क्या दूसरों के सौंपे गए कामों के प्रति निष्ठावान होना सही तरीका है?
यिन एन, चीनमेरे दादाजी हमारे गाँव के बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और वे हमेशा दूसरों की मदद करके खुश रहते थे। जब मैं छोटी थी तो वह और मेरी...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
बचपन से ही मेरे परिवार की कमान हमेशा पुरुषों के हाथ में रहती थी और हर चीज में मेरे पिता का फैसला ही आखिरी होता था। वह कभी घर का कोई काम नहीं करते थे; खाना पकाना, कपड़े धोना और सफाई जैसे काम मेरी माँ और बहन के थे। वह अक्सर मुझे और मेरे भाइयों को सिखाते थे कि “पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर का काम सँभालना चाहिए” और यह कि खेती करना और पैसे कमाना मर्दों का काम है, जबकि खाना पकाना और कपड़े धोना औरतों के काम हैं। मेरे पिता की कथनी-करनी के प्रभाव से मेरे सारे बड़े भाई शादी के बाद अपने-अपने घर के मुखिया बन गए और वे घर का कभी कोई काम नहीं करते थे। मैं बिल्कुल उनके जैसा बनना चाहता था क्योंकि मुझे लगता था कि किसी मर्द के पास अपना उचित अंदाज और गरिमा होने का यही एकमात्र तरीका है। जब मेरी शादी हुई तो मेरी पत्नी एक बहुत ही गुणवान और कुशल गृहिणी थी जो सारे घरेलू काम सँभालती थी। कभी-कभी तो भोजन के दौरान वह खाना सीधे मेरी थाली में परोस तक देती थी। इससे मुझे और भी ज्यादा लगने लगा कि एक मर्द होने के नाते, मुझे कपड़े धोने, सिलाई-कढ़ाई करने या बच्चों की देखभाल करने जैसे काम नहीं करने चाहिए। यह सब औरतों का काम था। अगर मैं इसे करता तो यह अपमानजनक और मेरी शान के खिलाफ होता। बाद में जब मेरी पत्नी ने बच्चे को जन्म दिया, तो मैं काम से लौटकर घर आता और देखता था कि वह बच्चे को गोद में लिए हुए खाना पकाने और घर का काम करने से जूझ रही है। मैं उसकी मदद करना चाहता था, लेकिन फिर मैं सोचता कि अगर लोगों को पता चल गया कि मुझ जैसा मर्द इस तरह का काम कर रहा है तो कितनी बेइज्जती होगी। इसलिए मैं घर के कामों में अपनी पत्नी की मदद करने के बजाय बस ताश खेलने बाहर चला जाता था। परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने के बाद मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ने में वास्तव में आनंद आता था। उसके वचनों से मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए मुझे सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करना होगा और सामान्य मानवता जीनी होगी। मैं बस दूसरों से अपनी सेवा नहीं करवा सकता था—यह बहुत ही अविवेकपूर्ण होता। उसके बाद से मैं घर के कुछ कामों में अपनी पत्नी की मदद करने लगा, खाना पकाना, सब्जी धोना और सफाई करना सीखने लगा।
जनवरी 2023 में एक दिन, अगुआ ने कहा कि एक मेजबान घर को सुरक्षा संबंधी कुछ खतरा है और वहाँ रहने वाली युवा बहनों को तुरंत वहाँ से हटाने की जरूरत है। उसने मुझसे अस्थायी तौर पर उनकी मेजबानी करने के लिए कहा और कहा कि नए साल के बाद जब कोई उपयुक्त मेजबान घर मिल जाएगा तो वे चली जाएँगी। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं एक भाई हूँ। सारा दिन रसोई के चूल्हे के आस-पास रहना—यह कितना अपमानजनक और अटपटा होगा! अगुआ ने मेरे लिए मेजबानी की व्यवस्था क्यों की? क्या वह मेरे लिए बस चीजों को मुश्किल बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है?” लेकिन फिर मैंने सोचा, “मैं बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करता आया हूँ। अगर मैं यह कर्तव्य अस्वीकार करता हूँ तो क्या अगुआ यह नहीं कहेगा कि मैं सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ? इसके अलावा मेरा घर मेजबानी के लिए काफी उपयुक्त है। और भले ही मेरी पत्नी को कलीसिया से हटा दिया गया है लेकिन वह कर्तव्य करने में मेरा समर्थन करती है और मेरे दो बच्चे