सत्य का अनुसरण कैसे करें (26) भाग दो

पिछली बार हमने देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देने के एक दूसरे विषय पर संगति की थी : देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के साथ बराबरी पर नहीं रखना, है ना? (हाँ।) इस विषय पर मैंने, देहधारी परमेश्वर अपनी मानवता के परिप्रेक्ष्य से कैसे आचरण और कार्य करता है इस मामले में उसकी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों को और साथ ही उसके स्वभाव सार की कुछ अभिव्यक्तियों को सूचीबद्ध किया—धोखा नहीं देना, होड़ नहीं करना, संघर्ष नहीं करना, षड्यंत्र नहीं करना, दूसरों को नीचा नहीं दिखाना, पलटवार नहीं करना, प्रलोभन नहीं देना वगैरह-वगैरह। पिछली बार हमने इनमें से धोखा नहीं देना, होड़ नहीं करना और संघर्ष नहीं करना पर जरा-सी संगति की थी। इस बार हमें किस अभिव्यक्ति पर संगति करनी चाहिए? (षड्यंत्र नहीं करना।) धोखा नहीं देना, होड़ नहीं करना और संघर्ष नहीं करना की तरह ही षड्यंत्र नहीं करना भी एक सिद्धांत है जिसके अनुसार देहधारी परमेश्वर, यह साधारण व्यक्ति, आचरण और कार्य करता है। यकीनन इस सिद्धांत में उसका मानवता सार और उसका स्वभाव भी शामिल है। षड्यंत्र नहीं करना भी देहधारी परमेश्वर, इस साधारण व्यक्ति, के स्वभाव सार की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति है या स्व-आचरण का एक पहलू है। क्या “षड्यंत्र नहीं करना” वाक्यांश को समझना आसान है? क्या तुम सभी इसे समझते हो? (हाँ।) षड्यंत्र नहीं करने की सबसे मूलभूत समझ है चालबाजी नहीं करना और युक्तियों या चालाकी भरे षड्यंत्रों का सहारा नहीं लेना। यानी जब तुम लोगों के साथ मेरा संपर्क रहता है और मैं तुम लोगों से मेलजोल रखता हूँ, चाहे कार्यस्थल पर हो या दैनिक जीवन में, तब मैं हमेशा ईमानदार और सच्चा रहता हूँ। मैं युक्तियों का सहारा नहीं लेता, चालाकी भरे कुचक्रों में शामिल नहीं होता और न ही चालबाजी करता हूँ। बल्कि मैं सच्चाई से बोलता हूँ, जो भी मेरे दिल में होता है वही कहता हूँ और चीजें जैसी हैं वैसी ही तुम लोगों को बताता हूँ। मैं तुम लोगों के खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और न ही तुम लोगों को धोखा देता हूँ। मैं तुम लोगों का विश्वास हासिल करने और फिर तुम लोगों को खुद को खपाने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने का इच्छुक बनाने के लिए अलंकृत वचनों का उपयोग नहीं करूँगा। क्या तुम लोगों ने मुझे ऐसी चीजें करते देखा है? (नहीं।) जब मैं तुम लोगों से पूछता हूँ तब तुम लोग निश्चित रूप से कहोगे कि नहीं, लेकिन क्या तुम लोग इसे समझाने के लिए कोई उदाहरण दे सकते हो? अगर तुम लोगों में से हर कोई एक उदाहरण दे सके तो फिर यह तथ्य निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो जाएगा और तुम लोगों के पास इस बिंदु—षड्यंत्र नहीं करने—की सही मायने में कुछ समझ होगी। उदाहरण के लिए, कोई कहता है कि दुनिया में उसने कुछ कौशल सीखे और वह एक विशेष पेशे की समझ रखता है। संयोग से परमेश्वर के घर में एक ऐसा कार्य या विशिष्ट काम है जो उसके द्वारा सीखे हुए इस पेशे से जुड़ा है। मैं उससे बात करता हूँ, कहता हूँ, “तुम इस पेशे के बारे में थोड़ा जानते हो और संयोग से परमेश्वर के घर में इस क्षेत्र में कार्य है। क्या अपने पेशेवर ज्ञान के आधार पर और तुम लोगों के क्षेत्र के नियमों या सिद्धांतों के अनुसार तुम इस कार्य को अच्छी तरह से कर सकते हो? अगर तुम इच्छुक हो तो यह कार्य तुम्हारा हुआ।” क्या इसमें कोई षड्यंत्र करने या फायदा उठाने वाले वचन हैं? क्या ऐसे वचन हैं जो किसी चालबाजी को छिपाते हैं? (नहीं।) क्या तुम्हें यकीन है कि ऐसे वचन नहीं हैं? (बिल्कुल।) चूँकि तुमने अपनी सिफारिश की और इस पेशे को समझने वाले व्यक्ति के रूप में अपना परिचय दिया और मुझे तुम्हारी स्थिति के बारे में पता चला, इसलिए मैंने यह कार्य तुम्हें निर्दिष्ट किया। अगर तुम इसे करने के इच्छुक हो और तुम कहते हो, “मैं इसे परमेश्वर से स्वीकारता हूँ; मैं यह कार्य, यह कर्तव्य स्वीकारता हूँ,” यानी तुम इसे करने के लिए अपने आप को पेश कर रहे हो तो तुम्हें इसे अच्छी तरह से करना चाहिए। अगर तुम इच्छुक नहीं हो तो तुम मेरे मुँह पर कह सकते हो कि तुम यह कर्तव्य नहीं करना चाहते। क्या मैं तुम्हें मजबूर करूँगा? (नहीं।) लोगों से पेश आने के मेरे सिद्धांतों के अनुसार, मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। मैं घोड़े को पानी पीने के लिए बिल्कुल भी मजबूर नहीं करूँगा, अपनी व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार चीजें करने के लिए तुम पर दबाव नहीं डालूँगा। अगर तुम नहीं चाहते तो मैं तुम्हें चीजें करने के लिए मजबूर नहीं करूँगा और न ही ऐसे कार्य करूँगा मानो कि मेरी यह पहचान है इसलिए मेरे वचन प्रभावपूर्ण होने ही चाहिए या वे अपनी निश्चितता और अटल होने में किसी सम्राट के वचनों जैसे होने ही चाहिए। मैं लोगों के साथ सहनशीलता से पेश आता हूँ; मैं तुम्हें अपने लिए