जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

जो लोग भाई-बहनों के बीच हमेशा नकारात्मकता फैलाते रहते हैं वे शैतान के सेवक हैं और वे कलीसिया में बाधा डालने वाले लोग हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निष्कासित कर देना और हटा देना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास रखते हुए अगर लोगों के पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल न हों, परमेश्वर के प्रति समर्पणशील दिल न हों, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिए कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि इसके उलट वे परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने वाले और उसका प्रतिरोध करने वाले लोग बन जाएँगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसके प्रति समर्पण न करना या उसका भय न मानना और इसके बजाय उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी अपनी बोली और आचरण में ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो वे अविश्वासियों से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये ठेठ दुष्ट राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातें प्रकट करते हैं, जो भाई-बहनों के बीच निराधार अफवाहें फैलाते हैं, कलह के बीज बोते हैं और गुटबाजी करते हैं, ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निष्कासित कर दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग प्रतिबंधित हैं, क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से निकाला जाना है। शैतान द्वारा जिन लोगों को भ्रष्ट किया जा चुका है उन सबमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। लेकिन कुछ में बस भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, जबकि अन्य लोग भिन्न होते हैं : न केवल उनमें शैतानी भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद दुर्भावनापूर्ण होती है। इन लोगों की कथनी-करनी केवल शैतानी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने तक ही सीमित नहीं होती है; ये लोग असली दानव और शैतान होते हैं। वे बस परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी और विघ्न पैदा करते हैं, इससे भाई-बहनों के जीवन प्रवेश में विघ्न पड़ता है और कलीसिया के सामान्य जीवन को क्षति पहुँचती है। भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का देर-सवेर सफाया किया जाना चाहिए; शैतान के इन सेवकों के प्रति एक सख्त रवैया, तिरस्कार का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का भय मानने वाला दिल, परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह सब परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप और उसके दिल को संतुष्ट करने वाला होना चाहिए। उन्हें दुराग्रही नहीं होना चाहिए, जो मन करे वो नहीं करना चाहिए; ऐसा करना संतों जैसे आचरण के अनुकूल नहीं है। लोगों को परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए चारों ओर छल-प्रपंच करते हुए और अकड़ दिखाते हुए उच्छृंखल होकर नहीं चलना चाहिए; यह सबसे विद्रोहपूर्ण ढंग का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के घर में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या इसके मानक और भी अधिक कड़े नहीं हैं? क्या यह और भी जरूरी नहीं है कि इसके पास प्रशासनिक आदेश हों? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मानवजाति से अपमान सहन नहीं करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो लोगों को मार गिराता है। क्या लोग वास्तव में यह सब पहले से ही नहीं जानते?

