सत्य का अनुसरण कैसे करें (17) भाग चार
मानवता से रहित लोगों की एक स्पष्ट विशेषता यह होती है कि जब वे क्रियाकलाप करते हैं और बोलते हैं तो वे यह नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत; वे हमेशा विकृत तर्क प्रस्तुत करते हैं। हम कहते हैं कि वे यह नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, फिर भी वे कभी सही चीज नहीं कहते या नहीं करते। वे सिर्फ गलत चीजें ही कहते हैं; वे कुछ भी कह सकते हैं, चाहे वह कितना भी गलत हो। उदाहरण के लिए, एक बार एक व्यक्ति ने एक कपड़ा खरीदा जो उसे फिट नहीं आया और उसने देखा कि औरों के कपड़े उन्हें फिट आते हैं, तो वह क्रोधित हो गया और बोला, “यह मुझे फिट नहीं आ रहा—तुम्हारे कपड़े तुम पर इतने फिट कैसे आ रहे हैं?” उसने बेसब्री से चाहा कि औरों को भी उनके कपड़े फिट न आएँ—तब वह खुश होगा। यहाँ तक कि वह ऐसी चीजें कहने में सक्षम भी था—क्या यह विकृत तर्क नहीं है? (हाँ।) अगर वह रात को सो नहीं पाए और देखे कि तुम गहरी नींद सो रहे हो, तो वह दुखी हो जाएगा और कहेगा, “मैं सो नहीं सकता, तो तुम कैसे सो सकते हो? यह ठीक नहीं है! तुम इतनी गहरी नींद सो रहे हो, क्या इसकी वजह यह है कि तुममें अपना कर्तव्य निभाने में बोझ की कोई भावना नहीं है? मुझे कलीसिया के अगुआ को, ऊपर वाले को इसकी रिपोर्ट करनी होगी!” क्या यह विकृत तर्क नहीं है? (हाँ, है।) मैं मजाक नहीं कर रहा, वे लोग जिनमें मानवता नहीं होती और जो नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, ठीक इसी तरह बोलते हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि वह नहीं जानता था कि क्या सही है और क्या गलत? उसने मुझे इसकी रिपोर्ट की थी। जब मैंने उसकी बात सुनी, तब मैंने सोचा, “इस व्यक्ति की बात में कुछ गड़बड़ है; यह युक्तिसंगत तर्क नहीं है! यह वह चीज नहीं है जो किसी मानवता वाले व्यक्ति को कहनी चाहिए। वह बिल्कुल बच्चा नहीं है और दस साल से ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास कर रहा है, फिर भी वह यह तक नहीं जानता कि वह जो कह रहा है, वह सही है या नहीं; यहाँ तक कि वह उस व्यक्ति की रिपोर्ट करने के लिए इसे युक्तिसंगत तर्क मानता है। यह व्यक्ति न सिर्फ उचित-अनुचित का भेद पहचानने में असमर्थ है—बल्कि वह यह तक नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत। वह अच्छी प्रकृति का नहीं है।” अगर उसने यह मामला तुम लोगों को बताया होता, तो हो सकता है तुम लोग वाकई इसका भेद न पहचान पाते और तुममें से कुछ लोग उसकी बातों में आकर उसका तर्क सही मान लेते। अब जबकि मैंने इसे इस तरह से बताया है, तो क्या तुम लोग बता सकते हो कि यह सही है या नहीं? (हाँ।) क्या ऐसे लोग विकृत और बेतुके नहीं होते? (हाँ।) वे नहीं जानते कि वे जो कह रहे हैं वह सही है या नहीं, फिर भी वे उसे कहते हैं। वे स्पष्ट रूप से गलत कथनों, विचारों और दृष्टिकोणों को सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों के रूप में व्यक्त और संप्रेषित कर रहे हैं। यह ये जानना नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत। वे अज्ञानता का ढोंग नहीं कर रहे हैं, न ही वे इन शब्दों का इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने, बच्चों को मूर्ख बनाने के लिए कर रहे हैं—यह स्पष्ट है कि वे नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत। इसलिए मैं कहता हूँ कि उनमें कोई मानवता नहीं है। वे इतने बुनियादी मामले में भी सही और गलत में अंतर नहीं कर सकते—क्या उनके पास सच्चा विवेक है? क्या वे अभी भी ईमानदार लोग हो सकते हैं? वे गलत चीजें ऐसे कहते हैं मानो वे सही हों, जो कि काले को सफेद कहने के बराबर है। क्या वे अभी भी अपने कार्यों में ईमानदार हो सकते हैं? क्या वे लोगों के साथ निष्पक्ष रूप से पेश आ सकते हैं? वे