मैं अपने कर्तव्य में मुश्किलों का सामना क्यों नहीं कर सकी?
ली यिकान, चीननवंबर 2021 में मुझे एक कलीसिया अगुआ चुना गया। शुरू में मैंने सोचा कि यह कर्तव्य करने से मुझे समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य के...
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मैं सालों से एक अभिनेत्री के तौर पर अपना कर्तव्य कर रही हूँ। मई 2022 में, अगुआओं ने मुझसे निर्देशक के तौर पर प्रशिक्षण लेने और वीडियो जाँच का पार्ट-टाइम काम करने के लिए कहा। उस समय, हालाँकि मुझ पर कुछ दबाव था, फिर भी मैं ऊपर उठने का प्रयास करने और उसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देने को तैयार थी। मैं हर दिन व्यस्त रहती थी और यह सब बहुत संतोषजनक लगता था।
अगस्त 2022 में, हमने एक नई फिल्म की शूटिंग शुरू की और निर्देशकों ने मुझसे और बहन जूडिथ से मुख्य भूमिका के लिए ऑडिशन देने को कहा, लेकिन मेरी कोई खास इच्छा नहीं थी। मुझे लगा कि दो कर्तव्य पहले ही मुझे काफी व्यस्त रखे हुए हैं और अगर मैं ऑडिशन पास कर लेती हूँ और मुख्य किरदार बन जाती हूँ, तो निश्चित रूप से तीन कर्तव्यों का बोझ बहुत हो जाएगा। बाद में, जूडिथ को मुख्य किरदार के लिए चुन लिया गया और मुझे तीसरी भूमिका के लिए चुना गया। मुख्य किरदार न बन पाने से मैं निराश तो हुई नहीं, ऊपर से मन ही मन खुश हो गई। क्योंकि इस तीसरे किरदार के संवाद कम थे और यह बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं था, यह अपेक्षाकृत आसान होता, इसलिए मैंने खुशी-खुशी यह भूमिका स्वीकार कर ली। बाद में, निर्देशकों ने देखा कि जूडिथ कुछ विषादी दिखती है और यह नायिका के सकारात्मक और मजबूत व्यक्तित्व से मेल नहीं खाता था, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि मैं फिर से मुख्य भूमिका के लिए ऑडिशन दूँ। जब मैंने यह खबर सुनी, तो मेरे पहले विचार थे : “ये तीन कर्तव्य ही मुझे काफी व्यस्त रखे हुए हैं; अगर उन्होंने मुझे मुख्य किरदार बना दिया, तो क्या मैं और भी व्यस्त नहीं हो जाऊँगी? साथ ही, मुख्य किरदार के लिए कुछ रोने वाले दृश्य भी हैं, इसलिए यह काफी मुश्किल प्रदर्शन होगा। इसे अच्छी तरह से करने के लिए बहुत ऊर्जा लगानी पड़ेगी।” इस पर सोचने के बाद, मैंने निर्देशकों से कहा, “नायिका काफी शांत है, लेकिन मैं थोड़ी छोटी हूँ, बहुत शांत नहीं हूँ और इस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं हूँ। जूडिथ ने इस भूमिका के लिए पहले ही बहुत मेहनत की है और उसकी उम्र और स्वभाव भी ज्यादा उपयुक्त हैं। बस उसके हाव-भाव पूरी तरह से ठीक नहीं हैं और थोड़ी और मदद से इसमें सुधार हो जाना चाहिए। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मुझे फिर से ऑडिशन देने की कोई जरूरत है।” बाद में, कुछ चर्चा के बाद, सभी को लगा कि जूडिथ वाकई नायिका के स्वभाव से बेहतर मेल खाती है और उसे कुछ और मदद की जरूरत हो सकती है। हालाँकि यह मामला खत्म हो गया, मैं दिल ही दिल में जानती थी कि मैं कष्ट सहने के डर से मुख्य किरदार नहीं बनना चाहती थी। मुझे कुछ अपराध बोध हुआ, लेकिन मैंने इसे सुलझाने के लिए सत्य नहीं खोजा।
उसके बाद, हर दिन का कार्यक्रम पूरी तरह से तय होता था और मैं कुछ हद तक अनिच्छुक महसूस करती थी। कभी-कभी, निर्देशक रात में फिल्म के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मिलते थे और मैं अनमनी और अनिच्छुक महसूस करती थी, मन ही मन सोचती थी, “बस जल्दी से चर्चा खत्म करो। जब तुम लोग काम खत्म कर लोगे, तो तुम आराम कर सकते हो, लेकिन मुझे अभी भी वीडियो की जाँच करनी है। जाँच करने के लिए वीडियो कब कम होंगे?” कभी-कभी, इन कामों को तेजी से खत्म करने के लिए, वीडियो की जाँच करते समय, मैं उन्हें तेज गति से देखती थी ताकि मैं जल्दी खत्म कर सकूँ और जल्दी सो सकूँ। एक निर्देशक के कर्तव्य में शॉट और प्रस्तुति जैसी चीजों के बारे में सोचना शामिल है और मुझे लगा कि इन चीजों के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की जरूरत है, इसलिए मैं मेहनत नहीं करना चाहती थी। जब मुख्य अभिनेत्री को अपने प्रदर्शन में कठिनाइयाँ होती थीं, तो दूसरे निर्देशक उसे भूमिका अच्छी तरह से निभाने में मदद करते थे, लेकिन मैं बस कामचोरी करना चाहती थी और भूमिका पर विचार नहीं करती थी। मैं बस अपना हासिल किया हुआ थोड़ा-सा अनुभव उस बहन को बता देती थी, जो एक निर्देशक की भूमिका को असल में पूरा नहीं करता था। जहाँ तक मेरी तीसरी भूमिका का सवाल है, मैंने व्यस्त होने का बहाना बनाया और भूमिका का अध्ययन करने में मेहनत नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप प्रदर्शन बहुत खराब रहा।
एक दिन, एक बहन ने मेरे साथ संगति की, उसने कहा कि मैं अपने कर्तव्यों में कीमत चुकाने को तैयार नहीं थी, शारीरिक आराम में डूबी रहती थी और यह कि मैं छोटी-मोटी चालाकियों का इस्तेमाल करती थी, धूर्त थी और ढिलाई करती थी। मैं जानती थी कि वह मेरी असल समस्याओं की ओर ही इशारा कर रही थी, लेकिन मुझे समस्या की गंभीरता का एहसास नहीं हुआ। मैंने मन ही मन सोचा, “वैसे भी, मैं इतने सारे कर्तव्य नहीं सँभाल सकती और चूँकि मैं एक निर्देशक के तौर पर योगदान नहीं दे रही हूँ, तो देर-सबेर मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा और अगर मुझे बर्खास्त कर दिया गया, तो कोई बात नहीं। एक कर्तव्य कम होने का मतलब होगा कम शारीरिक कष्ट और मुझे ज्यादा खाली समय मिल सकेगा। एक ही काम वाला कर्तव्य करना भी अच्छा रहेगा।” चूँकि मैंने मन से पछतावा नहीं किया, इसलिए मैं अपने कर्तव्यों में और भी निष्क्रिय हो गई। फिल्मांकन के दौरान, कई समस्याएँ थीं, इसलिए प्रगति विशेष रूप से धीमी थी, लेकिन मैं बस अपने कर्तव्य कम करने पर ध्यान दे रही थी और इसलिए इन मुद्दों के प्रति उदासीन बनी रही। बाद में, चूँकि मुझमें अपने कर्तव्यों का बोझ महसूस नहीं होता था, अगुआओं ने मुझे निर्देशक बने रहने से रोक दिया और इसके बजाय मुझसे पूरी तरह से जो भूमिका मैं निभा रही थी उस पर ध्यान केंद्रित करने को कहा। हालाँकि मेरे कर्तव्य कम हो गए थे, फिर भी मैं कोई प्रेरणा नहीं जुटा पाई और मेरे प्रदर्शन में अभी भी कई समस्याएँ थीं। अंत में, फिल्मांकन की समस्याओं के कारण और हम मुख्य कलाकारों का प्रदर्शन मानक स्तर का न होने के