सहयोग से सीखना
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि तुम समुचित ढंग से अपने कर्तव्यों का निर्वहन और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना चाहते हो, तो तुम्हें...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
जब मैं पचास साल की थी, मैंने परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं अपने जीवनकाल में परमेश्वर के व्यक्तिगत कथन सुनूँगी और प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करूँगी। स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की आशा देखकर मुझे जीवन का एक सार्थक उद्देश्य मिला। हर दिन मैं सुबह जल्दी उठती, देर रात तक परमेश्वर के वचन पढ़ती, कलीसिया द्वारा सौंपे गए किसी भी कर्तव्य को स्वीकारती और उसके प्रति समर्पित रहती थी। मैंने सोचा : “जब तक मैं अपने कर्तव्य में लगी रहूँगी, मैं बचा ली जाऊँगी और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करूँगी।” 2023 में मैं 75 साल की हो गई थी। मैं बूढ़ी हो चली थी, मेरी याददाश्त भी कमजोर हो गई थी, ऊँचा सुनने लगी थी, नजर भी धुँधली हो गई थी और अब मैं ठीक से चल भी नहीं पाती थी। कलीसिया ने मेरी स्थिति के अनुसार मेरे लिए मेजबानी की व्यवस्था की। मैं सोचने लगी कि मैं बूढ़ी हो रही हूँ और मेरी सेहत भी बिगड़ रही है। अपनी कमजोर याददाश्त के कारण मैं चीजें भूलती रहती थी और कभी-कभी मेरी यादें उलझ जाती थीं। अगले कुछ सालों में अगर मैं सठिया गई और अपना कर्तव्य नहीं कर पाई, तो क्या मैं एक बेकार इंसान नहीं बन जाऊँगी? क्या मैं तब भी बचाई जा सकती हूँ? एक बार मैं नए घर में आई ही थी और वापस आने का रास्ता भटक गई। यह जानने के बाद एक बहन ने यूँ ही कह दिया, “क्या तुम भ्रमित हो रही हो?” मैंने जल्दी से कहा, “मैं भ्रमित नहीं हूँ।” मैंने सोचा : “कहीं वे यह न सोचें कि मैं भ्रमित हो रही हूँ और मुझे मेरा कर्तव्य करने से रोक दें। अगर मेरे पास करने के लिए कोई कर्तव्य नहीं होगा तो क्या यह मेरा अंत नहीं होगा? तब मैं कैसे बचाई जा सकती हूँ?” लेकिन बाद में सोचने पर, मुझे एहसास हुआ कि मैं अक्सर खाना बनाते समय नमक या हरी प्याज डालना भूल जाती थी और कभी-कभी मैं सड़क पर रास्ता भटक जाती थी और घर वापस नहीं आ पाती थी। मुझे डर लगने लगा। मैंने सोचा : “क्या मैं सच में भ्रमित हो रही हूँ? क्या कलीसिया अभी भी मुझसे कोई कर्तव्य करवा सकती है? अगर मैं कोई कर्तव्य न कर पाऊँ तो क्या फिर भी बचाई जा सकती हूँ?” मैं चिंता और बेचैनी में डूबने लगी।
जून 2023 में मैंने भाई-बहनों के लिए एक सभा की मेजबानी की। उस समय ऊपर वाले फ्लैट में मरम्मत का काम चल रहा था और हर दिन लगातार ठोकने-पीटने की आवाज आती थी। उसके बाद मैंने काफी समय तक भाई-बहनों को सभाओं में आते नहीं देखा और मैं हैरान थी, “आजकल वे आ क्यों नहीं रहे हैं? क्या वे अब मुझसे मेजबानी नहीं करवा रहे हैं? इस उम्र में तो मैं सिर्फ मेजबानी का कर्तव्य ही कर सकती हूँ। अगर मैं मेजबानी का कर्तव्य भी नहीं कर सकती तो क्या मैं बचाए जाने का मौका खो नहीं दूँगी?” मैं बहुत बेचैन थी और बेसब्री से उनके दोबारा आने की उम्मीद कर रही थी। एक शाम एक बहन ने दरवाजा खटखटाया और मेरी बहू ने दरवाजा खोला। बहन ने कहा कि वे तीन-चार बार आए थे लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा, “क्या ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैं बूढ़ी हूँ और ऊँचा सुनती हूँ, इसलिए मैंने उन्हें नहीं सुना? मैंने अपना कर्तव्य अच्छे से पूरा नहीं किया है। अब मैं ऊँचा सुनती हूँ, मेरी नजर धुँधली है, मैं प्रतिक्रिया देने में धीमी हूँ और मेरे पैर भी ठीक से नहीं पड़ते। मैं सच में कुछ भी ठीक से नहीं कर सकती! मैं मेजबानी का कर्तव्य भी ठीक से नहीं कर सकती! बुढ़ापा सच में तुम्हें बेकार बना देता है!” मुझे जवानों से बहुत ईर्ष्या होती थी कि वे कितनी जल्दी सीख जाते हैं और कोई भी कर्तव्य कर सकते हैं। मुझे लगा कि परमेश्वर जवानों को पसंद करता है और वे अंत में निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे। मैंने सोचा कि काश मैं दस साल पीछे भी जा पाती तो मैं साठ के दशक में भी कुछ कर्तव्य तो कर पाती। धीरे-धीरे मेरी अवस्था बिगड़ती गई और हर दिन मैं दुख और बेचैनी में डूबी रहती थी। मेरी प्रार्थनाएँ सामान्य नहीं थीं और परमेश्वर के वचन पढ़ने से मुझे कोई रोशनी और प्रबोधन नहीं मिला। मेरा दिल परमेश्वर से दूर और दूर होता चला गया। एक दिन चलते हुए मैं गिर पड़ी और मेरे पैर की एक नस खिंच गई। हालाँकि इससे सभाओं में देरी नहीं हुई, पर मैं और भी चिंतित हो गई। हालाँकि इस बार मेरे गिरने से सभाओं में देरी नहीं हुई, पर अगर किसी दिन मैं बीमार पड़ गई तो शायद