सत्य का अनुसरण कैसे करें (14) भाग दो

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग सत्य पर संगति के शब्दों को सुनने के सबसे ज्यादा अनिच्छुक होते हैं। खासकर जब ये शब्द खुद को जानने, विभिन्न प्रकारों के लोगों की अवस्थाओं का गहन-विश्लेषण करने, सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश करने के तरीके या सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों के बारे में होते हैं, तब वे अपने दिलों में बहुत ही ज्यादा विकर्षण महसूस करते हैं और साथ ही वे विरूपित समझ और राय फैलाते हैं। उदाहरण के लिए, जब कलीसिया कुछ कुकर्मियों को बाहर निकाल देती है, तो इस प्रकार का व्यक्ति दूसरों को उकसाता है, ऐसी बातें कहता है, “परमेश्वर के घर में लोगों के लिए कोई प्रेम नहीं है। ऐसा लगता है जैसे वे खेत जोतते ही बैलों को काट रहे हों,” या, “इन लोगों को इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने उच्चतर अगुआओं को नाराज कर दिया।” वे परमेश्वर के घर में कलीसिया की स्वच्छता के कार्य के साथ सही ढंग से पेश आने में असमर्थ हैं और न ही उनमें शुद्ध समझ होती है—वे इस बारे में विरूपित तरीके से सोचते और बोलते हैं। तुम्हें उनके मुँह से जमीर या विवेक का कोई शब्द सुनाई नहीं देगा और न ही तुम्हें ऐसे शब्द सुनाई देंगे जो सकारात्मक चीजें हों और ऐसी कोई बात तो बिल्कुल भी सुनाई नहीं देगी जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हो। उनका दिल शिकायतों, उद्दंडता और परिवेदनाओं से भरा होता है। जब वे असंयमित ढंग से अपने दृष्टिकोण व्यक्त करते हैं, तब वे जो चीजें कहते हैं और जो विचार और दृष्टिकोण प्रकट करते हैं, वे सभी विकृत और टेढ़े होते हैं। तुम्हें यह समझ से बाहर लगता है—तुम सोचते हो कि कैसे उन्होंने इतने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है और धर्मोपदेश सुने हैं और कैसे बाहर से वे काफी शिष्ट लगते हैं और बुरे नहीं लगते हैं और तुम्हें अचरज होता है कि वे महत्वपूर्ण समय पर ये अनुचित बातें कैसे कह सकते हैं। आखिरकार उन्होंने अपने सच्चे विचार जाहिर कर ही दिए हैं, वे बातें जाहिर कर ही दी हैं जो उन्होंने लंबे समय से अपने दिल में छिपाकर रखी थीं—क्या यह वाकई उनकी समस्या को प्रकट नहीं करता? (हाँ।) उन्होंने जो सच्चे विचार प्रकट किए हैं वे पूरी तरह से टेढ़ी दलीलें और विधर्म हैं। तो क्या उन्होंने ये टेढ़ी दलीलें और विधर्म किसी अस्थायी रूप से खराब मिजाज के कारण व्यक्त किए? (नहीं।) बिल्कुल नहीं। चाहे उन्होंने कितने भी वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो और धर्मोपदेश सुने हों, ये विचार उनके दिल में हमेशा छिपे ही रहे हैं, उन्होंने कभी दिन का उजाला नहीं देखा है। लेकिन जब कोई महत्वपूर्ण पल आता है और वे जो कहना चाहते हैं उसे और रोककर नहीं रख पाते हैं, तब यह ज्वालामुखी की तरह फट पड़ता है—यह उनके भीतर बहुत ही तेजी से जमा हो रहा होता है और एक दिन वे इसे और काबू में नहीं रख पाते हैं और यह विकृत गुस्सा बाहर फूट पड़ता है। जब उनकी दानवी प्रकृति फट पड़ती है तब सभी तरह की टेढ़ी दलीलें, विधर्म और भ्रांतियाँ बाहर आ जाती हैं—वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करने वाले शब्द, परमेश्वर की ईश-निंदा करने वाले शब्द, परमेश्वर का अपमान करने वाले शब्द, लोगों के प्रति जलन और नफरत के शब्द और उकसाने वाले शब्द बोलते हैं—वे सभी तरह के दानवी शब्द उगलते हैं और सिर्फ तब तुम्हें एहसास होता है कि वे दानव हैं और पूरी तरह से बेनकाब हो चुके हैं। इससे पहले तुमने देखा कि धर्मोपदेश हमेशा उनके सिर के ऊपर से निकल जाते हैं और परमेश्वर में विश्वास रखने के इन सभी वर्षों में उन्होंने कभी भी सत्य नहीं समझा है। तुमने मान लिया कि उनमें खराब काबिलियत है और सत्य उनकी समझ से परे है, इसलिए तुमने उन्हें भाई या बहन माना और उनकी मदद करने का प्रयास किया। तुमने उनके सामने अपने दिल के राज खोले और उन्हें बताया कि कैसे तुम्हारे अपने भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध होने लगे हैं। लेकिन तुमने उनके साथ चाहे कैसे भी संगति की हो, उन्होंने इस बारे में बात करने के लिए कभी भी अपना दिल नहीं खोला कि वे सही मायने में कैसे हैं। तुम कभी भी समझ नहीं पाए : वे अपना दिल क्यों नहीं खोल सके? उन्होंने अपनी असली अवस्था उजागर क्यों नहीं की? क्या यह हो सकता है कि उन्होंने कभी भी भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा नहीं किया हो? तुम कभी भी उनकी असलियत देख नहीं पाए और तुमने यहाँ तक सोचा कि वे शिष्ट, सीधे-सादे और निष्कपट हैं। सिर्फ अब जब उनकी दानवी प्रकृति फट पड़ी है और उन्होंने परमेश्वर की शिकायत करते हुए और उसकी ईश-निंदा करते हुए इतनी सारी बातें कह डाली हैं, तुम्हें दिखाई देता है कि उनमें वास्तव में कोई मानवता नहीं है और वे पूरी तरह से दानवी प्रकृति के हैं। तुम्हें लगता है, “यह व्यक्ति भयानक है! उसने इन सभी वर्षों में परमेश्वर में विश्वास रखा है, लेकिन यह पता चला है कि उसने हमेशा अपने दिल में सत्य से नफरत की है और उसका प्रतिरोध किया है! इसमें कोई हैरानी नहीं है कि उसने कभी भी किसी के भी सामने खुलकर बात नहीं की—उसे डर था कि दूसरे लोग उसकी दानवी प्रकृति की असलियत देख लेंगे! वह एक सच्चा दानव है!” एक बार जब तुम उसके सार की असलियत देख लेते हो, तब तुम्हें लगता है कि तुम इन सभी वर्षों में पूरी तरह से अंधे रहे हो—तुम हर रोज अपना कर्तव्य करते रहे और उसके साथ कलीसियाई जीवन जीते रहे, पूरे समय यही सोचते रहे कि वह एक अच्छा व्यक्ति है, परमेश्वर के घर का सदस्य है, परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक है, और तुम उसका भेद पहचानने में असमर्थ रहे। यह बहुत ही डरावनी परिस्थिति है! अगर तुम भाई-बहनों के साथ रहते हो और उनसे मेलजोल रखते हो और तुम्हें पता चलता है कि किसी में भ्रष्ट स्वभाव हैं या वह अपने कर्तव्य में सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और तुम उसके साथ सत्य की संगति करते हो और उसकी मदद करते हो और वह इसे स्वीकारने और आभार व्यक्त