भी कोई एतराज नहीं करते। युवा बहनों के लिए मेरे यहाँ नया साल बिताना बिल्कुल सही रहेगा। इसके अलावा अगुआ ने मुझे बस अस्थायी तौर पर उनकी मेजबानी करने के लिए कहा है। जैसे ही कोई उपयुक्त मेजबान घर मिल जाएगा वे चली जाएँगी।” यह सोचकर मैं मान गया। लेकिन जब मेजबानी करने का समय आया, तो “पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर का काम सँभालना चाहिए” वाली सोच फिर से उभर आई। चूँकि मेरी पत्नी नाश्ते की दुकान पर काम करती थी, इसलिए मैं ही घर पर हर दिन नाश्ता और दोपहर का खाना बनाता था। मेरी पत्नी ने मुझे बहुत बार याद दिलाया, “खाना पकाते समय तुम्हें एप्रन और बाजुओं के कवर पहनने चाहिए, वरना तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएँगे और धोने में मुश्किल होगी।” मैं मुँहजुबानी मान जाता था, लेकिन मैंने एक बार भी ऐसा नहीं किया। मुझे लगता था, “वह चाहती है कि मैं बाजुओं के कवर और एप्रन पहनूँ? मैं कैसा दिखूँगा? मैं एक बूढ़ी गृहिणी जैसा लगूँगा! अगर बहनों ने मुझे ऐसे देख लिया, तो यह कितना शर्मनाक होगा? खाना पकाना और धोना तो ऐसे काम हैं जो बहनों को करने चाहिए, भाइयों को नहीं। अगर भाई-बहनों को पता चला कि मैं मेजबानी कर रहा हूँ तो वे निश्चित रूप से मुझे नीची नजर से देखेंगे। मैं यकीन नहीं कर सकता कि मैं, एक भाई जो पाठ आधारित कार्य करता हूँ, अब एक पेशेवर रसोइया बन गया हूँ!” कुछ समय बाद अगुआ ने यह व्यवस्था की कि एक और युवा बहन मेरे घर में रहेगी और ऐसा लगा कि बहनों का यहाँ से जाने का कतई कोई इरादा नहीं है। मैंने मन ही मन सोचा, “क्या उन्होंने यह नहीं कहा था कि वे नए साल के बाद चली जाएँगी? मेरे घर में और लोगों को क्यों जोड़ा जा रहा है? यह रोजाना खाना पकाना कितना अपमानजनक है। यह सब कब खत्म होगा?” मैं नकारात्मकता में घुटने लगा और मैंने खाना पकाने में दिल लगाना बंद कर दिया और मैं लापरवाह हो गया। जो चावल मैं बनाता वह या तो बहुत सख्त होता या बहुत गीला और जो सब्जियाँ मैं बनाता वे या तो बहुत नमकीन होतीं या बिल्कुल फीकी। लेकिन मैंने बिल्कुल भी आत्मचिंतन नहीं किया; मुझे यहाँ तक लगा कि बस खाना मेज पर रख देना ही काफी है। बाद में वे मुझे यह कहकर अपनी राय देने लगीं कि मेरे बनाए नूडल्स अधपके रह जाते थे और ठंडी सब्जियों में नमक के रवे घुले हुए नहीं होते थे। यह सुनकर मुझे और भी बुरा लगता था। “मुझ जैसे मर्द के लिए सारा दिन तुम्हारे लिए खाना पकाना ही काफी अपमानजनक है और अब तुम हर चीज में कमी निकाल रही हो? यह बर्दाश्त से बाहर है!” मेरे दिल में मैं बस यही चाहता था कि वे जल्दी चली जाएँ। बाद में मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत थी इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मेरी समस्याओं को समझने में मेरा मार्गदर्शन करे।
उस समय मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना :
मूल इंसान आत्मा युक्त सजीव प्राणी थे
1 आरंभ में मैंने मानवजाति का सृजन किया; अर्थात् मैंने मानवजाति के पूर्वज, आदम का सृजन किया। वह रूप और छवि से संपन्न, जीवन शक्ति से भरपूर, जोश से भरपूर था और इससे भी बढ़कर, वह मेरी महिमा के साहचर्य में था। वह महिमामय दिन था, जब मैंने मनुष्य का सृजन किया। इसके बाद आदम के शरीर से हव्वा उत्पन्न हुई, वह भी मनुष्य की पूर्वज थी। इस प्रकार जिन लोगों का मैंने सृजन किया था, वे मेरे श्वास से भरे थे और मेरी महिमा से भरपूर थे।
2 आदम मूल रूप से मेरे हाथ से “पैदा हुआ” और वह मेरी छवि का प्रतिनिधित्व था। इसलिए “आदम” का मूल अर्थ था मेरे द्वारा सृजित किया गया प्राणी, जो मेरी जीवन-ऊर्जा से भरा हुआ, मेरी महिमा से भरा हुआ, रूप और छवि से युक्त, आत्मा और श्वास से युक्त है। आत्मा से संपन्न वह एकमात्र सृजित प्राणी था, जो मेरा प्रतिनिधित्व करने और मेरी छवि धारण करने में सक्षम था, जिसने मेरा श्वास प्राप्त किया।
