सत्य का अनुसरण कैसे करें (5) भाग एक

परिशिष्ट : अफवाहों के साथ कैसे पेश आएँ

क्या हाल ही में कुछ लोगों ने कुछ नकारात्मक अफवाहें सुनी हैं? (हाँ।) जब तुम लोगों ने ये अफवाहें सुनीं तब तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया थी? क्या तुम डर गए थे? क्या तुम जिज्ञासु थे? क्या तुम लोग जानना चाहते हो कि ये अफवाहें आखिर किस बारे में हैं? (हम नहीं जानना चाहते, क्योंकि हम पहले से ही जानते हैं कि बड़ा लाल अजगर अक्सर हवा-हवाई अफवाहें गढ़ता है। चाहे वह कुछ भी कहे, वह झूठा ही होता है। इसलिए, हमें इन अफवाहों के विवरण में कोई दिलचस्पी नहीं है और हम उसके शैतानी शब्दों को समझने का प्रयास नहीं करना चाहते।) बड़ा लाल अजगर लोगों को गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए सभी तरह की अफवाहें गढ़ता है और बहुत-से लोग ये अफवाहें सुनने के बाद गुमराह हो जाते हैं। कुछ लोग डर जाते हैं और सच्चे मार्ग को स्वीकारने की हिम्मत नहीं करते हैं; जिन कुछ लोगों ने इसे स्वीकार लिया है, वे भी संदेहपूर्ण हो जाते हैं और परमेश्वर में अब और विश्वास नहीं रखना चाहते हैं। बड़े लाल अजगर की अफवाहें सुनने से पहले ऐसा लगता था कि ये लोग बिना किसी संदेह के परमेश्वर में आस्था रखते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य करने के इच्छुक हैं। लेकिन अफवाहें सुनने के बाद उनमें तुरंत संदेह जन्म ले लेते हैं और उनका परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य करने का अब और दिल नहीं करता है। विशेष रूप से, बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों में से कुछ लोग उसकी क्रूर यातनाओं के दबाव में आकर हार मान लेते हैं और परमेश्वर का नाम नकार देते हैं और यहाँ तक कि उनमें से कुछ लोग “तीन कथनों” पर हस्ताक्षर कर देते हैं, और उन्हें मौखिक रूप से परमेश्वर का अपमान करने के लिए भी मजबूर किया जाता है। ऐसे लोग बहुत सारे हैं। तुम सभी ने ढेरों अफवाहें और नकारात्मक प्रचार सुने हैं और यह भी देखा है कि जब बड़ा लाल अजगर परमेश्वर में विश्वासी लोगों को गिरफ्तार कर लेता है, उसके बाद वह उनकी बुद्धि भ्रष्ट करता है—सचमुच बहुत सारे लोग गुमराह हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त, वह अपनी सेवा करवाने के लिए परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने वालों का उपयोग भी करता है, उनसे कलीसिया की निगरानी करवाता है और परमेश्वर में विश्वासियों का पीछा और खुफिया निगरानी करवाता है। धार्मिक विश्वास को जड़ से उखाड़ने और परमेश्वर की कलीसिया को हटाने के लिए बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के चुने हुए लोगों के दमन और गिरफ्तारी को एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य, एक राजनीतिक मिशन मानता है और इसे बड़ी संपूर्णता और मेहनत से अंजाम देता है। इससे परमेश्वर के कई विश्वासी डर जाते हैं, इसलिए वे परमेश्वर में विश्वास रखने की हिम्मत नहीं करते हैं और अपना कर्तव्य करने की हिम्मत नहीं करते हैं। विशेष रूप से, बड़े लाल अजगर द्वारा गढ़ी गई अफवाहें सुनने के बाद बहुत-से लोग गुमराह हो जाते हैं। जहाँ तक इन अफवाहों का प्रश्न है, परमेश्वर के घर ने बहुत पहले ही इनका सारांश प्रस्तुत कर दिया है और इनके भेद की पहचान करवा दी है, इसलिए यहाँ उन पर चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर तुम सच में गिरफ्तार किए जाते हो और बड़ा लाल अजगर इन अफवाहों का उपयोग तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट करने का प्रयास करने के लिए करता है, तुम्हें एक रुख अपनाने के लिए मजबूर करता है और तुम्हें “तीन कथनों” पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करता है तो तुम्हें क्या करना चाहिए? अब तुम लोगों को यह पता है कि बड़े लाल अजगर द्वारा गढ़ी गई सभी अफवाहें झूठी, भ्रामक और छलपूर्ण होती हैं। हालाँकि तुम लोगों का रवैया उन्हें नहीं सुनने, उनकी तरफ नहीं देखने और उन पर विश्वास नहीं करने का है, फिर भी अगर ये अफवाहें तुम्हारे सामने रख दी जाएँ जिससे वे तुम्हें सुनाई दें, दिखाई दें और यहाँ तक कि तुम यह भी सोचो कि वे तथ्यात्मक हैं तो क्या तुम डोल जाओगे? तुम अपने दिल में क्या सोचोगे? क्या तुम तथ्यों के बारे में सच्चाई जानना चाहोगे? क्या तुम उन्हें सत्यापित करना चाहोगे? जहाँ तक बड़े लाल अजगर द्वारा लोगों को गुमराह करने और भयभीत करने के लिए अफवाहें गढ़ने या लोगों की बुद्धि भ्रष्ट करने और वैचारिक कार्य करने के लिए अफवाहों और नास्तिकता का उपयोग करने का प्रश्न है, क्या हमें लोगों को प्रतिरक्षित करने के लिए सत्य की संगति करने की जरूरत है? क्या यह कार्य की जरूरी मद है? कुछ लोग कहते हैं, “बड़ा लाल अजगर इतने वर्षों से हमारे बारे में, विशेष रूप से मसीह के बारे में, पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किए जाने वाले व्यक्ति के बारे में और कलीसिया और कलीसियाई कार्य के बारे में अफवाहें गढ़ता जा रहा है। हमने कभी उनका स्पष्टीकरण नहीं दिया है, हम कभी अपना रवैया या दृष्टिकोण स्पष्ट करने के लिए आगे नहीं आए हैं, हमने कभी कोई बचाव नहीं किया है—क्या यह उचित है?” कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने से लेकर अब तक बड़े लाल अजगर और धार्मिक दुनिया की विभिन्न अफवाहों का कभी स्पष्ट रूप से भेद नहीं पहचान पाए हैं। उनके दिलों में इन चीजों को लेकर हमेशा एक प्रश्नचिह्न मौजूद रहा है। इस प्रश्नचिह्न का मतलब न तो पूर्ण अविश्वास है और न ही पूर्ण विश्वास; बल्कि इसका मतलब यह है कि वे इन मामलों को देखने के लिए बीच का रुख अपनाते हैं, यह सोचते हैं कि शायद ये सब चीजें बड़े लाल अजगर द्वारा गढ़ी गई अफवाहें हैं या फिर शायद ये तथ्य हैं। क्या यह “शायद” सत्य की तलाश करने का परिप्रेक्ष्य दर्शाता है? (नहीं।) यह ऐसा विश्वास करने का परिप्रेक्ष्य है कि अफवाहों को सत्यापित करने और उनकी पुष्टि करने की जरूरत है या यह प्रतीक्षा करने और देखने का परिप्रेक्ष्य है, जानकार लोगों द्वारा कुछ वास्तविक हालातों का खुलासा किए जाने की प्रतीक्षा करने का परिप्रेक्ष्य है। मुझे बताओ, तुम्हें क्या लगता है कि लोगों द्वारा इन दोनों में से कोई भी परिप्रेक्ष्य रखने से क्या नतीजे निकलेंगे? क्या ऐसे लोग खतरे में हैं? इन दोनों में से कौन-सा परिप्रेक्ष्य लोगों को मजबूती से डटे रहने में सक्षम बना सकता है? (इन दोनों में से कोई भी परिप्रेक्ष्य लोगों को मजबूती से डटे रहने में सक्षम नहीं बना सकता है। अगर किसी में यह “शायद” वाला विचार है तो यह दर्शाता है कि वह अभी भी सच्चे मार्ग के बारे में निश्चित नहीं है और उसमें अभी भी संशयवाद के तत्व मौजूद हैं। ऐसे में अफवाहें उसके लिए एक बड़ा प्रलोभन बन जाती हैं। अगर लोग सच्चे मार्ग के बारे में निश्चित नहीं हो सकते हैं, सत्य में विश्वास नहीं रख सकते हैं और बड़े लाल अजगर के सार की असलियत नहीं देख सकते हैं तो वे वास्तव में बहुत बड़े खतरे में हैं।) आज तक ये लोग सच्चे मार्ग के बारे में निश्चित नहीं हो पाए हैं। उनका सार क्या है? (सार में वे छद्म-विश्वासी हैं।) वे छद्म-विश्वासी हैं। क्या ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो इन दोनों में से कोई परिप्रेक्ष्य पकड़कर रखते हैं? निश्चित रूप से ऐसे बहुत सारे लोग हैं। जब ये लोग अफवाहें सुनते हैं तब उनके दिलों में परमेश्वर के बारे में संदेह पैदा हो जाते हैं और वे अफवाहों की तह तक पहुँचना चाहते हैं, यह पता लगाना चाहते हैं कि वे सच्ची हैं या झूठी। हालाँकि, क्योंकि वे नहीं जानते हैं कि इस मामले को हल करने के लिए सत्य की तलाश कैसे करनी है, अंत में वे इसे अनसुलझा ही रहने देते हैं। दरअसल यह समस्या अभी भी उनके दिलों में बसी होती है और यह हल नहीं होती है। जब तुम लोग ये अफवाहें सुनते हो तब क्या तुम सत्य की तलाश करते हो? क्या तुम अफवाहों का गहन-विश्लेषण करने और उनका भेद पहचानने के लिए सत्य की तलाश करते हो या तुम इन अफवाहों को एक-एक करके सत्यापित करते हो ताकि यह अंतर कर सको कि वे सही हैं या गलत और यह देख सको कि वे वास्तव में सच्ची हैं या झूठी? अफवाहें सुनने के बाद तुम लोग अपने दिल में यही सोचते हो कि वे झूठी हैं, यह पूरी तरह से बड़ा लाल अजगर है जो अफवाहें गढ़ रहा है और कीचड़ उछालने वाला अभियान चला रहा है, लेकिन तुम सत्य और तथ्यों के आधार पर उनका खंडन नहीं करते हो और वास्तव में तुम्हारे दिल में अभी भी कुछ संदेह होते हैं और तुम बस इन धर्म-सैद्धांतिक कथनों का उपयोग अपने संदेह हल करने के लिए करते हो। क्या इस तरह से सोचना तुम्हें अडिग रहने में सक्षम बना सकता है? क्या यह सत्य की तलाश करना है? क्या यह दर्शाता है कि तुम सत्य समझते हो और सत्य प्राप्त कर चुके हो? क्या समस्या जड़ से हल की जा चुकी है? (नहीं।) तो क्या तुम लोग सत्य का उपयोग इस समस्या को हल करने के लिए करना चाहते हो ताकि तुम लोग इन अफवाहों का भेद पहचान सको, गुमराह न हो सको, तुम्हारे दिल में किसी भी तरह का कोई प्रश्न न रहे और मेरे प्रति तुम्हारी शंकाएँ, अटकलें और सतर्कता पूरी तरह से समाप्त हो जाएँ? कुछ लोग सोचते हैं, “जब से हमने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया है तब से लेकर अब तक हम तुम्हारे धर्मोपदेश सुने जा रहे हैं और तुम्हारी सिंचाई और चरवाही स्वीकार किए जा रहे हैं और हमने कुछ लाभ और प्रगति प्राप्त की है। लेकिन हम वास्तव में तुम्हारे साथ नहीं रहे हैं या हमारा तुमसे एक व्यक्ति के रूप में वास्तविक संपर्क नहीं रहा है। इसलिए हम इस बारे में पूरी तरह से अँधेरे में हैं और अनजान हैं कि तुम किस प्रकार के व्यक्ति हो, तुम्हारा व्यक्तित्व और चरित्र किस तरह का है और तुम किस प्रकार का जीवन जीते हो।” यानी जब इस देह की मानवता की विभिन्न अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों और साथ ही मेरे जीवन और लोगों और मामलों से निपटने में मेरे रवैये और विशिष्ट अभिव्यक्तियों की बात आती है तब लोगों ने हमेशा इन चीजों पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं और इनके प्रति शंकाएँ पाल रखी हैं। एक तरफ, लोगों द्वारा ये शंकाएँ पालना परमेश्वर के देहधारण के बारे में लोगों के 100% निश्चित नहीं होने से उत्पन्न होता है और दूसरी तरफ, यह धार्मिक दुनिया या बड़े लाल अजगर की अफवाहों द्वारा प्रभावित होने से उत्पन्न होता है क्योंकि सत्य के बारे में उनकी समझ बहुत ही ज्यादा उथली है। इस प्रकार, तुम लोग मेरे बारे में कई अटकलें लगाते हो। यकीनन इन अटकलों की विषयवस्तु निश्चित रूप से सकारात्मक या उचित नहीं है; इसमें निश्चित रूप से कुछ अंधकारमय और नकारात्मक तत्व हैं। ये अटकलें लगाना—क्या यह तुम लोगों के लिए अच्छी चीज है या बुरी? क्या यह बोझ है, बंधन है या प्रोत्साहन है? तुम