सत्य का अनुसरण कैसे करें (19) भाग तीन
पूर्वी समाज में पूरब के लोग अपनी शिक्षा से मानवता का जो विशिष्ट गुण विकसित करते हैं, वह है दबना और सहना। इस दबने और सहने के पीछे असल में कई तरह के विशिष्ट विचार, दृष्टिकोण, आचरण के तरीके और सभी तरह की चीजों के प्रति अलग-अलग रवैये होते हैं जो पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा में पाए जाते हैं। पूर्वी समाज ऐसा ही है। इसी तरह, पश्चिमी समाज की भी अपनी मुख्यधारा की सांस्कृतिक शिक्षा है, जिसके जरिए पश्चिमी लोग भी मानवता के अपने-अपने विशिष्ट गुण विकसित करते हैं। तो यह मुख्यधारा की पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा क्या है? यह मुख्य रूप से स्वायत्तता और स्वतंत्रता को महत्व देती है। यह पूर्वी समाज की उस स्थिति से अलग है, जो लोगों से देश और समाज के लिए खुद को बलिदान करने और योगदान देने की अपेक्षा रखता है, ऐसी चीजें करने की उम्मीद करता है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हुई नहीं हैं। इसके विपरीत, पश्चिमी समाज लोगों को जो सिखाता है वह, पूर्वी समाज उनसे जो करने की अपेक्षा रखता है उसके ठीक उल्टा है। पश्चिमी समाज तुमसे समाज, मानवजाति या देश से जुड़े बड़े उद्देश्य के लिए कुछ भी योगदान देने की अपेक्षा नहीं करता; पश्चिमी शिक्षा के मूल में तुम्हें स्वतंत्र रूप से सोचने, अपनी समस्याओं से खुद निपटना सीखने और दूसरों के लिए, समाज या देश के लिए मुसीबत न बनने की शिक्षा देना है। यह तुम्हें स्वतंत्र अधिकार, सोचने के लिए स्वतंत्र जगह और स्वतंत्र व्यक्तिगत स्थान देता है; साथ ही, यह तुम्हारी स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता और समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने और उन्हें हल करने की क्षमता को विकसित करता है। तुम्हें अपनी समस्याएँ खुद हल करनी होंगी; तुम्हें स्वतंत्र, स्वायत्त और आत्मनिर्भर होना चाहिए। पश्चिम में इस तरह की वैचारिक शिक्षा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है और इस सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के सामने पश्चिमी लोग भी अपनी शैक्षिक विचारधारा के मूल से संबंधित मानवता के कुछ विशिष्ट गुण विकसित करते हैं। पूरब के लोगों ने पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा की पृष्ठभूमि में पूरब की शैक्षिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ विकसित की हैं। चूँकि पश्चिमी लोगों में पश्चिमी समाज का विशिष्ट शैक्षिक गुण होता है, इसलिए उनमें उस विशिष्ट गुण से संबंधित सार भी होता है। पश्चिमी लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है उसका सार, असल में पूरब के लोगों में मौजूद विशिष्ट शैक्षिक गुण से अलग है। पूरब के लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है, वह दिखावे की शिक्षा है, जबकि पश्चिमी लोगों में जो विशिष्ट शैक्षिक गुण है, वह स्वार्थ की शिक्षा है। पश्चिमी शिक्षा का हर एक विषय लोगों को स्वतंत्र और स्वायत्त होना, अपनी समस्याओं के बारे में सोचना और अपने मामलों से खुद निपटना और उनका प्रबंध करना सिखाता है। इसलिए, पश्चिमी शिक्षा में स्वार्थ की शिक्षा होने का विशिष्ट गुण है। स्वार्थ की यह शिक्षा पूर्वी शिक्षा से पूरी तरह अलग है; यह एक अलग तरह का विशिष्ट गुण है। इस विशिष्ट गुण की वजह से पश्चिमी लोग व्यक्तिगत स्वतंत्र स्थान; व्यक्तिपरक इच्छाशक्ति, सोच, विचारों, दृष्टिकोणों और खयालों; और इसके अलावा अपने खुद के अधिकारों, अपने मौजूदा जीवन परिवेशों, अपनी मौजूदा मनोदशा और भावनाओं को प्राथमिकता देते हैं। उन्हें दूसरी चीजों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, न ही किसी सामाजिक या पारिवारिक जिम्मेदारी पर ध्यान देने की जरूरत होती है। उन्हें सबसे पहले अपनी समस्याओं को समझना होता