चुनने की आजादी देता हूँ। मैं हमेशा परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों के आधार पर कार्य की व्यवस्था करता हूँ। अगर उस क्षेत्र में अनुभव रखने वाले लोग हैं या विषय के जानकार लोग हैं जो कार्य करने के इच्छुक हैं और उसे बेहतर ढंग से कर सकते हैं तो यह निश्चित रूप से बहुत अच्छा है। अगर किसी को भी इसकी समझ नहीं है तो फिर हमारे पास जो क्षमताएँ हैं उनसे हम जितना कर सकते हैं, जिस भी हद तक कर सकते हैं, करते हैं। यही मेरा सिद्धांत है। अगर तुम्हें कुछ खास कार्य सौंपा जाता है, लेकिन तुम कहते हो, “मैं यह नहीं करना चाहता। मुझे लोगों द्वारा फायदा उठाया जाना या परमेश्वर के घर द्वारा निर्देशित होना पसंद नहीं है; मैं अपने चयन खुद करता हूँ” तो ठीक है, परमेश्वर का घर तुम्हारा उपयोग नहीं करेगा। अपना कर्तव्य करना कुछ ऐसी चीज है जिसे तुम तत्परता से और स्वेच्छा से करते हो। लोग जब परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद अपना कर्तव्य करने के इच्छुक होते हैं, सिर्फ तभी कलीसिया उनके लिए कार्य की व्यवस्था कर सकती है। अगर तुम अपना कर्तव्य करने के इच्छुक नहीं हो तो परमेश्वर का घर तुम पर दबाव नहीं डालेगा और कलीसियाई कार्य करने के लिए तुम पर दबाव डालने के लिए मैं अपनी पहचान और रुतबे का उपयोग तो और भी नहीं करूँगा। यह पूरी तरह से सत्य समझने के जरिए ही है कि परमेश्वर के चुने हुए लोग अपना कर्तव्य करते हैं और कार्य करते हैं। जब लोग सत्य नहीं समझते हैं तब परमेश्वर का घर उन पर अपना कर्तव्य करने के लिए दबाव नहीं डालेगा और न ही उनसे अपेक्षा करेगा और मैं लोगों को पूरी तरह से अपनी इच्छा के अनुसार कार्य तो और भी नहीं करवाऊँगा। इसलिए, अगर मैं चाहता हूँ कि तुम कुछ करो तो मैं इसे स्पष्ट रूप से कहूँगा। तुम्हें अपना अर्थ समझाने के लिए मैं बिल्कुल भी युक्तियों का सहारा नहीं लूँगा, अप्रत्यक्ष संकेत नहीं दूँगा और न ही अस्पष्ट भाषा का उपयोग करूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा। अगर तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद है और तुममें परमेश्वर के घर के लिए कुछ कार्य करने का दायित्व बोध है तो मैं स्पष्ट रूप से तुमसे पूछूँगा, “क्या तुम यह कार्य स्वीकारने के इच्छुक हो?” या मैं और भी स्पष्ट रूप से कहूँगा, “बस यह कार्य सँभाल लो।” मैं सीधे-सीधे, सब कुछ सादी भाषा में बोलता हूँ। जब तक तुम मनुष्य हो तब तक तुम समझ सकते हो। तुम्हें यह सोचने-विचारने और समझने में दिमाग खपाने की जरूरत नहीं है कि मेरे वचनों का वास्तव में क्या अर्थ है या मैंने वे वचन क्यों कहे। मेरे वचनों का अर्थ समझने के लिए मैं तुमसे दिमाग पर जोर नहीं डलवाऊँगा; मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से बता दूँगा। मेरे वचनों का जो भी शाब्दिक अर्थ है, वही इसका अर्थ है। इसके अलावा, मैं तुमसे यह कार्य करने के लिए क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य कर रहा है और तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हो। इसलिए, तुम्हारा यह दायित्व है कि परमेश्वर का घर तुमसे जो भी कार्य करने की अपेक्षा करता है उसका बीड़ा तुम उठाओ। मैं तुम्हें जो भी कार्य या विशिष्ट काम सौंपता हूँ, मैं उन्हें तुम्हें पूरी तरह से इसलिए सौंपता हूँ क्योंकि मैं तुम्हें परमेश्वर में विश्वासी मानता हूँ। तुम्हें उन्हें अपनी जिम्मेदारी, दायित्व और कर्तव्य के रूप में स्वीकारना चाहिए; ऐसा करना सही है। चाहे यह तुम्हें कार्य सौंपना हो या तुम्हें कार्य निर्दिष्ट करना, यह सब तुम्हारे द्वारा एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करने की खातिर है और साथ ही अपना कर्तव्य करने में तुम्हारे द्वारा सत्य की तलाश करने और सत्य प्राप्त करने के लिए भी है। यहाँ कोई लेन-देन से संबंधित रिश्ता नहीं है और न ही मैं तुम्हें फुसला रहा हूँ या धोखा दे रहा हूँ। ये सभी बोले गए वचन और निर्दिष्ट काम सकारात्मक और खुले हैं; यहाँ कोई रहस्य नहीं है। यहाँ धन, भौतिक चीजों या हितों का कोई रिश्ता शामिल नहीं है और न ही फायदा उठाने या फायदा उठाए जाने का कोई रिश्ता शामिल है। यह फायदा हासिल करने के उद्देश्य से परमेश्वर के घर के लिए तुम्हारी शक्तियों, कौशलों या पेशेवर ज्ञान का उपयोग करने का मामला बिल्कुल नहीं है; परमेश्वर का घर ऐसा बिल्कुल नहीं करेगा। कर्तव्य करना पूरी तरह से इस बात से आता है कि व्यक्ति इसके लिए तैयार और इच्छुक है; परमेश्वर का घर कभी किसी पर दबाव नहीं डालता। तुम्हारे द्वारा यह कर्तव्य स्वीकारना वह कार्य है जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में करना चाहिए। यह कर्तव्य करना तुम्हारे लिए परमेश्वर के कार्य को अनुभव करने और उद्धार प्राप्त करने का मार्ग भी है। अगर अपना कर्तव्य निभाकर तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करना सीखते हो और सत्य प्राप्त करते हो तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति, स्मरण और मान्यता प्राप्त कर चुके