करने में समर्थ होता है, तो तुम काफी संतुष्ट महसूस करोगे—तुम्हें लगेगा कि यह व्यक्ति बहुत अच्छा है, वह सत्य से प्रेम करता है; तुम्हें उसके प्रति बिल्कुल भी विकर्षण महसूस नहीं होगा। लेकिन अगर तुम कई वर्षों तक किसी दानव के साथ मेलजोल रखते हो, हमेशा उससे भाई-बहन की तरह पेश आते हो, अक्सर उसकी मदद करते हो, उसे सहारा देते हो और उसके प्रति प्रेम, धीरज और सहनशीलता दिखाते हो, लेकिन फिर भी वह तुम्हें बहुत शत्रुतापूर्ण नजरों से देखता है, हमेशा तुमसे ऐसे सावधान रहता है जैसे कि तुम उसके दुश्मन हो और उत्तरोत्तर तुम्हें यह एहसास होता है कि अपने दिल में वह सत्य रत्ती भर भी स्वीकार नहीं करता है और वह एक दानव के अलावा कुछ नहीं है—तो तुम्हें कैसा लगेगा? वह व्यक्ति जिसके बारे में हमने अभी-अभी जिक्र किया कि उसे निष्कासित कर दिया गया था उसे देखा जाए तो—अगर तुम इस तरह के व्यक्ति के साथ मेलजोल रखते हो और एक दिन तुम्हें पता चलता है कि उसकी मानवता बहुत बुरी है, वह न सिर्फ अपने दिल में परमेश्वर से नफरत करता है और सत्य बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है, बल्कि उनसे भी नफरत करता है जो प्रेम के कारण उसकी मदद करते हैं, और इससे तुम्हें यकीन हो जाता है कि इस तरह का व्यक्ति एक सच्चा दानव है, तो तुम्हें कैसा लगेगा? (मुझे लगेगा कि मैं सच में बेवकूफ था।) सबसे पहले तुम्हें लगेगा कि तुम बेवकूफ थे और तुम्हें अचरज होगा कि तुमने ऐसे व्यक्ति पर इतना सारा निरर्थक प्रयास कैसे कर दिया। और क्या? (मुझे कुछ हद तक घिनौना महसूस होगा।) किसके प्रति घिनौना? उसके प्रति या अपने प्रति घिनौना? (उसके प्रति घिनौना, लेकिन अपने प्रति भी क्योंकि मैं उसका भेद पहचानने में असमर्थ रहा।) तो क्या अब भी तुम भविष्य में उसे देखना या उससे मेलजोल रखना चाहोगे? (नहीं।) तो फिर तुम उसके साथ किस तरह का रिश्ता रखना चाहोगे? उसके साथ मेलजोल रखने में तुम किस तरीके से पेश आना चाहोगे? (मैं उससे फिर कभी भी मिलना नहीं चाहूँगा—मैं उससे जितना दूर रह सकूँगा, उतना ही अच्छा होगा।) तो फिर अगर ऐसा हो कि अपना कर्तव्य करने के दौरान तुम्हें अब भी कभी-कभी उससे मिलना पड़े या उसके साथ कार्य पर चर्चा करनी पड़े और तुम उससे बच नहीं सकते—तो तुम क्या करोगे? क्या तुम लोगों ने इसके लिए कोई सिद्धांत और अभ्यास का मार्ग निकाला है? तुम लोगों को उसके प्रति घिनौना महसूस होता है और इसलिए तुम उससे बचना चाहते हो और उससे नहीं मिलना चाहते, लेकिन अगर तुम अपने कर्तव्य में उससे मिलने से बचते हो तो इससे कार्य में देरी होगी और उस पर असर पड़ेगा—तो तुम्हें क्या करना चाहिए? क्या तुम लोगों के पास कोई अच्छा समाधान है? (नहीं।) तो फिर मैं तुम लोगों को दो समाधान बताऊँगा। पहला यह है कि अगर इस तरह का व्यक्ति सेवा करने के लिए कलीसिया में रह सकता है तो जब तुम्हें अपने कर्तव्य में उसके संपर्क में रहने की जरूरत न हो तो तुम मत रहो। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम उसके प्रति घिनौना महसूस करते हो, उसके संपर्क में रहना अजीब और दर्दनाक लगता है और क्योंकि वह भी यह भांप सकता है कि तुम उसके प्रति घिनौना महसूस करते हो, जो उसे परेशान करने वाला लगता है। और इसलिए अब तुम्हें पहले की तरह उसके सामने अपने दिल के राज खोलने और उसे अपने अंतरतम विचार बताने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बजाय तुम बस सहनशील और धैर्यवान बनो और समझदारी भरे तरीकों का उपयोग करके उससे मेलजोल रखो—बस इतना ही काफी है। यह एक सिद्धांत है। दूसरा यह है कि जब तुम्हें अपने कार्य में उसके संपर्क में रहना ही पड़े, तो तुम्हें उसे सौंपा जा रहा कार्य और उससे संबंधित सत्य सिद्धांत उसे स्पष्ट रूप से समझा देने होंगे। यहाँ एक बिंदु है जिस पर तुम्हें जरूर ध्यान देना होगा—तुम्हें यह देखना होगा कि वह उसे सौंपे गए कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने में सक्षम है या नहीं। अगर वह आमतौर पर इस कार्य को करने में समर्थ है तो उसके साथ संगति करो और मामले को निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ ढंग से सँभालो। लेकिन अगर वह इस कार्य में हमेशा लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रहता है, तो तुम उसे यह कार्य सौंपते हुए सहज महसूस नहीं कर सकते, और उसके बजाय तुम्हें किसी और को चुन लेना चाहिए। अगर इस मौके पर कोई उपयुक्त उम्मीदवार नहीं है और तुम्हारे पास उसका उपयोग करने के अलावा कोई चारा नहीं है, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उसका पर्यवेक्षण करने के लिए किसी की व्यवस्था करनी चाहिए। जैसे ही यह पाया जाए कि वह वास्तविक कार्य नहीं कर रहा है या इस तरीके से व्यवहार कर रहा है जिससे विघ्न-बाधाएँ या गड़बड़ियाँ उत्पन्न हो रही हैं, तो इसकी तुरंत सूचना दी जानी चाहिए। अगर उसका पर्यवेक्षण करने वाला व्यक्ति प्रभावी ढंग से ऐसा करने में विफल रहता है तो एक और समाधान है : अगुआओं और कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से उसका पर्यवेक्षण करना चाहिए और उसके कार्य पर अनुवर्ती कार्रवाई करनी चाहिए और इन अनुवर्ती कार्रवाइयों की आवृत्ति थोड़ी ज्यादा होनी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोग बेहद गैर-भरोसेमंद होते हैं; जैसे ही उन पर से कड़ी नजर हटा ली जाती है, उनके बुरे कर्म करने और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करने और बाधा डालने की संभावना रहती है, और फिर उनका उपयोग करने से फायदों की तुलना में नुकसान ज्यादा होंगे। इसलिए अगर तुम्हें कार्य के लिए उनसे मेलजोल रखना ही है, तो तुम इससे बच नहीं सकते। सिर्फ इसलिए कि तुम उनका भेद पहचान सकते हो और उनका असली चेहरा देख सकते हो, तुम उनसे दूरी नहीं बना सकते या उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते—यह गैर-जिम्मेदारी की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि तुम उनका भेद पहचानने में समर्थ हो और चूँकि तुम्हें पता है कि उनका प्रकृति सार दानव का है और तुम जानते हो कि वे बुरे कर्म कर सकते हैं