है, अपनी भावनाओं को संभालना होता है और अपने तात्कालिक मामलों को सुलझाना होता है; बाकी सब कुछ उसके बाद ही आता है। पूर्वी शिक्षा ने पूरब के लोगों को दबना और सहना सिखाया है, जबकि पश्चिमी शिक्षा ने पश्चिमी लोगों को अपने अधिकारों की रक्षा करना सिखाया है। इस मामले में पश्चिमी लोग और पूरब के लोग पूरी तरह से अलग हैं। जब पूरब के लोगों के सामने कुछ आता है, तब वे बस उसे सहते रहते हैं। जब वे सच में उसे और नहीं सह पाते, तब वे खुद से कहते हैं, “बुरा जीवन भी अच्छी मृत्यु से बेहतर है। जीवित रहने के लिए सहना पड़ता है।” पूरब के लोगों के दबने और सहने के गुण के उलट, पश्चिमी लोगों में एक अलग विशिष्ट गुण होता है : स्वायत्तता और स्वतंत्रता में अपनी सामाजिक शिक्षा के जरिए, उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा करना सीखा है। पूरब के लोगों के दबने और सहने की तुलना में, क्या पश्चिमी लोगों द्वारा अपने अधिकारों की रक्षा करने में कुछ हद तक अधिक आत्म-सम्मान और गरिमा नहीं है? यानी, इसमें थोड़ी ज्यादा स्वायत्तता शामिल है, है ना? (हाँ।) अपने अधिकारों की रक्षा करना एक पूर्णतया मौलिक अवधारणा है; इसका मतलब है अपने मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना, जिसमें विश्वास का अधिकार, जीवन का अधिकार, बोलने की आजादी का अधिकार वगैरह शामिल हैं। तो फिर, अधिकारों की इस बुनियादी रक्षा का मुख्य रूप से क्या अर्थ है? इसका अर्थ है लोगों के पास सोचने के लिए स्वतंत्र स्थान होना, किसी भी सामाजिक परिवेश या आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों से प्रभावित या नियंत्रित हुए बिना मुद्दों पर मुक्त रूप से और स्वतंत्र रूप से विचार करने में समर्थ होना। चाहे मुद्दों पर विचार करने से उत्पन्न होने वाले दृष्टिकोण सही हों या गलत या फिर सोचने का तरीका सही हो या नहीं, स्वायत्तता और स्वतंत्रता हासिल करना सबसे अधिक मायने रखता है। संक्षेप में, पश्चिमी लोग स्वतंत्र समाजों में रहते हैं और पश्चिमी सामाजिक शिक्षा के सांस्कृतिक संदर्भ में, उनके मन बहुत सक्रिय होते हैं और अक्सर स्वतंत्रता की दशा में होते हैं। इसलिए, पूर्वी समाज के लोगों की तुलना में, पश्चिमी लोग अपनी सोच में अधिक साहसी होते हैं, सोचने के लिए ज्यादा इच्छुक और ज्यादा सक्षम होते हैं, जबकि पूरब के लोगों की सोच ज्यादातर समय बंधी हुई, रुढ़िवादी या दबी हुई होती है। सामान्य परिस्थितियों में, पश्चिमी लोगों के मन स्वतंत्र, सक्रिय होते हैं और वे समस्याओं के बारे में सोचने के इच्छुक रहते हैं। इसे थोड़ा अनुचित तरीके से कहें तो वे अजीब और असामान्य चीजों पर विचार करने के अधिक इच्छुक रहते हैं, यहाँ तक कि वे बहुत ज्यादा गहराई में जाने के भी इच्छुक रहते हैं। यह मानवता के उन विशिष्ट गुणों की अभिव्यक्ति है जो वे पश्चिमी सामाजिक शिक्षा के अंदर विकसित करते हैं और मानवता की यह अभिव्यक्ति पूरब के लोगों की तुलना में अधिक प्रगतिशील है। एक तरफ, वे अपने जीवन के अधिकार की रक्षा करते हैं और दूसरी तरफ, वे अपने स्वतंत्र विचारों से उत्पन्न होने वाले विभिन्न दृष्टिकोणों की भी रक्षा करते हैं। नतीजतन, पश्चिमी साहित्यिक रचनाओं में या पश्चिमी कला और मनोरंजन से जुड़े जीवन में दिखाए गए विचारों, दृष्टिकोणों और कलात्मक रूपों में विविधता और व्यापकता होती है। पूरी मानवजाति में, पश्चिमी साहित्यिक रचनाएँ और मनोरंजन से जुड़ा जीवन अपेक्षाकृत स्वतंत्र और अग्रगामी होते हैं; लोग उनसे प्रेरणा ले सकते हैं और बहुत लाभ उठा सकते हैं। देखो—कुछ पूर्वी साहित्यिक और कलात्मक रचनाएँ किन विचारों की हिमायत करती हैं? देशभक्ति, परिवार के लिए प्यार, माता-पिता के लिए प्यार, वगैरह। ये सभी चीजें पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा में पाई जाती हैं या पूर्वी संस्कृति के सत्व का हिस्सा हैं। पश्चिमी