क्या आदर्श शादी होने से खुशी मिलती है?
आठ साल तक एक-दूसरे को जानने और प्यार करने के बाद मैं और मेरा पति सगाई करने वाले थे, तभी मुझे अचानक ऐसी बीमारी हो गई, जिसके चलते मैं कभी माँ...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
2012 में मैंने और मेरी पत्नी ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। हम अक्सर संगति करते थे और साथ में परमेश्वर के वचन पढ़ते थे और हर दिन खुशी और संतुष्टि से भरा होता था। दो साल बाद मुझे एक कलीसिया अगुआ चुन लिया गया। चूँकि मैं अपने कर्तव्यों में व्यस्त था और घर पर कम समय बिताता था, इसलिए मेरी पत्नी कुछ असंतुष्ट रहने लगी, कहती थी कि मैं परिवार का ख्याल नहीं रखता और उसकी परवाह नहीं करता। यूँ तो मैं जानता था कि एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है, लेकिन मुझे यह भी लगता था कि मेरी पत्नी की बात में दम है और मुझे एक पति के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए और अपनी पत्नी और बच्चे की अच्छी देखभाल करनी चाहिए, ताकि हमारे पास सुखी वैवाहिक जीवन और आदर्श परिवार हो। इस प्रकार, जब मैं घर पर होता था तो बहुत सारा घरेलू कार्य करता था और पत्नी के लिए स्वादिष्ट खाना बनाता था, एक अच्छा पति होने की भरसक कोशिश करता था। कभी-कभी मैं अपने कर्तव्यों में बहुत व्यस्त होने के कारण अपनी पत्नी का ख्याल नहीं रख पाता था और बाद में इसकी भरपाई करने की भरसक कोशिश करता था। क्योंकि मुझे डर था कि उसका असंतोष हमारी आपसी भावनाओं पर असर डालेगा। बाद में मैं एक प्रचारक बन गया और मेरे पास घर पर अपनी पत्नी के साथ बिताने के लिए और भी कम समय होता था। कभी-कभी मैं अपने कर्तव्यों में व्यस्त होने के कारण लगातार कई दिन बाहर रहता था और मेरी पत्नी मेरे बारे में शिकायत करती थी। हालाँकि मैंने इस वजह से अपने कर्तव्यों में देरी नहीं की, फिर भी मेरे दिल में हमेशा अपनी पत्नी के प्रति अपराध-बोध रहता था। इसलिए मैं जाने से पहले उसके लिए जल्दी खाना बना देता था और जब मैं घर लौटता तो उसकी कोई भी माँग पूरी करने या उसे बाहर ले जाने की पूरी कोशिश करता था। मुझे लगता था कि एक अच्छे पति को जो करना चाहिए वह करने और हमारे वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने का यही एकमात्र तरीका था।
बाद में मेरी पत्नी का सारा ध्यान पैसे और शारीरिक सुखों के पीछे भागने पर रहने लगा और वह दोस्तों के साथ खाने-पीने और मौज-मस्ती करने में अपने दिन गुजारने लगी। वह न केवल परिवार की उपेक्षा करती थी, बल्कि अक्सर बार भी जाती थी। जब मैंने अपनी पत्नी को और भी ज्यादा बिगड़ते हुए देखा तो मुझे चिंता होने लगी कि मेरी पत्नी इन लोगों के साथ इतना अधिक समय बिता रही थी। क्या होगा अगर वह प्रलोभन का सामना न कर सकी और मेरे साथ विश्वासघात कर देती है? जिस परिवार को बनाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की क्या वह बिखर नहीं जाएगा? मैं अक्सर अपनी पत्नी के साथ मन की बातें करता था और उसे परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाता था, मैं यह उम्मीद करता था कि वह इन परेशानीपरक जगहों से दूर रहेगी। मेरी पत्नी मौखिक रूप से हामी भर लेती थी, लेकिन बाद में वह बिल्कुल भी नहीं बदलती थी। धीरे-धीरे मेरे और मेरी पत्नी के बीच बातें करने के लिए बहुत कम चीजें होती थीं और जब मैं घर लौटता था तो वह मेरी अनदेखी कर देती थी। मुझे अक्सर चिंता होती थी कि क्या मेरी पत्नी मेरे साथ पहले ही विश्वासघात कर चुकी है? खासकर जब मैं घर आकर खाली मकान देखता था तो मेरे दिल में हमेशा एक अकेलापन महसूस होता था। मुझे लगता था कि मेरे और मेरी पत्नी के बीच जो रिश्ता इतने सारे सालों में बना है वह टूट सकता है और मेरा दिल दर्द और पीड़ा से भर गया था। ठीक जब मैं दर्द में गहराई से फँसा हुआ था और खुद को बाहर नहीं निकाल पा रहा था, अगस्त 2020 में एक दिन मुझे अगुआ का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि मेरे साझेदार भाई वांग छियांग को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, वह निगरानी फुटेज अपने कब्जे में कर चुकी है और उसके संपर्क में रहे लोगों की जाँच कर रही है और मुझे तुरंत घर छोड़कर कहीं छिपने की जरूरत है। इस अचानक मिली खबर का सामना होने पर पहले तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूँ। मैंने सोचा कि अगर मैं चला गया तो मैं अब और अपनी पत्नी और बच्चे की देखभाल नहीं कर पाऊँगा और परिवार बिखर सकता है। इससे मुझे अंदर से बहुत दर्द हुआ। लेकिन अगर मैं न गया तो मुझे गिरफ्तारी और यातना का सामना करना पड़ेगा। आखिरकार, मैंने फिर भी घर छोड़ने का फैसला कर लिया। दो महीने बाद मुझे अपने परिवार का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि कुछ दिन पहले सात पुलिस अधिकारी मुझे गिरफ्तार करने के लिए मेरे घर में घुस आए थे और जब मैं उन्हें नहीं मिला तो उन्होंने मेरी पत्नी की बड़ी बहन को गिरफ्तार कर लिया। अपनी सुरक्षा को देखते हुए मुझे छिपने के लिए कहीं और चले जाने की जरूरत थी।
जुलाई 2023 में एक दिन मुझे घर से एक पत्र मिला कि मेरी पत्नी ने देखा कि मैं तीन साल से बाहर हूँ, इसलिए वह तलाक के लिए अर्जी देने और किसी और से शादी करने की तैयारी कर रही थी। यूँ तो मैं बहुत बार सोच चुका था कि शायद मेरी पत्नी अब और मेरा इंतजार न करे, लेकिन जब यह असल में मेरे साथ घटित हो गई तो मुझमें अभी भी इसका सामना करने की हिम्मत नहीं थी। मैंने मन ही मन सोचा, “एक बार हमारा वैवाहिक संबंध टूट गया तो क्या इतने सालों की मेहनत से बनाया मेरा घर हाथ से नहीं चला जाएगा? मेरी शादी को ग्यारह साल हो गए हैं और हमारी एक प्यारी बेटी है। हमने एक साथ इतने सारे खुशी और आनंद के पल बिताए हैं। अगर हमारा तलाक हो गया तो मैं अकेले कैसे जिऊँगा?” रात में मैं बिस्तर पर लेटा रहता था और सो नहीं पाता था, मैं इस बारे में सोचता था कि भविष्य में मेरी बच्ची को भी पीड़ा सहनी होगी। मेरा दिल दर्द और व्यथा से भर जाता था और अपना वैवाहिक रिश्ता बचाने के लिए घर लौटने का विचार मेरे मन में आता था। लेकिन पुलिस मेरा पीछा कर रही थी, पिछले लगभग तीन सालों में जब मैं घर से बाहर था, पुलिस कई बार मेरे घर पर नजर रखने आ चुकी थी और मेरी पत्नी का फोन भी पुलिस की निगरानी में था। अगर मैं बिना सोच-विचार किए हुए घर वापस चला जाता तो न केवल मैं पकड़ा जाता, बल्कि मैं कलीसिया के लिए भी मुसीबत खड़ी कर देता। यही नहीं, मैं अपने कर्तव्य निभा रहा था, इसलिए अगर मैं चला जाता तो मैं अपने कर्तव्य छोड़ रहा होता और परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहा होता। विवेक के आधार पर मैं जानता था कि मैं घर नहीं लौट सकता हूँ, लेकिन घर न लौटने का मतलब था मेरे वैवाहिक जीवन का टूट जाना। मैंने इस पीड़ा में अपनी पत्नी को एक पत्र लिखकर विनती की कि वह रुक जाए, मुझे उम्मीद थी कि वह मेरी कठिनाइयाँ समझ सकती है। पत्र लिखने के बावजूद मैं जानता था कि शायद मेरी दिली बातों का मेरी पत्नी पर कोई असर नहीं होगा। मुझे अपने दिल में बहुत पीड़ा महसूस हुई, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और यह समझा कि वैवाहिक रिश्ते और परिवार के साथ कैसे पेश आना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम्हें कभी नहीं भूलना चाहिए कि तुम एक सृजित प्राणी हो, परमेश्वर ने ही तुम्हें जीवन के इस पड़ाव पर लाकर खड़ा किया है, वह परमेश्वर ही है जिसने तुम्हें शादी की व्यवस्था दी, एक परिवार दिया और वे जिम्मेदारियाँ सौंपी जो तुम्हें शादी के ढाँचे के भीतर निभानी चाहिए, और कि वह तुम नहीं हो जिसने शादी का विकल्प चुना या ऐसा नहीं है कि तुम्हारी शादी बस यूँ ही हो गई, या फिर तुम अपनी क्षमताओं या ताकत के भरोसे अपने वैवाहिक सुख को कायम रख सकते हो। क्या अब मैंने इसे स्पष्ट रूप से समझा दिया है? (हाँ।) क्या तुम समझते हो कि तुम्हें क्या करना है? क्या अब तुम्हारा मार्ग स्पष्ट है? (हाँ।) अगर वैवाहिक जीवन में तुम्हारी जिम्मेदारियों और दायित्वों और एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे कर्तव्य और मिशन के बीच कोई टकराव या विरोधाभास नहीं है, तो ऐसी परिस्थिति में तुम्हें शादी के ढाँचे के भीतर अपनी जिम्मेदारियाँ उस तरह निभानी चाहिए जैसे उन्हें निभाया जाना चाहिए, तुम्हें अपनी जिम्मेदारियाँ अच्छे से निभानी चाहिए, वे जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए जो तुम्हें उठानी ही हैं और उनसे भागने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने जीवनसाथी की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए—उसके जीवन की, उसकी भावनाओं और उसके बारे में हर चीज की जिम्मेदारी। लेकिन जब शादी के ढाँचे के भीतर तुम्हारे द्वारा निभाई जाने वाली जिम्मेदारियों और दायित्वों और एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे मिशन और कर्तव्य के बीच कोई टकराव होता है, तो तुम्हें अपना कर्तव्य या मिशन नहीं, बल्कि शादी के ढाँचे के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को त्याग देना चाहिए। परमेश्वर तुमसे यही अपेक्षा करता है, यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का आदेश है और बेशक, हर पुरुष और महिला से परमेश्वर यही अपेक्षा करता है। जब तुम यह सब करने में सक्षम होगे तभी सत्य खोज रहे होगे और परमेश्वर का अनुसरण कर रहे होगे। अगर तुम इसमें सक्षम नहीं हो और इस तरह से अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम बस नाममात्र के विश्वासी हो, तुम सच्चे दिल से परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते, और सत्य का अनुसरण करने वालों में से भी नहीं हो। ... कुछ लोग कहते हैं, “अगर मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए विदेश जाता हूँ, तो मुझे अपने परिवार का त्याग करना पड़ेगा। क्या मैं कभी अपने पति (या पत्नी) को नहीं देख पाऊँगा? क्या हमें एक दूसरे से दूर अलग-अलग जगहों पर नहीं रहना पड़ेगा? क्या हमारा वैवाहिक संबंध टूट जाएगा? तब मैं अपने पति (या पत्नी) के बिना कैसे रहूँगा?” क्या तुम्हें यह सोचना चाहिए कि तुम्हारा भविष्य