मेरे कर्तव्य ने मेरा स्वार्थ प्रकट कर दिया

08 अक्टूबर, 2025

रोक्साना, ताइवान

मैं दो वर्षों से अधिक समय से वीडियो कार्य की पर्यवेक्षक हूँ। कुछ समय पहले काम की जरूरतों के चलते हमारे समूह को दो छोटे समूहों में बाँट दिया गया। बहन लायला एक समूह की प्रभारी बनी और दूसरे समूह का प्रभार मुझे दिया गया। भले ही बहन लायला ने अभी-अभी इस काम की देखरेख शुरू की थी, पर वह वीडियो बनाने को लेकर हमेशा अहम सुझाव देती थी और अक्सर काम की मिलकर समीक्षा करने और तकनीकी कौशल सीखने में भाई-बहनों की अगुआई करती थी। मैं इस बात से बहुत खुश नहीं थी, सोच रही थी “इस रफ्तार से वे जरूर तेजी से प्रगति करेंगे और वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है जब मैं पीछे हो जाऊँगी।” मुझे लगा जैसे संकट निकट है और मैंने मन ही मन कहा कि मुझे हर वीडियो पर अच्छा काम करना होगा ताकि लायला और उसके समूह से पीछे न रह जाऊँ। उस समय हम एक ऐसा वीडियो बना रहे थे जो तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था और मैं अन्य भाई-बहनों के साथ मिलकर संबंधित कौशल का बारीकी से अध्ययन कर रही थी। जब हमारे सामने मुश्किलें आतीं तो मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती और सभी के साथ समाधान तलाशती। बहुत मेहनत के बाद वीडियो पूरा हो गया और इसे देखने वाले भाई-बहनों ने कहा कि यह बहुत बढ़िया बना है। इससे संतोष मिला क्योंकि यह बताता था कि मुझमें कुछ काबिलियत तो है और लायला और उसके समूह से अधिक सक्षम हूँ। मैंने वीडियो अन्य समूहों में भाई-बहनों को भेजा और कुछ दिनों बाद उन्होंने जवाब दिया कि वीडियो बहुत जीवंत लग रहा है और पूछा कि मैंने अपना तकनीकी कौशल कैसे सुधारा। यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई और मैंने मन ही मन सोचा, “अब जब भाई-बहन जान गए हैं कि मैं क्या कर सकती हूँ तो उन्हें मेरा आदर और मेरी सराहना करनी ही पड़ेगी।” मैंने खुद से वादा किया कि मैं आइंदा हर वीडियो पर पूरी लगन से काम करूँगी।

इसके बाद लायला और उसके समूह को एक वीडियो में मुश्किलें आ रही थीं और वे चाहते थे कि इन्हें सुलझाने में मैं उनकी मदद करूँ। मैंने मन ही मन सोचा, “यह वीडियो तुम्हारी जिम्मेदारी है। अगर मैं इन समस्याओं को सुलझाने में समय लगाती हूँ तो मुझे इसका श्रेय भी नहीं मिलेगा और इससे मेरा अपना काम भी रुक जाएगा। मेरे लिए अपनी जिम्मेदारी वाले वीडियो में ही ज्यादा मेहनत करना बेहतर होगा, बजाय इसके कि मैं तुम्हारी समस्याएँ सुलझाने में मदद करने लगूँ।” इसलिए मैंने उनकी मदद न करने का फैसला किया। बाद में जब लायला को अभी भी कोई समाधान नहीं मिला तो वह फिर मेरे पास आई। उसने कहा कि उन्होंने कई तरीके आजमाए पर सफलता नहीं मिली और पूछा कि मैंने ऐसी मुश्किलों को कैसे सँभाला था। मैंने सोचा, “अगर मैं तुम्हारे समूह की समस्याओं पर समय लगाती हूँ और तुम्हारा काम मुझसे अच्छा हो जाता है तो क्या हर कोई तुम्हें मुझसे बेहतर समूह अगुआ नहीं मानेगा, भले ही तुमने अभी-अभी शुरुआत की हो? मैं अक्षम दिखूँगी!” यह सोचकर मैंने उसे कुछ अनमने ढंग से कह दिया कि मैं उसकी मदद कर पाने की स्थिति में नहीं हूँ। लायला के पास अब वापस जाकर खुद ही मुश्किलों की गहन खोजबीन करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। फिर उसने समूह चैट में वीडियो का एक नमूना भेजा ताकि हम देख सकें कि कोई समस्या तो नहीं है। मैंने जवाब देने के बारे में नहीं सोचा क्योंकि मुझे लगा कि वीडियो देखने में मेरा समय बर्बाद होगा। लेकिन साथ ही मुझे यह भी चिंता हुई कि अगर मैंने इसे नहीं देखा तो भाई-बहन कहेंगे मैं काम की देखरेख में लापरवाह हूँ और समूह अगुआ के तौर पर गैर-जिम्मेदार हूँ। इसलिए मैंने अनिच्छा से फाइल खोली और वीडियो देखा। मुझे कई जगहों पर समस्याएँ दिखीं, लेकिन मैंने उन पर सावधानी से भली-भाँति विचार नहीं किया। फिर लायला ने वीडियो अगुआ को भेजा, उसने बहुत सारी समस्याएँ बताईं, इसलिए उनके वीडियो पर फिर से काम करने और उसे सुधारने की जरूरत पड़ी। परिणामस्वरूप काम की प्रगति में देरी हुई। बाद में जब अगुआ मेरे साथ काम पर चर्चा करने आई तो उसने मेरी समस्याएँ बताईं और कहा, “जब हम कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाते हैं तो हम काम को बाँट देते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम एक-दूसरे से मतलब रखे बिना काम करें। तुम एक समूह अगुआ हो, इसलिए तुम्हें ज्यादा जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। लायला ने अभी-अभी समूह अगुआ के रूप में अभ्यास शुरू किया है, इसलिए तुम्हें उसके और उसके समूह द्वारा बनाए गए वीडियो की अधिक बारीकी से जाँच करनी होगी, ताकि कुछ समस्याएँ समय रहते सुलझाई जा सकें।” तब मुझे एहसास हुआ कि मैं इस देरी की जिम्मेदारी लेने से नहीं बच सकती क्योंकि यह सब मेरे बहुत स्वार्थी होने, सिर्फ अपने काम पर ध्यान देने और लायला के साथ सहयोग न करने के कारण हुआ था। लेकिन मैंने इस मामले पर बहुत गहराई से विचार नहीं किया। इसके बाद जब भी मैं वीडियो बनाती तो मेरी सोच धुँधली हो जाती और मैं उनींदापन और भटकाव महसूस करने लगती। मैं भाई-बहनों के कर्तव्यों में समस्याएँ नहीं ढूँढ़ पा रही थी और मुझे यह भी समझ नहीं आ रहा था कि प्रार्थना करते समय क्या कहना है। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा ठीक नहीं है और परमेश्वर ने मुझसे अपना चेहरा छिपा लिया है। इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने आकर खोजते हुए प्रार्थना की और उससे कहा कि वह मुझे स्वयं को समझने की ओर मार्गदर्शन करे।

एक रात को सोने से पहले मैंने अपने हालिया प्रदर्शन पर विचार किया। मैंने सोचा कि परमेश्वर कैसे उन मसीह-विरोधियों को उजागर करता है जो अपने कर्तव्य निर्वहन में सिर्फ अपने ही काम की परवाह करते हैं। मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला : “मसीह-विरोधियों में न कोई अंतरात्मा होती है, न विवेक और न ही मानवता। वे न केवल बेशर्म होते हैं, बल्कि उनकी एक और पहचान होती है : वे असाधारण रूप से स्वार्थी और नीच होते हैं। ‘स्वार्थी और नीच’ का शाब्दिक अर्थ समझना मुश्किल नहीं है। इसका मतलब है कि व्यक्ति लाभ के सिवा कुछ नहीं चाहता। यदि किसी बात का सरोकार उनके अपने हितों से होता है तो वे उसमें अपना पूरा मन लगा देंगे, उसके लिए कष्ट सहेंगे और कीमत चुकाएँगे, और उसमें अपनी सोच और ऊर्जा लगाएँगे। यदि किसी बात का सरोकार उनके अपने हितों से नहीं होता है तो वे उससे आँखें मूँद लेंगे और उस पर कोई ध्यान नहीं देंगे; वे दूसरों को अपनी मर्जी करने देंगे—भले ही कोई गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा कर रहा हो, वे उसे नजरअंदाज़ कर देंगे और सोचेंगे कि इसका उनसे कोई लेना-देना नहीं है। इसे कहने का एक अच्छा तरीका यह है कि वे अपने काम से मतलब रखते हैं, लेकिन यह कहना अधिक सटीक है कि इस तरह का व्यक्ति नीच, अधम और घिनौना होता है—हम उन्हें ‘स्वार्थी और नीच’ ठहराते हैं। मसीह-विरोधियों की स्वार्थपरता और नीचता कैसे प्रकट होती है? उनके रुतबे और प्रतिष्ठा को जिससे लाभ होता है, वे उसके लिए जो भी जरूरी होता है उसे करने या बोलने के प्रयास करते हैं और वे स्वेच्छा से हर पीड़ा सहन करते हैं। लेकिन जहाँ बात परमेश्वर के घर द्वारा व्यवस्थित कार्य से संबंधित होती है, या परमेश्वर के चुने हुए लोगों की जीवन संवृद्धि को लाभ पहुँचाने वाले कार्य से संबंधित होती है, वे पूरी तरह इसे अनदेखा करते हैं। यहाँ तक कि जब बुरे लोग गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करते हैं, सभी प्रकार की बुराई कर रहे होते हैं और इसके फलस्वरूप कलीसिया के कार्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहे होते हैं, तब भी वे उससे सरोकार नहीं रखते और इसके बारे में पूछताछ नहीं करते हैं, मानो उनका उससे कोई लेना-देना ही न हो। और अगर कोई किसी बुरे व्यक्ति के बुरे कर्मों के बारे में जान जाता है और इनकी रिपोर्ट कर देता है तो वे कहते हैं कि उन्होंने कुछ नहीं देखा और अज्ञानता का ढोंग करने लगते हैं। ... मसीह-विरोधी चाहे जिस भी कार्य के लिए जिम्मेदार हों, वे कभी परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करते। वे केवल इस बात पर विचार करते हैं कि कहीं उनके हित तो प्रभावित नहीं हो रहे हैं और वे केवल अपने सामने के उस छोटे-से काम के बारे में सोचते हैं, जिससे उन्हें फायदा होता है। उनकी नजर में, कलीसिया का प्राथमिक कार्य बस वही है जिसे वे अपने खाली समय में करते हैं। वे उसे बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते। वे केवल तभी हिलते हैं जब उन्हें काम करने के लिए कोंचा जाता है, केवल वही करते हैं जो वे करना पसंद करते हैं और केवल वही कार्य करते हैं जो उनके अपने सामर्थ्य और रुतबे को कायम रखने के लिए होता है। उनकी नजर में परमेश्वर के घर द्वारा व्यवस्थित कोई भी कार्य, सुसमाचार फैलाने का कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों का जीवन प्रवेश महत्वपूर्ण नहीं हैं। चाहे अन्य लोगों को अपने काम में जो भी कठिनाइयाँ आ रही हों, उन्होंने जिन भी मुद्दों को पहचाना और उन्हें रिपोर्ट किया हो, उनके शब्द कितने भी ईमानदार हों, मसीह-विरोधी उन पर कोई ध्यान नहीं देते, वे उनमें शामिल नहीं होते, मानो इन मामलों से उनका कोई लेना-देना ही न हो। कलीसिया के काम में उभरने वाली समस्याएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, वे पूरी तरह से उदासीन रहते हैं। अगर कोई समस्या उनके ठीक सामने रख दी जाए, तब भी वे उससे लापरवाही से ही निपटते हैं। केवल जब ऊपरवाला सीधे उनकी काट-छाँट करता है और उन्हें किसी समस्या को सुलझाने का आदेश देता है, तभी वे बेमन से थोड़ा-सा वास्तविक कार्य करेंगे और ऊपरवाले को दिखाने के लिए दिखावा करेंगे। इसके बाद, वे खुद को अपने ही मामलों में व्यस्त रखना जारी रखेंगे। जब कलीसिया के कार्य की या समग्र स्थिति से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों की बात आती है, तो वे इनमें से किसी भी चीज से सरोकार नहीं रखते हैं और इन्हें अनदेखा कर देते हैं, और यहाँ तक कि समस्याएँ पता चलने पर भी वे उन्हें नहीं सँभालते हैं। चाहे दूसरे कोई भी मुद्दा उठाएँ, वे अनमने ढंग से जवाब देते हैं और टालमटोल करते हैं, बड़ी अनिच्छा से ही मुद्दों से निपटते हैं। क्या यह स्वार्थपरता और नीचता की अभिव्यक्ति नहीं है? इसके अलावा, मसीह-विरोधी चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ, वे हमेशा यह विचार