होगे। यही वह फसल है जो तुम्हें उस चीज से काटनी चाहिए जो तुमने समर्पित की है। इसलिए, तुम्हें बिना किसी चिंता या संदेह के इस कार्य को अपने कर्तव्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए। मैं तुमसे जो भी करवाना चाहता हूँ, मैं तुम्हें वह सच-सच बता दूँगा। मुझे दो टूक बोलना पसंद है। मुझे तुम्हें तीन वर्ष के बच्चे की तरह फुसलाने, तुमसे घुमा-फिराकर और अस्पष्ट ढंग से बात करने और अच्छी-अच्छी चीजें बोलने की जरूरत नहीं है। मैं ऐसा नहीं करूँगा। अगर तुम गा सकते हो या नृत्य कर सकते हो और तुममें ये अंतर्निहित क्षमताएँ हैं तो जब तुम्हें यह कर्तव्य करने के लिए व्यवस्थित किया जाता है तब तुम्हें इसे स्वीकारना चाहिए। अगर तुम कहते हो, “मेरी अंतर्निहित क्षमताओं के आधार पर मैं इस कर्तव्य के लिए पूरी तरह से योग्य नहीं हूँ। अगर मैंने यह कर्तव्य नहीं किया तो क्या यह ठीक है?” कोई बात नहीं। यह तुम्हारी आजादी है; मैं तुम पर दबाव नहीं डालूँगा।

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या कहता हूँ या तुम लोगों से क्या करने के लिए कहता हूँ, इसमें कोई षड्यंत्र शामिल नहीं है। जब मैं अगुआओं और कार्यकर्ताओं से बात करता हूँ तब मैं उनसे पूछता हूँ, “हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? नए लोगों ने कलीसियाई जीवन जीना शुरू कर दिया है—उनकी अभी भी क्या समस्याएँ हैं? क्या वे हल हो चुकी हैं? परमेश्वर के घर की फिल्में या अनुभवजन्य गवाहियाँ देखने के बाद उनके क्या विचार हैं?” कुछ अगुआ और कार्यकर्ता उत्तर नहीं दे सकते हैं। वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, “क्या तुम मुझसे मेरी असली स्थिति प्रकट करवाने के लिए झाँसा देने का प्रयास कर रहे हो? क्या तुम जाँच रहे हो कि मैंने कोई वास्तविक कार्य किया है या नहीं? मुझे सावधानी से उत्तर देना चाहिए और लापरवाह नहीं होना चाहिए! मैं उस कार्य के बारे में बात कर सकता हूँ जो अच्छी तरह से किया गया है, लेकिन अगर कोई कार्य नहीं किया गया है या अच्छी तरह से नहीं किया गया है तो मुझे उसका बिल्कुल जिक्र नहीं करना चाहिए। एक बार मैंने उसका जिक्र कर दिया तो समस्या उजागर हो जाएगी!” इसलिए, जब वे अपने कार्य की रिपोर्ट देते हैं तब वे हमेशा एक भी अतिरिक्त शब्द कहने से हिचकिचाते हैं और समस्याओं को उजागर करने से बहुत डरते हैं। ऐसे लोगों के मन पेचीदा होते हैं। जब मैं उनसे कुछ पूछता हूँ तब शब्द वास्तव में उनकी जुबान पर होते हैं, लेकिन वे उन्हें सीधे नहीं कहते हैं। उन्हें अपने मन में इसे सोचना-विचारना और संसाधित करना होता है, “तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मैं उचित रूप से कैसे उत्तर दूँ ताकि एक तरफ तुम वास्तविक स्थिति न जानो और दूसरी तरफ तुम संतुष्ट भी हो जाओ?” दरअसल, मैं अपने द्वारा कहे जाने वाले एक भी वचन को दिमागी छलनी से नहीं गुजारता। जब मैं प्रश्न पूछता हूँ तब मेरी क्या अवस्था होती है? जब मैं किसी को देखता हूँ और यह जानता हूँ कि वह किस कार्य के लिए जिम्मेदार है तब मैं इस बारे में तुरंत सोचता हूँ कि वह कौन-से विशिष्ट काम पूरे कर सकता है, अपने कार्य में उसकी किन समस्याओं से सामना होने की संभावनाएँ ज्यादा हैं और उसे किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इन बातों पर विचार करते हुए मैं उससे सीधे पूछता हूँ, “तुम जिन कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार हो, वहाँ हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या सभी कलीसियाई अगुआ और उपयाजक उपयुक्त हैं? क्या भाई-बहन जानते हैं कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना और पीना है? क्या उनमें से ज्यादातर लोग आध्यात्मिक भक्ति में शामिल होते हैं? क्या वे अपने खाली समय में भजन और नृत्य सीखते हैं? सुसमाचार कार्य कैसे आगे बढ़ रहा है?” मेरे द्वारा पूछा गया हर प्रश्न सीधा और स्पष्ट होता है जिसमें कोई परीक्षा या गुप्त उद्देश्य नहीं होता। मैं बस कार्य और लोगों के जीवन प्रवेश पर गौर कर रहा हूँ। तुम चाहे कैसे भी उत्तर दो, तुम्हारी परीक्षा नहीं ली जाएगी और न ही मैं किसी भी चीज को तुम्हारे खिलाफ हथियार के रूप में प्रयोग करूँगा; इसमें अनजाने में अपना भेद बता देने या किसी चीज को तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल किए जाने का कोई मुद्दा नहीं है। मैं बस कार्य के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहा हूँ, मैं जानबूझकर किसी की स्थिति के बारे में पूछताछ नहीं कर रहा और न ही मैं किसी को सँभालने या बर्खास्त करने के लिए निशाना बना रहा हूँ। कलीसिया वर्ग संघर्ष या गुटीय विवादों में शामिल नहीं होती—वह वास्तविक कार्य करती है। कभी-कभी जब मैं भाई-बहनों या अगुआओं और कार्यकर्ताओं से मिलता हूँ तब मैं बस यूँ ही गपशप करना चाहता हूँ, कुछ दिली वचन कहना चाहता हूँ और रोजमर्रा की कुछ चीजों के बारे में बात करना चाहता हूँ। कभी-कभी मैं यह भी पूछता हूँ कि कलीसिया के कार्य में अभी भी क्या समस्याएँ मौजूद हैं। मैं जो कुछ भी कहता हूँ वह रोजमर्रा की भाषा होती है, वह सच्चे वचन हैं। उदाहरण के लिए, मैं तुम लोगों से पूछता हूँ, “हाल ही में कलीसियाई जीवन कैसा रहा है? क्या भाई-बहनों को हर सभा से फायदा पहुँच सकता है? क्या कलीसियाई जीवन जीने से वास्तविक समस्याएँ हल करने में मदद मिल सकती है?” कुछ लोग जवाब देते हैं, “हाल ही में कलीसियाई जीवन अच्छा नहीं रहा है। भले ही हम इकट्ठा हो रहे हैं, फिर भी कोई बड़ा फायदा नहीं होता है और मूलभूत समस्याएँ नहीं सुलझाई जा सकती हैं।” फिर मैं पूछता हूँ, “समस्या कहाँ मौजूद है?” ज्यादातर लोग उत्तर नहीं दे सकते हैं। मुझे बताओ, क्या मेरे प्रश्न में कोई छल है? क्या इसके पीछे कोई चालबाजी है? बिल्कुल नहीं। मैं बस कार्य के बारे में पता लगाने और स्थिति पर पकड़ बनाने के लिए पूछता हूँ ताकि मैं तुम लोगों के साथ सत्य की संगति कर सकूँ और समस्याएँ सुलझा सकूँ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कैसे उत्तर देते हो, तुम्हारी परीक्षा नहीं ली जाएगी। कुछ अपेक्षाकृत सरल लोग सच्चाई से बोल सकते हैं। वे कहते हैं, “भाई-बहनों ने अभी-अभी परमेश्वर का कार्य स्वीकारा है और उन्हें अभी तक ज्यादा अनुभव नहीं है। सभाओं में उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता। अगर वे बहुत ही ज्यादा परमेश्वर के वचन पढ़ लेते हैं तो वे उन्हें समझ नहीं सकते और साथ ही उन्हें नींद भी आने लगती है और वे उन्हें आत्मसात नहीं कर सकते। हमें नहीं पता कि इसे कैसे सुलझाया जाए।” मैं कहता हूँ, “इसे सुलझाना आसान है। हर कोई पहले एक भजन गा सकता है, फिर जरा-सा नृत्य कर सकता है, फिर परमेश्वर के कुछ वचन पढ़ सकता है। जिन्हें समझ है वे अपनी समझ के बारे में बात कर सकते हैं और जिन्हें अनुभव है वे अपने अनुभव के बारे में बात कर सकते हैं। जिन्हें कोई समझ या अनुभव नहीं है वे भी अपनी वास्तविक कठिनाइयों का जिक्र कर सकते हैं और उन्हें हल करने के लिए अनुभवी भाई-बहनों से मदद ले सकते हैं। क्या इस तरीके से सभाएँ उपयोगी नहीं होंगी? छोटे आध्यात्मिक कद वाले लोगों को भी आध्यात्मिक शिक्षा दी जा सकती है।” देखो, क्या इससे यह समस्या सुलझ नहीं जाती? जब मैं लोगों से गपशप करता हूँ, कभी-कभी कुछ प्रश्न पूछता हूँ तब कुछ पेचीदा मन वाले लोग सोच-विचार करते हैं, “तुम्हारा प्रश्न काफी सीधा है। मुझे नहीं पता कि तुम यह पूछकर क्या कहना चाहते हो। मुझे अपने उत्तर में सावधान रहना चाहिए!” मैं कहता हूँ, तुमने इसे गलत समझ लिया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे बात करता हूँ या क्या प्रश्न पूछता हूँ, अंतिम लक्ष्य हमेशा समस्याओं का पता लगाना और उन्हें सुलझाना होता है, तुम्हारी सहायता और मार्गदर्शन करना होता है और समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना होता है। पहली बात, इसका उद्देश्य तुम्हें खोलकर रख देना और तुम्हें मूर्ख दिखाना नहीं है। दूसरी बात, इसका उद्देश्य तुम्हारा यह परीक्षण करना नहीं है कि तुम सच बोल रहे हो या नहीं या क्या तुम निष्कपट व्यक्ति हो। तीसरी बात, इसका उद्देश्य तुम्हें बहला-फुसलाकर तुमसे अपनी वास्तविक स्थिति का खुलासा करवाना नहीं है। चौथी बात, इसका उद्देश्य यह परीक्षण करना तो और भी नहीं है कि तुम कार्य करने में सक्षम हो या नहीं या तुम वास्तविक कार्य कर सकते हो या नहीं। दरअसल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं कैसे बात करता हूँ, यह सब तुम्हें अपना कर्तव्य पूरा करने, कार्य अच्छी तरह से करने, समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद और मार्गदर्शन करने के लिए है। कुछ लोग मेरी सरल पूछताछ को लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, बहुत डरते हैं कि इसमें कोई छिपा अर्थ है। कुछ तो यह तक संदेह करते हैं कि मैं उनके खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। स्पष्ट रूप से, मैं समस्याएँ सुलझाने में तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ, फिर भी तुम गलती से सोचते हो कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ। क्या यह मेरे साथ अन्याय करना नहीं है? (हाँ।) तो यहाँ क्या मुद्दा है? मानव दिल धोखेबाज है! हालाँकि हो सकता है कि लोग जोर से कहें, “तुम परमेश्वर हो, मुझे तुम्हें सच बता देना चाहिए और तुम्हारे साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूँ, मैं तुममें विश्वास रखता हूँ!” लेकिन अपने दिल की गहराई में वे इस तरीके से नहीं सोचते। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे प्रश्न कितने साधारण और सरल हैं, लोग अक्सर उनकी व्याख्या अत्यधिक संवेदनशील तरीके से करते हैं। वे अपने अनुमानों और फिर जाँच-पड़ताल के जरिए कई टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजरते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे अंतिम उत्तर पा लेते हैं, लेकिन दरअसल, यह मेरे वचनों के मूल इरादे से दूर है। यह स्पष्ट रूप से एक बहुत सरल प्रश्न है, फिर भी वे इसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं। क्या ऐसे लोग अत्यधिक संवेदनशील नहीं हैं? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं क्या पूछता हूँ, इसे सुनने के बाद उनके दिलों में उथल-पुथल मच जाती है : “तुम यह क्यों पूछ रहे हो? मैं ऐसे किस तरीके से उत्तर दूँ जो तुम्हें संतुष्ट कर दे और कोई कमी प्रकट न करे? मुझे पहले क्या और बाद में क्या कहना चाहिए?” तीन से पाँच सेकंड में बिना किसी देरी के शब्द निकल आते हैं। उनके दिमाग कंप्यूटर से भी तेज हैं। इतने तेज क्यों हैं? दरअसल, यह प्रक्रिया पहले से ही उनकी आदत है; लोगों से निपटने और मामलों को सँभालने में यह उनकी सामान्य चाल और शैली है। वे सबके खिलाफ षड्यंत्र करते हैं। इसलिए, चाहे मेरी पूछताछ कितनी भी सरल क्यों न हो, वे उसे लेकर बहुत ही ज्यादा सोचते हैं, वे मानते हैं कि मेरा कुछ मकसद या लक्ष्य है। वे अपने दिलों में सोच-विचार करते हैं, “अगर मैंने सच्चाई से उत्तर दे दिया तो क्या मैं अपनी वास्तविक स्थिति को उजागर नहीं कर दूँगा? यह तो खुद से गद्दारी करने के समान है। मैं तुम्हें अपनी वास्तविक स्थिति जानने नहीं दे सकता। तो मुझे कैसे उचित ढंग से उत्तर देना चाहिए? मैं कैसे तुम्हें खुश और संतुष्ट कर सकता हूँ, अपने बारे में एक अच्छी छवि बनवा सकता हूँ और मेरा उपयोग करना तुमसे जारी रखवा सकता हूँ?” देखो, ये लोग कितने धोखेबाज हैं! इन लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं इनसे कैसे बात करता हूँ, वे संदेह और जाँच-पड़ताल करेंगे। क्या ऐसे लोग सत्य का अभ्यास कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर के उपयोग के लायक हो सकते हैं? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों के मन बहुत ही ज्यादा पेचीदा होते हैं और बिल्कुल भी सरल नहीं होते; जो कोई भी लंबे समय तक उनके संपर्क में रहता है, वह इसे देख सकता है। लोग षड्यंत्र करने में विशेष रूप से अच्छे होते हैं, लेकिन जब मैं तुम लोगों से बात करता हूँ और संप्रेषण करता हूँ तब क्या मैंने तुम्हारे खिलाफ कभी षड्यंत्र किया है? (नहीं।) चाहे मैं तुम्हारी व्यक्तिगत अवस्था के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहा होता हूँ या तुम्हारी कार्य स्थिति के बारे में, यह हमेशा तुम्हारी मदद करने, कार्य की समस्याएँ हल करने के लिए होता है। भले ही तुम गलतियाँ करो और तुम्हारी काट-छाँट कर दी जाए या तुम्हें बर्खास्त कर दिया जाए, मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करूँगा और न ही तुम्हें सताऊँगा। एक बार समस्या सुलझ जाती है तो बात समाप्त हो जाती है। परमेश्वर का घर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करेगा और न ही तुम्हें सताएगा और ऐसा तो मैं और भी नहीं करूँगा कि तुम्हारी गलतियों का इस्तेमाल तुम्हारे खिलाफ करूँ और उन्हें जाने देने से इनकार कर दूँ, या तुम्हें बदनाम करने, सबको तुम्हें अलग-थलग कर देने और तुम्हें ठुकरा देने के लिए तैयार करने के तरीके सोचूँ जिससे तुम निराश महसूस करो और खुद ही इस्तीफा दे दो। मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता होने के लिए उपयुक्त नहीं हो तो ज्यादा-से-ज्यादा मैं यही कहूँगा, “तुम्हारी काबिलियत बहुत ही खराब है और तुममें आध्यात्मिक समझ नहीं है। तुम अगुआ या कार्यकर्ता बनने के लिए उपयुक्त नहीं हो। अगर तुम्हें अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में चुन लिया जाता है तो भी तुम वास्तविक कार्य नहीं कर सकते।” परमेश्वर का घर इस कारण से तुम्हें बिल्कुल भी नहीं सताएगा और न ही तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करेगा।

परमेश्वर के घर के पास इस बारे में सिद्धांत हैं कि किस तरह के लोगों को पदोन्नत और इस्तेमाल करना है और किस तरह के लोगों को इस्तेमाल नहीं करना है, साथ ही किन लोगों को विकसित करना है और किन लोगों को नहीं करना है; यह सब परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों पर आधारित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसे पदोन्नत किया जाता है और किसे इस्तेमाल किया जाता है, उद्देश्य उन्हें विकसित करना है ताकि वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकें और यह जान सकें कि परमेश्वर के कार्य का कैसे अनुभव करना है, ताकि वे कार्य की जिम्मेदारी उठाने में समर्थ हों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस समस्या को सुलझाया जा रहा है, उद्देश्य उन्हें ज्यादा सत्य समझने में और यह सीखने में सक्षम बनाना है कि जिन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से उनका सामना होता है, उनसे वे कैसे सबक सीखें और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करें। इस तरीके से उनके लिए सभी पहलुओं में सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह तुमसे सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करने के बारे में नहीं है और इस बारे में तो और भी नहीं है कि किसी