सत्य का अनुसरण कैसे करें (27) भाग एक

“सत्य का अनुसरण कैसे करें” में “त्याग देना” विषय के संबंध में हमने “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” विषय के अंतर्गत धारणाओं और कल्पनाओं से जुड़ी विषयवस्तु तक संगति की थी। पिछली कुछ बार हमने “देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना” पर संगति की थी। आज हम इसी पर संगति जारी रखेंगे। देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं के संबंध में हमने देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता से जुड़े कुछ विषयों पर संगति की थी, है ना? तो पिछली बार हमने किस पर संगति की थी? हमने देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता को जीकर दिखाने और इसके प्रकाशनों से जुड़ी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर संगति करने के साथ ही देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के भीतर स्व-आचरण और कार्य करने के कुछ सिद्धांतों पर संगति की थी और फिर हमने इस पर संगति की थी कि देहधारी परमेश्वर अपनी मानवता के संदर्भ में कौन-सी चीजें नहीं करता। इन पहलुओं पर संगति करने से लोगों को परमेश्वर के देहधारी शरीर के स्वभाव सार और उसके स्व-आचरण और कार्य करने के सिद्धांतों को और साथ ही उसकी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। जब हम देहधारी परमेश्वर की इन अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करते हैं—चाहे वह तथ्यों व उदाहरणों के रूप में हो या कार्य करने के विशिष्ट सिद्धांतों के रूप में—तब उनमें जीवन के सभी प्रकार के छोटे-मोटे मामले शामिल होते हैं। उनमें लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं में मौजूद कोई महान, अग्रणी कारनामे या प्रशंसा के योग्य नेक कार्य शामिल नहीं लगते; देहधारी परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ बहुत ही आम और बहुत ही साधारण होती हैं। ठीक इसलिए कि देहधारी परमेश्वर इस साधारण, भ्रष्ट मानवजाति के बीच रहता है, उसकी ये सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ एक लिहाज से परमेश्वर के देहधारी शरीर की मानवता की अपरिहार्य अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरे लिहाज से मानवजाति के बीच रहने वाले देहधारी परमेश्वर की एक सामान्य आवश्यकता हैं। बेशक, ये सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ लोगों को परमेश्वर को जानने के संबंध में कुछ जानकारी या मार्ग भी प्रदान करती हैं। लोगों के बीच देहधारी परमेश्वर के व्यावहारिक जीवन यापन और स्व-आचरण के व्यावहारिक सिद्धांतों के माध्यम से, ये लोगों को परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जानने में और स्वर्गिक परमेश्वर को भी जानने में समर्थ बनाते हैं, जिससे वे स्वर्गिक परमेश्वर को अधिक सटीकता से समझ पाते हैं और पृथ्वी पर एक सामान्य, साधारण व्यक्ति के रूप में उसके सार को सटीकता से समझ पाते हैं।

कुछ लोग कहते हैं, “देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता से जुड़ी जिन चीजों और उदाहरणों के बारे में तुम बात करते हो, वे सभी बहुत साधारण हैं; वे सभी दैनिक जीवन की बहुत ही नगण्य और मामूली चीजें हैं। क्या तुम कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में बात कर सकते हो, जो रहस्यमय और अथाह महसूस होते हों या जो बहुत भव्य लगते हों?” इस पर मैं कहता हूँ, अब तक वास्तव में ऐसे कोई तथ्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता की वास्तविकता में और एक विशिष्ट जीवन परिवेश में रहता है और स्वयं परमेश्वर का कार्य करने के अलावा वह अपना बाकी समय अपनी सामान्य मानवता के जीवन के दायरे में भाई-बहनों के साथ मिलने-जुलने या कलीसिया में कुछ छोटी-मोटी समस्याएँ सँभालने में बिताता है। इसलिए, उन उदाहरणों के अलावा जिन पर हमने संगति की थी, जो उसके आचरण और कार्य करने के सिद्धांतों और उसूलों से जुड़े हैं, वह कोई ऐसा महान, अग्रणी कारनामा या असाधारण कार्य नहीं करता जिसकी तुम लोग कल्पना करते हो। यह लोगों के लिए अप्रत्याशित हो सकता है और शायद यह लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप न हो, लेकिन वास्तव में चीजें ऐसी ही हैं। देहधारी परमेश्वर के विषय पर हमारी संगति मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में उसकी कुछ अभिव्यक्तियों, जीवन-यापन, और स्व-आचरण और कार्य करने के विशिष्ट सिद्धांतों से संबंधित रही है। यह दुनिया में महान हस्तियों और प्रसिद्ध लोगों के कर्मों का वर्णन करने के तरीके से अलग है। जब दुनिया में लोग किसी महान, प्रसिद्ध या असाधारण हस्ती के बारे में बात करते हैं, तब वे हमेशा इस बारे में बात करते हैं कि वह कितना अद्वितीय, असाधारण और महान है, और वे उसके करिश्मे के बारे में बात करते हैं, मुख्य रूप से इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि वह कितना उच्च और भव्य है। लेकिन देहधारी परमेश्वर के बारे में हम जो बात करते हैं, वह उसके बिल्कुल विपरीत होता है जो दुनिया उन असाधारण हस्तियों और महान लोगों के बारे में कहती है। हम मुख्य रूप से इस बारे में बात करते हैं कि देहधारी परमेश्वर कैसे सामान्य, व्यावहारिक, साधारण है, और असाधारण नहीं है। हम केवल ठोस उदाहरणों के बारे में बात करते हैं—वह भी दैनिक जीवन के छोटे-मोटे उदाहरणों के बारे में—इस बारे में बात करते हैं कि उसके आचरण और कार्य करने में शामिल सिद्धांत और दृष्टिकोण क्या हैं। आचरण और कार्य करने के ये विचार और दृष्टिकोण, सिद्धांत और तरीके सब सामान्य मानवता के जमीर और विवेक पर आधारित हैं। हम मुख्य