करते हैं कि क्या वे सुर्खियों में आ सकते हैं; अगर कोई कर्तव्य उनकी प्रतिष्ठा बढ़ा सकता है, तो वे यह सीखने के लिए कि इसे कैसे करना है और इसे कार्यान्वित करने के लिए अपना दिमाग खपाएँगे और हर संभव तरीका खोजने की कोशिश करेंगे। अगर वे दूसरों से ऊपर उठ सकते हैं, तो वे संतुष्ट रहते हैं। वे चाहे जो कुछ भी कर या सोच रहे हों, वे हर मोड़ पर केवल अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के बारे में ही सोचते हैं। वे चाहे जो भी कर्तव्य करें, वे केवल यह देखने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं कि कौन बेहतर है, कौन जीतता है और किसकी प्रतिष्ठा अधिक है। वे केवल इस बात की परवाह करते हैं कि कितने लोग उन्हें आराध्य मानते हैं और उनका आदर करते हैं, कितने लोग उनकी सुनते हैं और उनका अनुसरण करते हैं। वे कभी भी सत्य पर संगति नहीं करते और वास्तविक समस्याओं का समाधान नहीं करते हैं। वे कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि अपना कर्तव्य इस तरह से कैसे करें कि वे सिद्धांतों के अनुसार चीजों को सँभाल सकें, न ही वे इस पर चिंतन करते हैं कि क्या उनमें लगन है, क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया है, क्या उनके कार्य में कोई विचलन, चूक या समस्या है, और वे इस बात पर तो और भी कम विचार करते हैं कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं, और परमेश्वर के इरादे क्या हैं। वे इन सभी चीजों पर जरा भी ध्यान नहीं देते हैं। वे केवल प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की खातिर और अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए खुद को अपने कार्य में झोंकते हैं। क्या यह स्वार्थपरता और नीचता की अभिव्यक्ति नहीं है? यह इस तथ्य को पूरी तरह से उजागर करता है कि उनके दिल महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और अविवेकपूर्ण माँगों से भरे हुए हैं, और उनका हर क्रियाकलाप उनकी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं द्वारा संचालित होता है। वे चाहे जो भी करें, उनके क्रियाकलापों की प्रेरणा और स्रोत उनकी अपनी महत्वाकांक्षाओं, इच्छाओं और अविवेकपूर्ण माँगों से आते हैं। यह स्वार्थपरता और नीचता की एक ठेठ अभिव्यक्ति है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक चार : मसीह-विरोधियों के चरित्र और उनके स्वभाव सार का सारांश (भाग एक))। परमेश्वर मसीह-विरोधियों को अत्यधिक स्वार्थी के रूप में उजागर करता है। जो मामले उनके अपने हितों से जुड़े होते हैं या जो उन्हें दूसरों से अलग दिखाते हैं, उनमें वे लगन और खुशी से काम करते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कितनी भी कीमत चुकानी पड़े या कष्ट सहना पड़े। लेकिन अगर कोई चीज उनके अपने हितों से जुड़ी नहीं होती तो वे उसे अनदेखा कर देते हैं। वे ऐसे मामलों पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं होते, चाहे दूसरों को कितनी भी मुश्किलें क्यों न आ रही हों या कलीसिया के काम को कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए। वे जो कुछ भी करते हैं, वह अपनी निजी प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए करते हैं और वे कलीसिया के हितों पर जरा भी विचार नहीं करते। तब मुझे एहसास हुआ कि मैं इसी तरह का व्यवहार कर रही थी। हमारे समूह के दो भागों में विभाजित होने के बाद मैंने देखा कि लायला तेजी से प्रगति कर रही है और अपने कर्तव्य में जिम्मेदारी उठा रही है। मुझे चिंता हुई कि वह मुझसे आगे निकल जाएगी, इसलिए जब उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वह मदद के लिए मेरे पास आई तो मैं उसकी मदद करने के लिए अनिच्छुक हो गई। मुझे लगा कि यह मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है और ऐसा करने में मेरा समय और ऊर्जा खर्च होगी। इतना ही नहीं, बल्कि अगर वीडियो अच्छा भी बन जाता तो भी मेरी मेहनत पर किसी का ध्यान नहीं जाता—इसके बजाय दूसरे लोगों को लगता कि लायला का स्तर भी मेरे जैसा है, जबकि उसने अभी-अभी समूह अगुआ के तौर पर अभ्यास शुरू किया है। ऐसी स्थिति में मैं खुद को नहीं दिखा पाती। फिर जब लायला ने मुझसे उनका वीडियो देखने और सुझाव देने के लिए कहा तो मैंने परवाह नहीं की। मैं इसे देखने में समय और ऊर्जा नहीं लगाना चाहती थी। आखिरकार मैंने इसे देख तो लिया—लेकिन सिर्फ अनिच्छा से, बस औपचारिकता के लिए, क्योंकि मुझे चिंता थी कि दूसरे लोग कहेंगे कि मैं गैर-जिम्मेदार हूँ। इस वजह से यह वीडियो—जिसमें अनेक मसले थे—फिर से तैयार करना पड़ा। अगर मैंने थोड़ा और प्रयास किया होता तो मैं उन मसलों को पहले ही पहचान कर सुलझा सकती थी। लेकिन चूँकि मैं बहुत स्वार्थी थी और सिर्फ अपने हितों के बारे में सोच रही थी, इसलिए कलीसिया के काम में देरी हुई। यह सोचकर मुझे बहुत अपराध बोध हुआ। कलीसिया ने मुझे समूह अगुआ बनाया था, इसलिए मुझे अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए थीं और भाई-बहनों के कर्तव्यों में आने वाली विभिन्न मुश्किलों और समस्याओं को सुलझाने में ध्यानपूर्वक लगे रहना चाहिए था। लेकिन मैंने परमेश्वर के इरादों की जरा भी परवाह नहीं की। मुझे बस इस बात की परवाह थी कि मेरी जिम्मेदारी वाले वीडियो अच्छे से बनाए गए हैं या नहीं और मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों से अपनी प्रशंसा कैसे करवा सकती हूँ। जब लायला को मुश्किलों का सामना करना पड़ा तो स्पष्ट रूप से मेरे पास उन्हें सुलझाने के लिए कुछ विचार थे, लेकिन मैंने जरा भी मदद नहीं की। मैंने तो द्वेषपूर्ण ढंग से यहाँ तक सोचा, “अच्छा ही है कि उन्हें कुछ मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अगर उनके नतीजे खराब रहे तो मैं ही बेहतर दिखूँगी। भाई-बहन सोचेंगे कि मैं अपने समूह की रीढ़ हूँ और वे मेरे बिना कुछ नहीं कर सकते।” जिस तरह से मैंने सोचा और बर्ताव किया वह वाकई घृणित था! बाद में काम की समीक्षा करते समय मैंने कुछ बहनों को यह कहते हुए सुना, “यह वीडियो बहुत अच्छा नहीं बना है और मैं इसके बारे में कुछ हद तक नकारात्मक महसूस कर रही हूँ। लगता है मेरी काबिलियत इस कर्तव्य के लायक नहीं है।” यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा और मेरी यह भावना और मजबूत हो गई कि मैं कितनी स्वार्थी थी। मुझे सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की परवाह थी। मुझे अच्छी तरह पता था कि उन्होंने अभी-अभी अभ्यास करना शुरू किया है और उन्हें मदद और सहयोग की जरूरत है। लेकिन मैं तो बस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और जरा भी प्यार नहीं दिखाया। जितना मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही मुझे लगा कि मुझमें मानवता की कमी है। मैं इतना घृणित और निकृष्ट काम कैसे कर सकती थी?

एक सभा के दौरान मैंने एक भाई को अपने अनुभव के बारे में संगति करते हुए सुना और पाया कि मुझे इससे वाकई लाभ हुआ। उसकी संगति में परमेश्वर के वचनों का एक अंश था जिसने मुझ पर वाकई गहरी छाप छोड़ी। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों को अच्छे या बुरे के रूप में आँका जाता है? वह यह है कि वह अपने विचारों, खुलासों और क्रियाकलापों में सत्य को अभ्यास में लाने और सत्य वास्तविकता को जीने की गवाही रखता है या नहीं। यदि तुम्‍हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो बेशक, तुम एक कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को कैसे देखता है? परमेश्वर के लिए, तुम्हारे विचार और बाहरी क्रियाकलाप परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या उसे हराते हैं; बल्कि वे परमेश्वर को शर्मिंदा करते हैं और उसके अपमान के निशानों से भरे हुए हैं। तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे रहे, न ही तुम परमेश्वर के लिए खुद को खपा रहे हो, तुम परमेश्वर की खातिर अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे; बल्कि केवल अपनी खातिर काम कर रहे हो। ‘केवल अपनी खातिर’ का क्या मतलब है? इसका सही-सही मतलब है, शैतान की खातिर। इसलिए अंत में परमेश्वर यही कहेगा, ‘हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।’ परमेश्वर की नजर में तुम्‍हारे कार्यों को अच्‍छे कर्मों के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उन्‍हें बुरे कर्म माना जाएगा। उन्‍हें न केवल परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं होगी—बल्कि उनकी निंदा भी की जाएगी। परमेश्वर में ऐसे विश्‍वास से कोई क्‍या हासिल करने की आशा कर सकता है? क्या इस तरह का विश्‍वास अंततः व्‍यर्थ नहीं हो जाएगा?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ में आया कि परमेश्वर यह नहीं देखता कि कोई व्यक्ति कितने कर्तव्य निभाता है या दूसरे लोग उसकी कितनी प्रशंसा करते हैं। वह तो यह देखता है कि क्या किसी व्यक्ति के पास अपने विचारों, अभिव्यक्तियों और कार्यों में अपने कर्तव्य के दौरान सत्य का अभ्यास करने की गवाही है। परमेश्वर इस तरह फैसला करता है कि उस व्यक्ति का काम अच्छा है या बुरा। परमेश्वर लोगों के दिलों की जाँच-पड़ताल करता है और अगर कोई व्यक्ति परमेश्वर की गवाही देने और उसे संतुष्ट करने के इरादे के बिना अपना कर्तव्य निभाता है और इसके बजाय अपने हितों की रक्षा के लिए कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाता है तो चाहे वह व्यक्ति कितनी भी कीमत चुकाए, वह परमेश्वर की नजर में अभी भी बुराई कर रहा है। मुझे हमेशा लगता था कि मैं अपने कर्तव्य में सजग और जिम्मेदार हूँ और मैं उतनी बुरी नहीं हूँ। परमेश्वर के वचनों की रोशनी में अपने व्यवहार पर विचार करके मैंने देखा कि भले ही मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया और अपनी जिम्मेदारी वाले काम में बहुत सावधानी बरती, लेकिन इसके पीछे मेरे भाई-बहनों के दिलों में अपनी जगह बनाने का इरादा छिपा था; मेरा उद्देश्य यह था कि लोग सोचें कि मैं समूह की रीढ़ हूँ और मेरे बिना वे कुछ नहीं कर सकते। यहाँ तक कि जब लायला को मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वह अपने काम में प्रगति नहीं कर पाई तो भी मुझे जरा भी बेचैनी नहीं हुई। इसके विपरीत मुझे खुशी हुई कि उसे कठिनाइयाँ हो रही हैं, मुझे लगा कि इससे मुझे दूसरों से अलग दिखने में मदद मिलेगी। ऐसे घृणित इरादों के साथ अपना कर्तव्य निभाते हुए मैं बुराई कर रही थी और परमेश्वर द्वारा निंदित थी। अगर मैंने पश्चात्ताप न किया तो आखिरकार परमेश्वर मुझे निकाल देगा, भले ही मैंने बहुत काम किया हो और बड़ी कीमत चुकाई हो। इस विचार ने मुझे डरा दिया और मुझे लगा कि मैं गंभीर खतरे में हूँ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए प्रतिज्ञा की कि मैं अब अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार नहीं जिऊँगी और अगर भविष्य में भी मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ तो मैं कलीसिया के काम पर समग्रता से विचार करूँगी और कलीसिया के हितों की रक्षा करूँगी।