लोगों के साथ निष्पक्ष रूप से पेश नहीं आ सकते, तो क्या वे लोगों को नुकसान नहीं पहुँचा रहे हैं? (हाँ।) क्या यह दयालु होना है? (नहीं।) शायद वे बुरे लोग नहीं बनना चाहते और दूसरों के साथ मित्रतापूर्ण भी होना चाहते हैं, लेकिन वे यह तक नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, वे काले और सफेद में अंतर भी नहीं कर सकते, तो वे दूसरों के साथ मित्रतापूर्ण कैसे हो सकते हैं? यह उनके वश से परे है। जब व्यक्ति का जमीर और विवेक स्वस्थ होता है और उसमें भेद पहचानने की क्षमता होती है और वह अभ्यास के सही सिद्धांत चुन सकता है, तभी वह दयालु हो सकता है। अगर तुम कहते हो कि तुम ईमानदार और दयालु हो, तो इसकी अभिव्यक्तियाँ कहाँ हैं? अगर तुम यह भी नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो तुम ईमानदार और दयालु कैसे हो सकते हो? खुद को धोखा मत दो! ठीक है? इसे खुद को और दूसरों को धोखा देना कहते हैं। ऐसे लोग यह सोचकर खुद को विशेष रूप से सराहते भी हैं कि उनका चरित्र ईमानदार है, वे दयालु हैं और सत्ता से नहीं डरते, और जब भी वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जिसने कुछ गलत किया होता है, तो वे तुरंत उसकी आलोचना कर सकते हैं। ऐसी आलोचना का तुम्हारा आधार क्या है? अगर तुम अपने गलत विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर उनकी आलोचना करते हो, तो तुम अंततः अच्छे लोगों को सताओगे, और परमेश्वर के घर के सत्य सिद्धांतों को विकृत कर डालोगे। क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? अगर ऐसा व्यक्ति कलीसिया में सत्ता में रहता है, तो इसका मतलब है कि शैतान सत्ता में है। अगर शैतान सत्ता में रहता है तो ज्यादातर लोगों को फायदा होता है या तकलीफ? (उन्हें तकलीफ होती है।) ज्यादातर लोगों को गंभीर नुकसान होगा और उनके पास जीने का कोई रास्ता नहीं होगा।
जिन विषयों पर हम चर्चा कर रहे हैं, वे सब लोगों के दैनिक जीवन की कुछ सामान्य अभिव्यक्तियों से संबंधित हैं। इन विषयों पर चर्चा सुनने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या इन विषयों का सत्य से कोई संबंध है? क्या तुम लोग सुनने के इच्छुक हो? (हाँ।) क्या यह सिर्फ गपशप है? क्या यह लोगों के पीठ पीछे उनकी बुराई करना है? (नहीं, यह हमें यह सीखने में मदद करने के लिए है कि लोगों का भेद कैसे पहचानें।) अब जबकि तुमने ये संगतियाँ सुन ली हैं, तो क्या तुम लोगों का भेद पहचानने में समर्थ हो? (मुझे लगता है कि मैं लोगों का भेद पहचानने में पहले की तुलना में थोड़ा ज्यादा समर्थ हूँ।) अब तुम्हें कुछ हद तक लोगों का भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए। अब जबकि मैंने सत्य पर संगति की है और इस तरह उदाहरणों पर चर्चा की है, अगर तुम अभी भी लोगों का भेद नहीं पहचान सकते तो तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है और सत्य तुम्हारी पहुँच से बाहर है। बेशक, ऐसे लोग निश्चित रूप से होते हैं। वे चाहे जैसे भी सुनें, उन्हें यह समझ नहीं आता और वे यह तक सोचते हैं, “तुम जिनके बारे में कह रहे हो, वे सब रोजमर्रा के मामले हैं—मैं नहीं सुनूँगा! मैं तीसरे स्वर्ग के गहन सत्य सुनना चाहता हूँ। तुम जो संगति कर रहे हो, वह सत्य नहीं है, यह सब सिर्फ गपशप है। मैं नहीं सुनूँगा!” अगर तुम वाकई नहीं सुनना चाहते, तो तुम्हें सुनने की जरूरत नहीं है। लेकिन जिन विषयों पर हम चर्चा कर रहे हैं, वे सब जरूरी हैं। जो भी व्यक्ति उनके भीतर का सत्य समझ सकता है, वह लोगों का भेद पहचानने में समर्थ होगा। अगर तुम वाकई समझ सकते हो, तो तुम एक धन्य व्यक्ति हो। तुम जैसे भी सुनो, अगर नहीं समझ सकते और जितना ज्यादा सुनते हो, उतने ही ज्यादा भ्रमित हो जाते हो और उतना ही ज्यादा तुम्हें इससे सिरदर्द होता है, तो यह अभिव्यक्ति तुम्हारे लिए कोई शुभ संकेत या शुभ सगुन नहीं है।