3 आरंभ में, हव्वा दूसरी ऐसी इंसान थी जो श्वास से संपन्न थी, जिसका सृजन मैंने नियत किया था, इसलिए “हव्वा” का मूल अर्थ था, ऐसा सृजित प्राणी जो मेरी महिमा जारी रखेगा, जो मेरी जीवन शक्ति से भरा हुआ है और इससे भी बढ़कर, मेरी महिमा से संपन्न है। हव्वा आदम से आई, इसलिए उसने भी मेरा रूप धारण किया, क्योंकि वह मेरी छवि में सृजित की जाने वाली दूसरी इंसान थी। “हव्वा” का मूल अर्थ था आत्मा, देह और हड्डियों से युक्त जीवित मनुष्य, मेरी दूसरी गवाही और साथ ही मानवजाति के बीच मेरी दूसरी छवि। वे मानवजाति के पूर्वज थे, मानवजाति में बहुमूल्य और शुद्ध मनुष्य थे और मूल रूप से आत्माओं से संपन्न जीवित प्राणी थे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है
बोलों पर विचार करते हुए मुझे एहसास हुआ कि जब परमेश्वर ने प्रारंभ में मानवजाति—आदम और हव्वा—को बनाया तो उसने कभी नहीं कहा कि पुरुष महिलाओं से ज्यादा श्रेष्ठ हैं या महिलाओं का दर्जा पुरुषों से कम है। परमेश्वर की नजरों में पुरुष और महिलाएँ समान हैं। परमेश्वर के घर में भी बिल्कुल ऐसा ही है। व्यक्ति चाहे कोई भी कर्तव्य निभाता हो, परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि कुछ कर्तव्य भाइयों द्वारा किए जाने चाहिए और अन्य केवल बहनों द्वारा। लेकिन मैं बचपन से ही अपने पिता की कथनी-करनी द्वारा प्रशिक्षित था और मैं पुरुषवादी विचारों के अनुसार जीता था। मैं हमेशा महिलाओं को कमतर समझता था और खाना पकाने और धोने जैसे कामों को नीची नजर से देखता था, सोचता था कि ये सब औरतों के काम हैं। यही वजह थी कि मैं अपने मेजबानी के कर्तव्य के प्रति इतना प्रतिरोधी था और जब मैं इसे करता भी था तो मैं बस लापरवाह होता था। जो कुछ भी मैं सोचता और करता था वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं होता था। यह एहसास होने पर मैं समर्पण करने और लगन से अपना मेजबानी का कर्तव्य निभाने के लिए तैयार हो गया। उसके बाद जब मैं नूडल्स बनाता तो मैं उन्हें थोड़ा और उबालता और मैं सब्जियों को पहले ही मसाले लगाकर तैयार कर लेता था। मैं अपने बनाए पकवानों में विभिन्नता लाने के बारे में भी सोचने लगा। जब मैंने कुछ युवा बहनों को बीमार और खाँसते हुए देखा तो उनके लिए नाशपाती और मिश्री का शोरबा बनाया। जैसे ही मैं बदलने लगा, वे अप्रत्याशित रूप से दूसरी जगह चली गईं।
उनके जाने के बाद मैं अक्सर सोचता था, “मेजबानी के समय मैंने इतना प्रतिरोध क्यों प्रकट किया?” बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े जिन्होंने पुरुषवादी मुद्दे को उजागर कर दिया और मुझे अपने बारे में कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कई पुरुष सोचते हैं, ‘कपड़े धोने और सिलने जैसे घरेलू काम सब महिलाओं को ही करने चाहिए। जब भी मैं ये काम करता हूँ, तो मैं चिढ़ जाता हूँ और मुझे लगता है कि मेरा पौरुष कम हो गया है।’ ... कुछ पुरुषों में ये पुरुषवादी विचार होते हैं; वे बच्चों की देखभाल करने, कपड़े धोने, खाना पकाने और सफाई करने जैसे घरेलू कामों का तिरस्कार करते हैं और ये काम करने को अनिच्छुक होते हैं। अगर वे उन्हें करते भी हैं, तो वे कुछ हद तक बेमन से करते हैं, इस डर से कि दूसरे उन्हें नीची नजर से देख सकते हैं। वे सोचते हैं, ‘यदि मैं हमेशा ये काम करता रहूँ, तो मुझमें और एक महिला में क्या अंतर रह जाएगा?’ क्या उनकी सोच में समस्या नहीं है? (हाँ।) ... कुछ क्षेत्रों के लोग विशेष रूप से पुरुषवादी होते हैं—यह निर्विवाद रूप से उनके परिवारों की शिक्षा और प्रभाव का नतीजा है। तो क्या इस शिक्षा ने तुम्हें नुकसान पहुँचाया है या फायदा पहुँचाया है? (इसने मुझे नुकसान पहुँचाया है।) यह लोगों के लिए बहुत हानिकारक रहा है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (14))। “उदाहरण के लिए, मान लो तुम एक भाई हो और तुमसे हर दिन दूसरे भाई-बहनों के लिए भोजन बनाने और बर्तन धोने के लिए कहा जाता है। क्या तुम समर्पण कर पाओगे? (मुझे लगता है कर पाऊँगा।) शायद तुम थोड़े समय के लिए तो कर पाओ, लेकिन अगर तुमसे यह कर्तव्य लंबे समय तक निभाने के लिए कहा जाए तो क्या तुम समर्पण कर पाओगे? (अगर मुझे यह कर्तव्य कभी-कभी ही करना पड़े तो मैं समर्पण कर पाऊँगा। अगर यह लंबे समय के लिए हो तो शायद मैं समर्पण न कर पाऊँ।) यह दिखाता है कि तुममें कोई समर्पण नहीं है। किस कारण लोगों में कोई समर्पण नहीं होता है? (यह लोगों के अपने दिलों में पारंपरिक धारणाएँ पालने के कारण होता है। वे सोचते हैं कि पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घरेलू काम सँभालना चाहिए, कि खाना बनाना एक महिला का काम है और खाना बनाने से एक भाई की इज्जत चली जाती है। इसीलिए समर्पण करना आसान नहीं होगा।) सही कहा। जब श्रम के बँटवारे की बात आती है तो लोग लैंगिक भेदभाव के फेर में पड़ जाते हैं। पुरुष सोचते हैं, ‘हम पुरुषों को बाहर जाकर रोजी-रोटी कमानी चाहिए। खाना पकाने और सफाई जैसे काम-काज महिलाओं को करने चाहिए। हमसे यह नहीं करवाया जाना चाहिए।’ लेकिन अब ये विशेष परिस्थितियाँ हैं और तुमसे यह करने के लिए कहा जा रहा है तो तुम क्या करते हो? समर्पण करने में सक्षम होने के लिए तुम्हें किन कठिनाइयों का समाधान करना होगा? यही मसले का अहम बिंदु है। तुम्हें अपने लैंगिक भेदभाव पर काबू पाना होगा। ऐसा कोई काम नहीं है जो पुरुषों को ही करना चाहिए और न ही ऐसा कोई काम है जो महिलाओं को ही करना चाहिए। पहली बात तो यह है, श्रम का इस तरह से बँटवारा मत करो। कोई व्यक्ति कौन-सा कर्तव्य निभाता है यह उसके लिंग के अनुसार निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अभ्यास जीवन प्रवेश प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी दशा को सटीक रूप से उजागर किया। मैंने सोचा कि कैसे बचपन से ही पिता की कथनी-करनी और अपने पारिवारिक पालन-पोषण से प्रभावित होकर मैंने हमेशा यही माना था कि “पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं” और “पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर का काम सँभालना चाहिए।” मुझे लगता था कि कपड़े धोना, खाना पकाना और सफाई करना जैसे घर के काम औरतों के हैं, जबकि मर्दों को बस खेती करनी चाहिए या पैसे कमाने के लिए काम करना चाहिए। मैं मानता था कि पुरुष का दर्जा महिला से ऊँचा होता है इसलिए उनकी पत्नियों को स्वाभाविक रूप से उनकी सेवा करनी चाहिए और अगर कोई मर्द घर का काम करता है तो यह अपमानजनक है और उसे नीची नजर से देखा जाएगा। इसलिए परमेश्वर में विश्वास करने से पहले मैंने कभी घर का कोई काम नहीं किया। जब मैं अपनी पत्नी को बच्चे को गोद में लिए इधर-उधर भागकर काम करते हुए देखता, तो मुझे बुरा लगता और मैं मदद करना चाहता था, लेकिन फिर मुझे याद आता कि मुझ जैसे मर्द को एक असली मर्द का निश्चित अंदाज और गरिमा बनाए रखनी चाहिए। मैं सोचता था कि अगर दूसरों ने मुझे औरतों वाला काम करते देख लिया तो मेरी कितनी बेइज्जती होगी, इसलिए मैं उसके कामों में मदद करने के बजाय ताश खेलने और मजे करने बाहर चला जाता था। उन सारे सालों में मेरी पत्नी मौन होकर पीड़ा सहती रही, एक थकाऊ और कड़वा जीवन जीती रही। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चूँकि मैं पुरुषवादी विचारों से इतना प्रभावित था, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण नहीं कर सका। जब अगुआ ने यह व्यवस्था की कि मैं अस्थायी तौर पर बहनों की मेजबानी करूँ तो मैंने घर के काम को औरत का काम समझा और महसूस किया कि एक भाई के रूप में मेजबानी का कर्तव्य करना अपमानजनक और मेरी शान के खिलाफ है। अपनी मर्दाना छवि की सुरक्षा के लिए मैं खाना पकाते समय एप्रन या बाजुओं के कवर पहनने की हिम्मत भी नहीं करता था, मैं डरता था कि बहनें मुझे नीची नजर से देखेंगी। अपने भीतरी प्रतिरोध के कारण मैं अपने कर्तव्य में लापरवाह था; मैं ठीक ढंग से नूडल्स तक नहीं पका पाता था और ठंडी सब्जियों में नमक तक नहीं घुलता था। जब बहनों ने मुझे सुझाव दिए, तो मुझे लगा कि वे बहुत ज्यादा माँग कर रही हैं और मैं बस यही चाहता था कि वे जल्द से जल्द चली जाएँ। मैंने देखा कि इन पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों के अनुसार जीने से, अपनी तथाकथित मर्दाना गरिमा और दर्जे की रक्षा करने के लिए, मैं बेहद स्वार्थी और रूखा हो गया था, मुझमें जरा भी सामान्य मानवता नहीं थी। मेरे अंदर अपने कर्तव्य के प्रति जरा भी समर्पण या निष्ठा नहीं थी। यह एहसास होने पर मैंने प्रार्थना की, परमेश्वर से विनती की कि वह मुझे मार्गदर्शन दे ताकि मैं सत्य को समझूँ और अपने पुरुषवादी विचारों के बंधन और बाधाओं से मुक्त हो जाऊँ।
उसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या पुरुषों और महिलाओं की सामाजिक जिम्मेदारियों में अंतर किया जाना चाहिए? क्या पुरुषों और महिलाओं का सामाजिक दर्जा समान होना चाहिए? क्या पुरुषों का दर्जा अनावश्यक रूप से ऊँचा उठाना और महिलाओं को कमतर आँकना उचित है? (नहीं, यह अनुचित है।) तो फिर, पुरुषों और महिलाओं के सामाजिक दर्जे के साथ वास्तव में किस तरह पेश आएँ कि यह निष्पक्ष और विवेकसंगत हो? इसके क्या सिद्धांत हैं? (यह कि पुरुष और महिलाएँ समान हैं और उनके साथ निष्पक्ष ढंग से पेश आना चाहिए।) निष्पक्ष व्यवहार सैद्धांतिक आधार है, लेकिन इसे इस तरह से अभ्यास में कैसे लाया जाए जो निष्पक्षता और विवेकसंगतता को दर्शाता हो? क्या इसका संबंध वास्तविक समस्याओं से नहीं है? सबसे पहले, हमें यह निर्धारित करना होगा कि पुरुषों और महिलाओं का दर्जा समान है—यह निर्विवाद है। इसलिए, पुरुषों और महिलाओं के बीच श्रम का सामाजिक विभाजन भी एक जैसा होना चाहिए, और उन्हें उनकी काबिलियत और कार्यक्षमता के अनुसार देखा और व्यवस्थित किया जाना चाहिए। खास तौर पर जब मानव अधिकारों की बात आती है तो समानता होनी चाहिए, महिलाओं को भी उन चीजों का लाभ मिलना चाहिए जिनका पुरुष आनंद ले सकते हैं; केवल इसी तरीके से समाज में पुरुषों और महिलाओं का एक समान दर्जा सुनिश्चित हो सकता है। चाहे महिला हो या पुरुष, जो कोई भी काम कर सकता है या जो अगुआ बनने में सक्षम है, उसे यह करने दिया जाना चाहिए। इस सिद्धांत के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है? (अच्छा है।) यह पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम दमकलकर्मियों की भर्ती कर रहे हो और आवेदकों में पुरुष और महिलाएँ दोनों शामिल हैं। तुम्हें किसे काम पर रखना चाहिए? निष्पक्ष व्यवहार एक सैद्धांतिक आधार और सिद्धांत है, लेकिन तुम्हें इसे विशिष्ट रूप से कैसे लागू करना चाहिए? मैंने अभी कहा था कि अपनी काबिलियत और क्षमता के आधार पर जो कोई भी काम करने में सक्षम है, उसे चुना जाना चाहिए। तुम्हें इसी सिद्धांत के अनुसार चुनना चाहिए कि किसे काम पर रखना है। देखो कि किन आवेदकों की काबिलियत अच्छी है, कौन मानसिक रूप से चुस्त और तेज दिमाग वाले हैं, और आपात स्थिति में तेजी से काम कर सकते हैं। फिर, हर व्यक्ति की विभिन्न विशेषताओं, जैसे कि उनकी कार्यक्षमता, अनुभव और दमकल कार्य के संबंध में सक्षमता के स्तर का पता लगाकर, तुम अंततः एक उचित निर्णय पर पहुँच सकते हो। हो सकता है कि जिन आवेदकों को तुम चुनो, उनमें न केवल पुरुष बल्कि महिलाएँ भी शामिल हों। हो सकता है कि पुरुष लंबे-चौड़े और मजबूत हों, उन्हें दमकल कार्य का अनुभव हो और वे कई दमकल और बचाव अभियानों में शामिल रहे हों। वहीं, महिलाएँ चुस्त