इसके बाद मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का मार्ग मिला। परमेश्वर कहता है : “अपने कर्तव्य को निभाने वाले सभी लोगों के लिए, चाहे सत्य को लेकर उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि हर मोड़ पर परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, व्यक्तिगत मंशाओं, उद्देश्यों, इज्जत और रुतबे का त्याग किया जाए और परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखा जाए—कम से कम इतना तो उन्हें करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य निभाने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए। इन चीजों को पहले स्थान पर रखना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्‍हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। इसे दो चरणों में बाँटो, थोड़ा-सा समझौता कर लो—क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इससे चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं? यदि तुम कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हें महसूस होने लगेगा कि परमेश्वर को संतुष्ट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा, यदि तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हो; अपने दायित्वों और कर्तव्य को पूरा कर सकते हो; अपनी स्वार्थी इच्छाओं, मंशाओं और उद्देश्यों को एक तरफ रख सकते हो; परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो; और परमेश्वर के घर के हितों, कलीसिया के कार्य और उस कर्तव्य को जिसे तुम्हें निभाना चाहिए, सबसे पहले रख सकते हो, तो कुछ समय तक इस तरह अनुभव करने के बाद, तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह से आचरण करना अच्छा है, लोगों को ईमानदारी और स्पष्टवादिता से जीना चाहिए और उन्हें नैतिक साहस से विहीन, घिनौना, नीच अस्तित्व नहीं जीना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार और न्यायसंगत होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि यही वह छवि है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को तुष्‍ट करने की तुम्‍हारी इच्छा घटती चली जाएगी(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए किसी को अपने व्यक्तिगत इरादों, उद्देश्यों, अभिमान और रुतबे को अलग रखना चाहिए और हर समय कलीसिया के हित आगे रखने चाहिए। इसके बाद मैंने सचेत होकर परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपना कर्तव्य निभाया और स्वार्थी और नीच बनना और सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के बारे में सोचना बंद कर दिया। एक बार लायला को वीडियो बनाते समय एक कठिनाई का सामना करना पड़ा और वह चाहती थी कि मैं देखूँ कि इसे कैसे सुलझाया जाए। मैं कुछ हद तक अनिच्छुक थी और मैंने मन ही मन सोचा, “मैंने अभी तक अपना वीडियो पूरा नहीं किया है। क्या उसकी समस्या सुलझाने में मदद करने से मेरे काम की प्रगति प्रभावित होगी? अगर मैं इसे समय पर पूरा नहीं कर पाती हूँ तो क्या दूसरे लोग कहेंगे कि मैं समूह अगुआ होने के बावजूद अक्षम हूँ?” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जी रही हूँ। मुझे परमेश्वर से की गई प्रतिज्ञा याद आई—कि मैं कलीसिया का काम समग्रता से देखूँगी और सिर्फ अपने काम से मतलब नहीं रखूँगी—और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, मैं देह के विरुद्ध विद्रोह करने, अपने हितों को दरकिनार करने और लगन से लायला की मदद करने के लिए तैयार हो गई। मैंने ध्यान से वीडियो देखा, समस्याओं को नोट किया, फिर लायला और उसके समूह से मिलने गई ताकि मौके पर मार्गदर्शन दे सकूँ। लायला ने कहा कि मेरी संगति ने उसके लिए एक रास्ता खोल दिया है और मुझे अपने दिल में बहुत शांति मिली। शुरू में मैंने सोचा था कि उनकी मदद करने से मेरा काम रुक जाएगा, लेकिन अंत में कोई देरी नहीं हुई। हमारे दोनों समूहों का काम पहले से कहीं ज्यादा कुशलता से आगे बढ़ा और एक महीने के भीतर सफलतापूर्वक पूरा हो गया। इसके बाद जब भी भाई-बहनों ने मुझसे अपनी मुश्किलों के लिए मदद माँगी तो मैंने इनकार नहीं किया। इसके बजाय मैंने अपनी पूरी क्षमता से उनकी मदद की। हालाँकि मैं चीजों की जाँच करने और सुझाव देने में ज्यादा समय और प्रयास लगा रही थी, लेकिन इस तरह से अभ्यास करने से मुझे शांति मिली।