मैं सभाओं में शामिल न हो पाऊँ या कोई कर्तव्य न कर पाऊँ। बाद में मैं सच में बीमार पड़ गई और मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। इस समय मैं बहुत नकारात्मक थी। मैंने सोचा : “इस बार तो मैं सच में गई काम से—मैं सभाओं तक में शामिल नहीं हो सकती, किसी भी तरह का कर्तव्य करना तो दूर की बात है। क्या यह मुझे सचमुच बेकार नहीं बना देता?” अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी मेरी अवस्था खराब ही रही। मुझे चिंता थी कि अगर मैं मेजबानी का कर्तव्य भी नहीं कर सकती तो क्या मैं बचाई जा सकती हूँ। क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि मेरे इतने सालों का विश्वास व्यर्थ चला गया? मैं इस बारे में जितना सोचती, उतना ही मेरा दिल टूटता और मैं परेशान हो जाती। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे मुझे प्रबुद्ध और रोशन करने के लिए कहा ताकि मैं अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर निकल सकूँ।
एक दिन, मैंने एक बुजुर्ग बहन द्वारा लिखा गया अनुभवात्मक गवाही का लेख पढ़ा और उसमें मेरी ही अवस्था बताई गई थी। उसमें उद्धृत परमेश्वर के वचनों के एक अंश ने मुझे बहुत प्रभावित किया। परमेश्वर कहता है : “भाई-बहनों के बीच 60 से लेकर 80 या 90 वर्ष तक की उम्र के बड़े-बूढ़े भी हैं, जो अपनी बढ़ी हुई उम्र के कारण भी कुछ मुश्किलों का अनुभव करते हैं। ज्यादा उम्र होने पर भी जरूरी नहीं कि उनकी सोच सही या तार्किक ही हो, और उनके विचार और नजरिये सत्य के अनुरूप हों। इन बड़े-बूढ़ों को भी वही समस्याएँ होती हैं, और वे हमेशा चिंता करते हैं, ‘अब मेरी सेहत उतनी अच्छी नहीं रही, और मैं कौन-से कर्तव्य निभा पाऊँगा वे भी सीमित हो गए हैं। अगर मैं बस यह छोटा-सा कर्तव्य निभाऊँगा तो क्या परमेश्वर मुझे याद रखेगा? कभी-कभी मैं बीमार पड़ जाता हूँ, और मुझे अपनी देखभाल के लिए किसी की जरूरत पड़ती है। जब मेरी देखभाल के लिए कोई नहीं होता, तो मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाता, तो मैं क्या कर सकता हूँ? मैं बूढ़ा हूँ, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे याद नहीं रहते, और सत्य को समझना मेरे लिए कठिन होता है। सत्य पर संगति करते समय मैं उलझे हुए और अतार्किक ढंग से बोलता हूँ, और मेरे पास साझा करने लायक कोई अनुभव नहीं होते। मैं बूढ़ा हूँ, मुझमें पर्याप्त ऊर्जा नहीं है, मेरी दृष्टि बहुत स्पष्ट नहीं है, और मैं अब शक्तिशाली नहीं हूँ। मेरे लिए सब कुछ मुश्किल होता है। न सिर्फ मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाता, बल्कि मैं आसानी से चीजें भूल जाता हूँ और गलतियाँ कर बैठता हूँ। कभी-कभी मैं भ्रमित हो जाता हूँ, और कलीसिया और अपने भाई-बहनों के लिए समस्याएँ खड़ी कर देता हूँ। मैं उद्धार प्राप्त करना चाहता हूँ, सत्य का अनुसरण करना चाहता हूँ, मगर यह बहुत कठिन है। मैं क्या कर सकता हूँ?’ जब वे इन चीजों के बारे में सोचते हैं, तो यह सोचकर झुँझलाने लगते हैं, ‘मैंने आखिर इतनी बड़ी उम्र में ही परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू क्यों किया? मैं उन लोगों जैसा क्यों नहीं हूँ, जो 20-30 वर्ष के हैं, या जो 40-50 वर्ष के हैं? इतना बूढ़ा हो जाने के बाद ही क्यों मुझे परमेश्वर के कार्य का पता चला? ऐसा नहीं है कि मेरा भाग्य खराब है; कम-से-कम अब तो परमेश्वर के कार्य से मेरा सामना हो चुका है। मेरा भाग्य अच्छा है, और परमेश्वर मेरे प्रति दयालु है! बस सिर्फ एक चीज है जिसे लेकर मैं खुश नहीं हूँ, और वह यह है कि मैं बहुत बूढ़ा हूँ। मेरी याददाश्त बहुत अच्छी नहीं है, और मेरी सेहत उतनी बढ़िया नहीं है, मगर मैं अंदर से बहुत शक्तिशाली हूँ। बात बस इतनी है कि मेरा शरीर मेरी आज्ञा नहीं मानता और सभाओं में थोड़ी देर सुनने के बाद मेरी आँखें बोझिल होने लगती हैं। कभी-कभी मैं प्रार्थना के लिए आँखें बंद कर लेता हूँ और सो जाता हूँ, और परमेश्वर के वचन पढ़ते समय मेरा मन भटकता है। थोड़ी देर पढ़ने के बाद मैं उनींदा हो जाता हूँ और सो जाता हूँ, और वचन मेरे दिमाग में नहीं उतरते। मैं क्या करूँ? ऐसी व्यावहारिक दिक्कतों के साथ भी क्या मैं सत्य का अनुसरण कर उसे समझने में समर्थ हूँ? अगर नहीं, और अगर मैं सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप अभ्यास न कर पाऊँ, तो कहीं मेरी पूरी आस्था बेकार न हो जाए? कहीं मैं उद्धार प्राप्त करने में विफल न हो जाऊँ? मैं क्या कर सकता हूँ? मैं बहुत चिंतित हूँ! इस उम्र में अब और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। अब चूँकि मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, मुझे कोई चिंता नहीं रही या मैं किसी चीज को लेकर व्याकुल नहीं हूँ, मेरे बच्चे बड़े हो चुके हैं और उनकी देखभाल के लिए या उन्हें बड़ा करने के लिए मेरी जरूरत नहीं है, इसलिए जीवन में मेरी सबसे बड़ी कामना सत्य का अनुसरण करने की है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की है और अपनी बची-खुची उम्र में उद्धार प्राप्त करने की है। हालाँकि मेरी असली स्थिति, उम्र से धुंधला गई आँखों की रोशनी, मन की उलझनों, खराब सेहत, अपना कर्तव्य अच्छी तरह न निभा पाने, और यथासंभव कार्य करने पर भी कभी-कभी समस्याएँ खड़ी होते देखकर लगता है कि उद्धार प्राप्त करना मेरे लिए आसान नहीं होगा।’ वे इन चीजों के बारे में बार-बार सोचकर व्याकुल हो जाते हैं, और फिर सोचते हैं, ‘लगता है कि अच्छी चीजें सिर्फ युवाओं के साथ ही होती हैं, बूढ़ों के साथ नहीं। लगता है चीजें जितनी भी अच्छी हों, मैं अब उनका आनंद नहीं ले पाऊँगा।’ वे इन चीजों के बारे में जितना ज्यादा सोचते हैं, जितना झुँझलाते हैं, उतने ही व्याकुल हो जाते हैं। वे अपने बारे में सिर्फ चिंता ही नहीं करते, बल्कि आहत भी होते हैं। अगर वे रोते हैं तो उन्हें लगता है कि यह बात सचमुच रोने लायक नहीं है, और अगर नहीं रोते, तो वह पीड़ा, वह चोट हमेशा उनके साथ बनी रहती है। तो फिर उन्हें क्या करना चाहिए? ... कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके लिए सचमुच आगे का रास्ता नहीं है? क्या कोई समाधान है? (बूढ़े लोगों को भी अपने बूते के कर्तव्य निभाने चाहिए।) बूढ़े लोगों के लिए उनके बूते के कर्तव्य निभाना स्वीकार्य है, है न? क्या बूढ़े लोग अपनी उम्र के कारण अब सत्य का अनुसरण नहीं कर सकते? क्या वे सत्य को समझने में सक्षम नहीं हैं? (हाँ, जरूर हैं।) क्या बूढ़े लोग सत्य को समझ सकते हैं? वे कुछ सत्य समझ सकते हैं, वैसे युवा लोग भी सभी सत्य नहीं समझ पाते। बूढ़े लोगों को हमेशा भ्रांति होती है, वे मानते हैं कि वे भ्रमित हैं, उनकी याददाश्त कमजोर है, और इसलिए वे सत्य को नहीं समझ सकते। क्या वे सही हैं? (नहीं।) हालाँकि युवा बूढ़ों से ज्यादा ऊर्जावान और शारीरिक रूप से सशक्त होते हैं, मगर वास्तव में उनकी समझने, बूझने और जानने की क्षमता बूढ़ों के बराबर ही होती है। क्या बूढ़े लोग भी कभी युवा नहीं थे? वे बूढ़े पैदा नहीं हुए थे, और सभी युवा भी किसी-न-किसी दिन बूढ़े हो जाएँगे। बूढ़े लोगों को हमेशा यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि वे बूढ़े, शारीरिक रूप से कमजोर, बीमार और कमजोर याददाश्त वाले हैं, इसलिए वे युवाओं से अलग हैं। असल में कोई अंतर नहीं है। कोई अंतर नहीं है कहने का मेरा अर्थ क्या है? कोई बूढ़ा हो या युवा, उनके भ्रष्ट स्वभाव एक-समान होते हैं, हर तरह की चीज को लेकर उनके रवैये और सोच एक-समान होते हैं और हर तरह की चीज को लेकर उनके परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण एक-समान होते हैं। ... ऐसा नहीं है कि बड़े-बूढ़ों के पास करने को कुछ नहीं है, न ही वे अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ हैं, उनके सत्य का अनुसरण करने में असमर्थ होने की तो बात ही नहीं उठती—उनके लिए करने को बहुत कुछ है। अपने जीवन में जो विविध पाखंड और भ्रांतियाँ तुमने पाल रखी हैं, साथ ही जो विविध पारंपरिक विचार और धारणाएँ, अज्ञानी, जिद्दी, दकियानूसी, अतार्किक और विकृत चीजें तुमने इकट्ठा कर रखी हैं, वे सब तुम्हारे दिल में जमा हो गई हैं और तुम्हें युवाओं से भी ज्यादा वक्त इन चीजों को खोद निकालने, गहन विश्लेषण करने और पहचानने में लगाना चाहिए। ऐसी बात नहीं है कि तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं है, या कोई काम न होने पर तुम्हें संतप्त, व्याकुल और चिंतित अनुभव करना चाहिए—यह न तो तुम्हारा कार्य है न ही तुम्हारी जिम्मेदारी। अव्वल तो बड़े-बूढ़ों की मनःस्थिति सही होनी चाहिए। भले ही तुम्हारी उम्र बढ़ रही हो और शारीरिक रूप से तुम अपेक्षाकृत बूढ़े हो, फिर भी तुम्हें युवा मनःस्थिति रखनी चाहिए। भले ही तुम बूढ़े हो रहे हो, तुम्हारी सोचने की शक्ति धीमी हो गई है, तुम्हारी याददाश्त कमजोर है, फिर भी अगर तुम खुद को जान पाते हो, मेरी बातें समझ सकते हो, और सत्य को समझ सकते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम बूढ़े नहीं हो, और तुम्हारी काबिलियत कम नहीं है। अगर कोई 70 की उम्र में होकर भी सत्य को नहीं समझ पाता, तो यह दिखाता है कि उसका आध्यात्मिक कद बहुत ही छोटा है, और कामकाज के लायक नहीं है। इसलिए जब सत्य की बात आती है तो उम्र अप्रासंगिक होती है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। मैंने परमेश्वर के वचनों के इस अंश को कई बार पढ़ा और जितना अधिक मैंने पढ़ा, मेरा दिल उतना ही रोशन होता गया। परमेश्वर