अभी-अभी हमने मानवता में क्या सही है और क्या गलत, यह जानने की विशेषता के बारे में बात की। लोगों के क्या सही है और क्या गलत, यह नहीं जानने की कई विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। अगर लोग जानते कि क्या सही है और क्या गलत, तो अच्छा होता और हमें इस विषय पर बात करने की जरूरत ही न पड़ती। लेकिन कई लोग नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत, इसलिए कुछ उदाहरण देना जरूरी है ताकि यह भेद पहचाना जा सके कि ऐसा व्यक्ति क्यों नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, वह उन चीजों का भेद क्यों नहीं पहचानता जो इतने स्पष्ट रूप से सही या गलत हैं। ऐसा व्यक्ति वास्तव में ऐसे बेतुके शब्द बोलने और ऐसी हास्यास्पद चीजें करने में समर्थ होता है—असल में यहाँ क्या हो रहा है? यह संगति करने और भेद पहचानने लायक है। यह जानना कि क्या सही है और क्या गलत, एक ऐसी पूर्वापेक्षा है जो व्यक्ति की मानवता में होनी चाहिए। यह न जानना कि क्या सही है और क्या गलत, ऐसी चीज है जो व्यक्ति में नहीं होनी चाहिए। अगर व्यक्ति वास्तव में नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, तो यह बहुत दुख की बात है; इसका मतलब है कि वह उन पूर्वापेक्षाओं से रहित है जो व्यक्ति में होनी चाहिए। हमने अभी कुछ विशिष्ट उदाहरणों और अभिव्यक्तियों के बारे में बात की, और कुछ लोगों के मामले में वास्तव में ऐसा होता है कि वे स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत। अगर कोई लोगों से कुछ अनुचित, उकसाऊ चीजें या कुछ भ्रामक बातें कह रहा है या लोगों के सामने कुछ विकृत तर्क व्यक्त कर रहा है, तो इसके बारे में विशेष रूप से संगति करने और भेद पहचानने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अभिव्यक्तियाँ सामान्य भ्रष्ट मनुष्यों की ओर निर्देशित होती हैं। लेकिन क्या सही है और क्या गलत, यह नहीं जानने की कुछ लोगों की अभिव्यक्ति, परमेश्वर, सत्य और सकारात्मक चीजों की ओर निर्देशित होती है। ऐसे व्यक्ति के लिए, जो नहीं जानता कि क्या सही है और क्या गलत, अगर मैं संगति करने के लिए कुछ उदाहरण पेश नहीं करता, तो हो सकता है हर कोई उसका भेद न पहचान पाए, और वह ऐसी समस्या के सार और गंभीरता की असलियत नहीं जान पाएगा। इसलिए मेरे लिए इसके बारे में बात करना जरूरी है। बहुत-सी चीजें घटित हुई हैं—अगर उनमें सत्य शामिल है तो मुझे इसे यथावत बताना चाहिए, और सत्य समझने और भेद पहचानने में लोगों की मदद करने के लिए इन नकारात्मक उदाहरणों का हवाला देना चाहिए और हर किसी को उनसे सबक भी सीखने देना चाहिए। अगर किसी मामले में कुछ खास व्यक्ति शामिल हैं तो उन शामिल लोगों को शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। अगर तुम अभी शर्मिंदा महसूस करते हो तो तुम्हें उस समय वे चीजें नहीं करनी चाहिए थीं। कुछ लोग किस गंभीर सीमा तक नहीं जानते कि क्या सही है और क्या गलत? जो चीजें वे करते हैं—जो क्या सही है और क्या गलत, यह नहीं जानने के कारण होती हैं और जो बहुत गंभीर प्रकृति की होती हैं—वे किसी व्यक्ति की ओर नहीं, बल्कि मेरी ओर निर्देशित होती हैं। मैं कलीसिया के ज्यादातर लोगों से परिचित नहीं हूँ और उन्हें नहीं जानता, और कुछ ऐसे अगुआ और कार्यकर्ता हैं जिनसे मैं एक-दो बार ही मिला हूँ, लेकिन मेरी लोगों से व्यक्तिगत रूप से आमने-सामने, दिली बातें कभी-कभार ही होती हैं, क्योंकि मेरे पास इतना खाली समय नहीं होता। इन लोगों में से कुछ के साथ तो मेरी अच्छी बनती है, लेकिन कुछ के साथ बातचीत करना असंभव है। ऐसा क्यों है? आओ, अब कुछ उदाहरण देखते हैं।