संस्कृति ने पश्चिमी लोगों को सोचने के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त जगह दी है, उनके अंदर मानवता का यह विशिष्ट गुण पैदा किया है और उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने का यह अधिकार दिया है, इसलिए पश्चिमी लोगों के साहित्यिक और कलात्मक जीवन में पूरब के लोगों की तुलना में अधिक बौद्धिक सार होता है; साथ ही, उनकी सोच का दायरा भी व्यापक होता है। देखो, पूरब के लोगों की सोच का दायरा या जो विचार वे अपने साहित्यिक और कलात्मक जीवन में व्यक्त करते हैं और जिनकी वे हिमायत करते हैं, वे बहुत सीमित, संकीर्ण और प्रतिबंधित होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों के साहित्यिक और कलात्मक जीवन में दिखाई देने वाले विभिन्न विषय काफी व्यापक और सरकारी प्रतिबंधों से मुक्त होते हैं। इनमें से कुछ विषय किसी अवधि में सरकार द्वारा लागू किए गए किसी विशेष कानून पर लोगों की मानवता के संदर्भ में चिंतन से जुड़े होते हैं, या समाज पर या यहाँ तक कि किसी व्यक्ति के जीवन और परिवार पर इसके प्रभाव से संबंधित चिंतन से जुड़े होते हैं। अन्य विषय, स्कूली शिक्षा और मानवाधिकारों से संबंधित चिंतन से जुड़े होते हैं, साथ ही कई दूसरे मुद्दे भी होते हैं, जैसे कि नस्लीय समानता, नस्लीय भेदभाव और अलग-अलग रंग के लोगों के बीच संबंधों पर आप्रवासियों सहित सभी सामाजिक वर्गों के लोगों के बीच चर्चा करना। इससे यह देखा जा सकता है कि पश्चिमी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में जिन विभिन्न विषयों को दिखाया गया है, उनका दायरा बहुत व्यापक है; यही बात इसमें शामिल विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों पर भी लागू होती है। वे कुछ कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा व्यापक कानूनी ढांचे के अंदर इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों और साधनों के कारण पड़ने वाले सामाजिक प्रभाव, साथ ही जनता पर पड़ने वाले विभिन्न मनोवैज्ञानिक बोझों या लोगों के जीवन पर बाद में पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों को भी दर्शाते हैं। ये सभी ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो विभिन्न पश्चिमी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में प्रस्तुत किए गए हैं। एक बात तो यह है कि ये ऐसे विचार हैं जिनकी पश्चिमी सांस्कृतिक संदर्भ में हिमायत की जाती है; दूसरी बात, ये ऐसे विचार और दृष्टिकोण हैं जो इसलिए सामने आते हैं क्योंकि पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा के संदर्भ में लोगों को सोचने की आजादी है। संक्षेप में, अपनी साहित्यिक और कलात्मक रचनाओं में पश्चिमी लोगों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले विभिन्न विचार, साथ ही विभिन्न सामाजिक वर्गों और विभिन्न उद्योगों में पश्चिमी लोगों के विचार, दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के फलसफे और सभी तरह की चीजों से व्यवहार करने के उनके रवैये, पूरब के लोगों से पूरी तरह अलग हैं। इसका एक सरल उदाहरण है : पूरब में, जब कोई कर्मचारी किसी कंपनी में काम करता है, तब उसकी आजीविका उसके मालिक से आती है, इसलिए उसे वही करना होता है जो उसका मालिक उसे करने के लिए कहता है। भले ही उसे अपने मालिक के लिए कुछ घरेलू काम करने के लिए कहा जाए, जैसे कि उसके बच्चों को लाना या किराने का सामान खरीदना, उसे पूरी तरह आज्ञाकारी होना पड़ता है और उसमें मना करने की हिम्मत नहीं होती है। उसे अपनी छुट्टी के समय भी फोन पर उपलब्ध रहना पड़ता है। वह अपने मालिक का सेवक, अधीनस्थ और गुलाम होता है। पूरब में कर्मचारी और कंपनी के मालिक के बीच वरिष्ठ-अधीनस्थ का संबंध ऐसा ही होता है। हो सकता है कर्मचारी असहज, परेशान और अनिच्छुक महसूस करता हो, लेकिन उसके पास कोई