सच में इंसान के अंतरतम हृदय को देखता है। क्या ये वचन सीधे मेरे बारे में नहीं बोल रहे थे? मैं चिंतित थी क्योंकि मैं बूढ़ी थी, सेहत खराब थी, ऊँचा सुनती थी, मेरी नजर धुँधली और याददाश्त कमजोर हो गई थी। मुझे डर था कि जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ेगी, मैं अपना कर्तव्य नहीं कर पाऊँगी और मैं बचाए जाने का अपना मौका खो दूँगी। मैं अपने दिन दुख और बेचैनी में डूबे हुए बिताती थी। परमेश्वर के वचनों का वह अंश पढ़ने के बाद, मेरे दिल को अचानक मुक्त होने का एहसास हुआ। परमेश्वर बुजुर्ग लोगों की कठिनाइयों को जानता है और उसने इन वचनों को इसलिए व्यक्त किया है ताकि बुजुर्ग उसके इरादे को समझ सकें। चाहे जवान हो या बूढ़ा, परमेश्वर हर किसी को सत्य का अनुसरण करने और बचाए जाने का मौका देता है और मैंने देखा कि परमेश्वर धार्मिक है। परमेश्वर के वचनों से मुझे अभ्यास का एक मार्ग मिला। हालाँकि मैं बूढ़ी हूँ, फिर भी मैं परमेश्वर के वचनों को समझ सकती हूँ और मुझे अपने ऊपर आने वाली परेशानियों में सत्य खोजना चाहिए, अपनी भ्रष्टता और कमियों को जानना चाहिए। मुझे सत्य का अनुसरण करना चाहिए और पश्चाताप और बदलाव हासिल करना चाहिए क्योंकि बुजुर्गों का स्वभाव जवानों से कम भ्रष्ट नहीं होता। उदाहरण के लिए, मेरा स्वभाव बहुत घमंडी था और कभी-कभी जब भाई-बहन मेरी समस्याओं को बताते, तो मैं उसे स्वीकार नहीं करना चाहती थी। रोजमर्रा के पारिवारिक जीवन में, जब मेरी बहू मेरी बात नहीं सुनती, तो मैं गुस्सा हो जाती और खुद को बड़ा समझकर उससे बात करती। ये सभी एक भ्रष्ट स्वभाव के प्रकाशन थे और मुझे उन्हें सुलझाने के लिए सत्य खोजने की जरूरत थी, तो ऐसा नहीं था कि मैं कुछ नहीं कर सकती थी। अब मेरे पास हर दिन घर पर परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़ने के लिए बहुत समय था, अपने सामने आने वाले लोगों, चीजों और घटनाओं में सत्य खोजने और अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए समय होता था। मैं अनुभवात्मक गवाही के वीडियो भी देख सकती थी और भाई-बहनों के अनुभवों से सबक सीख सकती थी। मैं अनुभवात्मक गवाही के लेख भी लिख सकती थी, परमेश्वर की गवाही देने के लिए अपने वास्तविक अनुभव लिख सकती थी। ये सभी चीजें थीं जो मुझे करनी चाहिए थीं। अब जब मैं परमेश्वर का इरादा समझ गई, तो मैंने उसे गलत नहीं समझा या नकारात्मक अवस्था में डूबी नहीं रही और मुझे अब इस बात की चिंता नहीं थी कि मैं कोई कर्तव्य कर सकती हूँ या नहीं। मैंने संकल्प लिया कि चाहे कलीसिया मेरे लिए किसी कर्तव्य की व्यवस्था करे या नहीं, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित रहूँगी। तब से, मैं हर दिन शांति से बैठकर परमेश्वर के वचन खा और पी सकती थी और जब मेरे ऊपर कोई परेशानी आती, तो मैं प्रार्थना कर सकती थी और परमेश्वर के इरादे खोज सकती थी।
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : “मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता और सबसे कम इस आधार पर तय नहीं करता कि वह किस हद तक दया का पात्र है, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। “प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर की इच्छा है कि उसे पूर्ण बनाया जाए, अंततः उसके द्वारा उसे प्राप्त किया जाए, उसके द्वारा उसे पूरी तरह से शुद्ध किया जाए, और वह ऐसा इंसान बने जिससे वह प्रेम करता है। चाहे मैं तुम लोगों को पिछड़ा हुआ कहता हूँ या निम्न क्षमता वाला—यह सब तथ्य है। मेरा ऐसा कहना यह प्रमाणित नहीं करता कि मेरा तुम्हें छोड़ने का इरादा है, कि मैंने तुम लोगों में आशा खो दी है, और यह तो बिल्कुल नहीं कि मैं तुम लोगों को बचाना नहीं चाहता। आज मैं तुम लोगों के उद्धार का कार्य करने के लिए आया हूँ, जिसका तात्पर्य है कि जो कार्य मैं करता हूँ, वह उद्धार के कार्य की निरंतरता है। प्रत्येक व्यक्ति के पास पूर्ण बनाए जाने का एक अवसर है : बशर्ते तुम तैयार हो, बशर्ते तुम खोज करते हो, अंत में तुम इस परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होगे, और तुममें से किसी एक को भी त्यागा नहीं जाएगा। यदि तुम निम्न क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निम्न क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम उच्च क्षमता वाले हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उच्च क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम अज्ञानी और निरक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी निरक्षरता के अनुसार होंगी; यदि तुम साक्षर हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस तथ्य के अनुसार होंगी कि तुम साक्षर हो; यदि तुम बुज़ुर्ग हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ तुम्हारी उम्र के अनुसार होंगी; यदि तुम आतिथ्य प्रदान करने में सक्षम हो, तो तुमसे मेरी अपेक्षाएँ इस क्षमता के अनुसार होंगी; यदि तुम कहते हो कि तुम आतिथ्य प्रदान नहीं कर सकते और केवल कुछ निश्चित कार्य ही कर सकते हो, चाहे वह सुसमाचार फैलाने का कार्य हो या कलीसिया की देखरेख करने का कार्य या अन्य सामान्य मामलों में शामिल होने का कार्य, तो मेरे द्वारा तुम्हारी पूर्णता भी उस कार्य के अनुसार होगी, जो तुम करते हो। वफादार होना, बिल्कुल अंत तक समर्पण करना, और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने की कोशिश करना—यह तुम्हें अवश्य करना चाहिए, और इन तीन चीजों से बेहतर कोई अभ्यास नहीं है। अंततः, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इन तीन चीज़ों को प्राप्त करे, और यदि वह इन्हें प्राप्त कर सकता है, तो उसे पूर्ण बनाया जाएगा। किंतु, इन सबसे ऊपर, तुम्हें सच में खोज करनी होगी, तुम्हें सक्रियता से आगे और ऊपर की ओर बढ़ते जाना होगा, और इसके संबंध में निष्क्रिय नहीं होना होगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि परमेश्वर किसी व्यक्ति का परिणाम उसकी उम्र, वरिष्ठता या उसने कितना दुख उठाया है, इस आधार पर निर्धारित नहीं करता, बल्कि इस आधार पर कि क्या उसके पास सत्य है। मैंने सोचा कि मैं बूढ़ी हूँ और अब किसी काम की नहीं और इसलिए मुझे परमेश्वर द्वारा निकाल दिए जाने का डर था—इससे पता चला कि मैं लोगों को बचाने में परमेश्वर के इरादे या लोगों के परिणाम निर्धारित करने के लिए उसके अपेक्षित मानक को नहीं समझती थी। परमेश्वर का लोगों को बचाना और पूर्ण बनाना उनकी उम्र या काबिलियत पर आधारित नहीं है, बल्कि इस पर आधारित है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं। अगर कोई सत्य स्वीकार सकता है और परमेश्वर के प्रति वफादार है और वह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित रहता है, तो वह उसे नहीं त्यागेगा। मैंने परमेश्वर के घर को अविश्वासी दुनिया के समान देखा था। समाज में, बुजुर्गों को नजरअंदाज और अनदेखा किया जाता है और मैंने मान लिया था कि परमेश्वर के घर में भी ऐसा ही होता है—कि एक बार जब तुम बूढ़े हो जाते हो, तो फिर परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहता। यह परमेश्वर के प्रति एक गलतफहमी और ईशनिंदा थी। दुनिया पर शैतान का शासन है और शैतान लोगों से अपने लिए मेहनत करवाता है। एक बार जब लोग बूढ़े हो जाते हैं और मेहनत नहीं कर सकते, तो उन्हें त्याग दिया जाता है। लेकिन परमेश्वर के घर में सत्य का बोलबाला है। परमेश्वर लोगों को अपना कर्तव्य निभाने और सत्य का अनुसरण करने का मौका देता है; अपना कर्तव्य निभाने के दौरान, लोग खुद को जान जाते हैं और बदलते हैं और वे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देते हैं। मैंने सोचा कि मैं कितनी बूढ़ी हूँ, फिर भी परमेश्वर ने मुझसे अपने वचन खाने और पीने या सत्य का अनुसरण करने का अवसर नहीं छीना था। परमेश्वर हमारा सिंचन और भरण-पोषण करने के लिए लगातार वचन व्यक्त कर रहा है। जब मुझपर परेशानियाँ आतीं तो वह मुझे प्रबुद्ध करने और मार्गदर्शन करने के लिए भी अपने वचनों का इस्तेमाल करता था और मैं ही थी जो परमेश्वर का इरादा नहीं समझती थी। मुझे लगता था चूँकि मैं बूढ़ी और भ्रमित हो गई हूँ, परमेश्वर मुझे नहीं बचाएगा। लेकिन असल में, अगर कोई ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है और सत्य का अनुसरण करने को तैयार है, भले ही एक दिन, वे कोई कर्तव्य न कर सकें, परमेश्वर का घर उन्हें बाहर नहीं निकालेगा या हटा नहीं देगा। मेरे आस-पास के कई बुजुर्ग भाई-बहन लगभग मेरी ही उम्र के हैं। हालाँकि वे अब बहुत से कर्तव्य नहीं कर सकते, वे परमेश्वर के वचन खाने और पीने और कलीसिया का जीवन जीने में लगे रहते हैं और कलीसिया ने उन्हें बाहर नहीं निकाला है। जबकि कुछ ऐसे जवान लोग हैं जिन्होंने लगातार कर्तव्य किए हैं, लेकिन क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते और उनके भ्रष्ट स्वभाव गंभीर और अपरिवर्तित रहते हैं, वे अंततः कई बुरे कर्म कर बैठते हैं और कलीसिया से बाहर निकाल दिए जाते हैं। इससे, मैंने परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव देखा। परमेश्वर लोगों को इस आधार पर नहीं बचाता कि वे जवान हैं या बूढ़े, बल्कि उनके दिलों को देखता है और यह देखता है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं। तब से, चाहे मेरे पास कोई कर्तव्य हो या न हो, मैंने संकल्प लिया कि मैं ईमानदारी से परमेश्वर के वचन खाऊँगी और पीऊँगी, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करूँगी, अपनी कमियों और दोषों को जानूँगी, अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझूँगी और अब परमेश्वर को गलत नहीं समझूँगी या उसके खिलाफ शिकायत नहीं करूँगी।