और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं, इसलिए तुम्हारी और ज्यादा जिम्मेदारी बनती है कि तुम उनका पर्यवेक्षण करो और उन पर अनुवर्ती कार्रवाई करो, बजाय इसके कि भय या घिनौनेपन के कारण तुम उन्हें नजरअंदाज कर दो। अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में तुम्हारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी परमेश्वर के घर के द्वारों की रखवाली करना, परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा करना और भाई-बहनों की देखभाल करना है। अब जब दानव ने अपना असली रूप प्रकट कर ही दिया है और तुम पहले से ही उसकी असलियत देख चुके हो और जानते हो कि वह किस किस्म का नीच है, तो तुम्हें उसका पर्यवेक्षण और भी अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि वह यथासंभव अधिकतम सीमा तक प्रभावी ढंग से काम करे—यही वह चीज है जो तुम्हें करनी चाहिए। इस कारण से कि तुमने उसकी असलियत देख ली है, तुम्हें उस पर ध्यान देने से इनकार नहीं करना चाहिए या उसे जो कार्य समझाना चाहिए उसे स्पष्ट रूप से समझाने में विफल नहीं होना चाहिए या अगर वह तुमसे कार्य से संबंधित मुद्दों के बारे में पूछता है, तो भी तुम्हें उसके साथ संगति करने से इनकार नहीं करना चाहिए। क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य पर अपना गुस्सा निकालना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के घर के कार्य और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश की उपेक्षा करना नहीं है? अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम गलती कर रहे हो—इसका मतलब है कि तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की है। अपने निजी जीवन में हो सकता है कि तुम्हारा उसके साथ बिल्कुल कोई व्यवहार न हो और अब तुम उससे वैसे मेलजोल रखना बंद कर सकते हो जैसे पहले रखते थे। लेकिन अगर परमेश्वर के घर का कार्य तुम्हें उसके साथ बातचीत करने और मेलजोल रखने की अपेक्षा करता है तो तुम इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते—यह तुम्हारा कर्तव्य और तुम्हारी जिम्मेदारी है और तुम इससे बचने के लिए बहाने नहीं बना सकते। जब दानवों की बात आती है, तो उनसे सिर्फ दूरी बनाए रखने, उन्हें अस्वीकार करने, उनसे दूर रहने और अपने दिल में उनके प्रति नापसंदगी और विमुखता महसूस करने का रास्ता अपनाना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है। तुम्हें उनका पर्यवेक्षण भी करना होगा और उन पर अंकुश भी लगाना होगा। अगर वे सेवा करने को तैयार हैं तो तुम्हें उनकी मदद करनी चाहिए और उचित रूप से सेवा करने के लिए उनका उपयोग करना चाहिए—उन्हें यथासंभव अधिकतम सीमा तक प्रभावी ढंग से सेवा करने में सक्षम बनाना चाहिए। अगर वे उचित रूप से सेवा नहीं करते हैं और एक पल के लिए भी निगरानी के बगैर छोड़े जाने पर कलीसिया के कार्य में बाधा डाल सकते हैं और उसे बरबाद कर सकते हैं, तो उनकी उपयोगिता की तुलना में उनके कारण हुआ नुकसान ज्यादा है और उन्हें तुरंत बाहर निकाल दिया जाना चाहिए। जब भी जरूरत हो, गहन-विश्लेषण के लिए ऐसे नकारात्मक उदाहरणों की चर्चा चलाई जानी चाहिए ताकि भाई-बहन भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त कर सकें, दानवों और शैतानों का प्रकृति सार समझ सकें और फिर दिल से उन्हें अस्वीकार कर सकें, वे उनके द्वारा गुमराह, बाधित या नियंत्रित न हों। परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा करने के लिए दानवों और शैतानों का उपयोग करने, सभी चीजों का उपयोग करने का यही मतलब है। यह तुम लोगों की जिम्मेदारी है—यही वह चीज है जो तुम लोगों को करनी चाहिए। लेकिन तुम लोगों में इस जिम्मेदारी का भाव नहीं है। ठीक जैसा कि तुम लोगों ने इससे पहले कहा—एक बार जब तुममें इस तरह के व्यक्ति का भेद पहचानने की क्षमता आ जाती है तो तुम्हें घिनौना महसूस होता है और तुम उसे और नहीं देखना चाहते और अगर वह तुम्हें दिख भी जाता है, तो तुम घूम कर चले जाते हो, उससे जितना हो सके उतना दूर रहते हो। समाधान के नाम पर तुम लोगों के पास बस यही है। तुम लोगों में परमेश्वर के घर के कार्य के लिए, परमेश्वर के घर के हितों के लिए या भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए दायित्व का कोई भाव नहीं है। यही तुम लोगों का आध्यात्मिक कद है—यह बेनकाब हो गया है, है ना? तुम एक दानव के सार की असलियत देख लेते हो और फिर जब भी वह तुम्हें दिखता है, तुम उससे बचते हो। लेकिन तुम भाई-बहनों की रक्षा नहीं करते हो और नतीजतन उन्हें नुकसान पहुँचता है। तुम अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल रहते हो—यह जिम्मेदारी की उपेक्षा है। जब दानव अभी तक बेनकाब नहीं हुआ है, तब तुम्हें भाई-बहनों को चेतावनी देनी चाहिए, उन्हें कुकर्मियों से सावधान रहने की बात याद दिलानी चाहिए, उन्हें बताना चाहिए कि दानव ने क्या किया, उसने ऐसी चीजें क्यों की, उसके क्रियाकलापों की प्रकृति क्या है, इन क्रियाकलापों के क्या प्रभाव हो सकते हैं और उनके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, परमेश्वर इस दानव को कैसे निरूपित करता है और उससे कैसे पेश आना चाहिए। एक बार जब भाई-बहन भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त कर लें और दानव सेवा करना समाप्त कर ले और भाई-बहनों या परमेश्वर के घर के लिए उसका कोई मूल्य न रह जाए, तो तुम्हें उसे बाहर निकाल देना चाहिए जिससे इस दानव और शैतान का यह जीवन समाप्त हो जाए। इसे बुद्धिमानी कहते हैं—यह सिद्धांतों के साथ कार्य करना और अपने पास अभ्यास के लिए मार्ग होना है। तुम अपने निजी जीवन में इस तरह के व्यक्ति से कैसे मेलजोल रखते हो, यह तुम पर निर्भर करता है—वह तुम्हारी आजादी है। लेकिन एक जिम्मेदारी ऐसी है जिसे अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में तुम्हें उठानी होगी : तुम्हें भाई-बहनों की रक्षा करनी होगी और परमेश्वर के घर के हितों और कलीसिया के कार्य का बचाव करना होगा। इस सिद्धांत की नींव पर, इस प्रकार के व्यक्ति के संबंध में जो कि एक दानव है, अगर फिलहाल वह सेवा कर रहा है तो तुम्हें