सत्य का अनुसरण कैसे करें (17) भाग तीन
ख. यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत
अब जबकि हमने उचित-अनुचित का भेद पहचानने के बारे में संगति पूरी कर ली है, इसलिए अब हमें यह जानने के बारे में बात करनी चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत, है ना? (हाँ।) यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत, निश्चित रूप से उचित-अनुचित का भेद पहचानने से अलग है; वरना इन पर अलग-अलग चर्चा करने की कोई आवश्यकता न होती। यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत, का अर्थ यह है कि मानवता के परिप्रेक्ष्य से व्यक्ति को यह जानना चाहिए कि कौन-से दृष्टिकोण और कौन-से शब्द सही हैं और कौन-से गलत हैं। जो सही हैं उन्हें कायम रखना चाहिए और जो गलत हैं उन्हें छोड़ देना चाहिए। सामान्य लोगों के मन में, क्या सही है और क्या गलत, इसका भेद पहचानने के लिए कुछ विचार, दृष्टिकोण और आधार होते हैं। वे जो सही है उस पर दृढ रहेंगे और जो गलत है उसका विरोध करेंगे या उसे अस्वीकार तक कर देंगे। अगर कोई यह भी नहीं कर सकता, तो यह दर्शाता है कि उसकी मानवता में कुछ कमी है; यह भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ऐसे लोग मानवता से रहित होते हैं। एक व्यक्ति के रूप में अगर तुम कहते हो कि तुममें मानवता है, लेकिन तुम यह तक नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो तुम आचरण कैसे कर सकते हो? तुम सही ढंग से आचरण कैसे कर सकते हो? तुम हर शब्द मानवता के भीतर कैसे बोल सकते हो और हर क्रियाकलाप मानवता के भीतर कैसे कर सकते हो? अगर तुम नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो तुम्हारा हर शब्द और हर क्रियाकलाप मानवता के भीतर बोला और किया नहीं जाता। मानवता के भीतर न बोलने या क्रियाकलाप न करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम ये शब्द और ये क्रियाकलाप उन सही विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर तर्कसंगत ढंग से नहीं बोलते और नहीं करते, जो मानवता में होने चाहिए—अपनी मानवता के भीतर न बोलने या क्रियाकलाप न करने का यही अर्थ है। कुछ लोग कहते हैं, “अगर कोई अपनी मानवता के भीतर नहीं बोलता या क्रियाकलाप नहीं करता, तो वह किस आधार पर बोलता और क्रियाकलाप करता है?” मोटे तौर पर कहें तो इसके दो आधार हैं। एक है राक्षसी प्रकृति के भीतर बोलना और क्रियाकलाप करना, शैतानी स्वभाव के अनुसार जीना। जो लोग सत्य समझते हैं, वे देख सकते हैं कि इन लोगों के विचार, दृष्टिकोण और रवैये उनके शब्दों और क्रियाकलापों में वैसे ही होते हैं जैसे दानवों के होते हैं और ये चीजें लोगों को गुमराह करती हैं, नुकसान पहुँचाती हैं, लुभाती और बहकाती हैं, और सकारात्मक नहीं होतीं। यह एक आधार है : अपनी राक्षसी प्रकृति के भीतर बोलना और क्रियाकलाप करना। दूसरा है दरिंदे की तरह बोलना और क्रियाकलाप करना, और दरिंदे मानवता से और भी अधिक रहित होते हैं। मानवता से रहित होने का अर्थ है जमीर या विवेक के बिना बोलना और क्रियाकलाप करना; सीधी-सी बात है। दरिंदे जो शब्द बोलते हैं, वे भ्रमित, मूर्खतापूर्ण, विकृत शब्दों का ढेर होते हैं; वे जो कहते हैं वे बस कुछ विकृत तर्क होते हैं। देखो, वे जो शब्द बोलते हैं, वे जानवरों के विचारों और दृष्टिकोणों के समान होते हैं—वे विकृत और मूर्खतापूर्ण, बेवकूफी भरे और भ्रमित होते हैं। उनकी बातें सुनने के बाद तुम्हें समझ नहीं आता कि हँसें या रोएँ, और तुम कहते हो, “वह ऐसा कैसे कह सकता है? मानो वह कोई तीन से पाँच साल तक का बच्चा हो, बेतुका और कुछ भी न जानने वाला। ये वे शब्द नहीं हैं जो एक वयस्क को कहने चाहिए! उसके शब्दों में दम नहीं होता, वे हास्यास्पद होते हैं—वे इतने शर्मनाक