हर कलीसिया में ऐसे लोग होते हैं जो कलीसिया के लिए विघ्न पैदा करते हैं या परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी करते हैं। ये सब शैतान हैं जो छद्म वेश में परमेश्वर के घर में घुस आए हैं। ऐसे लोग अभिनय में विशेष रूप से निपुण होते हैं : मेरे समक्ष विनीत भाव से आकर, नमन करते हुए, नत-मस्तक होते हैं, खुजली वाले कुत्ते की छवि जीते हैं, अपने मकसद को पूरा करने के लिए अपना “सर्वस्व” न्योछावर करते हैं, लेकिन भाई-बहनों के सामने उनका बदसूरत चेहरा प्रकट हो जाता है। जब वे सत्य का अभ्यास करने वाले लोगों को देखते हैं, तो उन पर आक्रमण कर देते हैं और उन्हें दरकिनार कर देते हैं; और जब वे ऐसे लोगों को देखते हैं जो उनसे अधिक शक्तिशाली हैं, तो वे उनकी चाटुकारिता और खुशामद करने लगते हैं। कलीसिया के भीतर वे आततायियों की तरह व्यवहार करते हैं। कह सकते हैं कि ऐसे “स्थानीय गुण्डे” और ऐसे “पालतू कुत्ते” ज्यादातर कलीसियाओं में मौजूद हैं। ऐसे लोग गुप्त रूप से मिलकर काम करते हैं, आँखे झपकाकर, गुप्त संकेतों और इशारों से आपस में बात करते हैं, और इनमें से कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता। जो सबसे ज्यादा जहरीला होता है, वही “प्रधान राक्षस” होता है, और जो सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है, वह इनकी अगुवाई करता है और इनका परचम बुलंद रखता है। ऐसे लोग कलीसिया में उपद्रव मचाते हैं, नकारात्मकता फैलाते हुए मौत का तांडव करते हैं, मनमर्जी करते हैं, जो चाहे कहते हैं; किसी में इन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती है। ये शैतानी स्वभावों से भरे होते हैं। एक बार जब ये लोग व्यवधान पैदा करते हैं, कलीसिया में मुर्दनी छा जाती है। कलीसिया के भीतर के जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं उन्हें खारिज कर दिया जाता है, वे वह सब करने में असमर्थ होते हैं जिन्हें करने में सक्षम हैं, जबकि जो कलीसिया में बाधा डालते हैं और मौत फैलाते हैं वे अंदर तांडव करते फिरते हैं—और इतना ही नहीं, अधिकतर लोग उनका अनुसरण करते हैं। वास्तव में ऐसी कलीसियाओं पर शैतान शासन करता है और दानव इनका राजा होता है। यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग आवाज नहीं उठाएँगे और उन प्रधान राक्षसों को खारिज नहीं करेंगे, तो देर-सवेर वे भी बर्बाद हो जाएँगे। अब से ऐसी कलीसियाओं के खिलाफ कदम उठाए जाने चाहिए। जो लोग थोड़ा-सा भी सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं, यदि वे खोज नहीं करते हैं, तो उस कलीसिया को समाप्त कर दिया जाएगा। यदि कलीसिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो सत्य का अभ्यास करने का इच्छुक हो, और परमेश्वर की गवाही में अडिग रह सकता हो, तो उस कलीसिया को पूरी तरह से अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए और अन्य कलीसियाओं के साथ उसके संबंध समाप्त कर दिये जाने चाहिए। इसे “मृत्यु दफ़्न करना” कहते हैं; इसी का अर्थ है शैतान को अस्वीकार करना। यदि किसी कलीसिया में कई स्थानीय गुंडे हैं, और कुछ “छोटी-मोटी मक्खियों” द्वारा उनका अनुसरण किया जाता है जिनमें भेद पहचानने की क्षमता का पूर्णतः अभाव है, और यदि ऐसी कलीसियाओं में लोग सत्य जान लेने के बाद भी इन गुंडों की जकड़न और चालाकी को नकार नहीं पाते हैं, तो उन सभी भ्रमित लोगों को अंत में हटा दिया जाएगा। भले ही इन छोटी-छोटी मक्खियों ने कोई बड़ा बुरा काम न किया हो, लेकिन ये और भी धूर्त, और भी ज़्यादा मक्कार होती हैं, इस तरह के सभी लोगों को निकाल दिया जाएगा। एक भी नहीं बचेगा! जो शैतान के हैं, उन्हें शैतान के पास भेज दिया जाएगा, जबकि जो परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं, वे निश्चित रूप से सत्य की खोज करेंगे; यह उनकी प्रकृति के अनुसार तय होता है। उन सभी को नष्ट हो जाने दो जो शैतान का अनुसरण करते हैं! इन लोगों के प्रति कोई दया-भाव नहीं दिखाया जाएगा। जो सत्य की खोज करते हैं उनका भरण-पोषण होने दो और वे अपने हृदय के तृप्त होने तक परमेश्वर के वचनों में आनंद प्राप्त करें। परमेश्वर धार्मिक है; वह किसी के प्रति पक्षपात नहीं दिखाएगा। यदि तू दानव है, तो तू सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता; यदि तू सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति है, तो यह निश्चित है कि तू शैतान का बंदी नहीं बनेगा—इसमें कोई संदेह नहीं है।