जल्दी से उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। तुम्हें उसके कार्य का पर्यवेक्षण करना चाहिए और यह देखने के लिए कि वह क्या कर रहा है उसकी हर गतिविधि को ध्यान से देखना चाहिए। जैसे ही कोई ऐसा संकेत नजर आए कि कुछ गड़बड़ है, तुम्हें तुरंत उसे उजागर करने और उसकी काट-छाँट करने का अभ्यास करना चाहिए या उसे उसके पद से हटा देना चाहिए। अगर उजागर और काट-छाँट किए जाने के बाद वह जरा-सी सेवा कर पाता है, तो यह कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद है। लेकिन एक बार जब यह पता चल जाता है कि वह सेवा नहीं करना चाहता, वह सही मार्ग नहीं अपना रहा है, गड़बड़ करने और बाधा डालने वाला है और भाई-बहनों को गुमराह करने के लिए अपने दानवी पंजे बढ़ा रहा है, तो यही वह समय है जब दानव अपना असली रूप प्रकट करता है और उसके खिलाफ कार्रवाई करने का यही सही समय है। उसे सेवा करने का मौका दिया गया था लेकिन उसने उचित रूप से सेवा नहीं की—तो फिर उसे बी समूह में भेज दो। अगर परिस्थिति गंभीर है, तो उसे बहिष्कृत या निष्कासित करने का अभ्यास करो—यह शैतान की किस्मत का अंत करने का भी समय है। जब तक तुम इन दो सिद्धांतों का पालन करते हो, तब तक तुम लोग कुकर्मियों और दानवों से सिद्धांतयुक्त तरीके से पेश आ पाओगे। क्या इस तरीके से इसे करने से तुम्हारी जिम्मेदारी पूरी हो रही है? (हाँ।) एक लिहाज से तुम्हारे पास दानवों का भेद पहचानने की क्षमता होगी, अब तुम उनके द्वारा और गुमराह या बाधित नहीं होगे और अब तुम बेवकूफी भरी चीजें और नहीं करोगे—कम से कम, अब तुम ऐसे लोगों के साथ सत्य की संगति और नहीं करोगे जो दानव हैं। अपने दिल में तुम्हें पता होगा : यह व्यक्ति दानव है—उसके साथ सत्य की संगति करना भैंस के आगे बीन बजाने के समान है; उनके साथ सत्य की संगति चाहे कैसे भी की जाए, वह व्यर्थ ही जाएगी। इस प्रकार तुम बेवकूफी भरी चीजें नहीं करते रहोगे। तुम उनसे बस कुछ धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करोगे जो उन्हें समझने चाहिए और उन विनियमों के बारे में बात करोगे जिनका उन्हें पालन करना चाहिए—इतना काफी है। अगर तुम इस तरीके से अभ्यास करोगे, तो कलीसिया के कार्य पर असर नहीं पड़ेगा। लेकिन अगर तुम सिद्धांत नहीं समझते हो, तो संभव है कि तुम बेवकूफी भरी चीजें कर बैठो। दूसरे लिहाज से अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इन सेवाकर्मियों और दानवों का उचित रूप से पर्यवेक्षण और उपयोग करना चाहिए जो सत्य रत्ती भर भी स्वीकार नहीं करते हैं। इस तरीके से अभ्यास करने से यह सुनिश्चित हो सकता है कि कलीसिया के कार्य को कोई नुकसान न पहुँचे और साथ ही भाई-बहनों की दानवों और शैतानों द्वारा गुमराह और बाधित किए जाने से भी रक्षा हो सके। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) तुम्हें कुकर्मियों और दानवों से भाई-बहनों की तरह बिल्कुल पेश नहीं आना चाहिए। जब तक तुममें दानवों और कुकर्मियों का भेद पहचानने की क्षमता है तब तक तुम फिर कभी बेवकूफी भरी चीजें नहीं करोगे। पहले लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं थी और वे कई बेवकूफी भरी चीजें करते थे—हमेशा कुकर्मियों और दानवों से भाई-बहनों की तरह पेश आते थे और अपनी कीमत पर दानवों को हमेशा अपनी खिल्ली उड़ाने देते थे। जब तुम दानवों के साथ संगति करने के लिए अपना दिल खोल देते थे, तो वे अंदर से तुम्हारा उपहास करते हुए सोचते थे, “तुम कितने ईमानदार, कितने शुद्ध और खुले हो—तुम सच में बेवकूफ हो!” अब जब तुममें दानवों का भेद पहचानने की क्षमता है, तो तुम इस तरह की बेवकूफी भरी चीज और नहीं करोगे। अब तुम्हें पता है कि संगति में अपना दिल खोलना या किसी को सहारा देना और मदद करना, ऐसा तुम्हें उन सच्चे भाई-बहनों के साथ करना चाहिए, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनमें मानवता है—दानवों के साथ नहीं। यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि अब तुम दानवों के सामने कातर या भयभीत महसूस नहीं करते हो। तुम जानते हो कि वे दानव हैं और तुम जानते हो कि वे अपने दिलों में क्या सोच रहे हैं। अब जब तुममें उनका भेद पहचानने की क्षमता है तो तुम्हें पता है कि उनसे उचित रूप से कैसे पेश आना है। तुम्हें हमेशा उन पर कड़ी नजर रखनी चाहिए—देखो कि वे क्या करने का प्रयास कर रहे हैं, वे अपने दिलों में क्या जोड़-भाग कर रहे हैं और क्या साजिशें रच रहे हैं, वे कार्य के किन हिस्सों में गड़बड़ कर सकते हैं, बाधा डाल सकते हैं और तोड़-फोड़ कर सकते हैं, वे दूसरों को भड़काने और गुमराह करने के लिए किस तरह के शब्दों का उपयोग कर सकते हैं और वे कौन-से लक्ष्य हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। एक बार जब तुम इन सभी चीजों को स्पष्ट रूप से देखोगे, तो तुम जान जाओगे कि कैसे उचित रूप से कार्य करना है, और तुम सत्य सिद्धांतों का पालन करोगे।

दानवों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों की विकृत अभिव्यक्तियों का भेद पहचानने पर जब हमने संगति की, उसके बाद अब शायद तुममें से ज्यादातर लोगों के दिलों में कुछ स्पष्टता और भेद पहचानने की जरा-सी क्षमता आ गई है—जैसे कि इतने वर्षों तक लोगों से मेलजोल रखने के बाद उनमें से कौन-से लोग दानवों जैसे लगते हैं जिनके साथ तुम अपनी सच्ची भावनाएँ अब और साझा नहीं करोगे; और कौन-से लोग भाई-बहन हैं जिनके साथ तुम ज्यादा मेलजोल रखोगे, जिनके और करीब जाओगे और—जब कोई बात हो—तो ज्यादा संगति करोगे। इस तरीके से हर तरह के व्यक्ति के साथ तुम्हारा व्यवहार सिद्धांतयुक्त होगा और तुम गलतियाँ नहीं करोगे। लेकिन क्या ज्यादातर लोग दानवों का भेद पहचानने, दानवों की प्रकृति की असलियत देखने के बिंदु तक पहुँच सकते हैं? और अगर कोई दानव सेवा करने को तैयार है तो क्या वे उस दानव की सेवा का उपयोग कर सकते हैं? ज्यादातर भाई-बहन इस तरीके से अभ्यास करने में अक्षम हैं—लेकिन अगुआओं और कार्यकर्ताओं को ऐसा करने में समर्थ होना चाहिए। मैं क्यों कहता हूँ कि उन्हें ऐसा करने में समर्थ होना चाहिए? क्योंकि अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में