लोगों को क्या लगता है? (अगर लोगों के दिलों में ये नकारात्मक अटकलें हों तो यह कोई अच्छी चीज नहीं बल्कि एक बोझ है। इससे लोग परमेश्वर के प्रति सतर्क हो जाएँगे; यह चीज परमेश्वर में उनके विश्वास में मदद करने के लिए कुछ नहीं करेगी।) इन नकारात्मक बातों का तुम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है? इनके क्या नतीजे होंगे? कुछ खास परिवेशों में क्या ये चीजें तुम लोगों के लिए खतरनाक हैं? (हाँ।) चूँकि ये चीजें बोझ हैं और तुम्हारे लिए कोई अच्छी चीज नहीं हैं, तो क्या तुम्हें इन्हें हल करने के लिए सत्य का उपयोग करना चाहिए? या तुम्हें इन्हें एक तरफ रख देना चाहिए, इन्हें लेकर परेशान नहीं होना चाहिए और इनके बारे में नहीं सोचना चाहिए, और तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए जब तक कि उनका समाधान करने के लिए वास्तव में कोई मुद्दा उत्पन्न न हो जाए, ताकि तब तुम उनका समाधान कर सको? तुम लोगों का क्या रवैया है? (जब मैंने अफवाहें सुनीं तब मैंने उन्हें एक तरफ रख दिया और उन्हें लेकर परेशान नहीं हुआ। लेकिन अभी-अभी परमेश्वर की संगति के जरिए मुझे एहसास हुआ है कि जब ये समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तब उन्हें सत्य से हल किया जाना चाहिए। नहीं तो, अपने दिल में इस बोझ को छोड़ा नहीं जा सकता है और निश्चित परिस्थितियों में यह बुरे नतीजों का कारण बन सकता है, यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में संदेह करने और परमेश्वर को नकारने का भी कारण बन सकता है, जो कि बहुत खतरनाक है।) हालाँकि तुम सीधा बोल देते हो कि ये अफवाहें हैं, लेकिन अगर तुम सचमुच कभी भी इन अफवाहों का भेद नहीं पहचानते हो या उनके प्रति सही रवैया नहीं रखते हो और हमेशा इन नकारात्मक बातों को अपने दिल में रखते हो तो तुम अक्सर इनसे बेबस होते रहोगे। ये अफवाहें तुम्हारे लिए एक चालू टाइम बम जैसी होंगी, जो किसी भी पल, किसी भी जगह फटने के लिए तैयार है। इसके अंजाम निस्संदेह कल्पना से परे होंगे और तुम्हारे चीथड़े उड़ जाएँगे। क्या “तीन कथनों” पर हस्ताक्षर करने वाले लोग वही नहीं हैं जिन्होंने बम विस्फोट करके अपने चीथड़े उड़ा दिए? “तीन कथनों” पर हस्ताक्षर करने के बाद भी बड़ा लाल अजगर जाने नहीं देता है। वह माँग करता है कि उन्हें मौखिक रूप से कुछ ऐसी बातें कहनी होंगी जो परमेश्वर का अपमान करती हैं और तभी मामला निपट चुका माना जा सकता है। हालाँकि वे अपने दिलों में अनिच्छुक होते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि उनके पास कोई विकल्प नहीं है और वे कैद से बचने के लिए शैतान के आगे हथियार डाल देते हैं। मौखिक रूप से परमेश्वर का अपमान करने के बाद उन्हें लगता है कि आशीष पाने की उनकी उम्मीद जा चुकी है, उनका काम तमाम हो गया है। उन्हें इस बारे में अब और सोचने की जरूरत नहीं होती है कि वे अफवाहें सच्ची हैं या झूठी और परमेश्वर में विश्वास रखने के इतने वर्षों से उन्होंने जो व्याकुलताएँ, चिंताएँ, दब्बूपन और आतंक पाल रखे थे, वे पूरी तरह से गायब हो जाते हैं। साथ ही, उद्धार की उनकी उम्मीद भी चकनाचूर हो जाती है। मुझे बताओ, अगर लोग देहधारी परमेश्वर या इस धारा के बारे में संदेह करते हों तो भी क्या उन्हें परमेश्वर का अपमान करना चाहिए? (नहीं।) जब बड़ा लाल अजगर तुम्हें परमेश्वर का अपमान करने के लिए कहता है तब तुम उसकी आज्ञा क्यों मानते हो? यह चाहे कोई भी हो, भले ही वह सच्चे मार्ग को नकारता हो, इस धारा को नकारता हो, फिर भी उसे परमेश्वर का अपमान नहीं करना चाहिए। वे किस तरह के लोग होते हैं जो परमेश्वर का अपमान करते हैं? (जो लोग परमेश्वर का अपमान कर सकते हैं, वे वही लोग हैं जिनमें बुरी मानवता होती है और वे वो लोग भी हैं जिनमें सत्य के लिए विशेष नफरत होती है और जो शैतान के प्रभाव के प्रति समर्पण कर देते हैं।) मुझे बताओ, अगर लोग सही मायने में अपने दिलों में विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, मानवजाति परमेश्वर द्वारा बनाई गई है, मानव जीवन परमेश्वर द्वारा प्रदान किया गया है और परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है तो क्या वे परमेश्वर का अपमान करेंगे? (नहीं।) वे कभी नहीं करेंगे। हालात चाहे जैसे भी हों, वे परमेश्वर का अपमान नहीं करेंगे। भले ही वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम पर या इस धारा पर जो सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य है, संदेह करते हों, फिर भी वे कभी भी परमेश्वर का कतई अपमान नहीं करेंगे। इसलिए, जिस तरह का व्यक्ति परमेश्वर का अपमान कर सकता है, वह न सिर्फ इस धारा और देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को नकारता है, बल्कि वह परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य को भी नकारता है। तो फिर इस तरह के लोग किस श्रेणी में आते हैं? (वे दानव हैं; वे ऐसे लोग हैं जो अपने दिलों में परमेश्वर को नकारते हैं।) इस प्रकार के लोग शैतान और दानवों के गिरोह का हिस्सा हैं; वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं, परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं—वे गैर-मनुष्य हैं। कुछ लोग बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद, क्योंकि वे सत्य नहीं समझते हैं और उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, अफवाहें सुनकर शंकालु हो जाते हैं। वे देहधारी परमेश्वर के बारे में संदेह करने लगते हैं और धमकियों, प्रलोभनों और क्रूर यातनाओं के दबाव में आकर परमेश्वर के नाम को नकार देते हैं, इस धारा को नकार देते हैं जो पवित्र आत्मा का कार्य है और कलीसिया को नकार देते हैं। यह पहले से ही परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने के समान है। लेकिन कुछ लोग परमेश्वर का अपमान तक कर सकते हैं—यह पूरी तरह से जमीर और विवेक की कमी होना है, यह अक्षम्य है और यह अक्षम्य पाप करना है। जब तुम लोगों का अपमान करते हो या उन पर हमला करते हो, उनकी आलोचना करते हो या उनकी मानहानि करते हो तब कानूनी लिहाज से इसे ज्यादा-से-ज्यादा मानहानि का अपराध या सबसे गंभीर मामलों में व्यक्तिगत हमला कहा जाएगा। यह सच में गंभीर नहीं है और इससे मृत्यु नहीं होती है। लेकिन जब कोई परमेश्वर का अपमान कर सकता है तब समस्या की प्रकृति बदल जाती है। अब यह सिर्फ परमेश्वर का अपमान नहीं रह जाता है—यह परमेश्वर के खिलाफ ईशनिंदा है! ईशनिंदा करने का क्या मतलब है? इसका मतलब है सकारात्मक चीजों, सत्य या परमेश्वर पर सीधा हमला करना, उनकी मानहानि करना, उनका अपमान करना या उन पर कलंक लगाना—ये सब ईशनिंदा है। परमेश्वर पवित्र है, परमेश्वर सर्वोच्च है, परमेश्वर सारी मानवजाति पर संप्रभु है, परमेश्वर ही वह है जो मानवजाति के लिए जीवन प्रदान करता है और परमेश्वर ही मानव जीवन का स्रोत है। परमेश्वर का सार, पहचान और दर्जा सर्वोच्च हैं। परमेश्वर पूर्ण, अच्छा और पवित्र है, वह दोषरहित है और तिरस्कार से परे है। ठीक इसलिए क्योंकि परमेश्वर पवित्र, पूर्ण और सर्वोच्च है और क्योंकि परमेश्वर ही वह स्रोत है जो मानवजाति को जीवन प्रदान करता है, सृजित मानवजाति द्वारा परमेश्वर की तरफ निर्देशित कोई भी कलंक, हमला या अपमान ईशनिंदा है। अब तुम्हें समझ जाना चाहिए कि “ईशनिंदा” क्या है, है ना? (परमेश्वर की तरफ निर्देशित कोई भी हमला, अपमान या कलंक ईशनिंदा है।) अगर “ईशनिंदा” शब्द को समझाना है तो इसका मतलब है सकारात्मक चीजों पर कलंक लगाना, उनकी आलोचना करना या निंदा करना और यह विशेष रूप से सत्य या परमेश्वर पर कलंक लगाना, उसकी आलोचना करना या निंदा करना है। इसे ईशनिंदा कहा जाता है। इसलिए, “ईशनिंदा” शब्द का उपयोग सिर्फ मानवजाति द्वारा परमेश्वर पर कलंक, अपमान, हमले या आलोचना का वर्णन करने के लिए ही किया जा सकता है—यह अपेक्षाकृत उपयुक्त है। जब लोग दूसरों की आलोचना करते हैं, उनका अपमान करते हैं, उन पर हमला करते हैं या उनकी निंदा करते हैं तब अगर यह तथ्यों के अनुरूप नहीं होता है तो यह ज्यादा-से-ज्यादा मानहानि होती है। अगर यह तथ्यों के अनुरूप होता है तो यह मानहानि नहीं होती है। लेकिन लोगों द्वारा परमेश्वर की आलोचना और निंदा तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना है और सत्य को असत्य में बदलना है—यह ईशनिंदा है। यह कैसी प्रकृति है कि लोग परमेश्वर की निंदा करने की हिम्मत करते हैं? क्या परमेश्वर में पाप है? (नहीं।) परमेश्वर पवित्र है, परमेश्वर पाप रहित है, इसलिए परमेश्वर की तरफ निर्देशित कोई भी कलंक, हमला, आलोचना या अपमान ईशनिंदा कहलाता है। जो लोग परमेश्वर का अपमान करते हैं, वे सोचते हैं, “जब तक मैं ऐसी कुछ चीजें कहता हूँ जो परमेश्वर का अपमान करती हैं तब तक मैं रिहा किया जा सकता हूँ और खतरे से बच सकता हूँ। हालातों के मद्देनजर, परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा।” मानव परिप्रेक्ष्य से ये तो बस कुछ गालियाँ हैं जो कोई बड़ी समस्या नहीं लगती हैं। लेकिन परमेश्वर इस मामले को कैसे देखता है? यह जो तुम परमेश्वर का अपमान कर सकते हो वह दर्शाता है कि तुमने अपने दिल में पहले से ही परमेश्वर को नकार दिया है। सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम अपने दिल में परमेश्वर के प्रति नफरत रखते हो, तुम उसका अपमान कर सकते हो। चाहे तुम सक्रिय रूप से परमेश्वर का अपमान करो या दूसरों द्वारा तुम्हें उसका अपमान करने के लिए मजबूर किया जाए, यह परमेश्वर को नकारने और परमेश्वर से नफरत करने की अभिव्यक्ति है। इसलिए, इस किस्म का व्यवहार और क्रियाकलाप पूरी तरह से ईशनिंदा है।

कुछ लोग विभिन्न अफवाहों को कभी नहीं छोड़ सकते हैं, हमेशा यही सोचते हैं कि हो सकता है वे सच हों। वे हमेशा यह सत्यापित करना चाहते हैं कि क्या बड़े लाल अजगर यानी सत्तारूढ़ दल, धार्मिक दुनिया और अविश्वासियों द्वारा फैलाई गई अफवाहें—विशेष रूप से वे अफवाहें और टिप्पणियाँ जो ऑनलाइन पोस्ट की जाती हैं—सच हैं। अगर परमेश्वर ने अपना रुख कभी व्यक्त नहीं किया होता या उसके घर ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया होता तो वे पूरी तरह से यह मान लेते कि ये अफवाहें सच हैं और परमेश्वर को नकार देते और परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते—यहाँ क्या समस्या है? आखिर वे किस आधार पर परमेश्वर में विश्वास रखते हैं? अगर उनका विश्वास इस बात पर आधारित है कि अफवाहें सच हैं या नहीं तो यह एक बहुत बड़ी गलती है। दरअसल परमेश्वर के घर के धर्मोपदेशों, संगतियों और फिल्मों में कई अफवाहों का पहले ही बहुत स्पष्ट रूप से गहन-विश्लेषण किया जा चुका है और उन्हें झूठा ठहरा दिया गया है; मुझे यहाँ विस्तार में जाने की कोई जरूरत नहीं है। तो तुम लोग अभी भी किन प्रकारों की अफवाहों को सत्यापित करना चाहते हो? आओ आज हम