एक बार पतझड़ में, एक खेत में उगाए गए आलू खोदकर निकाले जा रहे थे और खाना बनाने का काम करने वाला व्यक्ति खेत में गया और एक टोकरी आलू लेकर आया। ऊपर रखे आलू लगभग मुट्ठी के आकार के दिख रहे थे, जो देखने में ठीक लग रहे थे। लेकिन उनके नीचे वाले आलू छोटे थे और कुछ सड़े हुए भी थे। मैं हैरान रह गया। “वे हमें ऐसे आलू कैसे दे सकते हैं? क्या ऐसे आलू जानवरों के चारे के रूप में इस्तेमाल नहीं किए जाने चाहिए? क्या खेत वाले ने इन्हें गलती से पैक कर दिया?” अगर यह वाकई गलती थी तो ऊपर वाले आलू अच्छे और सामान्य क्यों थे, जबकि नीचे वाले छोटे थे या सड़े हुए थे? इस घटना ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला। बाहरी तौर पर, आलू पैक करने वाला व्यक्ति भेंगा नहीं था और उसका रूप-रंग साधारण था। मैंने उसे एक-दो बार देखा था और उससे दो-चार बातें भी की थीं, लेकिन हमारे बीच कोई वास्तविक संपर्क नहीं हुआ था। मैं लगभग कह सकता हूँ कि मैं उसे नहीं जानता था, इसलिए आलोचना, फटकार या काट-छाँट का कोई सवाल ही नहीं था। तो फिर यह व्यक्ति मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करेगा, मुझे ऐसे छोटे और सड़े हुए आलू क्यों देगा? अगर उसे पता नहीं था कि वे मेरे लिए हैं, तो उसने अच्छे आलू ऊपर और सड़े हुए आलू नीचे क्यों रखे? उसे स्पष्ट रूप से पता था। तो यह जानते हुए भी कि वे मेरे लिए हैं, उसने सड़े हुए आलू क्यों रखे? क्या उस समय वह किसी भ्रम में था? या किसी दानव ने उसके हाथों पर नियंत्रण कर लिया था? या वह किसी दुष्ट आत्मा के कब्जे में था? इसकी संभावना बहुत कम है। अगर वह वाकई किसी दुष्ट आत्मा के कब्जे में होता, तो वह मानसिक रूप से विक्षिप्त हो जाता और मेरे लिए आलू लाता ही नहीं। तो अगर वह किसी दुष्ट आत्मा के कब्जे में नहीं था, तो यह व्यक्ति जो बिल्कुल सामान्य दिखता था, ऐसा काम क्यों करेगा? क्या उसे पता नहीं था कि ऐसा करना छल है? अगर उसके दिल में मेरे लिए नफरत थी तो उसे यहाँ अपना कर्तव्य निभाने के बजाय परमेश्वर का घर छोड़ देना चाहिए था। इसके अलावा, अगर वह मेरे लिए नफरत रखता भी था तो उसकी वजह क्या थी? मुझसे नफरत करने का क्या कारण था? अगर हम इसे मानवता के संदर्भ में देखें, तो पहली बात, मैंने उसे बस एक-दो बार ही देखा था; मैं नहीं जानता था कि वह कैसा है। और दूसरी बात, मेरा उससे कभी कोई वास्तविक संपर्क या लेन-देन नहीं रहा था। मैं सिर्फ इतना जानता था कि वह फसलें उगाने का काम करता है। तो फिर उसने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया? एक ही संभावना है : वह ऐसा तभी कर सकता था जब वह मेरे बारे में बहुत प्रबल धारणाएँ और मेरे विरुद्ध बहुत ज्यादा पूर्वाग्रह रखता हो या किसी ने उसे उकसाया हो। यह व्यक्ति ऐसा कर सकता है, यह ऐसा करने की हिम्मत जुटा सकता है—क्या यह तुम लोगों को अकल्पनीय नहीं लगता? अगर तुम किसी साधारण व्यक्ति के साथ भी व्यवहार कर रहे होते तो भी क्या तुम ऐसा करने की हिम्मत जुटा सकते थे? यहाँ तक कि अगर तुम सुपरमार्केट चला रहे होते, तो भी तुम लोगों को धोखा और झाँसा नहीं दे सकते थे; अपने ग्राहक बनाए रखने और अपना ही रास्ता खराब नहीं करने के लिए तुम्हें भरोसेमंद होना पड़ता। इसके अलावा, अब तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो और ऐसा काम करना, खासकर मेरे साथ—बताओ, क्या यह उचित है? (नहीं।) तो ऐसे व्यक्ति की प्रकृति क्या है? क्या ऐसा करते समय वह जानता था कि क्या सही है और क्या गलत? उसमें जरा भी जागरूकता नहीं थी। अगर उसमें वाकई जागरूकता होती, तो जब वह सड़े हुए आलू उठाने वाला था तब उसने सोचा होता, “नहीं, मैं सड़े हुए आलू नहीं ले सकता, मुझे कुछ अच्छे आलू लेने हैं। क्या सबको अच्छा खाना नहीं खाना चाहिए?” और यह तो कहना ही क्या कि वे मेरे खाने के लिए थे—सड़े हुए आलू लेने का खयाल भी उसके मन में नहीं आना चाहिए था, उस पर अमल करने की तो बात ही छोड़ दो। अब, क्या जवाब बिल्कुल स्पष्ट नहीं है? वह ऐसा क्यों कर पाया? ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने चाहे दानवों से पुनर्जन्म लिया हो या जानवरों से, अपनी मानवता में वे नहीं समझ पाते कि क्या सही है और क्या गलत। उनकी मानवता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह भेद कर सके या जाँच सके कि सही क्रियाकलाप और विचार क्या हैं और गलत क्रियाकलाप और विचार क्या हैं। अगर उन्होंने जानवरों या दानवों से पुनर्जन्म नहीं लिया, तो वे चलती-फिरती लाशें हैं। तो फिर ऐसे व्यक्तियों का परमेश्वर में विश्वास करने का क्या मतलब है? वे कहते हैं, “यह परमेश्वर है जिसमें मैं विश्वास करता हूँ। तुम महज एक इंसान हो, तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो?” क्या इन शब्दों में कोई विवेक है? क्या यह परमेश्वर में सच्चा विश्वास है? क्या परमेश्वर के साथ इस तरह पेश आना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है? परमेश्वर इस तरह का विश्वास नहीं चाहता। शायद वे यह भी कहें, “परमेश्वर मुझे चाहता है या नहीं, यह तुम्हारे कहने की बात नहीं है!” मैं कहता हूँ, “तुम जो कह रहे हो वह सही नहीं है। जो वचन मैं बोलता हूँ अगर वे परमेश्वर के वचन हैं, तो तुम्हारा मेरे साथ इस तरह पेश आना—इसमें समस्या है। तुम्हारा परिणाम परमेश्वर के वचनों से तय होता है।” वे कहते हैं, “मैं तीसरे स्वर्ग जाऊँगा और तुम्हारी रिपोर्ट करूँगा!” मैं कहता हूँ, “अगर तुम वाकई तीसरे स्वर्ग जा सकते हो, तो जल्दी करो और जाओ।” बताओ, क्या ऐसे लोग भयानक नहीं होते? अब भी ऐसे व्यक्ति के साथ जुड़ने को कौन तैयार होगा? चलो, अभी इस बात पर नहीं जाते कि वह किसे निशाना बना रहा था। अगर वह मुझे नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति को निशाना बना रहा होता, तो क्या उसके क्रियाकलाप जमीर के मानक के अनुरूप होते? (नहीं।) वह मेरे साथ ऐसा करने में सक्षम था, यह किस प्रकार की समस्या है? चूँकि वह मेरे साथ ऐसा करने में सक्षम था, तो क्या वह किसी साधारण व्यक्ति के साथ भी ऐसा कर सकता था? इस मामले का आकलन कैसे किया जाए? मैं बहुत हैरान था कि यह व्यक्ति ऐसा कर सकता है। वह ऐसा क्यों कर सका? अगर वह किसी साधारण व्यक्ति के साथ ऐसा करता, तो मेरे पास भी उसका एक चरित्र-चित्रण होता। उसका ऐसा करना गलत था। ऐसा नहीं है कि दूसरों के साथ ऐसा करना सही है जबकि मेरे साथ ऐसा करना गलत है—ऐसा कथन उचित और सच नहीं है। अगर वह मेरे साथ ऐसा कर सकता है तो वह दूसरों के साथ, किसी के भी साथ ऐसा कर सकता है। इसका क्या कारण है? यह गहराई से विचार करने योग्य है। उसने कहा कि वह परमेश्वर में विश्वास करता है और वह परमेश्वर के घर का सदस्य है, फिर भी वह मेरे साथ इस तरह पेश कैसे आ सका? वह ऐसा नीच काम कैसे कर सका? वह ऐसा समझ से बाहर काम कैसे कर सका? वह खुद को बहुत दयालु समझता था, तो वह दूसरों को सड़े हुए आलू खाने के लिए कैसे दे सका? उसने उन्हें खुद क्यों नहीं खाया? वे सड़े हुए आलू, छोटे आलू और अल्पविकसित आलू जानवरों को खिलाने के लिए होते हैं, तो उसने उन्हें लोगों को खाने के लिए क्यों दिया? अगर मैं उसे सत्य से न मापूँ, तो भी नैतिक दृष्टिकोण से उसके कृत्य स्वीकार्य नहीं थे, इसलिए मैं कहता हूँ कि वह अमानव है। क्या यह चरित्र-चित्रण सटीक है? क्या यह उचित है? (यह सटीक और उचित है।) उसने इतना स्पष्ट रूप से गलत काम किया और फिर भी वह इसे नहीं जानता था और वह सहज भी था और उसके दिल में जरा भी आत्म-ग्लानि नहीं थी। ऐसा क्यों? उसमें जमीर नहीं था, यहाँ तक कि उसमें आत्मा भी नहीं थी; किसी दानव या जानवर की तरह, उसमें जागरूकता नहीं थी। वह मानव नहीं था, इसलिए उसमें जमीर नहीं था। वह नहीं जानता था कि क्या सही है और क्या गलत और चाहे उसने कितना भी गंभीर कुकृत्य किया हो, उसे हमेशा लगता था कि उसके कृत्य पूरी तरह से उचित हैं और उसने कभी