तुम्हें चीजों की अच्छी तरह से जाँच करनी चाहिए। एक बार जब तुम्हें यह पता चल जाता है कि कोई कुकर्मी बुरे कर्म कर रहा है तो तुम्हें तुरंत उसे उजागर करने, उसका गहन-विश्लेषण करने और उसकी विघ्न-बाधाओं और गड़बड़ियों पर अंकुश लगाने में समर्थ होना चाहिए। अगर तुम इस तरीके से अभ्यास कर सके, तो तुम कलीसिया के कार्य की सामान्य प्रगति सुनिश्चित कर पाओगे और भाई-बहनों की रक्षा होगी—उनमें भेद पहचानने की क्षमता बढ़ेगी और दानवों की बाधाओं के कारण उनके जीवन-प्रवेश को नुकसान नहीं पहुँचेगा। अगर तुम इस तरीके से अभ्यास करने में असमर्थ रहते हो—अगर तुम दानवों पर अंकुश नहीं लगा सकते, द्वार की रखवाली नहीं कर सकते—तो दानव बाधा डालने के लिए लगातार आते रहेंगे। आज वे एक व्यक्ति को बाधित करते हैं, उसे नकारात्मक बनाते हैं और सुसमाचार का प्रचार करने में उसके उत्साहहीन बन जाने का कारण बनते हैं; कल वे किसी और को बाधित करेंगे जिसके फलस्वरूप वह अपना कर्तव्य नहीं करना चाहेगा जिससे कार्य में देरी होगी और तुम उसकी जगह कोई और व्यक्ति ढूँढ़ने के लिए मजबूर हो जाओगे। तुम्हें कुछ आकस्मिक, अप्रत्याशित परिस्थितियाँ लगातार सँभालनी पड़ेंगी। क्या इस तरह से कार्य करना बहुत निष्क्रिय नहीं है? (हाँ, है।) तो फिर अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में क्या तुम मानक-स्तर का होने से बहुत दूर नहीं हो? अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा नहीं कर रहे होते तो तुम अपने जीवन प्रवेश का, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने का और अपने कर्तव्य का प्रबंध करने में समर्थ होते। लेकिन एक बार जब तुम अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा करना शुरू कर देते हो, तो तुम हर दिन व्यस्त रहते हो—पागलों की तरह इधर-उधर भागते रहते हो, बहुत दौड़धूप करते रहते हो। या तो कोई मसीह-विरोधी या फिर कोई कुकर्मी आ टपकता है और वह कलीसिया में बाधा डालता है, या कुछ भाई-बहन नकारात्मक हो जाते हैं और अपना कर्तव्य नहीं करना चाहते हैं, या कोई नया विश्वासी अफवाहों से गुमराह हो जाता है और अब विश्वास नहीं रखना चाहता और पीछे हट जाता है। कार्य समुचित रूप से नहीं किया जा रहा है जिससे हर जगह समस्याएँ लगातार पैदा हो रही हैं और इन समस्याओं के लगातार पैदा होने से तुम अभिभूत हो जाते हो और बुरी तरह से थक जाते हो और हर दिन का सामना करने में असमर्थ हो जाते हो, अच्छी तरह से खाने-सोने में असमर्थ हो जाते हो—फिर भी कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जाता है। यह कार्य के लिए पूरी तरह से अक्षम होना है। ऐसा अगुआ या कार्यकर्ता बिल्कुल मानक-स्तर का नहीं है। मैं क्यों कहता हूँ कि तुम मानक-स्तर के नहीं हो? क्योंकि तुमने इन समस्याओं के बारे में, जिनका पैदा होना तय था, पहले से स्पष्ट रूप से वह संगति नहीं की जिससे सभी को सत्य समझने में और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करने में मदद मिलती ताकि समस्याओं के सामने आते ही उन्हें तुरंत हल किया जा सकता। दूसरे शब्दों में, तुमने ज्यादातर लोगों को इन चीजों का सामना करने की क्षमता से लैस करने के लिए टीका नहीं लगाया। आखिरकार जब ये चीजें एक के बाद एक घटित हुईं तो तुम बहुत निष्क्रिय हो गए—हमेशा किसी गड़बड़ को साफ करते रहे, हमेशा दुष्परिणाम को साफ करते रहे। इसका मतलब है कि तुम अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में मानक-स्तर का होने से दूर हो। तुम विभिन्न प्रकारों के दानवों से जिस तरीके से पेश आते हो उसमें उन्हें सँभालने की तुम्हारी विधियाँ अनुचित हैं, तुम जो कार्य करते हो वह अपर्याप्त है और इसलिए कलीसिया का कार्य लगातार बाधित होता रहता है, लगातार समस्याओं से पीड़ित रहता है। तुम्हें हमेशा चीजों को ठीक करते रहना पड़ता है और उन्हें निपटाते रहना पड़ता है, इसलिए तुम खुद को बेहद व्यस्त महसूस करते हो और यह कार्य करना बहुत श्रमसाध्य हो जाता है।

क्या तुम्हें दानवों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों से पेश आने के दो सिद्धांत याद हैं? मुख्य सिद्धांत क्या है? दानवों और शैतानों से मत डरो और उनसे मत बचो। इसके बजाय उनका भेद पहचानना और उनके सार की असलियत देखना सीखो और उनके विचारों के रुझान को समझो; यानी स्पष्ट रूप से यह देखो कि वे कलीसिया में क्या करना चाहते हैं और वे कौन-से लक्ष्य हासिल करना चाहते हैं। इस तरीके से तुम निष्क्रियता को पहल में बदल सकते हो और उन्हें उजागर करने और उनसे निपटने के लिए सक्रियता से आक्रमण करने की पहल कर सकते हो। अगर दानवों और शैतानों को बोलते और कार्य करते देखकर तुम सिर्फ यह महसूस करते हो कि वे घिनौने हैं और तुम उन पर ध्यान नहीं देना चाहते या उनके साथ मिलकर कार्य नहीं करना चाहते और बस इतना ही—यहाँ तक कि जब तुम दानवों और शैतानों को कलीसिया के कार्य में बाधा डालते और गड़बड़ी करते देखते हो, तब भी तुम इसे अनदेखा कर देते हो—तो क्या इस तरह से कार्य करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है? (नहीं।) कलीसिया में घुसपैठ करने के बाद दानव और शैतान नियमों का पालन करने वाले तरीके से कलीसियाई जीवन नहीं जीएँगे और नियमों का पालन करने वाले तरीके से सेवा तो बिल्कुल नहीं करेंगे। वे अनिवार्यतः कुछ न कुछ बोलेंगे और चीजें करेंगे, यहाँ तक कि वे तब तक शांत नहीं होंगे जब तक उनके लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते। इस प्रकार से दानवों से पेश आते समय तुम्हें बुद्धिमान होना चाहिए और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना चाहिए। जिन्हें उजागर और अस्वीकार किया जाना चाहिए, उन्हें उजागर और अस्वीकार करना होगा। जब तक कोई दानव अभी बेनकाब नहीं हुआ है और अगर वह सेवा करने को तैयार है तो सेवा के लिए उसका उपयोग करो और जब वह ऐसा कर रहा हो तो उस पर कड़ी नजर रखो। उदाहरण के लिए, अगर तुम कार्य की किसी खास मद के किसी विशेष पर्यवेक्षक की असलियत ठीक से नहीं देख पा रहे हो—तुम देखते हो कि वह दूसरे भाई-बहनों की तरह सीधा-सादा और खुला नहीं है, वह कभी