इस विषय को खोलकर रख दें। अगर तुम अफवाहों को सत्यापित करना चाहते हो तो मैं तुम लोगों को बताऊँगा कि मुझे उनके बारे में क्या कहना है ताकि कुछ लोग यह न सोचते रहें, “क्या तुम हमसे कुछ ऐसा छिपा रहे हो जो तुम नहीं चाहते कि हमें पता चल जाए? हमें हमेशा ऐसा लगता है कि हम तुम्हें पूरी तरह से समझ नहीं सकते हैं। हालाँकि हमने तुम्हारा अनुसरण किया है और बहुत सारे सत्य सुने हैं, फिर भी हम अपने दिलों में इस बात को लेकर अनिश्चित रहते हैं कि अफवाहें सच्ची हैं या झूठी, इसलिए हममें हमेशा उन्हें सत्यापित करने का विचार और ख्याल रहता है।” अगर तुम लोग उन्हें सत्यापित करना चाहते हो तो बेझिझक ऐसा कहो। आओ हम इस मामले पर खुलकर बात करें। मैं तुम्हें बताऊँगा कि मुझे उनके बारे में क्या कहना है—छिपाने के लिए यहाँ कुछ भी नहीं है। क्या कोई उन्हें सत्यापित करना चाहता है? (नहीं।) क्या जिस वजह से तुम उन्हें सत्यापित नहीं करना चाहते हो वह इस आधार पर टिकी हुई है कि तुम बड़े लाल अजगर की अफवाहों पर विश्वास नहीं करते हो या ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम्हारा रवैया ऐसा है, “मैं इस मामले को लेकर परेशान नहीं होना चाहता—मैं इसे बस ऐसे ही रहने दूँगा”? या क्या यह इसलिए है क्योंकि तुम डरते हो कि अफवाहों को सत्यापित करने के बाद तुम निराश हो जाओगे और नतीजे का सामना करने में असमर्थ रहोगे और तुम नहीं जानते कि तुम मजबूती से डटे रह सकोगे या नहीं और तुम ऐसे नतीजों का सामना नहीं करना चाहते? इन अफवाहों की विषयवस्तु चाहे कुछ भी हो, चाहे तुम लोग उनका सत्यापन करना चाहो या न चाहो, चाहे तुम इन अफवाहों के बारे में मुझे क्या कहना है उसे या उन पर मेरी टिप्पणी सुनना चाहो या न चाहो और चाहे तुम लोगों का रवैया कुछ भी हो, मेरा एक ही रवैया है : अगर तुम सत्य समझते हो तो तुम प्राकृतिक रूप से इन अफवाहों का भेद पहचान पाओगे; अगर तुम लोग सत्य नहीं समझते हो और सत्य की तलाश नहीं करते हो तो फिर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है। वह इसलिए क्योंकि मैंने सत्य व्यक्त करते हुए बहुत सारे वचन कहे हैं; मुझे तुम्हें इन अफवाहों को समझाने की कोई जरूरत नहीं है—यह वह कार्य नहीं है जो मुझे करना चाहिए। क्या तुम इतने सारे धर्मोपदेश सुनने के बाद अब भी अफवाहों का भेद नहीं पहचान सकते? अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते हो तो इसका मतलब है कि तुम सत्य नहीं समझते हो। जो व्यक्ति सत्य नहीं समझता है उससे चाहे कितना भी कहा जाए, वह बेकार है—यह अविश्वासियों से बात करने जैसा है; तुम चाहे कितना भी कह लो, वे नहीं समझेंगे। इसलिए, जब किसी भी अफवाह की बात आती है तब मेरी कोई टिप्पणी नहीं होती! न तो मैं कुछ समझाना चाहता हूँ, न मैं कुछ कहना चाहता हूँ और न ही मैं किसी बात को उचित ठहराना या उसका बचाव करना चाहता हूँ। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाहरी दुनिया में क्या कहा जा रहा है, मेरी कोई टिप्पणी नहीं है! क्या तुमने यह स्पष्ट रूप से सुन लिया है? (हाँ।) “कोई टिप्पणी नहीं है”—यह एक तरह का रवैया है। इसके अतिरिक्त, वह क्या है जो मैं इस मामले के संबंध में तुम लोगों से कहना चाहता हूँ? ऐसा है कि चाहे कोई भी समय हो, परमेश्वर की पहचान और सार नहीं बदलेगा, परमेश्वर का दर्जा नहीं बदलेगा, परमेश्वर का स्वभाव नहीं बदलेगा, परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य नहीं बदलेगा, यह तथ्य नहीं बदलेगा कि परमेश्वर मानवजाति पर संप्रभु है और उसे जीवन प्रदान करता है, परमेश्वर के देहधारण का तथ्य नहीं बदलेगा और यह तथ्य कभी नहीं बदलेगा कि परमेश्वर ही सत्य है, मार्ग है और जीवन है। क्या ये वचन तुम लोगों के संदेहों को हल करने के लिए पर्याप्त हैं? (हाँ।) मुझे तुम लोगों से इस मामले में बस इतना ही कहना है। अगर तुम लोग समझते हो तो फिर इसे स्वीकार करो। अगर तुम नहीं समझते हो तो फिर इस पर चिंतन करने के लिए अपना पूरा समय लो। अगर तब भी तुम्हारे दिल में संदेह रहते हैं और ये वचन तुम्हारे संदेहों को हल नहीं कर सकते हैं तो मैं और कुछ नहीं कर सकता। बस चीजों को अपने ढर्रे पर चलने दो। मैं तुम्हारे लिए बस इतना ही कह और कर सकता हूँ। क्या यह तरीका उचित है? (हाँ।) क्या लोगों पर इन वचनों का कुछ प्रभाव पड़ सकता है? विभिन्न जटिल मामलों का सामना करते समय अगर तुम्हारे और परमेश्वर के बीच के रिश्ते में कोई दरार दिखाई देती है या अगर तुम परमेश्वर के बारे में गंभीर संदेह पैदा कर लेते हो और ये वचन तुम्हारी उस समस्या को हल नहीं कर सकते हैं जिसका तुम अभी सामना कर रहे हो तो फिर तुम छद्म-विश्वासी हो। तुम जो स्वीकारते हो वह सत्य नहीं बल्कि शैतान के झूठ हैं और वे तमाम शैतानी शब्द हैं जो शैतान बोलता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा शुरू में आदम और हव्वा के साथ हुआ था—परमेश्वर ने कहा, “तुम लोग बाग के सभी वृक्षों से फल खा सकते हो, लेकिन भले-बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तुम नहीं खाओगे क्योंकि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम लोगों की जरूर मौत हो जाएगी।” परमेश्वर के वचन सुनने के बाद उन्होंने उन वचनों को अपने दिलों में रख लिया। लेकिन जब शैतान ने उनसे कहा, “परमेश्वर ने कहा कि तुम भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल मत खाना—यह जरूरी तौर पर सच नहीं