हों, उन्होंने कठोर प्रशिक्षण लिया हो, वे दमकल कार्य के बुनियादी ज्ञान और कार्य प्रक्रियाओं की अच्छी जानकारी रखती हों, और उन्होंने अपने पिछले काम में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया हो। अगर ऐसा है, तो चुने गए सभी आवेदक काफी उपयुक्त हैं। इसे किसी भी पक्ष के प्रति पक्षपाती हुए बिना, सर्वश्रेष्ठ में से सर्वश्रेष्ठ को चुनना कहा जाता है। ... सबसे पहले, किसी मामले को सँभालते समय, तुम्हारे मन में पुरुषों या महिलाओं के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं है। तुम मानते हो कि बहुत-सी उत्कृष्ट और प्रतिभाशाली महिलाएँ भी हैं और तुम ऐसी काफी महिलाओं को जानते हो। इसलिए, तुम्हारी अंतर्दृष्टि तुम्हें यकीन दिलाती है कि महिलाओं की कार्य क्षमता पुरुषों की तुलना में कमतर नहीं है और समाज में महिलाओं की अहमियत भी पुरुषों की तुलना में कम नहीं है। जब तुम्हारे पास यह अंतर्दृष्टि और समझ आ जाएगी, तो तुम भविष्य में कोई भी काम करते समय इस तथ्य के आधार पर सटीक निर्णय लोगे और सही विकल्प चुनोगे। दूसरे शब्दों में, यदि तुम किसी भी पक्ष के प्रति पक्षपात नहीं करते और कोई लैंगिक पूर्वाग्रह नहीं रखते हो, तो इस संबंध में तुम्हारी मानवता अपेक्षाकृत सामान्य होगी, और तुम निष्पक्ष तरीके से काम कर सकोगे। पारंपरिक संस्कृति में पुरुषों के महिलाओं से श्रेष्ठ माने जाने की बाधाएँ तुमसे हट जाएंगी; तुम्हारे विचार अब सीमित नहीं रहेंगे और तुम पारंपरिक संस्कृति के इस पहलू से प्रभावित नहीं होगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (11))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे बहुत स्पष्टता महसूस हुई और मैं समझ गया कि “पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं” और “पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर का काम सँभालना चाहिए” जैसे पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों की बेड़ियों से आजाद होने के लिए, मुझे पहले इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि पुरुष और महिलाएँ समान हैं। पुरुषों को महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए, उन्हें कमतर समझना या उन पर जुल्म करना तो दूर की बात है। यह अनैतिक है और मानवता रहित है। पुरुषों को महिलाओं के साथ उचित रूप से पेश आना चाहिए और घरेलू काम को इस रूप में नहीं देखना चाहिए कि यह स्वाभाविक तौर पर औरतों का काम है, न ही रुतबा दिलाने वाली ऊँची नौकरियों को मर्दों के कार्य के रूप में देखना चाहिए। इस तरह का नजरिया शैतान के पाखंड और भ्रांतियों में से एक है और यह पूरी तरह से सत्य के खिलाफ जाता है। परमेश्वर के घर में ऐसा कोई नियम नहीं है जो यह बताता हो कि कौन-से कर्तव्य भाइयों द्वारा किए जाने चाहिए और कौन-से बहनों द्वारा। परमेश्वर के घर में कर्तव्यों की व्यवस्था कभी भी लिंग के आधार पर नहीं की जाती है, बल्कि हर व्यक्ति की काबिलियत, खूबियों, कार्य-क्षमता और कलीसिया के कार्य की जरूरतों के आधार पर विवेकपूर्ण ढंग से की जाती है। उदाहरण के लिए, अगुआ ने मेरे लिए मेजबानी के कर्तव्य की व्यवस्था इसलिए की कि जिस मेजबान घर में बहनें रह रही थीं वहाँ सुरक्षा का खतरा था और तुरंत कोई सुरक्षित घर नहीं मिल पाया था। दूसरी ओर, मेरा घर उपयुक्त था और मेरी पत्नी और बच्चे कर्तव्य निभाने में मेरा समर्थन करते थे। एक ओर, अगुआ की व्यवस्था ने बहनों को सुरक्षित रखा और दूसरी ओर, इसने उन्हें सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने दिया, यह सुनिश्चित किया कि कलीसिया का कार्य प्रभावित न हो। उनकी मेजबानी करके मैं भी कलीसिया के कार्य को कायम रख रहा था और अपना कर्तव्य निभा रहा था। मुझे इस व्यवस्था को स्वीकार कर लेना चाहिए था और समर्पण करना चाहिए था, “पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं” और “पुरुषों को घर के बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर का काम सँभालना चाहिए” के भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को त्याग देना चाहिए था और अपना मेजबानी का कर्तव्य परमेश्वर के वचनों के अनुसार अच्छे ढंग से निभाना चाहिए था।