होते हैं कि लोगों के सामने नहीं कहे जा सकते!” यह एक जानवर, एक दरिंदा बोल रहा है। वह एक दरिंदे की प्रकृति के दायरे में बोल और कार्य कर रहा है, बोलने की किसी सूझ-बूझ या तर्कसंगतता के बिना, जमीर और विवेक तो दूर की बात है। यानी उसकी वाणी बेहद अविवेकपूर्ण होती है, इसके पीछे कोई तर्क नहीं होता है। तुम नहीं जानते कि वे जो चीजें कहते हैं, वे कहाँ से आती हैं, और उन्हें सुनने के बाद तुम पूरी तरह से भ्रमित और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हो। जितना ज्यादा तुम उनके शब्द और उनके द्वारा चीजों का वर्णन सुनते हो, उतना ही ज्यादा तुम्हें वह अराजक लगता है और तुम्हारे पास उसे समझने का कोई तरीका नहीं होता। जब वे बोलते हैं तो हमेशा बेकार की बातों में समय नष्ट करते हैं, चीजों को गड्डमड्ड कर देते हैं, खुद को दोहराते रहते हैं और एक ही चीज पर लगातार प्रलाप करते रहते हैं और फिर भी नहीं जानते कि अंत में उसे कैसे समेटें। यह एक दरिंदा, एक जानवर बोल रहा है। ऐसे लोगों की एक विशेषता होती है जो यह है कि चाहे वे कुछ भी करें, कुछ भी कहें, उनके पास चाहे कोई भी विचार या दृष्टिकोण हो या वे चाहे कोई भी विचार या दृष्टिकोण आत्मसात करें, यहाँ तक कि वे खुद नहीं जानते कि वह सही है या गलत। यह उनकी मानवता की एक विशेषता है। उनकी मानवता की विशेषता अंततः यही निर्धारित होती है कि ऐसे लोगों में कोई मानवता नहीं होती, यानी उनमें कोई जमीर और विवेक नहीं होता। वे यह तक नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो क्या तुम्हें लगता है कि वे जमीर के साथ बोल सकते हैं और क्रियाकलाप कर सकते हैं? अगर वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो क्या उनमें एक सामान्य व्यक्ति का जमीर और विवेक हो सकता है? अगर वे इसका भेद नहीं पहचान सकते कि क्या सही है और क्या गलत, तो क्या उनमें एक सामान्य व्यक्ति की सोच हो सकती है? उनमें वह कभी नहीं होगी। सामान्य लोग ऐसे व्यक्ति से संवाद नहीं कर सकते। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्या इसलिए कि तुम प्रेमरहित हो? नहीं, ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारे बीच कोई समानता नहीं है, तुम उसके साथ कोई विचार या दृष्टिकोण साझा नहीं करते। उसके साथ संवाद करना किसी जानवर, किसी दानव के साथ संवाद करने जैसा है; यह असंभव है। मुझे बताओ, अगर तुम दानवों और शैतानों के साथ सत्य के बारे में बात करते हो, तो क्या तुम उन्हें समझा सकते हो? अगर तुम दानवों और शैतानों से कहते हो, “तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करना चाहिए। मानवजाति परमेश्वर ने सृजित की है। सृजित प्राणियों के रूप में यह सही और उचित है कि लोग परमेश्वर की आराधना करें,” तो वे क्या कहेंगे? “परमेश्वर की आराधना? मैं तो चाहता हूँ कि लोग मेरी आराधना करें! परमेश्वर की आराधना करने के लिए मुझे कितने पैसे मिलेंगे? अगर मुझे पैसे मिलेंगे तो मैं उसकी आराधना करूँगा।” ये कैसे शब्द हैं? क्या तुम दानवों से संवाद कर सकते हो? (नहीं।) जानवरों के बारे में क्या खयाल है, क्या तुम उनसे संवाद कर सकते हो? (हम उनसे भी संवाद नहीं कर सकते।) देखो, कुछ जानवर खाते समय अपने खाने के प्रति बेहद रक्षात्मक रहते हैं। अपना खाना समाप्त करने के बाद वे दूसरे जानवरों का खाना छीनने की भी कोशिश करते हैं। अगर तुम उनसे कहो, “खाने के लिए लड़ाई मत करो, सिर्फ अपना खाना खाओ,” तो क्या वे इसे समझ सकते हैं? (नहीं।) खाते समय वे फिर भी एक-दूसरे से खाना छीनेंगे और एक-दूसरे से लड़ना और एक-दूसरे को काटना तक शुरू कर देंगे। तुम उनसे संवाद कर ही नहीं सकते। उन्हें बचाने और खाने के लिए लड़ने से रोकने के लिए तुम्हें उपाय करने होंगे और उनका सख्ती से