सत्य का अनुसरण कैसे करें (12) भाग चार
III. तीसरी विशेषता : भ्रमित होना
विरूपित समझ होने और सुन्न होने, इन दो विशेषताओं के अलावा पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों की एक और विशेषता यह होती है कि वे विशेष रूप से भ्रमित होते हैं। अतीत में जब हमने सत्य पर संगति की थी तब हमने सिर्फ व्यापक रूपरेखा और दिशा के बारे में ही बात की थी—यह संगति अपेक्षाकृत सामान्य थी। जहाँ तक सत्य के विभिन्न विवरणों का प्रश्न है, हमने उन पर विशिष्ट रूप से संगति नहीं की थी, बल्कि सिर्फ कुछ वैचारिक कथनों और विषय-वस्तु पर ही चर्चा की थी। संगति के इन वर्षों में सत्य के विभिन्न पहलुओं पर विशिष्ट रूप से और विस्तार से संगति की गई है। लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग जब अब संगति में बोले जा रहे शब्दों को सुनते हैं तब उन्हें लगता है कि वे करीब-करीब वही हैं जो इससे पहले की संगति में बोले गए थे और बस बातों को पेश करने के तरीके कुछ हद तक बदल गए हैं, विषय-वस्तु कुछ हद तक पहले से समृद्ध हो गई है और पहले की तुलना में संगति की मात्रा काफी बढ़ गई है। और इसलिए वे चकित हैं कि ऐसा क्यों है कि सुनने के इस लंबे समय में वे बस लगातार और उलझन में पड़ते जा रहे हैं। उन्होंने बहुत सारे वर्षों से धर्मोपदेश सुने हैं, लेकिन उन्होंने इससे कुछ भी प्राप्त नहीं किया है। जब यह बात आती है कि कैसे आचरण करना है, दूसरों से कैसे पेश आना है, खुद को कैसे जानना है, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करना है और विशेष रूप से, परमेश्वर और उसके वचनों से कैसे पेश आना है तब शुरू से ही वे इन चीजों को समझने में असमर्थ रहे हैं और अब भी वे इन्हें समझ नहीं सकते। यह कोई मामूली स्तर का भ्रमित होना नहीं है, बल्कि गंभीर स्तर का भ्रमित होना है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्य के विभिन्न पहलुओं को कितने विशिष्ट रूप से समझाया जाता है, वे इन सभी को आपस में मिला देते हैं। सिर्फ कुछ नारों और धर्म-सिद्धांतों पर ही उनकी पकड़ बनती है, जैसे कि “हमें परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए, परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करना चाहिए!” वे कुछ विनियमों, नारों और सिद्धांतों से चिपके रहते हैं और सोचते हैं कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। जितनी ज्यादा विशिष्टता से तुम संगति करते हो, वे उतने ही ज्यादा चकरा जाते हैं और उतना ही ज्यादा उन्हें महसूस होता है कि यह उनकी समझ से परे है, यह पहले ही बेहतर था जब संगति सरल हुआ करती थी। इसके अलावा, व्याख्या जितनी ज्यादा विस्तृत होती है, उन्हें उतनी ही ज्यादा मुश्किलें आती हैं : “मैं इतनी विस्तृत चीज को कैसे याद रख सकता हूँ? पहले अभ्यास करना बहुत सरल हुआ करता था। ऐसा क्यों है कि अब जितनी ज्यादा संगति होती है, उतने ही ज्यादा कथन होते हैं? ऐसा क्यों है कि जितना ज्यादा कहा जाता है, उतना ही कम मैं जानता हूँ कि अभ्यास कैसे करना है? कर्तव्य करना बहुत आसान हुआ करता था—यह बस छोड़ देना, खुद को खपाना, भाग-दौड़ करना, सुसमाचार का खूब प्रचार करना और परमेश्वर की खूब गवाही देना था। अब सत्य के बाकी सभी पहलुओं की तरह कर्तव्य करने के बारे में सत्यों को भी विस्तार से समझाया गया है, लेकिन इन चीजों को जितना ज्यादा समझाया जाता है, मुझे ये चीजें उतनी ही कम समझ आती हैं और उतनी ही ये मेरी समझ से परे होती हैं।” व्याख्या जितनी ज्यादा विस्तृत होती है, ये सत्य उनकी समझ से उतने ही ज्यादा परे होते हैं—क्या यह भ्रमित होना नहीं है? वे बुरी तरह से भ्रमित हैं, है ना? हालाँकि सत्य के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझा दिया गया है, फिर भी वे कुछ वैचारिक और पारिभाषिक पदों को लेकर अभी भी उलझन में हैं और भ्रमित हैं। उदाहरण के लिए, वे न तो जानते हैं और न ही यह असलियत देख सकते हैं कि बुरे लोग क्या होते हैं या नकली अगुआ क्या होते हैं; वे यह भी नहीं जानते हैं कि अच्छी मानवता क्या होती है और बुरी मानवता क्या होती है और न ही वे सत्य-सिद्धांतों का अभ्यास करने और विनियमों का पालन करने के बीच का अंतर जानते हैं। ये सभी विशिष्ट मुद्दे उनके लिए पूरी तरह से उलझे हुए हैं। यहाँ तक कि उन्हें ये वैचारिक चीजें भी समझ नहीं आती हैं—उनकी सोच अव्यवस्थित है। इसके अलावा, वे चाहे जो भी करें, उन्हें सिद्धांत नहीं मिलते, उनके पास अनुसरण करने के लिए चरण नहीं होते हैं, कोई ठोस योजना नहीं होती है और उन्हें यह नहीं पता होता है कि उन्हें कौन-सी विधियाँ अपनानी चाहिए या क्या नतीजे प्राप्त करने चाहिए; वे यह भी स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं कि किसी विशेष तरीके से कार्य करने के क्या नतीजे होंगे। वे मन में सोचते हैं, “मैं इन चीजों की चिंता क्यों करूँ? अगर मुझे नहीं पता कि किसी चीज को कैसे करना है तो मैं उसे बस आँख मूँदकर कर डालूँगा—जो भी हो, जब तक मेरा दिल परमेश्वर के प्रति ईमानदार है तब तक यह काफी है।” देखो, ऐसे लोग हद से ज्यादा भ्रमित होते हैं, है ना? वे कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखते आए हैं, फिर भी उन्हें नहीं पता कि वे सत्य के किन पहलुओं को समझने लगे हैं और न ही उन्हें यह पता है कि उन्होंने सत्य का अभ्यास किया है या नहीं। इस बारे में पूछे जाने पर कि क्या उनके पास जीवन प्रवेश है, वे कहते हैं, “ऐसा है, मैं कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखता आया हूँ और मैंने अपना परिवार छोड़ दिया है।” वे इन सब चीजों के बारे में अस्पष्ट हैं—यह बुरी तरह से भ्रमित होना है। सभाओं में गाने और नृत्य करने के दौरान उनमें भरपूर ऊर्जा होती है, लेकिन जब सत्य पर धर्मोपदेशों और संगति का समय आता है तब वे ऊंघने लगते हैं, उन्हें नींद घेरने लगती है और हो सकता है कि वे सो भी जाएँ। जब कार्य करने की बात आती है तब वे प्रयास करने को तैयार रहते हैं और कहते हैं, “आओ, हम अपने कर्तव्य अच्छी तरह से करें और परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा अर्पित करें!” लेकिन जब सत्य पर संगति करने की बात आती है तब अगर उनसे पूछा जाता है, “क्या तुमने हाल ही में कोई लाभ प्राप्त किया है? क्या तुमने पहचान लिया है कि तुमने कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए हैं? उन्हें पहचान लेने के बाद क्या तुमने उन्हें हल करने का कोई मार्ग ढूँढ़ लिया है?” तो वे उत्तर देते हैं, “पता नहीं। मैंने उन्हें थोड़ा-सा पहचान लिया है, लेकिन मुझे नहीं पता कि मैंने जो पहचाना है वह सही है भी या नहीं। दोनों ही सूरतों में, मैं बस आगे बढ़ा और वैसे ही अभ्यास कर लिया, लेकिन मुझे नहीं पता कि यह सटीक था भी या नहीं।” वे किसी भी चीज की असलियत नहीं देख सकते हैं और उनका मन भ्रमित और अस्पष्ट रहता है। उन्हें नहीं पता कि वे किसमें निपुण हैं और न ही वे जानते हैं कि उनमें किस चीज की कमी है। भ्रष्ट स्वभावों को जानने लगने के बारे में संगति के दौरान वे मान लेते हैं कि उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं, कि वे झूठ भी बोलते हैं और कभी-कभी ढुलमुल होते हैं और कामचोरी करते हैं। लेकिन वास्तविक परिस्थितियों से सामना होने पर अगर तुम उनसे पूछते हो, “तुमने क्यों ढुलमुल ढंग से कार्य किया और कामचोरी की? तुमने चालबाजी क्यों की?” तो वे कहते हैं, “मैंने नहीं किया! मैंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया—मुझे लगा कि इसे करने का यही उचित तरीका है, इसलिए मैंने इसे ऐसे किया।” मान लो कि कोई उन्हें उजागर कर देता है और कहता है, “तुमने सोचा कि इसे उस तरीके से करना उचित है, लेकिन क्या तुम्हारे भीतर कोई व्यक्तिगत इरादे या योजनाएँ थीं? क्या तुम जानते हो कि आत्म-चिंतन कैसे करना है? क्या तुम जानते हो कि इसे उस तरीके से करने के क्या नतीजे सामने होंगे?” वे जवाब देते हैं, “जब तक मेरे इरादे बुरे नहीं होते तब तक यह ठीक है।” “क्या बुरे इरादे नहीं होना सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के समान है?” “मैं नहीं जानता।” वे कुछ भी नहीं जानते। उन्होंने बहुत सारे सत्य और बहुत सारी संगति सुनी है, और अपने दैनिक जीवन में उनका ऐसे सभी तरह के मुद्दों से सामना हुआ है जो सत्य से संबंधित हैं, लेकिन वे अभी भी हर सत्य के बारे में अस्पष्ट और धुँधले हैं। वे यह नहीं बता सकते हैं कि कौन-सी चीजें सत्य हैं और कौन-सी नहीं, और न ही वे यह जानते हैं कि स्थितियों से सामना होने पर सत्य का अभ्यास कैसे करना है। वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि उनके क्रियाकलाप और व्यवहार सत्य-सिद्धांतों से मेल खाते हैं या नहीं और वे चीजों को बस ऐसे किसी भी तरीके से करते हैं जो उन्हें लगता है कि अच्छा है। क्या यह भ्रमित होना नहीं है? (हाँ।) वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका कोई सिद्धांत नहीं होता है और न ही किसी व्यक्ति के साथ पेश आने में उनके कोई सिद्धांत होते हैं। उदाहरण के लिए, जब बुरे लोगों से पेश आने की बात आती है तब कुछ बुरे लोगों के पास कुछ खूबियाँ या पेशेवर कौशल होते हैं और वे अभी भी कुछ समय के लिए सेवा कर सकते हैं—तो फिर ऐसे लोगों को सेवा करने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन कुछ लोग इस बात को बस समझ ही नहीं सकते : “क्या परमेश्वर बुरे लोगों को नापसंद नहीं करता? तो अब भी उनका उपयोग क्यों किया जा रहा है?” जब तुम उनसे यह संगति करते हो कि यह बुद्धिमानी है और एक सिद्धांत भी है, तब वे इस पर विचार करते हैं और सोचते हैं, “कौन-सा सिद्धांत? क्या यह बस लोगों को धोखा देना नहीं है? क्या यह लोगों का शोषण करना नहीं है?” वे इसे इसी तरह से देखते हैं। मुझे बताओ, क्या उनमें सामान्य मानवता की सोच है? वे नहीं जानते कि वास्तविक हालातों के अनुसार कार्य करने के लिए सिद्धांतों को कैसे पहचानना है—क्या वे सामान्य मानवीय बुद्धिमत्ता के स्तर तक पहुँच सकते हैं? (नहीं।) सामान्य मानवता की सोच और सामान्य बुद्धिमत्ता वाले सभी लोग इस मामले को समझ सकते हैं और इस पर पकड़ बना सकते हैं, लेकिन पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग इस सरल मामले पर भी पकड़ नहीं बना सकते। तो फिर यह कैसे संभव है कि वे सत्य समझ सकते हैं? वे अक्सर एक चीज कहते हैं, “पिछली बार तुमने इस मामले के बारे में ऐसा कहा था। आज तुम कुछ भिन्न क्यों कह रहे हो? तुम्हारे शब्द भरोसे के लायक नहीं हैं—तुम उन्हें यूँ ही कभी भी कैसे बदल सकते हो?” वे नहीं जानते कि अब इस मामले की स्थिति भिन्न है, इसलिए इसे सँभालने का दृष्टिकोण भी बदलना चाहिए। हालाँकि सिद्धांत और लक्ष्य वही रहते हैं। बस यही है कि मामले को सँभालने की विधि बदल गई है—इसे विशिष्ट हालातों के अनुसार समायोजित किया जाता है और इस मामले की स्थिति के आधार पर जब भी जरूरत हो अनुकूलित किया जाता है और प्रतिक्रिया की जाती है ताकि बेहतर नतीजे प्राप्त हों। जब पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के सामने ऐसे मामले आते हैं तब वे उनकी असलियत नहीं देख सकते हैं। उनका मानना है कि सत्य सिद्धांत विनियम हैं और उनका हर समय बिना किसी बदलाव के पालन किया जाना चाहिए। इसलिए जब तुम सत्य सिद्धांतों के आधार पर कोई चीज करने की विधि को समायोजित करते हो तब उन्हें यह समझ नहीं आता और न ही वे इसे स्वीकार कर सकते हैं। उनमें से कुछ लोग तुम्हारी निंदा तक कर सकते हैं और तुम्हारे खिलाफ उपयोग करने के लिए कोई मौका तक ढूँढ़ सकते हैं। भीतर से वे किसी भी चीज का सार या प्रकृति स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं। उनके विचार भ्रमित हैं। जब वे किसी चीज को देखते हैं तब बस उस पर विनियम लागू कर देते हैं; उन्हें कभी पता नहीं होता कि उसे सत्य सिद्धांतों के आधार पर कैसे मापना है और न ही उन्हें यह पता होता है कि उसे उसके विकास के नियम के आधार पर हल करने और उस पर प्रतिक्रिया करने के लिए विभिन्न विधियाँ कैसे अपनानी हैं। पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों में यह भ्रमित होने की विशेषता बहुत स्पष्ट होती है, है ना? (हाँ।)
पशुओं से पुनर्जन्म लिए हुए लोग दूसरों का भेद पहचानने में असमर्थ होते हैं। जब वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो बहुत ईमानदारी से बोलता है, लेकिन चीजों को कुछ हद तक कपटपूर्ण ढंग से करता है तब वे यह असलियत नहीं देख सकते हैं कि वह वास्तव में किस तरह का व्यक्ति है, वह वास्तव में सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति है या नहीं। ऐसी पेचीदा स्थितियों से सामना होने पर जिनके लिए द्वंद्वात्मक सोच की जरूरत होती है, वे चकरा जाते हैं और उन्हें समझने में असमर्थ होते हैं और यह नहीं जानते कि उन्हें कैसे आँकना है। वे अपनी सोच में भ्रमित होते हैं; उनकी