परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" | अंश 144

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V" | अंश 144

38 |31 जुलाई, 2020

शैतान के प्रलोभन

(मत्ती 4:1-4) तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उस की परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात, निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखनेवाले ने पास आकर उस से कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" यीशु ने उत्तर दिया: "लिखा है, 'मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।'"

ये वे शब्द हैं जिनसे शैतान ने प्रभु यीशु की परीक्षा करने की कोशिश की। इबलीस् ने जो कहा उसकी भावना क्या है? आगे बढ़कर इसे पढ़ो, ("यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।") शैतान ने ये शब्द कहे, जो कि बिल्कुल साधारण हैं। परन्तु क्या इन शब्दों के आवश्यक भाव के साथ एक समस्या है? (हां।) क्या समस्या है? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है," तो अपने मन में क्या वह जानता था कि प्रभु यीशु परमेश्वर का पुत्र है? क्या वह जानता था कि वह मसीह है? (हां।) तो उसने क्यों कहा "यदि तू है"? (वह प्रभु की परीक्षा लेने का प्रयत्न कर रहा था।) हां, सचमुच वह परमेश्वर की परीक्षा लेने की कोशिश कर रहा था। पर उसके ऐसा करने का मकसद क्या था? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।" अपने हृदय में वह जानता था कि यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है। यह उसके मन में बिल्कुल स्पष्ट था, पर इसके बावजूद, क्या उसने अपना समर्पण किया या उसने उसकी आराधना की? (नहीं।) वह क्या करना चाहता था? वह यह करना और ये शब्द कहना चाह रहा था ताकि यीशु मसीह क्रोध करे और अपने प्रलोभन में फंसा ले और यीशु मसीह को अपने सोचे हुए तरीके के अनुसार काम करवाकर अपने फंदे में फंसा ले। क्या इसका मतलब यह नहीं था? उसका मन साफ जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, पर फिर भी उसने ऐसा कहा। क्या यह शैतान का स्वभाव नहीं? शैतान का स्वभाव क्या है? (धूर्तता, दुष्टता और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना।) उसके मन में परमेश्वर के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है। यहां वह क्या नकारात्मक बात कर रहा था? क्या वह परमेश्वर पर आक्रमण करना नहीं चाह रहा था? वह इस विधि से परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था इसलिए उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ" क्या यह शैतान की बुरी नियत नहीं? (हाँ।) वह वास्तव में क्या करना चाह रहा था? इसका मकसद बिल्कुल स्पष्ट है; वह प्रभु यीशु मसीह के स्थान और पहचान को खंडित करने के लिए इस विधि के उपयोग की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे, और यदि तू ऐसा नहीं करता तो परमेश्वर का पुत्र नहीं है और यह काम तू मत कर" क्या यहाँ उसका यह मतलब था? वह इस विधि का प्रयोग कर परमेश्वर पर आक्रमण करना चाह रहा था और वह परमेश्वर के काम को तहस-नहस करके खत्म करना चाह रहा था। यह शैतान का दुष्कर्म और धूर्तता है। उसका दुष्कर्म उसके स्वभाव की प्राकृतिक अभिव्यक्ति है। हालांकि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, स्वयं परमेश्वर की सृष्टि होते हुए भी वह स्वयं को इस प्रकार के काम करने से नहीं रोक सका, और परमेश्वर के पीछे लगे रहने और पीछे से लगातार आक्रमण करते रहने और परमेश्वर के काम को बिगाड़ने और नाश करने के लिए बड़ा भ्रष्ट कदम उठाने के कारण वह परमेश्वर का शत्रु बना।