भी किसी को पूरा सच नहीं बताता है और कार्य में कठिनाइयों या समस्याओं से सामना होने पर वह उनका समाधान ढूँढ़ने का प्रयास नहीं करता है—तो तुम्हें उसकी स्थिति की तह तक जाने की पहल करने की जरूरत है। तुम्हें निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम तब तक प्रतीक्षा करते रहो, जब तक कि वह कार्य को बिगाड़ न दे और फिर तुम “घोड़ा भाग जाने के बाद अस्तबल के दरवाजे पर ताला लगाने” का प्रयास करो। तुम्हें उससे बात करने और यह देखने की जरूरत है कि अपने कर्तव्य के प्रति उसका क्या रवैया है, क्या उसके पास कार्य के लिए विशिष्ट योजनाएँ और व्यवस्थाएँ हैं, क्या उसके पास कार्य करने के सिद्धांत हैं, क्या वह कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य कर सकता है, और क्या वह अपने से ऊपर के लोगों को धोखा देने, अपने से नीचे के लोगों से बातें छिपाने और अपने खुद के तरीके से चीजें करने में सक्षम है। क्या ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिन पर तुम्हें ध्यान देना चाहिए? (हाँ, हैं।) मान लो कि तुम्हें पता चलता है कि कोई व्यक्ति दानव है और इसलिए तुम उससे अब और मेलजोल नहीं करते हो, यहाँ तक कि यह कहते हो, “यह दानव बहुत ही भयानक है—इसे देखकर ही महसूस होता है कि यह घिनौना है। मैं इससे अब और बात नहीं करूँगा। मुझे अपने और उसके बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी और भाई-बहनों से भी एक स्पष्ट रेखा खिंचवानी होगी—सभी को उसे नजरअंदाज करना चाहिए।” क्या इस तरीके से कार्य करना ठीक है? यह कार्य करने का बेवकूफी भरा तरीका है। यह न तो चतुर है और न ही बुद्धिमान और इसमें कोई आध्यात्मिक कद नहीं है। क्या सिर्फ इसलिए कि तुम उससे बात नहीं करते हो, तुम्हें लगता है कि तुम चतुर हो? क्या तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील व्यक्ति हो? क्या तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है? क्या तुमने झुंड की रखवाली करने और परमेश्वर के घर के द्वार पर नजर रखने का दायित्व उठाया है? क्या तुम्हें इन चीजों के बारे में भी सोचना नहीं चाहिए? लोगों से दानवों का भेद पहचानने की क्षमता रखने की परमेश्वर की अपेक्षा का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि दानवों को बस अस्वीकार कर देना ही काफी है। तुम्हें दानवों का पर्यवेक्षण करने और उन्हें रोकने में भी समर्थ होना चाहिए; अगर कोई दानव अभी तक बेनकाब नहीं हुआ है और वह सेवा करना चाहता है तो तुम्हें उसका उपयोग करने में भी समर्थ होना चाहिए—ये चीजें भी वह कर्तव्य है जो तुम्हें करना चाहिए, वह जिम्मेदारी है जो तुम्हें पूरी करनी चाहिए और यह पूरी तरह से कलीसिया के कार्य का बचाव करने के लिए है। अगर तुम देखते हो कि कोई व्यक्ति असाधारण रूप से रहस्यमय है, वह हर एक बात बहुत सतर्कता से कहता है और कोई उसे समझ नहीं पाता है, तो वह व्यक्ति बहुत खतरनाक है और भरोसे के लायक नहीं है। खासकर अगर तुम किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हो जो विशेष रूप से कुटिल, धूर्त और चालाक तरीके से व्यवहार करता है—जो कभी भी किसी को पूरा सच नहीं बताता है और जिसके साथ मेलजोल रखने वाले या जुड़ने वाले ज्यादातर भाई-बहन उसकी असलियत नहीं देख पाते हैं—तो ऐसे व्यक्ति को सिर्फ नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है और अकेला नहीं छोड़ा जा सकता है। इसके बजाय तुम्हें उसके पास जाना चाहिए, उसके संपर्क में आना चाहिए और उससे बात करनी चाहिए ताकि उसका भेद पहचानने की तुम्हारी क्षमता और अंतर्दृष्टि बढ़े, तुम देख पाओ कि वह क्या सोच रहा है, उसके क्रियाकलापों का स्रोत और प्रेरणा क्या है, वह क्या करने की योजना बना रहा है, क्या अपना कर्तव्य करते समय वह कार्य की जिम्मेदारी उठा सकता है, क्या वह कलीसिया के कार्य में बाधा डाल सकता है और एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर सकता है और क्या उसके कर्तव्य करने से फायदे की तुलना में नुकसान ज्यादा होता है और अंत में यह ऐसी हानि होती है जो लाभ से कहीं ज्यादा है। देखो—क्या अगुआ या कार्यकर्ता होना कोई आसान मामला है? जब कलीसिया में ऐसे किसी व्यक्ति का पता चलता है तो तुम्हें न सिर्फ उससे दूरी नहीं बनानी चाहिए और उससे बचना नहीं चाहिए, बल्कि सक्रियता से उसके पास जाना चाहिए और उसके संपर्क में आना चाहिए। ऐसा करने का क्या उद्देश्य है? यह उसकी स्थिति को ठीक से समझना और एहतियाती उपाय अपनाना है। उदाहरण के लिए, अगर तुम्हारे सामने कोई ऐसा सीसीपी एजेंट या जासूस आ जाता है जो तुम्हारी निजी जानकारी में ताक-झाँक करने के मौके लगातार तलाश रहा है और तुम्हें अपने दिल में यह आभास होता है कि वह एक जासूस है तो तुम्हें उससे सावधान रहना चाहिए और तुम्हें उसे अपनी वास्तविक स्थिति बिल्कुल भी नहीं बतानी चाहिए। तुम्हें एक और भी जरूरी बात याद रखनी चाहिए : तुम्हें उसे तुम्हारा फोन नंबर, ईमेल अकाउंट वगैरह पता नहीं चलने देना है। हालाँकि अगर तुम सिर्फ उसके द्वारा तुम्हारी स्थिति के बारे में पूछताछ करने के बारे में ही सावधान रहते हो, लेकिन तुम दूसरी चीजें, जैसे कि वह और किसके संपर्क में है, वह किसके बारे में जानकारी ले रहा है और वह कलीसिया की किस परिस्थिति के बारे में पूछ रहा है आदि को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हो और उन्हें यूँ ही जाने देते हो—यह तक सोचते हो कि तुम ऐसा करने में बहुत चतुर बन रहे हो—तो क्या तुम वाकई इस मामले से उचित तरीके से निपट रहे हो? क्या तुमने कोई बुद्धिमानी दिखाई है? क्या तुमने दिखाया है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद है? क्या तुमने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है? क्या तुमने परमेश्वर के घर के हितों का बचाव किया है और भाई-बहनों की रक्षा की है? अगर तुम इन मामलों पर जरा भी विचार नहीं करते हो, तो तुम पूरी तरह से स्वार्थी और नीच व्यक्ति हो। मान लो कि तुम्हारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति आ जाता है जो दानव है और वह तुमसे पूछता है कि तुम कहाँ से हो और क्या तुम्हारे परिवार में कोई परमेश्वर में विश्वास रखता है; तुम्हें पता है कि वह जानकारी जुटाने के लिए पूछताछ कर रहा है, इसलिए तुम अपनी वास्तविक स्थिति बताए बिना उसे टरका देने के लिए यूँ ही कुछ चीजें कह देते हो और फिर तुम प्रश्नों को घुमा देते हो और उससे पूछते हो, “तुम कहाँ से हो? तुम्हारे परिवार में कौन परमेश्वर में विश्वास रखता है? तुम्हारे अपने गृहनगर में कलीसिया में कलीसियाई जीवन कैसा है? क्या वहाँ सीसीपी विश्वासियों को गिरफ्तार करती है? क्या कभी तुम्हें गिरफ्तार किया गया है?” यह सुनकर सीसीपी एजेंट या जासूस मन ही मन सोचता है, “हमेशा मैं ही प्रश्न पूछता हूँ—ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई मेरी तरफ पलटा हो और उसने मुझसे जिरह की हो। यह व्यक्ति होशियार है!” यह देखकर कि तुम उससे लगातार प्रश्न पूछे जा रहे हो, वह इस बात से चिंतित हो उठता है कि उसकी पहचान उजागर हो जाएगी और इस कारण वह विषय बदल देता है। तुम्हें ऐसे व्यक्ति को बहुत ध्यान से देखना चाहिए। अगर तुम्हें पता चलता है कि वह बेहद संदेहजनक है और अस्सी प्रतिशत संभावना है कि वह सीसीपी का जासूस है तो तुम्हें उससे सावधान रहना चाहिए—तुम्हें भाई-बहनों के बारे में रत्ती भर भी जानकारी नहीं देनी चाहिए। अगर भाई-बहन उससे बिल्कुल भी सावधान नहीं रहते हैं और बिना किसी संकोच के इस व्यक्ति को अपनी सारी जानकारी दे देते हैं, किसी भी विषय पर बात करने को तैयार रहते हैं, तो यह कलीसिया और भाई-बहनों को आसानी से खतरे में डाल सकता है। इसलिए तुम्हें ऐसे व्यक्ति पर कड़ी नजर रखनी चाहिए—तुम्हें देखना चाहिए कि वह लगातार किसके संपर्क में आता है, लगातार किससे जानकारी हासिल करने का प्रयास करता है, क्या वह चुपके से भाई-बहनों के फोन नंबरों की जाँच कर रहा है या उनके कंप्यूटर पर खातों की जाँच कर रहा है या लोगों के पीठ पीछे परमेश्वर के घर की अंदरूनी जानकारी ढूँढ़ रहा है। तुम्हें उस पर कड़ी नजर रखनी चाहिए—तुम्हें उसे कामयाब नहीं होने देना चाहिए। तुम्हें भाई-बहनों से भी यह कहने की जरूरत है कि वे इस व्यक्ति से सावधान रहें—अगर वह जानकारी जुटाने के लिए बार-बार पूछताछ करता है तो उससे बचना चाहिए और उसे यह चेतावनी देनी चाहिए कि वह लोगों को परेशान न करे। इसके अलावा तुम्हें यह भी देखना होगा कि वह भाई-बहनों को गुमराह करने के लिए कौन-से विधर्म और भ्रांतियाँ फैला रहा है—अगर तुम्हें ऐसे मुद्दों का पता चलता है तो तुम्हें तुरंत उन्हें सँभालना चाहिए और उन्हें हल करना चाहिए। इस तरह से अभ्यास करना कलीसिया के कार्य का बचाव करना और भाई-बहनों की रक्षा करना है—यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है और यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की भी जिम्मेदारी है। अगर तुम चुपचाप देखते रहते हो और कुछ नहीं करते हो और उसे अपनी मर्जी से पूछताछ करने की अनुमति देते हो, तो हो सकता है कि कुछ बेवकूफ लोग या आस्था में उथली नींव वाले नए आए लोग उसे सब कुछ बता दें। इसके बाद मुख्यभूमि चीन की पुलिस तुरंत उनके परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को गिरफ्तार करना शुरू कर सकती है जिससे कुछ कलीसियाओं और कुछ भाई-बहनों पर मुसीबत आ सकती है। चाहे किसी भी तरह की परेशानी आ जाए, कुछ भी हो जाए, अगर अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति का पता चलता है जो दानव है, लेकिन तुम तुरंत उपाय नहीं करते हो, उचित रूप से एहतियाती कार्यवाही नहीं करते हो और नतीजतन कुछ बेवकूफ और जाहिल लोग ऐसी बहुत-सी चीजों का भेद खोल देते हैं जिनका भेद नहीं खोला जाना चाहिए और भाई-बहनों की जानकारी प्रकट कर देते हैं जिससे कलीसिया के कार्य और भाई-बहनों पर मुसीबत आ जाती है तो यह तुम्हारे द्वारा जिम्मेदारी की उपेक्षा करना है। मुझे बताओ, इस मामले में तुम्हारे कर्तव्य का प्रदर्शन कैसा रहा है? क्या तुमने इसे अच्छी तरह से किया? (नहीं।) अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं करना—क्या यह कोई ऐसा मामला है जिसमें तुमने परमेश्वर को निराश किया है? (हाँ।) यह परमेश्वर को निराश करना है। अगर तुम लोग खुद विदेश में काफी सुरक्षित हो, लेकिन अपनी बेवकूफी के कारण किसी सीसीपी एजेंट से मात खा जाते हो, तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे; यह मुख्यभूमि में तुम्हारे अपने गृहनगर की कलीसियाओं और भाई-बहनों पर आपदा ले आएगा। क्या तुम लोग ऐसा कोई नतीजा देखने को तैयार हो? (नहीं।) अगर किसी में जरा-सा भी जमीर और जरा-सी भी मानवता है तो उसे इस तरह की चीज होते देखने का अनिच्छुक होना चाहिए; चाहे फिलहाल वह खुद कहीं भी हो, वह मुख्यभूमि में किसी भी भाई-बहन को उत्पीड़न सहते हुए नहीं देखना चाहता। अगर कोई कहता है, “ऐसा है, अब मैं विदेश में सुरक्षित हूँ—कौन गिरफ्तार होता है इससे मुझे क्या! अगर कोई कष्ट सहता है, तो इससे मेरा क्या लेना-देना है? मुझे तो अपने परिवार तक की परवाह नहीं है। मुझे जरा भी स्नेह नहीं है”—तो क्या ऐसे व्यक्ति में मानवता है? (नहीं।) उसमें कोई मानवता नहीं है—ऐसे नहीं सोचना चाहिए। अगर तुम यह दावा करते हो कि तुममें जमीर और मानवता है, तो कम से कम तुम्हें मुख्यभूमि में अपने रिश्तेदारों और कलीसिया पर मुसीबत नहीं लानी चाहिए। इसलिए जब तुम दानवों का सामना कर रहे हो तो सिर्फ उनका भेद पहचानने की क्षमता होना पर्याप्त नहीं है—तुम्हें व्यापक रूप से सोचना भी चाहिए। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि किस तरीके से कार्य किया जाए जिससे यह सुनिश्चित हो कि तुम खुद को उजागर न करो और साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि मुख्यभूमि में तुम्हारे माता-पिता, रिश्तेदारों और भाई-बहनों को कोई नुकसान न पहुँचे। तुम्हें कलीसिया के कार्य का बचाव करने और परमेश्वर के घर के द्वार की रखवाली करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। यही वह जिम्मेदारी है जो लोगों को पूरी करनी चाहिए। अगर तुमने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है तो भले ही कुछ गलत हो गया हो क्योंकि ऐसी कुछ चीजें थीं जिन्हें तुम करने में असमर्थ थे या तुम किसी मामले की असलियत नहीं देख पाए थे, फिर भी तुम दोषी नहीं हो—सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है। लेकिन लोगों के परिप्रेक्ष्य से तुम्हें उस जिम्मेदारी के बारे में स्पष्ट होना चाहिए जो लोगों को पूरी करनी चाहिए। तुम्हें इससे जी नहीं चुराना चाहिए और तुम सिर्फ अपने बारे में नहीं सोच सकते—तुम्हें अपने आस-पास के भाई-बहनों का और कलीसिया के कार्य का भी ध्यान रखना चाहिए। क्या अब अभ्यास का यह मार्ग स्पष्ट है? (हाँ।) देखो, अगर इन मामलों पर संगति नहीं की जाती, तो तुम लोग सबसे निर्णायक और सबसे महत्वपूर्ण चीजों को नजरअंदाज कर देते और फिर भी तुम्हें लगता कि तुम्हें पता है कि दानवों और शैतानों से कैसे पेश आना है। हकीकत में तुम लोग अभ्यास के सिद्धांतों को नहीं समझते हो—यही तुम लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद है।