चारा नहीं होता—वह केवल सहन कर सकता है। वह उसका मालिक है, जो उसे आजीविका प्रदान करता है, इसलिए वह खुद को उसकी दया पर ही छोड़ सकता है। पूरब में, कोई मालिक अपने कर्मचारियों का कितना भी शोषण करे और उसके काम कितने भी अनुचित क्यों न हों, कर्मचारी केवल इसे सहन कर सकते हैं; उनके पास इस स्थिति से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। कुछ पूर्वी देशों में श्रम कानून भी हो सकते हैं, जो हर नागरिक के कानूनी अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन सामाजिक स्तर पर, क्योंकि यह पूरब है, कोई भी कर्मचारी अपने मालिक पर मुकदमा करने की हिम्मत नहीं करता, भले ही वह श्रम कानूनों को तोड़े। चाहे उसे अधिकारों से कैसे भी वंचित किया जाए या मालिक द्वारा उसका कितना भी शोषण किया जाए, वह कुछ भी नहीं कर सकता। श्रम कानून होने के बावजूद, वह अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करने के लिए कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकता। वह बस हालात के साथ चलता रहता है और हालात को वैसे ही बने रहने देता है। दूसरी ओर, पश्चिम में स्थिति अलग है। पश्चिम में कर्मचारी और मालिक के बीच वरिष्ठ-अधीनस्थ का संबंध केवल काम के स्तर पर और काम के घंटों के दौरान ही होता है। काम के बाहर, उनके बीच कोई व्यक्तिगत, भावनात्मक संबंध नहीं होता। अगर तुम्हारा मालिक तुमसे ओवरटाइम करने को कहता है, तो तुम मना कर सकते हो। अगर तुम्हारा मालिक तुमसे अपने बच्चों को लाने या किराने का सामान खरीदने में मदद करने को कहता है, तो तुम कह सकते हो, “आपको मुझसे यह सब करने के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं है। यह मेरा काम नहीं है। मैं आपकी सेवा करने के लिए बाध्य नहीं हूँ।” तुम मना कर सकते हो। अगर तुम्हारा मालिक बार-बार और जबरन तुमसे यह सब करने को कहता है, तो तुम उस पर मुकदमा कर सकते हो; इसमें पश्चिमी श्रम कानून लागू होंगे; कानून इस पर उचित कार्रवाई करेगा। पश्चिमी लोग ऐसा करने में समर्थ हैं और वे ऐसा करने से डरते नहीं हैं, लेकिन पूरब के लोग डरते हैं। पूरब के लोगों की धारणाओं के अनुसार, तुम्हारा वरिष्ठ या कोई रुतबे वाला या मशहूर व्यक्ति तुमसे जो कुछ भी करने को कहे, तुम्हें वह करना चाहिए और उसे मुफ्त में सेवाएँ प्रदान करनी चाहिए। तुम्हें तो यह भी कहना होगा, “मैं आपकी सेवा करने की खातिर, आपके लिए अपनी जान भी देने को तैयार हूँ और बदले में कुछ नहीं चाहूँगा। आपकी सेवा करना मेरा सम्मान है!” चाहे वह तुम्हारे श्रम का शोषण करे या तुम्हें तुम्हारे मानवाधिकारों से वंचित करे, तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए और किसी भी पारिश्रमिक की माँग नहीं करनी चाहिए। अगर तुम ऐसा करते हो, तो इसका मतलब है कि तुम एहसानफरामोश हो, उसकी इज्जत खराब कर रहे हो और वह तुम्हें इसकी सजा देगा। दूसरी ओर, पश्चिमी लोग अलग हैं। उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा करना और इन अधिकारों का अत्यंत प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना सीख लिया है; वे इन्हें जितना हो सके उतना आगे ले जाते हैं। अगर राष्ट्रपति या कोई मशहूर व्यक्ति खाने के बाद टिप नहीं देता है, तो भी शिकायत दर्ज की जाएगी—यह श्रम कानूनों द्वारा श्रमिकों को दिया गया अधिकार है। जब पूरब के लोग ऐसी स्थितियों का सामना करते हैं, तब वे शिकायत करने की हिम्मत तक नहीं करते। वे सोचते हैं, “वह एक अधिकारी है, एक मशहूर इंसान है। क्या मैं उसके खिलाफ मुकदमा जीत पाऊँगा? अगर मैं सचमुच जीत भी गया, फिर अगर वह पर्दे के पीछे से मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करेगा तो मैं क्या करूँगा? अगर मैंने उस पर मुकदमा किया, तो मैं बड़ी मुसीबत में पड़ जाऊँगा और शायद मेरी जान भी जा सकती है।” इसलिए, पूरब के लोग टिप माँगने की हिम्मत