सत्य का अनुसरण कैसे करें (26) भाग पाँच
जब मैं सामान्य मानवता में लोगों से बातचीत करता हूँ तब बातचीत निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं होने का मुद्दा उत्पन्न हो जाता है। निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं होने से मेरा क्या मतलब है? कभी-कभी जब मैं किसी से बिल्कुल सामान्य तरीके से मेल-जोल रख रहा होता हूँ और वार्तालाप कर रहा होता हूँ तब वह चीजों को बहुत ही ज्यादा जटिल बना देता है या उनके बारे में बहुत ही ज्यादा सोचता है और बातचीत जारी नहीं रह सकती। अगर यह जारी नहीं रह सकती तो मैं क्या करता हूँ? मैं बस उस व्यक्ति से मेल-जोल रखना बंद कर देता हूँ—मैं किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ लेता हूँ जो दूसरों से मेल-जोल रख सकता है, जो संवाद और वार्तालाप करने का तरीका जानता है, जिसके पास सामान्य मानवता की सोच है और फिर मैं उसके साथ वार्तालाप करता हूँ और मेल-जोल रखता हूँ। तुम लोगों के साथ अपने संपर्क में मुझे यह सबसे आम स्थिति दिखाई देती है कि लोगों को लगता है, “जब तुम लोगों से बात करते हो और संवाद करते हो तब तुम्हारी पहचान और रुतबे का बहुत ही ज्यादा प्रभाव रहता है। तुम देहधारी परमेश्वर हो और हम सृजित प्राणी हैं। अगर हम कुछ गलत कहते हैं तो हमारे लिए समान रुतबा ग्रहण करने और परमेश्वर के स्वभाव को ठेस पहुँचाने की संभावना रहती है। साथ ही, देहधारी परमेश्वर के रूप में तुम्हारा कार्य मानवता को बचाना है और तुम खुद परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करते हो, इसलिए तुम्हारी जिम्मेदारी या तुम्हारे द्वारा हाथ में लिया जाने वाला कार्य सिर्फ सत्य व्यक्त करना ही हो सकता है ताकि तुम भ्रष्ट मानवता के उद्धार के मुद्दे का समाधान कर सको। तुम्हें सिर्फ कार्य के बारे में या उन विषयों के बारे में बात करनी चाहिए जो दिव्यता से उत्पन्न होते हैं। तुम सामान्य मानव जीवन—भोजन, कपड़े, आवास और परिवहन के मामलों—के बारे में या इस बारे में बात नहीं कर सकते कि अमुक व्यक्ति कैसा है। अगर तुम इस बारे में बात करते हो कि वह कैसा है तो तुम उसके बारे में राय बना रहे हो या तुम्हारे कुछ गुप्त मकसद हैं।” चूँकि लोग ऐसी धारणाएँ रखते हैं, इसलिए वे देहधारी परमेश्वर को कोई गैर-मानवीय हस्ती मानते हैं। इसलिए, जब मैं ऐसे लोगों से मेल-जोल रखता हूँ जिनमें सामान्य सोच और सामान्य मानवता की कमी है और मैं रोजमर्रा के मामलों या दैनिक जरूरतों के बारे में जरा-सी बात करता हूँ तब कुछ लोग मानसिक बाधा खड़ी कर लेते हैं, सोचते हैं “इस बारे में बात करने का क्या फायदा है? यह आध्यात्मिक नहीं है! साथ ही, क्या यह बात उठाने के पीछे तुम्हारे गुप्त इरादे हैं?” अगर मैं किसी व्यक्ति की स्थिति पर चर्चा करता हूँ तो कुछ लोग सोचते हैं, “क्या यह लोगों के पीठ पीछे उनके बारे में राय बनाना या उनके खिलाफ षड्यंत्र करना है? क्या तुम उनके साथ कुछ करने वाले हो? क्या तुम उन्हें पदोन्नत करने वाले हो या हटा देने वाले हो? क्या तुम उनका उपयोग करना जारी रखने वाले हो या उन्हें बर्खास्त करने वाले हो?” अगर मैं किसी के मुद्दों के बारे में बात करता हूँ तो कुछ लोग सोचते हैं, “क्या तुम उस व्यक्ति को नापसंद करते हो या उसके प्रति नफरत महसूस करते हो? क्या उसने कुछ किया जिससे तुम्हें चोट पहुँची? क्या उसने कुछ कहा या किया जिससे तुम्हें ठेस पहुँची?” विशेष रूप से, अगुआओं और कार्यकर्ताओं से संबंधित संवेदनशील विषयों पर चर्चा करते समय कुछ लोग तो शामिल होने से और भी डरते हैं, कहते हैं, “तुम कार्य के लिए इनके बारे में बात कर रहे हो, लेकिन हम तुम्हारे साथ इन पर चर्चा नहीं करेंगे। ये संवेदनशील विषय हैं। जैसे ही हम कुछ गलत कहेंगे, तुम हमें उजागर कर दोगे, हमारी काट-छाँट करोगे, तुम हमारी भ्रष्टताओं का प्रकाशन देखोगे और इससे हमारे बारे में तुम्हारे मन पर एक गलत छाप पड़ेगी, जो कि अनुचित होगा।” ऐसे भी समय हैं जब मैं कुछ विषय उठाता हूँ, जैसे कि पूछता हूँ, “तुम लोगों के परिवार में कौन परमेश्वर में विश्वास रखता है?” मुख्यभूमि चीन में यह एक संवेदनशील विषय है। हालाँकि मुख्यभूमि में कुछ ऐसे लोगों से पूछना संवेदनशील नहीं माना जाता जिनसे तुम अपेक्षाकृत लंबे समय से मेल-जोल कर रहे हो और जिनसे तुम काफी परिचित हो—विदेशों में तो ऐसा और भी कम माना जाता है। लेकिन अगर मैंने यह पूछा तो कुछ लोग उत्तर तक देने की हिम्मत नहीं करते हैं। वे सोच-विचार करते हैं, “क्या तुम यह पूछकर कि मेरे परिवार में कौन विश्वास रखता है मेरी पृष्ठभूमि की छानबीन करने का प्रयास कर रहे हो?” अगर मैंने पूछा, “तुम लोगों की स्थानीय कलीसिया में कितने लोग हैं? कलीसियाई अगुआ कौन है?” तो वे सोचते हैं, “अरे नहीं, क्या तुम कलीसिया के बारे में पता लगाने का प्रयास कर रहे हो? मैं इस बारे में तुमसे बात नहीं कर सकता। अगर मैंने कुछ कह दिया और कलीसियाई अगुआ को पता लग गया तो मुसीबत खड़ी हो जाएगी।” देखो, वे कलीसिया के मामलों पर बात करते समय भी सतर्क रहते हैं और कुछ भी कहने से डरते हैं। बहुत-से लोग कलीसियाई अगुआओं और कलीसियाई कार्य से संबंधित विषयों पर चर्चा करने या उनके मन में जो है उसे खुलकर कहने की हिम्मत नहीं करते। इसके मुख्य कारणों में से एक कलीसिया की स्थिति उजागर हो जाने और अगुआओं और कार्यकर्ताओं को नाराज कर देने का डर है और