है। अगर तुम लोग इसे खाओगे तो यह निश्चित नहीं है कि तुम्हारी मौत होगी ही,” तब आदम और हव्वा तुरंत संदेहग्रस्त हो गए। उन्होंने परमेश्वर के वचन छोड़ दिए और साँप के शब्दों पर विश्वास कर लिया। उन्हें संदेह हुआ कि परमेश्वर ने जो कहा, वह झूठ है। साँप ने जो कहा उसके कारण उन्होंने अब परमेश्वर में और विश्वास नहीं रखा और न ही उसकी आज्ञा का और पालन किया, बल्कि उन्होंने पूरी तरह से साँप के झूठों का अनुसरण किया। यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि इसका अंतिम नतीजा क्या निकला। साँप की बातों पर विश्वास करते हुए और उसे स्वीकारते हुए वे परमेश्वर ने जो कहा था उसे भी नकार रहे थे, यह सोच रहे थे कि परमेश्वर ने जो कहा वह झूठ है। उन्हें अब और विश्वास नहीं था कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और उन्हें अब और परमेश्वर की पहचान और सार पर विश्वास नहीं था। इसके बजाय वे परमेश्वर के प्रति संशयी थे, उन्हें संदेह था कि परमेश्वर के उनके प्रति कुछ गुप्त मकसद हैं और वह उन्हें झूठ बोलकर धोखा दे रहा है। इसके विपरीत, वे मानते थे कि साँप ने जो कहा वह सच है और साँप उनके फायदे के लिए बोल रहा है। अंतिम नतीजा यह निकला कि वे साँप द्वारा बहका दिए गए और शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए गए। वे परमेश्वर की देखभाल से भटक गए, उन्होंने परमेश्वर की सुरक्षा खो दी और एक ऐसे मार्ग पर चलना शुरू कर दिया जहाँ से लौटना असंभव था।

क्या तुम लोगों के लिए अफवाहों की समस्या हल हो गई है? अगर यह नहीं हुई है तो खुद ही धीरे-धीरे इस पर काम करो। जहाँ तक यह प्रश्न है कि अफवाहों से कैसे पेश आना है, तो मैं इस बारे में पहले ही बहुत संगति कर चुका हूँ। अगर अब भी ऐसे लोग हैं जो विभिन्न अफवाहों की असलियत नहीं देख सकते हैं और उनका भेद नहीं पहचान सकते हैं तो इस बारे में संगति करो और खुद इसे हल करो। हालाँकि यह मामला कोई बड़ा मामला नहीं माना जाता, लेकिन लोगों के दैनिक जीवन में यह अक्सर उनके मन को क्षुब्ध कर सकता है और उनके जीवन में व्यवधान डाल सकता है। हालाँकि कुछ अफवाहें इस हद तक नहीं जातीं कि तुरंत तुम्हारी जान ले लें, लेकिन वे तुम्हारे लिए एक तरह का उत्पीड़न भी होती हैं, जैसे कि एक तंग करने वाली मक्खी जो लोगों को काटती नहीं है लेकिन लोगों को उससे घिन आती है—वे समय-समय पर तुम्हें परेशान करने के लिए प्रकट होती हैं। विशेष रूप से, जब तुम कमजोर होते हो, जब तुम्हारे सामने विफलता या रुकावटें आती हैं या जब तुम नकारात्मक होते हो तब ये अफवाहें और शैतानी शब्द तुम्हें परेशान करने, तुम्हारे दिल में तुम्हें सताने, तुम्हें पीछे खींचने, तुम्हें थोड़ा-थोड़ा करके नीचे डुबो देने के लिए प्रकट होंगे। ठीक इसी तरीके से कुछ लोग पीछे हट गए हैं और उन्होंने विश्वास रखना छोड़ दिया है। देखो, बी समूहों या साधारण कलीसियाओं में भेजे गए लोग बहुत खतरे में हैं—लेकिन क्या वे लोग जो पूर्णकालिक कर्तव्य करते हैं, खतरे में नहीं हैं? उनमें से कुछ लोग भी बड़े खतरे में हैं। उनमें से कौन-सा समूह बड़े खतरे में है? उन लोगों का समूह जो सत्य समझने में लगातार विफल हो जाते हैं। उन्होंने परमेश्वर के जितने भी वचन सुने हैं, वे उन्हें नहीं समझते हैं। उनके दिलों में हमेशा संदेह रहता है : “मैं यह क्यों नहीं समझ सकता हूँ कि परमेश्वर के कौन-से वचन सत्य हैं? हर कोई कहता है कि सत्य ही मार्ग है, जीवन है—मुझे क्यों नहीं लगता कि यही जीवन है? मैंने भी परमेश्वर के बहुत सारे वचन सुने हैं, लेकिन मेरे भीतर का जीवन नहीं बदला है; मैं अब भी मैं ही हूँ, मैं तो नहीं बदला!” वे कभी भी नहीं समझते हैं कि सत्य क्या है, वे परमेश्वर का कार्य कभी भी नहीं समझते हैं और वे दर्शनों के बारे में हमेशा अस्पष्ट रहते हैं। ऐसे लोग खतरे में हैं। इस तरह के लोग अफवाहें सुनते समय उनका भेद पहचानने के लिए कभी सत्य की तलाश नहीं करते हैं; उन्हें सिर्फ अफवाहों से बचना और उन्हें अस्वीकार करना आता है। अगर वे उनसे बच सकते हैं तो वे संयोग से आपदा से बच जाते हैं; अगर वे उनसे नहीं बच सकते हैं तो वे शैतान द्वारा बंदी बना लिए जाते हैं। मुझे बताओ, क्या यह संयोग है कि ऐसे लोग शैतान द्वारा बंदी बना लिए जा सकते हैं? (नहीं।) जो लोग कभी सत्य नहीं समझते हैं, जो कभी नहीं समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखना क्या होता है—क्या ये लोग परमेश्वर की भेड़ें हैं? क्या वे परमेश्वर के वचन समझ सकते हैं? (वे नहीं समझ सकते हैं।) ये लोग कभी भी परमेश्वर के वचन नहीं समझते हैं और न ही वे सत्य की तलाश करते हैं; और वे हमेशा इस बात को लेकर फिक्रमंद रहते हैं : “परमेश्वर का दिन कब आएगा? हम स्वर्ग के राज्य में कब प्रवेश करेंगे?” परमेश्वर में विश्वास रखने में लोगों को जो बातें समझनी चाहिए, उनमें से उन्होंने एक भी बात नहीं समझी है। आखिर वे कितने भ्रमित हो सकते हैं! मुझे बताओ, जब मैं इस तरह के भ्रमित व्यक्ति से बात करता हूँ तब मेरे दिल में कैसी भावना होती है? क्या यह सम्मान है या दुःख? या क्या यह रोष की भावना है? इन लोगों को देखकर मुझे चिढ़ होती है। परमेश्वर में विश्वास रखकर इन भ्रमित बेवकूफों को क्या मिल सकता है? बड़े लाल अजगर द्वारा उन्हें गिरफ्तार करने और उनकी बुद्धि भ्रष्ट करने के बाद उन्हें बेनकाब कर दिया जाता है और हटा दिया जाता है। ये लोग रत्ती भर भी सत्य नहीं समझते हैं और