करने के बजाय नुकसान उठाना पसंद करते हैं। इसे ही सहना कहते हैं। लेकिन पश्चिमी लोग अलग होते हैं। वे सोचते हैं, “मैं इसे क्यों सहूँ? मैं किसी और की खातिर अपना जीवन जीने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ—मैं अपने लिए जीता हूँ। मुझे अपने अधिकारों की रक्षा करनी है। यह पैसा मेरा हक है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कोई जाने-माने व्यक्ति या बड़े आदमी हो, तुम्हें पैसे देने होंगे। हर कोई बराबर है। टिप नहीं देने का अधिकार तुम्हें किसने दिया? अगर तुमने टिप नहीं दी, तो मैं तुम पर मुकदमा कर दूँगा!” और एक बार जब उसे टिप मिल जाती है, तो मामला निपट जाता है। ये अलग-अलग सोच, दृष्टिकोण और लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटने के तरीके हैं जो पूरब के लोगों और पश्चिमी लोगों में अपनी-अपनी संबंधित सांस्कृतिक शिक्षाओं से आते हैं।
पूरब और पश्चिम के लोग सांस्कृतिक शिक्षा के अपने तरीकों और उस शिक्षा की विशिष्ट विषय-वस्तु के मामले में अलग-अलग हैं। शिक्षा के इन अलग-अलग रूपों ने अलग-अलग इंसानी संस्कृतियों के साथ-साथ अलग-अलग जातीय समूहों में मानवता के विशिष्ट गुण भी पैदा किए हैं। मानवता के इन विशिष्ट गुणों के साथ, पूरब के लोगों की अपनी जीवनशैली, जीवन की स्थितियाँ, सोचने के तरीके और सांसारिक आचरण के प्रति उनके रवैये होते हैं, जबकि पश्चिमी लोगों की अपनी अलग जीवनशैली, जीवन की स्थितियाँ, सांसारिक आचरण के लिए उनके तरीके और रवैये होते हैं। बेशक सांसारिक आचरण के इन दो रवैयों में से एक है दबना और सहना; और यह खास तौर पर संयमी होना है; दूसरा, लोगों की अपनी व्यक्तिगत मर्जी और इच्छाओं के अधिकारों की रक्षा करने पर खास जोर देता है। एक दिखावे की शिक्षा से पैदा होता है और दूसरा स्वार्थ की शिक्षा से पैदा होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवता के ये विशिष्ट गुण किस तरह की शिक्षा से पैदा होते हैं—चाहे वह दबने और सहने का गुण हो या अपने अधिकारों की रक्षा करना, संयमी होना या खुलापन हो—इनमें से कौन-सी सकारात्मक चीजें हैं? (चाहे पूर्वी हो या पश्चिमी, मानवता के इनमें से कोई भी विशिष्ट गुण सकारात्मक चीजें नहीं हैं।) तुम ऐसा क्यों कहते हो कि वे सकारात्मक चीजें नहीं हैं? आओ, हम तुम्हारे विशिष्ट कारणों के बारे में सुनते हैं। तुममें से कोई भी नहीं बता सकता कि ऐसा क्यों, है ना? (हम नहीं बता सकते।) मामला चाहे जो भी हो, तुम सभी डरते हो कि दूसरे लोग बारीकियों पर बहुत ज्यादा ध्यान देंगे और जब वे ऐसा करते हैं, तो तुम भ्रमित हो जाते हो और चीजों को साफ-साफ समझा नहीं पाते। इससे साबित होता है कि तुममें उस मामले में स्पष्टता की कमी है, इसलिए तुम्हें इस पर संगति करनी चाहिए। जो सवाल मैंने तुमसे पूछा है, वह संगति करने लायक विषय है, है ना? (हाँ।) इस विषय में “परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है” शामिल है। तो आओ, पहले देखते हैं : परमेश्वर द्वारा सृजित इंसान किस तरह का प्राणी है? परमेश्वर जो भी बनाता है, वे सकारात्मक चीजें होती हैं। एक इंसान में कौन-सी चीजें परमेश्वर द्वारा सृजित हैं? (एक इंसान की स्वतंत्र इच्छाशक्ति और वह बुद्धि जो परमेश्वर उसे देता है।) मोटे तौर पर, एक इंसान की सभी जन्मजात स्थितियाँ परमेश्वर द्वारा दी गईं और उसके द्वारा सृजित हैं। अगर हम “सृजित” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो यह थोड़ा अमूर्त हो सकता है, क्योंकि हर कोई अपने माता-पिता से पैदा होता है, न कि परमेश्वर के अपने हाथों से बनाया जाता है। “परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है” वाक्यांश का इस्तेमाल थोड़ा व्यापक है; यह पूरी तरह से उपयुक्त नहीं है। ऐसे में, “परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई जन्मजात स्थितियाँ” कहना अधिक विशिष्ट और