अपनी गलतियाँ नहीं मानीं और उसी तरह कृत्य करते रहने पर अड़ा रहा। जब दूसरे लोग उसका चरित्र-चित्रण यह कहते हुए करते थे कि उसने जो किया वह गलत था, तब भी वह सोचता था कि वह पूरी तरह से सही था और उसे लगता था कि उसके साथ अन्याय हुआ है। मैं कहता हूँ कि यह तुम्हारे साथ अन्याय करना बिल्कुल नहीं है। यह बिना तथ्यों को जाने तुम्हारी निंदा करना या तुम्हारा मानवताविहीन व्यक्ति के रूप में चरित्र-चित्रण करना नहीं है। बल्कि, सबको दिखने वाले इतने गंभीर तथ्य सामने हैं, तो फिर कौन कह सकता है कि तुममें मानवता थी? प्रमाण के रूप में इन तथ्यों के होने पर कोई भी इससे इनकार नहीं कर सकता। मैं यह कहना पसंद करता कि तुममें मानवता थी, तुम दयालु और ईमानदार थे, लेकिन तुमने जो किया उसकी प्रकृति बहुत ही घृणित है; यह शैतान द्वारा परमेश्वर का उपहास करने जैसी प्रकृति का है, यह तथ्यों को वैसे ही विकृत करना है, जैसे शैतान ने परमेश्वर को संसार की संपत्ति और वैभव दिखाकर कहा था, “यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।” संसार की हर चीज और सभी वस्तुएँ परमेश्वर द्वारा बनाई गई हैं। जो कुछ भी है वह सब और हर चीज परमेश्वर ने बनाई है; परमेश्वर को इन सबका आनंद लेना चाहिए, तुम्हें नहीं, तुम ऐसा करने के योग्य नहीं हो। तुम जिसका आनंद लेते हो, वह वही है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। तुम्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए, न कि परमेश्वर से अपनी आराधना करवानी चाहिए। इस आदमी को इतनी स्पष्ट और सरल अवधारणा भी समझ नहीं आई और उसने यह तक सोचा कि मुझे बस कुछ आलू पाने के लिए उसका मूड भाँपना होगा और देखना होगा कि वह खुश है या नहीं। अगर उसका मूड खराब होगा तो वह मुझे कुछ सड़े हुए आलू दे देगा, मानो किसी भिखारी के साथ पेश आ रहा हो। मुझे उसका दुर्व्यवहार सहना था—क्या यह संभव है? क्या मैं यह बर्दाश्त कर सकता हूँ? (नहीं।) ऐसे व्यक्ति से कैसे निपटा जाना चाहिए? (उसे तुरंत दूर कर दिया जाना चाहिए।) ऐसे व्यक्ति से प्रशासनिक आदेश द्वारा निपटा जाना चाहिए। और बेशक यह अपनी तरह की अकेली घटना नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या इससे भी ज्यादा गंभीर घटनाएँ हैं?” बेशक हैं, वरना मैं क्यों कहता कि लोग एक-दूसरे से अलग हैं? अगर परमेश्वर में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति परमेश्वर की आराधना कर सके, तो हर किसी को अपनी किस्म के अनुसार छँटाई की कोई जरूरत नहीं होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि बहुत-से लोग ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास नहीं करते और ऐसे बुरे लोग और भ्रमित लोग हैं जो कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हैं, कोई भी दुष्कर्म करने में सक्षम हैं, इसलिए जैसे-जैसे कलीसिया का कार्य समाप्त हो रहा है, वैसे-वैसे हर कोई बेनकाब किया जा रहा है और उसकी अपनी किस्म के अनुसार छँटाई की जा रही है।
आओ, एक और उदाहरण के बारे में बात करते हैं। एक खेत में मक्का की फसल पक चुकी थी और कोई मेरे लिए कुछ भुट्टे लाने वाला था। पास खड़े एक व्यक्ति ने उससे कहा, “इन भुट्टों के ऊपर से चूहे दौड़ गए हैं, इन्हें मत लो!” उसने इस पर सोचा और कहा, “अगर इनके ऊपर से चूहे दौड़ गए हैं तो क्या हुआ? क्या ये अभी भी खाने लायक नहीं हैं? अगर मैं इन्हें लेता हूँ तो यह ठीक ही है!” वह स्पष्ट रूप से जानता था कि उन भुट्टों के ऊपर से चूहे दौड़ गए हैं और वे लोगों के खाने लायक नहीं हैं, फिर भी वह उन्हें मेरे पास लाने पर अड़ा रहा। इसकी प्रकृति क्या है? क्या ऐसे व्यक्ति में मानवता है? (नहीं।) तो यह कैसा व्यक्ति है? (यह मानव नहीं, बल्कि दानव है।) मुझे बताओ, क्या वह जिन भुट्टों के ऊपर से चूहे दौड़ गए हैं उन्हें अपने माता-पिता या बच्चे