परमेश्वर का घर ऐसे लोगों को नहीं चाहता है। उन्हें बड़े लाल अजगर के जरिए ही बेनकाब किया जाता है और हटा दिया जाता है। मुझे बताओ, क्या यह प्रेमहीनता है? (नहीं।) अगर ऐसे लोगों को बड़े लाल अजगर द्वारा गिरफ्तार नहीं किया जाता और उन्हें गुमराह करने वाली ये अफवाहें नहीं होतीं तो क्या वे हमेशा कलीसिया से चिपके रहते? कौन-से हालात उन्हें पीछे लौटने पर मजबूर कर सकते हैं? (यह ठीक बड़े लाल अजगर की अफवाहों के जरिए ही होता है। अफवाहें सुनने और उन पर विश्वास करने के बाद वे पीछे लौट जाते हैं।) यह ठीक बड़े लाल अजगर के राक्षसी पंजों, इस विषमता, के जरिए ही होता है कि वे कैदी बना लिए जाते हैं और अंत में अब और विश्वास नहीं रखते हैं। दरअसल ये लोग सत्य नहीं समझ सकते हैं, कोई कर्तव्य नहीं कर सकते हैं और कोई सेवा नहीं कर सकते हैं। परमेश्वर के घर में वे बस जरूरी गिनती पूरी कर रहे हैं, मुफ्तखोरी कर रहे हैं और मौत की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनमें से हर एक दयनीय अवस्था में है, फिर भी वे परमेश्वर के अनुयायी होने, परमेश्वर के चुने हुए लोग होने का दावा करते हैं—क्या वे शर्मनाक नहीं हैं? जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे कम-से-कम मनुष्य तो होने ही चाहिए, बिना आत्मा वाले मुर्दे नहीं, दरिंदे नहीं होने चाहिए। वे ऐसे लोग होने चाहिए जो परमेश्वर के वचन समझ सकते हैं। सिर्फ वे लोग जो परमेश्वर के वचन और सत्य समझ सकते हैं, वे ही परमेश्वर की भेड़ें हैं। सिर्फ परमेश्वर की भेड़ें ही सच्चाई से अपना कर्तव्य कर सकती हैं और परमेश्वर का अनुसरण कर सकती हैं। जो लोग परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं, वे सच्चे अनुयायी नहीं हैं। वे एक मकसद से कलीसिया में घुसपैठ करते हैं, जो कि आशीष प्राप्त करना है। उनके दिलों में कोई परमेश्वर नहीं है। चाहे वे कितने भी वर्षों तक विश्वास रखें, उनके पास कभी भी परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं हो सकता है। दानव, शैतान और जो लोग अशुद्ध आत्माओं और बुरी आत्माओं के कब्जे में होते हैं, वे भी जानते हैं कि यही सच्चा मार्ग है और वे भी आशीषों की इच्छा करते हैं। लेकिन क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को चाहता है? (वह नहीं चाहता।) विभिन्न बुरी आत्माएँ और अशुद्ध आत्माएँ जानवरों पर कब्जा कर लेती हैं और जब वे कई वर्षों के विकास से गुजरती हैं और अलौकिक प्राणी बन जाती हैं, उसके बाद वे हमेशा मनुष्य बनना चाहती हैं। वे अशुद्ध आत्माएँ, बुरी आत्माएँ या विभिन्न पाशविक आत्माओं के रूप में बने रहने के लिए अनिच्छुक होती हैं; वे और ऊँचे स्तर पर पहुँचना चाहती हैं—मनुष्य बनना चाहती हैं। इसी प्रकार, ये भ्रमित बेवकूफ भी अपना पद ऊँचा करना चाहते हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोग बनना चाहते हैं। मुझे बताओ, क्या परमेश्वर ऐसे लोगों को चाहता है? वह नहीं चाहता। भले ही वे कलीसिया में घुसपैठ करें, यह व्यर्थ होगा; चाहे कुछ भी हो, उन्हें दूर कर देना चाहिए। एक बार जब वे दूर हो जाएँगे तब परमेश्वर का घर स्वच्छ हो जाएगा और कलीसिया स्वच्छ हो जाएगी। जो लोग बच जाएँ, वे कम-से-कम ऐसे लोग होने चाहिए जो परमेश्वर की पहचान और सार को मानते हों, जो मानते हों कि परमेश्वर ही सत्य है, मार्ग है और जीवन है और जो खुशी से परमेश्वर की सेवा कर सकते हों। क्या वे भ्रमित बेवकूफ इसे प्राप्त कर सकते हैं? वे इसे प्राप्त करने से बहुत पीछे रह जाते हैं। वे सभी बिना आत्मा वाले मुर्दा लोग हैं, लेकिन फिर भी वे हमेशा आशीष चाहते हैं, हमेशा राज्य में प्रवेश करना चाहते हैं, हमेशा स्वर्ग जाना चाहते हैं। उनकी महत्वाकांक्षा और इच्छा छोटी नहीं होती हैं, लेकिन वे कभी भी यह नहीं देखते हैं कि वे क्या हैं—वे खुद को जरूरत से ज्यादा आँकते हैं! यह सही है कि ऐसे लोगों को हटा दिया जाता है। क्या तुम लोगों को लगता है कि यह अफसोस की बात है? (नहीं।) आरंभ से ही परमेश्वर ने कहा है, “मैं जो चाहता हूँ वह है लोगों में उत्कृष्टता, न कि उनकी संख्या में विशालता।” यह परमेश्वर का अपने चुने हुए लोगों के लिए अपेक्षित मानक है और साथ ही कलीसिया में लोगों की संख्या के संबंध में एक अपेक्षा और सिद्धांत भी है। “मैं जो चाहता हूँ वह है लोगों में उत्कृष्टता”—यहाँ “उत्कृष्टता” का आशय राज्य के अच्छे सैनिकों से है या विजेताओं से? इनमें से कोई भी सटीक नहीं है। सटीक रूप से कहा जाए, तो “उत्कृष्टता” का मतलब वे लोग हैं जिनमें सामान्य मानवता है, जो वास्तव में मनुष्य हैं। परमेश्वर के घर में अगर तुम वे कर्तव्य कर सकते हो जो एक मनुष्य को करने चाहिए, अगर एक मनुष्य के रूप में तुम्हारा उपयोग किया जा सकता है और अगर तुम दूसरों द्वारा खींचे, घसीटे या धकेले बिना एक मनुष्य की जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा कर सकते हो और तुम बेकार कचरा नहीं हो, मुफ्तखोर नहीं हो, आवारा नहीं हो—तुम मनुष्य की जिम्मेदारियाँ और दायित्व उठा सकते हो और मनुष्य के मिशन का भार उठा सकते हो—सिर्फ यही मनुष्य के रूप में मानक स्तर का होना है! क्या वे आवारा लोग और वे लोग जो उचित कार्यों पर ध्यान नहीं देते हैं, मनुष्य के मिशन का भार उठा सकते हैं? (नहीं।) कुछ लोग जिम्मेदारी उठाने के अनिच्छुक होते हैं; दूसरे इसे नहीं उठा सकते हैं—वे बेकार कचरा हैं। जो लोग किसी मनुष्य की जिम्मेदारियाँ नहीं उठा सकते हैं, वे मनुष्य नहीं कहलाए जा सकते हैं। उन लोगों को देखो जो बौद्धिक रूप से विकलांग, मंदबुद्धि, मस्तिष्क पक्षाघातग्रस्त या शारीरिक रूप से लकवाग्रस्त हैं—क्या उन्हें मानक मनुष्य कहा जा सकता है? (उन्हें नहीं कहा जा सकता।) क्यों नहीं? ऐसे लोगों में जीने की कोई क्षमता नहीं होती है, जीवित बचे रहने की कोई क्षमता नहीं होती है और अपनी देखभाल करने की कोई क्षमता नहीं होती है। वे सहायता और देखभाल के लिए पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहते हैं, अपना भरण-पोषण करने की क्षमता के बिना जीते हैं और मनुष्य की जिम्मेदारियाँ और दायित्व उठाने में असमर्थ होते हैं। जो लोग परमेश्वर के घर में अपना खुद का कर्तव्य उठाने में असमर्थ हैं, वे सामान्य मनुष्य नहीं हैं और परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। चाहे तुम कोई अगुआ हो या कार्यकर्ता या तुम ऐसा विशिष्ट कार्य कर रहे हो जिसमें पेशेवर कौशल शामिल हैं, तुम्हें उस कार्य का भार उठाने में समर्थ होना चाहिए जिसके लिए तुम जिम्मेदार हो। अपने जीवन और उत्तरजीविता का प्रबंधन करने में समर्थ होने से परे तुम्हारा अस्तित्व सिर्फ साँस लेने के बारे में नहीं है, खाने-पीने और मौज-मस्ती करने के बारे में नहीं है, बल्कि उस मिशन का भार उठाने में समर्थ होने के बारे में है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। सिर्फ ऐसे लोग ही सृजित प्राणी कहलाने योग्य हैं और मनुष्य कहलाने योग्य हैं। परमेश्वर के घर में जो लोग हमेशा मुफ्तखोरी करना चाहते हैं और हमेशा खानापूरी करने का प्रयास करते हैं, अंत तक चालाकी से अपना काम निकालने और आशीष प्राप्त करने की उम्मीद करते हैं, वे किसी भी कार्य का भार या कोई भी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं, फिर किसी मिशन का भार उठाने की तो बात ही छोड़ दो। ऐसे लोगों को हटा दिया जाना चाहिए और यह कोई अफसोस की बात नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे हटाया जा रहा है वह मनुष्य नहीं है—वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। तुम उन्हें निकम्मे लोग, आवारा या कामचोर कह सकते हो; किसी भी हालत में वे मनुष्य कहलाने के लायक नहीं हैं। जब तुम उन्हें कोई कार्य सौंपते हो तब वे उसे स्वतंत्र रूप से पूरा नहीं कर सकते हैं; और जब तुम उन्हें कोई काम सौंपते हो तब वे अपनी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं या वह दायित्व पूरा नहीं कर सकते हैं जो उन्हें करना चाहिए—ऐसे लोगों का काम तमाम हो चुका है। वे जीने के लायक नहीं हैं; वे मौत के लायक हैं। परमेश्वर का उनके जीवन को बख्श देना पहले से ही उसका अनुग्रह है, यह एक असाधारण एहसान है।

हम अफवाहों के विषय पर यहीं रुक जाएँगे। अगर अभी भी तुम लोगों की कोई समस्या है तो तुम उन्हें उठा सकते हो और उन पर संगति कर सकते हो या उन्हें खुद हल करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हो। हम इसके बारे में अब और बात नहीं करेंगे, ठीक है? क्या किसी को कोई आपत्ति है? (नहीं।) अगर ऐसी कोई समस्या है जिस पर मैंने चर्चा नहीं की है तो तुम उसे खुद हल करने का कोई तरीका सोच सकते हो। मैंने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है। मान लो, कोई कहता है, “हमें अभी तक वह उत्तर नहीं मिला है जो हम चाहते हैं; क्या वे अफवाहें सच्ची हैं या झूठी? कृपया हमें एक स्पष्ट उत्तर दो।” अगर मैं तुम्हें एक स्पष्ट उत्तर दे दूँ तो भी इससे कौन-सी समस्या हल हो सकेगी? यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हें यह उत्तर खुद ही ढूँढ़ना चाहिए। इस पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है। यह सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि तुम लोगों में भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। जिन लोगों ने सत्य प्राप्त कर लिया है, वे कभी भी गुमराह नहीं होंगे। दरअसल इन अफवाहों ने बहुत सारे लोगों को बेनकाब कर दिया है। जिन लोगों ने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है लेकिन सत्य प्राप्त नहीं किया है, वे सभी बेनकाब हो चुके हैं—यह परमेश्वर की बुद्धि है। यही मेरा उत्तर है। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) तो वह क्या है जो मैं तुम लोगों से कहना चाहता हूँ? मैं जो कहना चाहता हूँ वह सब कुछ “वचन देह में प्रकट होता है” के खंडों में और सभी धर्मोपदेशों में है। मैं तुम लोगों से ये वचन ही कहना चाहता हूँ। क्या ये पर्याप्त नहीं हैं? (हाँ, हैं।) अगर कुछ लोग अब भी अड़ जाते हैं, कहते हैं, “तो फिर अफवाहों के बारे में क्या तुम्हारे पास कोई उत्तर है?” तो मैं कहता हूँ नहीं, मेरे पास अब भी कोई टिप्पणी नहीं है। मैं जो कहना चाहता हूँ उसमें से मैंने पहले ही बहुत कुछ धर्मोपदेशों में कह दिया है। अगर तुम लोग सत्य की तलाश करने के इच्छुक हो और तुम इन वचनों को स्वीकार सकते हो और उनका पालन कर सकते हो तो तुम लोगों की समस्याएँ हल हो जाएँगी। अगर तुम लोग इन वचनों को नहीं स्वीकारते हो तो तुम लोगों की समस्याएँ हमेशा के लिए समस्याएँ ही बनी रहेंगी। मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है; अब इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। क्या तुमने स्पष्ट रूप से सुन लिया है? (हाँ।)

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