बाद में मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और सीखा कि कैसे अपने कर्तव्य के साथ पेश आने का उचित रवैया अपनाना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हारा चाहे जो भी कर्तव्य हो, उसमें ऊँचे और नीचे के बीच भेद न करो। मान लो तुम कहते हो, ‘हालाँकि यह काम परमेश्वर का आदेश और परमेश्वर के घर का कार्य है, पर यदि मैं इसे करूँगा, तो लोग मुझे नीची निगाह से देख सकते हैं। दूसरों को ऐसा काम मिलता है, जो उन्हें विशिष्ट बनाता है। मुझे यह काम दिया गया है, जो मुझे विशिष्ट नहीं बनाता, बल्कि परदे के पीछे मुझसे कड़ी मेहनत करवाता है, यह अनुचित है! मैं यह कर्तव्य नहीं करूँगा। मेरा कर्तव्य वह होना चाहिए, जो मुझे दूसरों के बीच खास बनाए और मुझे प्रसिद्धि दे—और अगर प्रसिद्धि न दे या खास न बनाए, तो भी मुझे इससे लाभ होना चाहिए और शारीरिक आराम मिलना चाहिए।’ क्या यह कोई स्वीकार्य रवैया है? मनमर्जी से चुनना परमेश्वर से आई चीजों को स्वीकार करना नहीं है; यह अपनी पसंद के अनुसार विकल्प चुनना है। यह अपने कर्तव्य को स्वीकारना नहीं है; यह अपने कर्तव्य से इनकार करना है, यह परमेश्वर के खिलाफ तुम्हारी विद्रोहशीलता की अभिव्यक्ति है। इस तरह मनमर्जी से चुनने में तुम्हारी निजी पसंद और इच्छाओं की मिलावट होती है। जब तुम अपने अभिमान और रुतबे, अपने हितों और ऐसी अन्य चीजों पर विचार करते हो, तो अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया समर्पण का नहीं होता। अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया कैसा होना चाहिए? सबसे पहले, तुम्हें यह विश्लेषण नहीं करना चाहिए कि यह काम किसने सौंपा है; इसके बजाय, तुम्हें इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकारना चाहिए—यह परमेश्वर का आदेश है, यह तुम्हारा कर्तव्य है, तुम्हें परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए और अपना कर्तव्य स्वीकारना चाहिए। दूसरा, ऊँच-नीच का भेद-भाव मत करो और इस बात की चिंता मत करो कि कर्तव्य की प्रकृति क्या है, चाहे वह तुम्हें अलग दिखाता हो या नहीं, चाहे वह सार्वजनिक रूप से किया जाना हो या पर्दे के पीछे। इन बातों पर विचार मत करो। इस रवैये का एक और पहलू भी है : समर्पण और सक्रिय सहयोग” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने कर्तव्य का मानक स्तर का निर्वहन क्या है?)। “उदाहरण के लिए, मान लो कि भाई-बहनों के लिए खाना पकाना तुम्हारी जिम्मेदारी है और वही तुम्हारा कर्तव्य है। तुम्हें इस काम के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए? (हमें सत्य सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिए।) तुम सत्य सिद्धांतों की तलाश कैसे करते हो? इसमें वास्तविकता और सत्य शामिल हैं। तुम्हें यह सोचना चाहिए कि सत्य को अभ्यास में कैसे लाया जाए और इस कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे निभाया जाए। इसमें सत्य के कौन-से पहलू शामिल हैं? पहला कदम यह है कि तुम्हें सबसे पहले यह जानना चाहिए, ‘मैं अपने लिए खाना नहीं बना रहा हूँ। यह मेरा कर्तव्य है।’ इसमें दर्शन का पहलू शामिल है। दूसरे कदम के बारे में क्या? (हमें यह सोचना चाहिए कि खाना अच्छी तरह से कैसे बनाया जाए।) अच्छी तरह से खाना बनाने का मानक क्या है? (हमें परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश करनी चाहिए।) यह सही है। केवल परमेश्वर की अपेक्षाएँ ही सत्य, मानक और सिद्धांत हैं। परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार काम करो—यह सत्य का एक पहलू है। तुम्हें सबसे पहले सत्य के इस पहलू के बारे में सोचना चाहिए और फिर विचार करना चाहिए, ‘परमेश्वर ने मुझे यह कर्तव्य निभाने के लिए दिया है। परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक क्या है?’ तुम्हारे पास सबसे पहले यह आधार होना चाहिए। तो फिर, परमेश्वर के मानक को पूरा करने के लिए तुम्हें कैसे काम करना चाहिए? तुम जो खाना बनाते हो वह स्वस्थ, स्वादिष्ट, स्वच्छ होना चाहिए और शरीर के लिए हानिकारक नहीं होना चाहिए—ये इसमें शामिल विवरण हैं। जब तक तुम इस सिद्धांत के अनुसार काम करते हो, तुम जो खाना बनाते हो वह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार बनेगा। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि तुमने इस कर्तव्य के सिद्धांतों की तलाश की और तुम्हारे क्रियाकलाप परमेश्वर द्वारा निर्धारित दायरे से बाहर नहीं गए। जिस तरह से तुमने काम किया वह सही था। तुमने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया और तुमने इसे इस तरह से निभाया जो मानक स्तर का है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य सिद्धांत खोजकर ही कोई अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकता है)। परमेश्वर के घर में किसी भी कर्तव्य की व्यवस्था व्यक्ति के लिंग के आधार पर नहीं की जाती है और कोई भी कर्तव्य श्रेष्ठ या नीच नहीं होता है। अपने कर्तव्य के प्रति सही रवैया यह है कि इसे परमेश्वर से स्वीकार किया जाए और समर्पण किया जाए। चाहे कोई भी इसकी व्यवस्था करे या चाहे तुम चर्चा में रहो या न रहो, तुम्हें अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाने के लिए सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए। अभ्यास करने का यही सही तरीका है और यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। जब अगुआ ने मेरे लिए मेजबानी के कर्तव्य की व्यवस्था की तो मुझे नीची नजर से देखे जाने की चिंता नहीं करनी चाहिए थी, बल्कि इसके बजाय मुझे सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए थे और अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभाने की भरसक कोशिश करनी चाहिए थी। सबसे पहले मुझे बहनों के लिए सुरक्षित माहौल बनाए रखने के लिए वह सब करना था जो मैं कर सकता था। साथ ही मुझे घर साफ रखना था और खाना पकाते समय मुझे सोचना था कि खाना पौष्टिक और सेहतमंद कैसे बनाया जाए। मेजबानी का कर्तव्य निभाने से एक ओर मेरा पुरुषवादी भ्रामक दृष्टिकोण दुरुस्त हो गया, जिससे मैं अब महिलाओं को “पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं” के पारंपरिक नजरिए से नहीं देखता। दूसरी तरफ इससे मेरे जीवन कौशल में भी सुधार हुआ। मैं अब सब्जियाँ धोने और काटने में काफी माहिर हो गया हूँ और घर पर आमतौर पर मैं ही खाना पकाता और सफाई करता हूँ। मुझे याद है एक बार दोपहर के खाने के समय मेरी पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तुम्हारे लिए खाना पकाया करती थी लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि अब ठीक इसके उलट होगा।” मेरे बच्चों ने भी कहा कि मैं बदल गया हूँ। कभी-कभी कुछ बहनें अपने धर्मोपदेशों पर चर्चा करने के लिए मेरे घर आती हैं और ज्यादातर समय मैं ही खाना बनाता हूँ। मुझे अब बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगता है कि यह अपमानजनक या शर्मनाक है। बहनें यहाँ तक कहती हैं कि मेरी बनाई मछली बहुत स्वादिष्ट होती है। इन पारंपरिक पुरुषवादी विचारों से मुक्त हो पाना और थोड़ी-सी सामान्य मानवता को जी पाना, यह सब परमेश्वर के वचनों के जरिए हासिल नतीजा है। परमेश्वर का धन्यवाद!
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