बाद में मैंने कुछ आत्म-चिंतन किया और खुद से पूछा कि क्यों मैं अपने हितों से जुड़े मामलों में इतनी तत्पर रहती हूँ, लेकिन जब मेरे हित शामिल नहीं होते तो सहयोग के प्रति अनिच्छुक रहती हूँ। इस समस्या का सार वास्तव में क्या है? मैंने परमेश्वर के कुछ वचन देखे : “अपनी इज्जत और आत्मसम्मान की रक्षा करने के लिए और अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा करने के लिए कुछ लोग खुशी से दूसरों की मदद करते हैं और अपने दोस्तों के लिए कोई भी खतरा उठाने और कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। लेकिन जब उन्हें परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने, सत्य को कायम रखने और न्याय को कायम रखने की जरूरत होती है, तो उनकी सदिच्छा छू-मंतर हो जाती है, यह पूरी तरह से गायब हो जाती है। जब उन्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए, तो वे बिल्कुल भी अभ्यास नहीं करते। यह क्या हो रहा है? अपनी गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए वे कोई भी कीमत चुकाएँगे और कोई भी कष्ट सहेंगे। लेकिन जब उन्हें वास्तविक कार्य करने और वास्तविक मामले सँभालने होते हैं, कलीसिया के कार्य और सकारात्मक चीजों की रक्षा करनी होती है, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करने और उन्हें पोषण प्रदान करने की आवश्यकता होती है, तो कोई भी कीमत चुकाने और कोई भी कष्ट उठाने की उनकी ताकत क्यों गायब हो जाती? यह अकल्पनीय है। असल में, उनमें सत्य से विमुख रहने वाला स्वभाव होता है। मैं क्यों कहता हूँ कि वे सत्य से विमुख होते हैं? क्योंकि जब भी किसी चीज में सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर के लिए गवाही देना, शैतान की चालों से लड़ना या कलीसिया के कार्य की रक्षा करना और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की रक्षा करना शामिल होता है, तो वे भाग खड़े होते हैं और इससे दूर हो जाते हैं, किसी भी गंभीर कर्तव्य से नहीं निपटते। उनकी वीरता और पीड़ा सहने की भावना कहाँ हैं? वे इन चीजों का प्रयोग कहाँ करते हैं? यह देखना सरल है। भले ही कोई उन्हें फटकारे और कहे कि उन्हें इतना स्वार्थी और नीच नहीं होना चाहिए और खुद की रक्षा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और उन्हें कलीसिया के कार्य की रक्षा करनी चाहिए, फिर भी वे वास्तव में इसकी परवाह नहीं करते। वे अपने मन में कहते हैं, ‘मैं ये चीजें नहीं करता, और इनका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मेरी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के अनुसरण को उससे क्या फायदा होगा?’ वे सत्य का अनुसरण करने वाले लोग नहीं हैं। वे केवल प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का अनुसरण करना पसंद करते हैं, और वह काम तो बिल्कुल नहीं करते जो परमेश्वर ने उन्हें सौंपा होता है। इसलिए जब कलीसिया के कार्य में उनकी जरूरत पड़ती है तो वे बस भाग जाना चुनते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि अपने दिल में वे सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करते और सत्य में रुचि नहीं रखते। यह सत्य से विमुख होने की स्पष्ट निशानी है। जो सत्य से प्रेम करते हैं और जिनके पास सत्य वास्तविकता होती है, केवल वही लोग परमेश्वर के घर के कार्य को जरूरत पड़ने पर और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को जरूरत पड़ने पर आगे आ सकते हैं, परमेश्वर की गवाही देने और सत्य पर संगति करने के लिए साहसपूर्वक और कर्तव्यपरायणता से खड़े हो सकते हैं, उसके चुने हुए लोगों को सही मार्ग पर ला सकते हैं, जो उन्हें परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। सिर्फ यही जिम्मेदारी का रवैया है और परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने की अभिव्यक्ति है। यदि तुम लोगों में यह रवैया नहीं है, तुम बस खानापूरी करते हो और सोचते हो, ‘मैं अपने कर्तव्य के दायरे में ही चीजों को करूँगा, लेकिन मुझे किसी और चीज की परवाह नहीं है। यदि तुम मुझसे कुछ पूछोगे तो मैं तुम्हें जवाब दूँगा—बशर्ते मैं अच्छे मूड में हुआ। वरना, जवाब नहीं दूँगा। यही मेरा रवैया है,’ तो यह एक भ्रष्ट स्वभाव है, है न? केवल अपने रुतबे, अपनी प्रतिष्ठा और इज्जत की रक्षा करना और केवल अपने हित से संबंधित चीजों की रक्षा करना—क्या ऐसा करना एक न्यायोचित उद्यम की रक्षा करना है? क्या यह परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करना है? इन ओछे, स्वार्थी मंसूबों के पीछे सत्य से विमुख रहने वाला स्वभाव है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “परमेश्वर के लोगों से विकर्षित होने और उन्हें खुद से दूर रखने का कारण यह नहीं है कि उनकी काबिलियत खराब है, उनमें कुछ छोटी-मोटी खामियाँ हैं, भ्रष्ट स्वभाव हैं, या एक ऐसा सार है जो उसका प्रतिरोध करता है। परमेश्वर का ऐसा इरादा नहीं है, और न ही यह इंसान के प्रति उसका दृष्टिकोण है। परमेश्वर लोगों की खराब काबिलियत से घृणा नहीं करता, वह उनकी मूर्खता से घृणा नहीं करता और वह इस बात से भी घृणा नहीं करता कि उनके स्वभाव भ्रष्ट हैं। लोगों में वह क्या चीज है, जिससे परमेश्वर सबसे ज्यादा घृणा करता है? यही कि वे सत्य से विमुख होते हैं। अगर तुम सत्य से विमुख हो, तो केवल इसी एक कारण से, परमेश्वर कभी भी तुमसे खुश नहीं होगा। यह बात पत्थर की लकीर है। अगर तुम सत्य से विमुख हो, अगर तुम सत्य से प्रेम नहीं करते, अगर सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया परवाह न करने वाला, तिरस्कारपूर्ण और अहंकारी और मनमाना है, यहाँ तक कि विकर्षक, प्रतिरोधी और नकारपरक है—अगर तुममें यही