रूप से इस बारे में बात करते हैं कि वह कैसे आचरण करता है और कैसे कार्य करता है। हालाँकि, दुनिया में बहुत कम लोग इस बारे में बात करते हैं कि आचरण कैसे किया जाए। अगर कुछ लोगों ने इस विषय पर बात की भी है तो वे कई विशिष्ट उदाहरण नहीं दे पाए हैं, आचरण के कोई सिद्धांत व्यक्त कर पाना तो दूर की बात है। वे इस बारे में बात नहीं करते कि प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों के पास आचरण और कार्य करने में कौन-से सकारात्मक सिद्धांत, सकारात्मक तरीके या सही विचार और दृष्टिकोण हैं। वे केवल अपनी उपलब्धियों, प्रतिभा और सीख, गुणों और जज्बे के बारे में बात करते हैं, और वे इस बारे में बात करते हैं कि अपनी उपलब्धियों, प्रतिभा और सीख, गुणों और जज्बे के कारण वे मानवजाति के बीच किस तरह का प्रमुख स्थान रखते हैं। वे जिस बारे में बात करते हैं, वह देहधारी परमेश्वर द्वारा धारण और वहन की गई उस सामान्य मानवता के बिल्कुल विपरीत है, जिस पर हम आज संगति कर रहे हैं। परमेश्वर का देहधारी शरीर तुम लोगों को जो जानने और समझने देता है, वे आचरण और कार्य करने के वे सिद्धांत और मत हैं जो उसकी सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर जिए जाते हैं और जो उसमें मौजूद हैं। आचरण और कार्य करने के ये सिद्धांत और उसूल उस मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के पूरी तरह अनुरूप हैं, जिसे वह बचाना चाहता है। परमेश्वर का देहधारी शरीर ऐसी मानवता रखता है और इस सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर—आचरण और कार्य करने के अपने सिद्धांतों और उसूलों के साथ—वह विभिन्न विचार और दृष्टिकोण रखता है। सिर्फ यही वजह है कि वह स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है और वह कार्य और सेवकाई पूरी कर सकता है जिसे देहधारी परमेश्वर को इस युग में, ऐसी मानवता के भीतर अच्छी तरह से करना चाहिए, कि वह मानवजाति को उस प्रतिनिधि स्वभाव से पूरी तरह अवगत करा सकता है जिसे परमेश्वर इस युग में व्यक्त करना चाहता है, और—बेशक—सत्य व्यक्त करने के उस कार्य के लिए पूरी तरह से सक्षम हो सकता है जिसे परमेश्वर कार्य के इस चरण में करना चाहता है। यदि परमेश्वर के देहधारी शरीर द्वारा जिया गया, प्रकट किया गया और उसमें मौजूद मानवता सार यह सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता न होता जिस पर हम संगति करते रहे हैं या यदि उसके पास आचरण के ये सिद्धांत और उसूल न होते जिन पर हम संगति करते रहे हैं, बल्कि इसके बजाय उसके पास उन प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों का मानवता सार होता जिनके बारे में गैर-विश्वासी बात करते हैं और जिनका वे आदर करते हैं, तो इसका क्या परिणाम होता? (वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने के लिए हमारी अगुआई न कर पाता।) इसके परिणामस्वरूप एक बिल्कुल अलग स्थिति उत्पन्न हो जाती। मान लो परमेश्वर के देहधारी शरीर में किसी गैर-विश्वासी महान हस्ती या प्रसिद्ध व्यक्ति का मानवता सार होता—एक ऐसे व्यक्ति का, जो बहुत ऊँचा, असाधारण, अद्वितीय, रहस्यमय और अथाह है। ऐसे व्यक्ति के पास आचरण और कार्य करने की कोई सीमा नहीं होती, वह लगातार झूठ बोलता है और नियमों का पालन करने वाले या शिष्ट तरीके से आचरण या कार्य नहीं करता और अपना स्थान नहीं जानता या कर्तव्यनिष्ठा से कार्य नहीं करता और उसके अनुसरण, विचार और दृष्टिकोण अविश्वासियों के समान ही होते हैं—बस उच्च और भव्य चीजों का अनुसरण करना और खूबियों, ज्ञान और अलौकिक क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करना। ऐसा व्यक्ति तुम लोगों को किस तरह के मार्ग पर ले जाएगा? (वह हमें उद्धार के मार्ग पर नहीं ले जा पाएगा। इसके विपरीत, जो लोग उसका अनुसरण करेंगे, वे केवल अधिकाधिक भ्रष्ट और दुष्ट होते जाएँगे।) ऐसे व्यक्ति में स्व-आचरण के सकारात्मक सिद्धांत नहीं होते; उसके स्व-आचरण के तरीके और सिद्धांत सकारात्मक नहीं, बल्कि शैतानी होते हैं। इस प्रकार, शैतान के इस व्यक्ति के स्व-आचरण के सिद्धांत और उसूल उसके मानवता सार का अत्यधिक प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे मानवता सार वाले व्यक्ति के अनुसरण क्या होते हैं और उसके द्वारा चला गया मार्ग क्या है? वे बिल्कुल शैतान के समान होते हैं। उसके अनुसरण और वह जिस मार्ग पर चलता है, वे सभी शैतान से आते हैं और शैतान के अनुरूप हैं। तो क्या उसके पीछे चलने वाले लोग उसकी अगुआई का पालन नहीं करेंगे, उनके उस जैसे ही अनुसरण नहीं होंगे और वे उसी मार्ग पर नहीं चलेंगे? (हाँ।) वे लोग उसकी अगुआई का अनुसरण करेंगे, उसके स्व-आचरण के सिद्धांतों की नकल करेंगे और उसकी तरह ज्ञान, रुतबे, अलौकिकता और उच्च और भव्य चीजों के लिए, हर उस चीज के लिए जो असाधारण है और हर उस चीज के लिए जो लोगों को रहस्यमय और अथाह लगती है, प्रयास करेंगे। ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करके कोई भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता; इसके बजाय, वे अधिकाधिक पतित होते जाएँगे। ऐसे समूह को कलीसिया नहीं कहा जा सकता, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि वे सभी परमेश्वर के कार्य से अलग हो चुके होंगे और उनमें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जिस अगुआ का वे अनुसरण करते हैं, वह परमेश्वर द्वारा स्थापित नहीं होगा, परमेश्वर द्वारा भेजा गया तो बिल्कुल भी नहीं होगा। भले ही वे सभी खुद को कलीसिया कहें, इसका कोई फायदा नहीं होगा; परमेश्वर उन्हें अनदेखा कर देगा। चाहे वे सभी खुद को कितना भी कलीसिया कहें, परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं करेगा और पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं करेगा। वह अगुआ लोगों को वही करना सिखाएगा जो उसे पसंद है; वह लोगों को वही प्रदान करेगा जो उसके भीतर मौजूद है, और लोग उससे वही प्राप्त करेंगे। उसके पास सत्य नहीं होता और वह लोगों को कोई सकारात्मक चीजें प्रदान नहीं कर सकता या उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन नहीं दे सकता, इसलिए लोगों के लिए उससे सत्य प्राप्त करना असंभव होगा। अधिक से अधिक, लोग केवल थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्त कर पाएँगे और गैर-विश्वासियों की दुनिया से कुछ पेशेवर कौशल या किसी विशेष क्षेत्र में कुछ क्षमताएँ ही उससे सीख पाएँगे। संक्षेप में, ऐसा कोई व्यक्ति, जिसमें सामान्यता और व्यावहारिकता नहीं है या जिसमें उसके जीवन के रूप में दिव्य सार नहीं है, उसे देहधारी परमेश्वर नहीं कहा जा सकता; वह लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकता, न ही वह लोगों को उद्धार के मार्ग पर ले जा सकता है। इन तथ्यों को देखते हुए, मानवजाति के बीच, क्या परमेश्वर के देहधारी शरीर के अलावा कोई ऐसा है, जो परमेश्वर का कार्य करने के लिए उसका प्रतिनिधित्व कर सके? (नहीं।) क्या कोई ऐसा है, जो मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभावों से बचाने के लिए परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सके? (नहीं।) साधारण मानवजाति के किसी भी सदस्य में जो जीवन और मानवता सार है, वह लगभग एकसमान ही है—ऐसे जीवन और मानवता सार को शैतान द्वारा पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया है; लोगों के लिए उनके भ्रष्ट स्वभाव उनका जीवन हैं। इस प्रकार, चाहे लोगों की मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या लोगों के जीवन सार के परिप्रेक्ष्य से, पूरी मानवजाति में से एक भी व्यक्ति देहधारी परमेश्वर के इस कार्य के लिए सक्षम नहीं है, न ही भ्रष्ट मानवजाति को भ्रष्टता से बचाने के लिए कोई भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। स्वाभाविक रूप से, ये तथ्य लोगों को यह भी बताते हैं : कोई भी भ्रष्ट मनुष्य मानवजाति को यह नहीं बता सकता कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, और कोई भी भ्रष्ट मनुष्य लोगों को यह नहीं बता सकता कि सत्य क्या है या परमेश्वर के इरादे वास्तव में क्या हैं। भ्रष्ट मनुष्य अन्य लोगों को केवल ज्ञान प्रदान करते हैं, साथ ही वे भ्रष्ट मानवजाति द्वारा अनुसरण किए जाने वाले विभिन्न कौशल, क्षमताएँ या गुण, और स्व-आचरण और कार्य करने के विभिन्न हथकंडे, सांसारिक आचरण के फलसफे और शैतान से आने वाले विभिन्न विचार और दृष्टिकोण भी प्रदान करते हैं। सभी जातियों के मनुष्यों में एक समान विशेषता होती है। यह समान विशेषता क्या है? वे सभी अपने बीच की अपेक्षाकृत सकारात्मक या अपेक्षाकृत नेकनीयत, रूढ़िवादी और पारंपरिक चीजों को सकारात्मक चीजें मानते हैं और सत्य तथा परमेश्वर के इरादों को उनसे बदलने का प्रयास करते हैं। लोग मानते हैं कि इन चीजों को पकड़े रहने से उन्होंने सच्चा मार्ग प्राप्त कर लिया है और वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में, इन चीजों का मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है। देखो, मानवजाति के बीच, लोग चाहे कितने भी चतुर हों, उनके गुण चाहे कितने भी महान हों या वे कितने भी प्रतिभाशाली और ज्ञानी हों या बाहर से उनकी मानवता कितनी भी दयालु और परोपकारी लगे, एक भी व्यक्ति सत्य नहीं समझ सकता और एक भी व्यक्ति यह भेद नहीं पहचान सकता कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं। परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने से पहले और परमेश्वर द्वारा अपने वचन व्यक्त करने से पहले लगभग हर कोई परंपरागत संस्कृति को एक सकारात्मक चीज मानता था और कुछ लोग तो परंपरागत संस्कृति को सत्य के रूप में पूजते भी थे। इसलिए, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो, यदि देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता के भीतर ये सत्य व्यक्त न करे और यह कार्य न करे, बल्कि इसके बजाय मानवजाति का कोई सदस्य यह कार्य करे, तो वह केवल लोगों को एक ऐसे मार्ग पर ले जाएगा जो परमेश्वर के वचनों और इरादों से हटकर होगा।

आओ, एक सरल उदाहरण देखें। यदि लोगों से किसी नृत्य कार्यक्रम के लिए पोशाकें चुनने के लिए कहा जाए, तो वे कैसे चुनेंगे? सिद्धांत रूप में, हर कोई जानता है कि जब परमेश्वर में विश्वास करने वाले कोई नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, विशेष रूप से ऐसे वीडियो के लिए जिसे ऑनलाइन प्रकाशित किया जाएगा, तब उनके द्वारा पहने जाने वाले कपड़े और उनका व्यवहार परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए, चुनी गई पोशाकें अजीबोगरीब नहीं बल्कि गरिमापूर्ण और शालीन होनी चाहिए। जब गरिमापूर्ण और शालीन होने की बात आती है तो इसमें बहुत कुछ शामिल होता है। लोगों की धारणाओं के अनुसार किस तरह के कपड़े गरिमापूर्ण और शालीन माने जाते हैं? ये वे कपड़े हैं जिन्हें विभिन्न जातीय समूह सबसे आम तौर पर पहनते हैं, ऐसे कपड़े जो अपेक्षाकृत परंपरागत और रूढ़िवादी हैं और सभी को उचित लगते हैं। ये अजीबोगरीब या अत्यधिक फैशनेबल नहीं होते। इसे ही लोग, अपनी धारणाओं के अनुसार, गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े मानते हैं। कार्यक्रमों के लिए पोशाकें चुनने के संबंध में कलीसिया में अधिकांश भाई-बहनों के क्या विचार हैं? देखो, कोई फिल्म बनाते समय, पोशाकों के प्रभारी व्यक्ति के विचार वास्तव में अधिकांश लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह जो कपड़ों की शैलियाँ चुनता है, वे सब अस्सी और नब्बे के दशक में अधिकांश लोगों द्वारा आम तौर पर पहनी जाने वाली शैलियाँ होती हैं। रंग ज्यादातर नीला, खाकी या स्लेटी होता है, जिनमें केवल इस बात की भिन्नता होती है कि वे कितने गहरे या हल्के हैं। कुल मिलाकर, ये बस वही दो-तीन साधारण रंग होते हैं। वे कुछ चमकीले रंग क्यों नहीं चुनते? लोगों की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर के सभी विश्वासी गरिमापूर्ण और शालीन अच्छे लोग होते हैं, इसलिए उन्हें अपने कपड़ों के लिए ये कुछ सबसे आम, सबसे साधारण रंग ही चुनने चाहिए। देखो, पोशाकों की शैली और रंग चुनने जैसा इतना साधारण मामला लोगों के दिलों में परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में धारणाओं और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को पूरी तरह से उजागर कर देता है। यानी, लोग अपने भीतर एक बहुत ही गंभीर धारणा रखते हैं; कई लोग मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए पुराने तौर-तरीकों पर चिपके रहने और परंपरा बहाल करने की आवश्यकता होती है। उनकी धारणाओं के अनुसार, केवल परंपरागत, पुरानी, पिछड़ी और बासी चीजें ही सकारात्मक चीजें हैं और केवल यही चीजें परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं। क्या अधिकांश लोग ऐसा ही सोचते हैं? (हाँ।) लोगों के दिमाग में यही होता है। सभी लोग उन परंपरागत, पिछड़ी, पुरानी और अप्रचलित चीजों को सकारात्मक चीजों के रूप में परिभाषित करते हैं। इसलिए, कार्यक्रम निर्माण में लोग पोशाकों के रंगों और शैलियों के संबंध में सटीक चुनाव तक नहीं कर पाते, जो कि सबसे सरल और सबसे बुनियादी मामलों में से एक है। वे सभी अपनी धारणाओं का उपयोग करके इस मुद्दे को मापते हैं और बहुत रूढ़िवादी होने के साथ-साथ बहुत मूर्ख और जिद्दी होते हैं। मुझे बताओ, लोगों के मन में परमेश्वर के बारे में कितनी धारणाएँ होंगी! लोगों द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजें और वे चीजें जिन्हें लोग सोचते हैं कि परमेश्वर पसंद करता है, वे सभी लोगों की धारणाओं में कल्पित परंपरागत संस्कृति हैं, या मानवजाति के बीच वे चीजें हैं जिन्हें सांसारिक लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता है और मान्यता दी जाती है; उनका सत्य से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है। तो मुझे बताओ, मैं परंपरावादी हूँ या आधुनिकतावादी? (परमेश्वर न तो परंपरावादी है और न ही आधुनिकतावादी।) कुछ लोग कहते हैं, “तुमने जो संगति की है, उसके माध्यम से हम जानते हैं कि तुम्हें परंपरागत संस्कृति पसंद नहीं है, क्योंकि तुम वर्तमान में रहते हो। कम से कम, तुम परंपरागत नहीं हो और तुम पुराने तौर-तरीकों पर चिपके नहीं रहते।” तुम लोग कहते हो कि मैं परंपरागत नहीं हूँ, तो क्या मैं आधुनिकतावादी हूँ? (नहीं।) तुम कैसे बता सकते हो कि मैं आधुनिकतावादी नहीं हूँ? (आज दुनिया में लोग चलनों के काफी शौकीन हैं, लेकिन परमेश्वर हमें गरिमापूर्ण और शालीन होना सिखाता है, जो चलनों के विपरीत है।) ऐसा नहीं है कि केवल आज के लोग ही चलनों को पसंद करते हैं; प्राचीन काल के लोग भी चलनों को पसंद करते थे। सभी गैर-विश्वासी चलन पसंद करते हैं। चलनों को पसंद करने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति आधुनिकतावादी है। तो इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जाना चाहिए? इस पर थोड़ा विचार करो। क्या तुमने कभी मुझे प्राचीन कपड़े पहने देखा है? क्या मैं परंपरागत कपड़े पहनता हूँ? मैं आधुनिक कपड़े पहनता हूँ। यह देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता से संबंधित है। देहधारी परमेश्वर चाहे जिस भी युग में रहता हो और बुनियादी जरूरतें पूरी करने के मामले में उस युग के लोग विकास के जिस भी स्तर तक पहुँच गए हों, उसकी सामान्य मानवता स्वाभाविक रूप से इसके लिए वही तरीका अपनाती है जो वे अपनाते हैं; वह पीछे की ओर नहीं जाएगा। क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) उसकी सामान्य मानवता में तर्क-बुद्धि है, इसलिए जब बुनियादी जरूरतों की बात आती है, तब वह स्वाभाविक रूप से जानता है कि क्या चुनना उचित है। यह एक पहलू है। दूसरे पहलू से, चाहे परंपरा हो या आधुनिकता, यह कोई रूप नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा के चलन का और एक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है। तो क्या परंपरा सकारात्मक है या आधुनिकता सकारात्मक है? मेरे नजरिये से, दोनों में से कोई भी सकारात्मक नहीं है। दोनों का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है; दोनों शैतान के प्रभाव में भ्रष्ट मानवजाति द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। चाहे परंपरागत विचार और दृष्टिकोण हों या आधुनिक विचार और दृष्टिकोण, जो कुछ भी परमेश्वर से नहीं आता, वह एक नकारात्मक चीज है, सकारात्मक चीज नहीं। चाहे परंपरागत बुनियादी आवश्यकताएँ हों या आधुनिक बुनियादी आवश्यकताएँ, उनका उद्देश्य हमेशा सामान्य मानवता की जरूरतें पूरी करना होता है। देहधारी परमेश्वर चाहे जिस भी युग में जन्म ले, वह सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर रहता है और उसके स्व-आचरण और कार्य करने के सिद्धांत नहीं बदलते। वह जो कुछ भी करता है उसमें और हर चीज के प्रति अपने व्यवहार में वह परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और अपने आंतरिक जीवन स्वभाव से उत्पन्न होने वाले सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; वह परंपरा को संरक्षित या उसका पालन नहीं करता, न ही वह आधुनिकता का पालन करता है या चलनों के पीछे भागता है। इसलिए, अपने अनुयायियों से देहधारी परमेश्वर की अपेक्षाएँ न तो परंपरा पर आधारित हैं और न ही आधुनिकता से प्रभावित हैं। उसके पास जो विभिन्न विचार और दृष्टिकोण या सत्य हैं और जिनकी वह संगति करता है, वे सब परमेश्वर से, परमेश्वर के दिव्य सार और परमेश्वर के जीवन से उत्पन्न होते हैं; उनका परंपरागत संस्कृति या आधुनिक ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है।

परमेश्वर के घर द्वारा तैयार किए गए नृत्य कार्यक्रमों के लिए चुनी गई पोशाकें देखते हुए क्या तुम लोग किन्हीं सिद्धांतों का भेद पहचान पाए हो? वे शैलियाँ और वे रंग क्यों चुने गए? यदि तुम लोग यहाँ सिद्धांतों को समझ सकते हो, तो तुम लोग सचमुच थोड़ा सत्य समझते हो और तुममें आध्यात्मिक समझ है; यदि तुम इतने सरल मामले में भी सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, तो तुम एक भ्रमित व्यक्ति हो जिसकी काबिलियत बहुत खराब है और इतने वर्षों तक उपदेश सुनने के बावजूद तुम सत्य नहीं समझे हो। पहले तो, जब हम नृत्य कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले कपड़े परंपरागत होते हैं या आधुनिक? (वे आधुनिक होते हैं।) वे सभी आधुनिक कपड़े होते हैं—वह भी साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें। कुछ लोग नहीं समझते और कहते हैं, “हमारे नृत्य कार्यक्रम कलात्मक कार्यक्रम होते हैं, तो कलाकार मंच की पोशाकों के बजाय केवल साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें क्यों पहनते हैं? सलमा-सितारे जड़ी पोशाकें खासकर शानदार होती हैं। उन राष्ट्रीय स्तर की नृत्य मंडलियों द्वारा मंच पर पहनी जाने वाली पोशाकें देखो—वे शानदार, उत्कृष्ट और शाही होती हैं और जब उन पर रोशनी पड़ती है तो वे चौंधियाने वाली लगती हैं। जब हम कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब यदि हमारे कलाकार भी ऐसी ही पोशाकें पहनें, तो क्या इससे वे बेहतर नहीं दिखेंगे और परमेश्वर को अधिक महिमामंडित नहीं करेंगे? क्या यह परमेश्वर के घर की शक्ति बेहतर ढंग से प्रकट नहीं करेगा और गैर-विश्वासियों या धार्मिक लोगों को परमेश्वर के घर की ताकत बेहतर ढंग से देखने नहीं देगा?” क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) सबसे पहले मुझे यह बताओ—जब हम नृत्य कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब कलाकार शानदार पोशाकों के बजाय साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें क्यों पहनते हैं? (यदि नाचते समय सभी भाई-बहन बहुत शानदार पोशाकें पहनते हैं, तो दर्शक कपड़ों पर और इस बात पर ध्यान केंद्रित करेंगे कि कलाकार कैसे दिखते हैं। लेकिन यदि वे साधारण कपड़े पहनते हैं और गरिमापूर्ण और शालीन लोगों की तरह दिखते हैं, तो दर्शक इन बाहरी चीजों से आकर्षित नहीं होंगे और अपना मन परमेश्वर के वचनों पर केंद्रित करेंगे।) तुम एक चीज के बारे में सही हो—शानदार पोशाकें न पहनना लोगों को बाहरी रस्मों और बाहरी दिखावे पर ध्यान केंद्रित करने से रोकने के लिए है। एक बात और भी है, जो सबसे महत्वपूर्ण है : चाहे नाचना हो या गाना, जब हम कार्यक्रम तैयार करते हैं, तो उसका क्या उद्देश्य होता है? (परमेश्वर की गवाही देना।) यही एकमात्र लक्ष्य है। चाहे नाचना हो या गाना, यह सब परमेश्वर की गवाही देने के लिए होता है। यह किसी व्यक्ति को विशिष्ट रूप से दर्शाने के लिए नहीं होता, न ही यह किसी को प्रसन्न करने के लिए होता है; यह केवल परमेश्वर की गवाही देने के लिए होता है। इसलिए, कलाकारों के लिए ऐसे सरल, अच्छी फिटिंग वाले, गरिमापूर्ण और शालीन और सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनना पर्याप्त है, जो परमेश्वर की गवाही देने का उद्देश्य हासिल करते हों। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, वे प्रकृति से मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होते। मनोरंजन कार्यक्रम क्या होते हैं? मनोरंजन कार्यक्रम वे चीजें हैं, जिन्हें लोग अपने खाली समय में मनोरंजन के लिए देखते हैं; वे केवल लोगों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं। जब लोग आराम करते हैं, तब वे मजे करने, आराम करने, खुश महसूस करने, अपनी चिंताएँ भुलाने और तनाव दूर करने के लिए कोई कार्यक्रम देखते हैं। उसके बाद, जो भी काम उन्हें करना होता है, वापस उसे करने चले जाते हैं, बिना इस पर ज्यादा सोचे या बिना इसके बारे में कोई भावना रखे। मनोरंजन कार्यक्रम ऐसे ही होते हैं। हम जो कार्यक्रम करते हैं, उनके बारे में क्या? रूप के लिहाज से वे मनोरंजन हैं, लेकिन सार में वे जनता को प्रसन्न करने के लिए नहीं हैं, न ही वे कलात्मक कौशल दिखाने के लिए हैं। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका लक्ष्य परमेश्वर की गवाही देना है। उदाहरण के लिए, भजन कार्यक्रम तैयार करते समय परमेश्वर के वचनों के भजनों का उद्देश्य परमेश्वर के वचनों के सत्य की गवाही देना और उसका प्रसार करना होता है, जिससे लोग परमेश्वर के सामने आने में सक्षम बनें; अनुभवजन्य भजनों का उद्देश्य परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त प्रभावों की और परमेश्वर के कार्य ने लोगों में जो परिणाम उत्पन्न किए हैं, उनकी गवाही देना है। संक्षेप में, हम चाहे किसी भी प्रकार के कार्यक्रम तैयार करें, वे विशुद्ध रूप से मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होते। उनका उद्देश्य लोगों का ध्यान खींचना या लोगों को समय बिताने और मनोरंजन करने में मदद करना नहीं होता, कलात्मक कौशल दिखाना तो और भी नहीं होता। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका केवल एक ही लक्ष्य होता है, जो कि परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना और परमेश्वर के कार्य की गवाही देना है, जिससे अधिक लोगों को यह पता चले कि परमेश्वर ने देह धारण कर लिया है और कार्य का एक नया चरण करता रहा है, जिससे अधिक लोगों को यह पता चले कि परमेश्वर के कार्य ने पहले ही लोगों के एक समूह को प्राप्त कर लिया है और यह कि परमेश्वर अब कार्य कर रहा है और बोल रहा है। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका यही एकमात्र उद्देश्य होता है। चूँकि हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका उद्देश्य यही होता है, इसलिए यदि लोग शानदार कपड़े पहनते हैं और भारी मेकअप करते हैं और हर तरह के रूप धारण करते हैं, तो क्या यह परमेश्वर की गवाही देने के लक्ष्य के विपरीत नहीं है? (हाँ।) यह एक टकराव है। इसलिए हम इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करते कि कलाकार क्या पहनते हैं। वह एकमात्र चीज क्या है, जिस पर हम ध्यान केंद्रित करते हैं? हम केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि कार्यक्रम जो कुछ प्रस्तुत करते हैं—भाई-बहनों का व्यवहार, नृत्य की मुद्राएँ और कार्यक्रमों का रूप—क्या वे लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं और क्या वे लोगों को उन्हें पसंद करने और उनमें रुचि लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जिससे लोगों पर अनुकूल प्रभाव पड़े और उन्हें परमेश्वर के कार्य की जाँच करने, परमेश्वर के वचन स्वीकार करने और भाई-बहनों के साथ मिलकर भजन गाने और परमेश्वर की आराधना करने के लिए इच्छुक होने में मदद मिले—यही वह उद्देश्य है, जिसे हम हासिल करना चाहते हैं। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए, जहाँ तक कलाकारों की पोशाकों और उनके दिखने का संबंध है, उन्हें बस गरिमापूर्ण और शालीन, साफ और सुथरा दिखना चाहिए और उनका व्यवहार बहुत अच्छा होना चाहिए; जहाँ तक बाकी चीजों का संबंध है—शानदार पोशाकें, भारी मेकअप और सभी प्रकार के रूप—उन सभी के नकारात्मक प्रभाव होते हैं। क्या नकारात्मक प्रभाव? यदि सभी नाचने वाली बहनें दिव्य कन्याओं की तरह सजी-धजी हों और सभी भाई सुंदर लड़कों या अमीर वारिसों की तरह सजे-धजे हों, तो जब लोग इसे देखेंगे, तब वे सोचेंगे, “तुम लोग दिखावा कर रहे हो। क्या तुमने बुरे इरादे नहीं पाल रखे हैं? क्या तुम लोगों को लुभा नहीं रहे हो?” यदि लोगों के मन में ये विचार आते हैं, तो यह अच्छा नहीं है। भाई-बहन गरिमापूर्ण और शालीन, और सुरुचिपूर्ण और उचित तरीके से कपड़े पहनते हैं। हालाँकि, कुल मिलाकर, शायद वे सुरुचिपूर्ण न दिखें, लेकिन वे बहुत साफ, सुथरे, गरिमापूर्ण और शालीन होते हैं। जब लोग उन्हें देखते हैं, तो वे देखते हैं कि इन लोगों का व्यवहार अच्छा है, ये परमेश्वर में विश्वास करने वाले हैं और ये जो कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं वह परमेश्वर की गवाही देने वाला है, न कि कोई कुटिल या बुरी चीज। देखो, गैर-विश्वासियों के कार्यक्रम केवल आँखें मटकाने, हवा में चुंबन उछालने या कलाकारों के शरीर दिखाने वाले होते हैं। नाचते समय कलाकार अपनी कला दिखाने के अलावा अपने आकर्षण का भी दिखावा करते हैं, ज़रा-सा भी सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान नहीं करते। इसके विपरीत, हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, वे पूरी तरह से सकारात्मक मार्गदर्शन देते हैं। यदि दर्शक अनुचित विचार रखना भी चाहें, तो भी उन्हें ऐसा करने का कोई अवसर या गुंजाइश नहीं मिलती। यदि वे कलाकारों के शरीर और चेहरे के नैन-नक्श देखना चाहें, तो वे उन्हें अच्छी तरह से नहीं देख सकते; यदि वे देखना चाहें कि कौन अपने आकर्षण का दिखावा कर रहा है तो वे वह भी नहीं देख सकते। वे केवल एक ही भाव देखते हैं—मुस्कान—जो पूरी तरह से गरिमापूर्ण और शालीन आचरण प्रस्तुत करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे कार्यक्रम दिखावा करने या किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं होते, बल्कि परमेश्वर की गवाही देने के लिए होते हैं; यह एक मुख्य सिद्धांत है। इसके अलावा, हमने नृत्य मंडली के लिए जो कपड़ों की शैलियाँ चुनीं—टी-शर्ट, स्वेटशर्ट और स्वेटपैंट—लोग उनमें नाचते हुए काफी आराम महसूस कर सकते हैं, लेकिन कुछ युवा लोगों को अपनी पसंद के आधार पर हो सकता है वे वास्तव में पसंद न आएँ। उन्हें लगता है कि ये शैलियाँ बहुत साधारण हैं, कि ये बस रोजमर्रा के आम कपड़े हैं, ऐसे कपड़े जिन्हें तुम घर में पहनते हो, लेकिन गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े ठीक ऐसे ही होते हैं। टी-शर्ट, स्वेटशर्ट और स्वेटपैंट आजकल कैजुअल परिधानों की सबसे आम शैलियाँ हैं। हम इन शैलियों को क्यों चुनते हैं? मैंने देखा है कि कैजुअल परिधानों की इस शैली को पहली बार आए हुए शायद अब तक कम से कम कई दशक हो चुके हैं। हम अब अपने कार्यक्रमों के लिए यह शैली इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए चुनते हैं कि अगले कुछ दशकों में भी यह पुरानी या अप्रचलित नहीं होगी। इसके अलावा, यह शैली सभी आयु-समूहों और सभी सामाजिक वर्गों के लोगों के लिए उपयुक्त है; चाहे वे आम लोग हों या उच्च वर्ग के लोग, वे सभी अपने दैनिक जीवन में घर पर ऐसे ही कपड़े पहनते हैं। इसके अलावा, ये कपड़े ढीले और नाचने के लिए आरामदायक होते हैं। इस प्रकार, हमने अंततः मंच की पोशाकों के लिए कपड़ों की इस शैली का निर्णय लिया। मंच