एक सभा के दौरान, मेरी अवस्था जानने के बाद, एक बहन ने मुझसे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़वाया : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष का प्राप्त होना या दुर्भाग्य सहना, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए पूरा करना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या कारणों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। दुर्भाग्य सहना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या दुर्भाग्य सहना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए, और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह न्यूनतम है, जो व्यक्ति को करना चाहिए, ऐसे व्यक्ति को, जो परमेश्वर की खोज करता है। तुम्हें अपना कर्तव्य केवल आशीष प्राप्त करने के लिए नहीं निभाना चाहिए, और तुम्हें दुर्भाग्य सहने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और इंसान एक सृजित प्राणी है; इंसान के लिए अपना कर्तव्य निभाना बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। यह इंसान की जिम्मेदारी और दायित्व है और इसका आशीष पाने या दुर्भाग्य सहने से कोई लेना-देना नहीं है। केवल अपना कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करके और स्वभाव में बदलाव लाकर ही कोई व्यक्ति परमेश्वर की आशीषें पा सकता है। लेकिन मेरा मानना था कि जब तक मैं अपना कर्तव्य करती हूँ, मुझे परमेश्वर की आशीष मिलेगी और मैं हमेशा सोचती थी कि कर्तव्य करने का मतलब है कि मुझे आशीष मिलेगी। यह मेरी धारणाओं और कल्पनाओं के अलावा और कुछ नहीं था। पलटकर देखूँ तो, मैंने काफी कर्तव्य किए थे, लेकिन मैंने अपने कर्तव्य में सत्य का अनुसरण नहीं किया और हमेशा अपनी इच्छानुसार काम किया और मैंने परमेश्वर के इरादे या सत्य खोजने के लिए शायद ही कभी प्रार्थना की, नतीजतन, इस मुकाम तक, मेरे स्वभाव में शायद ही कोई बदलाव आया था। इस तरह से मैंने चाहे कितना भी कर्तव्य किया हो, मुझे फिर भी परमेश्वर की स्वीकृति नहीं मिलेगी। मैंने सत्य का अनुसरण न करके कई साल बर्बाद कर दिए थे। अब से, मुझे अपने ऊपर आने वाली परेशानियों पर परमेश्वर के इरादे खोजने थे, परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना था और स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सत्य का अनुसरण करना था। भले ही अंततः मैं बचाई न जा सकूँ, तो यह इसलिए होगा क्योंकि मेरा स्वभाव नहीं बदला है, न कि इसलिए कि मैं बूढ़ी हो गई थी और परमेश्वर मुझे नहीं चाहता था। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, अब मैं तेरा इरादा समझ गई हूँ। मैं तेरे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित रहने और अब तुझे गलत न समझने या तेरे खिलाफ शिकायत न करने को तैयार हूँ। मैं चाहे जो भी कर्तव्य करूँ, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए उसे पूरे दिल और दिमाग से करना चाहती हूँ।”
बाद में, बहन को मेरी अवस्था से संबंधित परमेश्वर के वचनों का एक और अंश मिला। परमेश्वर कहता है : “लोग आशीष पाने, पुरस्कृत होने, ताज पहनने के लिए परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। क्या यह सबके दिलों में नहीं है? यह एक तथ्य है कि यह सबके दिलों में है। हालाँकि लोग अक्सर इसके बारे में बात नहीं करते, यहाँ तक कि वे आशीष प्राप्त करने का अपना मकसद और इच्छा छिपाते हैं, फिर भी यह इच्छा और मकसद लोगों के दिलों की गहराई में हमेशा अडिग रहा है। लोग चाहे कितना भी आध्यात्मिक सिद्धांत समझते हों, उनके पास जो भी अनुभवजन्य ज्ञान हो, वे जो भी कर्तव्य निभा सकते हों, कितना भी कष्ट सहते हों, या कितनी भी कीमत चुकाते हों, वे अपने दिलों में गहरी छिपी आशीष पाने की प्रेरणा कभी नहीं छोड़ते, और हमेशा चुपचाप उसके लिए कड़ी मेहनत करते हैं। क्या यह लोगों के दिल के अंदर सबसे गहरी दबी बात नहीं है? आशीष प्राप्त करने की इस प्रेरणा के बिना तुम लोग कैसा महसूस करोगे? तुम किस रवैये के साथ अपना कर्तव्य निभाओगे और परमेश्वर का अनुसरण करोगे? अगर लोगों के दिलों में छिपी आशीष प्राप्त करने की यह प्रेरणा दूर कर दी जाए तो ऐसे लोगों का क्या होगा? संभव है कि बहुत-से लोग नकारात्मक हो जाएँगे, जबकि कुछ अपने कर्तव्यों के प्रति प्रेरणाहीन हो जाएँगे। वे परमेश्वर में अपने विश्वास में रुचि खो देंगे, मानो उनकी आत्मा गायब हो गई हो। वे ऐसे प्रतीत होंगे, मानो उनका हृदय छीन लिया गया हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि आशीष पाने की प्रेरणा ऐसी चीज है जो लोगों के दिल में गहरी छिपी है। शायद अपना कर्तव्य निभाते हुए या कलीसिया का जीवन जीते हुए उन्हें लगता है कि वे अपने परिवार त्यागने और खुद को खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए खपाने में सक्षम हैं, और अब वे आशीष प्राप्त करने की अपनी प्रेरणा को जानकर इसे दरकिनार भी कर चुके हैं, और अब उससे नियंत्रित या विवश नहीं होते। फिर वे सोचते हैं कि उनमें अब आशीष पाने की प्रेरणा नहीं रही, लेकिन परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता है। लोग मामलों को केवल सतही तौर पर देखते हैं। परीक्षणों के बिना, वे अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। अगर वे कलीसिया नहीं छोड़ते या परमेश्वर के नाम को नहीं नकारते, और परमेश्वर के लिए खपने में लगे रहते हैं, तो वे मानते हैं कि वे बदल गए हैं। उन्हें लगता है कि वे अब अपने कर्तव्य-पालन में व्यक्तिगत उत्साह या क्षणिक आवेगों से प्रेरित नहीं हैं। इसके बजाय, वे मानते हैं कि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, और अपना कर्तव्य निभाते हुए लगातार सत्य की तलाश और अभ्यास कर सकते हैं, ताकि उनके भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो सकें और वे कुछ वास्तविक बदलाव हासिल कर सकें। लेकिन जब सीधे लोगों की मंजिल और परिणाम से संबंधित कोई बात हो जाती है तो वे किस प्रकार व्यवहार करते हैं? सच्चाई पूरी तरह से प्रकट हो जाती है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। परमेश्वर ने आशीष पाने के लिए लोगों के भीतर छिपी मंशा को उजागर किया है। लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि आशीष और लाभ पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि जब वे कोई कर्तव्य करने के लिए अपने परिवारों और करियर को त्यागते हुए दिखते हैं, तो यह सब सिर्फ परमेश्वर के साथ सौदा करने की कोशिश होती है। जब मैंने पहली बार परमेश्वर को पाया था, उस समय को याद करके, मुझे लगा कि मेरे पास स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की आशा है और इसलिए मैंने उत्साह से खुद को खपाया। कलीसिया ने मेरे लिए जो भी कर्तव्य सौंपा, मैंने उसके प्रति समर्पण किया और मुझमें हर दिन अंतहीन ऊर्जा होती थी। लेकिन जैसे-जैसे मैं बूढ़ी होती गई और कम कर्तव्य कर पाती थी, मुझे चिंता होने लगी कि मुझे आशीषें नहीं मिलेंगी और इस तरह मैं नकारात्मक हो गई। मैंने परमेश्वर के वचन खाने और पीने पर ध्यान देना भी बंद कर दिया। जब मेरे ऊपर परेशानियाँ आतीं तो मैं अब परमेश्वर के इरादे नहीं खोजती थी और अपने दिन दुख और बेचैनी में डूबे हुए बिताती थी। मुझे समझ आया कि इतने बरसों तक मैं आशीषों और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने की खोज में अपना कर्तव्य कर रही थी—न कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए। इस तरह से परमेश्वर में विश्वास करना और अपना कर्तव्य करना मेरे द्वारा परमेश्वर के साथ सौदे करने और उसे धोखा देने की कोशिश थी। मुझमें सचमुच मानवता की कमी थी! इन वर्षों पर विचार करते हुए, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़कर कुछ सत्य समझे और मैंने अपनी शैतानी प्रकृति की कुछ समझ हासिल की। मैं इंसान को बचाने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को भी थोड़ा समझ गई। मैंने परमेश्वर से बहुत कुछ पाया था और फिर भी मैं उसके साथ सौदे करने की कोशिश कर रही थी। जैसे ही मुझे लगा कि मुझे आशीषें नहीं मिलेंगी, मैं नकारात्मक हो गई और अब आगे बढ़ने की कोशिश नहीं करना चाहती थी। मुझमें सचमुच जमीर और विवेक नहीं था! मैं सचमुच स्वार्थी और घिनौनी थी! मैंने अपनी उम्र के उन लोगों को देखा जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे—वे अपने दिन खाने, पीने और सुख खोजने में बिताते हैं और अगर वे गपशप नहीं कर रहे होते, तो वे ताश या महजोंग खेल रहे होते हैं। उन्हें पता नहीं कि जीवन का अर्थ क्या है और वे हर दिन बस बैठकर मौत का इंतजार करते हैं। बरसों परमेश्वर में विश्वास करके, मैं यह समझ गई थी कि एक सार्थक जीवन क्या है और मैं अब सांसारिक सुखों का पीछा नहीं करती थी, बल्कि सत्य का अनुसरण करना, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना और परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहती थी। मैंने जीवन का लक्ष्य पा लिया था। मुझे संतुष्टि और सुकून महसूस होता था और अगर मैं इस मुकाम पर मर भी जाती, तो मेरा जीवन सार्थक हो जाता। मुझे अब परमेश्वर के साथ सौदे करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए या सिर्फ आशीष पाने के लिए अनुसरण नहीं करना चाहिए।
कुछ ही समय बाद, बहन मुझसे मेरा मेजबानी का कर्तव्य फिर से शुरू करने के लिए कहने आई। मैं बहुत खुश थी। परमेश्वर ने मुझे कर्तव्य करने का एक और मौका दिया था और मैं इसे ठीक से संजोना चाहती थी। बाद में, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “अपनी क्षमताओं के अनुसार अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा पाने के अलावा बहुत-सी ऐसी चीजें हैं, जो उम्रदराज लोग कर सकते हैं। बशर्ते तुम मूर्ख और विक्षिप्त नहीं हो और सत्य को नहीं समझ सकते हो और बशर्ते खुद की देखभाल करने में असमर्थ नहीं हो, तो ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जो तुम्हें करनी चाहिए। युवाओं की ही तरह तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो, सत्य को खोज सकते हो, और तुम्हें बार-बार परमेश्वर के समक्ष आकर प्रार्थना करनी चाहिए, सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए, और लोगों और चीजों को देखने-समझने और पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य को अपना मानदंड बनाकर आचरण और कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। यही वह रास्ता है जिस पर तुम्हें चलना चाहिए, और तुम्हारे बूढ़े होने, अनेक बीमारियाँ होने, या शरीर के बूढ़े होते जाने के कारण तुम्हें संतप्त, व्याकुल और चिंतित अनुभव नहीं करना चाहिए। संताप, व्याकुलता और चिंता का अनुभव करना सही नहीं है—ये तर्कहीन अभिव्यक्तियाँ हैं। ... चूँकि बड़े-बूढ़ों के स्वभाव भी युवाओं की तरह ही भ्रष्ट होते हैं, और वे भी युवाओं की तरह ही अक्सर जीवन और अपने कर्तव्य-निर्वहन में भ्रष्ट स्वभाव दिखाते हैं, तो फिर बड़े-बूढ़े वे काम क्यों नहीं करते जो उचित हैं, और इसके बजाय हमेशा अपने बुढ़ापे और उनकी मृत्यु के बाद क्या होगा विषय को लेकर संतप्त, व्याकुल और चिंतित क्यों अनुभव करते हैं? वे युवाओं की तरह अपने कर्तव्य क्यों नहीं निभाते? वे युवाओं की तरह सत्य का अनुसरण क्यों नहीं करते? तुम्हें यह अवसर दिया गया है, तो अगर तुम इसे गँवा दो और फिर तुम इतने बूढ़े हो जाओ कि न सुन सको, न देख सको या न अपनी देखभाल कर सको, तब तुम पछताओगे और तुम्हारा जीवन यूँ ही गुजर जाएगा” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि मुझे इस बात पर दुख या बेचैनी में नहीं डूबे रहना चाहिए कि मैं बचाई जाऊँगी या नहीं, न ही मुझे पहले की तरह परमेश्वर को गलत समझना और उसके खिलाफ शिकायत करना जारी रखना चाहिए। मुझे जो करना है वह है अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए सत्य का अनुसरण करना और मुझे तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक कि मैं सचमुच भ्रमित और गतिहीन न हो जाऊँ, क्योंकि तब तक सत्य का अनुसरण न करने का पछतावा करने में बहुत देर हो जाएगी। मैं इस अंतिम समय का लाभ उठाकर सत्य का अनुसरण करना और स्वभाव में बदलाव लाना चाहती हूँ। बीती बातों पर विचार करने पर देखती हूँ कि मैं हमेशा परमेश्वर के वचनों को पूरी तरह से आत्मसात किए बिना सरसरी तौर पर पढ़ लेती थी और मैं परमेश्वर के इरादों को नहीं समझती थी। अब जब मैं बूढ़ी हो गई हूँ, तो मेरी याददाश्त किसी जवान व्यक्ति जैसी नहीं है, लेकिन मैं परमेश्वर के वचनों को बार-बार पढ़ सकती हूँ और उन पर अधिक विचार कर सकती हूँ और परेशानियाँ आने पर, मैं परमेश्वर के इरादे खोज सकती हूँ और उसके वचनों में अभ्यास का मार्ग पा सकती हूँ। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “... और लोगों और चीजों को देखने-समझने और पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुसार सत्य को अपना मानदंड बनाकर आचरण और कार्य करने का प्रयास करना चाहिए।” मुझे परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए और मैं अपने सही कार्य की उपेक्षा नहीं कर सकती। मैं दुख से बाहर निकालने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!
बाद में, चाहे अपने कर्तव्यों में या परिवार के साथ बातचीत में, जब मुझपर परेशानियाँ आतीं, तो मैंने उन्हें परमेश्वर से स्वीकार करना सीखा और मैंने परमेश्वर के इरादे खोजे और उसके वचनों के अनुसार अभ्यास किया। मेरा घमंडी स्वभाव धीरे-धीरे बदलने लगा और मेरे बेटे ने कहा कि मैं पहले की तरह मनमानी करने वाली नहीं रही। मैंने अपने दिल में सचमुच परमेश्वर का आभार महसूस किया। यह परमेश्वर ही था जिसने मुझे इस बदलाव के लिए मार्गदर्शन दिया और इस मुकाम पर अपने दैनिक जीवन में, मैं परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और उसकी महिमा के लिए उसकी गवाही देने को तैयार हो गई।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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