुझसे बेहतर थे और मैं उन्हें तहेदिल से स्वीकारने लगा। इस तरह अभ्यास कर मैंने वाकई शांत और सहज महसूस किया। परमेश्वर के वचनों ने मुझे सिखाया कि कैसे अच्छे से सहयोग करें और रत्तीभर मानवता के समान जिएँ।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
याँग झेंग हीलोंगजियाँग प्रांत मैं एक गरीब ग्रामीण परिवार में पैदा हुआ था जो अपनी सोच में पिछड़ा हुआ था। मैं छोटी उम्र से ही घमंडी था और...
लू हेंग, चीनअप्रैल 2023 में, मुझे अगुआओं से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया था कि मेरा स्वभाव घमंडी है और मैं लोगों का चयन और नियुक्ति करते समय...
चेन मियाओ, चीनमैंने 2006 में परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। तब से मैं कलीसिया में अगुआ और कार्यकर्ता के रूप में सेवा करती रही...
काओशेन, चीन2016 के अंत में मैंने कलीसिया के कार्य में बहन यी शिन के साथ सहयोग किया। कुछ समय तक साथ कार्य करने के बाद मैंने पाया कि यी शिन...