कैसा होगा? वह कौन-सी चीज़ है जिसके बारे में तुम्हें सबसे ज़्यादा सोचना चाहिए? यदि तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति बनना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे ज़्यादा इस बारे में सोचना चाहिए कि परमेश्वर तुमसे जिस चीज को छोड़ने के लिए कहता है उसे कैसे छोड़ें और परमेश्वर तुमसे जिस चीज को पूरा करने के लिए कहता है उसे कैसे पूरा करें। भले ही भविष्य में तुम्हें वैवाहिक जीवन और अपने साथी के बिना रहना हो, फिर भी तुम अपने अंतिम वर्षों को देखने के लिए और अच्छी तरह से जीने के लिए जीवित रह सकते हो। लेकिन यदि तुम अपना कर्तव्य निभाने के इस अवसर को छोड़ देते हो, तो यह तुम्हारे उस कर्तव्य को छोड़ने के बराबर है जिसे तुम्हें करना चाहिए और उस मिशन को छोड़ने के बराबर है जो परमेश्वर ने तुम्हें सौंपा है। परमेश्वर की नजर में, तब तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति, वास्तव में परमेश्वर को चाहने वाले व्यक्ति या उद्धार का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं होगे। यदि तुम सक्रिय रूप से उद्धार प्राप्त करने के अपने अवसर और अधिकार को छोड़ देते हो, अपने मिशन को छोड़ देते हो, और इसके बजाय तुम वैवाहिक जीवन को चुनते हो, अपने जीवनसाथी के साथ रहने का विकल्प चुनते हो, उसका साथ देने और उसे संतुष्ट करने का विकल्प चुनते हो, और अपने वैवाहिक संबंध को अक्षुण्ण रखने का विकल्प चुनते हो तो अंत में तुम कुछ प्राप्त करते हुए निश्चित रूप से कुछ खोओगे। तुम समझते हो कि तुम क्या खो बैठोगे, है न?” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (10))। “परमेश्वर ने तुम्हें एक स्थिर जीवन और एक जीवनसाथी बस इसलिए दिया है ताकि तुम बेहतर ढंग से जी सको और तुम्हारे पास तुम्हारा ख्याल रखने वाला कोई हो, तुम्हारे पास तुम्हारे साथ खड़ा होने वाला कोई हो, इसलिए नहीं कि तुम परमेश्वर और उसके वचनों को भूल सको या जीवनसाथी पाने के बाद अपना कर्तव्य निभाने के दायित्व या जीवन में उद्धार पाने के लक्ष्य को त्यागकर सिर्फ अपने जीवनसाथी के लिए जियो। अगर तुम वाकई ऐसा करते हो, इसी तरह से जीते हो, तो मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम जल्द-से-जल्द अपना रास्ता बदलोगे। चाहे कोई तुम्हारे लिए कितना ही जरूरी क्यों न हो, या वह तुम्हारे जीवन, तुम्हारी आजीविका या यहाँ तक कि तुम्हारे जीवन मार्ग के लिए कितना ही महत्व रखता हो, वह तुम्हारी मंजिल नहीं हैं, क्योंकि वह सिर्फ एक भ्रष्ट मनुष्य है। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए तुम्हारे मौजूदा जीवनसाथी की व्यवस्था की है और तुम उसके साथ जीवन बिता सकते हो। अगर परमेश्वर तुम्हारे लिए कोई और जीवनसाथी निर्धारित कर देता, तो तुम फिर भी उतने ही अच्छे से जी सकते थे, और इसलिए तुम्हारा वर्तमान जीवनसाथी तुम्हारा एकमात्र नहीं है, न ही वह तुम्हारी मंजिल है। सिर्फ परमेश्वर वह एकमात्र है जिसे तुम्हारी मंजिल सौंपी जा सकती है, और सिर्फ परमेश्वर वह एकमात्र है जिसे समस्त मानवजाति की मंजिल सौंपी जा सकती है। अपने माँ-बाप को छोड़ने के बाद भी तुम जिंदा रह सकते हो और जीवन बिता सकते हो, और बेशक अपने जीवनसाथी को छोड़ने के बाद भी तुम उतना ही अच्छा जीवन जी सकते हो। तुम्हारी मंजिल न तो तुम्हारे माँ-बाप हैं और न ही तुम्हारा जीवनसाथी। सिर्फ इसलिए कि तुम्हारा एक वैवाहिक जीवन है, तुम्हारे पास एक साथी है, तुम्हारे पास अपना दिल और अपनी देह को विश्राम देने के लिए एक स्थान है, जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज को मत भूलो, परमेश्वर का तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने का आदेश देना। अगर तुम परमेश्वर को भूल जाते हो, यह भूल जाते हो कि उसने तुम्हें क्या करने को सौंपा है, उस कर्तव्य को भूल जाते हो जो एक सृजित प्राणी को निभाना चाहिए, और अपनी पहचान को भुला देते हो, तो तुम अपनी अंतरात्मा और विवेक को पूरी तरह से खो दोगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (11))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि शादी, परिवार और बच्चे सब परमेश्वर के उपहार होते हैं, परमेश्वर ने ये लोगों को इसलिए दिए ताकि वे अकेला महसूस न करें और बेहतर जीवन जीने के लिए पति-पत्नी एक-दूसरे का ख्याल रख सकें और साथ दे सकें, न कि इसलिए कि लोग अपने जीवनसाथी को अपने जीवन की मंजिल मानें या परिवार या वैवाहिक जीवन को कायम रखने को अपने जीवन का लक्ष्य मानें। लेकिन मैं सत्य को नहीं समझता था और सोचता था कि मेरी जीवनसाथी ही मेरी मंजिल है और वैवाहिक जीवन में खुशी खोजना ही जीवन में मेरा लक्ष्य है। चूँकि मेरे बचपन में अपने माता-पिता के प्यार और परिवार के स्नेह का अभाव था, इसलिए जब मैं बड़ा हुआ तो एक परिवार के स्नेह और सुख के लिए लालायित रहता था। अपनी पत्नी से शादी करने के बाद मैंने अपनी पत्नी के प्यार और अपने बच्चे से मिली खुशी और आनंद का अनुभव किया और मुझे और भी यकीन हो गया कि एक आदर्श परिवार होना एक अद्भुत बात है। इसलिए जब मैंने सुना कि मेरी पत्नी तलाक के लिए अर्जी देना चाहती है तो मेरा दिल टूट गया और मुझे लगा जैसे मैं अपने वैवाहिक जीवन और परिवार के बिना जीना जारी नहीं रख सकता। यहाँ तक कि मैंने अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए अपने कर्तव्य छोड़ने और घर लौटने के बारे में सोचा। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे लिए मेरे दिल में परमेश्वर और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से ज्यादा महत्व वैवाहिक जीवन रखता है। सच तो यह था कि परमेश्वर ने मुझे एक वैवाहिक जीवन और एक परिवार दिया था और मुझे परिवार की जिम्मेदारी दी थी, लेकिन परमेश्वर का इरादा यह नहीं था कि मैं शादी करने के बाद अपने कर्तव्य छोड़ दूँ। हर समय सत्य का अनुसरण करना और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना ऐसी चीजें हैं जो मुझे करनी ही चाहिए और ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। मैंने इस बारे में सोचा कि कैसे बहुत से पश्चिमी मिशनरियों ने प्रभु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए सक्रिय रूप से अपनी शादियों, नौकरियों और आरामदायक जीवन को छोड़ दिया और वे सुसमाचार प्रचार करने के लिए हजारों मील की यात्रा करके चीन आए और कैसे उनके कारण पूरे चीन में प्रभु यीशु का सुसमाचार फैला। मैंने परमेश्वर के इतने सारे वचनों के सिंचन और प्रावधान का आनंद लिया था, फिर भी मैंने परमेश्वर के लिए क्या किया था? जब मेरी पत्नी ने कहा कि वह तलाक चाहती है तो मेरा पहला विचार यह था कि तलाक के बाद परिवार के बिना मेरी बच्ची पीड़ा सहेगी, और मुझे अब उस स्नेह और सुख का आनंद नहीं मिलेगा जो परिवार के साथ आता है। मेरा दिल तब दर्द और दुख से भर गया और मैंने अपने वैवाहिक रिश्ते को बचाने के लिए अपने कर्तव्य छोड़कर घर लौटने के बारे में सोचा। मैं केवल अपने हितों के बारे में विचार कर रहा था और मुझे परमेश्वर के इरादे की कोई परवाह नहीं थी। उन पश्चिमी मिशनरियों की तुलना में मुझमें अंतरात्मा की नितांत कमी थी और मैं स्वार्थ से ओतप्रोत था। और मैं इतने सालों तक मिले परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रावधान के लायक नहीं था। यह सोचकर मुझे बहुत अधिक अपराध-बोध महसूस हुआ और यह महसूस हुआ कि मुझे अपने भविष्य के जीवन को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए या परेशान नहीं होना चाहिए। इस समय सबसे महत्वपूर्ण यह सोचना था कि मैं अपने कर्तव्य कैसे अच्छे से निभाऊँ। बाद में मैंने अपना ध्यान अपने कर्तव्यों पर लगाया।
एक महीने बाद मेरी सास ने एक पत्र भेजा कि मेरे साले ने आंतरिक स्रोतों के जरिए पता लगाया कि मैं शायद वांछितों की सूची में नहीं हूँ और पुलिस बस मुझे गिरफ्तार करने के लिए तलाश रही है। अगर मैं स्थानीय इलाके को छोड़ देता हूँ तो मुझे छिपे नहीं रहना पड़ेगा। मेरी पत्नी, बच्ची और सास सब एक दूसरे प्रांत में थीं और मेरी सास ने कहा कि क्या मैं वहाँ जाने का इच्छुक था। मैंने मन ही मन सोचा, “अगर मैं अपनी पत्नी और बच्ची के पास लौट सकता हूँ तो मेरा परिवार नहीं टूटेगा और मेरी बच्ची परिवार के स्नेह का आनंद ले पाएगी।” लेकिन मुझे अचानक ख्याल आया कि मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की थी कि मैं अपने कर्तव्यों को कायम रखूँगा। अब अपने वैवाहिक संबंध को बचाने के लिए अपने कर्तव्यों को छोड़ना और वापस जान परमेश्वर को धोखा देना होगा! यही नहीं, इस कर्तव्य को निभाने के लिए मुझसे अधिक उपयुक्त कोई नहीं था। अगर मैं छोड़कर चला गया तो कार्य निश्चित रूप से प्रभावित होगा। इस समय मुझे एहसास हुआ कि उस दिन अपनी सास का पत्र प्राप्त करना मेरे लिए एक परीक्षा थी कि देखो मैं क्या चुनता हूँ। मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने और अपने कर्तव्यों की प्राथमिकता तय करने का चयन करना था। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अपने दिल में थोड़ा-सा कमजोर महसूस करता हूँ और मैं अपना वैवाहिक संबंध बचाने के लिए वापस जाना चाहता हूँ, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं अपने कर्तव्य नहीं छोड़ सकता, तुम्हारे साथ विश्वासघात करने की तो बात ही दूर है। परमेश्वर, कृपया मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं अपनी गवाही में अडिग रहूँ।”