को खाने के लिए देने को राजी होता? (नहीं।) क्यों नहीं? (वह जानता था कि वे शुद्ध नहीं हैं, उन्हें खाना उनके स्वास्थ्य के लिए खराब होगा। वह इन्हें अपने परिवार को खाने देने के लिए राजी नहीं होगा।) वह जानता था कि वह इन्हें अपने परिवार को नहीं दे सकता, फिर भी उसने इन्हें मेरे पास लाने की जिद की और दूसरे उसे रोक नहीं सके। तो क्या वह जानता था कि यह सही है या गलत? (वह नहीं जानता था।) असल में, वह अपने दिल में जानता था कि यह गलत है। तो फिर भी वह मेरे पास वे भुट्टे क्यों लाना चाहता था? क्या मैं उसका दुश्मन हूँ? क्या मैंने उसे सताया या नुकसान पहुँचाया था? नहीं, मैंने इनमें से कुछ नहीं किया था। मैं उसे जानता नहीं था, फिर भी उसने मेरे लिए ऐसे भुट्टे लाने पर जोर दिया जिनके ऊपर से चूहे दौड़ गए थे। मुझे बताओ, इसकी प्रकृति क्या है? यह वास्तव में ऐसी चीज थी जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की गई थी जो परमेश्वर में विश्वास करता था। यह असल में तुम्हारी आँखें खोलता है और तुम्हारा दृष्टिकोण व्यापक बनाता है, इससे वास्तव में तुम्हें भेद पहचानना आता है और तुम यह देख पाते हो कि इस विशाल दुनिया में विचित्रता का वास्तव में कोई अंत नहीं है। मुझे बताओ, जब उसने मेरे लिए वे भुट्टे तैयार किए, तो क्या उसके दिल में कोई जागरूकता थी? क्या वह जानता था कि वह जो कर रहा है वह गलत है, कि उसे कुछ अच्छे भुट्टे लाने चाहिए थे, कम से कम ऐसे भुट्टे जिनके ऊपर से चूहे न दौड़े हों? क्या वह इस तरह सोचता था? (उसमें कोई जागरूकता नहीं थी।) जब ऐसी चीजों की बात आती थी तो उसमें कोई जागरूकता नहीं होती थी। अगर ऐसे दूषित भुट्टे उसकी माँ या उसके बच्चे के लिए लाए जाते, तो उसमें जागरूकता होती। उसमें जमीर की जागरूकता नहीं थी जो मानवता में होनी चाहिए, तो क्या उसमें मानवता थी? वह किस तरह का प्राणी था? (वह मानव नहीं था।) देखो, परमेश्वर में अपने विश्वास में उसने अपना कर्तव्य निभाया, उसने कष्ट सहे और कीमत चुकाई, वह शारीरिक श्रम कर सकता था और वह सभाओं में भी जाता था और परमेश्वर के वचन पढ़ता था, लेकिन वह मेरे प्रति इतना अमैत्रीपूर्ण क्यों था? वह मुझसे इतना विकर्षित क्यों था? मैंने उसके साथ कभी दो-चार शब्दों से ज्यादा बातचीत नहीं की थी, तो मैंने उसे किस तरह से नाराज कर दिया था? जिन लोगों से मेरा संपर्क रहा है, उनमें से कुछ काफी अच्छे हैं और वे मेरे प्रति काफी मैत्रीपूर्ण हैं। हर व्यक्ति उसके जैसा नहीं है। लेकिन मैंने उसे नाराज नहीं किया था, न ही मैंने उसे कोई नुकसान पहुँचाया था, तो फिर वह मुझसे इतनी नफरत क्यों करता था? इसका जवाब तुम लोगों के दिलों में है। उसने सिर्फ मुझसे ही नफरत नहीं की; वह सबके साथ इसी तरह पेश आता है। वह बिल्कुल इसी तरह का प्राणी है। अगर वह व्यापार करता, तो वह निश्चित रूप से धोखा और ठगी करता और हर तरह के दुष्कर्म करता। लोगों के साथ अपने मेलजोल में उसमें जमीर की कोई सीमा और कोई सिद्धांत नहीं है; उसका दिल इन अँधेरी चीजों से भरा हुआ है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि लोगों के साथ व्यवहार करते समय यही उसका स्थायी तरीका और सिद्धांत था; चीजों को सँभालने का उसका यही उपाय और ढंग था। कुछ लोग कहते हैं, “वह ऐसा कर सका, इस तथ्य का मतलब यह है कि उसने परमेश्वर को परमेश्वर नहीं समझा।” क्या यह कथन सही है? (नहीं।) यह गलत क्यों है? अगर तुम मेरे साथ एक साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार कर रहे होते, तो भी तुम्हें मेरे साथ ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर तुम सिर्फ नैतिकता का पालन कर रहे होते, तो भी तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर भोजन के ऊपर से वाकई चूहे दौड़ गए हों या भोजन को किसी जानवर ने कुतर दिया हो और उसमें बैक्टीरिया