रिक्त पद को भरने के लिए तुम्हारा शोषण किया जा रहा है क्योंकि कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है और जब कोई उपयुक्त व्यक्ति आ जाता है तब तुम्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। यह ऐसा नहीं है। दरअसल यह तुम्हें खुद को प्रशिक्षित करने का अवसर दे रहा है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम मजबूती से डटे रहोगे; अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, तो तुम मजबूती से डटे नहीं रह पाओगे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि परमेश्वर के घर को तुम अप्रिय लगते हो, इसलिए वह तुम्हारी कमी का फायदा उठाने और तुम्हें हटाने का अवसर ढूँढ़ेगा। जब परमेश्वर का घर कहता है कि वह तुम्हें विकसित करेगा और तुम्हें पदोन्नत करेगा तब वह सही मायने में तुम्हें विकसित करेगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि तुम सत्य के लिए कैसे प्रयास करते हो। अगर तुम सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते तो परमेश्वर का घर तुम्हें त्याग देगा और तुम्हें अब और विकसित नहीं करेगा। कुछ लोग एक अवधि तक विकसित किए जाने के बाद इसलिए बर्खास्त कर दिए जाते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अपने विकसित किए जाने की अवधि के दौरान सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते हैं, मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ करते हैं और बाधा डालते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं। कुछ दूसरे लोग सत्य का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते हैं, हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए कार्य करते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं और हटा दिए जाते हैं। इन सभी स्थितियों को लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार सँभाला जाता है। परमेश्वर का घर अभी भी उन लोगों को विकसित करेगा जो सत्य स्वीकार सकते हैं और सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं, भले ही वे कुछ गलतियाँ करके अपराध करें। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य स्वीकार सकता है, और जब उसकी काट-छाँट की जाती है तब वह सत्य नहीं स्वीकारता है, तो फिर उसे सीधे बर्खास्त कर देना चाहिए और हटा देना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : “क्या यह बेरहमी से किसी के सारे संसाधनों का फायदा उठाने के बाद उसे एक तरफ फेंक देने जैसा नहीं है? क्या यह लोगों का शोषण करना नहीं है?” मुझे बताओ, क्या परमेश्वर के घर द्वारा कभी किसी को इसलिए बर्खास्त किया गया है, हटा दिया गया है या उसे आगे और विकसित नहीं किया गया है क्योंकि शोषण करने के लिए उसके पास और कुछ नहीं बचा था? क्या कभी भी ऐसी चीज हुई है? (नहीं।) तो फिर किन हालातों में परमेश्वर का घर लोगों को बर्खास्त करता है या हटा देता है? (परमेश्वर का घर किसी को तभी बर्खास्त करता है या हटाता है जब वह कार्य की जिम्मेदारी नहीं उठा सकता या जब वह गड़बड़ियाँ और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करता है और बुराई करता है।) किसी को भी अकारण बर्खास्त नहीं किया जाता। कुछ लोगों में खराब काबिलियत होती है और वे ठोस कार्य नहीं कर सकते। कुछ लोगों में एक निश्चित स्तर की काबिलियत होती है, लेकिन वे ठोस कार्य नहीं करते और न ही परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करते हैं; वे वह कार्य नहीं करते जिसमें वे सक्षम हैं, कलीसिया के कार्य को लेकर चिंतित होने और उसे करते हुए खुद को थका देने के इच्छुक नहीं होते, कष्ट सहने और कीमत चुकाने के इच्छुक नहीं होते और लोगों को नाराज करने के इच्छुक नहीं होते। ऐसे लोग वास्तविक कार्य नहीं कर सकते, इसलिए उन्हें हटाया ही जाना चाहिए। उनके लिए उस पद पर अब और बने रहना उचित नहीं है। वे न सिर्फ कलीसिया के कार्य में रुकावट डालते हैं, बल्कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को भी प्रभावित करते हैं। ऐसी स्थिति में उनमें आत्म-जागरूकता होनी चाहिए और उन्हें शीघ्र इस्तीफा दे देना चाहिए, ताकि जो लोग वास्तविक कार्य कर सकते हैं, वे यह कार्य सँभाल सकें। कुछ लोग वास्तविक कार्य नहीं करते, फिर भी वे रुतबे के फायदों का आनंद लेते हैं और यहाँ तक कि विघ्न-बाधाएँ और गड़बड़ियाँ भी उत्पन्न करते हैं। उन्हें हमेशा इस बात की चिंता सताती रहती है कि ऊपरवाला उनकी समस्याओं का पता लगा लेगा और उन्हें बर्खास्त कर देगा, इसलिए जब अपने कार्य के बारे में रिपोर्ट देने का समय आता है तब वे सत्य तलाशने के लिए कुछ प्रश्न उठाने का दिखावा करते हैं और विशेष रूप से अग्रसक्रिय दिखते हैं, ऊपरवाले के सामने एक अच्छी छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं और यह प्रमाणित करना चाहते हैं कि वे ऐसे लोग हैं जो सत्य तलाशते हैं और वास्तविक कार्य कर सकते हैं। ऊपरवाला लोगों को इस आधार पर पदोन्नत और इस्तेमाल नहीं करता कि वे अच्छी तरह से बोल सकते हैं या नहीं, वे प्रश्न उठाने में कुशल हैं या नहीं या वे हाजिरजवाब हैं या नहीं, बल्कि लोगों को इस आधार पर चुनता और विकसित करता है कि वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं, वे सत्य का अनुसरण करते हैं या नहीं और वे लगन से अपना कर्तव्य कर सकते हैं या नहीं। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो न सिर्फ ठोस कार्य नहीं करते या परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते, बल्कि गड़बड़ भी करते हैं और बाधा भी डालते हैं और परमेश्वर के घर के हितों को धोखा भी देते हैं। परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित करती हैं कि क्या करने की अनुमति नहीं है और क्या करना चाहिए, फिर भी वे एक भी मद कार्यान्वित नहीं करते और यहाँ तक कि लापरवाही से बुरे कर्म भी करते हैं। ऐसे बहुत-से लोग हुए हैं और उन सभी को बर्खास्त कर दिया गया है। स्थिति चाहे जो भी हो, जब परमेश्वर का घर इन लोगों को पदोन्नत करता है तब यह हमेशा उन्हें विकसित करने और उन्हें सत्य वास्तविकता की तरफ ले जाने के लिए होता है, वह यह उम्मीद करता है कि वे कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कर सकेंगे और उन कर्तव्यों को पूरा कर सकेंगे जो उन्हें पूरे करने चाहिए। अगर तुम्हें यह पता नहीं भी हो कि किसी कार्य को कैसे करना है क्योंकि तुम बेवकूफ हो और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है या क्योंकि तुम्हारी काबिलियत खराब है, जब तक तुम सत्य सिद्धांतों के लिए प्रयास करते हो, तुममें जिम्मेदारी का यह बोध है, तुम इस कार्य को अच्छी तरह से करने के इच्छुक हो और कलीसिया के कार्य की रक्षा कर सकते हो, तब तक परमेश्वर का घर अब भी तुम्हें विकसित करेगा, भले ही तुमने अतीत में कुछ मूर्खता भरी चीजें की हों। कुछ लोग, हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, फिर भी कुछ आसान कार्य कर सकते हैं। हालाँकि समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर उनकी संगति अच्छे नतीजे नहीं दे सकती, लेकिन वे कलीसिया के कार्य का बचाव कर सकते हैं। हर सभा में सत्य के जिस भी पहलू पर संगति की जाती है, वे उसे स्वीकार पाते हैं और आज्ञाकारी और समर्पित बन पाते हैं। अगर कोई कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जाता है तो वे उससे सबक सीख सकते हैं। हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, लेकिन उनके दिल सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। एक अवधि तक कार्य करने के बाद वे प्रगति करते हैं और उनके नतीजे उत्तरोत्तर बेहतर होते जाते हैं। मेरी नजर में ऐसे लोगों के पास उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद होती है। ज्यादातर लोग मानते हैं कि अच्छी काबिलियत वाले लोगों के उद्धार पाने की संभावना अधिक होती है। मेरे विचार से आवश्यक रूप से ऐसा नहीं है। मुख्य बात यह है कि लोगों को सत्य का अनुसरण करना होगा ताकि वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकें, अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकें और उद्धार प्राप्त कर सकें। कुछ लोगों में औसत काबिलियत होती है और उनके कर्तव्य के नतीजे भी औसत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के घर से वर्षों तक सिंचाई और भरण-पोषण प्राप्त करने के बाद वे सत्य में अपने दिल लगाने शुरू कर देते हैं और वे कुछ सत्यों को सचमुच समझने लगते हैं। वे कुछ व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त करते हैं, कुछ चीजों की असलियत जान सकते हैं और कुछ समस्याओं को सुलझा सकते हैं, जिससे वे कलीसिया के कार्य में उत्तरोत्तर प्रगति करते जाते हैं। यह काफी अच्छा है; ऐसे लोग विकसित किए जाने योग्य हैं। हालाँकि हो सकता है कि तुम इस कार्य के लिए पूरी तरह से योग्य न हो, लेकिन कम से कम ऊपरवाले के पास इस कार्य को करने में तुम्हारे प्रति कुछ पुष्टि है। मुझे बताओ, क्या कोई कर्तव्य करने के लिए लोगों की व्यवस्था करना उनका शोषण करना है? (नहीं।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना कार्य करने में सक्षम हो या तुम्हारी काबिलियत क्या है, तुम्हें पदोन्नत और इस्तेमाल करना तुम्हारा शोषण करना नहीं है। बल्कि इरादा यह है कि इस अवसर का उपयोग तुम्हें कार्य करने का प्रशिक्षण देने के लिए किया जाए और सत्य के तुम्हारे अनुसरण तथा तुम्हारे कड़ी मेहनत करने और भारी दायित्व उठाने के द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाया जाए। एक तरफ यह तुम्हें व्यक्तिगत रूप से पूर्ण बनाना है; दूसरी तरफ यह परमेश्वर के घर का कार्य पूरा करना भी है। तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन प्रवेश में लाभ भी प्राप्त किए हैं। यह बहुत ही अच्छा है! यह एक ही प्रयास में दो अच्छे नतीजे प्राप्त करना है। जिन लोगों को बेनकाब कर दिया गया और हटा दिया गया, उनमें से कुछ लोगों ने एक बार कहा था, “क्या तुम परमेश्वर के घर की सेवा करवाने के लिए मेरा शोषण करने का प्रयास कर रहे हो? नामुमकिन! मैं इतना बेवकूफ नहीं हूँ!” वे ऐसे शब्द कहने में भी सक्षम हैं—क्या वे सचमुच परमेश्वर में विश्वास रखते हैं? क्या ऐसे लोग सत्य समझते हैं? जरा-सा कर्तव्य करने के लिए लोगों की व्यवस्था करना उनका शोषण करना कैसे है? अगर तुम सही मायने में ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य समझता है तो तुम्हें सृष्टिकर्ता के इरादों को समझना चाहिए और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही एक मनुष्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी और दायित्व को पूरा करना है। अगर तुममें इतना भी जमीर और विवेक नहीं है तो क्या तुम एक सृजित प्राणी कहलाने योग्य हो? अगर तुममें सही मायने में जमीर और विवेक है तो तुम्हें अपने कर्तव्य से सही ढंग से पेश आना चाहिए। अगर तुममें इसके लिए काबिलियत है तो तुम्हें सत्य के लिए प्रयास करना चाहिए। अगर तुम अग्रसक्रिय रूप से अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करने के इच्छुक हो तो परमेश्वर का घर तुम्हारे लिए निश्चित कार्य करने की, एक दायित्व उठाने की व्यवस्था करेगा। यह तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करना या तुम्हारा शोषण करना नहीं है, बल्कि तुम्हें पदोन्नत करना, तुम्हें विकसित करना, तुम्हें प्रशिक्षित होने देना और तुम्हें सत्य वास्तविकता में ले जाना है। यह इतना ही सरल है। कुछ लोग कहते हैं : “अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, मेरा जोश काफी नहीं है और मेरी शारीरिक शक्ति कम होती जा रही है। मैं यह दायित्व अब और नहीं उठाना चाहता। क्या मैं इस्तीफा दे सकता हूँ?” मैं कहता हूँ कि कोई बात नहीं, लेकिन इस्तीफा देने से पहले तुम्हें इस पर अच्छी तरह से विचार कर लेना चाहिए। अगर यह सही मायने में शारीरिक कारणों से नहीं बल्कि इसलिए है क्योंकि तुम्हारे व्यक्तिगत विचार बदल गए हैं, तुम्हारे मन में कुछ अलग विचार आ गए हैं, तुम कष्ट सहने से डरते हो, थक जाने से डरते हो और ऊँचाई पर चढ़ने और फिर बुरी तरह से गिरने से डरते हो, तुम्हारा हमेशा यह विचार और दृष्टिकोण रहता है कि ऊँचाई पर तुम अकेले ही होगे—तो तुम्हें सावधान रहना होगा। इस आदेश, इस विशेष कर्तव्य को मत ठुकराओ; तुम्हें इस पर बड़े ध्यान से विचार करना चाहिए। ऐसे अवसर कभी-कभार ही मिलते हैं—वे दुर्लभ हैं, है ना? शायद तुम अड़ जाओगे, कहोगे, “तुम्हें मुझे इसके लिए राजी करने की जरूरत नहीं है। मैंने लंबे समय से इस बारे में सोचा है और पहले से ही फैसला कर लिया है। तुम मुझे इसके लिए राजी नहीं कर सकते; मैं इस थकान को अब और नहीं सहना चाहता। बाकी सभी आराम से हैं, अकेला मैं ही क्यों इतना थका-हारा रहूँ? क्या कष्ट सहना ही मेरी नियति है? मैं ऐसी कठिनाई सहने का इच्छुक नहीं हूँ! मैं खुद को किस्मत के भरोसे छोड़ने का इच्छुक नहीं हूँ! कलीसिया को मेरे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करना चाहिए; मैं कलीसिया का गुलाम नहीं हूँ और न ही मैंने खुद को कलीसिया को बेचा है!” तुम्हें ये अप्रिय बातें कहना जारी नहीं रखना चाहिए; और ज्यादा कहने से तुम बहुत सारे पाप कर बैठोगे और तुम्हें अपने कहे शब्दों और अपने किए चुनावों की जिम्मेदारी लेने की जरूरत है। पहली बात, तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हो; तुमने खुद को परमेश्वर के घर को बेचा नहीं है। दूसरी बात, अगर तुम खुद को परमेश्वर के घर को बेचना भी चाहते तब भी परमेश्वर के घर को इस पर बड़े ध्यान से विचार करना पड़ता कि तुममें यह मूल्य है या नहीं, तुम्हें खरीदना उपयोगी होगा या नहीं। इसलिए अगर तुम्हें लगता है कि परमेश्वर का घर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है और सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करना चाहता है तो तुम गलत सोच रहे हो क्योंकि लोगों की जाँच करने के परमेश्वर के घर के मानक ये हैं कि वे परमेश्वर में सच्चाई से विश्वास रखते हैं या नहीं, वे सत्य से प्रेम करते हैं या नहीं, वे परमेश्वर के वचनों का पालन कर सकते हैं या नहीं और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं। परमेश्वर का घर इन मानकों के आधार पर लोगों को चुनता है और उन्हें विकसित करता है। अगर तुम परमेश्वर के घर के बारे में इतना बुरा सोचते हो तो तुम्हारे पास बिल्कुल भी जमीर या विवेक नहीं है और तुम पूरी तरह से बेकार हो। परमेश्वर का घर न सिर्फ तुम्हें अपने कर्तव्य के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा, बल्कि उसे तुम्हें, एक छद्म-विश्वासी को, तुरंत हटा भी देना पड़ेगा। अगर तुम परमेश्वर में सच्चे विश्वासी नहीं हो तो तुम्हें परमेश्वर का घर तुरंत छोड़ देना चाहिए; परमेश्वर के घर में बस यूँ ही समय मत काटते रहो। तुम परमेश्वर के घर के नहीं हो; परमेश्वर के घर को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है। जल्दी से चले जाओ।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें