जब मैंने अपना डर दूर किया
कुछ समय पहले, कलीसिया के फिल्मांकन कार्य के लिए हमें कुछ चित्र बनाने थे। मेरे सहयोगी भाई साइमन ने एक चित्र बनाकर समीक्षा के लिए दिया। अगुआ...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
1995 में मैं प्रभु यीशु में विश्वास करने लगी। उस समय एक उपदेशक ने प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दी गई भविष्यवाणियों का उपयोग करके हमें बताया कि पवित्र नगर कितना अद्भुत है। उसने यह भी कहा कि प्रभु यीशु जल्द ही हमें हमारे स्वर्गीय घर ले जाने आएगा और केवल प्रभु के लिए खुद को त्यागने और खपाने से ही हम भविष्य में पवित्र नगर में प्रवेश कर सकते हैं। यह सुनकर मैं बहुत रोमांचित हो गई। उसके बाद मैं उत्सुकता से सभाओं में भाग लेने लगी और भेंट चढ़ाने लगी। चाहे मेरे पति या मेरे भाई और उसकी पत्नी ने मुझे रोकने की कितनी भी कोशिश की, प्रभु यीशु का अनुसरण करने के मेरे संकल्प को कुछ भी डिगा नहीं सका। तीन साल बाद, प्रभु में मेरे विश्वास पर अड़े रहने के कारण मेरे पति ने मुझसे तलाक माँगा। मैं मान गई। उसके बाद मैंने अपनी सारी संपत्ति कलीसिया को भेंट कर दी और दृढ़ता से प्रभु के लिए प्रचार और काम करने के लिए घर छोड़ दिया। दो महीने बाद मैं एक सहकर्मी बन गई। मैं सत्तर से अधिक कलीसियाओं के लिए जिम्मेदार थी। 2000 में एक सहकर्मी सभा में एक अगुआ ने हमसे कहा, “अब ‘चमकती पूर्वी बिजली’ नामक एक संप्रदाय सामने आया है। वे कहते हैं कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में देह में लौट आया है और कार्य का एक नया चरण कर रहा है। यह असंभव है! वे अब बाइबल भी नहीं पढ़ते। परमेश्वर के सभी वचन बाइबल में हैं; बाइबल के बाहर परमेश्वर के कोई वचन नहीं हैं। बाइबल को छोड़ना प्रभु में विश्वास करना छोड़ देना है! वे हर जगह प्रचार करते हैं और उन्होंने सभी संप्रदायों से कई अच्छी भेड़ों को चुरा लिया है। हमें प्रभु के वफादार सेवक बनना चाहिए और अपने भाई-बहनों की रक्षा करनी चाहिए, ताकि हम भविष्य में प्रभु को अपना हिसाब दे सकें! तुम्हें कभी भी चमकती पूर्वी बिजली के मार्ग पर विश्वास नहीं करना चाहिए। एक बार कर लिया तो तुम प्रभु का मार्ग छोड़ दोगे और उसके द्वारा त्याग दिए जाओगे!” अगुआ को यह कहते हुए सुनकर मैंने मन में सोचा, “मुझे सावधान रहना होगा, प्रभु के मार्ग पर दृढ़ रहना और झुंड की रक्षा करनी होगी।” उसके बाद मैं कलीसिया की घेराबंदी करने लगी। हर सभा स्थल पर, जिसके लिए मैं जिम्मेदार थी, मैंने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि अजनबियों को अंदर न आने दिया जाए और कोई भी चमकती पूर्वी बिजली के मार्ग पर विश्वास न करे। यह सुनकर सभी विश्वासी चमकती पूर्वी बिजली के लोगों से सतर्क रहने लगे। इसके तुरंत बाद मैंने सुना कि दो बहनों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया था। मैं उन्हें वापस लौटने के लिए मनाने तुरंत उनके घर गई। उन्होंने मेरी बात नहीं मानी और सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करने पर अड़ी रहीं। मैं बहुत गुस्से में थी और मैंने दूसरे भाई-बहनों पर और भी सख्ती से नजर रखनी शुरू कर दी। फिर मुझे पता चला कि एक विवाहित जोड़े ने भी सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है। मैं जल्दी से उनके घर गई और उन्हें वापस ले आई। उस समय मुझे सच में विश्वास था कि मैंने आखिरकार प्रभु की भेड़ों को बचा लिया है और प्रभु मेरे किए हुए काम को निश्चित रूप से स्वीकार करेगा।
फरवरी 2002 में एक बहन मुझे अपने रिश्तेदारों के साथ बाइबल पर चर्चा करने के लिए अपने घर ले गई। उन्होंने परमेश्वर द्वारा संसार की रचना से लेकर व्यवस्था के युग में यहोवा परमेश्वर के कार्य तक और फिर अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य तक, हर चीज पर चर्चा की। उन्होंने कार्य के हर चरण की पृष्ठभूमि और महत्वपूर्ण मोड़ों को स्पष्ट रूप से समझाया। उन्होंने इस बारे में भी संगति की कि परमेश्वर किस तरह के लोगों को आशीष देता है और किन्हें श्राप देता है। उनकी संगति बहुत रोशनी देने वाली थी और ऐसी थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी। मैंने सोचा कि उनका प्रचार बहुत बढ़िया था। उसके बाद उन्होंने मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की गवाही दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर और भाई-बहनों की संगति सुनकर, मैं समझ गई कि बाइबल केवल व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य को दर्ज करती है। यह एक ऐतिहासिक पुस्तक है और परमेश्वर के सभी कार्यों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता और उसका कार्य हमेशा आगे बढ़ता रहता है। जब परमेश्वर अंत के दिनों में लौटेगा तो वह नया कार्य करेगा जो बाइबल से परे होगा। इस चरण में वह न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करेगा, जो प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य के आधार पर होगा, ताकि इंसान को पाप से पूरी तरह से बचाया जा सके और लोगों को एक सुंदर मंजिल में लाया जा सके। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों में अपने न्याय का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करना प्रभु यीशु की भविष्यवाणियों को पूरा करता है : “वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो वचन बोले हैं वे ही अंत के दिन उसका न्याय करेंगे” (यूहन्ना 12:48)। “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। खास तौर पर जब मैंने देखा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने बाइबल के सभी रहस्यों को खोल दिया है, कि “वचन देह में प्रकट होता है” प्रकाशितवाक्य में भविष्यवाणी किया गया “मेमने द्वारा खोला गया छोटा सूचीपत्र” है और यही है जो पवित्रात्मा कलीसियाओं से कहता है, मुझे एहसास हुआ कि “चमकती पूर्वी बिजली” जिसे मैं लगातार स्वीकार करने से इनकार कर रही थी, असल में अंत के दिनों में प्रभु यीशु का प्रकटन और कार्य था। मेरे दिल में ऐसी पीड़ा होने लगी कि बयाँ नहीं कर सकती। मैंने सोचा कि जब से मैंने प्रभु में विश्वास किया था, मैंने अपने पति के उत्पीड़न पर जीत पा ली और गरीब विधवा की तरह भेंट चढ़ाई थी। मैंने प्रभु के लिए काम करने के लिए सब कुछ त्याग दिया था। मैंने सोचा कि मैं प्रभु के मार्ग पर दृढ़ता से चल रही हूँ, भक्ति के साथ उसके झुंड की रखवाली कर रही हूँ। मैंने कभी नहीं सोचा था कि जब प्रभु लौटेगा तो मैं बिल्कुल भी खोज नहीं करूँगी। मैं आँख मूँदकर अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से चिपकी रही, यह मानती रही कि परमेश्वर देह में नहीं आ सकता, कि उसका कार्य बाइबल से परे नहीं जा सकता, इत्यादि। मैंने घमंड से परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की निंदा की और उसका प्रतिरोध किया, भाई-बहनों को सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने से रोकने के लिए कलीसिया की घेराबंदी की और यहाँ तक कि एक जोड़े को, जिसने पहले ही परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया था, वापस अपने पुराने संप्रदाय में ले आई थी। प्रभु यीशु ने फरीसियों को फटकारते हुए कहा : “हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो” (मत्ती 23:13)। क्या मेरे काम फरीसियों जैसे ही नहीं थे? मैंने खुद तो परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार नहीं किया और दूसरे विश्वासियों को भी इसे स्वीकार करने से रोकने की पूरी कोशिश की। क्या यह उन्हें नरक में घसीटना नहीं था? मैंने इतने बुरे काम किए थे—तो क्या मैं भी हाय के योग्य नहीं थी? मेरा दिल पछतावे से भर गया। लेकिन फिर मैंने सोचा, परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर पाना मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह और दया है। मुझे अपने अपराधों की भरपाई के लिए सुसमाचार का प्रचार करना होगा। अगर मैंने और सुसमाचार का प्रचार ज्यादा किया तो शायद परमेश्वर मेरे अपराधों को याद नहीं रखेगा। बाद में मैं एक बहन को अपने साथ ले गई कि वह उस जोड़े के सामने सुसमाचार प्रचार करे जिसे मैं वापस खींच लाई थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि हम चाहे कुछ भी कहें, वे सुनने से इनकार कर देंगे। कलीसिया की घेराबंदी करते समय मैंने जो कहा था, उन्होंने वही बातें मेरे मुँह पर दे मारीं। मेरा दिल और भी टूट गया और मैं पछतावे से भर गई। अपने अपराधों की भरपाई के लिए मैंने और भी ज्यादा सुसमाचार का प्रचार किया। उस दौरान मैंने बहुत कठिनाई सही लेकिन कभी पीछे नहीं हटी। मैंने सोचा, “अगर परमेश्वर मेरी भक्ति और पश्चात्ताप को देखेगा, तो शायद वह मेरे अपराधों को मेरे खिलाफ नहीं गिनेगा और मुझे बचाए जाने का एक मौका देगा।”
2004 में एक दिन अपनी भक्ति के दौरान मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “मैं ऐसे किन्हीं भी लोगों के प्रति नरमी नहीं दिखा सकता जिन्होंने मुझे उत्पीड़ित किया, जिन्हें मेरे बारे में कोई ज्ञान नहीं है (मेरे नाम की गवाही दिए जाने से पहले के समय सहित), जो मुझे मनुष्य मानते हैं, और जिन्होंने अतीत में मेरे खिलाफ़ ईशनिन्दा की थी और मुझ पर लांछन लगाए थे। यहाँ तक कि यदि अब वे मेरे लिए सबसे गुंजायमान गवाही दें, तो भी इससे काम नहीं चलेगा। अतीत में मुझे प्रताड़ित करना मेरे लिए सेवा प्रदान करने का एक तरीक़ा था, और वे लोग यदि अब मेरे लिए गवाही दें, तो भी वे मेरे साधन ही होंगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 85)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं वहीं जम-सी गई। मेरा दिमाग बिल्कुल खाली हो गया और मुझे होश में आने में काफी देर लगी। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि परमेश्वर एक भी ऐसे व्यक्ति के प्रति नरमी नहीं दिखाता जिसने उसे उत्पीड़ित और बदनाम किया हो। भले ही वे अब परमेश्वर की गवाही दें, फिर भी वे उसकी नरमी नहीं पा सकते; वे केवल उसके लिए सेवा कर सकते हैं। मैंने सोचा कि कैसे मैं अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से चिपकी रही थी और परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य की बिल्कुल भी खोज या जाँच-पड़ताल नहीं की थी। इसके बजाय मैंने परमेश्वर को बदनाम किया था और उसका प्रतिरोध किया था, विश्वासियों को सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करने से रोकने के लिए कलीसिया की घेराबंदी की थी, यहाँ तक कि उन लोगों को भी वापस अपने पुराने संप्रदाय में ले आई थी जिन्होंने पहले ही परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार कर लिया था। मैंने इतनी बड़ी बुराई की थी; निश्चित रूप से परमेश्वर मुझे कभी माफ नहीं करेगा। क्या मेरा काम तमाम नहीं हो गया था? मेरा क्या अच्छा परिणाम हो सकता था? लेकिन मुझमें अभी भी एक छोटी-सी उम्मीद थी। “क्या मेरी समझ गलत हो सकती है? जब परमेश्वर ने कहा कि वह ‘नरमी नहीं दिखा सकता,’ तो क्या वह उन लोगों के बारे में बात कर रहा था जिन्होंने उसके वचन सुनने और उसके कार्य को जानने के बाद उसकी ईशनिंदा की और उसे बदनाम किया था?” मैंने उत्सुकता से एक-एक शब्द करके परमेश्वर के वचनों को फिर से पढ़ा। परमेश्वर ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा था। जिन लोगों के बारे में वह बात कर रहा था, उनमें वे लोग भी शामिल थे जिन्होंने उसके वचन कभी सुने बिना या उसे जाने बिना ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की ईशनिंदा की और उसे बदनाम किया था। केवल तभी मुझे यकीन हुआ कि मैं उन लोगों में से एक थी जिनके प्रति परमेश्वर नरमी नहीं दिखा सकता। परमेश्वर के कठोर वचनों ने मेरे दिल पर चोट की। मैं डर गई और मेरा पूरा शरीर ढीला पड़ गया। मैंने सोचा, “लगता है मेरे पास पश्चात्ताप करने का भी मौका नहीं है।” “चाहे मैं अपने कर्तव्य में कितनी भी समर्पित होऊँ, चाहे कितनी भी कठिनाई सहूँ, भले ही मैं सबसे शानदार गवाही दूँ, मुझे फिर भी परमेश्वर की नरमी नहीं मिलेगी। बचाए जाने की मेरी उम्मीद पूरी तरह खत्म हो गई है।” उस दौरान, हालाँकि मैं अभी भी सुसमाचार का प्रचार कर रही थी, जैसे ही मैंने सोचा कि परमेश्वर मुझे नहीं बचाएगा, मैं बहुत हताश हो गई और मैं सुसमाचार का प्रचार करने में पहले की तरह सक्रिय नहीं थी। एक बार, मैं सड़क पर अपनी बाइक लेकर चल रही थी और लोगों की भीड़ देख रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, “इन सभी के अपने-अपने घर हैं। लेकिन मेरा क्या? जब मैंने पहली बार प्रभु में विश्वास करना शुरू किया तो मैं कलीसिया को अपना घर मानती थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि प्रभु की वापसी को न पहचानकर, मैं उसका प्रतिरोध करूँगी, अक्षम्य अपराध कर बैठूँगी और उस घर में मेरा कोई हिस्सा नहीं होगा जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए तैयार किया है—परमेश्वर का राज्य।” उस पल, मुझे अकेलापन महसूस हुआ।
एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और बहुत प्रभावित हुई और मेरी हताश दशा में कुछ सुधार हुआ। परमेश्वर कहता है : “एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम मत करो; तुम्हें जो करना चाहिए, वह है सृष्टि के प्रभु के प्रति खुद को समर्पित करना” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मोआब के वंशजों को बचाने का अर्थ)। मैं एक सृजित प्राणी हूँ; सुसमाचार का प्रचार करना और परमेश्वर की गवाही देना मेरा कर्तव्य है। मैं सिर्फ इसलिए अपना कर्तव्य ईमानदारी से करना बंद नहीं कर सकती थी क्योंकि मेरा अच्छा परिणाम नहीं होगा। क्या ऐसा करना अंतरात्मा और विवेक की कमी नहीं है? उसके बाद मैंने सुसमाचार का प्रचार करना जारी रखा। जब मुझे नतीजे मिलते तो मैं खुश होती, लेकिन मेरे दिल की गहराइयों में हमेशा एक तरह का भारीपन रहता था। मैंने सोचा कि मैंने अपराध किया था और मैं दूसरों से अलग थी—जब वे सुसमाचार का प्रचार करते तो वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते थे और बचाए जाने की उम्मीद रख सकते थे, लेकिन चाहे मैं कितना भी सुसमाचार का प्रचार करूँ, परमेश्वर मुझे कभी माफ नहीं करेगा। समय-समय पर मैं हताश हो जाती थी।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी दशा के बारे में कुछ समझ पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का उद्देश्य बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए प्रयास नहीं करना चाहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का कोई भी लक्ष्य आशीष प्राप्त करने से ज्यादा वैध नहीं है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस उद्देश्य को प्राप्त करने में योगदान नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनके उद्देश्य और इरादे न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम उद्देश्य के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास के उद्देश्य को नहीं बदल सकते। वे अपने स्वार्थपूर्ण लक्ष्य साधने के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनका अंतःकरण है? क्या यह उनकी महान और कुलीन सत्यनिष्ठा है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर की गवाही देने की उनकी आस्था है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ त्याग देने की तत्परता के प्रति उनका लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, फिर भी इतना सारा हृदय का रक्त खपाना एक चमत्कार ही है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं प्रबुद्ध और शर्मिंदा दोनों महसूस करने लगी। परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता ठीक वैसा ही था जैसा उसने उजागर किया था : नग्न स्वार्थ का। जब मैं प्रभु में विश्वास करती थी तो मैंने आशीष पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए उत्पीड़न सहा और अपना परिवार त्याग दिया। मैं कड़ाके की ठंड और चिलचिलाती गर्मी में कलीसियाओं की अगुआई करने और सुसमाचार का प्रचार करने में दृढ़ रही, चाहे मुझे कितना भी कष्ट क्यों न उठाना पड़ा हो। लेकिन जब मैंने परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य का सामना किया तो न केवल मैंने खुद खोज या जाँच-पड़ताल नहीं की, बल्कि मैंने इसकी निंदा की और इसका प्रतिरोध भी किया, यहाँ तक कि विश्वासियों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने से रोकने के लिए कलीसिया की घेराबंदी की। परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार करने के बाद मुझे पता चला कि मैंने बुराई की थी और परमेश्वर का प्रतिरोध किया था। मेरा पहला विचार यह नहीं था कि परमेश्वर से कैसे पश्चात्ताप किया जाए, बल्कि यह था कि मैं अपने अपराधों की भरपाई करने और परमेश्वर की दया पाने के लिए और ज्यादा सुसमाचार का प्रचार कैसे करूँ, ताकि वह मुझे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का मौका दे। जब मैंने पढ़ा कि परमेश्वर उन लोगों के प्रति “नरमी नहीं दिखा सकता” जिन्होंने ईशनिंदा की और उसे बदनाम किया था तो मुझे विश्वास हो गया कि चाहे मैं अपने कर्तव्य में कितनी भी मेहनत करूँ, मुझे कभी भी परमेश्वर की नरमी नहीं मिलेगी और उद्धार की मेरी उम्मीद खत्म हो गई। तब मैं अपने कर्तव्य निभाने में नकारात्मक और निष्क्रिय हो गई। शुरू से अंत तक मैं सिर्फ आशीष पाने की परवाह करती थी। मैंने त्याग किया, खुद को खपाया, परिश्रम किया और काम किया लेकिन यह सत्य या परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करने के लिए नहीं, बल्कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की आशीष की सौदेबाजी के लिए था। जैसा परमेश्वर ने उजागर किया था “केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा,” क्या यह बिल्कुल वैसा नहीं था? परमेश्वर में विश्वास करने के अपने सभी वर्षों में, मैंने कभी भी परमेश्वर के इरादे नहीं खोजे थे। मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि परमेश्वर मुझसे क्या अनुसरण करवाना चाहता है, मुझसे उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, मुझे उसके इरादों के प्रति कैसे विचारशील होना चाहिए और उसे संतुष्ट करना चाहिए या अपने स्वभाव में बदलाव लाने के लिए मुझे सत्य का अनुसरण कैसे करना चाहिए। मेरे मन में, अपनी आस्था में सत्य का अनुसरण करना एक अतिरिक्त कार्य लगता था और आशीष का अनुसरण ही सबसे व्यावहारिक लगता था। मैं सचमुच आशीष पाने की इच्छा से अंधी हो गई थी और हमेशा से गलत रास्ते पर चल रही थी। मैंने पौलुस के बारे में सोचा। जब प्रभु यीशु कार्य कर रहा था तो उसने न तो सुना और न ही खोजा; इसके बजाय उसने प्रभु यीशु की निंदा की और उसका प्रतिरोध किया, उसके शिष्यों को ढूँढ़कर मारा और बहुत से कुकर्म किए। प्रभु द्वारा मार गिराए जाने के बाद, उसने अपने पिछले परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले कार्यों और सार पर बिल्कुल भी आत्म-चिंतन नहीं किया। उसने प्रभु को जानने का भी अनुसरण नहीं किया, बल्कि केवल अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए सुसमाचार का प्रचार करना और ज्यादा लोगों को हासिल करना चाहता था। बहुत सारा काम करने के बाद उसने बेशर्मी से परमेश्वर से एक मुकुट माँगा, यह कहते हुए : “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है” (2 तीमुथियुस 4:7-8)। मैंने परमेश्वर से आशीष माँगने के लिए चीजें त्यागीं, खुद को खपाया और अपना कर्तव्य निभाया; मैं पौलुस के रास्ते पर चल रही थी। यह महसूस होने पर मैं पछतावे और स्वयं के प्रति धिक्कार से भर गई और मैंने रोते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, अब मैं समझ गई हूँ कि मैं कितनी घिनौनी और कुरूप हूँ। हालाँकि इन सभी वर्षों में मैं सुसमाचार का प्रचार करती रही और अपना कर्तव्य निभाती रही, मैं असल में सिर्फ आशीष पाने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपने कर्तव्य का इस्तेमाल कर रही थी। मैं सचमुच तुम्हारे सामने जीने के अयोग्य हूँ। हे परमेश्वर, मैं प्रार्थना करती हूँ कि तुम मेरी अगुआई करो ताकि मैं अपने स्वभाव में बदलाव का और तुम्हें जानने का अनुसरण करूँ।”
फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और इंसान को बचाने के उसके इरादे के बारे में थोड़ा समझ पाई। परमेश्वर कहता है : “आज परमेश्वर तुम लोगों का न्याय करता है, तुम लोगों को ताड़ना देता है और तुम्हें दोषी ठहराता है, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि तुम्हें दोषी इसलिए ठहराया जाता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको। वह दोषी ठहराता है, शाप देता है, न्याय करता और ताड़ना देता है, ताकि तुम स्वयं को जान सको, ताकि तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हो सके और उससे भी बढ़कर तुम अपनी कीमत जान सको और यह देख सको कि परमेश्वर के सभी कार्य धार्मिक और उसके स्वभाव और उसके कार्य की आवश्यकताओं के अनुसार हैं और वह मनुष्य के उद्धार के लिए अपनी योजना के अनुसार कार्य करता है और यह कि वह धार्मिक परमेश्वर है, जो मनुष्य को प्यार करता है और उसे बचाता है और जो उसका न्याय करता है और उसे ताड़ना भी देता है। यदि तुम केवल यह जानते हो कि तुम निम्न स्तर के हो, कि तुम भ्रष्ट और विद्रोही हो, परंतु यह नहीं जानते कि परमेश्वर आज तुम पर जो न्याय और ताड़ना का कार्य कर रहा है उसके माध्यम से वह अपने उद्धार को प्रकट करने का इरादा रखता है, तो तुम्हारे पास चीजों को अनुभव करने का कोई तरीका नहीं है, तुम आगे बढ़ने में तो बहुत कम सक्षम हो। परमेश्वर लोगों को मार गिराने या नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि उनका न्याय करने, उन्हें शाप देने, ताड़ना देने और बचाने के लिए आया है। उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—पहले वह मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का परिणाम प्रकट करे—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य पूरी तरह से उद्धार की खातिर है; इसका विशुद्ध प्रयोजन उससे प्रेम करने वाले लोगों को पूरी तरह पूर्ण बनाना और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण कराना है। ... परमेश्वर पृथ्वी पर भ्रष्ट मानवता को बचाने के लिए कार्य करने आया है—इसमें कोई झूठ नहीं है। यदि ऐसा न होता, तो वह अपना कार्य करने के लिए व्यक्तिगत रूप से निश्चित ही नहीं आता। अतीत में, उद्धार के उसके साधन में परम दया और प्रेमपूर्ण दयालुता दिखाना शामिल था, यहाँ तक कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। वर्तमान अतीत जैसा नहीं है : आज तुम लोगों का उद्धार अंत के दिनों के समय घटित होता है, जब प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन दया या प्रेमपूर्ण दयालुता नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है, ताकि मनुष्य को अधिक पूरी तरह से बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है, वह ताड़ना, न्याय और निर्मम प्रहार है, लेकिन यह जान लो : इस निर्मम प्रहार में थोड़ा-सा भी दंड नहीं है। मेरे वचन कितने भी कठोर हों, तुम लोगों को जो मिलता है, वे कुछ वचन ही होते हैं, जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत हो सकते हैं, और मैं कितना भी क्रोधित क्यों न हूँ, तुम लोगों को जो मिलता है, वे फिर भी तिरस्कारपूर्ण वचन ही होते हैं, और मेरा आशय तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना या तुम लोगों को मार डालना नहीं है। क्या यह सब तथ्य नहीं है? जान लो कि आजकल हर चीज उद्धार के लिए है, चाहे वह धार्मिक न्याय हो या भावहीन शोधन और ताड़ना। भले ही आज प्रत्येक व्यक्ति उसके प्रकार के अनुसार छाँटा जाए या सभी प्रकार के लोगों को बेनकाब किया जाए, परमेश्वर के समस्त वचनों और कार्य का प्रयोजन उन लोगों को बचाना है जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं। धार्मिक न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से लाया जाता है और निर्मम शोधन उसे शुद्ध करने के लिए किया जाता है; कठोर वचन या आघात दोनों शुद्ध करने के लिए किए जाते हैं और वे उद्धार के लिए हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष को परे रखना चाहिए और मनुष्य का उद्धार लाने का परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए)। “इस बार परमेश्वर लोगों को मार गिराने के लिए नहीं, बल्कि यथासम्भव अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाने के लिए कार्य करने आया है। कोई भी त्रुटिहीन नहीं है—अगर सबको मार गिरा दिया जाए तो क्या यह ‘उद्धार’ होगा? कुछ अपराध जानबूझकर किए जाते हैं, जबकि अन्य अपराध अनिच्छा से होते हैं। जो चीजें तुम अनिच्छा से करते हो उन्हें पहचान लेने के बाद अगर तुम बदल सकते हो तो क्या परमेश्वर तुम्हारे ऐसा करने से पहले तुम्हें मार गिराएगा? क्या परमेश्वर इस तरह से लोगों को बचाएगा? वह इस तरह काम नहीं करता! चाहे तुम्हारा विद्रोही स्वभाव हो या तुमने अनिच्छा से कार्य किया हो, यह याद रखो : तुम्हें आत्मचिंतन कर खुद को जानना चाहिए। तुरंत खुद को बदलो और अपनी पूरी ताकत से सत्य के लिए प्रयास करो—और, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, खुद को निराशा में न पड़ने दो। परमेश्वर मनुष्य के उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन पर यूँ ही मनमाने ढंग से प्रहार नहीं करेगा। यह निश्चित है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैं बहुत प्रभावित हुई। परमेश्वर लोगों से जो वचन कहता है, चाहे वे न्याय, निंदा या श्राप के हों, वे सभी लोगों को बचाने के लिए ही होते हैं—ताकि लोग उसके वचनों से अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपनी आस्था की अशुद्धियों को जानें, अपने परमेश्वर-प्रतिरोधी सार को जानें और परमेश्वर के धार्मिक, प्रतापी और अपमान न किए जा सकने वाले स्वभाव को जानें, ताकि उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल पैदा हो। इस तरह वे अपने गलत इरादे छोड़ सकते हैं, अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को त्याग सकते हैं और परमेश्वर का उद्धार पा सकते हैं। मैं परमेश्वर में विश्वास तो करती थी, लेकिन उसे या उसके कार्य को नहीं जानती थी। मैंने अपने घमंडी स्वभाव से परमेश्वर का प्रतिरोध किया। जब मेरे पुराने संप्रदाय में परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार का प्रचार किया गया, मैंने इसकी खोज या जाँच-पड़ताल नहीं की, यहाँ तक कि दूसरे विश्वासियों को परेशान किया और उन्हें ऐसा करने से रोका। मेरे कार्यों के प्रति परमेश्वर के न्याय और निंदा ने उसके धार्मिक स्वभाव को पूरी तरह से प्रकट किया। लेकिन जब परमेश्वर ने अपने वचनों से मेरा न्याय और निंदा की तो वह मेरा परिणाम तय नहीं कर रहा था, मुझे मौत की स्थिति में रखना तो दूर की बात थी। परमेश्वर का उद्देश्य था कि मैं उसके धार्मिक, प्रतापी और अपमान न किए जा सकने वाले स्वभाव को जानूँ, ताकि मुझमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल पैदा हो सके। उसका उद्देश्य यह भी था कि मैं अपने कार्यों की प्रकृति को समझूँ, अपनी नाकामी के मूल कारण पर चिंतन करूँ और पश्चात्ताप करके बदल सकूँ। इसी तरह परमेश्वर मुझे शुद्ध करता और बचाता है। परमेश्वर ने चाहे जो भी कहा हो, उसकी आशा थी कि मैं अपने विद्रोही, परमेश्वर-प्रतिरोधी शैतानी स्वभाव पर चिंतन करूँ और उसे समझूँ, ताकि मैं पश्चात्ताप करके बदल सकूँ। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर मनुष्य के उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन पर यूँ ही मनमाने ढंग से प्रहार नहीं करेगा। यह निश्चित है।” मैंने परमेश्वर के कार्य को बाइबल तक सीमित कर दिया था, उसके अंत के दिनों के कार्य की निंदा और प्रतिरोध किया था, यहाँ तक कि विश्वासियों को उसे स्वीकार करने से रोका था। मैंने देखा कि हालाँकि मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, मुझे उसका बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था। मेरा स्वभाव बेहद घमंडी था और मुझमें परमेश्वर का भय मानने वाला या विनम्र दिल अंशमात्र भी नहीं था। मैंने इतने बुरे काम किए थे कि मुझे परमेश्वर द्वारा श्रापित और दंडित किया जाना चाहिए था। लेकिन परमेश्वर ने मेरे साथ मेरे बुरे कर्मों के अनुसार व्यवहार नहीं किया। इसके बजाय वह मेरे भाई-बहनों द्वारा प्रचारित सुसमाचार के माध्यम से मुझे अपने सामने लाया और अपने वचनों के न्याय, निंदा और प्रकाशन के माध्यम से मुझे आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने दिया। अगर परमेश्वर का न्याय न होता तो मैं पूरी जिंदगी उस पर विश्वास करती रहती और कभी भी आत्म-चिंतन नहीं करती या खुद को नहीं जान पाती। मैं अपनी घमंडी प्रकृति को नहीं पहचान पाती या यह महसूस नहीं कर पाती कि मेरे सभी प्रयास और खपना आशीष पाने के लिए थे। मैं बस गलत रास्ते पर चलती रहती, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करती, उसका प्रतिरोध करती, उसके स्वभाव को नाराज करती और आखिरकार उसके द्वारा ठुकरा दी जाती और हटा दी जाती। परमेश्वर के कठोर न्याय ने ही मुझे बचाया, मुझे खुद को जानने और उसके सामने पश्चात्ताप करने का मौका दिया। परमेश्वर ने केवल अपने वचनों से मेरा न्याय किया; उसने मुझे दंड नहीं दिया बल्कि मुझे उसके वचनों के इतने प्रावधान का आनंद लेने दिया और मुझे कई सत्य समझाए। मैंने परमेश्वर से बहुत कुछ पाया है। सिर्फ सेवाकर्मी होना भी परमेश्वर का अनुग्रह और उत्कर्ष है। भले ही भविष्य में मेरा अच्छा परिणाम और मंजिल न हो, मुझे फिर भी अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए। मैं कितनी भाग्यशाली हूँ कि सृष्टिकर्ता के सामने आई और उसकी वाणी सुनी। मेरा जीवन व्यर्थ नहीं गया। भविष्य में मेरा परिणाम चाहे जो भी हो, मैं परमेश्वर का धन्यवाद और स्तुति करती हूँ!
उसके बाद मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े। मैं अपने अपराधों का सही ढंग से सामना कर पाई और मेरे लिए अभ्यास का मार्ग और भी स्पष्ट हो गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम लोगों के पास अभी थोड़ी-सी भी उम्मीद बची है, तो चाहे परमेश्वर तुम्हारे पुराने अपराध याद रखे या न रखे, तुम्हें कैसी मानसिकता बनाए रखनी चाहिए? ‘मुझे अपने स्वभाव में बदलाव लाना होगा, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करना होगा, दोबारा कभी शैतान के बहकावे में नहीं आना होगा, और दोबारा ऐसा कुछ भी नहीं करना होगा जो परमेश्वर के नाम को शर्मसार करे।’ लोग अब गहन रूप से भ्रष्ट हैं और किसी काम के नहीं हैं। ऐसे कौन-से मुख्य क्षेत्र हैं जिनसे पता चलता है कि उन्हें बचाया जा सकता है या नहीं और उनके लिए कोई उम्मीद बची है या नहीं? मुख्य बात है, किसी उपदेश को सुनने के बाद तुम सत्य को समझ सकते हो या नहीं, सत्य का अभ्यास कर सकते हो या नहीं, और तुम बदल सकते हो या नहीं। यही मुख्य क्षेत्र हैं। अगर तुम सिर्फ पछताते रहते हो और जब कुछ करने का समय आता है तो जो जी में आए वही करते हो, वही पुराने तरीके अपनाए रहते हो, न सिर्फ सत्य की खोज नहीं करते बल्कि अभी भी पुराने विचारों, तौर-तरीकों और विनियमों से चिपके रहते हो, न तो आत्म-चिंतन करते हो, न खुद को जानने का प्रयास करते हो, इसके बजाय और ज्यादा बिगड़ते जा रहे हो, और अभी भी अपने पुराने मार्ग पर चलने की जिद करते हो, तो तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं बची होगी, और तुम्हारा पत्ता साफ कर दिया जाना चाहिए। परमेश्वर के बारे में ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर और खुद को गहराई से जानकर तुम बुराई या पाप करने से खुद को बेहतर ढंग से रोक सकोगे। अपनी प्रकृति के बारे में तुम्हारा ज्ञान जितना गहन होगा, उतने ही बेहतर तरीके से तुम अपनी रक्षा कर सकोगे, और अपने अनुभवों और सबक का सारांश निकालने के बाद तुम दोबारा असफल नहीं होगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “यदि लोग परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियों का समाधान करना चाहते हैं तो एक लिहाज से उन्हें अपने भ्रष्ट स्वभावों को जान लेना होगा और उन्होंने जो गलतियाँ की हैं उनका, जो घुमावदार रास्ते पकड़े हैं उनका और अपने अपराधों और लापरवाही का गहन-विश्लेषण करना चाहिए और इन्हें जान लेना चाहिए। सिर्फ इस तरह वे अपनी प्रकृति को साफ तौर पर देख पाएँगे और इसका ज्ञान प्राप्त कर पाएँगे। साथ ही उन्हें स्पष्ट रूप से यह देखना चाहिए कि वे क्यों गलत राह पकड़ते हैं और ऐसी बहुत-सी चीजें करते हैं जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और इन क्रियाकलापों की प्रकृति क्या है। इसके अलावा उन्हें समझना चाहिए कि उनके लिए परमेश्वर के इरादे और माँगें ठीक-ठीक क्या हैं, वे क्यों परमेश्वर की माँगों के अनुरूप कार्य करने में हमेशा अक्षम रहते हैं और क्यों वे हमेशा उसके इरादों के विरुद्ध जाते हैं और जो जी में आए वह करते हैं। इन चीजों को परमेश्वर के समक्ष लाओ और प्रार्थना करो, उन्हें स्पष्ट रूप से समझो, फिर तुम अपनी दशा बदल सकते हो, अपनी मानसिकता बदल सकते हो और परमेश्वर के बारे में अपनी गलतफहमियों का समाधान कर सकते हो। कुछ लोग चाहे कुछ भी करें, हमेशा अनुचित इरादे पाले रखते हैं, हमेशा बुरे विचार रखते हैं और यह जाँच नहीं कर पाते कि उनकी आंतरिक दशा सही है या नहीं, न ही वे इसे परमेश्वर के वचनों के अनुसार पहचान पाते हैं। ये लोग उलझे हुए हैं। किसी उलझे हुए व्यक्ति की एक सबसे स्पष्ट पहचान यह है कि कुछ बुरा करने के बाद अपनी काट-छाँट होने पर वे नकारात्मक बने रहते हैं, यहाँ तक कि खुद को निराशा में डुबो देते हैं और तय मान लेते हैं कि वे समाप्त हो चुके हैं और उन्हें नहीं बचाया जा सकता। क्या यह किसी उलझे हुए व्यक्ति का सबसे दयनीय व्यवहार नहीं है? वे परमेश्वर के वचनों के मुताबिक आत्म-चिंतन नहीं कर पाते और कठिनाइयाँ आने पर समस्या सुलझाने के लिए सत्य को नहीं खोज पाते। क्या यह और अधिक उलझा हुआ होना नहीं है? क्या स्वयं को निराशा के हवाले कर देने से समस्याएँ हल हो सकती हैं? क्या हमेशा नकारात्मकता में जूझते रहने से समस्याओं का समाधान हो जाता है? लोगों को समझना चाहिए कि यदि वे गलती करते हैं या उनकी कोई समस्या है तो इसके समाधान के लिए उन्हें सत्य को खोजना चाहिए। उन्हें पहले चिंतन करके समझने की जरूरत है कि उन्होंने बुराई क्यों की, ऐसा करने के पीछे उनका इरादा और शुरुआती बिंदु क्या था, वे ऐसा क्यों करना चाहते थे और उनका लक्ष्य क्या था, और क्या ऐसा करने के लिए किसी ने उनका हौसला बढ़ाया, उन्हें उकसाया या गुमराह किया या उन्होंने ऐसा जानबूझकर किया। इन प्रश्नों पर विचार कर इन्हें स्पष्ट रूप से समझना चाहिए और तब वे जान पाएँगे कि उन्होंने क्या गलतियाँ कीं और वे स्वयं क्या हैं। यदि तुम अपने बुरे कर्म का सार नहीं पहचान पाते या उससे कोई सबक नहीं सीख पाते तो फिर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। बहुत-से लोग बुरी चीजें करते हैं और कभी भी आत्म-चिंतन नहीं करते और खुद को जान नहीं पाते तो क्या ऐसे लोग सच में पश्चात्ताप कर सकते हैं? क्या उनके उद्धार की कोई आशा बची है? मानवजाति शैतान की संतान है और चाहे उसने परमेश्वर के स्वभाव को नाराज किया हो या नहीं, उसका प्रकृति सार एक जैसा है। लोगों को आत्म-चिंतन कर स्वयं के बारे में और अधिक जानना चाहिए, स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि उन्होंने किस हद तक परमेश्वर से विद्रोह कर उसका विरोध किया है और क्या वे अभी भी सत्य को स्वीकार कर इसका अभ्यास कर सकते हैं। यदि वे इसे स्पष्ट रूप से देख लेंगे तो उन्हें पता चल जाएगा कि वे कितने खतरे में हैं। वास्तव में अपने प्रकृति सार के आधार पर सभी भ्रष्ट इंसान खतरे में हैं; उन्हें सत्य स्वीकार करने में बहुत ज्यादा प्रयत्न करना पड़ता है और यह उनके लिए आसान नहीं होता। कुछ लोगों ने बुराई की है और अपना प्रकृति सार प्रकट किया है, जबकि कुछ ने अभी तक बुराई नहीं की है, लेकिन जरूरी नहीं कि वे दूसरों से बेहतर हों—उनके पास बस ऐसा करने का अवसर और परिस्थिति नहीं थी। चूँकि तुमने ये अपराध किए हैं, तुम्हें अपने हृदय में स्पष्ट होना चाहिए कि तुम्हें अब क्या रवैया अपनाना है, परमेश्वर के समक्ष तुम्हें क्या हिसाब देना है और वह क्या देखना चाहता है। तुम्हें ये चीजें प्रार्थना और खोज के माध्यम से पता लगानी चाहिए; तब तुम जान पाओगे कि तुम्हें भविष्य में कैसे अनुसरण करना चाहिए और तब तुम अतीत में की गईं अपनी गलतियों से प्रभावित या बाधित नहीं होगे। तुम्हें आगे के मार्ग पर बढ़ना चाहिए और उचित रूप से अपना कर्तव्य करना चाहिए और अब खुद को निराशा के हवाले नहीं करना चाहिए; तुम्हें नकारात्मकता और गलतफहमी से पूरी तरह उबर जाना चाहिए। एक मायने में, अब अपना कर्तव्य निभाना अपने पिछले अपराधों और लापरवाही की भरपाई के लिए है; यह एक नकारात्मक तरीका है और बहुत वांछनीय नहीं है, लेकिन कम-से-कम यह वह मानसिकता है जो तुम्हारे पास होनी चाहिए। दूसरे मायने में, तुम्हें जो कर्तव्य निभाना है उसे अच्छी तरह निभाने के लिए और अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को पूरा करने के लिए सकारात्मक रूप से और सक्रिय होकर सहयोग करना चाहिए और भरपूर प्रयास करना चाहिए। यही वह चीज है जो एक सृजित प्राणी को करनी चाहिए। चाहे तुम परमेश्वर के बारे में कोई धारणा रखते हो या भ्रष्टता प्रकट करते हो या उसके स्वभाव को नाराज करते हो, तुम्हें इन सबका समाधान आत्म-चिंतन करके और सत्य खोजकर करना होगा। तुम्हें अपनी विफलताओं से सीखना चाहिए और नकारात्मकता की छाया से पूरी तरह उबर जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल सत्य का अनुसरण करने से ही परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि चाहे परमेश्वर मेरे अपराधों को याद रखे या माफ करे, जब तक उद्धार की एक छोटी-सी भी उम्मीद है, मुझे हार नहीं माननी चाहिए। मुझे बस सत्य का अनुसरण करने और अपने स्वभाव में बदलाव लाने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। यही सही मार्ग है। यह एक तथ्य है कि मैंने अपराध किया है, लेकिन अब, परमेश्वर ने मुझे शैतान के हवाले नहीं किया है, न ही उसने मेरा कर्तव्य करने की पात्रता छीनी है। मैं परमेश्वर के वचन पढ़ सकती हूँ, अपना कर्तव्य निभा सकती हूँ और मेरे पास अभी भी सत्य का अनुसरण करने और स्वभाव में बदलाव लाने का मौका है इसलिए मैं हार नहीं मान सकती। परमेश्वर मेरे अपराधों को याद रखता है या माफ करता है, यह परमेश्वर पर निर्भर है; यह मेरे अनुमान लगाने की बात नहीं है। मुझे बस सत्य का अनुसरण करने की जरूरत है। परमेश्वर नहीं चाहता कि मैं अपने अपराधों में फँसी रहूँ और नकारात्मक दशा में अपना कर्तव्य निभाऊँ। उसका इरादा है कि मैं अपनी नाकामी का कारण समझूँ ताकि मैं पश्चात्ताप कर सकूँ और बदल सकूँ। वह चाहता है कि मैं अपनी धारणाओं और कल्पनाओं से उसे सीमित करना बंद कर दूँ और अपनी कड़ी मेहनत को आशीष पाने के लिए सौदेबाजी का जरिया मानना बंद कर दूँ। चाहे मेरे सामने कुछ भी आए, बड़ा या छोटा, मुझे उसे उसके वचनों के अनुसार देखना चाहिए और उसके वचनों का अभ्यास करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों ने मेरे गलत विचारों को भी सुधारा। मैं सोचती थी कि मैं दूसरों से अलग हूँ—कि उन्हें अपने कर्तव्य करने से उद्धार की उम्मीद थी, लेकिन मेरे अपराधों के कारण, मैं तो बस एक सेवाकर्मी ही हो सकती हूँ और चाहे मैं कितना भी अनुसरण करूँ, कभी भी बचाई नहीं जा सकती। यह परमेश्वर के बारे में एक गलतफहमी थी। उसके वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि हम सभी शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इंसान हैं और हम सभी का परमेश्वर-प्रतिरोधी सार एक जैसा है। बस इतना है कि मैंने परमेश्वर के स्वभाव के खिलाफ अपराध किए, जिससे मेरी समस्या और गंभीर हो गई। यह एक तथ्य है। समय को पीछे नहीं लौटाया जा सकता। परमेश्वर जो देखना चाहता है वह मेरे पश्चात्ताप का रवैया और मेरी वास्तविक अभिव्यक्तियाँ हैं। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, अब मैं तुम्हारा इरादा समझ गई हूँ। जब तक मैं जीवित हूँ, हर दिन मैं सत्य का अनुसरण करूँगी, अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करूँगी और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाऊँगी। चाहे तुम मुझे माफ करो या नहीं, मैं एक सृजित प्राणी हूँ। भले ही तुम मुझे एक सेवाकर्मी रहने दो, मैं फिर भी एक सृजित प्राणी हूँ। मैं व्यावहारिक तरीके से अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने को तैयार हूँ।” यह समझने पर मेरा दिल बहुत हल्का हो गया। अब जब परमेश्वर ने हमें सत्य के सभी पहलू बता दिए हैं, मैं देखती हूँ कि सत्य का अनुसरण करना ही सबसे महत्वपूर्ण है। मेरे भविष्य के परिणाम या परमेश्वर मेरे साथ कैसा व्यवहार करता है, इसकी परवाह किए बिना, मैं अपना कर्तव्य करते हुए सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के वचनों को अपना जीवन बनने देने पर ध्यान केंद्रित करूँगी। मुझे इसी का अनुसरण करना चाहिए। इस अनुभव से गुजरने के बाद मैंने सचमुच महसूस किया है कि परमेश्वर का न्याय ही मेरे लिए सबसे अच्छा उद्धार है। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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