अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

Recital-the-word-appears-in-the-flesh-1
अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

श्रेणियाँ

Recital-latest-expression-1
वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है, और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता है, जिस मायनों वह कार्य करता है वे निरंतर बदलते रहते हैं, और फलस्वरूप वे लोग भी बदलते रहते हैं जो उसका अनुसरण करते हैं। जितना अधिक परमेश्वर का कार्य होगा, उतना ही अधिक मनुष्य परमेश्वर को जानेगा, और मनुष्य का स्वभाव भी परमेश्वर के कार्य के साथ बदलेगा। हालाँकि, ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है कि जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में नहीं जानते हैं और सत्य को न जानने वाले विवेकहीन लोग परमेश्वर के विरोधी बन जाते हैं। कभी भी परमेश्वर का कार्य मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है। न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ जाता है। जिस प्रकार परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर निरपवाद रूप से उसके आज के कार्य का निर्णय करता है, नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना परमेश्वर के लिए अत्यंत कठिन है। मनुष्य बहुत अधिक बाधाएँ प्रस्तुत करता है! मनुष्य की सोच बहुत ही ओछी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है, फिर भी वह ऐसे कार्य की व्याख्या करता है। परमेश्वर से दूर होकर, मनुष्य जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को ग्रहण करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जा रहे आशीषों को तो और भी कम ग्रहण करता है। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं फिर भी परमेश्वर के कार्य में हुए किसी भी बदलाव को सहने में असमर्थ है। जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और कि परमेश्वर का कार्य हमेशा एक ठहराव पर रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है वह है व्यवस्था को बनाए रखना, और जब तक वे पश्चाताप करते और अपने पापों को स्वीकार करते रहेंगे, तब तक परमेश्वर का हृदय हमेशा संतुष्ट रहेगा। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर बाइबल से बढ़कर नही होना चाहिए और नही हो सकता है। ये ठीक इस प्रकार के विचार हैं जिन्होंने उन्हें पुरानी व्यवस्था में दृढ़ता से बाँध दिया है और कठोर नियमों में जकड़ कर रख दिया है। इससे भी अधिक लोग यह विश्वास करतें है कि जो कुछ भी परमेश्वर का नया कार्य है, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया ही जाना चाहिए और यह कि इस तरह के कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी उसका अनुसरण सच्चे हृदय से करते हैं उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए, अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता है। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। इसके अतिरिक्त मनुष्य के विवेकहीन हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं मिथ्याभिमान के विद्रोही स्वभाव को लें, तो परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य का सावधानीपूर्वक अध्ययन करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि, मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का दृष्टिकोण अपनाता है। क्या यह मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोध करता है और उसका विरोधी है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

उस समय, यीशु ने कहा था कि यहोवा का कार्य अनुग्रह के युग में पीछे हो गया है, जितना मैं आज कहता हूँ कि यीशु का कार्य पीछे रह गया है। यदि केवल व्यवस्था का युग होता और अनुग्रह का युग न होता, तो यीशु को सलीब पर नहीं चढ़ाया जा सकता था और समस्त मानवजाति का उद्धार नहीं किया जा सकता था; यदि केवल व्यवस्था का युग होता, तो क्या मानवजाति का सम्भवतः इस दिन तक विकास हो सकता था? इतिहास आगे बढ़ता है; क्या इतिहास परमेश्वर के कार्य की प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है? क्या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अंदर यह मनुष्य के उसके प्रबंधन का चित्रण नहीं है? इतिहास आगे प्रगति करता है, इसलिए परमेश्वर का कार्य भी बढ़ता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर बदलती रहती है। यह परमेश्वर के लिए अव्यवहारिक होगा कि वह कार्य के एक ही चरण को छः हज़ार साल तक बनाए रखे, क्योंकि मनुष्य यही जानता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है। वह सम्भवतः सलीब पर चढ़ाने के समान कार्य को बनाए रखना और एक बार, दो बार, तीन बार.....सलीब पर चढ़ाया जाना जारी नहीं रख सका, यह एक विवेकहीन मनुष्य की अनुभूति है। परमेश्वर एक ही कार्य को बनाए नहीं रखता है, और उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और हमेशा नया रहता है, बहुत कुछ ऐसा ही जैसे कि मैं प्रतिदिन तुम लोगों को नए वचन कहता और नया कार्य करता हूँ। यही वह कार्य है जो मैं करता हूँ, जिसकी मुख्य बात "नए" और "चमत्कारिक" शब्दों में निहित है। "परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा"; यह कथन वास्तव में सत्य है। परमेश्वर का सार कभी भी नहीं बदलता है, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, और वह कभी भी शैतान नहीं बन सकता है, परन्तु इनसे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसका कार्य उसके सार की तरह ही अचर और अचल है। तुमने घोषणा की कि परमेश्वर इस प्रकार से है, परन्तु तुम किस प्रकार से बता सकते हो कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी भी पुराना नहीं होता है? परमेश्वर का कार्य हमेशा फैलता और निरंतर बदलता रहता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर व्यक्त होती रहती है और मनुष्य को ज्ञात करवाई जाती रहती है। जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, उसका स्वभाव निरंतर बदलता जाता है, और उसका ज्ञान निरंतर बदलता जाता है। तो फिर, कहाँ से, यह परिवर्तन होता है? क्या यह कभी भी परिवर्तन न होने वाले परमेश्वर के कार्य से नहीं है? यदि मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य क्यों मेरे कार्य और मेरे वचन को निरंतर बदलने नहीं दे सकता है? क्या मुझे मनुष्यों के प्रतिबंधों के अधीन होना आवश्यक है? क्या तुम अब केवल कुतर्क का सहारा नहीं ले रहे हो?