हो गए हों, तो उसे सुपरमार्केट में भी नहीं बेचा जा सकता। अगर कोई उसे खा ले और उसे कुछ हो जाए तो क्या होगा? चाहे दूसरे जानें या न जानें, यह तुम्हारे जमीर को ठीक नहीं लगेगा। चूँकि तुम जानते हो, इसलिए तुम्हें उसे दूसरों को नहीं खाने देना चाहिए। इसमें व्यक्ति की प्रकृति शामिल है और इसमें आचरण के सिद्धांत शामिल हैं। तुममें आचरण के सबसे बुनियादी नैतिक मानदंड भी नहीं हैं, फिर भी तुम सोचते हो कि तुम मानव हो। तुम मानव बिल्कुल नहीं हो। यहाँ तक कि एक जानवर भी जानता है कि उसे उस व्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए जो उसे खिलाता और पालता है। उदाहरण के लिए कुत्ते को ही लो—अगर तुम उसे हमेशा खाना खिलाते रहोगे, तो वह तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। अगर कोई अजनबी घर में आकर कुछ लेना चाहे, तो वह उसे रोकेगा और हर मोड़ पर तुम्हारी रक्षा करेगा। एक कुत्ता तक अपने मालिक के प्रति वफादार हो सकता है और उसकी रक्षा कर सकता है, तो वह व्यक्ति इस स्तर तक पहुँचने में कैसे विफल रहा? क्या वह कुत्ते से भी बदतर नहीं है? (हाँ, है।) अगर तुम कहते हो कि वह दानव है, तो हो सकता है वह सचमुच इसे मानने से इनकार कर दे। तो आओ, अब इसे निष्पक्ष रूप से कहते हैं : ऐसे व्यक्ति में कोई मानवता नहीं होती, क्योंकि उसने ऐसी बेतुकी चीज की है, ऐसा नैतिक रूप से भ्रष्ट काम किया है और फिर भी उसमें जमीर की कोई जागरूकता नहीं है और उसे कभी इसका पछतावा भी नहीं होता और वह इसके बारे में व्यथित भी महसूस नहीं करता। अगर कोई किसी साधारण व्यक्ति के साथ भी ऐसा व्यवहार करता है तो उसमें जमीर की जागरूकता होनी चाहिए, उसे अंदर से व्यथित महसूस करना चाहिए और उसे यह जानना चाहिए कि वह जो कर रहा था वह गलत था और उसे रुक जाना चाहिए। यह बात तब और भी ज्यादा लागू होती है जब बात मेरे साथ उसके इस तरह के व्यवहार की आती है, जो और भी ज्यादा अनुचित है। बेशक, मैं इस बात से आहत नहीं हुआ कि वह मेरे साथ इस तरह पेश आया। मेरा दिल इतनी आसानी से आहत नहीं होता। बात बस यह थी कि मैंने देखा कि जिस सिद्धांत से उसने चीजों को सँभाला, वह बहुत घृणित था। न सिर्फ वह जमीर के मानक पर खरा नहीं उतरता था, बल्कि वह बहुत नीच और घिनौना भी था। इस व्यक्ति में बिल्कुल भी मानवता नहीं थी! उसने इतने आत्म-औचित्यपूर्ण, खुले ढंग से ऐसा गलत काम किया और कोई उसे रोक नहीं सका। मेरा यह कहना कि उसमें मानवता नहीं है, उसके साथ अन्याय करना बिल्कुल नहीं है, क्योंकि यह ठीक उसी तरह का कृत्य है—मानवता से रहित कृत्य—जो मानवताविहीन लोग करते हैं। यह सब उसके सार और उसकी पहचान के भी अनुरूप है। अगर कोई व्यक्ति उचित तरीके से काम करता है और उसमें मानवता और जमीर है तो यह कहना कि उसमें मानवता नहीं है, उसके साथ अन्याय करना है। लेकिन अगर वह सचमुच ऐसे कृत्य करता है जो मानवता से रहित हैं तो यह कहना कि उसमें मानवता नहीं है, उसके सार से बहुत मेल खाता है। ऐसा कहना उसके साथ अन्याय करना नहीं है, है ना? (हाँ।) कुछ लोग जब मुझे ये शब्द कहते हुए सुनते हैं, तो उनके मन में कुछ विचार आते हैं और वे कहते हैं, “तुम हमेशा इन चीजों के बारे में बोलते हो और इससे हमारा अपमान होता है। कौन गलतियाँ नहीं करता?” क्या इस तरह सोचना सही है? (नहीं।) हर व्यक्ति गलतियाँ करता है, लेकिन गलतियों की प्रकृति वास्तव में भिन्न होती है। कई गलतियों में मानवता की समस्याएँ शामिल होती हैं और कई गलतियों में व्यक्ति का प्रकृति सार शामिल होता है। कुछ गलतियाँ व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभाव का प्रकाशन मात्र होती हैं और इसका मतलब यह नहीं होता कि उस व्यक्ति के सार में कोई समस्या है।
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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?