सोच उलझे हुए जंजाल जैसी होती है और वे अपने विचारों को कभी भी सुलझा नहीं सकते। तुम उन्हें चाहे कितनी ही बार सिद्धांत बताओ, वे नहीं जानते कि विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का भेद पहचानने के लिए सत्य सिद्धांतों को कैसे लागू करना है। उदाहरण के लिए, जब समस्याओं की रिपोर्ट करने की बात आती है तब वे वास्तविक स्थिति के आधार पर चीजों की सटीकता से रिपोर्ट नहीं कर सकते। कुछ अगुआ कुछ वास्तविक कार्य करने में सक्षम होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में उनके कार्य के निर्वहन में कुछ विचलन हो सकते हैं और वे भ्रष्ट स्वभावों की कुछ अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित कर सकते हैं; हालाँकि उनकी मानवता और कार्य क्षमता के लिहाज से वे लगभग मानक के अनुरूप होते हैं। फिर भी कुछ भ्रमित लोग यह तथ्य नहीं देखते हैं कि ये अगुआ वास्तविक कार्य कर सकते हैं और न ही वे उनकी मानवता के गुणों को देखते हैं—इसके बजाय वे रिपोर्ट करने के लिए विशिष्ट रूप से उनके दोषों, कमियों और कुछ छोटे-मोटे, मामूली मुद्दों को चुनते हैं। इसके विपरीत, वे पक्के मसीह-विरोधी और बुरे लोग, वे लोग जो बड़ी-बड़ी बुराइयाँ करते हैं, वे कोई भी वास्तविक कार्य करने में अक्षम होते हैं और दूसरों को गुमराह करने के लिए सिर्फ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे बाहरी रूप से बड़े धूमधाम से चीजें करते हैं लेकिन वास्तव में उनकी मानवता मानक के अनुरूप नहीं होती है, उन्होंने जो मार्ग चुना है वह गलत है, उनकी मानवता बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों की मानवता है और वे जिस मार्ग पर चलते हैं वह मसीह-विरोधियों का मार्ग है, सत्य का अनुसरण नहीं करने वाला मार्ग है और फिर भी ये भ्रमित व्यक्ति इन चीजों की असलियत नहीं देख सकते। वे देखते हैं कि ये लोग अपना कार्य करते समय बड़ा तामझाम करते हैं और वे मान लेते हैं कि उनमें अगुआई की प्रतिभा और संगठनात्मक कौशल हैं, वे कार्य को अच्छी तरह से कर सकते हैं। जहाँ तक यह प्रश्न है कि उनका कार्य वास्तव में क्या नतीजे उत्पन्न करता है, उन्होंने पश्चात्ताप किया है या नहीं और क्या वे बदल गए हैं या क्या उनकी मानवता मानक के अनुरूप है, वे इनमें से कुछ भी नहीं जानते हैं। अगर वे मसीह-विरोधियों द्वारा गुमराह और नियंत्रित कर लिए जाएँ तो भी उन्हें इसकी कोई खबर नहीं होगी; वे मसीह-विरोधियों का अनुसरण करेंगे और उनकी आज्ञा मानेंगे, लेकिन फिर भी यही विश्वास करेंगे कि वे परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं, सुसमाचार का प्रचार कर रहे हैं और परमेश्वर की गवाही दे रहे हैं। वास्तव में मसीह-विरोधी बहुत पहले ही उनका नियंत्रण ले चुके होंगे; वे परमेश्वर में विश्वास नहीं रख रहे होंगे, बल्कि लोगों का अनुसरण कर रहे होंगे, दानवों और शैतानों का अनुसरण कर रहे होंगे—फिर भी उन्हें यह पता नहीं होगा। भीतर से वे बहुत पहले ही अंधकार से भर चुके होंगे, वे बहुत पहले ही परमेश्वर की उपस्थिति खो चुके होंगे और वे बहुत पहले ही पवित्र आत्मा का कार्य खो चुके होंगे। क्योंकि वे बहुत सुन्न होते हैं, क्योंकि उनकी समझ विरूपित होती है और क्योंकि वे किसी भी सत्य सिद्धांत को नहीं समझते हैं, इसलिए वे चीजों की असलियत नहीं देख सकते और लोगों का भेद पहचानने में असमर्थ होते हैं। वे न सिर्फ समस्याओं की रिपोर्ट नहीं करते हैं या मसीह-विरोधियों को नहीं हटवाते हैं, बल्कि वे उनका बचाव भी करते हैं। इसके विपरीत जब उन अगुआओं और कार्यकर्ताओं की बात आती है जो कुछ वास्तविक कार्य करने में सही मायने में सक्षम हैं तब अगर उनमें उन्हें छोटी-मोटी कमियाँ या छोटे-मोटे मुद्दे दिखाई दे जाते हैं तो वे उनकी रिपोर्ट करने और ये मुद्दे उठाने पर अड़ जाते हैं, भले ही वे सिद्धांत के मामले न हों। वे बुरी तरह से भ्रमित हैं! वे सिद्धांत के किसी भी मामले की असलियत नहीं देख सकते—यहाँ तक कि जब यह बात आती है कि उन्हें दैनिक जीवन में किसके साथ मेलजोल रखना चाहिए, वे किससे सहायता और लाभ प्राप्त कर सकते हैं या उन्हें किससे दूर रहना चाहिए तब वे इन चीजों का भेद नहीं पहचान सकते या उनकी असलियत नहीं देख सकते। उनमें से कुछ लोगों के छद्म विश्वासियों और अविश्वासियों के साथ बहुत अच्छे संबंध होते हैं, वे सोचते हैं कि ये लोग ज्ञानी हैं, उनमें काबिलियत है और इसलिए उनकी मदद कर सकते हैं और मेलजोल रखे जाने के लिए वे बहुत ज्यादा योग्य हैं। यहाँ तक कि वे बार-बार उन लोगों की तारीफ भी करते हैं जिन्हें वे पूजते हैं, कहते हैं कि वे बहुत सक्षम हैं और उनकी बहुत प्रतिष्ठा है। वे शैतानों को मूर्तियों की तरह पूजते हैं—क्या यह भ्रमित होना नहीं है? (है।)
