अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

आरंभ में परमेश्वर विश्राम कर रहा था। उस समय पृथ्वी पर कोई मनुष्य या अन्य कुछ भी नहीं था, और परमेश्वर ने किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं किया था। परमेश्वर ने अपने प्रबंधन के कार्य को केवल तब आरंभ किया जब एक बार मानवजाति अस्तित्व में आ गई और एक बार जब मानव जाति भ्रष्ट कर दी गई। इसके बाद से, परमेश्वर ने अब और विश्राम नहीं किया बल्कि इसके बजाय उसने स्वयं को मनुष्यजाति के बीच व्यस्त रखना आरंभ कर लिया। यह मनुष्यों की भ्रष्टता की वजह से था कि परमेश्वर को उसके विश्राम से उठा दिया गया, और यह प्रधान स्वर्गदूत के विद्रोह के कारण भी था कि जिसने परमेश्वर को उसके विश्राम से उठा दिया। यदि परमेश्वर शैतान को परास्त नहीं करता और मानव जाति को नहीं बचाता है, जो की भ्रष्ट हो चुकी है, तो परमेश्वर पुनः कभी भी विश्राम में प्रवेश नहीं कर पाएगा। जैसे मनुष्य में विश्राम का अभाव है, वैसे ही परमेश्वर में भी है। जब परमेश्वर पुनः विश्राम में प्रवेश करेगा, तो मनुष्य भी विश्राम में प्रवेश करेगा। विश्राम में जीवन बिना युद्ध, बिना गंदगी और लगातार बनी रहने वाली अधार्मिकता के बिना है। कहने का अर्थ है कि इसमें शैतान के उत्पीड़न (यहाँ "शैतान" का संकेत शत्रुतापूर्ण शक्तियों से हैं), शैतान की भ्रष्टता, और साथ ही परमेश्वर की विरोधी किसी भी शक्ति के आक्रमण का अभाव है। हर चीज अपने मूल स्वभाव का अनुसरण करती है और सृष्टि के प्रभु की आराधना करती है। स्वर्ग और पृथ्वी पूरी तरह से शांत हो जाते हैं। यह मानव जाति का विश्राम से भरा जीवन है। जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करेगा, तो पृथ्वी पर अब और कोई अधार्मिकता नहीं रहेगी, और शत्रुतापूर्ण शक्तियों का आक्रमण नहीं होगा। मानवजाति एक नये राज्य में भी प्रवेश करेगी, वह शैतान द्वारा भ्रष्ट की गयी मानव जाति अब और नहीं होगी, बल्कि ऐसी मानव जाति होगी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद बचाया गया है। मानवजाति के विश्राम का दिन परमेश्वर के भी विश्राम का दिन है। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने की असमर्थता के कारण परमेश्वर ने अपना विश्राम खोया; ऐसा नहीं था कि वह मूलरूप में विश्राम करने में असमर्थ था। विश्राम में प्रवेश करने का यह अर्थ नहीं है कि सभी चीज़ों का चलना बंद हो जाएगा, या सभी चीजें विकसित होना बंद कर देंगी, न ही इसका यह अर्थ है कि परमेश्वर का कार्य होना बंद हो जाएगा, या मनुष्य का जीवित रहना बंद हो जाएगा। विश्राम में प्रवेश करने का चिन्ह इस प्रकार है: शैतान नष्ट कर दिया गया है; शैतान के साथ बुरे कामों में शामिल दुष्ट लोगों को दण्डित किया गया है और मिटा दिया गया है; परमेश्वर के प्रति सभी शत्रुतापूर्ण शक्तियों का अस्तित्व समाप्त हो गया है। परमेश्वर के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि वह मानवजाति के उद्धार के अपने कार्य को अब और नहीं करेगा। मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करने का अर्थ है कि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश के भीतर और उसके आशीषों के अधीन जीवन जीएगी; वहाँ शैतान की कुछ भी भ्रष्टता नहीं होगी, न ही कोई अधार्मिक बात होगी। मानवजाति सामान्य रूप से पृथ्वी पर रहेगी, वह परमेश्वर की देखभाल के अधीन रहेगी। जब परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो इसका अर्थ होगा कि मानवजाति को बचा लिया गया है और शैतान का विनाश हो चुका है, कि मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य पूरी तरह समाप्त हो गया है। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और कार्य नहीं करता रहेगा, और मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में अब और नहीं रहेगा। इसलिए, परमेश्वर अब और व्यस्त नहीं रहेगा, और मनुष्य अब और जल्दबाजी नहीं करेगा; परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर अपनी मूल अवस्था में लौट जाएगा, और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्थान में लौट जाएगा। ये वे स्थान हैं जिनमें परमेश्वर के समस्त प्रबंधन के अंत के बाद परमेश्वर और मनुष्य अपने-अपने विश्राम करेंगे। परमेश्वर के पास परमेश्वर की मंज़िल है, और मनुष्य के पास मनुष्य की मंज़िल है। विश्राम करते हुए, परमेश्वर पृथ्वी पर समस्त मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करता रहेगा। जबकि परमेश्वर के प्रकाश में, मनुष्य स्वर्ग के एकमात्र सच्चे परमेश्वर की आराधना करेगा। परमेश्वर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, और मनुष्य भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर की मंज़िल में रहने में असमर्थ होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों एक ही राज्य के भीतर नहीं रह सकते हैं; बल्कि दोनों के जीने के अपने स्वयं के तरीके हैं। परमेश्वर वह एक है जो समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करता है, जबकि समस्त मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का ठोस स्वरूप है। यह मानवजाति है जिसकी अगुवाई की जाती है; सार के संबंध में, मानवजाति परमेश्वर के समान नहीं है। विश्राम करने का अर्थ है अपने मूल स्थान में लौटना। इसलिए, जब परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करता है, तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर अपने मूल स्थान में लौट जाता है। परमेश्वर पृथ्वी पर मनुष्यों के बीच अब और नहीं रहेगा, या मानवजाति के बीच होने के समय मानवजाति के आनंद या उसकी पीड़ाओं में सहभागी नहीं बनेगा। जब मानवजाति विश्राम में प्रवेश करती है, तो इसका अर्थ है कि मनुष्य एक सच्ची सृष्टि बन गया है; मानवजाति पृथ्वी पर से परमेश्वर की आराधना करेगी और सामान्य मानवीय जीवन जीएगी। लोग परमेश्वर के अब और अवज्ञाकारी और प्रतिरोध करने वाले नहीं होंगे; वे आदम और हव्वा के मूल जीवन की ओर लौट जाएँगे। विश्राम में प्रवेश करने के बाद ये परमेश्वर और मनुष्य के संबंधित जीवन और उनकी मंज़िलें हैं। परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध में शैतान की पराजय अपरिहार्य प्रवृत्ति है। इस तरह, परमेश्वर का अपने प्रबंधन का कार्य पूरा करने के बाद विश्राम में प्रवेश करना और मनुष्य का पूर्ण उद्धार और विश्राम में प्रवेश इसी तरह से अपरिहार्य प्रवृत्ति बन जाता है। मनुष्य के विश्राम का स्थान पृथ्वी है, और परमेश्वर के विश्राम का स्थान स्वर्ग में है। मनुष्य विश्राम करते हुए परमेश्वर की आराधना करेगा और पृथ्वी पर जीवन यापन करेगा, और जब परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मानवजाति के बचे हुए हिस्से की अगुआई करेगा; वह उनकी स्वर्ग से अगुआई करेगा, पृथ्वी से नहीं। परमेश्वर तब भी पवित्रात्मा ही होगा, जबकि मनुष्य तब भी देह होगा। परमेश्वर और मनुष्य दोनों के विश्राम करने के स्वयं के संबंधित भिन्न-भिन्न तरीके हैं। जिस समय परमेश्वर विश्राम करेगा, तो वह मनुष्यों के बीच आएगा और प्रकट होगा; जिस समय मनुष्य विश्राम करेगा, तो वह स्वर्ग आने में और स्वर्ग के जीवन का आनंद उठाने में भी परमेश्वर द्वारा अगुवाई किया जाएगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के बाद, शैतान का अस्तित्व अब और नहीं रहेगा। और शैतान की तरह, वे दुष्ट लोग भी अस्तित्व में अब और नहीं रहेंगे। परमेश्वर और मनुष्यों के विश्राम में जाने से पहले, वे दुष्ट व्यक्ति जिन्होंने कभी परमेश्वर को पृथ्वी पर उत्पीड़ित किया था और वे शत्रु जो पृथ्वी पर उसके प्रति अवज्ञाकारी थे, वे पहले ही नष्ट कर दिये गए होंगे; वे अंत के दिनों की बड़ी आपदा द्वारा नष्ट कर दिये गए होंगे। उन दुष्ट व्यक्तियों को पूरी तरह नष्ट कर दिए जाने के बाद, पृथ्वी पुनः कभी भी शैतान की पीडाओं को नहीं जानेगी। मानवजाति संपूर्ण उद्धार प्राप्त करेगी, और केवल तब कहीं जाकर परमेश्वर का कार्य पूर्णतः समाप्त होगा। परमेश्वर और मनुष्य के विश्राम में प्रवेश करने के लिए ये पूर्वापेक्षाएँ हैं।

सभी चीजों का अंत की ओर पहुँचना परमेश्वर के कार्य की समाप्ति की ओर संकेत करता है और मानवजाति के विकास के अंत का संकेत करता है। इसका अर्थ है कि शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई मानवजाति अपने विकास के अंत पर पहुँच गई है, और आदम और हव्वा के वंशज अपने अंत तक पहुँच गए हैं, और इसका अर्थ यह भी है कि अब ऐसी मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, के लिए लगातार विकास करते रहना असंभव है। आदम और हव्वा आरंभ में भ्रष्ट नहीं थे, पर आदम और हव्वा जो अदन के बगीचे से निकाले गए थे, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए थे। जब परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो आदम और हव्वा—जो अदन के बगीचे से बाहर निकाले गये थे— और उनके वंशजों का अन्त हो जाएगा; भविष्य की मानवजाति आदम और हव्वा के वंशजों से मिलकर बनेगी, परंतु वे ऐसे लोग नहीं होंगे जो शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन रहते हैं। बल्कि ये वे लोग होंगे जिन्हें बचाया और शुद्ध किया गया है। यह वह मानवजाति है जिसका न्याय किया जा चुका है और जिसे ताड़ना दी जा चुकी है, और ऐसी है जो पवित्र है। ये लोग उस मानव जाति के लोगों के समान नहीं होंगे, जैसे ये मूल रूप से थे; कोई लगभग कह सकता है कि वे मूल आदम और हव्वा से पूर्णतः भिन्न प्रकार के लोग हैं। इन लोगों को उन सभी लोगों में से चुना गया होगा जिन्हें शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया था, और ये वे लोग होंगे जो अंततः परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के दौरान अडिग रहे हैं; वे भ्रष्ट मानवजाति में से लोगों का अंतिम शेष समूह होगा। केवल लोगों का यह समूह ही परमेश्वर के साथ-साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश कर पाएगा। जो अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के कार्य के दौरान—अर्थात्, शुद्धिकरण के अंतिम कार्य के दौरान—अडिग रहने में समर्थ हैं, ये वे लोग होंगे जो परमेश्वर के साथ अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे; इसलिए, जो विश्राम में प्रवेश करेंगे, वे सब शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके होंगे और केवल परमेश्वर के शुद्धिकरण के अंतिम कार्य से गुज़रने के बाद ही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके होंगे। ये लोग ही जो अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं अंतिम विश्राम में प्रवेश करेंगे। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का सार मानवजाति को शुद्ध करना है, और यह अंतिम विश्राम के दिन के लिए है। अन्यथा, संपूर्ण मानवजाति अपने स्वयं के स्वभाव का अनुसरण करने या विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ नहीं होगी। यह कार्य ही मानवजाति के लिए विश्राम में प्रवेश करने का एकमात्र मार्ग है। केवल परमेश्वर द्वारा शुद्ध करने का कार्य ही मानवजाति को उसकी अधार्मिकता से शुद्ध करेगा, और केवल उसका ताड़ना और न्याय का कार्य ही मानव जाति की अवज्ञा की बातों को प्रकाश में लाएगा, फलस्वरूप, जिन्हें बचाया नहीं जा सकता है उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता है उन्हें, और जो नहीं बचेंगे उनमें से जो बचेंगे उन्हें अलग करेगा। जब उसका कार्य समाप्त हो जाएगा, तो जो शेष बचेंगे वे शुद्ध किए जाएँगे, और जब वे मानवजाति के उच्चतर राज्य में प्रवेश करेंगे तो एक अद्भुत द्वितीय मानव जीवन का पृथ्वी पर आनंद उठाएँगे; दूसरे शब्दों में, वे मानवजाति के विश्राम में प्रवेश करेंगे और परमेश्वर के साथ-साथ रहेंगे। जो नहीं बच सकते हैं उनके ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद, उनके मूल स्वरूप पूर्णतः प्रकट हो जाएँगे; उसके बाद वे सबके सब नष्ट कर दिए जाएँगे और, शैतान के समान, उन्हें पृथ्वी पर जीवित रहने की अनुमति नहीं होगी। भविष्य की मानवजाति में इस प्रकार के कोई भी लोग शामिल नहीं होंगे; ये लोग अंतिम विश्राम के देश में प्रवेश करने के योग्य नहीं है, न ही ये लोग उस विश्राम के दिन में प्रवेश करने के योग्य हैं जिसे परमेश्वर और मनुष्य दोनों साझा करेंगे, क्योंकि वे दण्ड के लक्ष्य हैं और दुष्ट हैं, और वे धार्मिक लोग नहीं हैं। उन्हें एक बार छुटकारा दिया गया था, और उन्हें न्याय और ताड़ना भी दी गई थी; उन्होंने एक बार परमेश्वर को सेवाएँ भी दी थीं, परंतु जब अंतिम दिन आएगा, तो उन्हें तब भी उनकी अपनी दुष्टता, अवज्ञा व छुटकारा न पाने की योग्यता के कारण दूर और नष्ट कर दिया जाएगा। भविष्य के संसार में उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा, और भविष्य की मानवजाति के बीच उनका अब और अस्तित्व नहीं रहेगा। जब मानवजाति में से पवित्र लोग विश्राम में प्रवेश करेंगे, तो कोई भी और सभी कुकर्मी और कोई भी और सभी जिन्हें बचाया नहीं गया है इस बात की परवाह किए बिना कि वे मृतकों की आत्माएँ हैं या अभी भी देह में जीवित हैं, नष्ट कर दिए जाएँगे। इस बात की परवाह किए बिना कि ये कुकर्मी लोगों की आत्माएँ और कुकर्मी जीवित लोग हैं, या फिर धार्मिक लोगों की आत्माएँ और वे लोग हैं जो धार्मिकता करते हैं, किस युग से संबंधित हैं, प्रत्येक कुकर्मी नष्ट कर दिया जाएगा, और प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति जीवित रहेगा। कोई व्यक्ति या आत्मा उद्धार प्राप्त करती है कि नहीं यह पूर्णतः अंत के युग के समय के कार्य के आधार पर तय नहीं होता है, परंतु बल्कि इस आधार पर निर्धारित किया जाता है कि क्या उन्होंने परमेश्वर का प्रतिरोध किया था या वे परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी रहे थे। यदि पिछले युगों में लोगों ने बुरा किया और बचाए नहीं जा सके थे, तो वे निःसंदेह दण्ड के लिए लक्ष्य बनेंगे। यदि इस युग में लोग बुरा करते हैं और बचाए नहीं जा सकते हैं, तो वे भी निश्चित रूप से दण्ड के लिए लक्ष्य हैं। लोग अच्छे और बुरे के आधार पर पृथक किए जाते हैं, युग के आधार पर नहीं। एक बार अच्छे और बुरे के आधार पर अलग-अलग कर दिए जाने पर, लोगों को तुरंत दण्ड या पुरस्कार नहीं दिया जाता है; बल्कि, परमेश्वर केवल अंत के दिनों में जीतने के अपने कार्य को करने के बाद ही बुराई को दण्डित करने और अच्छाई को पुरस्कृत करने का अपना कार्य करेगा। वास्तव में, वह अच्छे और बुरे का उपयोग मानवजाति को पृथक करने के लिए तब से कर रहा है जब से उसने मानव जाति के बीच अपना कार्य आरंभ किया था। कार्य का अंत करने पर वह दुष्टों और धार्मिकों को पृथक करने और फिर बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का कार्य आरंभ करने के बजाय, वह अपने कार्य की समाप्ति पर ही केवल धार्मिकों को पुरस्कार और दुष्टों को दण्ड देगा। बुरे को दण्ड और अच्छे को पुरस्कार देने का उसका परम कार्य समस्त मानवजाति को सर्वथा शुद्ध करने के लिए है, ताकि वह पूर्णतः शुद्ध मानवजाति को अनंत विश्राम में ले जाए। उसके कार्य का यह चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। यह उसके समस्त प्रबंधन कार्य का अंतिम चरण है। यदि परमेश्वर दुष्टों का नाश नहीं करता बल्कि उन्हें बचा रहने देता तो संपूर्ण मानव जाति अभी भी विश्राम में प्रवेश करने योग्य नहीं होती, और परमेश्वर समस्त मानवजाति को एक बेहतर राज्य में नहीं पहुँचा पाता। इस प्रकार वह कार्य पूर्णतः समाप्त नहीं होता। जब वह अपना कार्य समाप्त कर लेगा, तो संपूर्ण मानव जाति पूर्णतः पवित्र हो जाएगी। केवल इस तरह से ही परमेश्वर शांतिपूर्वक विश्राम में रह सकता है।

आज लोग देह की बातों को छोड़ने में असमर्थ हैं, वे देह के सुख को त्याग नहीं सकते हैं, न वे संसार, धन और अपने भ्रष्ट स्वभाव का त्याग कर पाते हैं। अधिकांश व्यक्ति ये कार्य सतही तौर पर करते हैं। वास्तव में इन लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं, इससे भी बढ़कर वे परमेश्वर का भय नहीं मानते हैं। परमेश्वर उनके हृदयों में नहीं है, और इसलिए वे वह सब समझ नहीं सकते कि परमेश्वर क्या करता है और इससे भी बढ़कर बात यह है कि वे उन वचनों पर विश्वास नहीं कर पाते हैं, जो वह स्वयं अपने मुख से कहता है। ये लोग अत्यधिक देह के स्तर पर हैं, वे आकंठ भ्रष्ट हैं, और उनमें सत्य का अभाव है, इसके साथ-साथ वे विश्वास नहीं करते हैं कि परमेश्वर देहधारण कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के देह धारण पर विश्वास नहीं करता है, अर्थात कोई जो प्रत्यक्ष परमेश्वर के कार्य और बातों पर और प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास न करके स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना करता है—उसके हृदय में परमेश्वर नहीं है। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर की अवज्ञा और प्रतिरोध करते हैं। इन लोगों के पास मानवीयता और विवेक का अभाव होता है, फिर सत्य के बारे में तो क्या कहें। ये वे लोग हैं जो प्रत्यक्ष और स्पर्शनीय परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते किंतु अदृश्य और अस्पर्शनीय परमेश्वर इनके लिए सर्वाधिक विश्वसनीय है और उनके हृदयों को सबसे अधिक खुशी देता है। वे जिसे खोजते हैं वह वास्तविकता का सत्य नहीं है, न ही जीवन का वास्तविक सार है, परमेश्वर की योजना तो है ही नहीं; वे केवल रोमांच का पीछा करते हैं। वे सब बातें या वस्तुएँ जो उन्हें अधिक से अधिक उनकी अपनी इच्छाओं को पूरा करने का अवसर देती हैं, वे ही हैं जिन पर वे विश्वास करते और जिनका वे पीछा करते हैं। वे परमेश्वर पर केवल इसलिए विश्वास करते हैं कि निज इच्छाओं को पूरा करें—सत्य की खोज के लिए नहीं। क्या ये लोग बुरे कार्य करने वाले नहीं हैं? वे अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, और वे यह विश्वास नहीं करते कि स्वर्ग का परमेश्वर उन्हें नष्ट कर देगा, इन "इन भले लोगों को"। बल्कि ये विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें बचाकर रखेगा, और इससे भी अधिक यह कि प्रचुरता से पुरस्कार देगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के लिए बहुत से कार्य किये हैं, और बड़े परिमाण में परमेश्वर के प्रति "निष्ठा" का प्रदर्शन किया है। यदि उन्हें साक्षात् परमेश्वर का पीछा करना हो, तो जैसे ही उनकी अभिलाषाएँ अधूरी रहें, वे तुरंत परमेश्वर के विरुद्ध बोलने लगेंगे और क्रोध से भर जाएँगे। ये बुरे लोग हैं जो अपनी अभिलाषाएँ पूरी करने की खोज में रहते हैं, ये लोग सत्य का पीछा करने वाले निष्ठावान लोग नहीं हैं। इस प्रकार के लोग तथाकथित दुष्ट लोग हैं जो मसीह के पीछे चलते हैं। जो लोग सत्य की खोज नहीं करते हैं वे सत्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। वे मानवजाति के भविष्य के परिणाम को समझने में और भी अधिक अयोग्य हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष परमेश्वर के किसी कार्य या वाणी पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे मानव जाति के भविष्य के गंतव्य पर विश्वास नहीं कर सकते हैं। इस कारण, यदि वे साक्षात् परमेश्वर का अनुसरण करें तब भी वे बुरा करेंगे और सत्य को नहीं खोजेंगे, और न उस सत्य पर अमल करेंगे, जिसे मैं चाहता हूँ। वे लोग जो यह विश्वास नहीं करते कि वे नष्ट होंगे, वे ही लोग असल में नष्ट होंगे। वे सब विश्वास करते हैं कि वे बहुत चतुर हैं, और वे ही सत्य पर अमल करते हैं। वे अपने बुरे आचरण को सत्य मानते हैं और उसमें सुख पाते हैं। ये दुष्ट लोग अत्यधिक आत्मविश्वास से भरे हैं, वे सत्य को धर्मशिक्षा मानते हैं, और अपने बुरे कार्यों को सत्य मानते हैं, और अंत में वे केवल वहीं काटेंगे जो उन्होंने बोया है। लोग जितना अधिक आत्मविश्वास रखते हैं और जितना अधिक हठ करते हैं, वे उतना ही अधिक सत्य को पाने में असमर्थ हैं; लोग जितना ज्यादा स्वर्गिक परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ये वे लोग हैं जो दण्डित किये जाएँगे। मनुष्यों के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर एक व्यक्ति का दण्ड या पुरस्कार पाना यह इस बात पर आधारित होगा कि क्या वे सत्य की खोज करते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं, क्या वे साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं। वे जिन्होंने साक्षात् परमेश्वर को सेवाएँ दीं, पर उसे नहीं जानते या आज्ञापालन नहीं करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ये लोग कुकर्मी हैं, और कुकर्मी निःसंदेह दण्डित किए जाएँगे। इससे अधिक, वे अपने बुरे आचरण के अनुसार दण्ड पाएँगे। परमेश्वर पर मनुष्यों द्वारा विश्वास किया जाता है, और वह मनुष्यों के द्वारा आज्ञापालन किये जाने योग्य भी है। वे लोग जो केवल अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में भी असमर्थ हैं। यदि ये मनुष्य साक्षात् परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, और उसके विजयी किए जाने के कार्य के पूरा होने तक अवज्ञाकारी बने रहते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं—जो देह में दृश्यमान है, तो ये सबसे अधिक अस्पष्ट लोग हैं, और निःसंदेह नष्ट किये जाएँगे। यह उसी प्रकार है जैसे तुम लोगों के बीच यदि कोई मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर को मानता है, परंतु देहधारी परमेश्वर के प्रति सत्य को अमल में नहीं ला पाता है, तो वह अंत में निकाल दिया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा और यदि कोई मौखिक रूप में साक्षात् परमेश्वर को मानता है और देहधारी परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त सत्य को खाता और पीता है परंतु फिर भी अस्पष्ट और अदृश्य परमेश्वर को खोजता है, तो भविष्य में और भी अधिक उसका नाश किया जाएगा। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने व उसके विश्राम का समय आने तक नहीं बच सकता है; विश्राम के समय जो लोग बच जाएँगे, उनमें इन लोगों के समान कोई भी नहीं होगा। दुष्ट लोग वे हैं जो सत्य पर अमल नहीं करते, उनका मूल तत्व प्रतिरोध करना और परमेश्वर की अवज्ञा करना है, उनमें परमेश्वर की आज्ञा मानने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। ऐसे सभी लोग नष्ट होंगे। चाहे तुममें सत्य हो, चाहे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करो, इसका निर्धारण तुम्हारे रूपरंग या कुछेक अवसरों पर तुम्हारी बातचीत और आचरण से नहीं, बल्कि तुम्हारे मूलतत्व के आधार पर होगा। प्रत्येक व्यक्ति का मूलतत्व तय करेगा कि उनका नाश किया जाएगा या नहीं, इसका निर्धारण उनके आचरण में प्रकट उनके मूलतत्व और उनकी सत्य की खोज में प्रकट होता है। उन लोगों में जो यही कार्य करते हैं और उतने ही परिमाण में कार्य करते हैं, वे लोग जिनका मानवीय मूलतत्व अच्छा है, और जो सत्य धारण करते हैं, वे ही लोग बच सकते हैं, परंतु वे जिनके मानवीय मूलतत्व बुरे हैं और जो साक्षात् परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, वे नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य की नियति के संबंध में परमेश्वर के कोई भी कार्य या वचन, मनुष्यों के मूलतत्व के आधार पर उचित रीति से प्रत्येक मनुष्य में कार्य करते हैं, वहाँ कोई संयोग नहीं है, और निश्चय ही लेशमात्र भी त्रुटि नहीं है। केवल जब एक मनुष्य कार्य करेगा तब मनुष्य की भावनाएँ या अर्थ उसमें मिश्रित होंगे। परमेश्वर जो कार्य करता है, वह सबसे अधिक उपयुक्त होता है, वह निश्चित तौर पर किसी प्राणी के विरुद्ध झूठे दावे नहीं करेगा। अब बहुत से लोग ऐसे हैं जो मानवजाति के भविष्य की नियति को समझने में असमर्थ हैं, और वे उन वचनों पर भी विश्वास नहीं करते जो मैं कहता हूँ, वे सब जो विश्वास नहीं करते और वे भी जो सत्य पर अमल नहीं करते हैं, वे सब दुष्टात्माएँ हैं! वे जो खोज करते हैं और वे जो खोज नहीं करते, वे अब दो भिन्न प्रकार के लोग हैं, और इन दो प्रकार के लोगों के दो अलग-अलग गंतव्य हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य पर अमल करते हैं, परमेश्वर केवल उन्हीं का उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते हैं वे दुष्टात्माएँ और शत्रु के समान हैं। वे महादूत के वंशज हैं, और उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। यहाँ तक कि एक अस्पष्ट परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? लोग जो भला विवेक रखते हैं परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं, उनका मूलतत्व भी परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और भले ही ऐसे व्यक्ति बहुत सी कठिनाइयों से होकर गुजरें, वे तब भी नष्ट होंगे। वे जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होने की बात नहीं सह सकते, और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, वे सब परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं—और वे सब नष्ट होंगे। प्रत्येक व्यक्ति जो देहधारण करने वाले परमेश्वर को नहीं मानता वह दुष्ट है, और वे सब के सब नष्ट होंगे। वे सब जो विश्वास करते हैं पर सत्य पर अमल नहीं करते, वे जो देह में आए परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, और वे जो परमेश्वर के अस्तित्व पर लेशमात्र भी विश्वास नहीं करते हैं, वे सब नष्ट होंगे। यदि कोई अंत में बचा रहता है तो वह व्यक्ति है जो परिष्कार की कड़वाहट से गुजरा है और विश्वास में दृढ़ रहा है। ये वे हैं जो वास्तव में परीक्षाओं से गुजरे हैं। यदि कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता है वह शत्रु है, अर्थात जो इस धारा के भीतर या बाहर है, पर परमेश्वर के देहधारण में विश्वास नहीं करता है वह यीशु विरोधी है! शैतान कौन है, दुष्टात्माएँ कौन हैं, और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं, क्या ये वे लोग नहीं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते और परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं? क्या ये वे लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के प्रति अवज्ञाकारी हैं? क्या ये वे नहीं जो मौखिक रूप में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु उनमें सत्य नहीं हैं? क्या ये लोग वे नहीं हैं जो आशीषों को पाने की फ़िराक में रहते हैं परंतु परमेश्वर के लिए गवाही नहीं बन सकते हैं? तुम इन दुष्टात्माओं के साथ आज घुलमिल सकते हो और विवेक को तनाव दे सकते हो, उनसे प्रेम भी कर सकते हो, क्या ये सब बातें शैतान की ओर मित्रता या सद्भावना का सूचक नहीं हैं? क्या यह दुष्टात्माओं के साथ सहभागिता करना नहीं है? यदि आज भी लोग अच्छे और बुरे में भेद नहीं कर सकते, और परमेश्वर की इच्छा जानने की आशा के बिना प्रेम और दया आँखें मूँदकर दर्शाते हैं, और परमेश्वर के हृदय को अपने हृदय में नहीं पाते हैं, तो उनका अंत और भी अधिक दुःखदायी होगा। यदि कोई देहधारी परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता है, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। यदि तुम विवेक को तनाव में डालकर शत्रु से प्रेम कर सकते हो, तो क्या तुममें धार्मिकता के संज्ञान की कमी नहीं है? यदि तुम उनके साथ सहज हो जिनसे मैं घृणा करता हूँ, और जिनसे मैं असहमत हूँ, और तुम तब भी उनके प्रति प्रेम और व्यक्तिगत सद्भावनाएँ रखते हो, तब क्या तुम अवज्ञाकारी नहीं हो? क्या तुम जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं कर रहे हो? क्या ऐसे व्यक्ति में सत्य है? यदि लोग शत्रुओं को स्थान देते हैं, दुष्टात्माओं से प्रेम और शैतान पर दया दिखाते हैं, तो क्या वे जानकर परमेश्वर के कार्य में रूकावट नहीं डाल रहे हैं? वे लोग जो केवल यीशु पर विश्वास करते हैं और जो अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर को नहीं मानते हैं, और जो मौखिक रूप में देहधारी परमेश्वर में विश्वास करने का दावा करते हैं, परंतु बुरे कार्य करते हैं, वे सब मसीह विरोधी हैं, उनको छोड़ दो जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं। ये सभी लोग नष्ट कर दिये जाएँगे। मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को जाँचता है उसका आधार चरित्र या व्यवहार है; वह जिसका आचरण अच्छा है, वह धार्मिक है, और जिसका आचरण घृणित है, वह दुष्ट है। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्य को जाँचता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का मूलतत्व परमेश्वर की आज्ञा मानना है, वह जो परमेश्वर की आज्ञा मानता है, धार्मिक है, और जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है—भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा हो, भले ही इस व्यक्ति की वाणी सही हो या गलत हो। कुछ लोग अच्छे कर्मों का भविष्य में एक अच्छी नियति प्राप्त करने के लिए उपयोग करना चाहते हैं, और कुछ लोग अच्छी वाणी का एक अच्छी नियति खरीदने के लिए उपयोग करना चाहते हैं। लोग गलत ढंग से विश्वास करते हैं कि परमेश्वर मनुष्य के व्यवहार या वाणी के अनुसार उसका परिणाम निर्धारित करता है, और इसलिए बहुत से लोग धोखे के माध्यम से अस्थायी अनुग्रह प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करते हैं। जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। परमेश्वर के पास सभी लोगों के परिणामों के प्रबंधन के लिए उचित मानदण्ड हैं; वह केवल किसी के वचनों या आचरण के अनुसार इन निर्णयों को नहीं लेता है, न ही वह इन्हें किसी एक समयावधि के दौरान उनके व्यवहार के अनुसार लेता है। वह अतीत में किसी व्यक्ति द्वारा परमेश्वर के लिए की गयी किसी सेवा की वजह से किसी के समस्त दुष्ट व्यवहार के प्रति सर्वथा उदार व्यवहार नहीं करेगा, न ही परमेश्वर के लिए एक बार के व्यय की वजह से किसी को मृत्यु से बचा लेगा। कोई भी अपनी दुष्टता के लिए दण्ड से नहीं बच सकता है, न ही कोई अपने दुष्ट आचरण को छिपा सकता है और फलस्वरूप विनाश की पीड़ा से बच सकता है। यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों को कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं। जब मानवजाति सही मार्ग में प्रवेश कर लेगी उसके बाद, लोगों का सामान्य मानव जीवन होगा। वे सब अपने संबंधित कर्तव्यों को करेंगे और पूर्णतः परमेश्वर के प्रति विश्वसनीय होंगे। वे अपनी अवज्ञा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को पूरी तरह छोड़ देंगे, और वे परमेश्वर के कारण और परमेश्वर के लिए जीएँगे। उनमें अवज्ञा और प्रतिरोध का अभाव होगा। वे पूर्णतः परमेश्वर की आज्ञा पालन कर पाएँगे। यही परमेश्वर और मनुष्य का जीवन है और राज्य का जीवन है, और यही विश्राम का जीवन है।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है परमेश्वर के प्रकटन को उनके न्याय और ताड़ना में देखना केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? तीन चेतावनियाँ परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं पतरस ने यीशु को कैसे जाना परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे क्या आप जाग उठे हैं? एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग एक परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "बाइबल के विषय में" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो

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