प्रबंधन करना होगा, खाने के समय उन्हें अलग-अलग खाना खिलाना होगा। उनका प्रबंधन करने का यही सही तरीका है। क्यों? क्योंकि वे जानवर हैं, उनमें कोई तर्क-शक्ति नहीं है और आत्म-संयम तो बिल्कुल भी नहीं है और वे यह आकलन नहीं कर सकते कि वे जो कर रहे हैं वह सही है या गलत, इसलिए तुम जो कहते हो वह कितना भी सही हो और उसमें कितना भी दम हो और चाहे वह उनके लिए कितना भी लाभदायक हो, वे उसे नहीं समझेंगे। जानवरों से पुनर्जन्म लिए हुए लोग भी ऐसे ही होते हैं। सत्य की चाहे कितनी भी स्पष्टता से संगति की जाए, वे उसे नहीं समझते, इसलिए वे कभी भी सही सिद्धांतों के अनुसार क्रियाकलाप नहीं करते। अगर वे कुछ गलत करते हैं तो भी उन्हें वह गलत नहीं लगता और वे उस पर अड़े रहते हैं और जीवन भर ऐसा करते रहते हैं। क्या वे जानवर नहीं हैं? जो लोग इंसानी भाषा नहीं समझ सकते, वे बिल्कुल जानवरों जैसे ही होते हैं—शायद ही उनसे कुछ बेहतर होते हों, अगर होते भी हों तो।
आओ, अब हम पाशविक और राक्षसी प्रकृति के बारे में बात नहीं करते, बल्कि मानवता के यह जानने के पहलू पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत, एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो मानवता से युक्त व्यक्ति में होनी चाहिए, लेकिन वास्तव में अनेक लोगों में इसका अभाव होता है। लोग अक्सर विकृत तर्क व्यक्त करते हैं, विकृत शब्द कहते हैं और भ्रामक क्रियाकलाप तक करते हैं और उन्हें एक खास दृढ़ता के साथ करते हैं, यहाँ तक कि वे अपना विकृत तर्क दूसरों तक भी फैला सकते हैं, उन तक पहुँचा सकते हैं। उनके द्वारा व्यक्त किया गया तर्क गंभीर रूप से विकृत होता है और फिर भी वे उसे दूसरों तक पहुँचाते हैं, न सिर्फ खुद को बल्कि दूसरों को भी नुकसान पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर वे चावल खाना पसंद नहीं करते तो वे कहेंगे, “चावल पौष्टिक नहीं होता। हमें नूडल्स, उबले हुए बन और ब्रेड खाने चाहिए।” वे कहते हैं कि चावल पौष्टिक नहीं होता। क्या यह कथन सही है? (नहीं।) क्या तुम पोषणविद् हो? क्या तुमने इसका परीक्षण किया है? चावल पौष्टिक नहीं है, यह कहने का तुम्हारा आधार क्या है? उदाहरण के लिए, कुछ जगहें ऐसी हैं जहाँ सिर्फ चावल उगाया जाता है, गेहूँ नहीं और वहाँ के लोग जीवन भर चावल खाते हैं और अच्छी तरह जीते हैं, कई लोग तो परिपक्व वृद्धावस्था तक पहुँचते हैं। लेकिन अपनी पसंद के आधार पर विकृत तर्क व्यक्त करने वाले लोग कह सकते हैं कि “चावल पौष्टिक नहीं होता”, यहाँ तक कि वे इसे इस तरह भी कह सकते हैं मानो यह ठोस तर्क हो। क्या यह वाकई ठोस तर्क है? (नहीं।) आओ, इसकी चर्चा नहीं करते कि यह कथन सत्य के अनुरूप है या नहीं—यह तो ठोस तर्क भी नहीं है। वे ऐसा विकृत तर्क कैसे दे सकते हैं? क्या वे इंसान हैं? (नहीं।) यह कथन स्पष्ट रूप से गलत है; यह स्पष्ट रूप से स्वार्थपूर्ण इच्छाओं और पूर्वाग्रह के कारण बोला गया कथन है, एक ऐसे व्यक्ति का कथन है जो विकृत तरीके से बोलता है। वे खुद नहीं जानते कि यह सही है या नहीं, फिर भी वे इसे बहुत खुलेआम घोषित करते हैं, हर जगह इसका ढिंढोरा पीटते हैं। कुछ लोग चावल खाना पसंद करते हैं और गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ नापसंद करते हैं। जब वे किसी को गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ खाते देखते हैं तो कहते हैं, “गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ पौष्टिक नहीं होते, चावल पौष्टिक होता है। गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ खाने वाले लोग निकम्मे होते हैं, जबकि चावल खाने वाले लोग कुलीन होते हैं!” वे इस सिद्धांत का इस्तेमाल हर तरह के लोगों को मापने के लिए करते हैं। अगर तुम्हें गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ पसंद हैं तो वे तुम्हें तुच्छ समझते हैं और अपने जितना कुलीन नहीं समझते। यह कथन इतना स्पष्ट रूप से गलत है, फिर भी वे किसी तरह इसका भेद नहीं पहचान सकते, यहाँ तक कि इसे हर जगह बोलते भी हैं। बताओ, क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) जब उन्हें चावल खाना अब और पसंद नहीं रहता और गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ पसंद आने लगते हैं, तो वे कहते हैं, “चावल पौष्टिक नहीं होता, गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ पौष्टिक होते हैं। देखो, गेहूँ से बने खाद्य पदार्थ खाने वाले लोग कितने तगड़े होते हैं; हमें ज्यादा नूडल्स और स्टीम्ड बन्स खाने चाहिए! चावल एक ठंडा[ख] खाद्य पदार्थ है, यह शरीर के लिए अच्छा नहीं है!” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) क्या यह पूर्वाग्रह नहीं है? (हाँ, है।) यह एक पूर्वाग्रह है; यह तथ्य नहीं है। वे ऐसा किस आधार पर कहते हैं? अपनी प्राथमिकताओं और पूर्वाग्रहों के आधार पर, अपने भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर। लेकिन वे नहीं जानते कि यह गलत है, और यहाँ तक कि वे इसे इस तरह कहते और इसका ढिंढोरा पीटते हैं मानो यह सही हो। अगर कोई भिन्न मत व्यक्त करता है, तो वे बहस करेंगे और अभी भी अपने भ्रामक दृष्टिकोण पर अड़े रहेंगे। क्या यह इस बारे में अज्ञानता नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत? (हाँ।) ऐसे साधारण मामले में भी वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत—मुझे बताओ, क्या उनका जमीर काम करने में समर्थ है? क्या वे ईमानदार हो सकते हैं? एक ईमानदार व्यक्ति को न्याय और सिद्धांत कायम रखने में समर्थ होने के लिए यह अवश्य जानना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत; केवल तभी वह जो कायम रखता है वह सही होता है। अगर व्यक्ति यह नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत और लगातार किसी गलत कथन या किसी गलत विचार और दृष्टिकोण से चिपका रहता है, तो क्या उसकी तथाकथित ईमानदारी सच्ची ईमानदारी है? यह ईमानदारी नहीं है; यह विकृति, बेतुकापन और विकृत तर्क है। तो मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में जमीर होता है? (नहीं।) उनमें कहने लायक कोई जमीर नहीं होता। कुछ लोगों पर जब कोई चीज आ पड़ती है और उनके भीतर स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ जाग उठती हैं, तो वे अपने दिल में उसे महसूस कर सकते हैं और अपनी तर्क-शक्ति से नियंत्रित हो सकते हैं। वे जानते हैं कि स्वार्थपूर्ण इच्छाएँ गलत हैं, इसलिए वे देह से विद्रोह कर सकते हैं और उन्हें त्याग सकते हैं। लेकिन कुछ लोग अलग होते हैं; खासकर जो लोग नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत और जो विकृत तर्क व्यक्त करने की प्रवृत्ति रखते हैं, वे मूर्खतापूर्वक और हठपूर्वक गलत दृष्टिकोण अपनाए रहेंगे। उदाहरण के लिए, कुछ लोग नृत्य करने में अच्छे नहीं होते; जब वे नृत्य करते हैं तो उनका समन्वय बिगड़ जाता है, उनमें संतुलन की कोई भावना नहीं रहती और वे ताल पर नहीं टिक पाते, हमेशा खुद का मजाक बनाते रहते हैं। इसलिए वे कहते हैं, “जिन लोगों को नृत्य करना पसंद नहीं है, वे स्थिर व्यक्ति होते हैं। जिन लोगों को नृत्य करना पसंद है, वे सब अस्थिर होते हैं, उनका व्यक्तित्व खराब होता है और वे लंपट होते हैं। अगर तुम ऐसे व्यक्ति से विवाह करते हो, तो तुम्हारा जीवन निश्चित रूप से अस्थिर होगा।” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) यह गलत क्यों है? (नृत्य करने का स्थिर होने या न होने से कोई संबंध नहीं है।) इस बात पर विचार किए बिना कि क्या वे यह स्वार्थवश, ईर्ष्यावश या बदनामी करने का प्रयास करने के लिए कहते हैं, चाहे उनका इरादा कुछ भी हो, क्या उनके शब्द वस्तुनिष्ठ तथ्यों के अनुरूप हैं? जो लोग नाच सकते हैं और जो नाचने में अच्छे हैं, क्या वे अनिवार्य रूप से अस्थिर होते हैं? क्या ऐसे शब्द इन लोगों की मानवता के सार पर आधारित होते हैं? क्या यह तथ्य है कि वे अस्थिर होते हैं? (नहीं।) इसके अलावा, स्थिर होने का क्या अर्थ है? क्या स्थिर होने का अर्थ यह है कि व्यक्ति अच्छा इंसान है? क्या स्थिर होना ईमानदार और दयालु होने, मानवता से युक्त होने की अभिव्यक्ति है? ज्यादा से ज्यादा, यह व्यक्ति की मानवता का एक गुण या एक मजबूत बिंदु है; यह ये संकेत नहीं दे सकता कि व्यक्ति में सामान्य मानवता है। वे अपना दृष्टिकोण ऐसे बताते हैं मानो वह ठोस तर्क हो, मानो वह एक सही कथन हो। क्या यह विकृत तर्क व्यक्त करना नहीं है? (हाँ।) यह तथ्य कि वे ऐसे शब्द कह सकते हैं, यह साबित करता है कि वे नहीं जानते कि वे जो कह रहे हैं वह सही है या नहीं। बताओ, क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? (नहीं।) क्या वे बहुत परेशान करने वाले नहीं हैं? (हाँ।) अगर यह कोई सामान्य मानवता वाला व्यक्ति होता, तो भले ही उसे किसी अच्छे नाचने वाले से जलन होती, फिर भी वह ज्यादा से ज्यादा यही कहता, “देखो, नाचते समय इसके हाथ-पैर कितनी फुर्ती से चलते हैं। मैं भी नाचना चाहता हूँ, लेकिन मुझमें यह हुनर, यह खूबी नहीं है; मैं नाचने में अच्छा नहीं हूँ। मुझे सच में जलन हो रही है कि यह अच्छा नाच पाता है! काश, मेरे पास भी इसके जैसे हाथ-पैर होते!” इस तरह कहना फिर भी किसी तरह स्वीकार्य है; इसे बेलाग-लपेट सच बोलना कहते हैं। ज्यादा से ज्यादा, इसमें थोड़ा भ्रष्ट स्वभाव है, लेकिन यह अस्वस्थ मानवता की अभिव्यक्ति नहीं है। लेकिन विकृत तर्क व्यक्त करने की समस्या गंभीर है। वे कहते हैं, “जो लोग नाचते हैं वे सब अस्थिर और छिछोरे होते हैं। तुम एक ही नजर में बता सकते हो कि वे ऐसे लोग नहीं हैं जो महान चीजें कर सकते हैं।” यह तथ्य कि वे ये शब्द कह सकते हैं, यह उजागर करता है कि उनकी मानवता में एक बड़ी समस्या है। कौन-सी बड़ी समस्या? उनकी मानवता में यह जानने की बुनियादी पूर्वापेक्षा नहीं होती कि क्या सही है और क्या गलत। वे गलत चीजें, विकृत चीजें और टेढ़ी-मेढ़ी चीजें इस तरह कह सकते हैं मानो वे युक्तिसंगत तर्क और सही शब्द हों। यह ये दिखाने के लिए पर्याप्त है कि उनमें मानवता नहीं है। वे अपने जमीर से नियंत्रित हुए बिना जो चाहें कहते हैं। यहाँ तक कि वे इतने खुले तरीके से, इतने औचित्य की भावना के साथ विकृत तर्क व्यक्त करने में समर्थ होते हैं, जबकि उन्हें इन शब्दों की प्रकृति या यह तक पता नहीं होता कि उनके कहने के नतीजे क्या होंगे। यह मानवता न होने की अभिव्यक्ति है। जिन लोगों में मानवता नहीं होती, वे अक्सर खुलेआम ऐसी गलत और बेतुकी चीजें कहते हैं। यह उनका प्राकृतिक प्रकाशन है। वे सिर्फ एक-दो मामलों में ही ये चीजें नहीं कहते—वे सभी मामलों में इसी तरह बोलते हैं, किसी न किसी तरह के भ्रामक विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करते हैं और अपने दिलों में यह मानते हैं कि ये ऐसे ही हैं। वे कभी भी सही या सकारात्मक कथन स्वीकार नहीं करते, न ही वे कभी सही या सकारात्मक कथन खोजते हैं, बल्कि इसी तरह बोलने और इसी तरह आचरण करने पर अड़े रहते हैं। इसलिए ऐसे व्यक्ति निश्चित रूप से मानवता से रहित लोग होते हैं। वे इसी तरह बोलने पर जोर देते हैं, जो पूरी तरह से एक समस्या, एक तथ्य को उजागर करता है : वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, और वे सोचते हैं कि तमाम अपसिद्धांत और भ्रांतियाँ सही हैं। अगर तुम उनसे पूछो, “गलत क्या है?” तो वे