कारण, फिल्मांकन असफल रहा। कुछ खास कारणों से, मैं न तो अभिनेत्री के तौर पर काम जारी रख सकी और न ही वीडियो की समीक्षा कर सकी। एक के बाद एक अपने कर्तव्य खोने पर भी मेरा सुन्न दिल नहीं जागा और मैंने अभी भी ठीक से आत्म-चिंतन नहीं किया। इसके बजाय, मुझे लगा कि मेरे कर्तव्य खोने के पीछे वस्तुनिष्ठ कारण थे। बाद में, कलीसिया ने मुझे सुसमाचार कार्य की जिम्मेदारी सौंपी और मैं इस कर्तव्य को सँजोना चाहती थी, लेकिन कुछ समय बाद, मैं अपनी पुरानी आदतों में वापस आ गई। सुसमाचार का प्रचार करने में भाई-बहनों द्वारा सामना की जाने वाली कठिनाइयों, सुसमाचार कार्यकर्ताओं के बीच सहयोग के मुद्दों, संभावित सुसमाचार प्राप्तकर्ताओं की समस्याओं आदि का सामना करते हुए, मुझे लगा कि काम कभी खत्म नहीं होगा और मैं फिर से धूर्त हो गई और ढिलाई बरतने लगी। हर बार जब मैं काम लागू करने जाती, तो मैं बस उसे आगे बढ़ा देती थी। हर दिन, मैं सोचती थी कि अगुआओं द्वारा दिए गए कामों को जल्दी से खत्म करूँ ताकि मैं जल्दी आराम कर सकूँ और जब मैं थक जाती, तो मैं सोचती, “क्या कोई हल्का कर्तव्य है जो मैं कर सकती हूँ? यह काम हमेशा इतना व्यस्त रहता है। मुझे छुट्टी कब मिलेगी? यह थकावट कब खत्म होगी?” मुझे उम्मीद नहीं थी कि ये “इच्छाएँ” जल्द ही सच हो जाएँगी।
9 जून, 2023 को, मेरे इलाके में कुछ विशेष मामलों के कारण, मैं अलग-थलग पड़ गई थी और कलीसिया या भाई-बहनों से संपर्क नहीं कर सकती थी और मुझे अपने कर्तव्य करने बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह स्थिति बहुत अचानक आई और मैं लंबे समय तक होश में नहीं आ सकी। अचानक, मैं व्यस्त रहने से खाली हो गई और मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैंने चाहे जितना भी सोचा, मैं बस समझ नहीं पा रही थी : अब सुसमाचार का काम इतना व्यस्त है और अपना कर्तव्य करने वाले हर व्यक्ति के पास करने के लिए बहुत सारे काम हैं। मेरे कर्तव्य अचानक क्यों बंद हो गए हैं? अचानक, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अगर तुम धूर्त और सुस्त हो, अगर तुम अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते और हमेशा गलत रास्ते पर चलते हो तो फिर परमेश्वर तुम में कार्य नहीं करेगा; तुम यह अवसर खो बैठोगे और परमेश्वर कहेगा, ‘तुम्हारा उपयोग करने का कोई तरीका नहीं है। जाकर एक तरफ खड़े हो जाओ। तुम्हें चालाक बनना और सुस्ती बरतना पसंद है, है न? तुम्हें आलसी होना और आराम में लिप्त होना पसंद है, है न? तो फिर ठीक है, हमेशा आराम में ही लिप्त रहो!’ परमेश्वर यह अनुग्रह और अवसर किसी और को देगा। तुम लोग क्या कहते हो : यह हानि है या लाभ? (हानि।) यह बहुत बड़ी हानि है!” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों के न्याय ने मुझे तुरंत जगा दिया। क्या मैं हमेशा ब्रेक नहीं लेना चाहती थी? क्या मैं हमेशा कठिनाई से नफरत नहीं करती थी, थकावट से नहीं डरती थी, धूर्तता से काम नहीं करती थी, ढिलाई और सिर्फ अपनी देह की परवाह नहीं करती थी? खैर, अब मैं पूरी तरह से आराम कर रही थी, कोई भी कर्तव्य नहीं निभा पा रही थी! मेरे दिमाग में शून्यता छा गई, और परमेश्वर के वचन मेरे मन में बार-बार गूँजते रहे : “तो फिर ठीक है, हमेशा आराम में ही लिप्त रहो!” मेरे दिल में एक अकथनीय एहसास था। मुझे बस खालीपन महसूस हो रहा था। मैंने पीछे मुड़कर देखा कि मैंने पहले अपने कर्तव्य कैसे किए थे और मैं पछतावे से भर गई और मैंने अपने दिन अपराध बोध में और खुद को दोष देते हुए बिताए : मैंने अपने कर्तव्यों को ठीक से क्यों नहीं सँजोया था? मैंने बस कामचलाऊ ढंग से काम क्यों किया?
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और लापरवाह होने की प्रकृति और परिणामों का कुछ ज्ञान प्राप्त किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपना कर्तव्य निभाते समय लापरवाह होना एक बहुत बड़ी निषिद्ध बात है। यदि तुम अपना कर्तव्य करते समय हमेशा लापरवाह रहते हो, तो तुम्हारे पास अपना कर्तव्य मानक स्तर पर निभाने का कोई तरीका नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य लगन से निभाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने लापरवाह होने की समस्या को ठीक करना होगा। जैसे ही तुम्हें इसके लक्षण दिखाई दें, तुम्हें स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाने चाहिए। अगर तुम भ्रमित रहते हो, समस्याएँ कभी नहीं देख पाते हो, हमेशा ही चीजों को लापरवाही से करते हो तो तुम्हारे पास अपना कर्तव्य ठीक से निभाने का कोई तरीका नहीं होगा। इसलिए, तुम्हें अपने कर्तव्य में अपना दिल झोंकना होगा। लोगों को अपना कर्तव्य निभाने का अवसर मिलना बहुत कठिन है! जब परमेश्वर उन्हें यह अवसर देता है लेकिन वे इसे लपकते नहीं हैं, तो यह अवसर खो जाता है—और भले ही वे बाद में ऐसा अवसर खोजना चाहें, तो शायद वह दोबारा न मिले। परमेश्वर का कार्य किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और न ही अपना कर्तव्य निभाने के अवसर किसी की प्रतीक्षा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं, ‘मैंने पहले अपना कर्तव्य अच्छी तरह से नहीं निभाया, लेकिन मैं इसे अभी भी निभाना चाहता हूँ। मैं अपनी विफलता से उबरकर दोबारा डटूँगा।’ इस तरह का संकल्प लेना अच्छी बात है लेकिन तुम्हें इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह निभाना है : तुम्हें सत्य के प्रति प्रयास करना चाहिए। जो सत्य को समझते हैं केवल वही अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकते हैं। अगर कोई सत्य को नहीं समझता है, तो उसका श्रम भी मानक स्तर का नहीं होगा। सत्य के बारे में तुम जितने अधिक स्पष्ट होगे, तुम अपने कर्तव्य में उतने ही प्रभावी होगे। यदि तुम इस मामले की असलियत देख सकते हो, तो तुम सत्य के लिए प्रयास करोगे और तुम्हें अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने की आशा होगी। वर्तमान में कर्तव्य निभाने के बहुत अवसर नहीं हैं, इसलिए जब भी अवसर मिले तुम्हें उन्हें थामे रहना चाहिए। जब कर्तव्य ठीक सामने हो तभी तुम्हें वास्तविक प्रयास करना चाहिए; तभी तुम्हें परमेश्वर के लिए खुद को अर्पित करना चाहिए और खुद को खपाना चाहिए और तभी तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए। कोई भी कसर मत रहने दो, कोई षड्यंत्र मत पालो, कोई गुंजाइश मत छोड़ो या अपने लिए बचने का कोई रास्ता मत रखो। यदि तुम कोई गुंजाइश छोड़ते हो या चालें चलते हो, धूर्त हो या ढीले पड़ते हो तो तुम निश्चित ही खराब तरीके से काम करोगे। मान लो, तुम कहते हो, ‘किसी ने मुझे धूर्तता करते और आलस्य बरतते हुए नहीं देखा। क्या बात है!’ यह किस तरह की सोच है? क्या तुम्हें लगता है कि तुमने लोगों की आँखों में धूल झोंक दी, और परमेश्वर की आँखों में भी? लेकिन वास्तव में, क्या परमेश्वर जानता है कि तुमने क्या किया है? वह जानता है। असल में, जो भी तुम्हारे साथ कुछ समय मेल-जोल करता है वह तुम्हारी भ्रष्टता और घिनौनेपन को जान जाएगा; बस इतना है कि वह शायद ऐसा सीधे तौर पर न कहे : वह तुम्हारे बारे में अपने आकलन को अपने दिल में रखेगा। ऐसे बहुत-से लोग हुए हैं जिन्हें इस कारण बेनकाब कर दिया गया और हटा दिया गया कि अधिकतर लोग उनकी असलियत को देख सकते थे और इसलिए उन लोगों को उनकी असलियत के चलते उजागर किया गया और कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया। इसलिए, चाहे लोग सत्य का अनुसरण करें या न करें, उन्हें अपनी भरसक क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहिए; उन्हें अपने जमीर से चलना चाहिए और कुछ वास्तविक चीजें करनी चाहिए। तुममें कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन यदि तुम अपना कर्तव्य निभाने में प्रभावी हो सकते हो, तो तुम्हें हटाया नहीं जाएगा। यदि तुम्हें हमेशा यह लगता है कि तुम ठीक हो, कि तुम्हें निश्चित रूप से हटाया नहीं जाएगा, यदि तुम खुद को जानने के लिए कभी चिंतन या कोशिश नहीं करते हो और तुम अभी भी अपने उचित कामों को अनदेखा करते हो और हमेशा लापरवाह रहते हो, तो जब परमेश्वर के चुने हुए लोग वास्तव में तुम्हारे प्रति अपनी सहनशीलता खो देंगे, वे तुम्हें तुम्हारी असलियत के लिए उजागर कर देंगे, और तुम्हें हटा दिया जाएगा। तब, पछतावों के लिए बहुत देर हो जाएगी, क्योंकि सभी ने तुम्हारी असलियत देख ली होगी, और तुमने अपनी सारी गरिमा और सत्यनिष्ठा खो दी होगी। यदि कोई तुम पर भरोसा नहीं करता है, तो क्या परमेश्वर तुम पर भरोसा करेगा? परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम हृदय की पड़ताल करता है : वह ऐसे व्यक्ति पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करेगा। ... लोगों को अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए : ‘क्या मैंने यह कर्तव्य मानक स्तर पर निभाया है? क्या मैंने इसमें अपना दिल लगाया है? क्या मैं लापरवाही की दशा में रहा हूँ?’ यदि तुम हमेशा लापरवाह रहते हो तो तुम खतरे में हो। कम से कम इसका मतलब है कि तुम्हारी कोई विश्वसनीयता नहीं है और लोग तुम पर भरोसा नहीं कर सकते। इससे भी गंभीर बात यह है कि यदि तुम अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा लापरवाह रहते हो, और यदि तुम हमेशा परमेश्वर को धोखा देते हो, तो तुम बहुत बड़े खतरे में हो! खुलेआम धोखा देने में शामिल होने के क्या परिणाम होते हैं? हर कोई देख सकता है कि तुम जानबूझकर गलत कर रहे हो। तुम पूरी तरह से अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जी रहे हो, और अपने कर्तव्य में तुम केवल लापरवाही करते हो, और सत्य का बिल्कुल भी अभ्यास नहीं करते—इसका मतलब है कि तुम मानवता से रहित हो! यदि यह तुममें हर समय प्रकट होता है—तुम कोई बड़ी गलती नहीं करते लेकिन छोटी-मोटी गलतियाँ लगातार करते रहते हो, और शुरू से अंत तक अपश्चात्तापपूर्ण रहते हो तो तुम एक बुरे व्यक्ति हो, एक छद्म-विश्वासी हो और तुम्हें बाहर निकाल दिया जाना चाहिए—यह एक गंभीर परिणाम है। तुम्हें एक छद्म-विश्वासी और एक बुरे व्यक्ति के रूप में पूरी तरह से बेनकाब कर दिया जाता है और हटा दिया जाता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है)। मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पहले भी कई बार पढ़ा था, लेकिन मैंने तब जैसा महसूस किया था, वैसा दिल में इतनी गहराई से चुभता हुआ कभी महसूस नहीं किया था। अपने कर्तव्यों को लापरवाही से करके, चालाकियों का सहारा लेकर, मैं लोगों की आँखों में धूल झोंक सकती थी, लेकिन मैं परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकती थी और अगर मैं बिना पश्चात्ताप किए चलती रही, तो मुझे हटा दिया जाएगा। मैंने अपने कर्तव्य करने के क्षणों को याद किया : जब मेरे कर्तव्य बढ़ गए, जिसमें अधिक समय और ऊर्जा की जरूरत थी, तो मैंने शिकायत करना शुरू कर दिया, मुझे लगा कि मेरे पास आराम करने का समय नहीं है और मैं समय पर आराम नहीं कर सकती और मैं अनिच्छुक थी और तैयार नहीं थी, हमेशा छुट्टी की उम्मीद करती थी। वीडियो की जाँच करते समय, मैं लापरवाही से देखती ताकि मैं जल्दी आराम कर सकूँ। हालाँकि इससे कोई नुकसान नहीं हुआ, मैं अपने कर्तव्यों में कामचोरी कर रही थी, धूर्तता कर और लापरवाही बरत रही थी और परमेश्वर यह सब देख रहा था। मैं सचमुच निष्कपट और भरोसे के लायक नहीं थी! कलीसिया ने मुझे एक निर्देशक के तौर पर प्रशिक्षित होने का अवसर दिया, लेकिन मैंने इसे सँजोया नहीं। मैंने पटकथा या शॉट पर विचार करने में मेहनत नहीं की और बस शिकायत की कि यह मानसिक रूप से थका देने वाला था। अभिनेताओं की भूमिकाओं में उनकी सहायता करते समय, मैं धूर्त थी और कामचोरी करती थी, उनका मार्गदर्शन करने के लिए अपने थोड़े से पिछले अभिनय अनुभव पर निर्भर रही, लेकिन यह किसी वास्तविक उपयोग का नहीं था। मैं वास्तव में सिर्फ दिखावटी थी, एक पद पर थी लेकिन कुछ भी ठोस नहीं कर रही थी। एक अभिनेत्री के रूप में अपने कर्तव्य में, मैं जानती थी कि मुख्य भूमिका में ऊर्जा की जरूरत होती है, इसलिए मैंने ऑडिशन का अवसर ठुकरा दिया। यह तो दूर की बात है कि मुझे चुना जाता या नहीं, जब परमेश्वर के घर के काम के लिए मेरी जरूरत थी, तो मैंने सक्रिय रूप से सहयोग नहीं किया। इसके बजाय, मैंने पहले यह विचार किया कि मेरी देह को आराम मिलेगा या नहीं और जैसे ही मैंने देखा कि यह मेरी देह के लिए फायदेमंद नहीं होगा, मैं ऑडिशन नहीं देना चाहती थी और मैंने बहाने बनाने और जिम्मेदारियों से बचने के लिए धोखे का इस्तेमाल किया। मैं बहुत स्वार्थी थी! यहाँ तक कि जब मैंने बाद में तीसरी भूमिका निभाई, तो मैंने इसे लापरवाही से लिया। मैंने पर्याप्त तैयारी नहीं की और शूटिंग के नतीजे अच्छे नहीं रहे। वास्तव में, उस समय, हालाँकि मैंने तीन तरह के कर्तव्य किए, अगर मैंने अपना समय ठीक से प्रबंधित किया होता और अपने कर्तव्य ईमानदारी से किए होते, तो मैं उनमें से किसी को भी अच्छी तरह से करने में असफल नहीं होती। मेरे कर्तव्य चाहे कितने भी व्यस्त क्यों न हों, उन्हें मुझसे दूसरे लोगों की तुलना में केवल आधा घंटा या एक घंटा अधिक काम करने की जरूरत होती। लेकिन मैं वह छोटी-सी कीमत भी चुकाने को तैयार नहीं थी और मैं हमेशा कठिनाई से नफरत करती थी और थकावट से डरती थी और जब मैंने एक के बाद एक अपने कर्तव्य खो दिए, तब भी मैंने पश्चात्ताप नहीं किया। अंत में, जब मैं सुसमाचार कार्य के लिए जिम्मेदार थी, तो मैं उन्हीं बुरी आदतों में वापस आती रही। अपनी देह के आराम की खातिर, मैं हमेशा धूर्त ढंग से काम करती थी और कामचोरी करती थी और जब भी संभव होता, मैं लापरवाही बरतती थी। मैंने अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा गँवा दी थी। मैं न भरोसे के लायक थी और न ही किसी सूरत से अपने कर्तव्य करने के योग्य थी। परमेश्वर ने बहुत पहले ही मुझे ठुकरा दिया था।
मैंने अपने कर्तव्य कैसे किए, इस पर विचार करते हुए, मुझे अपने दिल में गहरी ग्लानि महसूस हुई और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए रोई, “परमेश्वर, मैं देखती हूँ कि मैंने अपने कर्तव्य मानक स्तर के अनुसार नहीं किए हैं। यह सब मेरे लापरवाही भरे तरीकों और शारीरिक आराम में लिप्त होने के कारण हुआ है। आज, मेरे कर्तव्यों का अचानक रुक जाना मुझ पर तेरी ताड़ना और अनुशासन है। परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करना चाहती हूँ। कृपया मुझे आत्म-चिंतन करने और खुद को समझने के लिए प्रबुद्ध और मार्गदर्शन करें।” बाद में, मैंने सचेत रूप से अपनी समस्याओं के संबंध में सत्य की खोज की और मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “आलसी लोग कुछ भी नहीं कर सकते हैं। इसे दो शब्दों में सारांशित करें तो वे बेकार लोग हैं; उनमें दोयम दर्जे की अक्षमता है। आलसी लोगों की काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, वह नुमाइश से ज्यादा कुछ नहीं होती; भले ही उनमें अच्छी काबिलियत हो, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं है। वे बहुत ही आलसी होते हैं—उन्हें पता होता है कि उन्हें क्या करना चाहिए, लेकिन वे वैसा नहीं करते हैं, और भले ही उन्हें पता हो कि कोई चीज एक समस्या है, फिर भी वे इसे हल करने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं, और वैसे तो वे जानते हैं कि कार्य को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें क्या कष्ट सहने चाहिए, लेकिन वे इन सार्थक कष्टों को सहने के इच्छुक नहीं होते हैं—इसलिए वे कोई सत्य प्राप्त नहीं कर पाते हैं, और वे कोई वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। वे ऐसे कष्ट नहीं सहना चाहते हैं जो लोगों को सहने चाहिए; वे सुख-सुविधा में लिप्त रहना, खुशी और फुर्सत के मौकों का आनंद लेना और एक मुक्त और तनावमुक्त जीवन का आनंद लेना ही जानते हैं। क्या वे निकम्मे नहीं हैं? जो लोग कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं, वे जीने के लायक नहीं हैं। जो लोग हमेशा परजीवी की तरह जीवन जीना चाहते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है; वे पशु हैं, और ऐसे लोग श्रम करने के लिए भी अयोग्य हैं। क्योंकि वे कष्ट सहन नहीं कर पाते हैं, इसलिए श्रम करते समय भी वे इसे अच्छी तरह से करने में समर्थ नहीं होते हैं, और अगर वे सत्य प्राप्त करना चाहें, तो इसकी उम्मीद तो और भी कम है। जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह सकता है और सत्य से प्रेम नहीं करता है, वह निकम्मा व्यक्ति है; वह श्रम करने के लिए भी अयोग्य है। वह एक पशु है, जिसमें रत्ती भर भी मानवता नहीं है। ऐसे लोगों को हटा देना चाहिए; सिर्फ यही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। “आरंभ से ही परमेश्वर ने कहा है, ‘मैं जो चाहता हूँ वह है लोगों में उत्कृष्टता, न कि उनकी संख्या में विशालता।’ यह परमेश्वर का अपने चुने हुए लोगों के लिए अपेक्षित मानक है और साथ ही कलीसिया में लोगों की संख्या के संबंध में एक अपेक्षा और सिद्धांत भी है। ‘मैं जो चाहता हूँ वह है लोगों में उत्कृष्टता’—यहाँ ‘उत्कृष्टता’ का आशय राज्य के अच्छे सैनिकों से है या विजेताओं से? इनमें से कोई भी सटीक नहीं है। सटीक रूप से कहा जाए, तो ‘उत्कृष्टता’ का मतलब वे लोग हैं जिनमें सामान्य मानवता है, जो वास्तव में मनुष्य हैं। परमेश्वर के घर में अगर तुम वे कर्तव्य कर सकते हो जो एक मनुष्य को करने चाहिए, अगर एक मनुष्य के रूप में तुम्हारा उपयोग किया जा सकता है और अगर तुम दूसरों द्वारा खींचे, घसीटे या धकेले बिना एक मनुष्य की जिम्मेदारियों, कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा कर सकते हो और तुम बेकार कचरा नहीं हो, मुफ्तखोर नहीं हो, आवारा नहीं हो—तुम मनुष्य की जिम्मेदारियाँ और दायित्व उठा सकते हो और मनुष्य के मिशन का भार उठा सकते हो—सिर्फ यही मनुष्य के रूप में मानक स्तर का होना है! क्या वे आवारा लोग और वे लोग जो उचित कार्यों पर ध्यान नहीं देते हैं, मनुष्य के मिशन का भार उठा सकते हैं? (नहीं।) कुछ लोग जिम्मेदारी उठाने के अनिच्छुक होते हैं; दूसरे इसे नहीं उठा सकते हैं—वे बेकार कचरा हैं। जो लोग किसी मनुष्य की जिम्मेदारियाँ नहीं उठा सकते हैं, वे मनुष्य नहीं कहलाए जा सकते हैं। ... जो लोग परमेश्वर के घर में अपना खुद का कर्तव्य उठाने में असमर्थ हैं, वे सामान्य मनुष्य नहीं हैं और परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता है। चाहे तुम कोई अगुआ हो या कार्यकर्ता या तुम ऐसा विशिष्ट कार्य कर रहे हो जिसमें पेशेवर कौशल शामिल हैं, तुम्हें उस कार्य का भार उठाने में समर्थ होना चाहिए जिसके लिए तुम जिम्मेदार हो। अपने जीवन और उत्तरजीविता का प्रबंधन करने में समर्थ होने से परे तुम्हारा अस्तित्व सिर्फ साँस लेने के बारे में नहीं है, खाने-पीने और मौज-मस्ती करने के बारे में नहीं है, बल्कि उस मिशन का भार उठाने में समर्थ होने के बारे में है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। सिर्फ ऐसे लोग ही सृजित प्राणी कहलाने योग्य हैं और मनुष्य कहलाने योग्य हैं। परमेश्वर के घर में जो लोग हमेशा मुफ्तखोरी करना चाहते हैं और हमेशा खानापूरी करने का प्रयास करते हैं, अंत तक चालाकी से अपना काम निकालने और आशीष प्राप्त करने की उम्मीद करते हैं, वे किसी भी कार्य का भार या कोई भी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं, फिर किसी मिशन का भार उठाने की तो बात ही छोड़ दो। ऐसे लोगों को हटा दिया जाना चाहिए और यह कोई अफसोस की बात नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिसे हटाया जा रहा है वह मनुष्य नहीं है—वह मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। तुम उन्हें निकम्मे लोग, आवारा या कामचोर कह सकते हो; किसी भी हालत में वे मनुष्य कहलाने के लायक नहीं हैं। जब तुम उन्हें कोई कार्य सौंपते हो तब वे उसे स्वतंत्र रूप से पूरा नहीं कर सकते हैं; और जब तुम उन्हें कोई काम सौंपते हो तब वे अपनी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं या वह दायित्व पूरा नहीं कर सकते हैं जो उन्हें करना चाहिए—ऐसे लोगों का काम तमाम हो चुका है। वे जीने के लायक नहीं हैं; वे मौत के लायक हैं। परमेश्वर का उनके जीवन को बख्श देना पहले से ही उसका अनुग्रह है, यह एक असाधारण एहसान है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))। परमेश्वर उजागर करता है कि आलसी, निठल्ले लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपना उचित कार्य नहीं करते। कुलमिलाकर, वे “जैसे-तैसे काम चलाते हैं।” वे अपने दिन केवल खाने-पीने, मौज-मस्ती करने और शारीरिक आराम का आनंद लेने के बारे में सोचते हुए बिताते हैं, न कि उचित मामलों के बारे में। जब भी संभव होता है, ये लोग अपने कर्तव्यों में कामचलाऊ ढंग से काम करते हैं, आराम करते हैं और जिम्मेदारियों से बचते हैं। वे कोई भी कर्तव्य अच्छी तरह से करने में असफल रहते हैं और वे न तो कोई काम सँभालने को तैयार होते हैं और न ही सक्षम होते हैं। वे बस आराम और चैन चाहते हैं और फिर भी अंत में, वे आशीषों की उम्मीद करते हैं। ऐसे लोग इंसान कहलाने के लायक नहीं हैं, वे बेकार हैं और परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। जब मैंने अपने व्यवहार पर विचार किया, तो मैंने देखा कि मैं बिल्कुल इन्हीं लोगों की तरह थी। मैं वह काम नहीं करती थी जो मैं कर सकती थी और मैं उन जिम्मेदारियों और बोझ से बचती थी जो मुझे उठाने चाहिए थे। मैं हमेशा केवल शारीरिक आराम की लालसा करती थी और मैं कठिनाई और थकावट से डरती थी। हर दिन मेरी इच्छा यही होती थी कि मैं अपना काम जल्दी खत्म करूँ और जल्दी आराम करूँ। मैं बस एक सूअर की तरह खाना, पीना और अच्छी तरह सोना चाहती थी। कलीसिया ने मुझे वीडियो की समीक्षा करने का महत्वपूर्ण कर्तव्य सौंपा था, लेकिन जल्दी सोने के लिए, मैं समीक्षा करते समय वीडियो को तेज गति से देखती थी। अगर, मेरी गैर-जिम्मेदारी के कारण, मैंने एक ऐसे वीडियो को अपलोड करने की अनुमति दे दी जो मानक स्तर का नहीं था, तो यह न केवल परमेश्वर के लिए गवाही देने में असफल होता, बल्कि यह परमेश्वर का अपमान भी करता और यह एक ऐसा परिणाम था जिसे मैं सहन नहीं कर सकती थी। इसके अलावा, निर्देशक फिल्म कार्य का अगुआ होता है और इतने महत्वपूर्ण कर्तव्य को करने में प्रशिक्षित हो पाना परमेश्वर द्वारा ऊँचा उठाया जाना है, लेकिन मैं गैर-जिम्मेदार और धूर्त थी और कामचोरी करती थी। निर्देशक और अभिनेत्री दोनों के रूप में, फिल्म के इतने लंबे समय तक विलंबित होने और खराब तरीके से फिल्माए जाने के लिए मेरी जिम्मेदारी निर्विवाद थी। इसमें, मैं अपने कर्तव्य में गंभीर रूप से अपराध कर रही थी! कलीसिया ने मुझे कई वर्षों तक एक अभिनेत्री के रूप में विकसित किया था, फिर भी जब मैंने देखा कि नई फिल्म के लिए कोई उपयुक्त मुख्य अभिनेता नहीं मिल पा रहा है, मैं उदासीन बनी रही, चिंतित या परेशान महसूस नहीं किया और मैंने अपने शारीरिक आराम की खातिर मुख्य भूमिका के लिए ऑडिशन देने से भी इनकार कर दिया। मैंने परमेश्वर के इरादों के प्रति कोई विचारशीलता नहीं दिखाई और उसके घर के हितों की रक्षा करने में असफल रही। मुझमें मानवता का पूरी तरह से अभाव था! अपने विभिन्न कार्यों पर विचार करते हुए और परमेश्वर के घर के काम को जो नुकसान मैंने पहुँचाया था, मुझे लगा कि मैं बिल्कुल वैसी ही थी जैसा परमेश्वर ने यह कहते हुए वर्णन किया था : “वे जीने के लायक नहीं हैं; वे मौत के लायक हैं। परमेश्वर का उनके जीवन को बख्श देना पहले से ही उसका अनुग्रह है, यह एक असाधारण एहसान है।” परमेश्वर के घर ने मुझे बार-बार अपने कर्तव्य करने के अवसर दिए थे, जिससे मैं अपने कर्तव्य करने के माध्यम से सत्य पा सकूँ और अधिक प्रगति कर सकूँ। लेकिन मैं हमेशा लापरवाही बरतती और जैसे-तैसे काम चलाती थी। मैं पूरी तरह से बेकार थी। मुझमें जमीर और विवेक की कमी थी! मैंने मुझे सौंपे गए किसी भी कर्तव्य को पूरा नहीं किया था। मैं बस एक निकम्मी थी। मेरे जीवन का कोई मूल्य नहीं था और अगर मैं मर भी जाऊँ तो किसी को मेरी कमी महसूस नहीं हो। अब, परमेश्वर का मुझे चिंतन करने का अवसर देना, यह पहले ही मेरे लिए उसका अनुग्रह है।
बाद में, मैंने यह चिंतन किया कि कौन-सी चीज मुझे हमेशा लापरवाह ढंग से कार्य कराती है। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, ‘लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?’ तो सभी जवाब देंगे, ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।’ बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें)। परमेश्वर के वचनों से, मुझे समझ आया कि हर बार जब मेरे कर्तव्य मुझ पर आए, तो मुझे हमेशा कठिनाई नापसंद होती थी और मैं थकावट से डरती थी, वास्तव में परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में असमर्थ थी—यह न केवल मेरे गंभीर आलस्य के कारण था, बल्कि इसलिए भी था क्योंकि शैतान के जहर ने मेरे अंदर नियंत्रण कर लिया था, जैसे, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “जीवन सिर्फ अच्छा खाने और सुंदर कपड़े पहनने के बारे में है,” “आज मौज करो, कल की फिक्र कल करना,” “वर्तमान में जियो और अपने प्रति दयालु होना सीखो,” और “शारीरिक आनंद ही खुशी है।” मैं इन विचारों और दृष्टिकोणों के अनुसार जीती थी और अधिक स्वार्थी और घिनौनी होती जा रही थी। मैं किसी भी चीज के लिए कष्ट सहने या कीमत चुकाने को तैयार नहीं थी और मैंने शारीरिक आराम को सबसे ऊपर रखा। ठीक वैसे ही जैसे जब मैं बच्ची थी और मैंने कुछ सहपाठियों को मिडिल स्कूल में प्रवेश करते देखा—वे स्कूल जाने के लिए भोर से पहले उठ जाते थे और स्कूल के बाद, उनके पास करने के लिए हर तरह का होमवर्क होता था—मुझे लगा कि इस तरह से जीना बहुत थका देने वाला होगा और यह भी कि भले ही वे बहुत कष्ट सहें, फिर भी हो सकता है कि वे कॉलेज में प्रवेश भी न पा सकें। मैं बस वर्तमान का आनंद लेना और आराम से जीना चाहती थी और मुझे लगा कि इतना ही काफी होगा। इसलिए मैंने प्राथमिक विद्यालय पूरा करने के बाद स्कूल छोड़ दिया। शादी के बाद, मैं घर के सभी छोटे-बड़े मामलों की चिंता करने को भी तैयार नहीं थी और मेरे पति ने उन्हें सँभाला। मेरे परिवार ने कहा कि मैं भाग्यशाली हूँ, एक बेफिक्र जीवन जी रही हूँ और मैंने सोचा कि व्यक्ति को इसी तरह से जीना चाहिए और यह कि बिना किसी चिंता या तनाव के जीवन जीना, अपने दिन आराम से बिताना, सबसे सुखद जीवन था जो कोई जी सकता था। मैंने देखा कि ये शैतानी जहर पहले ही मेरी प्रकृति और मेरे कार्य करने तथा आचरण करने की कसौटी बन चुके थे। इन चीजों के अनुसार जीने से मैं देह में और भी अधिक लिप्त हो गई, बहुत ही नीच ढंग से जी रही थी। परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य करने आने के बाद भी, मैंने अपने शारीरिक हितों को पहले रखा, मैं अपने कर्तव्यों में थोड़ी-सी कीमत चुकाने को तभी तैयार थी जब तक कि मेरे शारीरिक आराम पर कोई असर न पड़े, लेकिन जैसे ही मेरे शारीरिक हितों पर असर पड़ता, मैं बाहर निकलने का रास्ता सोचने के लिए अपना दिमाग लगाती और मैं अपने कर्तव्यों को लापरवाही से करती थी। जैसा कि एक भजन में कहा गया है : “लोग देह के लिए अपना जीवन देने को तैयार हैं, लेकिन सत्य के लिए कुछ भी त्यागना नहीं चाहते हैं” (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ, उजाड़ और दुखद दुनिया के लिए एक विलाप)। कामचलाऊ ढंग से काम करने के बाद जब मुझे ग्लानि महसूस हुई और मैं स्पष्ट रूप से जानती थी कि अच्छे नतीजे कैसे हासिल किए जाएँ, तब भी मैं कष्ट सहने या कीमत चुकाने को तैयार नहीं थी। मुझे हमेशा लगता था कि उस प्रयास से मेरा ही नुकसान होगा, इसलिए मैं लगातार आराम की लालसा करती थी, जिसके परिणामस्वरूप मेरे कर्तव्यों का कोई नतीजा नहीं निकला। एक निर्देशक और अभिनेत्री के रूप में अपने समय के दौरान, मैंने परमेश्वर के घर के काम को इतना बड़ा नुकसान पहुँचाया, लेकिन मुझे इसके बारे में कुछ भी महसूस नहीं हुआ, कोई दुख महसूस नहीं हुआ और यहाँ तक कि मैंने सोचा कि इसके पीछे वस्तुनिष्ठ कारण थे। यह सोचकर, मैं थोड़ा डर गई। इन शैतानी जहरों ने मुझे स्वार्थी और नीच बना दिया था। हालाँकि मेरी देह आराम का आनंद ले रही थी, मैंने एक व्यक्ति के रूप में अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा पूरी तरह से खो दी थी और अब, मेरे पास अपने कर्तव्य करने का अवसर भी नहीं था। मेरे पिछले कर्तव्यों से मिले ये पछतावे अब परमेश्वर में मेरी आस्था पर एक धब्बा बन गए हैं। मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर ने, मानवजाति को बचाने के लिए, देह धारण किया और पृथ्वी पर आया, व्यक्तिगत रूप से मानवीय कष्टों का अनुभव किया और कैसे उसने आपूर्ति करने, मार्गदर्शन करने, न्याय करने और लोगों को शुद्ध करने के लिए सभी प्रकार के सत्य व्यक्त किए हैं। परमेश्वर ने मानवता के लिए अपने हृदय का इतना रक्त खपाया है, लेकिन मैं वह कर्तव्य भी करने को तैयार नहीं थी जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए। मुझमें किस तरह से कोई अंतरात्मा या विवेक था? मैं सचमुच परमेश्वर की अनुयायी होने के लायक नहीं थी!
अपने अलगाव के दौरान, मैं कलीसिया से संपर्क नहीं कर सकती थी। मैं केवल यूट्यूब पर भाई-बहनों द्वारा बनाए गए वीडियो देख सकती थी। मैंने परमेश्वर के घर की फिल्मों, जीवन की अनुभवजन्य गवाहियों, भजनों और नृत्य वीडियो की संख्या बढ़ते हुए देखी और हर दिन नए वीडियो अपलोड होते देखे। मुझे लगा कि इन भाई-बहनों के पास पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर की आशीषें और मार्गदर्शन है और मुझमें भी इसकी लालसा जगी। मुझे वे दिन याद आए जब मैं अपने भाई-बहनों के साथ अपने कर्तव्य करती थी। मैंने सोचा कि मैं भी कभी उनमें से एक थी, लेकिन क्योंकि मैंने अपने कर्तव्यों को सँजोया नहीं था और मैंने उन्हें बार-बार लापरवाही से किया था, मैंने अपने कर्तव्य करने का अवसर खो दिया था। मैं बहुत परेशान थी। मेरे पछतावे और अपराध मेरे दिल में चुभते काँटों की तरह महसूस हो रहे थे और उन्होंने मुझे बहुत सताया। इसी समय मुझे वास्तव में एहसास हुआ कि सच्ची खुशी इस बात में नहीं है कि हम कितना शारीरिक आराम पाते हैं, बल्कि इस बात में है कि हम कितने अच्छे कर्म तैयार करते हैं और हम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कितनी चीजें करते हैं। पीछे मुड़कर देखूँ तो, मैंने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए एक भी काम नहीं किया था और जब भी मैं इसके बारे में सोचती, मैं पछतावे और कर्ज की भावनाओं से भर जाती थी। उस समय, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना, जिसका शीर्षक था “अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाकर ही तुम मानव जीवन के मूल्य को जी सकते हो,” और मेरा दिल रोशन हो गया।
1 व्यक्ति के जीवन का मूल्य क्या है? एक ओर, यह सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने के बारे में है। दूसरे संदर्भ में, अपने जीवनकाल के दौरान तुम्हें अपना मिशन पूरा करना चाहिए; यह सबसे महत्वपूर्ण है। हम किसी बड़े मिशन, कर्तव्य या जिम्मेदारी को पूरा करने की बात नहीं करेंगे; लेकिन कम से कम, तुम्हें कुछ तो हासिल करना चाहिए। किसी व्यक्ति के जीवनकाल में अपना स्थान पाने के बाद, वह अपनी स्थिति पर अडिग रहता है, अपनी जगह पर टिका रहता है, अपने हृदय का पूरा रक्त और अपनी सारी ऊर्जा खपा देता है, जिस चीज पर काम करना चाहिए और जिसे पूरा करना चाहिए उसे अच्छे से करता है और समाप्त करता है। जब वह अंत में हिसाब देने के लिए परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो वह अपेक्षाकृत संतुष्ट महसूस करता है, उसके दिल में कोई आत्मग्लानि या पछतावा नहीं होता है। उसे सुकून महसूस होता है और उसे लगता है कि उसने कुछ प्राप्त किया है, उसने एक मूल्यवान जीवन जिया है।
2 तो, एक मूल्यवान जीवन जीने और अंततः इस प्रकार की फसल प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का थोड़ा-सा शारीरिक कष्ट सहना और थोड़ी-सी कीमत चुकाना सार्थक है, भले ही वह थकावट के कारण बीमार हो जाए या उसे कोई स्वास्थ्य समस्या हो जाए। जब कोई व्यक्ति इस संसार में आता है, तो यह देह के आनंद के लिए नहीं होता, न ही यह खाने, पीने और मौज-मस्ती करने के लिए होता है। व्यक्ति को उन चीजों के लिए नहीं जीना चाहिए; यह मानव जीवन का मूल्य नहीं है, न ही यह उचित मार्ग है। मानव जीवन का मूल्य और अनुसरण का उचित मार्ग कुछ मूल्यवान हासिल करने और कार्य के एक या अनेक मूल्यवान पहलुओं को पूरा करने में निहित हैं। इसे करियर नहीं कहा जा सकता है; इसे उचित मार्ग कहा जाता है और इसे उचित काम भी कहा जाता है। व्यक्ति के लिए किसी मूल्यवान कार्य को पूरा करने, सार्थक और मूल्यवान जीवन जीने और सत्य का अनुसरण करने और इसे प्राप्त करने के लिए कोई भी कीमत चुकाना व्यक्ति के लिए सार्थक है।
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—वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6)
इस भजन ने जीवन के मूल्य और अर्थ के प्रति मेरी आँखें खोल दीं। शारीरिक आराम केवल अस्थायी है और वास्तव में सार्थक जीवन तभी पाया जा सकता है जब हम अपने कर्तव्य पूरे करें और अपने दिलों में सुकून पाएँ। मुझे एहसास हुआ कि अगर मेरा भ्रष्ट स्वभाव अनसुलझा रहा, मेरा आलस्य और शारीरिक आराम में लिप्त होना मुझे हमेशा अपने कर्तव्य पूरे करने से रोकेगा। इसलिए, मैंने अभ्यास का मार्ग खोजते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के एक अंश से अभ्यास का एक मार्ग पा लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब तुम्हारा मन अनमने ढंग से काम करने, धूर्त बनने और कामचोरी करने का करे, और तुम अपना कर्तव्य करते समय परमेश्वर की जाँच-पड़ताल से बचने की कोशिश करो तो तुम्हें प्रार्थना करने और यह चिंतन करने के लिए परमेश्वर के सामने शीघ्र आना चाहिए कि क्या ऐसा करना सही है। फिर, कुछ सोच-विचार करो : ‘परमेश्वर में विश्वास करने में मेरा उद्देश्य क्या है? मेरी लापरवाही लोगों को तो मूर्ख बना सकती है, लेकिन क्या यह परमेश्वर को मूर्ख बना देगी? इसके अलावा, परमेश्वर में मेरा विश्वास और मेरा कर्तव्य करना इसलिए नहीं है कि मैं धूर्त बनूँ और कामचोरी करूँ, बल्कि इसलिए है कि मैं उद्धार पा सकूँ। इस तरह से व्यवहार करना यह दिखाता है कि मुझमें सामान्य मानवता नहीं है और यह ऐसा कुछ नहीं है जिससे परमेश्वर प्रसन्न होता है। यह ठीक नहीं होगा। अगर मैं दुनिया में धूर्त होता, कामचोरी करता और अपनी ही मर्जी के अनुसार चलता तो यह एक बात होती, लेकिन अब मैं परमेश्वर के घर में हूँ, मैं परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हूँ, परमेश्वर की नजरों की जाँच-पड़ताल के अधीन हूँ और मैं एक इंसान हूँ, इसलिए मुझे अपनी अंतरात्मा और परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना चाहिए, मैं अपनी मर्जी के अनुसार नहीं चल सकता, लापरवाह नहीं हो सकता या धूर्त और कामचोर नहीं हो सकता। तो मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मैं धूर्त और कामचोर न बनूँ और लापरवाही न करूँ? मुझे कुछ प्रयास करना चाहिए। अभी-अभी मुझे लगा कि उस तरह से व्यवहार करना बहुत ज्यादा मुश्किल भरा है, इसलिए मैं कठिनाई से बचना चाहता था, लेकिन अब मैं समझता हूँ : हो सकता है कि इसे इस तरह से करने में अधिक मुश्किल हो, लेकिन इससे नतीजे मिलते हैं, इसलिए मुझे यह इसी तरीके से करना चाहिए।’ जब तुम यह कर रहे हो और फिर भी कठिनाई झेलने को तैयार नहीं हो, तो ऐसे समय में तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए : ‘प्रिय परमेश्वर! मैं एक आलसी, धूर्त व्यक्ति हूँ। कृपया मुझे अनुशासित करो और मुझे फटकारो, ताकि मैं अंतरात्मा का बोध प्राप्त कर सकूँ और मुझमें शर्म की भावना हो। मैं लापरवाह नहीं रहना चाहता। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे प्रबुद्ध करो, ताकि मैं अपनी विद्रोहशीलता और अपनी कुरूपता देख सकूँ।’ जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, इस तरह आत्म-चिंतन करते हो और खुद को जानने की कोशिश करते हो, तो इससे पछतावे की भावना पैदा होगी; तुम अपनी कुरूपता से घृणा कर सकोगे और तुम्हारी गलत दशा बदलने लगेगी। तुम यह मनन कर सकोगे : ‘मैं क्यों इतना लापरवाह हूँ? मैं क्यों हमेशा धूर्त और कामचोर होने की कोशिश करता हूँ? इस तरह से पेश आना बिल्कुल अंतरात्मा और विवेक से रहित होना है—क्या मैं फिर भी परमेश्वर में विश्वास करने वाला व्यक्ति हूँ? मैं चीजों को कर्तव्यनिष्ठा से क्यों नहीं कर सकता? क्या मुझे बस थोड़ा-सा और समय और प्रयास लगाने की जरूरत नहीं है? इसमें इतना कठिन क्या है? यही वह चीज है जो मुझे करनी चाहिए; अगर मैं यह भी नहीं कर सकता, तो क्या मैं इंसान कहलाने के लायक हूँ?’ नतीजतन, तुम एक संकल्प लोगे और परमेश्वर के सामने शपथ लोगे, ‘प्रिय परमेश्वर! मैंने तुम्हें निराश किया है, मैं सचमुच बहुत गहराई तक भ्रष्ट हो चुका हूँ, मैं अंतरात्मा और विवेक से रहित हूँ और मुझमें कोई मानवता नहीं है। मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। कृपया मुझे क्षमा करो। मैं निश्चित रूप से बदलूँगा। यदि मैं पश्चात्ताप नहीं करता, तो तुम मुझे दंड देना।’ इसके बाद, तुम्हारी मानसिकता बदल जाएगी और तुम बदलने लगोगे। जब तुम अगली बार अपना कर्तव्य करोगे, तो तुम कर्तव्यनिष्ठा से कार्य कर पाओगे, कम लापरवाह होगे और तुम कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम होगे। तुम महसूस करोगे कि इस तरह से अपना कर्तव्य निभाना अद्भुत है, और तुम्हारे हृदय में शांति और आनंद होगा। जब लोग परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं, जब वे उससे प्रार्थना कर सकते हैं और उस पर निर्भर रह सकते हैं, तो उनकी मनोदशाएँ जल्द ही बदल जाएँगी। जब तुम्हारी नकारात्मक मनोदशा बदल चुकी होती है, तुम अपने इरादों और देह की स्वार्थपरक इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह कर चुके होते हो, जब तुम देह के सुख और खुशियों को छोड़ने में सक्षम रहते हो, परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो और अब मनमाने ढंग से या बेलगाम होकर कार्य नहीं करते हो, तो तुम्हारे दिल को शांति मिलती है और तुम अपनी अंतरात्मा द्वारा धिक्कारे जाने से मुक्त रहते हो। क्या इस तरह से देह के खिलाफ विद्रोह करना और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करना आसान है? अगर तुममें परमेश्वर के लिए जबरदस्त आकांक्षा है, तो तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो और सत्य का अभ्यास कर सकते हो। और अगर तुम इस तरह से अभ्यास करते हो, तो बिना एहसास किए ही तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे। यह बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे समझ में आ गया कि परमेश्वर में विश्वास करते हुए और अपना कर्तव्य निभाते हुए मुझे परमेश्वर के लिए एक प्रबल इच्छा रखनी होगी और अपने कर्तव्य को पहले रखना होगा। जब मैं अपने कर्तव्य में लापरवाही करना चाहूँ, तो मुझे जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए, उससे मुझे कष्ट सहने का संकल्प देने के लिए कहना चाहिए और मुझे उसकी जाँच-पड़ताल भी स्वीकार करनी चाहिए। इस अभ्यास में लगे रहने से, मेरी लापरवाही की समस्या धीरे-धीरे सुधरने लगेगी। मुझे एहसास हुआ कि मेरे कर्तव्य खोने में परमेश्वर का इरादा मुझे अपनी समस्याओं पर विचार करवाना था और यह मेरी आस्था के मार्ग का एक निर्णायक मोड़ था। मुझे सत्य का अनुसरण करना था, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करना था, अपना कर्तव्य पूरा करना था और एक मनुष्य जैसा जीवन जीना था। मैंने घुटने टेके और प्रार्थना की, “परमेश्वर, अब मैं अपनी असफलता की जड़ को स्पष्ट रूप से देखती हूँ। मैं अब और शैतानी स्वभाव के अनुसार नहीं जीना चाहती। मैं ऊपर उठने का प्रयास करना चाहती हूँ और अगर मुझे फिर से अपना कर्तव्य करने का मौका मिला, तो मैं अपने कर्तव्य को पहले रखूँगी और तुझे संतुष्ट करने का पूरा प्रयास करूँगी।”
अगस्त 2024 में, मैं आखिरकार कलीसिया से संपर्क करने में कामयाब रही और मैं फिर से अपने कर्तव्य करने में सक्षम हो गई। मैं इतनी रोमांचित थी कि मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकती थी। एक पल के लिए, मैंने खुशी, कृतज्ञता और अपराध बोध का मिला-जुला भाव महसूस किया। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर का मुझे पश्चात्ताप करने का अवसर देना है और मैंने मन ही मन संकल्प लिया कि मैं फिर कभी अपने कर्तव्यों में पहले की तरह शारीरिक आराम में नहीं लिप्त रहूँगी और यह कि मुझे अपने कर्तव्य को पहले रखना और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना याद रखना होगा।
बाद में, कलीसिया ने मेरे लिए एक अभिनेत्री बनने की व्यवस्था की और मैंने अनुभवजन्य गवाही वीडियो में अभिनय का प्रशिक्षण लिया और मैंने अंशकालिक रूप से अन्य कर्तव्य भी सँभाले। इस बार, मुझे अब यह महसूस नहीं हुआ कि मेरे अंशकालिक कर्तव्य अनावश्यक थे और जब भी मेरे पास समय होता, मैं उन्हें करती थी। मैंने देखा कि जिन भाई-बहनों से मैं पहले परिचित थी, उन सभी ने पिछले लगभग एक साल में अपने कर्तव्यों में काफी प्रगति की थी। अनुभवजन्य गवाही वीडियो फिल्माने की प्रगति विशेष रूप से तेज थी और अभ्यास के लिए ज्यादा समय नहीं था। मुझे एहसास हुआ कि मुझमें बहुत सारी कमियाँ थीं और मैं थोड़ी पीछे रह रही थी। मुझे याद है कि जिस पहले अनुभवजन्य गवाही वीडियो में मैंने अभिनय किया था, उसकी तैयारी का समय बहुत कम था और मैंने सोचा, “मैं अभी प्रशिक्षण शुरू ही कर रही हूँ, तो क्या वे हालात को और अधिक समझ नहीं सकते? मुझे तैयारी के लिए और समय दें। क्या हमें वाकई इतनी जल्दी करनी है?” मैंने निर्देशक को अपने विचार बताए और निर्देशक ने कहा, “कोई बात नहीं, हम परमेश्वर पर भरोसा करेंगे और बस अपना सर्वश्रेष्ठ करने की जरूरत है।” उस पल, मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपने कर्तव्यों को आसान और आरामदायक तरीके से करके अपनी देह को संतुष्ट करने की कोशिश कर रही थी। अपनी पिछली असफलताओं के बारे में सोचते हुए, मैंने खुद को चेतावनी दी कि मैं अब और अपनी देह की परवाह नहीं कर सकती और भले ही समय कम हो, मैं सहयोग करने की पूरी कोशिश करूँगी। इसके बाद, मैं जल्दी से तैयारी करने चली गई। जल्द ही, मेरा पहला अनुभवजन्य वीडियो सफलतापूर्वक फिल्माया गया। उसके बाद, लंबे अनुभवजन्य गवाही वीडियो में अभिनय करते समय, मुझे कभी-कभी अभी भी बहुत दबाव महसूस होता था और जब समय कम होता, तो मेरे मन में कठिनाई के प्रति नापसंदगी और थकावट से डरने के विचार आते, लेकिन उन विचारों के सामने आने के बाद, मैं समय रहते उनके प्रति जागरूक हो पाती थी और मैं जल्दी से प्रार्थना करती, परमेश्वर से मेरे दिल की रक्षा करने और मुझे फिर से अपनी देह के बारे में सोचने से रोकने के लिए कहती। मैं बार-बार, कड़ी मेहनत से अभ्यास करती और सहयोग करने में अपने सारे प्रयास लगा देती। हालाँकि जिन वीडियो में मैं अब अभिनय करती हूँ, उनमें मेरा प्रदर्शन दूसरों की तरह स्वाभाविक और सहज नहीं है, मेरे दिल में कोई आत्म-ग्लानि महसूस नहीं होती और इसके बजाय, मैं सहज और शांत महसूस करती हूँ।
कई कर्तव्य होने पर भी उनकी सराहना न करने से लेकर उन्हें खोने तक और फिर उन्हें बहाल करवा दिए जाने तक, मैंने वास्तव में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों को महसूस किया और मैंने यह एहसास कर लिया है कि परमेश्वर चाहे जो भी करता हो, यह मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव को छोड़ देने और जमीर और मानवता वाला व्यक्ति बनने देने के लिए है। परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मुझे खुद को समझने और सत्य पाने का ऐसा अवसर दिया। मैं आने वाले समय को सँजोने, अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से करने और परमेश्वर की अपेक्षाओं पर खरी उतरने को तैयार हूँ।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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