वस्तुनिष्ठ है। परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई जन्मजात स्थितियों में “परमेश्वर द्वारा सृजित क्या है” विषय शामिल है। तो क्या हम कह सकते हैं कि किसी व्यक्ति की सभी जन्मजात स्थितियाँ सकारात्मक चीजें हैं? (हाँ।) किसी व्यक्ति की शक्ल-सूरत, उसकी भाषाई क्षमता, उसकी सभी इंद्रियाँ और शारीरिक विशेषताएँ, साथ ही उसकी स्वतंत्र इच्छाशक्ति, वह क्षमता जिससे वह सोचता और विचार करता है, उसकी स्वाभाविक खूबियाँ और गुण; साथ ही जीवित प्राणी के तौर पर वह जीवन जीने के जो भी नियम मानता है—ये सभी सकारात्मक चीजें हैं। यानी, परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई सभी जन्मजात स्थितियाँ सकारात्मक चीजें हैं। तो क्या इन सकारात्मक चीजों में वे अलग-अलग विचार शामिल हैं जो किसी व्यक्ति के मन में आते हैं या जिन्हें वह समाज से और अलग-अलग युगों से अपनाता है? (नहीं।) जो कुछ भी लोग समाज से या मानवजाति से हासिल करते हैं, वह परमेश्वर ने नहीं दिया है, न ही यह मूल रूप से परमेश्वर द्वारा सृजित है। यह कहा जा सकता है कि अगर कोई चीज समाज या मानवजाति से आती है, तो वह सकारात्मक चीज नहीं है। इसे मोटे तौर पर, अवधारणात्मक तरीके से सारांशित करें तो हम यही कहेंगे। और विशिष्ट तौर पर कहें तो? क्या पूर्वी सामाजिक नैतिक शिक्षा के सांस्कृतिक संदर्भ में पैदा हुए मानवता के विशिष्ट गुण और सोचने के तरीके कुछ हद तक विकृत नहीं हैं? इसे ऐसे भी कहा जा सकता है : पूर्वी समाज में, लोगों के मन जकड़े हुए और विकृत हैं; वे समाज के और शैतान के कुछ विचारों और दृष्टिकोणों से भ्रष्ट और प्रभावित हुए हैं। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उनके मन शैतान द्वारा गढ़े जाने की प्रक्रिया से गुजरे हैं? (हाँ।) लोगों के मन गढ़े जाने की प्रक्रिया से गुजरे हैं और उनके विचार उनकी मानवता से पैदा नहीं हुए हैं। ये शिक्षाएँ सकारात्मक चीजों से नहीं आतीं, न ही ये परमेश्वर से आती हैं। चूँकि वे परमेश्वर से नहीं आती हैं, तो वे जो भी विचार, दृष्टिकोण और सोचने के तरीके पैदा करती हैं—और वे अंततः मानवता के जो भी विशिष्ट गुण पैदा करती हैं—बाद में उनसे निकलने वाली अन्य सभी चीजें, वे सब नकारात्मक चीजें होती हैं, सकारात्मक नहीं। यह एक ऐसी बात है जिसके बारे में तुम निश्चित हो चुके हो, है ना? (हाँ।) पूर्वी लोगों के मन जकड़े हुए और विकृत हैं; वे कुछ पूर्वी विचारों और दृष्टिकोणों से भी प्रभावित हैं, इसलिए उनकी मानवता के विशिष्ट गुणों से जो चीजें अभिव्यक्त होती हैं, वे सभी नकारात्मक हैं। अब पश्चिम को देखते हैं। पश्चिमी लोगों की वैचारिक शिक्षा की विषय-वस्तु क्या है? क्या इसका सत्य से कोई लेना-देना है? क्या पश्चिमी शिक्षा की विषय-वस्तु और मानवता की जिन अभिव्यक्तियों के लिए यह लोगों को प्रयास करना सिखाती है, क्या वे परमेश्वर के वचनों से आती हैं? (नहीं।) इसे और स्पष्ट कहने के लिए, मैं तुम लोगों से एक सवाल पूछता हूँ : क्या यह शिक्षा—जीवन, जीवित बचे रहने और सांसारिक मामलों से निपटने को लेकर इन विचारों और दृष्टिकोणों के पीछे के सिद्धांत और उन चीजों से निपटने के ये तरीके—परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं? क्या यह शिक्षा सत्य से मेल खाती है? (नहीं।) यह किस तरह से मेल नहीं खाती? (यह स्वार्थ की पश्चिमी शिक्षा की तरह है—भले ही यह सोचने की आजादी का सम्मान करती है, यह लोगों को केवल अपने बारे में सोचना और दूसरों के बारे में नहीं सोचना सिखाती है। यह परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुरूप नहीं है।) तो परमेश्वर के वचन और सत्य क्या कहते हैं? (आपस में बातचीत करते समय, लोगों को केवल अपने हितों या भावनाओं के बारे में नहीं सोचना चाहिए; बल्कि उन्हें यह सोचना चाहिए कि उनके क्रियाकलाप दूसरों को कैसे उन्नत कर सकते हैं और साथ ही कैसे सत्य के अनुरूप भी हो सकते हैं।) परमेश्वर के वचन तुम्हें बताते हैं कि चाहे तुम समस्याओं के बारे में स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से सोचो या किसी खास सोच या दृष्टिकोण के प्रभाव में रहो, तुम्हें ऐसा केवल अपने हितों की रक्षा करने या अपनी गरिमा और गौरव की रक्षा करने की खातिर नहीं करना चाहिए—यह वह सिद्धांत नहीं है जिसके अनुसार परमेश्वर के विश्वासियों को समस्याओं पर विचार करना चाहिए। समस्याओं पर विचार करते समय तुम्हें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि तुम्हारा तरीका सत्य के अनुरूप है या नहीं, क्या इन समस्याओं को सत्य का उपयोग करके हल किया जा सकता है और क्या तुम्हारा तरीका सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है और परमेश्वर के प्रति समर्पण की ओर ले जाता है। यह समस्याओं पर विचार करने का सिद्धांत है। चाहे तुम लोगों से निपट रहे हो या अपने परिवार या अपने आस-पास की अन्य चीजों से संबंधित समस्याओं से निपट रहे हो, तुम्हें बस अपने अधिकारों और हितों की रक्षा करने के बजाय, परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए। ये परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार आचरण करने के सिद्धांत हैं। तो ऊपरी तौर पर, पूर्वी संस्कृति की शिक्षा की तुलना में पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा मानव अधिकारों और लोगों के अधिकारों की रक्षा को अधिक महत्व देती है। यह पूर्वी संस्कृति से बेहतर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह सत्य की जगह ले सकती है। तुम्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह पूर्वी संस्कृति से बेहतर है या यह मानव अधिकारों का सम्मान करती है और लोगों को स्वतंत्र और मुक्त बनाती है, बस इसलिए यह सत्य सिद्धांतों की जगह ले सकती है और इसका वर्णन कुछ सकारात्मक के रूप में किया जा सकता है। पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा पूर्वी सांस्कृतिक शिक्षा से बस बेहतर है और मानवता की जरूरतों के अधिक अनुरूप है, लेकिन इसे सत्य सिद्धांतों के बराबर नहीं माना जा सकता, न ही यह उनकी जगह ले सकती है। कुछ हद तक, यह बस मानवता की जरूरतों, साथ ही लोगों की गरिमा, उनके अधिकारों और हितों को बनाए रखती है और उनका सम्मान करती है। हालाँकि, यह सम्मान केवल मानवता के संदर्भ में प्रासंगिक है। सत्य और न्याय के संदर्भ में, यह इनमें से किसी भी चीज को बनाए नहीं रखती है। इसलिए, पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा स्वार्थ की शिक्षा है। स्वार्थ की शिक्षा का मतलब है, “हर किसी को मेरे फायदे के लिए काम करना होगा। कुछ भी करने से पहले मुझे खुद सब कुछ भलीभाँति सोच लेना चाहिए। मेरे निजी हित, मेरे मानवाधिकार और मेरे व्यक्तिगत अधिकार सर्वोपरि हैं।” क्या यहाँ किसी नैतिक न्याय की बात की जा सकती है? क्या यहाँ किसी निष्पक्षता की बात की जा सकती है? (नहीं।) अगर निष्पक्षता या नैतिक न्याय की बात नहीं है, तो यह कैसे संभव है कि यह सत्य सिद्धांतों के साथ मेल खा सकती है? कुछ हद तक, पश्चिमी सांस्कृतिक शिक्षा तुम्हारे मानवाधिकारों का सम्मान करती है; यह तुम्हें समस्याओं के बारे में सोचने और खुलकर अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार देती है। इस तरह, यह मूल रूप से लोगों की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा कर सकती है। इसलिए, पश्चिमी शिक्षा कुछ हद तक मानवता की जरूरतों के अधिक अनुरूप है। लेकिन क्या पश्चिमी शिक्षा लोगों को जीवन में सही रास्ते पर ले जा सकती है? क्या यह लोगों को, सभी लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आने और सभी चीजों को सत्य सिद्धांतों के अनुसार करने में समर्थ बना सकती है? यह ऐसा नहीं कर सकती। पश्चिमी शिक्षा यह गारंटी दे सकती