कहेंगे, “जो कुछ भी इन कथनों के विपरीत है वह संभवतः गलत है।” और अगर तुम उनसे आगे पूछो, “उन शब्दों के बारे में क्या खयाल है जो सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं, जो वस्तुनिष्ठ तथ्यों के अनुरूप हैं? क्या वे सही हैं?” तो वे कहेंगे, “मेरी बला से! कौन जाने वे सही हैं या नहीं? खैर, जो शब्द मैं कहता हूँ वे सही हैं!” यह न जानना कि क्या सही है और क्या गलत—क्या यह ऐसी अभिव्यक्ति है जो ऐसे व्यक्ति में होनी चाहिए जिसमें वास्तव में जमीर और विवेक है? (नहीं।) उत्तर बहुत स्पष्ट है : यह निश्चित रूप से ऐसी अभिव्यक्ति नहीं है।
एक व्यक्ति, जो व्यापार करना पसंद करता था, गैर-विश्वासियों से छूट पर कुछ कपड़े खरीदा करता और उन्हें भाई-बहनों को बेच देता और इसमें कुछ मुनाफा कमा लेता। बाद में किसी और ने गर्मियों के वस्त्रों के लिए रेयान, गॉज और ऐसे ही दूसरे कपड़े खरीदे और उन्हें गोदाम में रख दिया। मैंने कहा, “उन्हें वहाँ रखना ठीक नहीं है। अगर उन्हें वहाँ ज्यादा देर तक रखा गया, तो उन्हें चूहे कुतर सकते हैं या उमस भरे मौसम में उनमें फफूँद लग सकती है, जो बहुत बर्बादी होगी। अगर हम उनसे भाई-बहनों के पहनने के लिए परिधान बना दें तो हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी, है ना?” बाद में, मैंने इसे व्यवस्थित करना शुरू किया। जब हम यह कर रहे थे, तो कपड़े बेचने वाला व्यक्ति खड़ा होकर आपत्ति करने लगा : “नहीं, हम ऐसा नहीं कर सकते! काला कपड़ा गर्मी सोख लेता है। भाई-बहन अक्सर धूप में काम करते हैं; अगर वे काले कपड़े पहनेंगे तो उन्हें बहुत गर्मी लगेगी। अगर भाई-बहन गर्मी की वजह से बीमार पड़ गए या उन्हें लू लग गई, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?” क्या यह सही लगता है? तुम लोग नहीं जानते, है ना? यहाँ एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है : ये कपड़े बहुत पतले और हवादार थे, वे पहनने में बहुत ठंडे थे। भले ही काला कपड़ा पहनने में थोड़ा ज्यादा गर्म हो, लेकिन अगर परिधान थोड़े ढीले बनाए जाएँ, तो इससे लोग गर्मी से बीमार नहीं पड़ेंगे, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं। इसके अलावा, ये सारे कपड़े काले नहीं थे; कुछ हलके रंगों के भी थे। दरअसल, जिस व्यक्ति ने यह कहा, उसके कुछ गुप्त इरादे थे। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? अगर तुम्हें संदर्भ पता न हो, तो तुम वाकई सोच सकते हो कि वह भाई-बहनों के प्रति विचारशील था। लेकिन अगर तुम्हें संदर्भ पता हो, तो तुम जान जाओगे कि ऐसा कहने के पीछे उसका एक मकसद था। अगर भाई-बहन रेयान के बने वे ठंडे कपड़े पहनते, तो वह अपने खरीदे हुए कपड़े न बेच पाता; भाई-बहन उन्हें न खरीदते। उसने जो कपड़े खरीदे थे, वे सब ठेलों पर से और क्लीयरेंस सेल से खरीदे गए थे और घटिया क्वालिटी के थे; उन्हें पहनकर तुम भिखारी जैसे दिखते। सबसे महत्वपूर्ण बात, उसके दाम सस्ते नहीं थे। अब जबकि तुम संदर्भ जानते हो, तो क्या तुम लोग समझ सकते हो कि उसने जो कहा वह सही था या नहीं? (हाँ।) उसने ऐसा क्यों कहा? (उसे डर था कि उसका सामान नहीं बिकेगा।) उसने यह नहीं कहा कि उसके स्वार्थपूर्ण इरादे हैं; उसने भाई-बहनों का ध्यान रखने का और यह चिंता करने का दिखावा किया कि वे गर्मी के कारण बीमार पड़ जाएँगे, ताकि उन परिधानों को बनाने में बाधा डाली जा सके, इस काम में बाधा डाली जा सके। एक और वस्तुनिष्ठ तथ्य यह है कि उसने खुद गर्मी में काली जींस और काले कपड़े पहने थे और कभी यह नहीं कहा कि उसे गर्मी लग रही है। क्या चल रहा था? उसने जो कहा, वह तथ्यों से मेल नहीं खाता था! हम रेयान कपड़े से भाई-बहनों के लिए कुछ वस्त्र बनाना चाहते थे और उसने कहा, “नहीं, काला कपड़ा बहुत गर्म