चाहे तुम सत्य, सकारात्मक चीजों और परमेश्वर के प्रति दानवों के रवैये को समझ पाओ या नहीं, हर हाल में, उनका सार सत्य से नफरत, सकारात्मक चीजों से नफरत और परमेश्वर से नफरत है। यह विकृत होना है। चाहे यह उनके द्वारा प्रकट किए गए शब्दों से हो या उनके दिलों के विचारों और दृष्टिकोणों से, सत्य के प्रति, सकारात्मक चीजों के प्रति और परमेश्वर के प्रति उनके रवैये को देखना संभव है। इस रवैये को देखा जाए, तो यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि दानव सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते हैं, सकारात्मक चीजें बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते हैं और यकीनन परमेश्वर की आराधना बिल्कुल नहीं करते हैं। इसलिए वे लोगों से कोई भी सही सुझाव, कथन या सलाह स्वीकार नहीं करते हैं। फिर जहाँ तक लोगों के लिए परमेश्वर से सत्य सिद्धांतों, परमेश्वर की चेतावनियों, परमेश्वर की अपेक्षाओं और परमेश्वर की शिक्षाओं का प्रश्न है, वे इन सबको और भी ज्यादा हल्के में लेते हैं और उन्हें कभी स्वीकार नहीं करते हैं। इसके बजाय वे अपने दिलों में उन्हें जो भी पसंद है, उन्हें जो भी फायदा पहुँचाता है उसके लिए षड्यंत्र करते रहते हैं। वे अपने रुतबे, अपनी प्रतिष्ठा, अपने गौरव और अपने गंतव्य के लिए षड्यंत्र करते रहते हैं; वे अपने वास्तविक जीवन में जिन भी फायदों का आनंद लेना चाहते हैं, जिन्हें भी प्राप्त करना और अर्जित करना चाहते हैं, उनके लिए षड्यंत्र करते रहते हैं। यह उनकी आंतरिक दुनिया है और यह इस चीज को दिखाने के लिए पर्याप्त है कि उनका प्रकृति सार दुष्ट है। यह विकृत प्रकृति सार कभी नहीं बदलेगा। शुरू से लेकर अंत तक वे जो कुछ भी करते हैं उसका और उनके सभी विचारों और दृष्टिकोणों का सत्य वास्तविकता से किसी भी प्रकार का कोई लेना-देना नहीं होता है और परमेश्वर की शिक्षाओं या मानव जीवन के सही मार्ग से कोई लेना-देना नहीं होता है; ये सभी दुष्ट और नकारात्मक चीजें हैं। चाहे तुम दुष्ट सार वाले लोगों के साथ सत्य की कैसे भी संगति करो, चाहे तुम प्रेम से कैसे भी उनकी मदद करने का प्रयास करो, तुम उनके दिलों को नहीं छू सकते, तुम उनके विचारों और दृष्टिकोणों को नहीं बदल सकते और तुम उनके जीने का तरीका नहीं बदल सकते जिसमें वे हर रोज सिर्फ बुराई के बारे में सोचते हैं। यकीनन तुम उनके उन लक्ष्यों को भी नहीं बदल सकते जिनका वे अनुसरण करते हैं और न ही हर मामले की ब्योरेवार योजना बनाने के उनके तरीके और दिशा को बदल सकते हो। ये लोग जो दानव हैं, शुरू से लेकर अंत तक एक जैसे ही रहते हैं। उनका दुष्ट सार नहीं बदलेगा। भले ही उन्होंने परमेश्वर के घर में परमेश्वर के नाम को छोड़े बिना या सच्चे मार्ग को छोड़े बिना हमेशा कर्तव्य किया हो, लेकिन क्योंकि वे सत्य स्वीकार नहीं करते हैं और वे जो कुछ भी सोचते हैं और चिंतन करते हैं वह नकारात्मक चीजों और दुष्ट चीजों से संबंधित होता है, उनके भ्रष्ट स्वभाव बिल्कुल भी छोड़े नहीं जा सकते और उनकी मानवता में बिल्कुल भी कोई बदलाव नहीं आ सकता। बेशक एक बात तो तय है : ये लोग बिल्कुल भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते। जहाँ तक उनके गंतव्य का प्रश्न है, वह स्पष्ट है। हम यहाँ इस पर संगति नहीं कर रहे हैं कि उनका गंतव्य क्या है। हम जिस चीज पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, वह उनके प्रकृति सार का भेद पहचानना और उसका गहन-विश्लेषण करना है।

दानवों से पुनर्जन्म लिए हुए लोगों के विकृत प्रकृति सार की पहली अभिव्यक्ति—“कुटिल होना”—पर अब पूरी तरह से संगति हो चुकी है। हमने मुख्य रूप से उनके विभिन्न रवैयों और अभिव्यक्तियों पर संगति की है कि वे सकारात्मक चीजों से किस तरह पेश आते हैं; साथ ही, इस पर भी कि वे किन विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों को अपने दिलों में सँजोते हैं और थामे रहते हैं। चाहे ये उनके ठोस प्रकाशन और अभिव्यक्तियाँ हों या उनके दिलों की गहराइयों में छिपी वे चीजें हों जिन्हें वे उजागर करने की हिम्मत नहीं करते हैं, यह सब साबित करता है कि वे आम भ्रष्ट मनुष्य नहीं हैं। उनमें आम भ्रष्ट मनुष्यों का जमीर और विवेक नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि इन लोगों में आम भ्रष्ट मनुष्यों की मानवता नहीं है। स्पष्ट रूप से कहें तो इन लोगों में कोई मानवता है ही नहीं। चाहे उनके विचार और दृष्टिकोण कितने भी दुष्ट हों, चाहे उनके कथन, क्रियाकलाप, व्यवहार और आचरण कितने भी दुष्ट हों और वे मानवता के साथ कितने भी असंगत हों, उनमें इसकी जरा-सी भी जागरूकता नहीं होती। वे कभी भी अपने प्रकृति सार को दुष्ट, सत्य के विपरीत या उसके प्रति शत्रुतापूर्ण निरूपित नहीं करते हैं। चाहे तुम उनके साथ कैसे भी संगति करो, वे तब भी अपने भ्रष्ट स्वभावों के दायरे में ही जीते हैं। आपस में मेल-जोल रखते समय ये लोग बहुत अच्छी तरह से मिलजुलकर रहते हैं और अपनी कलुषता में भी एक जैसी सोच रखते हैं। लेकिन अपने दिलों में वे उन लोगों के प्रति बेहद विकर्षित होते हैं और उनसे नफरत करते हैं जो सत्य समझते हैं और उसका अनुसरण करते हैं।

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