अपने पुनरुत्थान के बाद, यीशु अपने अनुयायियों के सामने प्रकट हुआ और उसने कहा, "और देखो, जिसकी प्रतिज्ञा मेरे पिता ने की है, मैं उसको तुम लोगों पर उतारूँगा और जब तक तुम लोग स्वर्ग से सामर्थ्य न पाओ, तब तक तुम लोग इसी नगर में ठहरे रहो।" क्या तुम जानते हो कि इन वचनों को किस प्रकार से समझाया जा सकता है? क्या तुम उसकी सामर्थ्य को धारण करते हो? क्या तुम अब समझ गए हो कि सामर्थ्य किसे कहते हैं? यीशु ने घोषणा की कि अंत के दिनों में मनुष्य पर सत्य का आत्मा अर्पित होगा। यह अब अंतिम दिन हैं; क्या तुम सत्य की आत्मा के अधीन हो? सत्य की आत्मा कहाँ है? क्या वे अशुद्ध आत्माएँ और दुष्टात्माएँ ही सत्य की आत्मा हैं? उनके पास कोई न्याय नहीं है, जीवन का प्रावधान तो और भी कम है, और वे कोई अल्पतम नया कार्य किए बिना पुराने युग के नियमों को बनाये रखते हैं। क्या वे ही सत्य की आत्मा हैं? क्या उनमें सत्य, जीवन और मार्ग है? क्या ये संसार से अलग पृथक रूप से उभर आयीं हैं? तुम में जो लोग बाइबल का हठपूर्वक पालन करते हैं और यीशु से चिपके रहते हैं—क्या तुमने यीशु के कार्य का अनुसरण किया है और उसके वचनों का पालन किया है। तुम यीशु के प्रति कितने वफादार हो? पुराने विधान की भविष्यवाणियों की सबसे महानतम पुस्तक यशायाह में कभी भी यह उल्लेख नहीं किया गया है कि नए विधान के युग में, यीशु नाम का बच्चा पैदा होगा, यह उल्लेख किया गया है कि इम्मानुएल नाम का एक नर शिशु पैदा होगा। उसने स्पष्ट रूप से यीशु का नाम क्यों नहीं बताया? पुराने विधान में कहीं भी उसका नाम नहीं दिखाई देता है, तब भी तुम क्यों यीशु पर विश्वास करते हो? तुमने यीशु पर विश्वास करने से पहले निश्चित रूप से उसे अपनी आँखों से नहीं देखा है? या क्या तुमने प्रकाशित होने पर विश्वास करना प्रारम्भ किया? क्या परमेश्वर वास्तव में तुम पर ऐसा अनुग्रह दर्शाएगा? और तुम पर इस प्रकार का महान आशीष अर्पित करेगा? तुमने किस आधार पर यीशु पर विश्वास किया? तो फिर तुम क्यों विश्वास नहीं करते हो कि आज के दिन परमेश्वर देहधारी हो गया है? तुम क्यों कहते हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर से प्रकटन की अनुपस्थिति यह सिद्ध करती है कि वह देहधारी नहीं हुआ है? क्या परमेश्वर को अपना कार्य प्रारम्भ करने से पहले मनुष्य को बताना आवश्यक है? क्या पहले उसे मनुष्य का अनुमोदन प्राप्त करना आवश्यक है? यशायाह में केवल घोषणा की गई है कि चरनी में एक नर शिशु का जन्म होगा परन्तु कभी भी यह भविष्यवाणी नहीं की कि मरियम यीशु को जन्म देगी। तो तुम क्यों यीशु पर विश्वास करते हो जिसे मरियम ने जन्म दिया? निश्चय ही तुम्हारा विश्वास अनिश्चितता और भ्रम वाला नहीं है! कुछ कहते हैं कि परमेश्वर का नाम बदलता नहीं है, तो फिर क्यों यहोवा का नाम यीशु हो गया? मसीह के आने की भविष्यवाणी की गई थी, तो फिर क्यों यीशु नाम का एक व्यक्ति आया? परमेश्वर का नाम क्यों बदला गया? क्या इस तरह का कार्य काफी समय पहले नहीं किया गया था? क्या परमेश्वर आज के दिन कोई नया कार्य नहीं कर सकता है? कल का कार्य बदला जा सकता है, और यीशु का कार्य यहोवा के कार्य के बाद नहीं आ सकता है। क्या यीशु के कार्य के बाद कोई अन्य कार्य नहीं हो सकता है? यदि यहोवा का नाम बदल कर यीशु हो सकता है, तो क्या यीशु का नाम भी नहीं बदला जा सकता है? यह असामान्य नहीं है, और लोग ऐसा[क] केवल अपनी नासमझी के कारण सोचते हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। उसके कार्य और नाम में परिवर्तन की परवाह किए बिना, उसका स्वभाव और विवेक हमेशा अपरिवर्तित रहता है, वह कभी भी नहीं बदलेगा। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर केवल यीशु के नाम से ही पुकारा जा सकता है, तो तुम्हें बहुत कम ज्ञान है। क्या तुम यह दृढ़तापूर्वक कहने का साहस करते हो कि परमेश्वर का नाम यीशु हमेशा के लिए है, और परमेश्वर हमेशा और निरंतर यीशु के ही नाम से जाना जाएगा, और कि यह कभी नहीं बदलेगा? क्या तुम यह निश्चितता से दृढ़तापूर्वक कहने का साहस कर सकते हो कि यह यीशु का नाम ही है जिसने व्यवस्था के युग का समापन किया और अंतिम युग का भी समापन करता है? कौन कह सकता है कि यीशु का अनुग्रह युग का समापन कर सकता है? यदि तुम अब इन सत्यों को स्पष्टता से नहीं जान सकते हो, तो तुम न केवल सुसमाचार का प्रचार करने के अयोग्य होगे, बल्कि यहाँ तक कि तुम स्वयं भी खड़ा नहीं रह सकते हो। जब दिन आता है कि तुम उन धार्मिक लोगों की सभी समस्याओं को हल करते हो और उनकी भ्रांतियों को खण्डित करते हो, यह सबूत होगा कि तुम कार्य के इस चरण के बारे में पूरी तरह से निश्चित हो और तुम्हें जरा सा भी संदेह नहीं है। यदि तुम उनकी भ्रांतियों को खण्डित नहीं कर पाते हो, तो वे तुम पर झूठे आरोप लगाएँगे और तुम्हारी झूठी निंदा करेंगे। क्या यह शर्मनाक नहीं है?