होता है, इससे भाई-बहन गर्मी से बीमार पड़ जाएँगे।” उसने जो काली जींस पहनी थी वह रेयान से कहीं ज्यादा मोटी थी, तो उसे गर्मी कैसे नहीं लगी? तो क्या उसका यह कहना कि काले कपड़े बहुत गर्म होते हैं और इससे भाई-बहन गर्मी से बीमार पड़ जाएँगे, सही था? क्या यह कहते हुए वह ईमानदार था? वह ईमानदार नहीं था; वह वास्तव में जैसा महसूस कर रहा था उसके विपरीत जा रहा था। तो उसने जो कहा वह सही था या नहीं? क्या वह तथ्यों के अनुरूप था? (वह तथ्यों के अनुरूप नहीं था।) तो फिर उसने ऐसा क्यों कहा? ठीक इसलिए क्योंकि यह मामला उसके व्यावसायिक हितों से टकरा रहा था। वह अंदर से चिंतित था, लेकिन स्पष्ट नहीं कह पा रहा था, इसलिए वह मामले को बिगाड़ने, अपने हितों की रक्षा करने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए इन शब्दों का ही इस्तेमाल कर सका। मैंने ही इसका आयोजन किया था और उसने इस तरह खुलेआम इसमें गड़बड़ी की। अगर उसे मेरे आयोजन पर आपत्तियाँ थीं, तो वह उन्हें सीधे मेरे सामने ला सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। बाहर से उसने बड़ा दिखावा किया, ऐसा लग रहा था कि उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन पर्दे के पीछे उसने काम खराब कर दिया, बिल्कुल भी पीछे नहीं हटा। उसने क्या कहा? “सभी भाई-बहनों के पास पहनने के लिए कपड़े हैं और वे काफी अच्छे कपड़े पहने हैं। क्या ये परिधान बनाने के लिए इतने सारे लोगों का इस्तेमाल करना और इतनी मेहनत करना जरूरी है?” उसने मेरे सामने एक शब्द भी नहीं कहा; उसने पर्दे के पीछे इस तरह काम खराब किया। जब उसने ये शब्द कहे, तो क्या वह अपने दिल में जानता था कि ये सही हैं या नहीं? अगर उसने किसी साधारण व्यक्ति के साथ ऐसा किया होता और वह अपने दिल में जानता होता कि यह सही है या नहीं, और सिर्फ इसलिए किया होता क्योंकि वह लालच में अंधा हो गया था और निजी मनसूबों और लक्ष्यों से प्रेरित था, तो यह सिर्फ उसके चरित्र के साथ एक समस्या होती। लेकिन वह इस कृत्य से मुझे निशाना बना रहा था और काम खराब करने के लिए ये चीजें कहने के बाद वह नहीं जानता था कि ये सही हैं या नहीं, उसके दिल में इसका कोई भान नहीं था, न ही उसे कोई आत्म-ग्लानि हुई और वह अपने कृत्यों की प्रकृति नहीं जानता था। यह कैसा व्यक्ति है? क्या उसमें मानवता है? (नहीं।) उसने इतना गंभीर कृत्य किया, फिर भी दिल में कुछ महसूस नहीं किया। मुझे बताओ, क्या उसमें जमीर था? (नहीं।) उसमें जमीर नहीं था, यह साफ दिखाई देता है। भले ही वह कोई साधारण व्यक्ति हो जो उचित मामले निपटा रहा हो, परमेश्वर के घर में भाई-बहनों के लिए कुछ लाभदायक चीज कर रहा हो, तुम्हें उसका समर्थन करना चाहिए, उसे खराब नहीं करना चाहिए—उसे पूरा करने में सभी को सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना चाहिए। इस कार्य की तो बात ही छोड़ो जिसे मैंने आरंभ किया था; फिर भी उसने पर्दे के पीछे से उसे खराब करने का साहस किया और अपने राक्षसी पंजे फैलाने की हिम्मत की। इसकी प्रकृति बहुत गंभीर है! कार्य को नुकसान पहुँचाने के बाद भी वह एक अच्छा इंसान होने का दिखावा करता रहा, मानो कुछ भी न हुआ हो। मुझे बताओ, क्या उसमें लेशमात्र भी जमीर था? उसने फिर भी दावा किया कि वह परमेश्वर में विश्वास भी करता है। क्या परमेश्वर में विश्वास करने वाले को इसी के समान होना चाहिए? क्या परमेश्वर में विश्वास करने वाले में ऐसा ही जमीर और मानवता होनी चाहिए? वह तो यह भी नहीं जानता था कि वह किसमें विश्वास करता है और वह सही-गलत का भेद नहीं पहचान सकता था। वह कौन-सा कर्तव्य निभा सकता था? ऐसा व्यक्ति अभी भी आशीष पाने की आशा कर रहा है—क्या यह मजाक नहीं है? अगर उसने मेरे बारे में टिप्पणियाँ करके मुझे