अब, आइए हम इस भाग की व्याख्या करें जिसका उपयोग शैतान ने कियाः "तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" पत्थर को रोटी में बदलना—क्या इसका कुछ अर्थ है? इसका कोई अर्थ नहीं। यदि यहां भोजन है तो क्यों ना इसे खाएं, यह क्यों आवश्यक है कि पत्थर को खाने में बदला जाए? इसका क्या यहां कुछ अर्थ है? (नहीं।) हालांकि उस समय वह उपवास में था, तो निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? क्या उसने खाना खाया? (खाया।) तो यहां हम इस कथन में शैतान की निरर्थकता और बेहूदगी को देखते हैं। उसके सारे छल-कपट और बेतुकेपन में हम उसकी मूर्खता देखते हैं। सही है? शैतान कई बातें करता है। आप उसके विद्वेषी स्वभाव को देखिये और देखिये कि वह परमेश्वर के काम को नष्ट करता है। वह घृणा से भरा हुआ और परेशान करने वाला है। परन्तु दूसरी तरफ क्या आप उसके शब्दों और काम के पीछे बचकाना और बेतुका स्वभाव पाते हैं? (हां।) यह शैतान के स्वभाव का एक प्रकाशन है; उसका स्वभाव इसी प्रकार का है और वह इसी तरह का काम करेगा। मनुष्यों को यह कथन बेतुका और हास्यपद लगेगा, पर ऐसे शब्द वाकई में शैतान द्वारा कहे जा सकते हैं। क्या हम कह सकते हैं कि वह अनभिज्ञ है? बेतुका? शैतान की बुराई हर जगह है और लगातार दिखाई देती जा रही हैं। और उसे प्रभु यीशु ने कैसे उत्तर दिया? ("मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।") क्या इन शब्दों में कोई शक्ति है? (शक्ति है।) हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? (वे सत्य हैं।) सही है। ये वचन सत्य है। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और चालीस रात उपवास किया। क्या वह भूख से मरा? (नहीं।) वह भूख से नहीं मरा, इसलिए शैतान उसके पास पहुंचा। उसे उकसाते हुए पत्थर को खाने में बदलने के लिए यह कहते हुएः "यदि तू पत्थर को खाने में बदल दे तो क्या तेरे पास खाने की वस्तु न होगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा?" परन्तु प्रभु यीशु ने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहेगा," इसका मतलब यह है कि हालांकि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, तो भी उसे कौन सी चीज़ जीवित रखती है, उसे जीवित रहने और सांस लेने की शक्ति कहां से मिलती है? यह भोजन नहीं, परन्तु वे सारे वचन हैं जो परमेश्वर के मुख से निकलते हैं। एक ओर तो, मनुष्य इन वचनों को सच मानता है। शब्द उसे विश्वास देते हैं, उसे यह एहसास कराते हैं कि वह परमेश्वर पर निर्भर रह सकता है, परमेश्वर सत्य है। और दूसरी ओर क्या इन वचनों का कोई व्यवहारिक स्वरूप है? (हां।) क्यों? क्योंकि प्रभु यीशु ने चालीस दिन और चालीस रात उपवास किया और वह अभी भी वहां खड़ा है; जीवित है। क्या यह एक दृष्टांत है? बात यहां यह है कि चालीस दिन और चालीस रात उसने कुछ नहीं खाया। और वह अभी भी ज़िंदा है। उसके वाक्यांश का शक्तिशाली सबूत है। उसका कथन सरल है, परन्तु जहां तक प्रभु यीशु का सम्बन्ध है, क्या उसका यह वक्तव्य उसे किसी और द्वारा सिखाया गया था या क्योंकि शैतान ने ऐसा कहा था केवल इसलिए उसने यह सोचा था। इसके विषय में विचार करें। परमेश्वर सत्य है। परमेश्वर जीवन है। क्या परमेश्वर की सत्यता और जीवन बाद में जोड़े गए थे। क्या यह अनुभव से उत्पन्न हुआ? (नहीं।) यह परमेश्वर में सहज है। मतलब यह कि सच्चाई और जीवन परमेश्वर के तत्व में रहते हैं। जो कुछ उसका है, वह जो प्रकट करता है, वह सत्य है। यह सत्य, यह वाक्यांश—चाहे इसका स्वरूप लम्बा हो या छोटा है—यह मनुष्य को जीने दे सकता है, उसे जीवन देता है; यह मनुष्य को जीवन यात्रा के विषय में स्पष्टता से खोजने लायक बना सकता है और मनुष्य को परमेश्वर पर विश्वास रखने के लायक बनाता है। इस वाक्यांश का उपयोग परमेश्वर का स्रोत है। स्रोत सकारात्मक है। तो क्या यह सकारात्मक वस्तु पवित्र है? (हां।) शैतान का वाक्यांश शैतान के स्वभाव में से आता है। शैतान अपना बुरा स्वभाव, दुर्भावनापूर्ण स्वभाव, हर जगह लगातार प्रकट करता है। अब ये प्रकाशन, क्या स्वभाविक रूप से बनाए जाते हैं? (हां।) क्या कोई इसे उकसाता है, क्या कोई इसकी सहायता करता है? क्या कोई इसे विवश करता है? (नहीं।) यह इन्हें स्वयं निकालता है। यह शैतान का बुरा स्वभाव है। जो कुछ भी परमेश्वर करता और जैसे भी करता है, शैतान उसके पदचिन्हों पर चलता है। शैतान जो भी ऐसी बातें कहता और करता है वह शैतान का विशिष्ट तत्व है—बुरा तत्व, दुर्भावनापूर्ण तत्व।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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