उस समय के सभी यहूदियों ने पुराने विधान से पढ़ा था और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरनी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर क्यों, इस ज्ञान के साथ, उन्होंने तब भी यीशु को सताया? क्या यह उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं है? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उससे भिन्न था जो वे भविष्यवाणी किए गए नर शिशु के बारे में जानते थे; आज का मनुष्य परमेश्वर को अस्वीकार करता है क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार एक ही बात नहीं है? क्या तुम इस प्रकार के हो सकते हो कि तुम पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को बिना कोई प्रश्न किए स्वीकार करो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह सही "स्रोत" है। तुम्हें इसे बिना किसी आशंका के स्वीकार कर लेना चाहिये, बजाय इसके कि किसे चुनें और स्वीकार करें। यदि तुम्हें परमेश्वर से कुछ ज्ञान प्राप्त होता है और उसके विरुद्ध कुछ सावधानी प्रयोग करते हो, तो क्या यह कार्य वास्तव में अनुचित नहीं है? अगर कोई कार्य पवित्रात्मा का है, तो बिना बाइबल के प्रमाण की आवश्यकता के, तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, जब तक कि यह पवित्र आत्मा का है, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, न कि उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए। मेरे यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ तुम्हें और सबूत नहीं खोजने चाहिए। इसके बजाय कि तुम्हें यह विचार करना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभ का हूँ, यही मुख्य बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में बहुत सारे अखंडनीय सबूत प्राप्त हो जाएँ; ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते हैं। तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो बाइबल के सीमा में ही रहता है, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई है कि एक नर शिशु जन्म लेगा, कोई थाह नहीं ले सकता है कि किस पर यह भविष्यवाणी घटित होगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता, और फरीसियों का यीशु के विरोध में खड़े होने का यही कारण है। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हितों में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं दो पूरी तरह से अलग-अलग प्राणी हैं जो परस्पर असंगत हैं। उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को उपदेशों की एक श्रृंखला कही, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे माँगें, दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें इत्यादि। जो कार्य उसने किया वह अनुग्रह के युग का था, और उन्होंने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण किया कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने विधान के नियमों को निर्धारित किया, उसने अनुग्रह के युग के कार्य को तब क्यों नहीं किया? उसने अग्रिम में अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों के स्वीकार करने के लिए लाभदायक नहीं हो गया होता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने अनुग्रह के युग का कार्य अग्रिम में नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और वह कभी भी कार्य का आगामी चरण अग्रिम में नहीं करता है। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने अंत के दिनों के केवल चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें और कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें और स्वीकार करें, और साथ ही सलीब को कैसे सहें, और साथ ही पीड़ाओं को कैसे सहन करें; उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस में प्रवेश करना चाहिए या परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करें। वैसे तो, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना भ्रान्ति का कार्य नहीं होगा? बाइबल को केवल अपने हाथों में पकड़कर तुम क्या विचार कर सकते हो? बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से जान सकता है?

"वह जिसके कान हो, सुन ले कि आत्मा ने कलीसियाओं से क्या कहा।" क्या तुमने अब पवित्र आत्मा के वचन सुन लिए हैं? परमेश्वर के वचन तुम्हें अचानक मिले हैं। क्या तुम उन्हें सुनते हो? अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का कार्य करता है, और ऐसे वचन पवित्र आत्मा के वचन हैं, क्योंकि परमेश्वर पवित्र आत्मा है और देहधारी भी हो सकता है; इसलिए, पवित्र आत्मा के वचन, जैसे अतीत में बोले गए थे, आज देहधारी परमेश्वर के वचन हैं। कई विवेकहीन मनुष्य हैं जिनका मानना है कि पवित्र आत्मा के वचन मनुष्य के कान में सीधे स्वर्ग से उतर कर आने चाहिए। इस प्रकार सोचने वाला कोई भी परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता है। वास्तव में, पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए कथन वे ही हैं जो परमेश्वर ने देहधारी होकर कहे। पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य से बात नहीं कर सकता है, और यहाँ तक कि व्यवस्था के युग में भी, यहोवा ने प्रत्यक्ष रूप से लोगों से बात नहीं की। क्या इस बात की बहुत कम सम्भावना नहीं होगी है कि वह आज के युग में भी ऐसा ही करेगा? कार्य को करने के लिए परमेश्वर को कथनों को बोलने के लिए, उसे अवश्य देहधारण करना चाहिए, अन्यथा उसका कार्य उसके उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकता है। जो परमेश्वर के देहधारी होने को इनकार करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो आत्मा को या उन सिद्धान्तों को नहीं जानते हैं जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। जो मानते हैं कि अब पवित्र आत्मा का युग है फिर भी उसके नए कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं वे अस्पष्ट विश्वास में जीने वाले लोग हैं। मनुष्यों का इस प्रकार का व्यवहार कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त नहीं करेगा। जो लोग चाहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष रूप से उनसे बात करे और अपना कार्य करे, फिर भी वे देहधारी परमेश्वर के वचनों या कार्य को स्वीकार नहीं करते हैं, वे कभी भी नए युग में प्रवेश या परमेश्वर से पूरी तरह से उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे।

फुटनोटः

क. मूलपाठ में "जो है" पढ़ा जाता है।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? तीन चेतावनियाँ परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं पतरस ने यीशु को कैसे जाना परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे क्या आप जाग उठे हैं? एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग एक परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो

0खोज परिणाम