अभिव्यक्तियाँ हैं तो परमेश्वर तुमसे नितांत विमुख है और तुम आशा के परे हो और बचाए नहीं जाओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्‍य पूरा करने के लिए सत्‍य को समझना सबसे महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते या कलीसिया के हितों की रक्षा नहीं करते, हमेशा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा करते हैं जो कुछ भी उनके हित साधता है और उन्हें दूसरों से अलग दिखाता है, उसके लिए तत्पर रहते हैं जबकि जिस चीज से उन्हें कोई लाभ नहीं मिलता उसे खारिज और नजरअंदाज कर देते हैं, वे सत्य से विमुख शैतानी स्वभाव के लोग होते हैं। इस तरह के इंसान अपने हितों से जुड़े मामलों में चाहे कितने भी मेहनती क्यों न हों, चाहे वे कितनी भी बड़ी कीमत चुकाएँ या उनके काम के नतीजे कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, उनका इरादा हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे की अपनी जरूरतें पूरा करना होता है। जब कलीसिया के हितों की बात आती है तो वे सत्य साफ समझते हुए भी उसका अभ्यास नहीं करते हैं और कलीसिया का काम कायम नहीं रखते हैं। चिंतन करने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं भी अपना कर्तव्य इसी तरह निभा रही थी। मैं प्रयास करने और कीमत चुकाने के लिए तैयार थी बशर्ते मैं दूसरों से अलग और बेहतर दिख सकूँ। मुश्किलों का सामना करने पर भी मैं अडिग रही और नतीजे पाने के लिए मैंने खुद को पूरी तरह से खपा दिया। लेकिन जैसे ही मैंने देखा कि यह काम ठीक से करने से मैं दूसरों से अलग नहीं दिख पाऊँगी या मुझे व्यक्तिगत रूप से कोई लाभ नहीं होगा तो मैंने इससे दूरी बना ली। कलीसिया के काम को नुकसान होते देखकर भी मुझे चिंता नहीं हुई। मैं सत्य से विमुख होने का शैतानी स्वभाव प्रकट कर रही थी! इतने वर्षों की अपनी आस्था और अब तक पढ़े हुए परमेश्वर के सभी वचनों से मैं धर्म-सिद्धांत के तौर पर जानती थी कि एक सृजित प्राणी के रूप में मुझे अपने कर्तव्य पूरे दिल, दिमाग और शक्ति से निभाने हैं और मुझे हर समय कलीसिया के हितों को सबसे पहले रखना है। मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती थी कि मैं उसके प्रेम का बदला चुकाने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य निभाऊँगी। लेकिन जब मुझे वास्तविक स्थिति का सामना करना पड़ा तो मैंने कलीसिया के हितों की रक्षा करने के बजाय अपनी स्वार्थी इच्छाएँ पूरी करने का चुनाव किया। मैंने हमेशा कलीसिया के हितों से पहले अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को प्राथमिकता दी। मैं कितनी बुरी हूँ! अगर मैं सत्य के प्रति विमुख होने के अपने शैतानी स्वभाव से नहीं निपटूँगी तो मेरे जीवन स्वभाव में कभी परिवर्तन नहीं आएगा, उद्धार पाना तो दूर की बात है, फिर चाहे मैं कितने ही वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करती रहूँ। यह सोचकर मुझे एहसास हुआ कि मेरा यह स्वभाव कितना घातक था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और इस भ्रष्ट स्वभाव की बेड़ियाँ उतार फेंकने में उसका मार्गदर्शन माँगा।

कुछ समय बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : “परमेश्वर के घर में, सत्य का अनुसरण करने वाले सभी लोग परमेश्वर के सामने एकजुट रहते हैं, न कि विभाजित। वे सभी एक ही साझा लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं : अपने कर्तव्य को पूरा करना, खुद को मिला हुआ कार्य अच्छे से करना, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना, परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार कार्य करना और उसके इरादों को पूरा करना। यदि तुम्हारा लक्ष्य इसके लिए नहीं है बल्कि तुम्हारे अपने लिए है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने के लिए है, तो यह एक भ्रष्ट शैतानी स्वभाव का खुलासा है। परमेश्वर के घर में लोग सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्य निभाते हैं, जबकि अविश्वासियों के कार्य उनके शैतानी स्वभावों द्वारा नियंत्रित होते हैं। ये दो बहुत अलग रास्ते हैं। अविश्वासी अपनी छिपी हुई मंशाएँ मन में पाले रहते हैं, उनमें से हर एक के अपने लक्ष्य और योजनाएँ होती हैं और हर कोई अपने हितों के लिए जीता है। यही कारण है कि वे सभी लाभ के हर अंश के लिए लड़ते हैं और एक इंच भी झुकने से इनकार करते हैं। वे विभाजित हैं, एकजुट नहीं, क्योंकि वे एक सामान्य लक्ष्य के लिए काम नहीं करते हैं। वे जो करते हैं उसके पीछे का इरादा और प्रकृति एक समान है। वे सभी अपने लिए हैं। इसमें सत्य का शासन नहीं है; इन सब में जो शासन करता है और इनका प्रभारी है, वे उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव हैं। वे अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों द्वारा नियंत्रित होते हैं और उनमें आत्म-नियंत्रण नहीं होता, इसलिए वे पाप में और गहरे डूबते जाते हैं। परमेश्वर के घर में, यदि तुम लोगों के क्रियाकलापों की प्रेरक शक्ति, प्रेरणा, सिद्धांत और तरीके अविश्वासियों के तरीकों से अलग नहीं हैं, यदि तुम भी अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभावों द्वारा बहकाए जाते हो, उनके द्वारा नियंत्रित और संचालित होते हो, यदि