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और यह जाना कि कैसे अभ्यास किया जाए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। हो सकता है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किंतु तुम कभी नहीं देखते हो या महसूस नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्ति करता है, तुमसे प्रेम करता है और तुम्हारे प्रति सरोकार दिखाता है। तो तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो, जो तुम्हें प्रेम करते हैं या तुम्हें बहुत स्नेह करते हैं। तुम उन चीज़ों को देखते हो, जो तुम्हारी देह के लिए लाभकारी हैं, तुम उन लोगों एवं चीज़ों की परवाह करते हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो। यह मनुष्य की तथाकथित निःस्वार्थता है। ऐसे ‘निःस्वार्थ’ लोग कभी भी उस परमेश्वर की चिंता नहीं करते, जो उन्हें जीवन देता है। परमेश्वर के विपरीत, मनुष्य की निःस्वार्थता मतलबी एवं निंदनीय हो जाती है। मनुष्य जिस चीज को निःस्वार्थता मानता है, वह खोखली एवं अवास्तविक, मिलावटी, परमेश्वर से असंगत एवं परमेश्वर से असंबद्ध है। मनुष्य की निःस्वार्थता सिर्फ स्वयं के लिए है, जबकि परमेश्वर की निःस्वार्थता उसके सार का सच्चा प्रकाशन है। यह बिल्कुल परमेश्वर की निःस्वार्थता की वजह से है कि मनुष्य उससे निरंतर आपूर्ति प्राप्त करता रहता है। तुम लोग शायद इस विषय से, जिसके बारे में आज मैं बात कर रहा हूँ, अत्यंत गहराई से प्रभावित न हो और मात्र सहमति में सिर हिला रहे हो, परंतु जब तुम अपने हृदय में परमेश्वर के हृदय को गहराई से महसूस करने की कोशिश करोगे तो तुम अनजाने में ही इसे जान जाओगे : सभी लोगों, मामलों एवं चीज़ों के मध्य, जिन्हें तुम इस संसार में महसूस कर सकते हो, केवल परमेश्वर की निःस्वार्थता ही वास्तविक एवं ठोस है, क्योंकि सिर्फ परमेश्वर का प्रेम ही तुम्हारे लिए बिना किसी शर्त के है और बेदाग है। परमेश्वर के अतिरिक्त, अन्य किसी की तथाकथित निःस्वार्थता झूठी, सतही एवं अप्रामाणिक है; इसका एक उद्देश्य होता है, निश्चित इरादे होते हैं, इसमें लेन-देन होता है और यह परीक्षा में नहीं ठहर सकती है। तुम यह तक कह सकते हो कि यह गंदी एवं घिनौनी है। क्या तुम लोग इन वचनों से सहमत हो?” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I)। परमेश्वर के वचनों के हर वाक्य ने मेरे दिल को बेध दिया, खासकर परमेश्वर के इन वचनों ने : “मानवजाति एक भौतिक संसार में रहती है। हो सकता है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, किंतु तुम कभी नहीं देखते हो या महसूस नहीं करते हो कि किस प्रकार परमेश्वर तुम्हारे लिए आपूर्ति करता है, तुमसे प्रेम करता है और तुम्हारे प्रति सरोकार दिखाता है। तो तुम क्या देखते हो? तुम अपने खून के रिश्तेदारों को देखते हो, जो तुम्हें प्रेम करते हैं... तुम उन लोगों एवं चीज़ों की परवाह करते हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो।” परमेश्वर जो कहता है वह सच है। जब से सीसीपी का पुलिस बल मेरा पीछा कर रहा था, भाई-बहन हमेशा मेरी मेजबानी करते आ रहे थे और खतरे के जोखिम के बावजूद वे मुझे कहीं और ले जाते थे। यह सब परमेश्वर का प्रेम था। खासकर जब मैंने अभी-अभी घर छोड़ा था, मैं अक्सर अपनी पत्नी और बच्चे के बारे में सोचता था और मेरा दिल दर्द और कमजोरी से भर जाता था। ये परमेश्वर के वचन ही थे जो मुझे निरंतर सींचते और प्रबुद्ध करते थे, सत्य को समझने और आगे बढ़ने की आस्था रखने में मुझे सक्षम बना रहे थे। पिछले कुछ सालों में अपना कर्तव्य निभाने के दौरान परमेश्वर ने मेरे लिए विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम किया था, मुझे परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और कुछ जीवन प्रगति करने का मौका दिया था। मैंने परमेश्वर से इतना अधिक प्राप्त किया था! लेकिन जब मुझे घर से यह पत्र मिला कि मैं वांछित नहीं हूँ और मैं उनके साथ फिर से एकजुट होने के लिए कहीं और जा सकता हूँ तो सबसे पहले मैंने अपनी पत्नी और बेटी के बारे में सोचा। मैंने सोचा कि अगर मैं अपनी पत्नी के पास लौट जाऊँ तो मैं अपने वैवाहिक संबंध को बचा सकता हूँ। इसलिए मैं उत्साहित हुए बिना नहीं रह सका और मैं तुरंत अपने परिवार के पास लौटने के लिए लालायित था। इससे साबित हुआ कि मेरे दिल में केवल मेरी पत्नी और बेटी थीं : मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी। यह सोचते हुए कि परमेश्वर का प्रेम मेरे लिए कितना महान था और मैंने बदले में परमेश्वर को लगभग कुछ भी नहीं दिया था, मेरे दिल में गहरा अपराध-बोध और पछतावा हुआ। मेरी ऋणी होने की भावनाओं ने मुझे फूट-फूटकर रोने पर मजबूर कर दिया और मैंने इतना स्वार्थी और मानवता की कमी होने के लिए खुद से नफरत की। मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम सच्चा, निस्वार्थ और पवित्र है, जिसमें कोई अशुद्धता नहीं है और बदले में कुछ भी नहीं माँगा जाता। लेकिन इंसानी प्यार पूरी तरह लेन-देन युक्त और अशुद्ध है और झूठी भावनाओं और स्वार्थ से भरा हुआ है। ठीक वैसे ही जैसे जब मैं अपने वैवाहिक संबंध को बचाने के लिए घर लौटना चाहता था तो इसके पीछे व्यक्तिगत इरादे थे। मुझे चिंता थी कि वैवाहिक संबंध टूटने के बाद मैं अकेला जीवन जियूँगा और मैं फिर कभी परिवार से मिलने वाले स्नेह और खुशी का आनंद नहीं ले पाऊँगा। मेरी पत्नी का तलाक चाहना भी उसके भविष्य की चिंता पर आधारित था। जब मैं घर पर था तो मेरी पत्नी अक्सर कहती थी, “अगर तुम मेरी परवाह न करते और मुझसे ठीक से पेश न आते तो मैं तुम्हें बहुत पहले छोड़ चुकी होती।” यह एक हकीकत बन गया था। चूँकि मैं हमेशा उसके साथ नहीं रह सकता हूँ, इसलिए वह आखिरकार मुझे छोड़ ही देगी। मेरी पत्नी का मुझसे प्यार कभी सच्चा नहीं था। यह सशर्त था। उसी समय मैंने यह भी सोचा, “मेरी पत्नी सत्य का अनुसरण नहीं करती है, बल्कि सांसारिक प्रवृत्तियों पर ध्यान देती है। वह अक्सर मेरे सामने नकारात्मक ढंग से बोलती है, मुझे रोकती है और मुझसे एक अच्छे भौतिक जीवन की माँग करती है। असल में मेरी पत्नी एक छद्म-विश्वासी है। वह धन और सुख का अनुसरण करती है और संसार के लोगों के मार्ग पर चलती है। जबकि, मैं परमेश्वर का अनुसरण करना चाहता हूँ और सत्य के अनुसरण के मार्ग पर चलना चाहता हूँ। हमारा एक-दूसरे से बेमेल होना नियत है और अगर हम जबरदस्ती एक साथ रहते हैं तो न केवल कोई खुशी नहीं होगी, बल्कि यह मेरे लिए अंतहीन पीड़ा भी लाएगा।” घर छोड़ने से पहले अपनी पत्नी के साथ हुए तर्क-वितर्क और झगड़े मेरी याद में अभी भी ताजा थे। अगर मैंने अभी घर लौटने का फैसला किया तो हो सकता है हमारा वैवाहिक संबंध बच जाए, लेकिन मेरा हाल भी वैसा ही हो जाएगा जैसा तीन साल पहले था, दैहिक भावनाओं में फँसा हुआ और सत्य का अनुसरण करने या अपने कर्तव्य निभाने के मन के बिना, बचाए जाने की तो बात ही छोड़ दो। साथ ही मुझे हमेशा यह चिंता रहती थी कि कैसे तलाक से मेरी बेटी आहत होगी या वह भविष्य में कैसे और भी अधिक कठिनाइयाँ सहेगी। लेकिन सच में, इन बातों का फैसला करना मेरे हाथ में नहीं था, क्योंकि माता-पिता अपने बच्चों को केवल शारीरिक और भौतिक रूप से ही मदद और देखभाल दे सकते हैं, लेकिन एक बच्चे की किस्मत कैसी होगी, उसे कौन-सा दुख सहना होगा और कौन-से आशीष मिलेंगे, यह सब पहले से ही परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और व्यवस्थित है। मैं हमेशा अपनी बच्ची के बारे में चिंता किया करता था—यह भी परमेश्वर की संप्रभुता में मेरी आस्था का अभाव था। यह सब समझने के बाद मैं अपनी बेटी को परमेश्वर के हाथ में सौंपने का इच्छुक हो गया। बाद में मेरी सास से मुझे पत्र भेजा कि मेरी बेटी ठीक चल रही है और उसने एक दर्जन से अधिक कलीसियाई भजन सीख लिए हैं और वह परमेश्वर की स्तुति में नृत्य भी कर सकती है। मैंने एहसास किया कि मेरी चिंताएँ अनावश्यक थीं। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, शपथ ली कि मैं अपने वैवाहिक संबंध से बाधित नहीं होऊँगा और मैं ठीक से सत्य का अनुसरण करूँगा और अपने कर्तव्य निभाऊँगा। अक्टूबर 2023 में मुझे पता चला कि मेरी पत्नी को छद्म-विश्वासी निरूपित किया गया है और कलीसिया से बाहर निकाल दिया गया है, लेकिन मुझे काफी सुकून महसूस हुआ और मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया कि उसने मुझे पत्नी की वजह से अपने कर्तव्य छोड़ने से बचा लिया।
बाद में मैं यह चिंतन किए बिना न रह सका, “मैं सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार होने को क्यों हमेशा अपने जीवन का अनुसरण मानता था और इन चीजों को बनाए रखने के लिए भरसक कोशिश क्यों करता था? इस समस्या का मूल कारण क्या है?” मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “हजारों वर्षों की ‘राष्ट्रीय भावना’ के माध्यम से मानव हृदय में गहराई तक बैठे हानिकारक प्रभावों और सामंती सोच ने लोगों को बाँध और जकड़ दिया है, जिससे उनमें जरा-सी भी स्वतंत्रता नहीं बची है, न कोई महत्वाकांक्षा या दृढ़ता है और न ही प्रगति करने की कोई इच्छा है; इसके बजाय वे नकारात्मक और प्रतिगामी बने रहते हैं, गुलामी की मानसिकता में जकड़े रहते हैं, इत्यादि। इन वस्तुनिष्ठ कारकों ने मानवता के वैचारिक दृष्टिकोण, आकांक्षाओं, नैतिकता और स्वभाव पर एक अमिट गंदा और बदसूरत रंग चढ़ा दिया है। ऐसा लगता है कि मनुष्य आतंकवाद की एक अँधेरी दुनिया में जी रहे हैं और उनमें से कोई भी इससे पार पाने के बारे में नहीं सोचता या एक आदर्श दुनिया में जाने के बारे में नहीं सोचता; बल्कि, वे अपने जीवन की स्थिति को लेकर संतोष की भावना के साथ अपने दिन बिताते हैं : बच्चे पैदा करना और पालना, प्रयास करना, पसीना बहाना, अपने श्रम में लगे रहना और एक आरामदायक और सुखी परिवार, वैवाहिक स्नेह, संतानोचित बच्चों, अपने बुढ़ापे में आनंद और शांति से अपना जीवन जीने का सपना देखना...। दसियों, हजारों, लाखों वर्षों से लेकर अब तक लोग इसी तरह अपना समय बरबाद करते आ रहे हैं, किसी ने भी समस्त मानव जीवन में सबसे शानदार जीवन का निर्माण नहीं किया है, वे केवल इस अँधेरी दुनिया में एक-दूसरे की हत्या, प्रसिद्धि और लाभ की दौड़ और एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें रचने में लगे रहते हैं। किसने कब परमेश्वर के इरादे जानने की कोशिश की है? क्या किसी ने कभी परमेश्वर के कार्य पर ध्यान दिया है? लोगों के उन सभी हिस्सों पर, जहाँ अंधकार ने प्रभाव जमा लिया है, एक लंबे अरसे से उनकी मानव-प्रकृति बन गए हैं और इसलिए परमेश्वर के कार्य को करना काफी कठिन हो गया है, यहाँ तक कि जो परमेश्वर ने लोगों को आज सौंपा है, उस पर वे ध्यान भी देना नहीं चाहते” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (3))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गया कि मैं पारंपरिक संस्कृति और शैतान द्वारा डाले गए