व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया होता और मैंने देखा होता कि वह जानबूझकर कलीसिया के कार्य में गड़बड़ नहीं कर रहा और बाधा नहीं डाल रहा और अपने कर्तव्य का उसका निर्वहन स्वीकार्य है, तो मैं इसे कुछ समय के लिए बर्दाश्त कर लेता और उस पर नजर रखता रहता। लेकिन मैं कुछ ऐसा कर रहा था जो परमेश्वर के घर और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए किया जाना जरूरी था, कुछ ऐसा जो सभी के लिए फायदेमंद था, और वह उसे बाधित करने और नुकसान पहुँचाने के लिए आ गया, मुझे काम करने से रोकने लगा। बताओ, क्या मुझे उसके साथ नरमी बरतनी चाहिए? अगर वह कोई छोटे आध्यात्मिक कद का व्यक्ति होता जो ज्यादा कुछ न जानता, लेकिन उसका कर्तव्य-निर्वहन आम तौर पर सफल रहता, तो मैं इसे बर्दाश्त कर सकता था और उसे पश्चात्ताप करने का एक मौका दे सकता था। अगर वह पश्चात्ताप करने का इच्छुक होता और परमेश्वर के घर के लिए सेवा करने का इच्छुक होता, तो मैं उसे छोड़ सकता था और उससे निपटता नहीं। अगर वह नहीं जानता कि उसके लिए क्या अच्छा है और वह अपसिद्धांत और भ्रांतियाँ फैलाता रहा और चीजों को बाधित करता रहा और नुकसान पहुँचाता रहा, तो मैं उसके साथ कोई शिष्टाचार नहीं दिखाऊँगा और सिद्धांतों के अनुसार उससे निपटूँगा। बुरे लोगों के साथ यही किया जा सकता है कि उनसे सिद्धांतों के अनुसार निपटा जाए। जब कलीसिया को बाधा पहुँचाने वाले तमाम तरह के कीड़े-मकोड़े दूर कर दिए जाएँगे, तो कलीसिया कहीं अधिक शांतिपूर्ण होगी। जब इन गैर-मानवों से निपटा जाएगा, तो यह कितना शांतिपूर्ण होगा! सूअर, गाय-भैंस, घोड़े जैसे पशुओं को घर के अंदर रखना ठीक नहीं। अगर रखे जाएँगे, तो क्या नतीजा होगा? निश्चित रूप से इससे घर एक गंदा स्थान, एक अराजकता का स्थान बन जाएगा। अगर तुम कहते हो कि तुम इसे बर्दाश्त कर सकते हो, तो मैं देखना चाहूँगा कि तुम कितने दिन ऐसा कर सकते हो। जो चीजें घर के अंदर रखने लायक नहीं हैं, उन्हें बाहर निकाल देना चाहिए। उन्हें उसी जगह रहना चाहिए जो उनके लिए उपयुक्त हो और इस तरह समस्या हल हो जाती है। बर्दाश्त करना कोई समाधान नहीं है; सिर्फ समस्या हल करना ही समाधान है, है ना? (हाँ।) चाहे तुम इन गैर-मानवों के साथ कितने भी स्पष्ट रूप से संगति करो, वे उसमें से कुछ भी अभ्यास में नहीं लाएँगे। हालाँकि उन्होंने दस-बीस वर्ष परमेश्वर में विश्वास अवश्य किया होगा, लेकिन जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो वे फिर भी गैर-विश्वासियों जैसे ही होते हैं; वे सत्य बिल्कुल नहीं स्वीकारते, न ही उसका बिल्कुल भी अभ्यास करते हैं, उनमें जीवन प्रवेश नहीं होता और जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं तो वे बस चीजों में बाधा डालते हैं और उन्हें बिगाड़ते हैं। जब ऐसे लोगों ने अपना असली रूप नहीं दिखाया होता है, तब वे अनिच्छा से कुछ सेवा करते हैं। लेकिन एक बार जब उनका असली रूप प्रकट हो जाता है, तो उन्हें तुरंत दूर कर देना चाहिए—उनके प्रति कोई शिष्टाचार मत दिखाओ। अगर दिखाते हो, तो तुम उन लोगों के प्रति क्रूर होते हो जिनमें वास्तव में मानवता है, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और अपना कर्तव्य निभाने के प्रति समर्पित हैं।
फुटनोट :
ख. “ठंडा” को पारंपरिक चीनी औषधि के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है। इस संदर्भ में, “ठंडा” तापमान में कमी को संदर्भित नहीं करता, बल्कि इसके बजाय यह किसी खास खाद्य पदार्थ के उस गुण को संदर्भित करता है, जो आंतरिक ताप कम करने, यांग ऊर्जा को नियंत्रित करने और अधिक मात्रा में खाए जाने पर पेट और तिल्ली की कार्यप्रणाली पर प्रभाव डालने का काम करता है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?