वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन – संकलन

आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश को देखें।

9.यीशु अद्भुत काम करता है।

1) यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है

(यूहन्ना 6:8-13) उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो छोटी मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिए वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी। तब लोग जिनकी संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका ना जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खाने वालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

2) लाज़र का पुनरूत्थान परमेश्वर की महिमा करता है

(यूहन्ना 11: 43-44) यह कह कर उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ!" जो मर गया था वह कफन से हाथ पाँव बँधे हुए निकल आया, और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, "उसे खोलकर जाने दो।"

प्रभु यीशु के द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों में से, हमने सिर्फ दो को ही चुना है क्योंकि जिसके बारे में मैं यहाँ बात करना चाहता हूँ उन्हें प्रदर्शित करने के लिए वे पर्याप्त हैं। ये दोनों अद्भुत काम वास्तव में बहुत ही आश्चर्यजनक हैं, और अनुग्रह के युग में वे प्रभु यीशु के चमत्कार के सच्चे प्रतिनिधि हैं।

पहले, आओ प्रथम अंश पर एक नज़र डालें: यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है।

"पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ" किस प्रकार का विचार है? पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ सामान्यतः कितने लोगों के लिए काफी होंगे। यदि तुम एक औसत इंसान की भूख के आधार पर माप करोगे, तो यह केवल दो व्यक्तियों के लिए ही काफी होगा। यह ही पाँच रोटियों और दो मछलियों का मुख्य विचार है। फिर भी, यह इस अंश में लिखा है कि पाँच रोटियों और दो मछलियों ने कितने लोगों को भोजन कराया? यह पवित्र शास्त्र में इस प्रकार दर्ज हैः "उस जगह बहुत घास थी: तब लोग जिनकी संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए।" पाँच रोटियों और दो मछलियों की तुलना में, क्या पाँच हज़ार एक बड़ी संख्या है? इसका क्या मतलब है कि यह संख्या इतनी बड़ी थी? मानवीय दृष्टिकोण से, पाँच हज़ार लोगों के बीच पाँच रोटियों और दो मछलियों को बाँटना असंभव होगा, क्योंकि उनके बीच का अंतर बहुत बड़ा है। भले ही प्रत्येक व्यक्ति बस एक छोटा सा टुकड़ा खाए, फिर भी यह पाँच हज़ार लोगों के लिए काफी नहीं होगा। परन्तु यहाँ, प्रभु यीशु ने एक चमत्कार किया—उसने ना केवल पाँच हज़ार लोगों को भरपेट भोजन कराया, बल्कि वहाँ कुछ बच भी गया था। पवित्र शास्त्र कहता हैः "जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका न जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खाने वालों से बच रहे थे बारह टोकरियाँ भरीं।" इस चमत्कार ने लोगों को प्रभु यीशु की पहचान और स्थिति को देखने की अनुमति दी, और इसने उन्हें यह देखने की भी अनुमति दी कि परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है—उन्होंने परमेश्वर की सर्वसामर्थता की सच्चाई को देखा। पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पर्याप्त थी, परन्तु यदि कोई भोजन ही नहीं होता तो क्या परमेश्वर पाँच हज़ार लोगों को भोजन करा सकता था? हाँ वास्तव में वह करा सकता था! यह एक चमत्कार था, लोगों ने आवश्यक रूप से महसूस किया कि यह उनके समझ से बाहर है और यह भी महसूस किया कि यह अविश्वसनीय और रहस्यमयी है, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कार्य करना कोई बड़ी बात नहीं थी। जबकि यह परमेश्वर के लिए एक सामान्य चीज़ थी, तो इसे अनुवाद के लिए अलग क्यों किया गया होगा? क्योंकि इस चमत्कार के पीछे प्रभु यीशु की इच्छा छिपी हुई थी, जिसे मानवजाति के द्वारा कभी भी खोजा नहीं गया था।

पहले, आओ ये समझने का प्रयास करें कि ये पाँच हज़ार लोग किस प्रकार के इंसान थे। क्या वे प्रभु यीशु के अनुयायी थे? पवित्र शास्त्र से हम जानते हैं कि वे प्रभु यीशु के अनुयायी नहीं थे। क्या वे जानते थे कि प्रभु यीशु कौन है? बिल्कुल भी नहीं! सब से कम, वे जानते ही नहीं थे कि वह व्यक्ति जो उनके सामने खड़ा है वह प्रभु यीशु था, या हो सकता है कि कुछ लोग जानते हों कि उसका नाम क्या था, और उन चीज़ों को जो उसने किया था उसके बारे में कुछ जानते हो या कुछ सुना हो। वे मात्र कहानियों के द्वारा प्रभु यीशु के विषय में उत्सुक थे, परन्तु तुम लोग निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते हो कि वे उसका अनुसरण करते थे, और उसे बिल्कुल नहीं समझते थे। जब प्रभु यीशु ने इन पाँच हज़ार लोगों को देखा, वे भूखे थे और भरपेट भोजन करने के सिवाए कुछ भी नहीं सोच सकते थे, इ इस प्रकार इस सन्दर्भ में प्रभु यीशु ने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया था। जब उसने उनकी इच्छाओं को तृप्त किया, तो उसके हृदय में क्या था? इन लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्ति क्या थी जो केवल भरपेट भोजन करना चाहते थे? इस समय, प्रभु यीशु के विचार और उसकी मनोवृत्तियाँ को परमेश्वर के स्वभाव और सार के साथ कार्य करना था। इन पाँच हज़ार लोगों का सामना करते हुए जो खाली पेट थे जो केवल एक बार का पूरा भोजन खाना चाहते थे, और ऐसे लोगों का सामना करते हुए जो उसके प्रति उत्सुकता और आशाओं से भरे हुए थे, प्रभु यीशु ने केवल इस चमत्कार का प्रयोग कर उन पर अनुग्रह करने के बारे में सोचा था। फिर भी, उसे यह आशा प्राप्त नहीं हुई कि वे उसके अनुयायी बन जाएँगे, क्योंकि वह जानता था कि वे मौज मस्ती करना और पेट भरकर खाना चाहते थे, इसलिए वहाँ जो कुछ उसके पास था उसने उससे अपना बेहतरीन कार्य किया, और पाँच हज़ार को भोजन कराने के लिए पाँच रोटियों और दो मछलियों का उपयोग किया। उसने उन लोगों की आँखों को खोल दिया जो मनोरंजन का आनंद ले रहे थे, और जो चमत्कार देखना चाहते थे, और उन्होंने अपनी आँखों से उन चीज़ों को देखा जिन्हें देहधारी परमेश्वर पूर्ण कर सकता था। यद्यपि प्रभु यीशु ने उनकी उत्सुकता को सन्तुष्ट करने के लिए कुछ स्पर्शगम्य चीज़ों का प्रयोग किया, क्योंकि वह पहले से ही अपने हृदय में जानता था कि ये पाँच हज़ार लोग बस एक बढ़िया भोजन करना चाहते थे, इसलिए उसने उन्हें कुछ भी नहीं कहा या उन्हें बिल्कुल भी प्रचार नहीं किया—उसने बस उन्हें उस चमत्कार को घटित होते हुए देखने दिया। उसने इन लोगों से बिल्कुल वैसा बर्ताव नहीं किया जैसा वह अपने चेलों के साथ करता था जो सचमुच में उसका अनुसरण करते थे, परन्तु परमेश्वर के हृदय में, सभी जीवधारी उसके शासन के अधीन थे, और वह अपनी दृष्टि में सभी जीवधारियों को जब जरूरी हो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति देता था। भले ही ये लोग नहीं जानते थे कि वह कौन था या वे उसे समझते नहीं थे, या रोटियों और मछलियों को खाने के बाद उनके ऊपर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं था या परमेश्वर के प्रति उनके पास कोई धन्यवाद नहीं था, फिर भी यह कुछ ऐसा नहीं था जिससे परमेश्वर को परेशानी हो—उसने उन्हें परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने के लिए एक बढ़िया अवसर दिया था। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर जो भी करता है उसके प्रति वह सैद्धांतिक होता है, और वह अविश्वासियों की निगरानी या उनकी सुरक्षा नहीं करता है, और वह विशेष रूप से उन्हें अपने अनुग्रह का आनंद उठाने की अनुमति नहीं देता है। क्या मामला वास्तव में ऐसा ही है? परमेश्वर की नज़रों में, जब तक वे एक जीवित प्राणी हैं जिन्हें स्वयं उसने ही बनाया है, वह उनके लिए प्रबन्ध करता रहेगा और उनकी परवाह करता रहेगा; वह उनसे व्यवहार करेगा, उनके लिए योजना बनाएगा, और विभिन्न तरीकों से उन पर शासन करेगा। ये सभी चीज़ों के प्रति परमेश्वर के विचार और उसकी प्रवृत्ति हैं।

यद्यपि पाँच हज़ार लोग जिन्होंने रोटियों और मछलियों को खाया था उन्होंने प्रभु यीशु का अनुसरण करने की योजना नहीं बनाई थी, फिर भी वह उनके प्रति कठोर नहीं था; एक बार जब उन्होंने भर पेट खा लिया, तो क्या तुम लोग जानते हो कि प्रभु यीशु ने क्या किया था? क्या उसने उनको कुछ प्रचार किया? इसे करने के बाद वह कहाँ गया था? पवित्र शास्त्र मे ऐसा कुछ भी नहीं लिखा है कि प्रभु यीशु ने उनसे कुछ कहा था; जब उसने अपने चमत्कार पूर्ण कर लिए तो वह चुपके से चला गया। तो क्या उसने इन लोगों से कुछ अपेक्षाएँ कीं? क्या वहाँ कोई नफरत थी? वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था—वह बस इन लोगों पर जो उसका अनुसरण नहीं कर सकते थे आगे से कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, और इस समय उसका हृदय दर्द में था। क्योंकि उसने मानवजाति की भ्रष्टता को देखा था और उसने मानवजाति के द्वारा ठुकराए जाने का एहसास किया था, और जब उसने इन लोगों को देखा या जब वह उनके साथ था, तो मनुष्य की मूढ़ता और अज्ञानता ने उसे बहुत ही दुखी कर दिया और उसके हृदय को दर्द में छोड़ दिया था, इसलिए वह इन लोगों को जितना जल्दी हो सके छोड़कर चला जाना चाहता था। प्रभु को अपने हृदय में इनसे कोई अपेक्षाएँ नहीं थीं, वह उन पर कोई ध्यान देना नहीं चाहता था, विशेषकर वह उन पर अपनी ऊर्जा को खर्च करना नहीं चाहता था, और वह जानता था कि वे उसके पीछे पीछे नहीं आएँगे—इन सभी के बावजूद भी, तब भी उनके प्रति उसकी मनोवृत्तियाँ बिल्कुल साफ थी। वह बस उनके साथ अच्छा बर्ताव करना चाहता था, उन्हें अनुग्रह देना चाहता था—अपने शासन के अधीन प्रत्येक जीवधारी के प्रति यह परमेश्वर की प्रवृत्ति थीः प्रत्येक जीवधारी के साथ अच्छा बर्ताव करना, उनके लिए प्रयोजन करना, उनका पालन पोषण करना। वह मुख्य कारण जिसके लिए प्रभु यीशु ने देहधारण किया था, उसने बहुत ही प्राकृतिक ढंग से स्वयं परमेश्वर के सार को प्रकाशित किया था और इन लोगों के साथ अच्छा बर्ताव किया था। उसने उनसे दया और सहिष्णुता के हृदय के साथ अच्छा व्यवहार किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इन लोगों ने प्रभु यीशु को किस प्रकार देखा, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वहाँ किस प्रकार का परिणाम होगा, उसने बस हर प्राणी के साथ समस्त सृष्टि के प्रभु के रूप में अपने पद के आधार पर व्यवहार किया। उसने जो प्रकट किया वह था, बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का स्वभाव, और परमेश्वर का स्वरूप इस प्रकार प्रभु यीशु ने खामोशी से कुछ किया था, फिर वह खामोशी से चला गया—यह परमेश्वर के स्वभाव का कौन सा पहलू है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह परमेश्वर की करूणा है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि परमेश्वर निःस्वार्थ है? क्या कोई नियमित व्यक्ति ऐसा कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं! सार रूप में, ये पाँच हज़ार लोग कौन थे जिन्हें प्रभु यीशु ने पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ खिलायी थीं? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे ऐसे लोग थे जो उसके अनुकूल थे? क्या तुम लोग कह सकते हो कि वे सभी परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण थे? ऐसा निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि वे वास्तव में प्रभु यीशु के अनुरूप नहीं थे, और उनका सार बिल्कुल परमेश्वर के विरूद्ध था। परन्तु परमेश्वर ने उनसे कैसा बर्ताव किया था? उसने परमेश्वर के प्रति लोगों के विरोध को थोड़ा कम करने के लिए एक तरीके का प्रयोग किया था—इस तरीके को कहते हैं "कृपालुता।" अर्थात्, यद्यपि प्रभु यीशु ने उन्हें पापियों के रूप में देखा था, फिर भी परमेश्वर की नज़रों में वे तब भी उसकी रचना थे, इस प्रकार उसने इन पापियों से भी कृपा के साथ व्यवहार किया था। यह परमेश्वर की सहनशक्ति है, और इस सहनशक्ति का निर्धारण स्वयं परमेश्वर की पहचान और सार से किया जाता है। इस प्रकार, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर के द्वारा सृजे गए किसी भी मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है—केवल परमेश्वर ही इसे कर सकता है।

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसकी प्रवृत्तियों की सचमुच में प्रशंसा करते हो, और जब तुम सचमुच में प्रत्येक जीवधारी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हो, तो तुम उसके द्वारा सृजे गए मनुष्यों में से प्रत्येक के ऊपर खर्च किए जा रहे लगन और प्रेम को समझने में भी सक्षम हो सकते हैं। जब ऐसा होता है, तुम दो शब्दों को देखोगे जो परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं—और वे दो शब्द क्या हैं?कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "मानव प्रेम।" इन दोनों में "मानव प्रेम" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह एक शब्द है जिसे लोग एक व्यक्ति के व्यापक—मस्तिष्क के विचारों और भावनाओं की व्याख्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। मैं सचमुच में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह बिना समझे बूझे, अव्यवस्थित रूप से, और सिद्धांतों की परवाह किए बगैर उदारता प्रदान करने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों का अत्याधिक भावनात्मक प्रकटीकरण है। जब इस शब्द का प्रयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो वहाँ पर ईश्वर की निदा करने का एक इरादा अवश्य होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो और अच्छे से परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं—वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "बहुत ज़्यादा" क्या यह शब्द पूर्णत: बुलाहट से भरा हुआ नहीं है? दूसरा है "अति विशाल।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैंने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए प्रयोग किया है। शब्दशः लेते हुए, "बहुत ज़्यादा" किसी चीज़ के घनफल और क्षमता की व्याख्या करता है, पर इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वह चीज़ कितना बड़ा है—यह कुछ ऐसा है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, वह एक अदृश्य पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को आभास देता है कि यह अपेक्षाकृत यथार्थ और व्यावहारिक है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे एक समतल या त्रिआयामी कोण से देख रहे हो; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि "बहुत ज़्यादा" शब्द का प्रयोग करते हुए परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम को तौला जा रहा है, फिर भी, यह हमें यह एहसास भी देता है कि उसके प्रेम को तौला नहीं जा सकता है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम को तौला जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अस्तित्वहीन नहीं है, और ना ही वह किसी पौराणिक कथा से आया है। उसके बजाए, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की अधीनता में सभी जीवधारियों के द्वारा आपस में बाँटा जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद सभी जीवधारियों के द्वारा विभिन्न मात्राओं और विभिन्न दृष्टिकोणों के तहत लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवन और आवश्यक सामग्रियाँ लेकर आता है जैसा कि यह थोड़ा थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकाशित होता रहता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम को गिनते हैं और उसकी गवाही देते हैं जिसका वे हर एक क्षण आनंद लेते हुए बिताते हैं। मैं कहता हूँ परमेश्वर के प्रेम को नापा तौला नहीं जा सकता है क्योंकि परमेश्वर का भेद कुछ ऐसा है जिसकी गहराई को मनुष्य नहीं नाप सकते हैं जो सभी चीज़ों के लिए प्रबन्ध करता है और उनका पालन पोषण करता है, सभी चीज़ों के लिए, और विशेषकर उस मानवजाति के लिए परमेश्वर के विचार ऐसे ही हैं। ऐसा कहना चाहिए, कोई नहीं जानता है उस लहू और आसूँओं को जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए बहाया है। मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता के प्रेम की गहराई और बोझ को कोई भी नहीं बूझ सकता है, और कोई समझ नहीं सकता है, जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था। परमेश्वर के प्रेम को अपरिमित के रूप में वर्णन करना लोगों की सहायता करना है ताकि वे उसकी व्यापकता और उसके अस्तित्व की सत्यता की तारीफ कर सकें और उसे समझ सकें। यह इसलिए भी है जिससे लोग अधिक गहराई से "सृष्टिकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को समझ सकें, और जिससे लोग "सृष्टि" के विशेष नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ को प्राप्त कर सकें। "अति विशाल" शब्द सामान्यतः क्या प्रदर्शित करता है? यह साधारणतः महासागरों या विश्व के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे अतिविशाल विश्व, या अतिविशाल महासागर। विश्व की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से कहीं परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और गंभीरता उनकी दृष्टि में तो हैं किन्तु उनकी पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तुम उसकी व्यापकता के बारे में सोचते हो—तो वह असीमित दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और उसके समावेश को देखते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए "अति विशाल" शब्द का प्रयोग किया है। यह लोगों को यह महसूस करने में सहायता करता है कि वह कितना बहुमूल्य है, और वे उसके प्रेम की अत्यंत सुंदरता का एहसास कर सकें, और यह कि परमेश्वर के प्रेम की ताकत असीमित एवं अति विस्तृत है। यह उनके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिश्ठा और उसके उल्लंघन ना किए जा सकने वाले गुण का एहसास करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के जरिए प्रकाशित हुआ है। अब क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए "अति विशाल" उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर का प्रेम इन दो शब्दों "बहुत ज़्यादा" और "अति विशाल" के अनुसार खरा उतरता है? बिल्कुल! मानवीय भाषा में, केवल ये दो शब्द ही अपेक्षाकृत उपयुक्त हैं, और परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोग ऐसा नहीं सोचते हो? यदि तुम लोग मुझे परमेश्वर के प्रेम के बारे में विवरण देते, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का प्रयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि परमेश्वर का प्रेम तुम लोगों की की समझ एवं मूल्यांकन के एक समतल दृष्टिकोण तक सीमित है, और अभी तक त्रि-आयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँचा है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाऊँ, तो तुम लोग महसूस करोगे कि तुम लोगों के पास शब्दों का अभाव है; और यहाँ तक कि तुम लोग निःशब्द भी हो जाओगे। आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने तुम लोगों से बात की है शायद तुम लोगों के लिए समझना कठिन हो, या हो सकता है कि तुम लोग यूँ ही उससे सहमत न हों। यह बस उस सच्चाई को बता सकती है कि परमेश्वर के प्रेम के विषय में तुम लोगों का मूल्यांकन और समझ सतही और एक सँकरे दायरे के भीतर है। मैंने पहले भी कहा है कि परमेश्वर निःस्वार्थ है — तुम लोगों को निःस्वार्थ शब्द याद है। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रेम को केवल निःस्वार्थ रूप में दर्शाया जा सकता है? क्या यह एक बहुत संकुचित दायरा नहीं है? इससे कुछ प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को इस मामले पर और मनन करना चाहिए।

ऊपर वह प्रथम अद्भुत काम है जिसमें हमने परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार को देखा था। भले ही यह एक कहानी है जिसे लोगों ने कई हज़ार सालों से पढ़ा है, इसकी एक सामान्य सी पटकथा है, और यह लोगों को एक सामान्य प्राकृतिक घटना को देखने की स्वीकृति देता है, फिर भी इस सामान्य घटना में हम कुछ देख सकते हैं जो अधिक बहुमूल्य है, और वह है परमेश्वर का स्वभाव एवं जो उसके पास है तथा जो वह है। ये चीज़ें जो उसके पास हैं तथा जो वह है स्वयं परमेश्वर को दर्शाते हैं, और स्वयं परमेश्वर के विचारों का एक प्रकटीकरण है। जब परमेश्वर अपने विचारों को व्यक्त करता है, तो यह स्वयं उसके हृदय की आवाज़ की अभिव्यक्ति है। वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसे समझेंगे, उसे जानेंगे, और उसकी इच्छा को बूझेंगे, और वह आशा करता है कि ऐसे लोग होंगे जो उसके हृदय की आवाज़ को सुन सकते हैं और उसकी इच्छा को संतुष्ट करने के लिए सक्रियता से सहयोग कर सकेंगे। और ये चीज़ें जिन्हें प्रभु यीशु ने किया था वे परमेश्वर का खामोश प्रकटीकरण था।

आगे, आओ इस अंश को देखें: लाजर के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की।

इस अंश को पढ़ने के बाद इसका तुम लोगों के ऊपर क्या प्रभाव पड़ा? प्रभु यीशु के द्वारा किए गए इस चमत्कार का महत्व पहले से कहीं ज़्यादा था क्योंकि कोई भी चमत्कार किसी मरे हुए इंसान को क़ब्र से बाहर लाने से बढ़कर आश्यचर्यजनक नहीं हो सकता है। प्रभु यीशु का ऐसा कुछ करना उस युग में बहुत ही ज़्यादा महत्वपूर्ण था। क्योंकि परमेश्वर देहधारी हो गया था, लोग केवल उसके शारीरिक रूप, उसके व्यावहारिक पक्ष, और उसके महत्वहीन पक्ष को ही देख पाते थे। यदि किसी ने उसके कुछ गुणों या कुछ सामर्थ को देखा और समझा जैसा उसमें दिखाई देता था, फिर भी कोई नहीं जानता था कि प्रभु यीशु कहाँ से आया है, उसका सार क्या है, और वह वास्तव में इससे ज़्यादा क्या कर सकता था। यह सब कुछ मानवजाति के लिए अंजान था। बहुत से लोग इन चीज़ों का प्रमाण माँगते थे, और सत्य को जानना चाहते थे। अपनी पहचान को साबित करने के लिए क्या परमेश्वर कुछ कर सकता है? परमेश्वर के लिए, यह ठण्डी हवा का एक झोंका था—यह एक केक के टुकड़े के समान था। वह कहीं पर भी, किसी भी समय अपनी पहचान और सार को साबित करने के लिए कुछ भी कर सकता था, परन्तु परमेश्वर ने चीज़ों को एक योजना के साथ, और चरणों में किया था। उसने चीज़ों को बिना सोच विचार के नहीं किया; उसने सही समय, और कुछ ऐसा करने के लिए जो मानवजाति के देखने में अर्थपूर्ण हो सही अवसर का इंतजार किया। इसने उसके अधिकार और उसकी पहचान को साबित किया। इस प्रकार तब, क्या लाजर के पुनरूत्थान ने प्रभु यीशु की पहचान को प्रमाणित किया? आओ पवित्र शास्त्र के इस अंश को देखें: "और यह कहकर, उसने बड़े शब्द से पुकारा, "हे लाज़र, निकल आ! जो मर गया था निकल आया।" जब प्रभु यीशु ने ऐसा किया, उसने बस एक चीज़ कहीः "लाज़रर निकल आ!" तब लाजर क़ब्र से बाहर निकल आया—यह प्रभु के द्वारा बोली गयी एक पंक्ति के कारण पूरा हुआ था। इस समय के दौरान, प्रभु यीशु ने कोई वेदी स्थापित नहीं की थी, और उसने कोई और गतिविधियाँ नहीं की थी। उसने बस एक बात कही। क्या इसे एक चमत्कार कहा जाएगा या एक आज्ञा? या यह किसी प्रकार का जादू था? सतही तौर पर, ऐसा दिखाई देता है कि इसे एक चमत्कार कहा जा सकता है, और यदि तुम इसे आधुनिक दृष्टिकोण से देखो तो, हाँ वास्तव में तुम इसे अभी भी अद्भुत काम कह सकते हो। फिर भी, एक आत्मा को मुर्दों में से बाहर लाने के लिए इसे जादू मंत्र कदापि नहीं कह सकते हैं, और जादू टोना तो बिल्कुल भी नहीं। ऐसा कहना सही है कि यह चमत्कार अत्याधिक सामान्य था, जो सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक छोटा सा प्रदर्शन था। यह परमेश्वर का अधिकार, और परमेश्वर की योग्यता है। परमेश्वर के पास अधिकार है कि वह एक व्यक्ति से उसका प्राण ले सकता है, और उसके आत्मा को उसके शरीर से जुदा कर के अधोलोक में, या जहाँ कहीं भी उसे जाना चाहिए, भेज सकता है। जब कोई मरता है, तो मृत्यु के बाद वे कहाँ जाते हैं—ये सब परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया जाता है। वह इसे किसी भी समय और कहीं भी कर सकता है। उसे मनुष्यों, घटनाओं, पदार्थों, समय के अन्तराल, या स्थान के द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है। यदि वह इसे करना चाहता है तो वह इसे कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ें और जीवित प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, और सभी चीज़ें उसके वचन, और उसके अधिकार के द्वारा जीवित रहते हैं और मृत हो जाते हैं। वह एक मृत व्यक्ति को पुनरूत्थित कर सकता है—यह भी कुछ ऐसा है जिसे वह किसी भी समय, और किसी भी स्थान पर कर सकता है। यह वह अधिकार है जो केवल सृष्टिकर्ता के पास है।

जब प्रभु यीशु ने कुछ ऐसा किया जैसे लाज़र को मृतकों में से वापस लाना, तब उसका उद्देश्य था कि मनुष्यों और शैतान को दिखाने के लिए प्रमाण दे, ताकि मनुष्य और शैतान जान सकें कि मनुष्यों की सभी चीज़ों, और मनुष्यों का जीवन और उनकी मृत्यु परमेश्वर के द्वारा निर्धारित होती है, और यह कि भले ही वह देहधारी हो गया था, फिर भी उसने हमेशा की तरह भौतिक संसार को अपनी अधीनता में बनाए रखा था जिसे मनुष्य देख सकते हैं साथ ही साथ आध्यात्मिक संसार को भी जिसे देख नहीं सकते हैं। यह इसलिए था कि मनुष्य और शैतान जानें कि मानवजाति का सब कुछ शैतान की अधीनता में नहीं है। यह परमेश्वर के अधिकार का प्रकाशन और प्रदर्शन था, और यह सभी चीज़ों को संदेश देने हेतु परमेश्वर का एक तरीका भी था कि मानवजाति का जीवन और उनकी मृत्यु उसके हाथों में है। प्रभु यीशु के द्वारा लाजर का पुनरूत्थान—इस प्रकार की पहुँच मानवजाति को शिक्षा और निर्देश देने के लिए सृष्टिकर्ता का एक तरीका था। यह एक ठोस कार्य था जिसमें उसने मानवजाति को निर्देश देने, और उनके लिए प्रबन्ध करने के लिए अपनी योग्यता और अधिकार का प्रयोग किया था। मानवजाति को उस सत्य को देखने की अनुमति देने के लिए कि वह सभी चीज़ों को अपनी अधीनता में रखता है, यह सृष्टिकर्ता का एक ऐसा मार्ग था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता था। यह उसका एक मार्ग था ताकि वह मानवजाति को व्यावहारिक कार्यों के जरिए यह बता सके कि उसके बगैर कोई उद्धार नहीं है। मानवजाति को इस प्रकार के निर्देश देने के उसके खामोश माध्यम सर्वदा बने रहते हैं—यह अमिट है, और इसने मनुष्य के हृदय को एक आघात और प्रकाश रूपी ज्ञान दिया है जो कभी धूमिल नहीं हो सकते हैं। लाज़र के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की महिमा की—इसका परमेश्वर के हर एक अनुयायी पर एक गहरा प्रभाव पड़ा है। यह प्रत्येक व्यक्ति की समझ में मज़बूती से जड़ जाता है जो गहराई से इस घटना, और उस दर्शन को समझता है कि केवल परमेश्वर ही मानवजाति के जीवन और मृत्यु पर शासन कर सकता है। यद्यपि परमेश्वर के पास इस प्रकार का अधिकार है, और यद्यपि उसने मानवजाति के जीवन और मृत्यु के ऊपर अपनी सर्वोच्चता के बारे में लाज़र के पुनरूत्थान के जरिए एक सन्देश भेजा है, फिर भी यह उसका प्राथमिक कार्य नहीं था। परमेश्वर कोई कार्य बिना किसी आशय के कभी नहीं करता है। हर एक चीज़ जो वह करता है उसका बड़ा महत्व है; यह सब एक अति उन्नत ख़ज़ाना है। वह एक व्यक्ति के क़ब्र से बाहर आने को अपने कार्य का प्राथमिक या एकमात्र उद्देश्य या चीज़ बिल्कुल भी नहीं बनाएगा। परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करता है जिसका कोई आशय ना हो। लाज़र का एक पुनरूत्थान परमेश्वर के अधिकार को प्रदर्शित करने के लिए काफी था। यह प्रभु यीशु की पहचान को साबित करने के लिए पर्याप्त था। इसीलिए प्रभु यीशु ने इस प्रकार के चमत्कार को फिर से नहीं दोहराया था। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धांतों के अनुसार कार्यों को करता है। मानव भाषा में, यह इस प्रकार होगा कि परमेश्वर गंभीर कार्य को लेकर सचेत है। अर्थात्, जब परमेश्वर चीज़ों को करता है तब वह अपने कार्य के उद्देश्य से भटकता नहीं है। वह जानता है कि इस स्तर पर उसे कौन सा कार्य करना चाहिए, वह क्या पूरा करना चाहता है, और वह अपनी योजना के अनुसार कड़ाई से कार्य करेगा। यदि एक भ्रष्ट व्यक्ति के पास इस प्रकार की काबिलियत होती, तो वह बस अपनी योग्यता को प्रदर्शित करने के तरीकों के बारे में ही सोचता रहेगा ताकि लोगों को पता चल सके कि वह कितना भयंकर था, इस प्रकार वे उसके सामने झुक जाते, इस प्रकार वह उन्हें नियन्त्रित कर सकता था और उन्हें निगल सकता था। यह वह बुराई है जो शैतान से आती है—इसे भ्रष्टता कहते हैं। परमेश्वर के पास इस प्रकार का स्वभाव नहीं है, और उसके पास इस प्रकार का सार भी नहीं है। इन चीज़ों को करने में उसका उद्देश्य अपने आपको बड़ा दिखाना नहीं है, परन्तु मानवजाति को और अधिक प्रकाशन और मार्गदर्शन प्रदान करना है, इस प्रकार लोग बाइबल में इस तरह की चीज़ों के बहुत कम ही उदाहरणों को देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभु यीशु की योग्यताएँ सीमित थीं, या वह इस प्रकार की चीज़ को नहीं कर सकता था। यह केवल इसलिए है कि परमेश्वर ऐसा नहीं करना चाहता था, क्योंकि प्रभु यीशु के द्वारा लाजर के पुनरूत्थान का बहुत ही व्यावहारिक महत्व था, और साथ ही क्योंकि देहधारी परमेश्वर के कार्य की प्राथमिकता चमत्कार करना नहीं था, यह लोगों को मुर्दों में से वापस लाना नहीं था, किन्तु यह मानवजाति के छुटकारे के कार्य को करना था। इस प्रकार, प्रभु यीशु के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य का अधिकांश भाग था लोगों को शिक्षा देना, उनके लिए प्रबन्ध करना, एवं उनकी सहायता करना, और ऐसी चीज़ें जैसे लाजर का पुनरूत्थान उसकी सेवकाई का मात्र एक छोटा सा अंश था जिसे प्रभु यीशु ने किया था। उससे भी अधिक, तुम लोग कह सकते हो कि "अपनी बड़ाई करना" परमेश्वर के सार का एक भाग नहीं था, इस प्रकार अधिक चमत्कारों को नहीं दिखाना जानबूझकर किया गया प्रतिरोध नहीं था, और ना ही यह वातावरण की सीमाओं के कारण था, और योग्यता की कमी तो बिल्कुल भी नहीं थी।

जब प्रभु यीशु लाज़र को मृतकों में से वापस जीवित किया, तो उसने एक पंक्ति का उपयोग किया: "लाज़र निकल आ!" उसने इसके अलावा कुछ भी नहीं कहा था—ये शब्द क्या दर्शाते हैं? ये दर्शाते हैं कि परमेश्वर बोलने के द्वारा कुछ भी पूरा कर सकता है, जिस में एक मरे हुए इंसान को जीवित करना भी शामिल है। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, जब उसने जगत को बनाया, उसने ऐसा अपने वचनों के द्वारा किया था। उसने बोले गए आज्ञाओं, एवं अधिकार के वचनों का प्रयोग किया था, और बस इस प्रकार सभी चीज़ों की सृष्टि हो गई थी। यह इसी प्रकार पूरा हुआ था। यह एक मात्र पंक्ति जो प्रभु यीशु के द्वारा कही गयी वह परमेश्वर के द्वारा कहे गए उस वचन के समान थी जब उसने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की थी; उसमें परमेश्वर का अधिकार, और सृष्टिकर्ता की योग्यता एक समान थी। परमेश्वर के मुँह के वचनों के कारण सभी चीज़ों को बनाया गया और वे स्थिर हुए, और बिल्कुल वैसे ही प्रभु यीशु के मुँह से बोले गए वचन के कारण लाज़र अपनी क़ब्र से बाहर आ गया। यह परमेश्वर का अधिकार था, जो उसके देहधारी शरीर में प्रदर्शित और सिद्ध हुआ था। इस प्रकार का अधिकार और योग्यता सृष्टिकर्ता का था, और मनुष्य के पुत्र का था जिस में सृष्टिकर्ता सिद्ध हुआ था। या वह समझ है जिसे परमेश्वर के द्वारा लाज़र को मृतकों में से वापस लाकर मानवजाति को सिखाया गया है। इस शीर्षक पर बस इतना ही। आगे, आओ पवित्र शास्त्र को पढ़ें।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
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