पर इन्हें पहनने वाले लोग इन्हें पसंद करें या न करें, यह शैली मंच के लिए उपयुक्त है; यानी, न तो दर्शक और न ही पहनने वाले ऐसे कपड़ों में कोई गलती निकाल सकते हैं। हो सकता है, पहनने वाले कहें, “तुमने हमारे लिए जो ये कपड़े चुने हैं, ये बहुत फैशनेबल नहीं हैं; मैं अपने दैनिक जीवन में ऐसे कपड़े बिल्कुल नहीं पहनूँगा।” इस पर मेरा उत्तर यह है कि तुम अपने दैनिक जीवन में क्या पहनते हो, मैं उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। तुम क्या पहनते हो और तुम्हें क्या पसंद है, यह दर्शाता है कि तुम कौन हो; वे तुम्हारी मानवता और सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि तुम्हें सरल, सुरुचिपूर्ण, गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े पसंद नहीं हैं, बल्कि इसके बजाय अजीबोगरीब कपड़े पसंद हैं, तो तुम काफी अपरंपरागत हो। यदि तुम्हें अपनी छाती और पीठ दिखाना, अपने बाल खुले रखना और बड़े धूप के चश्मे पहनना पसंद है और तुम हमेशा किसी बड़ी हस्ती की तरह व्यवहार करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हो। तुम्हें गरिमापूर्ण और शालीन होना पसंद नहीं है; कम से कम, तुम मेरे साथ असंगत हो। गरिमापूर्ण और शालीन होना, और सुरुचिपूर्ण और उचित होना—कपड़ों की शैलियाँ चुनने का यही सिद्धांत है। तो कपड़ों के रंग कैसे चुने जाने चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “सफेद रंग पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है, हरा रंग जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, लाल रंग उत्सव का प्रतिनिधित्व करता है और पीला रंग मित्रता का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए हमें बस ये रंग ही चुनने चाहिए।” मैं कहता हूँ कि यह कोरी बकवास है; रंग किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। तो कौन-से रंग पहनने चाहिए, इसका सिद्धांत क्या है? यह बहुत सरल है; केवल एक ही सिद्धांत है : वह कैमरे पर साफ-सुथरा दिखना चाहिए। खासकर, कुछ रंग अत्यधिक चमकीले और काफी उजले होते हैं, और लोग अपने दैनिक जीवन में उन्हें शायद ही कभी पहनते हों, लेकिन हमने इन रंगों को इनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले मंच प्रभाव और दृश्य प्रभाव के लिए चुना। एक लिहाज से, ये रंग अपेक्षाकृत अत्यधिक चमकीले और उजले हैं, इसलिए इनके द्वारा प्रदान किया जाने वाला मंच प्रभाव अच्छा होता है। दूसरे लिहाज से, इनमें से अधिकांश रंग बहुत अजीब नहीं हैं; कोई भी रंग फीका नहीं है और कोई भी ऐसा नहीं है जिससे लोगों को अरुचि हो, इसलिए इस तरह से बनाए गए वीडियो का प्रभाव अच्छा होता है।

मैंने अभी जिन चीजों पर संगति की, वे नृत्य कार्यक्रमों की पोशाकें चुनने के सिद्धांत थे। इनमें से कौन-से पहलू तुम लोगों ने स्पष्ट रूप से देखे हैं? मुझे बताओ, मैंने जिन सिद्धांतों पर विचार किया है, क्या वे उचित हैं? (हाँ।) यह मुख्य रूप से परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर को कलंकित न करने और सर्वोत्तम परिणाम हासिल करने के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमता है, है ना? (हाँ।) क्या इसका कोई ऐसा पहलू है, जो विरूपित या चरम हो? (नहीं।) क्या इसमें पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहने का कोई तत्त्व है? (नहीं।) यह किसी भी तरह से विरूपित या पुराने तौर-तरीकों से चिपका हुआ नहीं है। तो पोशाकें चुनने के हमारे ये सिद्धांत परंपरा का पालन करते हैं या ये आधुनिकता का पालन करते हैं? (ये न तो परंपरा का पालन करते हैं और न ही आधुनिकता का; हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, अगर वे परमेश्वर की गवाही देने का परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, तो यह सबसे अच्छा है।) तुम लोग अंततः समझ गए हो; इन कार्यक्रमों का उद्देश्य परमेश्वर की गवाही देना है, और कुछ नहीं। परमेश्वर की गवाही देने के लिए यह विचार करने की आवश्यकता है कि हमें परमेश्वर को कलंकित बिल्कुल नहीं करना चाहिए या परमेश्वर के घर को बुरा नहीं दिखाना चाहिए। बेशक, हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि पोशाकों का कपड़ा और शैली पहनने में आरामदायक होनी चाहिए। यानी, कोई भी गरिमापूर्ण और शालीन व्यक्ति जो तुम्हें ये कपड़े पहने हुए देखे, उन्हें यह स्वीकार्य लगेगा, उन्हें लगेगा कि तुम परमेश्वर में विश्वास करने वाले की तरह दिखते हो, और कि तुम परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हो, न कि किसी गैर-विश्वासी या किसी फिल्म स्टार या गायक की तरह लगते हो—और एक ही नजर में कोई बता सकता है कि तुम एक गरिमापूर्ण और शालीन व्यक्ति हो। इससे आँकने पर, क्या तुम लोगों को लगता है कि चीजों के प्रति मेरे दृष्टिकोण और अपनी सामान्य मानवता के भीतर मैं जिन सिद्धांतों का पालन करता हूँ वे तुम लोगों के समान हैं? (नहीं।) वे निश्चित रूप से समान नहीं हैं। तो मुझे बताओ, मैं जिन सिद्धांतों का पालन करता हूँ, क्या वे ऊँचे और भव्य हैं? क्या वे असाधारण हैं? वे बिल्कुल भी ऊँचे और भव्य नहीं हैं। वे बहुत सामान्य हैं। मैं जो सिद्धांत अपनाता हूँ और चीजें करने के द्वारा मैं जो परिणाम प्राप्त करना चाहता हूँ, वे सब अत्यधिक व्यावहारिक हैं और मैं कभी दिखावा नहीं करता। यदि हम, तुम सभी लोगों के चीजों को देखने के तरीके के अनुसार चलें, तो कार्यक्रमों के लिए पोशाकें चुनने में हम या तो परंपरागत होंगे और पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहेंगे या सांसारिक चलनों के पीछे चलेंगे। कुछ लोग कहते हैं, “दुनिया में स्मोकी आई मेकअप, नकली पलकें, नथ और बड़े झुमके लोकप्रिय हैं। हमें भी भाई-बहनों को सुंदर और आकर्षक बनाना चाहिए। न केवल उनके कपड़े शानदार होने चाहिए, बल्कि उनका मेकअप भी मोहक होना चाहिए। उन्हें दुनिया के गायकों और फिल्मी सितारों से पीछे नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें और भी उच्चस्तरीय और ठाठदार दिखना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने वालों को उनसे अधिक श्रेष्ठ होना चाहिए, इसलिए कलाकारों को कपड़े पहनाते समय हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।” तो ऐसा क्यों है कि ये कलाकार अंततः एक भी शानदार चीज पहने बिना मंच पर जाते हैं? क्योंकि मैं यहाँ हर चीज की जाँच-परख कर रहा हूँ। आधुनिकतावादी हों या परंपरावादी, उन सभी को किनारे कर दिया गया है—उन्हें अपने “कौशल” दिखाने का कोई अवसर नहीं मिलता। उन्हें मेरे द्वारा रोका गया है। यदि तुम लोग जाँच-परख कर रहे होते, तो क्या तुम लोग इन लोगों को अपने “कौशल” दिखाने का अवसर देते? (नहीं।) क्यों नहीं? (यदि उन्हें अवसर दिया जाता, तो वे पटरी से उतर जाते। वे परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों का पालन नहीं करेंगे।) यदि उन्हें अवसर दिया जाता तो वे कलाकारों को दानवों जैसा तैयार करते। वे ऐसे मनोरंजन कार्यक्रम तैयार करते, जो समाज में लोकप्रिय हैं, परमेश्वर की गवाही देने के उद्देश्य वाले कार्यक्रमों को जनता को प्रसन्न करने वाले मनोरंजन कार्यक्रमों में बदल देते और उनमें काम करने वाले लोगों को दानवों और भूतों जैसा बना देते। क्या तब भी कार्यक्रम देखने लायक होते? कार्यक्रमों की प्रकृति बदल जाती; वे परमेश्वर की गवाही न दे रहे होते बल्कि परमेश्वर को कलंकित कर रहे होते, और वे शापित और प्रतिबंधित किए जाने के लायक होते। यह कर्तव्य निभाना नहीं, बल्कि बुराई करना होता। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) तुम लोग इतने छोटे-से मामले को भी नहीं समझते थे। अब जबकि मैंने इसे अधिक स्पष्ट और सरल तरीके से रखा है तो कुछ लोगों को अचानक एहसास हुआ है : “अच्छा, तो यह बात है। अब मुझे पता चला कि परमेश्वर का घर अपने नृत्य कार्यक्रमों के लिए ऐसी पोशाकें क्यों चुनता है।” चाहे जो भी युग हो, लोगों को किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? वह है, सभी चीजों में परमेश्वर के वचन को सिद्धांत मानना। कार्य की कोई भी मद करते समय या कोई भी मामला सँभालते समय तुम्हारा पहला लक्ष्य लोगों का आत्मिक उन्नयन करना होना चाहिए और तुम्हारा दूसरा लक्ष्य परमेश्वर के कार्य की गवाही देना होना चाहिए। ये दो सिद्धांत हैं। इसलिए, सभी मामलों में ये वे दो सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए। फिर, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के भीतर मौजूद सामान्यता और व्यावहारिकता भी पूरी तरह से इन्हीं सिद्धांतों का पालन करने में निहित है। सिद्धांत नहीं बदलते; देहधारी परमेश्वर न तो परंपरा का पालन करता है और न ही आधुनिकता का। अपनी सामान्य मानवता के भीतर मैं जिस सिद्धांत का पालन करता हूँ, वह जमीर और विवेक के दायरे में आचरण और कार्य करना है। तो परमेश्वर के घर का कार्य करने में मैं किन सिद्धांतों का पालन करता हूँ? वह है मैं जो कुछ भी करता हूँ उसमें लोगों को लाभ पहुँचाना—ऐसी चीजें करना जो उन्हें लाभ पहुँचाएँ और उनका आत्मिक उन्नयन करें। इसके अतिरिक्त, वह परमेश्वर की गवाही देने का कार्य करना है, परमेश्वर की गवाही देने और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करने के सिद्धांतों का पालन करना है। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसा ही है? (हाँ।) इस तरह संगति करने से क्या तुम लोग अब मुझे बेहतर समझते हो? (हाँ।) यदि मैं इन चीजों के बारे में विस्तार से बात न करूँ, तो तुम लोग इनके बारे में स्पष्ट नहीं होगे। तुम लोग इतने साधारण मामले की भी थाह नहीं पा सकते। वास्तव में, यह बिल्कुल भी गहन नहीं है; यह सब बहुत व्यावहारिक और साधारण है। यह कितना साधारण है? यह सामान्य मानवता की तर्क-बुद्धि के अत्यधिक अनुरूप है। यानी, यदि तुममें सामान्य मानवता की तर्क-बुद्धि है, तो तुम इसे समझ सकते हो, लेकिन यदि नहीं है, तो तुम्हारे लिए इसे समझना बहुत कठिन होगा—मुझे इसे स्पष्ट रूप से और पूरी तरह से समझाना होगा, इसे तुम्हें आसान शब्दों में और विस्तार से बताना होगा, ताकि तुम समझ सको कि क्या हो रहा है। यह इतना साधारण मामला है, यह सत्य सिद्धांतों के स्तर तक भी नहीं पहुँचता, फिर भी तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकते। यहाँ चल क्या रहा है? क्या यह मामला गहन और अथाह है? (नहीं।) फिर तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से क्यों नहीं समझा सकते? मोटे तौर पर कहें तो, ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग सत्य नहीं समझते। अधिक विस्तृत स्तर पर, ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों की सामान्य मानवता और तर्क-बुद्धि में कुछ चीजों की कमी है और उनमें दोष हैं। जब गरिमापूर्ण और शालीन होने की बात आती है, तो तुम लोग परंपरा और पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहते हो। जब सामान्य मानवता की बात आती है, तो तुम लोग सोचते हो कि सामान्य मानवता होने का अर्थ निष्कपट होना है, किसी मूर्ख की तरह। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि तुम लोगों की काबिलियत वास्तव में खराब है और तुम लोगों में कोई बोध-क्षमता नहीं है? (हाँ।) असल में यही समस्या है। ठीक है, इस पर इतना ही काफी है।

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