विचारों से प्रभावित और विषाक्त हो चुका था, जैसे, “एक दूसरे का हाथ पकड़ना और साथ-साथ बूढ़ा होना” और “प्रेमालु पति-पत्नी सुख-दुख में एक दूसरे का सहारा बनते हैं,” मैं एक सुखी वैवाहिक संबंध और सामंजस्यपूर्ण परिवार को अपने अनुसरण के लक्ष्य मान रहा था, मैं नहीं जानता था कि लोग क्यों जीते हैं या एक सार्थक और मूल्यवान तरीके से कैसे जिया जाए। मुझे याद आया जब मैं छोटा था तो अपने माता-पिता से स्नेहिल पारिवारिक माहौल न मिलने के कारण मुझे खुद पर दया आती थी और मैं परिवार की एकजुटता को खुशी का प्रतीक मानता था। शादी के बाद मैंने इस बात का आनंद लिया कि मेरी पत्नी मेरी देखभाल और मेरी चिंता करती है, साथ ही मैंने अपने परिवार और बेटी से मिली खुशी का भी आनंद लिया, इसलिए मैं अपने वैवाहिक जीवन की खुशी को कायम रखने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करना चाहता था। परमेश्वर को पाने के बाद मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाता था, लेकिन मेरा दिल घर में लगा रहता था, मैं अपनी पत्नी और बच्चे से मिलने के लिए जल्दी से घर लौटने के बारे में सोचता था और अपने कर्तव्य में बस खानापूरी करता था। कभी-कभी मैं अपने कर्तव्य में इतना व्यस्त होता था कि अपनी पत्नी की अनदेखी कर बैठता था, फिर जब मैं घर पहुँचता था तो इसकी भरपाई करने की कोशिश करता था। मेरी पत्नी चाहे जो भी खाना, खरीदना चाहती थी या जहाँ भी जाना चाहती थी तो भले ही उसकी माँगें अविवेकपूर्ण होती थीं, मैं उन्हें पूरा करने की भरसक कोशिश करता था। मैं उसे खुश करने के लिए सभी तरह के तरीके आजमाता था। बाद में पुलिस गिरफ्तारियों के कारण मैं तीन साल तक घर नहीं लौट सका और मेरी पत्नी तलाक के लिए अर्जी देना चाहती थी। मुझे चिंता थी कि अगर हमारा तलाक हो गया तो जिस घर को बसाने के लिए मैंने इतनी मेहनत की वह हाथ से चला जाएगा, इसलिए मैं अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए घर लौटना चाहता था। मैंने तो कुछ मौकों पर अपने कर्तव्य लगभग छोड़ दिए थे और मैं परमेश्वर के साथ विश्वासघात लगभग कर बैठा था। पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मैं सचमुच खतरे में था। अब मैं आखिरकार साफ-साफ देख सकता था कि एक सुखी वैवाहिक जीवन और एक सामंजस्यपूर्ण परिवार के अनुसरण के विचार और दृष्टिकोण मुझे बाँधते आ रहे थे, मुझसे यह मनवा रहे थे कि सृजित प्राणियों के कर्तव्य की तुलना में वैवाहिक जीवन और परिवार अधिक महत्वपूर्ण हैं, जिसके कारण मैंने परमेश्वर में अपने सात या आठ साल के विश्वास में ज्यादा सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया और बहुत समय बर्बाद कर दिया। अतीत में मैं हमेशा यह विश्वास करता आया था कि अगर मैं अपनी पत्नी के प्रति अच्छा रहा और इस परिवार के लिए प्रयास करता रहा तो मेरा वैवाहिक जीवन सुखी होगा। मैं अपनी पत्नी को खुश करने के लिए हर संभव तरीका आजमाता था, ऐसा करके अपने वैवाहिक जीवन को बचाने की उम्मीद करता था, फिर भी अंत में मेरी पत्नी ने मुझे छोड़ दिया। मेरी पत्नी की मेरे प्रति मेहरबानी पूरी तरह से मेरे द्वारा किए गए प्रयास और उसके लिए चुकाई गई कीमत के कारण थी, और यहाँ तक कि इसलिए भी क्योंकि मैं उसे खुश करने के लिए अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा को गिराने तक चला गया था। लेकिन अब जब मेरी पत्नी मेरी दिखाई गई मेहरबानी का आनंद नहीं ले सकती थी, तो वह तलाक लेने के लिए उत्सुक हो गई ताकि वह किसी और को ढूँढ़ सके। हमारा वैवाहिक जीवन पूरी तरह से लेन-देन वाला था। जब हासिल करने के लिए कुछ था तो हमारे बीच प्यार था और मिठास थी, लेकिन जब फायदा उठाने के लिए कुछ मूल्यवान चीज नहीं बची तो मुझे ठोकर मारकर दरकिनार कर दिया गया। इसमें खुशी कहाँ थी? इन बातों पर पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मुझे एहसास हुआ कि इतने सालों का मेरा सारा कड़ा परिश्रम और बलिदान मुझे सच्चा प्यार और खुशी नहीं दे सका; इसके बजाय, बदले में मुझे केवल दिल टूटना और दर्द ही मिला। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि पति-पत्नी के बीच प्यार और वैवाहिक खुशी का विचार तो बस शैतान द्वारा लोगों को गुमराह करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मीठी गोली है, झूठ और धोखे के सिवाय कुछ नहीं है। सालोंसाल वैवाहिक सुख के मेरे अनुसरण की कीमत बहुत बड़ी थी और यह बिल्कुल भी इस लायक नहीं थी! मैं परमेश्वर में विश्वास करता था लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करता था, बल्कि बस वैवाहिक सुख की तलाश में रहता था। इसमें मैं शैतान की चालों में फँस रहा था। मैंने अपना सारा समय और ऊर्जा अपनी पत्नी को खुश करने और अपने वैवाहिक जीवन को बचाने की कोशिश में लगा दिया, जिसके कारण मैंने वह सत्य हासिल नहीं किया जो मुझे हासिल कर लेना चाहिए था, न ही वे कर्तव्य अच्छे से निभाए जो मुझे अवश्य ही निभाने थे। इसने न केवल मेरी जीवन संवृद्धि में विलंब कर दिया, बल्कि परमेश्वर की उम्मीदों को भी निराश कर दिया। मैं सचमुच मूर्ख था!
बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और मैं इस बारे में कुछ समझ हासिल करने लगा कि लोगों को जीवन में किस चीज का अनुसरण करना चाहिए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम सृजित प्राणी हो—तुम्हें निस्संदेह परमेश्वर की आराधना और सार्थक जीवन का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर की आराधना नहीं करते हो बल्कि अपनी अशुद्ध देह के भीतर रहते हो, तो क्या तुम बस मानव भेष में जानवर नहीं हो? चूँकि तुम मानव प्राणी हो, इसलिए तुम्हें स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाना और सारे कष्ट सहने चाहिए! आज तुम्हें जो थोड़ा-सा कष्ट दिया जाता है, वह तुम्हें प्रसन्नतापूर्वक और दृढ़तापूर्वक स्वीकार करना चाहिए और अय्यूब तथा पतरस के समान सार्थक जीवन जीना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (2))। “सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास अवश्य करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीना आना चाहिए, और उनमें पतरस के ज्ञान और अनुभवों का होना जरूरी है। लोगों को उन चीजों का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं शुद्ध प्रेम का अनुसरण जरूर करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण अवश्य करना चाहिए जिसका मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; तभी वे बिल्कुल पतरस जैसे बन पाएँगे। तुम्हें सक्रिय रूप से सकारात्मक पक्ष में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और साथ ही, तुम्हें अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों को नजरअंदाज करते हुए निष्क्रिय नहीं हो जाना चाहिए और खुद को पीछे नहीं हटने देना चाहिए क्योंकि तुम अस्थायी आसानी से संतुष्ट हो। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें बिल्कुल जानवरों जैसे इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए और अपने जीवन से एक ऐसे खिलौने की तरह पेश नहीं आना चाहिए जो खेलने के लिए है। संकल्प रखने वाले और परमेश्वर से प्रेम करने वाले हर व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं हैं और ऐसा कोई न्याय नहीं है जिस पर वह अडिग न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा मामला कोई नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है और तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए और उस मार्ग में अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें एहसास भी नहीं होगा और तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; उसके बाद क्या तुम्हारे पास अभी भी परमेश्वर से प्रेम करने का इस प्रकार का अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर बिल्कुल पतरस जैसा संकल्प और जमीर होना चाहिए; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खेल नहीं खेलने चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना चाहिए और इससे निपटने में सक्षम होना चाहिए—यह विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे इस तरीके से प्रेम करना चाहिए कि यह ज्यादा निष्कलंक, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। विश्वासियों के रूप में हमें परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी आराधना करने की कोशिश करनी चाहिए। केवल अय्यूब और पतरस की तरह जीना ही सार्थक है। मुझे ख्याल आया कि कैसे पतरस अपनी जवानी में पूरे दिल से परमेश्वर का अनुसरण करता था, लेकिन उसके माता-पिता उम्मीद करते थे कि वह उत्कृष्ट प्रदर्शन करे और एक अधिकारी बने। लेकिन उसने अपने माता-पिता की उम्मीदों को अपना लक्ष्य नहीं बनाया, न ही उसने इस बात की परवाह की कि क्या उसकी पसंदगियों का असर अपने माता-पिता के साथ रिश्ते पर पड़ेगा। इसके बजाय, उसने परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने के प्रयास में खुद को समर्पित कर दिया और अंत में वह परमेश्वर के लिए सूली पर उल्टा लटका दिया गया और वह परमेश्वर से प्रेम करने का एक आदर्श बन गया। फिर अय्यूब को ले लो। परीक्षणों में उसने अपने सारे मवेशी, भेड़ें और बच्चे खो दिए और उसका शरीर घावों से भर गया और उसकी पत्नी ने कहा, “परमेश्वर को श्राप दो, और मर जाओ!” (अय्यूब 2:9)। जब अय्यूब ने अपनी पत्नी को यह कहते हुए सुना तब भी उसने परमेश्वर में अपनी आस्था बनाए रखी और उसने अपनी पत्नी को एक मूर्ख औरत कहकर फटकारा। वह परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहा और उसने शैतान को शर्मिंदा किया। पतरस और अय्यूब के अनुभवों से मैंने देखा कि परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने का प्रयास करके ही और अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाकर और अपनी गवाही में अडिग रहकर हम परमेश्वर की स्वीकृति पा सकते हैं। यही अत्यंत सार्थक जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। उसके बाद मैंने अपना दिल शांत किया और खुद को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित कर दिया और साथ ही, मैंने अनुभवजन्य गवाही लेख लिखने का अभ्यास किया। बाद में मुझे पता चला कि मेरे एक अनुभवजन्य लेख पर एक वीडियो बनाया गया है। अपने अनुभव का उपयोग परमेश्वर की गवाही देने के लिए कर पाने से मैं बहुत प्रभावित हुआ और मुझे अधिकाधिक महसूस होता गया कि केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर की गवाही देना ही सबसे सार्थक है और केवल यही सच्ची खुशी और आनंद ला सकता है।
फरवरी 2024 में मुझे अपने माता-पिता का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि मेरी पत्नी ने अदालत में तलाक के लिए अर्जी दी है। यह खबर मिलने पर मैं काफी शांत था और मैं इस बात से व्यथित या दुखी नहीं हुआ कि मेरी पत्नी मुझे तलाक दे रही है। इसके बजाय, मुझे लगा कि यह मुक्ति का एक रूप है। अब मैं इन बोझों को उतार सकता हूँ और पूरे दिल से परमेश्वर का अनुसरण कर सकता हूँ। यह मेरे लिए परमेश्वर का उद्धार है और मैं अपने दिल की गहराई से सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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