तुम्हारे क्रियाकलापों की प्रेरक शक्ति तुम्हारे अपने हित, प्रतिष्ठा, अहंकार और रुतबा है, तो जिस तरह से तुम लोग अपना कर्तव्य निभाते हो, वह अविश्वासियों के चीजें करने के तरीके से अलग नहीं होगा। यदि तुम लोग सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम लोगों को अपने कार्य करने के तरीके को बदलना चाहिए। तुम्हें अपने हितों और अपने व्यक्तिगत इरादों और इच्छाओं को त्याग देना चाहिए। जब तुम लोग कार्य करते हो तो तुम्हें सबसे पहले सत्य पर एक साथ संगति करनी चाहिए और आपस में अपने कार्य विभाजित करने से पहले परमेश्वर के इरादों और अपेक्षाओं को समझना चाहिए और साथ ही इस बात पर भी नजर रखनी चाहिए कि कौन किस कार्य में अच्छा है और किसमें नहीं। तुम्हें उन कार्यों को लेना चाहिए जिन्हें तुम करने में सक्षम हो और अपने कर्तव्य को दृढ़ता से निभाना चाहिए। चीजों के लिए प्रतिस्पर्धा या लड़ाई मत करो। तुम्हें संयम और सहिष्णुता का अभ्यास करना सीखना चाहिए। यदि कोई इस कर्तव्य में नया है या बस संबंधित कौशल सीखना शुरू कर रहा है और वह अभी तक कुछ कार्यों को सँभालने में सक्षम नहीं है, तो तुम्हें उन कार्यों की जिम्मेदारी लेने के लिए उसे मजबूर नहीं करना चाहिए। तुम्हें उसे ऐसे कार्य सौंपने चाहिए जो थोड़े सरल हों। इससे उसके लिए अपने कर्तव्य निर्वहन में नतीजे हासिल करना आसान हो जाता है। सहनशील, धैर्यवान और सैद्धांतिक होने का यही मतलब है। यही वो चीज है जो सामान्य मानवता में होनी चाहिए; परमेश्वर भी लोगों से इसी की अपेक्षा करता है और लोगों को भी इसी का अभ्यास करना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि कलीसिया में कर्तव्य निभाना अविश्वासियों के काम करने के तरीके से कितना अलग है। अविश्वासी दुनिया में लोग सांसारिक आचरण के शैतानी फलसफों के अनुसार व्यवहार करते हैं, जैसे “चीजों को वैसे ही चलने दो अगर वे किसी को व्यक्तिगत रूप से प्रभावित न करती हों” और “अपना काम करो, दूसरों के मामले में दखल न दो।” वे सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचते हैं और यह भी देखते हैं कि क्या तरक्की या धन पाने की संभावना है। कोई भी दूसरों की मुश्किलों के प्रति कोई दिलचस्पी या परवाह नहीं दिखाता। अपने कर्तव्य के दौरान मैं कैसे व्यवहार कर रही थी, इस पर विचार करने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं बिल्कुल एक अविश्वासी की तरह व्यवहार कर रही थी। मैं इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ थी कि लायला ने अभी-अभी अभ्यास करना शुरू किया है और उसे अपने कर्तव्य में कठिनाइयाँ आ रही हैं, लेकिन मुझे अपने काम में देरी होने और उसके आगे निकल जाने का डर था, इसलिए मैं मदद करने की अनिच्छुक थी। परिणामस्वरूप न सिर्फ वीडियो पर फिर से काम करने के कारण प्रगति में देरी हुई, बल्कि मैं एक भ्रष्ट स्वभाव के साथ भी जी रही थी, परमेश्वर मुझसे घृणा कर रहा था और अपने कर्तव्य में मुझे उसका मार्गदर्शन नहीं मिल रहा था। इससे मैं देख पाई कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, परमेश्वर हमारे दिल की गहराई की जाँच-पड़ताल करता है, परमेश्वर हमारे कर्तव्य निर्वहन में हमारे स्वार्थी इरादे बिल्कुल साफ ढंग से देखता है और अगर हम अपने कर्तव्यों में गलत इरादे रखते हैं तो हम पवित्र आत्मा का कार्य हासिल नहीं कर पाते हैं। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि कलीसिया में हम अपने खुद के मामलों को सँभालने के बजाय एक कर्तव्य निभा रहे होते हैं और हम भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर अपना निजी उद्यम नहीं चला सकते। चाहे कुछ भी हो, हमें सत्य का अभ्यास करना होगा और कलीसिया के हितों के लिए खड़ा होना होगा और अपने भाई-बहनों की परस्पर सहायता और सहयोग करना होगा, ताकि कलीसिया का काम सुचारु रूप से आगे बढ़ सके। मैंने परमेश्वर के बहुत-से वचनों के सिंचन और पोषण का आनन्द लिया था और कलीसिया ने इतने लंबे समय तक मुझे विकसित किया था। अगर मैं अभी भी अपने लिए षड्यंत्र रच रही थी, अपनी स्वार्थी इच्छाओं को पूरा कर रही थी और परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए अपने कर्तव्य ठीक से नहीं निभा पा रही थी तो वाकई मुझमें अंतरात्मा नहीं थी और परमेश्वर ने मुझे जो कुछ भी दिया है, मैं उसके लायक नहीं थी, परमेश्वर के सामने जीने के लायक होना तो दूर की बात है। इस एहसास ने मुझे पश्चात्ताप से भर दिया। मुझे अपने कर्तव्य के साथ ऐसे पेश नहीं आना चाहिए था और मुझे जल्द से जल्द खुद को बदलने की जरूरत थी। भविष्य में मुद्दों से निपटते हुए अगर यह कलीसिया का काम हुआ तो मुझे इसे कायम रखने और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने की जरूरत थी, चाहे यह मेरे दायरे में हो या न हो और मैं इससे अच्छी दिखूँ या न दिखूँ। इसके बाद मैंने निश्चय किया कि आगे से जब भी भाई-बहनों को मुश्किलों का सामना करना पड़े और मेरी मदद की जरूरत हो तो मैं कभी मना नहीं करूँगी और उन्हें उन अच्छे मार्गों के बारे में बता पाऊँगी जिनका निचोड़ मैंने स्वयं निकाला है। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाते हुए मुझे शांति और सुकून का एहसास हुआ।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें