अपना कर्तव्‍य सही ढंग से पूरा करने के लिए सत्‍य को समझना सबसे महत्त्वपूर्ण है (भाग एक)

अपने कर्तव्य के मानक के अनुरूप निर्वहन के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात सत्य के लिए बड़ा प्रयास करना है। केवल सत्य सिद्धांतों को समझकर ही लोग इन सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं। इसके अलावा, लोगों को अपने कर्तव्यों से संबंधित विशेषज्ञता के विभिन्न क्षेत्रों और विशेष कौशल के बारे में सीखना होता है, और कुछ सरल और व्यावहारिक तकनीकों को सीखना अनिवार्य है। कुछ लोगों के पास थोड़ी तकनीकी विशेषज्ञता होती है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि अपने कर्तव्यों में उन्हें कैसे लागू किया जाए। जब वे कोई काम करते हैं, तो उनके मन में उस मामले को लेकर कभी स्पष्टता नहीं होती। वे नहीं जानते कि काम करने का कौन-सा तरीका सही है, सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है, और दूसरों को लाभ पहुँचा सकता है, या कौन-सा तरीका गलत है और सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। उनका दिमाग भ्रमित रहता है। उन्हें लगता है कि यह रास्ता तो सही है, लेकिन दूसरे रास्ते भी संभव हैं। वे कभी भी निश्चित नहीं कर पाते कि उचित तरीके से काम कैसे किया जाए और न ही यह जानते हैं कि ऐसा अभ्यास कैसे किया जाए ताकि सही मार्ग पर चला जा सके। इससे क्या सिद्ध होता है? (वे सत्य को नहीं समझते।) ये लोग सत्य को नहीं समझते, और अपनी आंतरिक स्थिति और बहुत-सी चीजों के बारे में अपनी समझ और मूल्यांकन मानकों के संबंध में अस्पष्टता की स्थिति में होते हैं। जब वे कोई काम नहीं कर रहे होते, तो उन्हें लगता है कि वे सब कुछ समझते हैं और उनके लिए सब कुछ आसान है। लेकिन जब उन्हें सच में किसी वास्तविक जीवन स्थिति का सामना करना पड़ता है, तो वे नहीं जानते कि इसे किस रूप में लें, इससे कैसे निपटें, या आगे बढ़ने का सही तरीका क्या है। सिर्फ तभी उन्हें लगता है कि उनके पास कुछ भी नहीं है और वे सत्य को जरा भी नहीं समझते हैं। जिन धर्म-सिद्धांतों पर वे पहले चर्चा करते आए हैं, वे बेकार हैं। ऐसे में उनके पास दूसरों से पूछने और उनके साथ स्थिति पर बात करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। जब सत्य को न समझने वाले लोग किसी स्थिति का सामना करते हैं, तो यही होता है—वे असमंजस में होते हैं, बेचैनी से भरे होते हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करना गलत होगा और वैसा करना भी सही नहीं होगा, और वे सही रास्ता नहीं खोज पाते। ऐसी स्थिति में ही वे देख पाते हैं कि सत्य के बिना एक भी कदम चल पाना वास्तव में कठिन है! इस वक्त ऐसे लोगों को सबसे ज्यादा किसकी जरूरत होती है? शैतानी फलसफे और ज्ञान की, या सत्य की समझ की? सबसे अहम बात है सत्य को समझना। यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो भले ही तुम कोई काम पूरा कर लो, तुम इसके बारे में अनिश्चित महसूस करोगे। तुम्हें पता नहीं होगा कि उस काम को तुमने ठीक से किया है या नहीं और काम पूरा होने के बाद उसका परिणाम क्या होगा। तुम ये चीजें माप नहीं सकते। तुम उन्हें माप क्यों नहीं पाते? तुम्हारा हृदय सदैव अनिश्चितता से क्यों भरा रहता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब तुम कुछ करते हो, तो तुम निश्चित नहीं होते कि तुम उसे ऐसे तरीके से कर रहे हो जो वास्तव में और सचमुच सिद्धांतों के अनुरूप है, कि तुम जिसका अभ्यास कर रहे हो वह सिद्धांत है या नहीं, और तुम्हारा अभ्यास सत्य के अनुरूप है या नहीं। तुम इसे सत्यापित नहीं कर सकते। यदि अपना कर्तव्य निभाने से तुम्हें कोई छोटा-मोटा परिणाम प्राप्त होता है, तो तुम्हें लगता है कि तुम बहुत काबिल हो और तुमने कुछ पूँजी अर्जित कर ली है, और आत्मसंतुष्ट हो जाते हो। परंतु, यदि कोई स्पष्ट परिणाम नहीं मिलता या वह सिद्धांतों के मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो तुम तुरंत निराश हो जाओगे और सोचोगे, “परमेश्वर मुझे कब प्रबुद्ध करेगा? परमेश्वर हमेशा दूसरों को प्रबुद्ध क्यों करता है, जबकि मुझे कोई प्रेरणा, कोई प्रबोधन और कोई रोशनी नहीं मिलती?” कभी-कभी तुम महसूस कर सकते हो कि तुमने सही इरादों के साथ काम किया है और बहुत अधिक मेहनत की है, इसलिए तुम आशा करते हो कि परमेश्वर तुम्हारे प्रयास को खुशी-खुशी स्वीकृत करेगा, पहचानेगा और उसकी पुष्टि करेगा। पर, साथ-ही-साथ, तुम डरते भी हो कि परमेश्वर कहेगा कि तुमने गलत तरीके से काम किया है और वह उसका अनुमोदन नहीं करेगा। क्या इससे लाभ-हानि की चिंता प्रदर्शित नहीं होती? जब तुम देखते हो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद छोटा है, तुम बहुत विद्रोही और अहंकारी हो, और जब तुम कोई छोटी-सी चीज भी हासिल कर लेते हो, तो तुम आत्मतुष्ट हो जाते हो, तो तुम्हें लगेगा कि तुम बहुत भ्रष्ट हो, तुम एक दानव और एक शैतान हो और परमेश्वर के उद्धार के लायक नहीं हो। फिर कुछ और छोटी उपलब्धियाँ हासिल करने के बाद तुम सोचोगे कि आखिर तुम इतने बुरे भी नहीं, तुममें कुछ योग्यता तो है, तुम कुछ परिणाम हासिल कर सकते हो, और इसलिए तुमको पुरस्कृत किया जाना चाहिए। क्या इसमें लाभ और हानि की चिंता दिखती है? लाभ और हानि की चिंता की यह स्थिति किस कारण उत्पन्न होती है? इसका सीधा संबंध सत्य की समझ न होने से है। जब लोग सत्य को नहीं समझते हैं, तो उससे अनेक अवस्थाएँ और अनेक अभिव्यक्तियाँ उत्पन्न होती हैं। मुख्य बात यह है कि लोग अक्सर लाभ-हानि को लेकर चिंता में जीते हैं। यह उनकी सामान्य स्थिति है। चूँकि तुम सत्य को नहीं समझते, इसलिए तुम अपनी काबिलियतों को माप नहीं सकते; तुम नहीं जानते कि तुम क्या कर सकते हो और क्या नहीं। चूँकि तुम सत्य को नहीं समझते, इसलिए यह नहीं जानते कि अपना कर्तव्य निभाते समय किन सिद्धांतों और मानकों का पालन करना है, या किस परिणाम का लक्ष्य रखना है। तुम यह भी नहीं जानते कि जीवन का लक्ष्य और दिशा क्या है। तुम नहीं जानते कि परमेश्वर तुमसे नाराज क्यों है, परमेश्वर तुम्हारा अनुमोदन क्यों करता है, या परमेश्वर तुम्हारे प्रति सहनशील क्यों है—तुम इनमें से कुछ भी नहीं जानते। तुम नहीं जानते कि तुम्हें कहाँ खड़े होना चाहिए, और तुम यह नहीं माप सकते कि तुमने जो किया है उससे एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारा कर्तव्य पूरा हुआ या नहीं और क्या तुमने इसे मानक के अनुरूप किया है। कभी-कभी तुम डरे-डरे से काम करते हो, और कभी-कभी तुम निर्भीक और उन्मादी होते हो। तुम्हारी मनोदशा सदैव अस्थिर रहती है। किसी व्यक्ति की मनोदशा अस्थिर कैसे हो जाती है? अंततः इसका संबंध सत्य की समझ न होने से है। जब लोग सत्य को नहीं समझते, तो वे बिना सिद्धांतों के चीजें सँभालते हैं। जब वे काम करते हैं तो अत्यधिक अस्थिर होते हैं, और किसी-न-किसी तरीके से हमेशा अचूक ढंग से भटकते रहते हैं। जब वे कुछ नहीं कर रहे होते तो वे ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे वे सब कुछ समझते हों और वे धर्म-सिद्धांतों पर बखूबी बोलते हैं—लेकिन जब कुछ हो जाता है और उनसे कहा जाता है कि वे इसे सुलझाएँ, अपनी समझ के सभी सत्यों को वास्तविक जीवन में लागू करें तो उनके पास कोई राह नहीं होती, उन्हें पता नहीं होता कि किस सिद्धांत का उपयोग करें और वे अपने आप से कहते हैं, “मैं समझता हूँ कि मुझे अपना कर्तव्य समर्पित होकर निभाना चाहिए, मुझे ईमानदार होना चाहिए, मुझे परमेश्वर के बारे में धारणाएँ या गलतफहमियाँ नहीं पालनी चाहिए, मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पणशील होना चाहिए—लेकिन मैं इसे वास्तव में कैसे संभालूँ?” वे इस पर विचार करते रहते हैं और विनियमों को लागू करने का प्रयास करते रहते हैं, और अंत तक उन्हें पता ही नहीं चलता कि किन विनियमों को लागू करना चाहिए। क्या तुम लोग सोचते हो कि जिस व्यक्ति को उसके साथ कुछ घटित होने पर परमेश्वर के वचनों की पुस्तक में खोजना पड़ता हो, वह ऐसा व्यक्ति है जिसे सत्य की समझ है? यह सत्य को वास्तव में समझना नहीं है। ऐसे लोग केवल कुछ धर्म-सिद्धांतों को समझते हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक इन सत्यों की वास्तविकता को नहीं समझा है। इससे पता चलता है कि वे लोग आम तौर पर जो कहते हैं, और जिसके बारे में समझ होने का विश्वास करते हैं, वे धर्म-सिद्धांतों के सिवाय और कुछ नहीं हैं। यदि तुम सत्य को समझते हो, यदि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता है, तो जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो, तो तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के इरादे के अनुसार कैसे कार्य करना है, और सिद्धांत की सीमा के भीतर कैसे कार्य करना है। यदि तुम जो भी समझते हो वह केवल धर्म-सिद्धांत है—सत्य नहीं है—तो जब वास्तव में तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो यदि तुम धर्म-सिद्धांत के सहारे रहते हो और विनियमों का पालन करते हो, तो तुम्हारे पास कोई रास्ता नहीं होगा। तुम सिद्धांत नहीं खोज पाओगे और अभ्यास का मार्ग नहीं ढूँढ़ पाओगे। कहने का मतलब यह है कि, ऐसा प्रतीत हो सकता है जैसे तुम सत्य के एक पक्ष को समझते हो, जैसे तुम उन सत्य वचनों का अर्थ समझते हो, और जैसे तुम परमेश्वर के इरादों को और जो परमेश्वर माँगता है उसे थोड़ा-बहुत समझते हो—जैसे कि तुम यह सब जानते हो—लेकिन जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम सत्य को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हो, तुम आँख मूँदकर विनियमों को लागू करते हो और चीजों को गड़बड़ कर देते हो। क्या यह शर्मनाक नहीं है? जब वास्तव में सत्य को समझने वाले लोगों के साथ कुछ घटित होता है, तो वे अभ्यास के लिए सिद्धांतों को ढूँढ़ने में सक्षम होते हैं, उनके पास अभ्यास का एक मार्ग होता है, और वे सत्य सिद्धांतों को अभ्यास में ला सकते हैं। केवल शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकने वाले लोगों की बात करें, तो ऐसा लगता है जैसे कि वे सत्य को समझते हैं, लेकिन कार्य करने का समय आने पर वे पूरे संभ्रमित हो जाते हैं। इससे साबित होता है कि जो लोग शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे सत्य को बिल्कुल नहीं समझते। जो लोग शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे दूसरों को गुमराह करने की कोशिश करते हैं, वे धोखेबाज हैं। वे खुद को और दूसरों को, दोनों को धोखा दे रहे हैं—जिसका मतलब है कि वे खुद के साथ-साथ दूसरों को भी नुकसान पहुँचा रहे हैं!

तुम लोग अब जो समझते हो, वे अधिक सत्य हैं, या अधिक धर्म-सिद्धांत? (अधिक धर्म-सिद्धांत हैं।) इसका कारण क्या है? (यह सत्य का अनुसरण न करने का परिणाम है।) (जा कर सत्य पर विचार करने के प्रयास की कमी का परिणाम है।) इसका इन सभी चीजों से कुछ-न-कुछ संबंध है, लेकिन तुम लोगों ने जो कारण दिए हैं वे सभी व्यक्तिपरक हैं। इसका एक वस्तुनिष्ठ कारण भी है, जिसका संबंध लोगों की काबिलियत से है। कुछ लोगों ने एक दशक से भी अधिक समय से धर्मोपदेश सुने हैं, लेकिन वे सत्य और धर्म-सिद्धांत में भेद नहीं कर सकते, न ही वे विनियमों का पालन करने और सत्य का अभ्यास करने के बीच का भेद पहचान सकते हैं। वे धर्मोपदेशों को गंभीरता से सुनते हैं और अंतर पहचानने के लिए सावधानी से काम करते हैं, लेकिन वे अंतर बता ही नहीं पाते हैं। उन्हें लगता है कि सभी लोगों की संगतियाँ लगभग एक जैसी होती हैं, यानी, वे सभी बहुत अच्छी होती हैं, सभी काफी व्यावहारिक होती हैं। उन्हें सुनने के बाद, वे यह नहीं बता सकते कि धर्म-सिद्धांत क्या है और सत्य क्या है। क्या यह काबिलियत संबंधी समस्या है? (हाँ।) क्या तुम लोगों की काबिलियत सत्य वास्तविकता के स्तर तक बढ़ सकती है? हर बार जब अगुआ और कार्यकर्ता सभाओं में संगति करते हैं या अन्य अवसरों पर तुम्हारे साथ मिल-जुल कर बातचीत करते हैं, तो क्या तुम लोग बता सकते हो कि उनकी कही हुई बातों में कितनी सत्य वास्तविकता है और कितना धर्म-सिद्धांत? (हाँ।) यदि तुम बता सकते हो, तो साबित होता है कि तुम लोगों में कुछ भेद पहचानने की समझ है, और तुम पूरी तरह से भेद पहचानने में अक्षम नहीं हो। यदि तुम अंतर बता सकते हो, तो साबित होता है कि तुम लोगों की काबिलियत खराब नहीं है। लोगों की काबिलियत को कई श्रेणियों में विभाजित किया जाता है : खराब, औसत, अच्छा और असाधारण रूप से अच्छा। मूलतः ये चार श्रेणियाँ हैं। जिनकी काबिलियत खराब से भी बदतर है, वे सत्य का बोध नहीं कर सकते; उनमें जरा भी काबिलियत नहीं है। वे जो कुछ भी सुनते हैं, उसे समझ नहीं सकते और जो कुछ भी करते हैं उसमें कहीं भी विचार, तर्क या सिद्धांत नहीं होते। उनके दिमाग में यह सब एक उलझन भरी गुत्थी जैसा होता है। वे भ्रमित लोग हैं, जिन्हें हम आम बोलचाल में वहशी कह सकते हैं। यदि उनकी काबिलियत बेहद खराब है, तो वे बौद्धिक रूप से पंगु हैं। उनमें सामान्य लोगों में पाया जाने वाला विवेक नहीं होता। ये वे लोग हैं जिन्हें हम मूर्ख, अधपगला, या अधकचरा कह सकते हैं।

बेहद खराब काबिलियत वाले लोग बौद्धिक रूप से पंगु होते हैं—हमें उनके बारे में और चर्चा करने की जरूरत नहीं है। आओ इस बारे में बात करें कि खराब काबिलियत किस तरह से प्रदर्शित होती है। कुछ लोगों ने अनेक वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी वे सत्य को नहीं समझते। वे सुसमाचार प्रचार का मूल कर्तव्य भी नहीं निभा सकते, वे सत्य पर संगति नहीं कर सकते और वे गवाही भी नहीं दे सकते। ये खराब काबिलियत की अभिव्यक्तियाँ हैं। खराब काबिलियत की दूसरी अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? कई वर्षों तक धर्मोपदेश सुनने के बाद खराब काबिलियत वाले लोगों को लगता है कि वे सभी एक जैसे हैं—वे सभी एक ही चीज के बारे में हैं। वे विभिन्न सत्यों के विवरणों के बीच स्पष्ट रूप से अंतर नहीं कर सकते, सत्य और धर्म-सिद्धांत के बीच अंतर बताना तो बहुत दूर की बात है। सत्य को समझना तो दूर, वे सबसे आसान शब्द और धर्म-सिद्धांत भी नहीं बोल सकते। क्या ऐसे लोगों की काबिलियत सबसे खराब होती है? ऐसे लोग, चाहे जिस तरह से भी धर्मोपदेश सुनें या उन्होंने चाहे जितने वर्षों तक भी धर्मोपदेश सुने हों, वे उनका अर्थ नहीं समझ पाते, और वे यह नहीं समझते कि सत्य क्या है या खुद को जानने का अर्थ क्या है। भले ही उन्होंने कितने भी समय तक परमेश्वर में विश्वास किया हो या कितने भी धर्मोपदेश सुने हों, अंत में भी वे सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते। वे केवल कुछ विनियमों का पालन कर सकते हैं और उन कुछ चीजों को याद रख सकते हैं जिन्हें वे महत्वपूर्ण मानते हैं—उससे कुछ भी ज्यादा हो तो वे याद नहीं रख सकते। ऐसा क्यों है? क्योंकि उनकी काबिलियत खराब है, वे सत्य तक नहीं पहुँच पाते, और बहुत ज्यादा चीजें नहीं समझ पाते हैं। अधिक-से-अधिक, वे कुछ सतही धर्म-सिद्धांत समझ सकते हैं। ज्यादा-से-ज्यादा वे यहाँ तक पहुँच सकते हैं। ऐसे लोग अक्सर काफी अहंकारी होते हैं और शेखी बघारते हैं। कुछ लोग कहेंगे, “मैं जब अपनी माँ के गर्भ में था तभी से मैंने प्रभु में विश्वास रखा था। मैं तो बहुत पहले ही पावनीकृत हो गया था और बहुत पहले ही मेरा बपतिस्मा और शुद्धिकरण हो चुका है।” उनमें से कुछ लोग तीन, पाँच, या दस वर्ष पहले परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार चुके हैं, फिर भी वे अब तक वही बात दोहराते हैं। क्या यह खराब काबिलियत का संकेत नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, “तुम कहते हो कि मैं खुद को नहीं जानता—तुम्हीं लोग खुद को नहीं जानते। मैं तो बहुत पहले ही पावनीकृत हो गया था।” जो लोग ऐसा कहते हैं उनमें आध्यात्मिक समझ की सबसे अधिक कमी है, वे सबसे खराब काबिलियत वाले हैं। क्या तुम अब भी ऐसे लोगों के साथ सत्य पर संगति कर सकते हो? नहीं कर सकते। तुम चाहे जितनी बात करो, वे नहीं समझेंगे कि सत्य क्या है, सत्य का अभ्यास करना क्या होता है, परमेश्वर के प्रति समर्पण क्या होता है, जीवन प्रवेश क्या है, और किसी का स्वभाव बदलना क्या होता है। वे इन चीजों को समझ नहीं सकते या इस स्तर तक नहीं पहुँच सकते। परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में, वे कुछ विनियमों का पालन करने पर ध्यान देते हैं, जैसे सांसारिक मामलों से अलग हो जाना, दुनिया को त्याग देना, दानवों के साथ कोई संबंध न रखना, बुरे काम न करना, कम पाप करना, परमेश्वर के नाम पर दृढ़ता से टिके रहना, परमेश्वर को धोखा न देना, और सभी चीजों में परमेश्वर से प्रार्थना करना और उस पर भरोसा करना—बस यही बातें हैं। मूलतः वे धार्मिक विश्वास की औपचारिकताओं तक ही सीमित रहते हैं। परमेश्वर के इतने सारे वचनों और सत्य के बारे में धर्मोपदेशों को सुनने के बाद, वे जो सुनते हैं उसे समझ नहीं पाते। वे जितना अधिक सुनते हैं, उतना अधिक उलझन महसूस करते हैं, इसलिए वे उसमें से कुछ भी समझ नहीं पाते। यदि तुम उनसे पूछो कि कार्य के इस चरण में परमेश्वर लोगों से क्या माँगता है, तो वे कुछ नहीं बता सकते। वे केवल धर्म-सिद्धांतों के बारे में कुछ सरल बातें ही कह सकते हैं। इसका मतलब यह है कि उनकी काबिलियत बेहद खराब है और वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझ सकते।

औसत काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि उनमें परमेश्वर के वचनों को समझने की योग्यता नहीं होती। धर्मोपदेश सुनने के बाद, वे केवल कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझते हैं, लेकिन वे उनमें किसी नए प्रकाश की खोज नहीं कर पाते। जब कोई चीज उन पर आ पड़ती है, तब भी वे उसे सँभाल नहीं पाते, और न ही सत्य का अभ्यास कर पाते हैं। वे केवल कुछ खोखले धर्म-सिद्धांत बोल सकते हैं और विनियमों का पालन कर सकते हैं। धर्मोपदेश सुनते समय लगता है कि वे समझ रहे हैं, लेकिन जब कुछ उनके साथ होता है, तब भी वे विनियमों का पालन करेंगे और अपनी ही इच्छा के अनुसार कार्य करेंगे। और वे हमेशा शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हुए दूसरों को डाँटते रहते हैं। कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, वे अनेक धर्म-सिद्धांत समझते हैं, और दूसरों के साथ संगति करते समय वे अपने ज्ञान के बारे में कुछ ज्यादा बात कर सकते हैं। वे अपना तात्पर्य पूर्ण और ठोस तरीके से व्यक्त कर सकते हैं और लोगों के साथ सामान्य बातचीत कर सकते हैं। परंतु, वे अब भी नहीं समझते कि सत्य क्या है या वास्तविकता क्या है। वे सोचते हैं कि जिन धर्म-सिद्धांतों के बारे में वे बात करते हैं वे सत्य वास्तविकता हैं और वे सत्य वास्तविकता से संबंधित अनुभवों, अपनी समझ या अभ्यास के मार्गों के बारे में दूसरे लोगों द्वारा बताए गए तथ्यों का भेद ठीक से नहीं पहचानते हैं। औसत काबिलियत के इन लोगों को लगता है कि सत्य और धर्म-सिद्धांत में कोई अंतर नहीं होता। वे चाहे जितने भी धर्मोपदेश सुनें, उन सत्यों को नहीं समझ पाते जिनका उन्हें अभ्यास करना चाहिए और बचाए जाने के लिए जो सत्य उनके पास होने चाहिए। वे स्वयं को समझना भी नहीं जानते, और यह भी नहीं जानते कि अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने के लिए उन्हें किन सत्यों का अभ्यास करना चाहिए। अपने वास्तविक जीवन में, वे केवल विनियमों और धार्मिक अनुष्ठानों का पालन कर सकते हैं, सभाओं में लगातार भागीदारी कर सकते हैं, लगातार दूसरों को धर्म-सिद्धांतों का उपदेश दे सकते हैं, और अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए लगातार कुछ प्रयास कर सकते हैं। परंतु, जिन सत्यों से स्वभाव में परिवर्तन, अपने भ्रष्ट स्वभाव का ज्ञान, या जीवन प्रवेश जुड़े हों, वे उनमें प्रवेश नहीं करते या गहराई में नहीं उतरते। औसत काबिलियत रखने का यही मतलब है। औसत काबिलियत के लोग केवल इसी स्तर तक पहुँच सकते हैं। ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने 20 या 30 वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है और अभी भी केवल धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करते हैं। क्या तुम लोग कभी ऐसे लोगों के संपर्क में आए हो जिन्होंने एक दशक से अधिक समय से परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी उनके मुँह से केवल धर्म-सिद्धांत ही निकलते हैं? (हाँ।) इस तरह के लोग औसत काबिलियत वाले होते हैं।

अच्छी काबिलियत वाले लोगों की अभिव्यक्तियाँ कैसी होती हैं? भले ही उन्होंने जितने भी समय से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, धर्मोपदेश सुनने के बाद वे यह बताने में सक्षम होंगे कि यह बाइबल में कही गई बातों से अलग है और यह धर्म में सिखाई जाने वाली बातों से भी बिल्कुल अलग है। वे बता सकते हैं कि यह अधिक गहराई तक पहुँचने वाली बात है, अधिक विस्तृत है, और बिल्कुल व्यावहारिक है। इसलिए, परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने के बाद वे सत्य का अभ्यास करने और वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान केंद्रित करना शुरू करते हैं। अपने वास्तविक जीवन में, वे स्वयं को इस बारे में प्रशिक्षित करते हैं कि परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव कैसे करें। उदाहरण के लिए, परमेश्वर कहता है, “तुम लोगों को ईमानदार होना चाहिए।” शुरुआत में ये लोग इसे केवल एक विनियम मानकर उसका पालन करते हैं और जो भी उनके मन में आता है, बोल देते हैं। धीरे-धीरे, धर्मोपदेश सुनने की प्रक्रिया में और अपने वास्तविक अनुभव में, वे सीखी गई बातों को लगातार सारांशित करते हैं और अंत में वे इस बात का अनुभव कर समझ लेते हैं कि ईमानदार व्यक्ति होने का सत्य वास्तव में क्या है और जीवन वास्तव में क्या है। उनमें परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को और धर्मोपदेशों को सुनकर समझे गए सत्यों को अपने वास्तविक जीवन में लागू करने और उन्हें अपनी वास्तविकता बना लेने की काबिलियत होती है। वास्तविक अनुभव के साथ, उनका जीवन अनुभव धीरे-धीरे गहराता जाता है। ये लोग जब धर्मोपदेश सुनते हैं या परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो वे उनमें निहित सत्य को समझ सकते हैं। यहाँ सत्य का क्या अर्थ है? यह कोई खोखला धर्म-सिद्धांत नहीं है, कोई कहने का ढंग भर नहीं है, और यह किसी एक चीज के बारे में कोई सिद्धांत भी नहीं है। बल्कि, इसका संबंध वास्तविक जीवन में आने वाली कठिनाइयों और किसी के द्वारा प्रकट की गई विभिन्न भ्रष्ट अवस्थाओं से है। अच्छी काबिलियत वाले लोग इन अवस्थाओं की पहचान कर सकते हैं और उनकी तुलना परमेश्वर के कहे वचनों और उजागर की गई बातों से कर सकते हैं। ऐसा होने पर उन्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कैसे करना है। अच्छी काबिलियत का यही मतलब है। अच्छी काबिलियत मुख्य रूप से कहाँ परिलक्षित होती है? धर्मोपदेशों में जो कहा जा रहा है उसे समझने की योग्यता, उन वचनों और अपनी वास्तविक अवस्था के बीच के संबंध को समझ पाना, यह समझ पाना कि उन वचनों का स्वयं पर क्या प्रभाव पड़ेगा, और उन वचनों को स्वयं से जोड़ पाना—यह अच्छी काबिलियत है। इन वचनों को समझ पाने और इन वचनों को खुद से जोड़ने में सक्षम होने के अलावा, अच्छी काबिलियत वाले लोग वास्तविक जीवन में अभ्यास के सिद्धांतों को भी समझ सकते हैं और इन सिद्धांतों को अपने वास्तविक जीवन में आने वाली हर कठिनाई या स्थिति पर लागू कर सकते हैं। अंतर्दृष्टि रखने का यही अर्थ है। जिनके पास ऐसी अंतर्दृष्टि होती है, केवल वे ही सचमुच अच्छी काबिलियत वाले लोग होते हैं।

जब औसत काबिलियत वाले लोग अपना थोड़ा-बहुत भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, तो वे अपनी दशा या समस्या के सार का भेद नहीं पहचान पाते हैं। वे केवल उन धर्म-सिद्धांतों के साथ तुलना करके उनका मूल्यांकन करते हैं जिन्हें वे समझते हैं। वे समस्या के सार को नहीं देख पाते या इस सार के मूल और उस पहलू को नहीं पहचान पाते जिससे सत्य जुड़ा होता है। जब वे किसी स्थिति का सामना कर रहे होते हैं, तो काट-छाँट के बाद, उसका सूक्ष्म परीक्षण और विश्लेषण करने के बाद वे स्थिति की गहरी छाप और कुछ समझ हासिल करते हैं। परंतु, किसी भिन्न दशा या परिस्थिति का सामना करने पर वे एक बार फिर उसे नहीं समझेंगे, नहीं जान पाएँगे कि क्या करें, और उन सिद्धांतों को नहीं ढूँढ़ पाएँगे जिनका पालन करना है। औसत काबिलियत होने का यही मतलब है। अच्छी काबिलियत वाले लोगों की बात करें, तो हम यह क्यों कहते हैं कि उनकी काबिलियत अच्छी है? किसी स्थिति का सामना करते हुए संभव है कि अच्छी काबिलियत वाले लोगों के पास भी तुरंत अभ्यास का कोई मार्ग न हो, लेकिन वे धर्मोपदेश सुनकर या परमेश्वर के वचनों को खोज कर मार्ग पा सकते हैं। फिर, वे जान जाएँगे कि स्थिति से कैसे पेश आना है। अगली बार ऐसी ही स्थिति का सामना होने पर क्या वे जान पाएँगे कि क्या करना चाहिए? (हाँ।) ऐसा क्यों है? (वे केवल विनियमों का पालन नहीं करते। वे मार्ग खोजने के लिए किसी स्थिति पर विचार कर सकते हैं, और फिर उन्होंने जो सीखा हो उसे समान स्थितियों में लागू कर सकते हैं।) ठीक, उन्होंने सिद्धांत पा लिया है और वे सत्य के इस पहलू को समझते हैं। एक बार जब वे सत्य को समझ लेते हैं, तो सत्य का यह पक्ष लोगों की जिन दशाओं, प्रकटनों और भ्रष्ट स्वभावों को संदर्भित करता है उन्हें जान जाते हैं, साथ ही वे अपने जीवन में आने वाली परिस्थितियों और मामलों वगैरह जैसी इससे जुड़ी बातों को भी जान लेते हैं। इस तरह के काम करने के सिद्धांतों के बारे में वे स्पष्ट होते हैं, और भविष्य में जब वे इसी तरह की चीजों का सामना करते हैं, तो वे जानते हैं कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना है। सत्य को सही मायने में समझना यही होता है। इसलिए, क्योंकि कुछ लोग सत्य को समझ सकते हैं, क्योंकि उनमें सत्य को समझने की काबिलियत होती है, वे टीम अगुआ या कलीसिया के अगुआ बनने में सक्षम होते हैं। बहरहाल, कुछ अन्य लोग केवल सिद्धांत के स्तर पर ही समझ सकते हैं, इसलिए वे टीम अगुआ नहीं बन सकते, क्योंकि वे सिद्धांतों को ग्रहण करने या पुनरीक्षण करने में असमर्थ होते हैं। तुम्हें टीम अगुआ के रूप में सेवा करने के लिए कहने का अर्थ है तुमसे नेतृत्व ग्रहण करने और पुनरीक्षण करने के लिए कहना। पुनरीक्षण करने के लिए तुम्हें किस चीज का उपयोग करना चाहिए? सिद्धांतों, नारों, ज्ञान या धारणाओं का नहीं। इसका अर्थ है तुमसे यह कहना कि पुनरीक्षण करने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करो। परमेश्वर के घर में कुछ भी करने का यह सबसे बुनियादी और सर्वोच्च सिद्धांत होता है। यदि तुम्हारी काबिलियत औसत या खराब है, और तुम सत्य को नहीं समझ पाते हो, तो तुम पुनरीक्षण कैसे कर सकोगे? तुम इस जिम्मेदारी को कैसे निभा सकोगे? तुम इस काम के, इस कर्तव्य के काबिल नहीं हो। कुछ लोगों को टीम अगुआ के रूप में चुन लिया जाता है, लेकिन वे सत्य को नहीं समझते और कुछ भी कतई हासिल नहीं कर सकते। वे टीम अगुआ कहे जाने लायक नहीं होते और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। कुछ लोगों को टीम अगुआ इसलिए चुना जाता है कि वे सत्य सिद्धांतों को थोड़ा-बहुत समझते हैं, वे काम की जिम्मेदारी ले सकते हैं और कुछ व्यावहारिक समस्याएँ हल कर सकते हैं। यही वह चीज होती है जो किसी को किसी काम के योग्य और टीम अगुआ बनने के लिए उपयुक्त बनाती है। कुछ लोग काम की जिम्मेदारी अपने कंधों पर नहीं उठा सकते या अपने कर्तव्य का ठीक ढंग से निर्वाह नहीं कर सकते। इसका मुख्य कारण क्या है? ऐसे लोगों में कुछ लोग ऐसा इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि वे हीन मानवता के होते हैं। लेकिन, अधिकतर लोगों के मामले में इसका कारण उनकी कम काबिलियत है। यही वह कारण है जिससे वे अपने काम करने के योग्य नहीं होते या कर्तव्यों का अच्छी तरह से निर्वाह करने योग्य नहीं होते। बात चाहे सत्य की गहरी समझ की हो या किसी पेशे को सीखने की या किसी विशिष्ट कौशल की, अच्छी काबिलियत वाले लोग उनके भीतर के सिद्धांतों को समझने में, चीजों की जड़ तक पहुँचने में, और उनकी वास्तविकता और सार की पहचान करने में सक्षम होते हैं। इस तरह से वे जो कुछ भी करते हैं, जिस भी काम में वे लगे होते हैं, उसमें सही निर्णय लेते हैं, और सही मानकों और सिद्धांतों को निर्धारित करते हैं। अच्छी काबिलियत यही होती है। अच्छी काबिलियत वाले लोग परमेश्वर के घर के विभिन्न कार्यों का पुनरीक्षण करने में सक्षम होते हैं। साधारण या खराब काबिलियत वाले लोग ऐसे काम करने में असमर्थ होते हैं। यह किसी भी तरह से परमेश्वर के घर के द्वारा कुछ लोगों का पक्ष लेना या कुछ लोगों को नीची निगाह से देखना या भेदभाव करना नहीं है—बात केवल इतनी है कि बहुत-से लोग अपनी काबिलियत के कारण पुनरीक्षण नहीं कर सकते। वे पुनरीक्षण क्यों नहीं कर सकते? इसका मूल कारण क्या है? वह यह है कि वे सत्य को नहीं समझते। और, वे सत्य को क्यों नहीं समझते? ऐसा इसलिए कि उनकी काबिलियत औसत या बहुत खराब होती है। यही कारण है कि सत्य उनकी पहुँच से बाहर होता है और वे सुनने पर भी सत्य को समझने में असमर्थ होते हैं। कुछ लोग सत्य को समझने में इसलिए असमर्थ होते हैं कि वे ध्यान से नहीं सुनते हैं, या हो सकता है कि वे अभी युवा हों और अभी तक परमेश्वर में आस्था के बारे में उनकी कोई संकल्पना नहीं है, और इसमें उनकी कोई बहुत रुचि नहीं होती। परंतु ये मुख्य कारण नहीं होते। मुख्य कारण होता है कि उनकी काबिलियत अपर्याप्त होती है। निम्न श्रेणी की काबिलियत वाले लोगों का चाहे जो कर्तव्य हो, या चाहे जितने लंबे समय से कोई काम कर रहे हों, उन्होंने चाहे जितने धर्मोपदेश सुने हों या तुम उनके साथ सत्य पर कैसी भी संगति करो, उनकी बुद्धि में कोई बात घुसती नहीं। वे अपने कर्तव्य निर्वाह की गाड़ी किसी तरह खींचते रहते हैं, चीजों को पूरी तरह उलट-पुलट कर देते हैं, और कुछ भी हासिल नहीं कर पाते। कुछ लोग जो टीम अगुआ के रूप में सेवा करते हैं और कुछ कामों का पुनरीक्षण करते हैं, पहली बार काम की जिम्मेदारी लेने पर सिद्धांतों को नहीं समझ पाते हैं। कई असफलताओं के बाद वे खोजने तथा प्रश्न पूछने के माध्यम से सत्य को समझ लेते हैं और उन्हें सिद्धांतों का बोध हो जाता है। फिर, इन सिद्धांतों के आधार पर वे पुनरीक्षण कर सकते हैं और अपने दम पर काम की जिम्मेदारी उठा सकते हैं। काबिलियत होने का यही मतलब है। अन्य लोगों के मामले में, तुम उन्हें सभी सिद्धांत बता दो और उन्हें लागू करने के तरीकों की भी विस्तार से जानकारी दे दो, और उस समय ऐसा प्रतीत होगा कि वे तुम्हारी बात को समझ रहे हैं, लेकिन फिर भी काम करते समय उन्हें सिद्धांतों का बोध नहीं होता। इसके बजाय, वे अपने ही विचारों और कल्पनाओं पर भरोसा करते हैं, और इन्हें ही सही भी मानते हैं। किंतु, वे स्पष्ट रूप से नहीं बता सकते और वास्तव में नहीं जानते कि वे सिद्धांतों के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं। अगर ऊपरवाला उनसे सवाल पूछता है तो वे घबरा जाते हैं और नहीं जानते कि क्या कहें। वे केवल तभी आश्वस्त महसूस करते हैं जब ऊपरवाला पुनरीक्षण करे और मार्गदर्शन प्रदान करे। इससे पता चलता है कि उनकी काबिलियत बहुत खराब है। ऐसी खराब काबिलियत के साथ अपने कर्तव्यों को मानक के मुताबिक पूरा करना तो दूर, वे न तो परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी कर सकते हैं, न ही सत्य सिद्धांतों पर खरे उतर सकते हैं।

अभी क्षण भर पहले मैंने बताया था कि अच्छी काबिलियत से ऊपर एक और स्तर है, जिसे बहुत अच्छी काबिलियत कहते हैं। जब बहुत अच्छी काबिलियत वाले लोग परमेश्वर में विश्वास रखने लगते हैं, तो वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और अनुभवात्मक स्तर पर धीरे-धीरे उससे गुजरते हैं, महसूस करते हैं और उन चीजों को समझते हैं जिन्हें परमेश्वर के वचनों में वर्णित विभिन्न अवस्थाएँ संदर्भित करती हैं। बहुत कम साधन या सहायता पाने पर भी वे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का मार्ग खोज सकते हैं, परमेश्वर के वचनों द्वारा बताए गए सिद्धांतों, निर्देशों और मानकों के अनुसार अपने लिए अपेक्षाएँ निर्धारित कर सकते हैं, और भटकावों तथा विकृतियों से बच सकते हैं। वे सत्य को समझ सकते हैं और खुद परमेश्वर के वचनों को खा-पी कर स्वयं को और परमेश्वर को जान सकते हैं। यह सर्वोच्च काबिलियत है, और ऐसे लोगों के पास गहनतम अंतर्दृष्टि होती है। मुझे बताओ कि क्या मनुष्यों में भी ऐसे लोग हैं? हो सकता है कि तुम लोगों को आज के मनुष्यों में ऐसे लोग न मिलें, लेकिन क्या तुम लोग बाइबल में ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में सोच सकते हो? (हाँ, अय्यूब और पतरस।) अय्यूब और पतरस दोनों इसी श्रेणी के हैं। वे सर्वोच्च काबिलियत वाले मनुष्यों में से हैं। उनकी मानवता, चरित्र और परमेश्वर में आस्था को एक तरफ छोड़ दें, तो काबिलियत के मामले में वे उच्चतम काबिलियत वाले दो लोग हैं। ऐसा कहने का क्या आधार है? (अय्यूब ने कभी परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ा, फिर भी वह परमेश्वर को जान गया, परमेश्वर का भय मानता रहा और बुराई से दूर रहा।) परमेश्वर ने तो कभी अय्यूब से बात नहीं की, फिर उसका अनुभव और ज्ञान कहाँ से आया? अय्यूब ने अपने जीवन में निरीक्षण किए और खोजें कीं, फिर उनका सावधानी से आस्वादन किया, जो उसके हृदय में कुछ निश्चित छापें छोड़ गया और उसके लिए कुछ प्रबोधन और रोशनी लेकर आया। उसने थोड़ा-थोड़ा करके सत्य को गहन रूप से समझा, और उसे गहन रूप से समझने के बाद उसने सत्य पर अपनी पकड़ और समझ के अनुसार अभ्यास करते हुए धीरे-धीरे परमेश्वर का भय माना और बुराई से दूर रहने लगा। “परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना” वह बात है जिसका लोगों को पालन और अभ्यास करना चाहिए। यह वह उच्चतम मार्ग है जिसका लोगों को अनुसरण करना चाहिए। बाद की पीढ़ियों की दृष्टि में, लगता है कि अय्यूब इस उक्ति को बहुत आसानी से अभ्यास में लाया। तुम सोचते हो कि यह सरल और आसान था क्योंकि तुम इन वचनों के व्यावहारिक पक्ष को नहीं जानते या तुमने इसका अनुभव नहीं किया है। अय्यूब इस उक्ति तक कैसे पहुँचा? उसने इसे अपने व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त किया। लोगों की नजर में, “परमेश्वर का भय मानो और बुराई से दूर रहो” वचन को एक सूत्रवाक्य बनना चाहिए; उन्हें इसका एक सत्य सिद्धांत के रूप में पालन और अभ्यास करना चाहिए—यह सही है। लेकिन अय्यूब ने इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं किया कि इसे कैसे कहा जाए; उसने केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि यह काम कैसे किया जाए। तो वह उस सिद्धांत तक कैसे पहुँचा जिसे उसने क्रियान्वित किया? (अपने रोजमर्रा के जीवन के अनुभव के माध्यम से।) वह अपने कार्यों में इस सिद्धांत का पालन कैसे कर सका? (जीवन के अपने अनुभवों के माध्यम से उसे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त हुआ।) उसने अपने सामान्य जीवन में परमेश्वर के कृत्यों और परमेश्वर द्वारा लोगों पर किए गए कार्यों को देखा। इन अनुभवों के माध्यम से उसमें परमेश्वर का भय, परमेश्वर में सच्ची आस्था, सच्चा प्रशंसा भाव और सच्चा समर्पण एवं विश्वास विकसित हुए। इसी प्रकार से उसमें परमेश्वर का भय उत्पन्न हुआ। वह परमेश्वर का भय मानने के ज्ञान के साथ पैदा नहीं हुआ था। परमेश्वर में विश्वास रखने और कई वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण करने के बाद उसके अभ्यासों और व्यवहार का सारांश परमेश्वर का भय है। हम कह सकते हैं कि यह उसके व्यवहार, ज्ञान और कार्य के सिद्धांतों का सार था। उसके आचरण, उसके प्रकटनों, और परमेश्वर के सामने किए हुए उसके व्यवहार, साथ ही उसके मन की गहराई में बैठे इरादों और कार्य के सिद्धांतों आदि सभी अभिव्यक्तियों का सार यह था कि वह परमेश्वर का भय मानता था। परमेश्वर ने उसे इसी तरह से परिभाषित किया। अय्यूब ये चीजें कर सका, लेकिन इसलिए नहीं कि परमेश्वर ने उससे बहुत सारे वचन कहे थे या उसे बहुत सारे सत्य बताए थे, जिसके बाद उसने धीरे-धीरे अपनी ही गहरी समझ के माध्यम से परमेश्वर का भय हासिल किया। उस युग में परमेश्वर ने उससे कोई स्पष्ट वचन नहीं कहे थे। अय्यूब ज्यादा-से-ज्यादा परमेश्वर के दूतों को ही देख सकता था; और वह अधिक-से-अधिक जो सुन सकता था वे सब परमेश्वर के बारे में उसके पूर्वजों के समय से चली आ रही किंवदंतियाँ या कहानियाँ थीं। वह बस इतना ही जान सका था। परंतु, केवल इसी जानकारी पर भरोसा करके, अय्यूब ने धीरे-धीरे अपना जीवन जीने से ज्यादा चीजें और ज्यादा व्यावहारिक चीजें सीखीं। धीरे-धीरे, परमेश्वर में उसकी आस्था और भी दृढ़ होती गई और उसमें परमेश्वर का सच्चा भय भी उत्पन्न हो गया। उसमें इन दो चीजों के उत्पन्न होने के बाद अय्यूब का असली आध्यात्मिक कद और उसकी असली काबिलियत स्पष्ट हो गई। अय्यूब के उदाहरण से हम क्या देख सकते हैं? हम देख सकते हैं कि कई सत्य हैं—परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर को जानने, मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानवजाति के उद्धार से संबंधित सत्य—जिन्हें सामान्य मानवीय सोच और काबिलियत वाले लोग वास्तव में अपने रोजमर्रा के जीवन में थोड़ा-थोड़ा कर गहराई से समझ सकते हैं। अय्यूब इस बात का उदाहरण है। वह कुछ व्यावहारिक बातों को गहराई से समझने में सक्षम था। उसने गहराई से क्या समझा? अपना सर्वोच्च सूत्रवाक्य, जिसकी पुष्टि तब हुई जब उसने परीक्षणों का अनुभव किया; यह उसकी सर्वोच्च समझ भी थी। यह सूत्रवाक्य, यह उच्चतम समझ क्या है? (“यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है” (अय्यूब 1:21)।) इस संदर्भ में, क्या वर्तमान मानवजाति में अय्यूब के समान सच्ची समझ वाला कोई है? क्या कोई है जो अय्यूब जैसी समझ हासिल कर सकता है? (नहीं।) लोग अब जो समझते हैं वह केवल एक धर्म-सिद्धांत है। ये वचन अय्यूब के अनुभव से निकले थे। बाद की पीढ़ियाँ इन वचनों का उच्चारण कर सकती हैं, लेकिन उनके दिलों में इसकी समझ नहीं है। अय्यूब के पास भी पहले यह समझ नहीं थी, लेकिन ये उसके ही वचन थे जो उसके प्रत्यक्ष अनुभव से उत्पन्न हुए थे। अय्यूब के पास यह वास्तविकता थी। बाद की पीढ़ियों ने अय्यूब के शब्दों को चाहे जितना रटकर बोला हो और उसकी नकल की हो, वे केवल धर्म-सिद्धांत को समझती हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह केवल एक धर्म-सिद्धांत है? सबसे पहले इसलिए कि लोग इसे अभ्यास में नहीं ला सकते। दूसरे, लोगों के पास वे अनुभव ही नहीं हैं जो अय्यूब के पास थे, और लोगों के पास इन अनुभवों से प्राप्त ज्ञान नहीं है, इसलिए उनका ज्ञान खोखला है। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि तुम इसे कितनी बार बोलते हो या कितनी ऊँची आवाज में चिल्लाते हो—“यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है। मैं स्वेच्छा से परमेश्वर के सभी आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करता हूँ”—जब जीवन में तुम पर चीजें आ पड़ती हैं, तो क्या तुम अपने हृदय से अभिस्वीकृत कर सकते हो कि यह परमेश्वर का कार्य है? यदि परमेश्वर वंचित कर नष्ट कर देता है, तब भी क्या तुम अपने हृदय में परमेश्वर के नाम को धन्य कह सकोगे? यह तुम्हारे लिए कठिन है। ऐसा करना तुम्हारे लिए इतना कठिन क्यों है? इसलिए कि तुम ऐसा करने के पीछे परमेश्वर के मूल इरादे को नहीं जानते, और उसकी संप्रभुता को भी नहीं पहचानते। ये दो बातें तुम नहीं समझ सकते। तुम परमेश्वर के इरादों को पकड़ नहीं सकते, न ही इसे व्यक्तिगत रूप से समझ सकते हो कि वह स्थिति क्या है जो किसी सृजित प्राणी को धारण करनी चाहिए, वह समर्पण क्या है जो किसी सृजित प्राणी में होना चाहिए, या वे कार्य क्या हैं जो किसी सृजित प्राणी को करने चाहिए। तुम इनमें से कुछ भी नहीं कर सकते। ऐसे में, जब तुम अय्यूब के वचनों का पाठ करते हो, तो वे अगोचर रूप से खोखले हो जाते हैं, सजावटी और बनावटी बातों से अधिक कुछ नहीं रह जाते। यही कारण है कि यद्यपि तुमने और अय्यूब ने, दोनों ने, एक ही वचन बोले थे, पर अय्यूब के दिल में इन शब्दों की समझ और गहरी समझ तुमसे अलग थी, और उसने ये वचन तुमसे अलग भावनात्मक संदर्भ में बोले थे। ये दो बिल्कुल अलग मनोदशाएँ हैं। अय्यूब ये शब्द आम तौर पर नहीं बोलता था। बल्कि, जब परमेश्वर ने उसे सभी चीजों से वंचित कर दिया, तो उसने जमीन पर दंडवत हो कर परमेश्वर के कार्यों की प्रशंसा की। परंतु, तुम अक्सर इन वचनों का प्रचार करते हो, लेकिन परमेश्वर द्वारा तुम्हें वंचित किए जाने की स्थिति में तुम कैसा व्यवहार करोगे? क्या तुम घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना कर पाओगे? तुम समर्पण नहीं कर पाओगे। भले ही बाहर से तुम कहो कि “मुझे समर्पण करना चाहिए। यह परमेश्वर द्वारा किया गया था और हम मनुष्यों में कोई काबिलियत नहीं है और हम प्रतिरोध नहीं कर सकते, इसलिए मैं चीजों को जैसे होना है, वैसे होने दूँगा,” क्या यह सच्चा समर्पण है? तुम्हारी नकारात्मक, विद्रोही और प्रतिरोधी भावनाओं की प्रकृति को एक तरफ कर दें, तो क्या तुम्हारे और अय्यूब के रवैये में कोई अंतर है? (हाँ, है।) बहुत बड़ा अंतर है। सत्य वास्तविकता के होने और न होने के बीच यही अंतर है। यह उन चीजों के बीच का स्पष्ट अंतर है जो किसी ने अनुभव किए हों और गहराई से समझ कर अपने जीवन का स्वाभाविक प्रकटन बना लिए हों, और जो वास्तविकता प्राप्त हुए बिना केवल धर्म-सिद्धांतों की समझ वाली हों। किसी चीज का सामना न होने पर लोग अय्यूब के वचनों का उपदेश देंगे, लेकिन उनके साथ कुछ घटित होने पर बहुत-से लोग अय्यूब के वचन नहीं बोल पाते। इससे पता चलता है कि वे केवल धर्म-सिद्धांतों को समझते हैं। ये वचन उनका जीवन नहीं बने हैं और जब उनके साथ कुछ घटित होता है तो ये वचन उनके विचारों और रवैयों का मार्गदर्शन नहीं करते हैं। परंतु, जिन लोगों ने इन वचनों को अपना जीवन बना लिया है जब उन पर चीजें आ पड़ती हैं, तो साफ देखा जा सकता है कि ये वचन केवल ऐसे सूत्रवाक्य नहीं हैं जिनका वे रोजमर्रा की जिंदगी में उपदेश देते हैं, बल्कि लोगों, घटनाओं और चीजों के प्रति उनका सच्चा रवैया भी यही है। इससे भी अधिक, यह परमेश्वर के प्रति उनका सच्चा रवैया है। ये वचन उनके जीवन का मूर्त रूप हैं, न कि केवल कोई नारा जो वे चिल्ला कर लगाते हैं। इससे सत्य को समझने और न समझने के बीच का अंतर रेखांकित होता है।

आओ, अब पतरस पर विचार करते हैं। हम यह क्यों कहते हैं कि पतरस अच्छी काबिलियत वाला है? ऐसा इसलिए है क्योंकि पतरस प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त सत्य को गहराई से समझ सकता था और प्रभु यीशु के वचनों को समझ सकता था। पतरस जिस युग में था, वह अनुग्रह का युग था। अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु द्वारा सिखाया गया छुटकारे का मार्ग व्यवस्था के युग के मार्ग से ऊँचा था। इससे मनुष्य के जीवन प्रवेश के बारे में कुछ बुनियादी सत्य और मानव स्वभाव में बदलाव से संबंधित कुछ प्रारंभिक सत्य जुड़े थे। उदाहरण के लिए, इसमें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना, परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के प्रति समर्पण करना और साथ-ही-साथ जब लोग अपने कुछ भ्रष्ट स्वभावों को प्रकट करें तो उन्हें कैसी प्रतिक्रिया दिखानी चाहिए आदि शामिल हैं। हालाँकि इन विषयों पर व्यापक और क्रमबद्ध ढंग से चर्चा नहीं की गई थी, फिर भी इनका उल्लेख किया गया था। बेशक, अय्यूब के समय की तुलना में उन पर बहुत अधिक चर्चा हुई थी, लेकिन वह आज की तुलना में काफी कम थी। यद्यपि बाइबल में सत्य के ऐसे पहलुओं के बारे में कोई वचन दर्ज नहीं हैं जैसे कि मनुष्य के स्वभाव में बदलाव, परमेश्वर के प्रति मनुष्यों का रवैया, लोगों के दिलों में गहरी पैठी भ्रष्टता का सार, या किसी के भ्रष्ट स्वभाव का प्रकटन आदि, फिर भी प्रभु यीशु ने निश्चित रूप से इन चीजों के बारे में कुछ हद तक बात की थी। बात सिर्फ इतनी है कि लोग इस स्तर तक नहीं पहुँच सके थे, और इसलिए ये वचन दर्ज नहीं किए गए। उदाहरण के लिए, प्रभु यीशु ने पतरस से यह कहा था : “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही रात को मुर्ग़ के बाँग देने से पहले, तू तीन बार मुझ से मुकर जाएगा” (मत्ती 26:34)। इस पर, पतरस ने उत्तर दिया : “यदि मुझे तेरे साथ मरना भी पड़े, तौभी मैं तुझसे कभी न मुकरूँगा” (मत्ती 26:35)। ये किस प्रकार के वचन हैं? (ये अहंकारपूर्ण वचन हैं जो आत्म-ज्ञान के अभाव का संकेत देते हैं।) वे किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोले गए अहंकारी वचन हैं जो स्वयं को नहीं जानता। तो इसका संबंध स्वयं को जानने से है। मुर्गे के बाँग देने के बाद पतरस को क्या एहसास हुआ? (कि उसने अपने बारे में शेखी बघारी थी।) जब उसे यह एहसास हुआ, तो क्या उसे अपने दिल में कुछ महसूस हुआ था? (हाँ।) ऐसा होने के बाद, उसकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी? (ग्लानि, उसका हृदय अपराध-बोध से भरा हुआ था।) उसकी पहली प्रतिक्रिया अपराध-बोध और पश्चात्ताप थी। उसने कहा, “प्रभु ने जो कहा वह सत्य था। प्रभु से प्रेम करने के बारे में मैंने जो कहा वह केवल एक इच्छा, एक आकांक्षा और एक तरह का नारा था। मेरे पास ऐसा आध्यात्मिक कद नहीं है।” प्रभु यीशु की गिरफ्तारी की परिस्थिति का सामना करते हुए पतरस कायर और भयभीत था। किसी ने उससे पूछा, “क्या वह तुम लोगों का प्रभु है? तुम उसे नहीं जानते?” और, तब पतरस अपने मन में क्या सोच रहा था? “हाँ, मैं उसे जानता हूँ, लेकिन अगर मैंने यह बात स्वीकारी, तो वे मुझे भी गिरफ्तार कर लेंगे।” अपनी कायरता और कष्ट झेलने के डर से, और क्योंकि वह प्रभु यीशु के साथ गिरफ्तार होने से भयभीत था, उसने प्रभु यीशु को जानने की बात स्वीकार नहीं की। उसकी कायरता उसकी आस्था पर भारी पड़ी। तो फिर, उसकी आस्था सच्ची थी या झूठी? (झूठी।) इसी समय उसे एहसास हुआ कि जब उसने पहले कहा था “हे प्रभु, मैं तेरे साथ बन्दीगृह जाने, वरन् मरने को भी तैयार हूँ,” ये वचन खयाली पुलाव पकाना भर थे। ये वचन उसकी वास्तविक आस्था नहीं थे, बल्कि केवल खोखले शब्द, एक नारा और सिद्धांत भर थे। उसके पास कोई वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं था। उसे कब एहसास हुआ कि उसके पास कोई वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं है? (जब तथ्यों का खुलासा हुआ।) जब उसके सामने तथ्य रखे गए और जब उसने ग्लानि और पश्चात्ताप महसूस किया, तभी उसे एहसास हुआ, “यह अब पता चला है कि प्रभु के कहने के अनुरूप ही मेरी आस्था और आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। प्रभु ने जो कहा वह सही था। मैंने जो कुछ भी प्रभु से कहा था, वह केवल शेखी थी। वह सच्ची आस्था नहीं थी, बल्कि एक क्षणिक आवेग था। किसी चीज का सामना होने पर मैं कायर था, कष्ट सहने को तैयार नहीं था, अपने स्वार्थी विचारों से ग्रस्त था, मैंने अपनी पसंद का विकल्प चुना, समर्पण नहीं किया, और मेरा हृदय ऐसा नहीं था जो वास्तव में प्रभु से प्यार करता हो। मेरी आस्था इतनी तुच्छ थी, मेरा आध्यात्मिक कद इतना छोटा था।” उसके पश्चात्ताप ने ही उसके मन में ये विचार उत्पन्न किए थे, है कि नहीं? उसके पश्चात्ताप से पता चलता है कि उसे पहले से ही अपने बारे में ज्ञान था और उसके पास अपने आध्यात्मिक कद, अवस्था और आस्था की सटीक माप भी थी। नए नियम में केवल यह दर्ज है कि पतरस ने तीन बार प्रभु को नकारा, लेकिन उसमें पतरस की अनुभवजन्य गवाही दर्ज नहीं है कि उसे किस प्रकार पश्चात्ताप हुआ, कैसे वह वापस परमेश्वर की ओर मुड़ा और बदल गया। वास्तव में, पतरस ने इस बारे में पत्र लिखे थे, लेकिन बाइबल के संपादकों ने उन्हें शामिल करने का विकल्प नहीं चुना। यह एक स्पष्ट समस्या है, जो दर्शाती है कि उस समय कलीसिया के सभी अगुआओं का ध्यान इस बात पर था कि उपदेश कैसे दिए जाएँ और गवाही कैसे दी जाए, लेकिन उनमें से किसी ने भी जीवन अनुभव को नहीं समझा था। यह न जानते हुए कि सबसे अहम चीजें जीवन प्रवेश, लोगों में सत्य की समझ तथा परमेश्वर का ज्ञान हैं, उन सभी ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि उन प्रेरितों ने कैसे उपदेश दिए और काम किए, और उन्होंने कैसे कष्ट उठाए। बाइबल का संपादन करने वालों ने पतरस के साथ जो कुछ हुआ उसे अत्यधिक सरलीकृत और सामान्य ढंग से दर्ज किया, लेकिन उन्होंने पौलुस के जीवन की घटनाओं को विशेष विवरण के साथ व्यापक रूप से दर्ज किया। इससे पता चलता है कि वे लोग पक्षपाती थे। वे नहीं समझते थे कि सत्य क्या है, न ही यह समझते थे कि परमेश्वर के लिए गवाही देने का क्या मतलब है। वे पौलुस की पूजा करते थे, इसलिए उन्होंने पौलुस के अधिक पत्रों को और पतरस के थोड़े-से पत्रों को ही चुना। बाइबल का इस तरह से संपादन करके उन्होंने सैद्धांतिक त्रुटि की, जिसके कारण जो लोग प्रभु में विश्वास करते थे वे दो हजार वर्षों तक पौलुस की पूजा करते रहे और उसका अनुकरण करते रहे। इस स्थिति ने पूरे धार्मिक जगत को परमेश्वर का प्रतिरोध करने के रास्ते पर आगे बढ़ाया जिससे वह मसीह-विरोधियों द्वारा नियंत्रित एक धार्मिक साम्राज्य बन गया। उन्होंने पतरस की उत्कृष्ट गवाही को नजरअंदाज करते हुए उसके केवल दो पत्रों को दर्ज किया—पतरस का पहला और दूसरा पत्र। लेकिन पतरस के साथ जो हुआ उसका उसने वास्तव में कैसे अनुभव किया, कैसे परमेश्वर ने उसे प्रबुद्ध किया, उसके सामने प्रकट होने पर यीशु ने उससे क्या कहा, पतरस ने परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, काट-छाँट, परीक्षणों और शोधनों को कैसे स्वीकार किया, कैसे उसे अंततः स्वेच्छा से क्रूस पर उल्टा लटका दिया गया, पतरस इस मुकाम तक कैसे पहुँचा, उसने अपने जीवन स्वभाव में इतना परिवर्तन कैसे हासिल किया, और उसने इतनी आस्था और समर्पण कैसे प्राप्त किया—अनुभव प्राप्ति की इस प्रक्रिया का कोई उल्लेख नहीं है। ऐसा किसी हाल में नहीं होना चाहिए। बहुत दुख की बात है कि इन अत्यधिक मूल्यवान चीजों को दर्ज नहीं किया गया!

चार सुसमाचारों में दर्ज पतरस द्वारा प्रभु के तीन नकारों से लेकर अंत में परमेश्वर के लिए क्रूस पर उसके उल्टा लटकने तक, जब लोग इन घटनाक्रमों को एक साथ रखते हैं, तो वे क्या देखते हैं? पतरस तीन बार प्रभु को नकारने से लेकर अंततः परमेश्वर के लिए क्रूस पर उल्टा लटकने तक चला गया। क्या इसमें कोई कठिन प्रक्रिया, कोई खोजबीन के योग्य प्रक्रिया नहीं थी? यह प्रक्रिया क्या थी? (मनुष्य के जीवन प्रवेश और स्वभाव में परिवर्तन की प्रक्रिया।) सही है, मानव स्वभाव में परिवर्तन परमेश्वर के लिए खुद को त्यागने और खपाने तथा परमेश्वर के सभी आयोजनों के प्रति स्वेच्छा से समर्पण कर पाने की जीवन यात्रा है। जीवन अनुभव ठीक यही प्रक्रिया है। इसमें जरा भी नाटकीयता नहीं है। एकदम प्रारंभ में जब पतरस प्रभु यीशु का अनुयायी होने की बात स्वीकारने की हिम्मत नहीं कर सका था से लेकर अंत में जब वह साहस और आस्था के साथ इस स्तर पर पहुँच गया था कि परमेश्वर के लिए क्रूस पर उल्टा लटकने को तैयार हो गया था। वह अपनी आस्था, अपने स्वभाव और समर्पण में परिवर्तन की कैसी प्रक्रिया से गुजरा! इसमें निश्चित रूप से विकास की प्रक्रिया शामिल थी। आधुनिक लोगों को यह जानने की जरूरत नहीं है कि यह विकास प्रक्रिया वास्तव में किस प्रकार की थी, क्योंकि आज बोले गए शब्द ऐसे सत्य हैं जिन्हें परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने वालों को अवश्य समझना चाहिए। आज, परमेश्वर ने पहले से ही लोगों को ये बातें स्पष्ट कर दी हैं और उन्हें ये सत्य प्रदान कर दिए हैं। तो पतरस का अनुभव कैसा था? प्रभु यीशु के चले जाने के बाद किसी ने भी उसे स्पष्ट शब्दों में नहीं बताया था कि उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण की स्थिति प्राप्त करने के लिए क्या अनुभव करना चाहिए। उस युग में जब उसे परमेश्वर के स्पष्ट वचन भी उपलब्ध नहीं थे, उसने बिना किसी शिकायत या व्यक्तिगत पसंद के आध्यात्मिक कद और स्वैच्छिक समर्पण की आस्था अर्जित की। मुझे बताओ कि अंत में उसे कौन-से सत्य प्राप्त हुए? और, उसने उन्हें कैसे हासिल किया? उसने यह सब प्रार्थना, खोज और फिर धीरे-धीरे अनुभव करने और टटोलने के माध्यम से हासिल किया था। निश्चित ही, इस दौरान पतरस को परमेश्वर से प्रबोधन और रोशनी मिली, परमेश्वर का विशेष अनुग्रह और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। इन बातों के अलावा, वह केवल अपने प्रयासों से ही अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सका। इस प्रक्रिया के दौरान, पतरस का स्वयं अपने बारे में, परमेश्वर के इरादों के बारे में, और सत्य के जिन सभी पहलुओं के बारे में लोगों को प्रवेश करना चाहिए उनके संबंध में ज्ञान धीरे-धीरे अस्पष्टता से स्पष्टता, फिर सटीकता तक गया और फिर अभ्यास के एक व्यावहारिक और निश्चित मार्ग के रूप में बदल गया। यह प्रक्रिया उस अंतिम समय तक चलती रही जब वह बिना किसी भटकाव के पूरी तरह से समर्पण करने योग्य हो गया। अपने मन में पुष्टि कर लेने के बाद ही उसने इस प्रकार अभ्यास करने का साहस किया। यह पुष्टि कहाँ से हुई? अँधेरे में टटोलने, साथ ही प्रार्थना और खोज से भी। उसने पवित्र आत्मा और परमेश्वर को उनका कार्य करने दिया। इसमें कोई रुकावट या अनुशासन नहीं था। पवित्र आत्मा से मिली प्रबुद्धता, शांति और आनंद होने के साथ-साथ उसके पास परमेश्वर का समर्थन, आशीष और मार्गदर्शन भी था। इस तरीके से उसे पुष्टि प्राप्त हुई। पुष्टि प्राप्त करने के बाद वह साहस के साथ खोजने, टटोलने और अभ्यास करने की दिशा में आगे बढ़ता रहा। इतनी जटिल प्रक्रिया से गुजरने के बाद पतरस को धीरे-धीरे मानव प्रकृति, आत्म-ज्ञान और स्वभाव के पहलुओं के साथ-साथ विभिन्न परिवेशों में मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव द्वारा उत्पन्न होने वाली विभिन्न अवस्थाओं की सटीक समझ पैदा हुई। इन्हें समझने के बाद उसने इन चीजों पर काम शुरू किया ताकि अभ्यास के संगत मार्गों को खोजा जा सके। अंत में उसने विभिन्न परिवेशों में अलग-अलग तरह के भ्रष्ट स्वभावों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई प्रत्येक स्थिति का समाधान किया। उसने इनका समाधान कैसे किया? उसने परमेश्वर द्वारा प्रबोधित सत्यों और सिद्धांतों का उपयोग करते हुए थोड़ा-थोड़ा करके उनका समाधान किया। निस्संदेह, इस दौरान उसे कई परीक्षणों और शोधनों का अनुभव हुआ। परमेश्वर ने उसका किस हद तक परीक्षण किया और उसका शोधन किया? अंत में, वह परमेश्वर का इरादा जानकर समझ गया कि परमेश्वर चाहता है कि लोग समर्पण का पाठ सीखें। तो फिर, परमेश्वर ने पतरस पर किस हद तक कार्य करके उसे यह बोध कराया कि लोगों को समर्पण का अभ्यास करना चाहिए? हमने पतरस की कही एक बात का पहले जिक्र किया था। क्या तुम्हें याद है कि वह बात क्या थी? (“अगर परमेश्वर मुझसे एक खिलौने जैसा बर्ताव करता, तो मैं तैयार और इच्छुक क्यों नहीं होता?”) सही है, यही वह बात है। परमेश्वर के कार्य या मार्गदर्शन का अनुभव करने की प्रक्रिया में पतरस के मन में अनजाने ही यह भावना पैदा हो गई : “क्या परमेश्वर लोगों के साथ खिलौनों की तरह व्यवहार नहीं करता?” लेकिन निश्चित रूप से यह वह बात नहीं है जिससे परमेश्वर के कार्य अभिप्रेरित होते हैं। लोग इस बात का आकलन करने के लिए अपने इंसानी नजरिए, सोच और ज्ञान पर भरोसा करते हैं और महसूस करते हैं कि परमेश्वर लोगों के साथ ऐसी बेपरवाही से खेलता है मानो वे खिलौने हों। वह एक दिन कहता है यह करो, तो अगले दिन कहता है, वह करो। अनजाने ही तुम महसूस करने लगते हो, “ओह, परमेश्वर ने तो बहुत-सी बातें कही हैं। आखिर वह क्या करने की कोशिश कर रहा है?” लोग भ्रमित और थोड़ा अभिभूत भी होने लगते हैं। उन्हें नहीं पता होता कि कौन-से विकल्प चुने जाएँ। परमेश्वर ने पतरस का परीक्षण करने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया था। इस परीक्षण का अंतिम परिणाम क्या रहा? (पतरस ने मृत्युपर्यंत समर्पण हासिल किया।) उसने समर्पण हासिल किया। यही वह परिणाम था जो परमेश्वर चाहता था, और परमेश्वर ने इसे देखा। पतरस द्वारा कहे गए कौन-से शब्द दिखाते हैं कि वह आज्ञाकारी हो गया था और उसका आध्यात्मिक कद बड़ा हो गया था? पतरस ने क्या कहा? परमेश्वर ने जो कुछ भी किया था और मनुष्य को खिलौना समझने के उसके रवैये को पतरस ने कैसे स्वीकार किया और किस रूप में देखा? पतरस का रवैया क्या था? (उसने कहा : “तो मैं तैयार और इच्छुक क्यों नहीं होता?”) हाँ, यही पतरस का रवैया था। उसके शब्द बिल्कुल यही थे। जिन लोगों को परमेश्वर के परीक्षणों और शोधनों का कोई अनुभव नहीं है, वे ये वचन कभी नहीं बोलेंगे क्योंकि वे इस कथा के कथ्य को नहीं समझते और उन्होंने कभी इसका अनुभव नहीं किया है। चूँकि उन्होंने इसका अनुभव नहीं किया है, वे इस बारे में निश्चित ही स्पष्ट नहीं हैं। यदि वे इस मामले में स्पष्ट नहीं हैं, तो यह बात इतनी लापरवाही से कैसे बोल सकते हैं? ये वचन कुछ ऐसे हैं जिनके बारे में कोई मनुष्य कभी सोच तक नहीं सकता। पतरस यह सब कहने में सक्षम था क्योंकि उसने बहुत सारे परीक्षणों और शोधनों का अनुभव किया था। परमेश्वर ने उसे बहुत-सी चीजों से वंचित किया, लेकिन साथ ही उसे बहुत कुछ दिया भी। और, देने के बाद, एक बार फिर सब कुछ वापस ले लिया। उससे चीजें वापस ले लेने के बाद, परमेश्वर ने पतरस को समर्पण करना सिखाया और फिर एक बार उसे दे दिया। मनुष्य के दृष्टिकोण से, परमेश्वर द्वारा की गई बहुत-सी चीजें मनमौजी लगती हैं, जिससे लोगों को भ्रम होता है कि परमेश्वर लोगों से खिलौनों की तरह पेश आता है, लोगों का सम्मान नहीं करता, और लोगों के साथ इंसानों जैसा व्यवहार नहीं करता। लोग सोचते हैं कि खिलौनों की ही तरह वे सम्मानहीन जीवन जी रहे हैं; वे सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वतंत्र चयन का अधिकार नहीं देता, और परमेश्वर जो चाहे कह सकता है। जब वह तुम्हें कुछ देता है, तो कहता है, “तुमने जो किया है उसके लिए तुम इस पुरस्कार के पात्र हो। यह परमेश्वर का आशीष है।” जब वह चीजें छीन लेता है, तो उसके पास कहने के लिए कुछ और होता है। इस प्रक्रिया में लोगों को क्या करना चाहिए? परमेश्वर के बारे में सही या गलत का न्याय करना तुम्हारा काम नहीं है, परमेश्वर के कार्यों की प्रकृति की पहचान करना भी तुम्हारा काम नहीं है और इस प्रक्रिया में अपने जीवन को अधिक सम्मान देना निश्चित रूप से तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हें इस विकल्प का चयन नहीं करना चाहिए। यह भूमिका तुम्हारी नहीं है। तो, तुम्हारी भूमिका क्या है? तुम्हें अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के इरादों को समझना सीखना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ सकते और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते, तो तुम्हारे पास एकमात्र विकल्प समर्पण करने का होगा। ऐसी परिस्थितियों में, क्या तुम्हारे लिए समर्पण करना आसान होगा? (नहीं।) समर्पण करना आसान नहीं है। यह वह सबक है जो तुम्हें सीखना चाहिए। यदि तुम्हारे लिए समर्पण करना आसान होता, तो तुम्हें सबक सीखने की जरूरत नहीं होती, तुम्हें काट-छाँट और परीक्षणों तथा शोधनों से गुजरने की जरूरत नहीं होती। चूँकि तुम्हारे लिए परमेश्वर के प्रति समर्पण करना कठिन है, इसीलिए वह लगातार तुम्हें परीक्षणों में रखता है, तुम्हारे साथ मनमाने तरीके से खेलता है मानो तुम कोई खिलौना हो। जिस दिन तुम्हारे लिए परमेश्वर के प्रति समर्पण करना आसान हो जाएगा, जब तुम बिना किसी कठिनाई या बाधा के परमेश्वर के प्रति समर्पण करने लगोगे, जब तुम अपनी पसंद, इरादों या प्राथमिकताओं के बिना, स्वेच्छा और प्रसन्नता से समर्पण कर सकोगे, तब परमेश्वर तुम्हारे साथ खिलौने जैसा व्यवहार नहीं करेगा और तुम बिल्कुल वैसा ही करोगे जैसा तुम्हें करना चाहिए। यदि किसी दिन तुम कहो, “परमेश्वर मुझसे खिलौने की तरह पेश आता है और मैं गरिमाहीन जीवन जी रहा हूँ। मैं इससे सहमत नहीं हूँ और मैं समर्पण नहीं करूँगा,” तो शायद उसी दिन परमेश्वर तुम्हारा त्याग कर दे। तब क्या होगा यदि तुम्हारा आध्यात्मिक कद इस स्तर तक पहुँच जाए जहाँ तुम कहो कि “यद्यपि परमेश्वर के इरादों को जान पाना आसान नहीं है और परमेश्वर हमेशा मुझसे छिपता है, फिर भी परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है। परमेश्वर चाहे जो करे, मैं स्वेच्छा से समर्पण करूँगा। भले ही मैं समर्पण न कर सकूँ, फिर भी मुझे यह रवैया अपनाना चाहिए और कोई शिकायत या अपने स्वयं के विकल्प नहीं बनाने चाहिए। ऐसा इसलिए कि मैं सृजित प्राणी हूँ। समर्पण करना मेरा कर्तव्य है, और यह एक स्पष्ट दायित्व है जिससे मैं बच नहीं सकता। परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह सही है। परमेश्वर जो करता है, उसके बारे में मुझे कोई कल्पना या धारणा नहीं बनानी चाहिए। ऐसा करना किसी सृजित प्राणी के लिए उचित नहीं है। परमेश्वर ने मुझे जो भी दिया है, उसके लिए मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ। परमेश्वर ने मुझे जो नहीं दिया या देकर वापस ले लिया, उसके लिए भी मैं परमेश्वर को धन्यवाद देता हूँ। परमेश्वर के सभी कार्य मेरे लिए लाभदायक हैं; भले ही मैं वे लाभ न देख सकूँ, फिर भी मुझे जो करना चाहिए वह है समर्पण करना”? क्या इन बातों का प्रभाव पतरस के उन वचनों जैसा नहीं है जब उसने कहा था, “तो मैं तैयार और इच्छुक क्यों नहीं होता”? केवल ऐसे आध्यात्मिक कद वाले लोग ही सत्य को सचमुच समझते हैं।

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