है कि हर किसी के पास मानवाधिकार हैं और अपनी गरिमा की रक्षा करने का अधिकार है—यह पूरी तरह से मानवता की जरूरतों के अनुरूप है। लेकिन समाज की वास्तविक स्थिति के हिसाब से देखें तो कुछ ही देश मानवाधिकारों की गारंटी देने के मानक को पूरी तरह से पूरा कर पाते हैं। यथार्थवादी तरीके से बोलें तो आज के समाज में यह एक बहुत अच्छी सामाजिक व्यवस्था है जो लोगों को समस्याओं के बारे में मुक्त रूप से सोचने और खुलकर अपनी राय व्यक्त करने की अनुमति देती है। परमेश्वर ने लोगों को स्वतंत्र इच्छाशक्ति और समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता दी; यह उसके द्वारा दी गई काबिलियत का बस एक पहलू है। लेकिन परमेश्वर ने तुमसे यह कभी नहीं कहा, “स्वार्थी बनो, स्वायत्त बनो। सब कुछ तुम्हारे अपने हितों पर केंद्रित होना चाहिए। तुम्हारे अपने हित सर्वोपरि हैं। सभी मामलों में तुम्हें स्वतंत्र होना चाहिए और अपना मालिक खुद होना चाहिए; सत्य खोजने, स्वर्ग की इच्छा के बारे में जानने या दूसरों के हितों पर विचार करने की कोई जरूरत नहीं है।” परमेश्वर ने कभी किसी को इस तरह से नहीं सिखाया। लोगों के जीवन में परमेश्वर के मार्गदर्शन की शुरुआत से ही, उसने जीवन जीने और सभी पहलुओं में आचरण करने के विशिष्ट तरीके बताए हैं, लोगों से सत्य का अनुसरण करने, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने, ईमानदार लोग बनने, सृजित प्राणियों का कर्तव्य पूरा करने और इसी तरह की बातें कही हैं। ये सभी व्यक्ति के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण अनुसरण हैं। परमेश्वर द्वारा व्यक्त बहुत-सारे सत्यों के बीच, उसने कभी भी तुमसे अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए नहीं कहा, न ही उसने कभी तुमसे समस्याओं के बारे में मुक्त रूप से सोचने और अपनी स्वतंत्र जगह की रक्षा करने के लिए कहा है। परमेश्वर ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं कहा। परमेश्वर ने तुम्हें केवल समस्याओं के बारे में स्वतंत्र रूप से सोचने की क्षमता दी है—बस इतना ही। तुम्हारे पास यह क्षमता है और तुम्हारे पास स्वतंत्र इच्छाशक्ति की जन्मजात स्थिति भी है। हालाँकि, लोगों को ऐसी जन्मजात स्थितियाँ देने के बाद, परमेश्वर ने उनके लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ भी बनाईं, उन्हें विभिन्न सत्यों की आपूर्ति की, बताया कि उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए और कैसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए—सभी मामलों में सत्य सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए। लेकिन परमेश्वर के सभी वचनों और लोगों को दी गई उसकी चेतावनियों में, उसने कभी भी लोगों से स्वायत्त होने, स्वतंत्र होने या अपने अधिकारों की रक्षा करना सीखने के लिए नहीं कहा। ऐसे विचार, दृष्टिकोण या ऐसी बातें और शिक्षाएँ परमेश्वर के वचनों या सत्य में कभी नहीं देखी गई हैं। इसके उलट, जिन वचनों में परमेश्वर लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है, वह उनके घमंड और स्वार्थ को उजागर करता है। यह स्वार्थ एक ऐसा गुण है जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद लोगों की मानवता में प्रकट होता है। कुछ लोगों में, यह तब प्रदर्शित होता है जब वे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद अपने हितों को सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं; दूसरों में, यह शुद्ध रूप से इस समाज की शिक्षा का नतीजा है। दोनों ही मामलों में, यह स्वार्थ है। चाहे यह कैसे भी पैदा हुआ हो, संक्षेप में, अगर तुम स्वार्थी हो, तो यह मानवता का एक गुण और उसका प्रकाशन है जिसे तुम भ्रष्ट स्वभावों में जीते समय प्रदर्शित करते हो। क्या अब यह स्पष्ट है? (हाँ।)
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?