साथ ही, अनजाने में अपने विचारों और नजरियों को प्रकट कर देने और काट-छाँट किए जाने या उजागर हो जाने का डर भी है। यह ऐसा कुछ है जिसे होता हुआ वे नहीं देखना चाहते। इसलिए, जब मैं बहुत-से लोगों से मेल-जोल रखता हूँ तब साधारण संवाद तक निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं हो सकता। जब मैं ऐसे अविश्वासियों से मेल-जोल रखता हूँ जिनके मन और पृष्ठभूमि जटिल हैं और उनके साथ चीजें सँभालता हूँ, तब जैसे ही मैं चीजें सँभालना समाप्त करता हूँ, मैं जल्दी से वहाँ से चला जाता हूँ—मैं गहरे रिश्ते नहीं बना सकता या बहुत ज्यादा करीब नहीं आ सकता। लेकिन जब मैं भाई-बहनों से मेल-जोल रखता हूँ तब भी मुझे ज्यादातर लोग ऐसे ही लगते हैं : मैं बहुत ज्यादा करीब नहीं आ सकता या गहरे रिश्ते नहीं बना सकता। ऐसा नहीं है कि मैं खुद को श्रेष्ठ समझता हूँ और ज्यादातर लोगों से मेल-जोल रखने का अनिच्छुक हूँ; बल्कि जब मैं उनके पास जाता हूँ या उनसे संपर्क बनाने का प्रयास करता हूँ तब वे ही अवचेतन रूप से मुझसे कतराते हैं या मुझसे दूर भागते हैं। तुम मुझसे दूर क्यों भागते हो? अगर तुमने कुछ गलत कह दिया तो मैं तुम्हारी निंदा नहीं करूँगा या इस बात को मुद्दा नहीं बनाऊँगा। अगर तुम अगुआ या कार्यकर्ता हो तो हम सत्य की संगति कर सकते हैं और ऐसे किसी भी विषय पर वार्तालाप कर सकते हैं जो तुम्हें समझ नहीं आता है। अगर तुम कोई साधारण भाई या बहन हो और तुम वाकई कुछ गलत कह भी देते हो या तुम्हारे कुछ त्रुटिपूर्ण विचार और नजरिए हैं तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं इस बारे में तुमसे बात करने का इच्छुक हूँ या नहीं। अगर मैं देखता हूँ कि तुम्हारी काबिलियत कमजोर है, तुममें बोध क्षमता की कमी है और तुम किसी भी चीज की असलियत नहीं जान सकते हो तो मैं तुमसे वार्तालाप नहीं करना चाहता और अगर हम वार्तालाप कर भी लेते हैं तो भी इससे कोई नतीजा नहीं मिलेगा। लेकिन अगर तुम्हारी काबिलियत अच्छी है, तुम्हारे पास बोध क्षमता है और तुम कुछ चीजों की असलियत जान सकते हो तो तुमसे वार्तालाप करने से नतीजे मिल सकते हैं और यह बातचीत निष्फल नहीं होगी। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं किससे यूँ ही वार्तालाप करता हूँ या मैं किन समस्याओं का पता लगाता हूँ, सबसे पहली बात, मैं अपने दिल में उनकी निंदा नहीं करूँगा, दूसरी बात, मैं उन्हें कोसूँगा नहीं, और तीसरी बात, मैं उनके परिणामों को निर्धारित नहीं करूँगा। उस तरीके से कार्य करना निराधार होगा और मैं बेवकूफी भरी चीजें नहीं करता। सामान्य मानवता के लिहाज से, कभी-कभी जब किसी परिचित व्यक्ति से मेरी मुलाकात होती है तब मैं बस जरा-सी बात करना और वार्तालाप करना चाहता हूँ। अगर तुम तैयार हो तो मैं तुमसे बात करूँगा। अगर नहीं हो तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा। कुछ लोग मुझसे वार्तालाप करने से डरते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, वे मुझसे सतर्क रहते हैं और अपने विचार व्यक्त नहीं करते, डरते हैं कि वे कुछ गलत कह देंगे और मुझे उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ मिल जाएगा। अगर मैंने देखा कि तुम अपने दिल की बात बोलने के इच्छुक नहीं हो तो मैं उचित बिंदु पर रुक जाऊँगा। अगर तुम हमेशा मुझसे सतर्क रहोगे, हमेशा डरते रहोगे कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र कर रहा हूँ तो तुमसे बात करने का मेरा मन नहीं होगा। मुझे बताओ, क्या मेरी यह तर्क-बुद्धि सामान्य है? (हाँ।) जब मैं किसी से बात और संवाद करता हूँ तब हमेशा कोई न कोई संदर्भ जरूर होता है। उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी खेत में पशुपालन के लिए जिम्मेदार हो तो हम पशुपालन के बारे में बात करेंगे। अगर तुम कलीसियाई अगुआ हो तो हम कलीसिया के मामलों के बारे में, भाई-बहनों से संबंधित मामलों के बारे में, भाई-बहनों की वर्तमान अवस्था के बारे में या कलीसियाई जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। अगर तुम सुसमाचार प्रचारक हो तो हम सुसमाचार कार्य के बारे में बात करेंगे। यह सामान्य मानवता के दायरे में लोगों से मेल-जोल रखना है और यह मेरे कार्य का हिस्सा भी है। कुछ मामलों में कलीसियाई कार्य शामिल नहीं होता है, लेकिन फिर भी वे परमेश्वर के घर के सामान्य मामले होते हैं। जब हम मिलते हैं तब इन चीजों के बारे में वार्तालाप करना सामान्य है। तुम परमेश्वर के घर में मामले सँभाल रहे हो और अपना कर्तव्य कर रहे हो, इसलिए जब हम मिलते हैं तब मुझे तुम्हारा अभिवादन करना चाहिए, तुम्हारे साथ वार्तालाप करनी चाहिए और देखना चाहिए कि कहीं तुम्हें कोई कठिनाई तो नहीं है। कभी-कभी हल्की-फुल्की वार्तालाप के दौरान मैं कुछ ऐसा पूछ लेता हूँ, “पिछली कुछ रातों से तापमान में गिरावट आई है—क्या तुम लोगों का घर ठंडा है?” कुछ लोग यह नहीं सुनना चाहते, वे सोचते हैं, “हम वयस्क हैं; क्या अपने बारे में चिंता करने के लिए हमें तुम्हारी जरूरत है?” अच्छे इरादों की बेकद्री की जाती है, है ना? दूसरे समय, जब मैं रसोई में जाता हूँ तब पूछता हूँ, “इस वर्ष की सब्जियाँ कैसी हैं? क्या वे खाने के लिए पर्याप्त हैं? तुम लोगों को कौन-सी सब्जियाँ या भोजन पसंद हैं?” ये बहुत सामान्य चीजें हैं, है ना? (हाँ।) लेकिन लोगों के दिल बहुत जटिल होते हैं और कुछ मामलों में जब मैं सामान्य ढंग से उनसे मेल-जोल रखता हूँ और संवाद करता हूँ तब भी निर्बाध प्रवाह मौजूद नहीं होता। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लोग अपने मुद्दों और अपनी असली स्थितियों को उजागर करने से हमेशा डरते हैं। और दूसरे लोग किस बात से डरते हैं? वे डरते हैं कि : “अगर मैंने अपनी असली स्थिति प्रकट कर दी तो तुम सभाओं में अपने धर्मोपदेशों में मुझे उजागर कर दोगे और मेरा उपयोग लक्ष्य के रूप में करोगे।” तुम लक्ष्य क्यों नहीं बन सकते? जब मैं तुम्हारी समस्याओं से संबंधित सत्य पर संगति करता हूँ तब वह उन्हें हल कर देती है। क्या यह कुछ अतिरिक्त चीज नहीं है जो तुमने प्राप्त की है? क्या यह तुम्हारा सौभाग्य नहीं है? यह अच्छी चीज है। इससे प्रमाणित होता है कि मैं तुम्हें गंभीरता से लेता हूँ और मेरे लिए तुम्हारा कुछ मोल है। क्या यह सही है? अगर मैं तुम्हें अनदेखा कर देता और तुम मेरे दिल में नहीं होते और अगर मुझे तुममें किसी समस्या का पता लगता, लेकिन मैं उस पर ध्यान नहीं देता और तुम्हें मार्गदर्शन और संगति नहीं देता तो क्या तुम सत्य समझ पाते और अपनी समस्याओं को सुलझा पाते? क्या तुम इससे खुश होते? अगर तुम इससे संतुष्ट होते, यह सोचते, “परमेश्वर जो मुद्दे उजागर करता है उनमें से कोई भी मुझसे संबंधित नहीं है, इसलिए इससे प्रमाणित होता है कि मुझमें कोई समस्या नहीं है,”—अगर तुम इस तरीके से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते तो तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो। कुछ लोग वर्षों की आस्था के बाद भी कभी भी काटे-छाँटे नहीं गए हैं, उन्होंने एक बार भी बतौर विषमता सेवा नहीं की है, फिर भी वे गर्वित और भाग्यशाली महसूस करते हैं, सोचते हैं कि वे बहुत अच्छे हैं, उनमें कोई समस्या नहीं है और वे निश्चित रूप से बचाए जाएँगे। क्या यह बहुत परेशानी वाली बात नहीं है? ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता।
सामान्य मानवता की सोच वाले लोग सामान्य मानवता के भीतर दूसरों से संवाद करते और मेल-जोल रखते समय सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के बोध का पालन करेंगे। इस बोध के कारण उनके पास दूसरों से पेश आने का एक न्यूनतम मानक और सिद्धांत होते हैं। जब तुम सामान्य मानवता की सोच के दायरे में रहकर लोगों से बात करते हो और उनके साथ मेल-जोल रखते हो, तब एक तरफ लोग यह महसूस कर पाते हैं कि तुममें मानवता के जमीर की जागरूकता है। दूसरी तरफ तुम औचित्य के बोध से कार्य करते हो जिससे तुम दूसरों को अप्रिय नहीं लगते। एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जब तुम दूसरों से संवाद और बातचीत करोगे तब उन्हें तुम्हारे द्वारा संवाद किए गए शब्दों से फायदा होगा और वे कुछ ऐसी चीजें प्राप्त करेंगे जिनकी मानवता को जरूरत है। इसे ही हम लोगों से मेल-जोल रखना और संवाद करना कहते हैं। संवाद करने का क्या मतलब है? सादे शब्दों में कहा जाए तो यह हल्का-फुल्का वार्तालाप करना है। ज्यादातर लोग हल्का-फुल्का वार्तालाप करना नहीं जानते; जैसे ही वे बोलते हैं, वे बहस और कहा-सुनी में उलझने की प्रवृत्ति रखते हैं या दूसरों से अपनी बात मनवाने के लिए दिखावा करते हैं और उन्हें उपदेश देते हैं। जिन लोगों में जरा-सी वाक्पटुता होती है, वे जैसे ही अपना मुँह खोलते हैं, दूसरों को उपदेश देना चाहते हैं और उनके शिक्षक के रूप में कार्य करते हैं। ये सभी अभिव्यक्तियाँ भ्रष्ट स्वभावों के प्रकाशन हैं। भ्रष्ट स्वभावों वाले लोग दूसरों से सामान्य रूप से हल्का-फुल्का वार्तालाप नहीं कर सकते। अगर वे कुछ देर सामान्य रूप से बोल भी लें तो भी यह लंबे समय तक नहीं चल सकता। किसी बिंदु पर, वे बहस करना शुरू कर देंगे, उनका चेहरा तमतमा जाएगा और वे उसमें पूरी तरह से उलझ जाएँगे। यह सामान्य हल्का-फुल्का वार्तालाप नहीं है। सामान्य हल्का-फुल्का वार्तालाप निश्चित रूप से सही और गलत पर बहस करना या झगड़ा करना और कहा-सुनी करना नहीं है, यह लोगों के बारे में राय बनाना या उनकी निंदा करना तो बिल्कुल नहीं है। आओ, हल्के-फुल्के वार्तालाप को परिभाषित करें। यह जानकारी का आदान-प्रदान करना और इसे साझा करना है—इसे ही हम हल्का-फुल्का वार्तालाप कहते हैं। क्या यह परिभाषा सटीक है? (हाँ।) यह किस तरीके से सटीक है? जानकारी का आदान-प्रदान करना और इसे साझा करना सामान्य मानवता के जमीर और तर्क-बुद्धि की नींव पर बने होते हैं। देखो—जमीर और विवेक वाले लोग कैसे वार्तालाप और संवाद करते हैं? वे बहस नहीं करते और वे एक-दूसरे का सम्मान कर पाते हैं जिससे सामने वाले को फायदा होता है। सामने वाले ने जो साझा किया है, उसे सुनने के बाद उन्हें कुछ नई जानकारी मिलती है। फिर वे बदले में सामने वाले को कुछ ऐसी जानकारी देते हैं जो उन्हें पता है ताकि सामने वाले को भी फायदा हो और वह अपनी मानवता में अनुभव, अंतर्दृष्टि और ज्ञान प्राप्त कर सके। सामने वाले का सम्मान करने और उसके साथ समान स्तर पर सामंजस्यपूर्ण ढंग से रहने के सिद्धांतों के आधार पर उन्हें जो जानकारी पता होती है, उसे उसके साथ साझा करना और फिर सामने वाले द्वारा साझा की गई जानकारी को प्राप्त करना—क्या यह आपसी मदद नहीं है? यह समानता, आपसी सहयोग, सामंजस्य और निष्पक्षता की नींव पर बना है। संवाद और हल्का-फुल्का वार्तालाप करने का यही मतलब है। मुझे बताओ, क्या मेरी परिभाषा सटीक है? (हाँ।) इस सिद्धांत के आधार पर वार्तालाप करने का और संवाद का अभ्यास करना सही है। अगर संवाद और वार्तालाप षड्यंत्रों, बहस, संघर्षों, चालबाजियों, छलों, जालों और परीक्षाओं से भरे हैं और अगर जो प्रकट होता है वह सब भ्रष्ट स्वभाव हैं, अगर यह सब आपसी दमन है जिसमें हर व्यक्ति दिखावा कर रहा होता है, एक-दूसरे से मुकाबला कर रहा होता है, यह देखने की होड़ कर रहा होता है कि कौन ज्यादा शानदार ढंग से बोलता है या ज्यादा कहता है तो यह सामान्य संवाद नहीं है। यह सामान्य मानवता के जमीर और तर्क-बुद्धि के दायरे में संवाद नहीं है। यह संवाद जानकारी का आदान-प्रदान करना और जानकारी साझा करना नहीं है, बल्कि खुल्लमखुल्ला और गुप्त संघर्ष और कहा-सुनी है। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।)
बिना षड्यंत्र रचे दूसरों से संवाद में सफल होने के लिए तुम्हें सामान्य मानवता के जमीर और तर्क-बुद्धि के दायरे में संवाद करना सीखना होगा। संवाद का उद्देश्य दूसरों की मदद करना है और साथ ही, उनसे मदद और फायदे प्राप्त करना भी है। यह सामान्य संवाद है और इस तरीके से तुम बिना षड्यंत्र रचे संवाद में सफल हो सकते हो। अविश्वासियों का संवाद और वार्तालाप देखो; क्या यह सामान्य संवाद का प्रभाव प्राप्त कर सकता है? (नहीं।) जब भ्रष्ट लोग संवाद और वार्तालाप करते हैं तब क्या उनके संवाद की विषयवस्तु, मकसद और लहजा सामान्य होते हैं? (नहीं।) उनका संवाद बस मुर्गों की लड़ाई या कुत्तों की लड़ाई जैसा होता है। क्या उनका संवाद निर्बाध रूप से आगे बढ़ सकता है? (नहीं।) वे दूसरों के खिलाफ षड्यंत्र न रचने या उनसे बहस न करने में भी सफल नहीं हो सकते। संवाद को निर्बाध रूप से प्रवाहित होने के लिए प्रेमपूर्ण दिल, एक-दूसरे की मदद करने की इच्छा और कमजोरियों की भरपाई करने के लिए एक-दूसरे की शक्तियों से सीखने की तत्परता होनी चाहिए। जब मैं तुम लोगों से संवाद और वार्तालाप करता हूँ तब सिर्फ मेरा षड्यंत्र न रचना ही काफी नहीं है; तुम्हें भी इस सिद्धांत के अनुसार षड्यंत्र न रचने और संदेही नहीं होने का अभ्यास करना होगा। अगर मैं षड्यंत्र न रचूँ, लेकिन तुम लोग लगातार षड्यंत्र रचते जाओ और न सिर्फ खुद षड्यंत्र रचो, बल्कि यह संदेह भी करो कि मैं षड्यंत्र रच रहा हूँ तो हमारा संवाद निर्बाध रूप से प्रवाहित नहीं हो सकता और न ही हम सच्ची, फायदेमंद बातचीत कर सकते हैं या सामंजस्यपूर्ण ढंग से रह सकते हैं। कुछ लोग जब मुझे आते हुए देखते हैं तब छिपने के लिए जल्दी से कोई जगह ढूंढ़ लेते हैं। अगर वे वाकई मुझसे बच नहीं सकते तो वे अनिच्छा से मेरा अभिवादन करते हैं, लेकिन अपने दिलों में वे मुझसे मिलना नहीं चाहते, सोचते हैं, “क्या मुसीबत है! तुम फिर से हमारी वास्तविक स्थिति का पता लगाने यहाँ चले आए हो। ऐसा करने के बाद तुम फिर से सत्य सिद्धांतों की संगति करोगे और हमें शर्मिंदा करोगे। हमें क्या करना चाहिए?” अगर तुम मुझसे मिलने या मेरे साथ मेल-जोल रखने के इच्छुक नहीं हो और मेरे साथ मेल-जोल रखने के दौरान तुम अंदर से थके हुए महसूस करते हो और तुम्हें हमेशा लगता है कि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र रच रहा हूँ तो जब तुम मुझे आते देखो तब मुझसे बच सकते हो। अगर तुम्हें लगता है कि जब तुम मुझसे मेल-जोल रखते हो तब मैं षड्यंत्र नहीं करता और इससे तुम्हें आराम, खुशी, आजादी और सुकून मिलता है तो चलो, हम मिलें, वार्तालाप करें और हाल ही में चीजें कैसी रही हैं, इस बारे में जानकारी साझा करें। अगर तुम मुझसे पूछते हो, “आजकल तुम्हारा क्या हाल-चाल है?” तो मैं ईमानदारी से उत्तर दूँगा। अगर मैंने तुमसे पूछा, “हाल ही में चीजें कैसी रही हैं? क्या तुमने कोई जीवन प्रगति की है? क्या अपना कर्तव्य करने से तुमने कोई फायदा प्राप्त किया है?” और तुम भी ईमानदारी से उत्तर दे सकते हो तो यह बहुत अच्छा है। हर मुलाकात सुखद माहौल में आगे बढ़ सकती है। अगर मुझे देखकर लोगों का हमेशा मुझसे छिपना सही नहीं है तो क्या जानबूझकर मेरी खुशामद करने के लिए हमेशा झूठी चापलूसी करना सही है? (नहीं।) यह सही क्यों नहीं है? (खुशामद करना पसंद करना असत्यता और धूर्तता के समान है। हमारे लिए बेहतर यही है कि हम ज्यादा सच्चाई से बोलें और हमें परमेश्वर के साथ बस सामान्य मानसिकता से पेश आने की जरूरत है। एक बात तो यह है कि हमें उसके साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। दूसरी बात यह है कि हमें परमेश्वर की खुशामद नहीं करनी चाहिए, चापलूसी कर उसकी कृपा पाने के लिए जानबूझकर प्रयास नहीं करना चाहिए या जानबूझकर उससे घनिष्ठ होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।) मेरी बस एक ही अपेक्षा है : जब मैं तुम्हें देखूँ तब मुझसे छिपो मत और जब मैं तुम्हें नहीं ढूँढ़ रहा होऊँ तब मुझे परेशान मत करो। वही करो जो तुम्हें करना चाहिए और सब कुछ सामान्य बनाओ। मैं तुम लोगों के कर्तव्य-निर्वहन को प्रभावित नहीं करूँगा और तुम लोगों को मुझे प्रभावित नहीं करना चाहिए। मुझसे छिपना और मुझे परेशान करना, ये दोनों ही वे सिद्धांत नहीं हैं जिनका लोगों को मेरे संपर्क में रहने और मेरे साथ मेल-जोल रखते समय पालन करना चाहिए। तो सिद्धांत क्या है? यह है सामान्य मानवता के जमीर और विवेक के दायरे में संवाद करना और स्पष्टवादिता से बातचीत कर पाना और स्पष्ट सच बोल पाना; मैं जो भी पूछूँ, उसका तुम्हें सच्चाई से उत्तर देना चाहिए। लोग स्पष्ट सत्य क्यों नहीं बोल पाते? उदाहरण के लिए, मान लो कि मैं तुमसे पूछता हूँ, “इस महीने सुसमाचार का प्रचार करने में तुमने कितने लोग प्राप्त किए?” और तुम उत्तर नहीं देना चाहते। अगर मैंने देखा कि तुम असहज हो रहे हो तो मैं और जोर नहीं दूँगा। मैं लोगों को मुश्किल स्थिति में नहीं डालना चाहता और मैं कभी भी किसी को बोलने के लिए मजबूर नहीं करता। कुछ लोग, चाहे दूसरे उनसे कुछ भी पूछें, हमेशा सोच-विचार करते हैं, “उनका यह पूछने का क्या अर्थ है?” वे सीधे उत्तर नहीं देना चाहते, उन्हें गलत जवाब देने और अपने लिए समस्याएँ खड़ी करने का बहुत डर होता है। अगर तुम हमेशा इस तरह से अटकलें लगाते रहोगे और षड्यंत्र रचते रहोगे तो हम संवाद नहीं कर सकेंगे। तुम्हें मेरे प्रश्नों के अर्थ की हमेशा पड़ताल करने की जरूरत नहीं है और न ही तुम्हें मेरे खिलाफ षड्यंत्र रचना चाहिए। अगर तुम सरल हो सकते हो और अपने दिल की बात कहने के लिए खुद को खोल सकते हो तो फिर हम एक-दूसरे से संवाद कर सकते हैं। यह आसान है या नहीं? (आसान है।) यह कहना आसान है, लेकिन हो सकता है कि इसे वास्तव में करना जरा-सा मुश्किल हो। यह सुनने में जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। उदाहरण के लिए, हो सकता है कि मैंने एक बार तुमसे कोई प्रश्न पूछा हो और तुमने उस समय सच नहीं बताया हो—तुमने झूठ बोला हो। वह संपर्क और संवाद विफल हो गया। विफल होने के बाद तुम्हें क्या करना चाहिए? इतना हिम्मती बनने का प्रयास करो कि अगली बार हमारी मुलाकात होने पर इसे मान सको : “पिछली बार मैंने झूठ बोला था। अब से मैं स्पष्ट सच बोलूँगा।” तब मैं तुम्हें प्रोत्साहित करूँगा—मैं तुम्हारी तारीफ करूँगा और तुम्हें शाबाशी दूँगा : तुम सत्य का अभ्यास करने और ईमानदार व्यक्ति बनने में सफल रहे हो। क्या यह बढ़िया नहीं है? (हाँ।)
जब षड्यंत्र नहीं करने के विषय पर संगति करने की बात आती है तब चाहे कितने भी उदाहरण दिए जाएँ, तुम लोगों को जो बताया जा रहा है वह एक सिद्धांत है। क्या तुम्हें पता है कि वह सिद्धांत क्या है? (परमेश्वर को मापने के लिए या परमेश्वर पर संदेह करने के लिए भ्रष्ट मानवजाति के परिप्रेक्ष्य का उपयोग मत करो।) सही कहा। परमेश्वर के साथ भ्रष्ट मानवजाति के परिप्रेक्ष्य से मत पेश आओ। तो किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? (परमेश्वर से परमेश्वर की तरह पेश आओ।) क्या उससे मनुष्य की तरह पेश आना ठीक नहीं है? क्या उससे एक सामान्य, साधारण व्यक्ति की तरह पेश आना ठीक नहीं है? चाहे तुम उससे परमेश्वर की तरह पेश आओ या मनुष्य की तरह, अंतर्वैयक्तिक मेल-जोल के लिए सबसे जरूरी सिद्धांत एक-दूसरे से स्पष्टवादी होना है। जब मैं तुमसे बात करता हूँ और तुम्हारे साथ मामले सँभालता हूँ तब मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता और तुम्हें भी मेरे साथ स्पष्टवादी होना चाहिए। इसलिए अगर कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है तो क्या तुम्हें भी उसके खिलाफ षड्यंत्र करना चाहिए? (नहीं।) अगर कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है तो तुम्हें उससे भी सिद्धांतों के अनुसार पेश आना चाहिए। यही सही तरीका है। यह सिर्फ ऐसा नहीं है कि चूँकि मैं तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करता, इसलिए तुम षड्यंत्र या संदेह किए बिना मेरे साथ स्पष्टवादी बनो। बल्कि भले ही दूसरे लोग तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करें, तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हो और मामलों को सँभाल सकते हो। यह सिद्धांतों का पालन करना है। कुछ लोग कहते हैं, “उन्होंने मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया—ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं पलटवार न करूँ? अगर मैं उन्हें सबक न सिखाऊँ और बस उन्हें ऐसे ही मुझे डराने-धमकाने दूँ, तो क्या मेरा ही नुकसान नहीं होगा? क्या मुझ पर धौंस जमाना इतना आसान है?” मुझे बताओ, क्या उनके तर्क का कोई अर्थ निकलता है? आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत—दुनिया के लोगों के बीच इसका अर्थ निकलता है। लेकिन अगर सत्य से मापा जाए तो यह कथन गलत है। उनका तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करना बुरा कर्म है। अगर तुम पलटवार करते हो, उनके खिलाफ षड्यंत्र करने के लिए उन्हीं विधियों का उपयोग करते हो तो परमेश्वर की नजर में सार एक ही है; दोनों ही बुरे कर्म हैं। परमेश्वर यह नहीं कहेगा कि चूँकि उन्होंने तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र किया, इसलिए तुम्हारा वापस हमला करना पूरी तरह से जायज है और सिद्धांतों के अनुसार है और यह बुरा कर्म नहीं है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुमने किस कारण से उनके खिलाफ षड्यंत्र किया; वह यह देखता है कि क्या तुम्हारा कार्य खुद एक षड्यंत्र है, क्या यह बुरा कर्म है और क्या तुम इस मामले को सत्य द्वारा या मानवीय नैतिक नजरियों द्वारा मापकर इससे पेश आते हो। अगर मामले को मानवीय नैतिक नजरियों द्वारा मापा जाता है तो “आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत” सही माना जाएगा। उन्होंने पहले तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र किया, इसलिए तुम्हारा भी उन्हीं तरीकों का उपयोग करके पलटवार करना और उनके खिलाफ षड्यंत्र करना उचित है और उन्हें ऐसे नतीजे स्वीकार करने चाहिए। अगर मानवीय नैतिक नजरियों का उपयोग करके मानवीय परिप्रेक्ष्य से मापा जाता है तो यह गलत नहीं है। और अगर कानून के अनुसार मापा जाता है तो शायद यह गैर-कानूनी नहीं है। लेकिन परमेश्वर की नजर में यह सत्य के विपरीत है। कोई भी चीज जो सत्य के विपरीत चलती है, वह बुरा कर्म है और परमेश्वर की नजर में दोषी ठहराई जाती है। अगर तुम्हारा वापस हमला करना जायज हो, तो भी परमेश्वर सिर्फ इस कारण से तुम्हें दोषी ठहराने से नहीं रुकेगा क्योंकि तुम्हारा वापस हमला करना उचित और नैतिक रूप से जायज है। परमेश्वर यह देखेगा कि उनका तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करने के बाद तुम उनसे किस तरीके से पेश आते हो। अगर तुम उनसे उसी तरीके से पेश आते हो तो परमेश्वर तुम्हें दोषी ठहराएगा। लेकिन अगर तुम उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हो और उनसे परमेश्वर द्वारा सिखाए ढंग से निष्पक्षता से और न्यायपूर्वक पेश आते हो तो भले ही नैतिक रूप से लोगों की धारणाएँ हों और वे तुम्हारी निंदा करें और कानूनी रूप से तुम्हें अपराधी घोषित कर दिया जाए, लेकिन परमेश्वर की नजर में, परमेश्वर कहता है कि इस मामले में तुमने सिद्धांत के अनुसार कार्य किया है और यह बुरा कर्म नहीं है—वह तुम्हें दोषी नहीं ठहराएगा। अगर तुम लोगों से सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो तो यह सत्य का अभ्यास करना है। तुम्हें मसीह से अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार या अपने भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर पेश नहीं आना चाहिए या उसके खिलाफ चालबाजियों और छल-कपट का उपयोग नहीं करना चाहिए। तुम लोगों से कैसे पेश आते हो इसमें भी यह ऐसा ही होना चाहिए। अगर तुम मसीह, इस साधारण व्यक्ति, से सही ढंग से पेश आ सकते हो तो उसी तरीके से तुम दूसरों से भी सही ढंग से पेश आ सकते हो। चाहे व्यक्ति कोई भी हो, तुम्हें इस बारे में सही रवैया अपनाना चाहिए कि तुम उससे कैसे पेश आते हो। इस तरह, लोगों से पेश आने के लिए तुम्हारे सिद्धांत और विधियाँ सही होंगी। अगर तुम लोगों के प्रति अपने रवैये में या उनसे पेश आने के तरीके के बारे में अपने विचारों और दृष्टिकोणों में कोई गलती करते हो तो तुम तुरंत परमेश्वर के वचनों के अनुसार आत्म-चिंतन करोगे और अपने विचारों और दृष्टिकोणों को ठीक करोगे और साथ ही, अपने व्यवहार को लगातार नियमित करोगे और धीरे-धीरे, लोगों से पेश आने के तरीके के बारे में तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण, और आचरण और कार्य करने के लिए तुम्हारे सिद्धांत उत्तरोत्तर सत्य के अनुसार होते जाएँगे। जब सत्य सिद्धांत तुम्हारा जीवन बन जाएँगे तब तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव छूट चुका होगा और परिवर्तित हो चुका होगा और तुम लोगों से निष्पक्षता से, न्यायपूर्वक और परमेश्वर के इरादों के हिसाब से पेश आ पाओगे। अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते हैं तो तुम सोचते हो कि उनके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करना तुम्हारे लिए सही है। लेकिन अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और तुम उनके खिलाफ षड्यंत्र करने से खुद को रोककर, इसके बजाय सत्य की तलाश कर सकते हो और उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकते हो, तो क्या यह प्रगति नहीं है? क्या यह परिवर्तन नहीं है? (हाँ।) अगर वे तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और तुम भी उनके खिलाफ षड्यंत्र करते हो तो क्या तुम उसी मार्ग पर नहीं चल रहे हो जिस पर तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करने वाला व्यक्ति चल रहा है? ऐसे में तुममें और दुनिया के लोगों में क्या अंतर रह जाता है? न तो लोगों और चीजों को लेकर तुम्हारे दृष्टिकोणों में कोई बदलाव हुआ है, न ही अपने आचरण और कार्य करने के पीछे के दृष्टिकोणों में। ये परमेश्वर के वचनों या सत्य सिद्धांतों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि दुनिया के लोगों के सिद्धांतों पर आधारित हैं : जो कोई भी तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है, तुम उसके खिलाफ षड्यंत्र करते हो—आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत। तुम दुनिया के लोगों से, अविश्वासियों से बिल्कुल भी अलग नहीं हो। अगर, इस बात की परवाह किए बगैर कि कोई तुम्हारे खिलाफ षड्यंत्र करता है या नहीं, तुम कभी भी उसके खिलाफ षड्यंत्र नहीं करते, बल्कि उससे परमेश्वर के वचनों के अनुसार और सत्य सिद्धांतों के अनुसार पेश आते हो तो यह रुख और परिप्रेक्ष्य सही है; यह सत्य का अभ्यास करना है। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु ने लोगों से क्या कहा? अगर कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें क्या करना चाहिए? (प्रभु यीशु ने कहा, “जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी ओर दूसरा भी फेर दे” (मत्ती 5:39)।) कुछ लोग कहते हैं, “अगर वह मुझे थप्पड़ मारेगा तो मैं उसे वापस थप्पड़ मार दूँगा! अगर उसने मेरे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारा तो मैं उसके बाएँ गाल पर थप्पड़ मार दूँगा। अगर उसने मेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारा तो मैं उसके दाहिने गाल पर थप्पड़ मार दूँगा। यह न तो नैतिक रूप से दोषी ठहराया जाता है और न ही कानूनी रूप से।” परमेश्वर कहता है, “गलत। अगर वह तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर दो। वापस थप्पड़ मत मारो।” क्या तुम ऐसा कर सकते हो? इस बात की परवाह किए बगैर कि मानवीय नजर में परमेश्वर की अपेक्षा स्वीकार्य है या नहीं—शायद कुछ लोगों के लिए यह बेवकूफी भरी बात हो, बेवकूफी भरा अभ्यास हो—तुमसे परमेश्वर की यही अपेक्षा है। क्या तुम यह कर सकते हो? तुम कहते हो, “मैं यह नहीं कर सकता। अगर उसने मेरे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारा तो मुझे उसे वापस थप्पड़ मारना ही पड़ेगा, नहीं तो मेरा अभिमान और गरिमा चली जाएगी और मैं अपना सम्मान पूरी तरह से खो चुका होऊँगा।” इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा यह कथन भ्रष्ट मानवजाति के बीच टिकता है या नहीं, अगर परमेश्वर की नजर में तुम्हारा कथन गलत है, तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हारा व्यवहार गलत है तो फिर परमेश्वर की नजर में तुम्हारा व्यवहार दोषी ठहराने लायक है। क्या कारण है कि इसे दोषी ठहराया जाता है? वह यह है कि तुमने परमेश्वर के वचन नहीं सुने और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया। परमेश्वर ने तुमसे कहा कि अगर कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर देना चाहिए। क्या तुमने ऐसा किया? परमेश्वर बस तुमसे पूछता है : क्या तुमने परमेश्वर के वचन सुने थे? क्या परमेश्वर ने तुम्हें जो निर्देश दिया, तुमने उसके अनुसार अभ्यास किया? अगर तुमने इस तरह से अभ्यास नहीं किया, तो फिर तुमने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया और तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है; तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य का अभ्यास करता है और ऐसे व्यक्ति नहीं हो, जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार चीजों को देखता है और आचरण करता है। ऐसे में परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करता है, तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसे परमेश्वर स्वीकारता है और परमेश्वर की नजर में वह थप्पड़ जो तुमने लौटाया, वह बुरा कर्म है। शायद तुम्हें हमेशा यही लगेगा कि यह पूरी तरह से जायज था, यह तुम्हारी गरिमा और अधिकारों की रक्षा करने का एक जरूरी उपाय था। लेकिन परमेश्वर की नजर में उस थप्पड़ का मतलब है कि तुमने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया है और न ही तुम चलना चाहते हो, तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं सुनते हो और तुम्हारी नजर में परमेश्वर के वचन सिर्फ धर्म-सिद्धांत हैं, खोखले शब्द हैं। तुम परमेश्वर के वचनों का सिर्फ प्रचार करते हो, उनका कभी अभ्यास नहीं करते। परमेश्वर तुम्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में निरूपित करेगा जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करता। तो फिर क्या अब भी तुम परमेश्वर की स्वीकृति पा सकते हो? अगर तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करते हो तो परमेश्वर के वचन कभी तुम्हारा जीवन नहीं बन सकते। तुम अपने चाहे कितने भी तर्क परमेश्वर के सामने पेश करो, वह तुम्हारी नहीं सुनेगा। परमेश्वर यह नहीं कहेगा, “किसी ने अकारण ही तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मार दिया और तुम काफी दयनीय हो। अपनी गरिमा की रक्षा करने के लिए तुम वापस थप्पड़ मार सकते हो। वापस थप्पड़ मारने के बाद तुम प्रार्थना कर सकते हो और अपना पाप कबूल कर सकते हो और परमेश्वर तुम्हें माफ कर देगा और तुम्हें दोषी नहीं ठहराएगा।” परमेश्वर ने ऐसा नहीं कहा। परमेश्वर ने कहा कि अगर कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो तुम्हें अपना दाहिना गाल भी उसकी ओर फेर देना चाहिए। अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति हो। अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो परमेश्वर की नजर में तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है, ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं करता है या परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं करता है, जो एक बुरा व्यक्ति है। बुरे लोगों के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया है? परमेश्वर कहता है, “मेरे पास से चले जाओ! मैं तुम लोगों को नहीं जानता।” परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता। समझे? (समझ आ गया।) यही बात षड्यंत्र करने पर भी लागू होती है। तुम कहते हो, “उन्होंने मेरे खिलाफ षड्यंत्र किया, तो मेरा उनके खिलाफ षड्यंत्र करने में क्या गलत है?” तुम्हारा लोगों के खिलाफ षड्यंत्र करना बस गलत है। यह किस तरीके से गलत है? यह इसलिए गलत है क्योंकि षड्यंत्र करना अपने आप में एक बुरा कर्म है, कोई अच्छा कर्म नहीं है। इसलिए, जब वे लोगों के खिलाफ षड्यंत्र करते हैं तब परमेश्वर उन्हें दोषी ठहराता है। अगर तुमने भी ऐसा ही किया तो परमेश्वर उसी तरीके से तुम्हें भी दोषी ठहराएगा। तुम्हें किसी ऐसे तरीके से कार्य करना चाहिए जो षड्यंत्र करने से मुक्त हो, एक ऐसे तरीके से जिसे परमेश्वर स्वीकारता है। तुम्हारा कर्तव्य परमेश्वर द्वारा तुम्हें बताए गए अभ्यास के मार्ग और सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना है, अपने तर्क पेश करने या अपनी व्यक्तिगत गरिमा या सम्मान की रक्षा करने के लिए नहीं। तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, रुतबा और गरिमा महत्वपूर्ण नहीं हैं। क्या महत्वपूर्ण है? महत्वपूर्ण यह है कि क्या परमेश्वर के वचन तुममें कार्यान्वित किए जाते हैं, क्या परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन गए हैं, क्या तुमने परमेश्वर के वचनों को जिया है और क्या परमेश्वर के वचन तुममें पूरे किए गए हैं। समझे? (समझ आ गया।) कुछ लोग कहते हैं, “उन्होंने मुझे गाली दी, इसलिए मैं उन्हें वापस गाली दूँगा।” क्या ऐसा कहना सही है? (नहीं।) दूसरे लोग कहते हैं, “वे हमेशा मेरे साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर उलझते हैं, तो मैं भी उनके साथ छोटी-छोटी बातों को लेकर क्यों नहीं उलझ सकता? अगर मैंने ऐसा नहीं किया तो क्या मैं भोंदू नहीं लगूँगा?” क्या यह महत्वपूर्ण है कि दूसरे तुम्हें कैसे देखते हैं? (नहीं।) लोग हमेशा इज्जत को लेकर परेशान रहते हैं, हमेशा डरते हैं कि दूसरे लोग उन्हें भोंदू और बेअक्ल समझेंगे। दरअसल, इसका कोई महत्व नहीं है कि दूसरे तुम्हें कैसे देखते हैं। फिर महत्वपूर्ण क्या है? जब वे तुम्हें भोंदू के रूप में, बेअक्ल के रूप में देखते हैं, जब वे तुम्हारी खिल्ली उड़ाते हैं तब तुम कैसे प्रतिक्रिया करते हो? क्या तुम आवेगशीलता से, मानवीय विधियों और उपायों से या परमेश्वर द्वारा तुम्हें बताए गए सिद्धांतों के अनुसार प्रतिक्रिया करते हो? क्या तुमने परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास किया है? क्या तुमने अपना कर्तव्य मजबूती से पकड़कर रखा है? वे तुम पर हँसते हैं और तुम्हें भोंदू कहते हैं, बस इस कारण से तुम झल्ला उठते हो और अपना कार्य छोड़ देते हो, “तुम मुझे भोंदू समझते हो, इसलिए अब मैं इसे और नहीं करूँगा!” तुम यह उनके लिए नहीं कर रहे हो। अगर तुमने अपना कर्तव्य छोड़ दिया तो परमेश्वर क्या कहेगा? “किसी ने तुम्हें भोंदू कहा, इसलिए तुमने वह कर्तव्य छोड़ दिया जो तुम्हें मैंने सौंपा था। तुममें कोई वफादारी नहीं है!” परमेश्वर इसे इसी तरीके से देखेगा। अगर तुम्हारे दिल में सही मायने में परमेश्वर है, अगर तुममें परमेश्वर के प्रति सही मायने में वफादारी है तो अगर कोई तुम पर हँसता है और तुम्हें भोंदू कहता है तो सबसे पहले तुम्हें सोच-विचार करना चाहिए : “तुम कहते हो कि मैं भोंदू हूँ, तुम कहते हो कि मैं बेअक्ल हूँ और तुम मेरे पीठ-पीछे मुझ पर हँसते हो। मैं तुमसे बहस नहीं करूँगा और न ही इस कारण से तुमसे नाराजगी रखूँगा। मैं बेवकूफ हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन परमेश्वर ने मेरा उन्नयन किया है और वह मुझे तुच्छ नहीं समझता। यह कर्तव्य मुझे तुमने नहीं दिया, यह मुझे परमेश्वर ने दिया था : यह मेरे लिए परमेश्वर का आदेश है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे बारे में ऊँची राय रखते हो या नहीं। मैं तुम्हारे देखने के लिए अपना कर्तव्य नहीं कर रहा हूँ। अपना कर्तव्य करना मेरा मिशन है। मुझे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहिए और परमेश्वर के प्रति वफादार रहना चाहिए। मुझे इस कर्तव्य को सँजोना चाहिए और परमेश्वर के उन्नयन और भरोसे पर खरा उतरना चाहिए। मुझे अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए। तुमने मुझे भोंदू कहा, इस कारण से मैं अपना कर्तव्य नहीं छोड़ सकता और परमेश्वर को निराश नहीं कर सकता। उससे मैं सच में भोंदू बन जाऊँगा।” क्या इस तरीके से सोचना सिद्धांतों के अनुसार नहीं है? क्या यह आवेगशीलता को छोड़ देना नहीं है? यह आवेगशीलता से प्रतिक्रिया करना नहीं है। जब तुम लोग इस तरीके से कार्य कर सकोगे तब तुम सही मायने में बदल चुके होगे और तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा। तुम लोगों, घटनाओं या चीजों से बाधित नहीं होगे। हालात चाहे कैसे भी हों, तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों को अपने मन में मजबूती से रखोगे और किसी भी मामले में आवेगशीलता, भावनाओं, मिजाज, व्यक्तिगत पसंद, इच्छाओं या महत्वाकांक्षाओं से पेश नहीं आओगे। परमेश्वर के वचन तुम्हारे दिल में सबसे ऊँचे और सबसे महान होंगे और जब कुछ भी होगा, तब तुम सबसे पहले परमेश्वर के वचनों की तलाश करोगे, “परमेश्वर के वचन यह कहते हैं, इसलिए मैं इन्हें मजबूती से पकड़कर रखूँगा। अगर दूसरे लोग मुझे भोंदू समझते हैं तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इससे पड़ता है कि परमेश्वर मुझे कैसे देखता है। वैसे तो मैं बेवकूफ हूँ और मेरी काबिलियत खराब है, लेकिन फिर भी परमेश्वर ने मुझे करने के लिए एक कर्तव्य सौंपा है। मैंने परमेश्वर से कितने बड़े उन्नयन का आनंद लिया है! यह एक आशीष है!” अगर जिन चीजों से तुम्हारा सामना होता है उनसे तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार पेश आ सको तो तुम जान जाओगे कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना है।
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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?