भ्रमित होने का विशिष्ट रूप से क्या मतलब है? (खराब काबिलियत होना।) यह सामान्य पदों में है—विशिष्ट रूप से, भ्रमित होने का मतलब है कि व्यक्ति के पास किसी भी चीज का भेद पहचानने के लिए सटीक विचार और दृष्टिकोण नहीं हैं और किसी भी चीज को देखने में उसके पास कोई सिद्धांत या आधार नहीं है और इस पर उसके विचार भ्रमित हैं। यह एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, इस प्रकार के लोग सही-गलत और काले-सफेद में भेद नहीं कर सकते हैं—वे अक्सर नकारात्मक चीजों को सकारात्मक चीजें समझने की भूल कर बैठते हैं और सकारात्मक चीजों को नकारात्मक कहते हैं। वे यह भेद नहीं पहचान सकते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं, “तुम जिस परमेश्वर में विश्वास रखते हो, वह सिर्फ एक व्यक्ति है।” वे इस पर विचार करते हैं और कहते हैं, “नहीं, यह सही नहीं है। मैं जिसमें विश्वास रखता हूँ, वह परमेश्वर है। अगर वह सिर्फ एक व्यक्ति होता तो वह सत्य कैसे व्यक्त कर सकता था? मैं जिसमें विश्वास रखता हूँ, वह परमेश्वर है—मैं इस बारे में निश्चित हूँ।” इस बिंदु पर वे भ्रमित नहीं हैं। लेकिन जब कोई कहता है, “तुम जिस परमेश्वर में विश्वास रखते हो, वह बहुत सारा पैसा लेकर फरार हो गया है और ऐश करने के लिए अमेरिका भाग गया है” तब वे चकरा जाते हैं और गुमराह हो जाते हैं। अगर बुद्धिमत्ता वाला कोई व्यक्ति ये बातें सुनता तो वह यह भेद पहचान लेता कि यह एक मनगढ़ंत अफवाह है। इसे “बहुत सारा पैसा लेकर फरार होना” कैसे कहा जा सकता है? कस्टम्स से गुजरते समय हर कोई कड़ी जाँच से गुजरता है और हर व्यक्ति कितनी नकदी ले जा सकता है वह विनियमित होता है। क्या उतनी छोटी-सी रकम को लाना “बहुत सारा पैसा लेकर फरार होना” माना जाएगा? इसके अलावा, यह पैसा किसका है? अगर कोई दूसरे लोगों के पैसों का गबन करता या उन्हें हड़प लेता तो उसे “बहुत सारा पैसा लेकर फरार होना” कहा जाता—लेकिन अगर यह उसका अपना पैसा है तो क्या उसे “बहुत सारा पैसा लेकर फरार होना” कहा जा सकता है? यह “पैसा लेकर फरार होना” नहीं है, बल्कि सामान्य रूप से पैसा लेकर चलना है। यह एक पहलू है। इसके अलावा, “फरार” का क्या मतलब है? कोई अपराध करने के बाद भागने वाले भगोड़े को “फरार” कहा जाता है। क्या देहधारी मसीह ने कोई अपराध किया? उसने तो बस बहुत सारे सत्य व्यक्त किए और चीन की मुख्य भूमि पर न्याय का अपना कार्य किया, लोगों का एक ऐसा समूह प्राप्त किया जिसने उसका अनुसरण किया और इसके लिए उसने सीसीपी का क्रूर दमन और उन्मादी गिरफ्तारियाँ सहीं। अंत में उसके पास विदेशों में परमेश्वर का कार्य जारी रखने के लिए कुछ लोगों की अगुआई करके उन्हें देश से बाहर ले जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। इसे “बहुत सारा पैसा लेकर फरार होना” कैसे कहा जा सकता है? यह एक सामान्य सफर था जिसमें पूरी तरह से सामान्य तरीके से कस्टम्स से गुजरना और संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए विमान पकड़ना शामिल था। उसने देश इसलिए छोड़ा क्योंकि सीसीपी उसका पीछा कर रही थी और उसके पास आराम करने और ठहरने की कोई जगह नहीं थी। सीसीपी के तानाशाही शासन में न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि परमेश्वर में विश्वास रखने पर गिरफ्तारी और उत्पीड़न भी किया जाता है; जहाँ तक उस मसीह का प्रश्न है जो मानवजाति को बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता है, अगर उसे पकड़ लिया जाता तो वह मृत्युदंड और सूली पर चढ़ाए जाने का सामना करता। सिर्फ कार्य की जरूरतों के कारण ही मसीह ने एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र देश में जाने का फैसला किया और संयुक्त राज्य अमेरिका आने से पहले उसने सामान्य माध्यमों से पासपोर्ट और वीजा प्राप्त किया। अमेरिका में उसका कोई दोस्त या रिश्तेदार नहीं है, वह इस जगह से अपरिचित है और एक आम जीवन जीता है, घर का बना सादा खाना खाता है—वहाँ “ऐश करने” जैसा कुछ भी नहीं है। क्या “ऐश करना” सिर्फ उन लोगों का जुमला नहीं है जिनके गुप्त इरादे हैं? क्या यह झूठ नहीं है? मसीह अमेरिका में एक आम व्यक्ति का जीवन जीता है : घरेलू शैली वाला भोजन करता है, उसने शानदार भोजन का आनंद लेने के लिए एक बार भी किसी महँगे रेस्तराँ में रात का खाना नहीं खाया है, कभी किसी महँगे होटल में ठहरना तो और भी कम है और वह घूमने के लिए मुश्किल से कभी जाता है—बस आस-पास के इलाकों में घूमना ही काफी होता है। इनमें से कोई भी चीज उसके लिए कोई विशेष आकर्षण नहीं रखती है। कुछ लोग भोजन करना पसंद करते हैं और ऐसी हर चीज का स्वाद लेना चाहते हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं खाई हो, यहाँ तक कि वे भोजन को सिर्फ चखने के लिए उसे हवाई जहाज से भी मँगवा लेते हैं। क्या मैंने कभी ऐसा किया है? कभी नहीं। फिर भी कुछ गुप्त इरादों वाले लोगों ने इसके संबंध में बात का बतंगड़ बना दिया है! ये लोग दानव हैं। वे परमेश्वर के दुश्मन के रूप में पैदा हुए थे और उनका इस तरह से कार्य करना उनकी जन्मजात प्रकृति है; वे लोगों को धोखा देने और परमेश्वर को बदनाम करने के लिए मुख्य रूप से झूठ पर भरोसा करते हैं। इस बारे में शक नहीं किया जा सकता कि वे दानव हैं। तो फिर जो व्यक्ति इन दानवों के झूठों पर विश्वास कर सकता है वह किस किस्म का है? यकीनन वह भी दानव ही होगा—सिर्फ दानव ही दानवों के शब्दों पर विश्वास करते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “जिस मसीह में तुम लोग विश्वास रखते हो, वह बहुत सारा पैसा लेकर भाग गया” और वे तुरंत इस बात पर पूरी तरह से विश्वास कर लेते हैं और इसे स्वीकार लेते हैं। कुछ लोग कहते हैं, “जिस मसीह में तुम लोग विश्वास रखते हो, वह अमेरिका भाग गया और वहाँ ऐश कर रहा है, वह इतने सारे पकवान खाता है कि वह उनसे थक चुका है, वह आलीशान होटल में रहता है, आलीशान कारों में इधर-उधर घूमता है, उसके पास एक निजी रसोइया और सहायक हैं और वह मशहूर सुंदर जगहों पर जाने के लिए विदेश जाता है—वह ऐश करने में अपना सारा समय बिता रहा है।” जैसे ही ये भ्रमित लोग शैतान द्वारा गुमराह कर दिए जाते हैं, वे तुरंत इन बातों पर विश्वास कर लेते हैं। मैं कहता हूँ कि ऐसे लोगों को शैतान के हवाले कर देना चाहिए—वे परमेश्वर में विश्वास रखने के योग्य नहीं हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने कितने धर्मोपदेश सुने हैं, वे बस समझते ही नहीं हैं और अब भी इन अफवाहों पर विश्वास कर सकते हैं। ऐसे लोग मनुष्य नहीं हैं। अगर वे मनुष्य नहीं हैं तो वे क्या हैं? वे पशु हैं। जबकि वे बुरे लोग नहीं हैं, लेकिन वे बुरी तरह से भ्रमित हैं, अच्छे-बुरे, सकारात्मक-नकारात्मक, सही-गलत, सत्य-दुष्टता और उलझे हुए तर्क में भेद करने में असमर्थ हैं। ऐसे लोगों को दूर कर दिया जाना चाहिए—अगर वे अपने आप नहीं चले जाते हैं तो उन्हें कलीसिया से दूर कर दिया जाना चाहिए। उन्हें तुरंत बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए और हम खुशी-खुशी उन्हें अलविदा कह देंगे। सीसीपी के पास कलीसिया द्वारा लोगों को बाहर निकाल देने का वर्णन करने का अपना एक तरीका है, उसका कहना है कि लोगों को बाहर निकाल देना और निष्कासित करना शक्ति का प्रदर्शन है। देखो, दानव और शैतान हर मामले को ऐसे बेहूदे तरीके से समझते हैं। इससे सिर्फ यह उजागर होता है कि सीसीपी के बहुत-से क्रियाकलाप शक्ति का प्रदर्शन करने की खातिर किए जाते हैं; इसलिए वह कलीसिया द्वारा लोगों को दूर किए जाने की व्याख्या शक्ति के प्रदर्शन के रूप में करती है। वह मान लेती है कि दूसरे भी उसी की तरह सोचते हैं। वह कभी नहीं समझेगी कि कलीसिया इसे पूरी तरह से सत्य और परमेश्वर के वचनों के आधार पर करती है—कलीसिया को स्वच्छ करना कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों का हिस्सा है। क्या दानव दुष्ट नहीं हैं? (वे हैं।) वे सच में दुष्ट हैं! और भ्रमित लोग बहुत सारे हैं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दानव कितने दुष्ट हैं, भ्रमित लोग यह नहीं देख सकते कि वे दुष्ट हैं। जब दानव परमेश्वर के बारे में अफवाहें गढ़ते हैं, परमेश्वर का अपमान करते हैं और उसकी ईश-निंदा करते हैं तब भ्रमित लोग हर शब्द पर विश्वास कर लेते हैं। लेकिन परमेश्वर के वचन चाहे कितने भी वास्तविक और सकारात्मक हों, वे उन पर विश्वास नहीं करते। चाहे परमेश्वर के वचन लोगों को कितना भी लाभ पहुँचाएँ, वे उसे देख नहीं सकते। लेकिन जैसे ही शैतान एक अकेला शब्द भी बोलता है, तो वे गुमराह हो जाते हैं और बिना किसी प्रश्न के उस पर विश्वास कर लेते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे शैतान जैसे हैं, लेकिन शैतान वास्तव में उन्हें नहीं चाहता है। क्यों? क्योंकि उनके जैसे बेवकूफ लोग, ऐसे निरे बेअक्ल लोग शैतान के लिए भी बहुत ही ज्यादा नासमझ हैं। तुम कुछ भी करने में अक्षम हो, इसलिए शैतान बस तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं रखने और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के लिए गुमराह करता है—शैतान तुम्हारे जैसे किसी को नहीं चाहता है। तुम संभवतः क्या कर सकते हो? क्या तुममें जासूसी करने के कौशल हैं? तुममें तो मानवीय बुद्धिमत्ता तक नहीं है। तुम तीन वाक्य पूरे करने से पहले ही अपनी पहचान उजागर कर दोगे। अगर तुम सीसीपी के लिए जासूस बनना चाहते तो भी सीसीपी तुम्हें नहीं चाहती। क्योंकि तुम बेवकूफ हो, भ्रमित हो, तुम्हें धोखा देना बहुत आसान है और तुममें मानवीय बुद्धिमत्ता नहीं है, इसलिए शैतान भी तुम्हें नीची नजर से देखता है और तुम्हें नहीं चाहता है। इसलिए जब परमेश्वर का घर तुमसे अपना कर्तव्य करने के लिए कहता है तब यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उन्नयन करना है—ऐसा महसूस मत करो कि तुम्हारे साथ अन्याय हुआ है। तुम शैतान की कही हर बात पर विश्वास कर लेते हो, लेकिन चाहे परमेश्वर ने कितना भी कार्य किया हो या परमेश्वर ने कितने भी वचन कहे हों, तुम उन पर विश्वास नहीं करते। तुम्हें परमेश्वर में कोई सच्चा विश्वास नहीं है और तुम संदेह से भरे रहते हो। शैतान एक शब्द बोलता है और तुम उसके द्वारा बंदी बना लिए जाते हो। तुम किस तरह के नीच व्यक्ति हो? तुममें क्या गरिमा है? तुम्हारा क्या मूल्य है? तुम सिर्फ एक भ्रमित व्यक्ति हो और कुछ नहीं, फिर भी तुम सोचते हो कि तुम बहुत अच्छे हो और खुद को नेक मानते हो। तुम शैतान के बहुत ही स्पष्ट झूठों तक का भेद नहीं पहचान सकते और न ही तुम उनके पीछे शैतान के उद्देश्य को पहचान सकते हो—क्या यह अत्यधिक भ्रमित होना नहीं है? सीसीपी कहती है, “जिस मसीह में तुम लोग विश्वास रखते हो, वह बहुत सारा पैसा लेकर फरार हो गया और संयुक्त राज्य अमेरिका में ऐश कर रहा है।” जब ये भ्रमित लोग यह बात सुनते हैं तब एक पल के लिए उनके दिलों की धड़कन रुक जाती है : “क्या ऐसा है? मुझे इस बारे में पता कैसे नहीं चला? क्या वह मेरे द्वारा चढ़ाए गए सारे पैसे लेकर फरार हो गया? कलीसियाई कार्य के लिए उसका उपयोग नहीं हुआ, है ना? यह उसके व्यक्तिगत मौजमस्ती के लिए खर्च किया गया है, है ना? इसका उपयोग उसने अपने लिए अच्छा भोजन, बढ़िया कपड़े और कीमती गहने खरीदने के लिए किया है, है ना? मुझे तो इसका आनंद लेने का मौका तक नहीं मिला—उसने इसका उपयोग अपने खुद के आनंद के लिए कर लिया। मैं इसे स्वीकारने से एकदम इनकार करता हूँ। मुझे अब और विश्वास नहीं है! मुझे अपना पैसा वापस चाहिए!” अगर तुम पैसे चढ़ाने पर पछता रहे हो तो परमेश्वर का घर तुम्हें यह वापस कर सकता है, लेकिन उस पल से तुम्हें परमेश्वर के घर से पूरी तरह से अलग कर दिया जाएगा। तुमने बहुत सारे वर्षों से धर्मोपदेश सुने हैं—तुम्हें मुफ्त में कितना सत्य मिला है? तुमने इतने वर्षों से परमेश्वर के अनुग्रह, आशीष, सुरक्षा और देखभाल का आनंद लिया है—क्या तुमने एक भी पैसा खर्च किया है? क्या परमेश्वर ने कभी तुमसे पैसा माँगा है? परमेश्वर का अनुग्रह, आशीष, देखभाल और सुरक्षा—तुम्हारा अपना जीवन भी—सब कुछ तुम्हें परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया था। क्या परमेश्वर तुम्हें जो प्रदान करता है उसे तुम पैसों से खरीद सकते हो? तुम उसके बदले में क्या दे सकते हो? क्या तुम अपने उन कुछ गंदे सिक्कों से उसका सौदा कर सकते हो? ये चीजें अनमोल खजाने हैं—तुम उनके बदले कुछ भी नहीं दे सकते; कोई भी नहीं दे सकता! ये तुम्हें इसलिए प्रदान किए गए हैं क्योंकि परमेश्वर ऐसा करने के लिए इच्छुक है, क्योंकि परमेश्वर तुम्हें अनुग्रह दिखाता है और परमेश्वर तुमसे एक सृजित प्राणी की तरह पेश आता है। ये वे चीजें नहीं हैं जिन्हें तुमने पैसों से खरीदा और न ही ये कोई कीमत चुकाने के बदले में मिली चीजें हैं। भ्रमित लोग इन चीजों की असलियत नहीं देख सकते हैं। वे अपने दिलों में हमेशा उलझन में रहते हैं; वे हमेशा सोचते हैं, “क्या परमेश्वर के पास कोई गहरा राज है? क्या धर्मोपदेश देने के अलावा ऐसी और भी बहुत-सी चीजें नहीं हैं जो हमें स्पष्ट की जानी चाहिए और समझाई जानी चाहिए? क्या कोई स्पष्टीकरण, कोई हिसाब नहीं होना चाहिए? क्या उसके निजी जीवन और पर्दे के पीछे के उसके शब्दों और क्रियाकलापों का सबके सामने खुलासा नहीं किया जाना चाहिए?” बहुत-से भ्रमित लोगों की यही मानसिकता होती है—हो सकता है कि वे ऐसी बातें जोर से न कहें, लेकिन वे अपने दिलों में यही सोचते हैं। क्या परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति को उन सब चीजों का खुलासा करने की जरूरत है जो वह करता है? परमेश्वर ने पहले ही बहुत सारे सत्य व्यक्त कर दिए हैं और यह सबसे महान किस्म का खुलासा है—यह सभी लोगों को प्रकट करता है। अगर तुम यह नहीं मानते कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सत्य है तो तुम्हें परमेश्वर का बिल्कुल भी कोई ज्ञान नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के बारे में मनमानी टिप्पणियाँ करते हो तो तुम परमेश्वर पर आक्रमण कर रहे हो और उसका विरोध कर रहे हो। परमेश्वर ने पहले ही सारा सत्य सार्वजनिक कर दिया है ताकि लोग चीजों को देखने के लिए सत्य का उपयोग कर सकें। व्यक्ति को लोगों को कैसे देखना चाहिए, उसे चीजों को कैसे देखना चाहिए और उसे अपने आचरण और कार्य में कौन-से दृष्टिकोण और सिद्धांत रखने चाहिए—यह सब कुछ परमेश्वर के वचनों में है। अगर तुम अभी भी यह नहीं जानते और इस बारे में स्पष्ट नहीं हो तो इसका कारण यह है कि तुम भ्रमित हो—तुम एक भ्रमित व्यक्ति हो। भ्रमित लोग परमेश्वर और परमेश्वर के घर के मामलों के बारे में जानने के अयोग्य हैं—दानव तो और भी कम—क्योंकि भ्रमित लोगों और दानवों को किसी भी सत्य की कोई समझ नहीं होती है; उनका इन मामलों में आँख मूँदकर विनियम लागू करने के प्रति झुकाव होता है, वे इनके बारे में आँख मूँदकर निर्णय लेते हैं और आँख मूँदकर इनकी निंदा करते हैं। उनमें भेद पहचानने की कोई क्षमता नहीं होती और न ही कोई सिद्धांत होता है। यह निस्संदेह कहा जा सकता है : भ्रमित लोग और दानव परमेश्वर के घर में रहने के अयोग्य हैं—उन्हें दफा हो जाना चाहिए! भ्रमित लोगों और बेतुके लोगों के पास सत्य समझने की मूलभूत स्थितियाँ नहीं होती हैं और न ही उनके पास उद्धार प्राप्त करने की मूलभूत स्थितियाँ होती हैं—उन्हें शैतान द्वारा कभी भी और कहीं भी बंदी बना लिया जा सकता है। मुझे बताओ, परमेश्वर ने आखिर कब पशुओं को धर्मोपदेश दिया है या सत्य समझाया है? इस तरह, लोगों का बहुत सारे धर्मोपदेश सुनने में समर्थ होना, चाहे वे सत्य समझ सकते हों या नहीं, यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह और परमेश्वर के उन्नयन के कारण है। अगर तुम हमेशा परमेश्वर पर संदेह करते हो और सोचते हो, “क्या मैं जिस पर विश्वास करता हूँ वह वास्तव में सच्चा परमेश्वर है? क्या परमेश्वर का वास्तव में अस्तित्व है? क्या परमेश्वर वास्तव में सभी चीजों पर संप्रभु है? क्या परमेश्वर वास्तव में लोगों के प्रति अच्छा है या सिर्फ ढोंग कर रहा है? क्या परमेश्वर वास्तव में सत्य है और क्या वह वास्तव में लोगों को बचा सकता है?”—अगर तुम इस तरीके से सोचते हो और परमेश्वर से इस रवैये से पेश आते हो तो तुम मृत्यु के लायक हो। देर-सवेर परमेश्वर एक विशेष परिवेश का इंतजाम करेगा जिसके जरिए वह तुम्हें शैतान के हवाले कर देगा और परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता पूरी तरह से टूट जाएगा। तुम्हारा और परमेश्वर का रिश्ता अब एक सृजित प्राणी और सृष्टिकर्ता का रिश्ता नहीं रहेगा और उस पल से तुम्हारा परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं रहेगा।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?