जो प्रगति के लिए प्रयास नहीं करते हैं, वे हमेशा चाहते हैं कि दूसरे भी उन्हीं की तरह नकारात्मक और अकर्मण्य बनें। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य का अभ्यास करने वालों के प्रति ईर्ष्या-भाव रखते हैं, और हमेशा ऐसे लोगों को गुमराह करना चाहते हैं जो भ्रमित हैं और जिनमें भेद पहचानने की क्षमता की कमी है। ये लोग जो चीजें देते हैं, वे तेरे पतन का, गर्त में फिसलने का, असामान्य स्थिति में गिरने का और तुझमें अंधकार भरने का कारण बनती हैं; वे तेरे परमेश्वर से दूर जाने, देह का आनंद लेने और खुद की गलतियों के प्रति काफी उदार रहने का कारण बनती हैं। जो सत्य से प्रेम नहीं करते हैं, जो परमेश्वर के प्रति सदैव लापरवाह रवैया अपनाते हैं, उनमें आत्म-जागरूकता नहीं होती; ऐसे लोगों का स्वभाव लोगों को पाप करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बहकाता है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और न ही दूसरों को इसका अभ्यास करने देते हैं। उन्हें पाप अच्छे लगते हैं और वे खुद से नफरत नहीं करते हैं। वे स्वयं को नहीं जानते हैं, और दूसरों को भी स्वयं को जानने से रोकते हैं; वे दूसरों को सत्य के लिए प्यासे होने से भी रोकते हैं। जो लोग उनके द्वारा गुमराह होते हैं वे प्रकाश नहीं देख सकते—वे अंधेरे में गिर जाते हैं, स्वयं को नहीं जानते, और सत्य के बारे में अस्पष्ट रहते हैं, तथा परमेश्वर से उनकी दूरी बढ़ती चली जाती है। वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं और दूसरों को भी सत्य का अभ्यास करने नहीं देते हैं, और उन सभी भ्रमित लोगों को अपने सामने लाते हैं। बजाय यह कहने के कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि वे अपने पूर्वजों में विश्वास करते हैं, या कि वे जिसमें विश्वास करते हैं वे उनके दिल में बसी प्रतिमाएँ हैं। उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किसमें विश्वास करते हैं : क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किसमें विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यह कहना कि तू विश्वासी है ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत-सी बातें बहुत पहले खूब सुन चुका हूँ और उन्हें दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच के स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो घातक बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और उन्हें निकाल दिया जाएगा। कलीसिया में बहुत-से लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है। जब कोई व्यक्ति लोगों को गुमराह करने की कोशिश करता है, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे हमेशा असत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में भेद पहचानने की क्षमता का अभाव है? वे विरोधवश शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो सत्य के लिए निष्पक्ष और विवेकपूर्ण हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में भेद पहचानने की क्षमता की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़े हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि भेद पहचानने की क्षमता से रहित लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ दानवों से वाकई प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं? यदि तू वाकई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो फिर तू सत्य का अभ्यास करने वालों को अनदेखा क्यों करता है और तू तुरंत उनके मात्र एक इशारे पर ऐसे लोगों का अनुसरण क्यों करता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं? यह किस प्रकार की समस्या है? मुझे परवाह नहीं कि तुझमें भेद पहचानने की क्षमता है या नहीं। मुझे परवाह नहीं कि तूने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है। मुझे परवाह नहीं कि तेरी शक्तियाँ कितनी बड़ी हैं और न ही मुझे इस बात की परवाह है कि तू एक स्थानीय गुण्डा है या कोई ध्वज-धारी अगुआ। यदि तेरी शक्तियाँ अधिक हैं, तो वह शैतान की ताक़त की मदद से है। यदि तेरी प्रतिष्ठा अधिक है, तो वह केवल इसलिए है क्योंकि तेरे आस-पास बहुत-से ऐसे लोग हैं जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; यदि तू निष्कासित नहीं किया गया है, तो इसलिए कि अभी निष्कासन-कार्य का समय नहीं है; बल्कि यह हटा देने के कार्य का समय है। तुझे निष्कासित करने की अभी कोई जल्दी नहीं है। मैं तो बस उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ, जब निकाल दिए जाने के बाद, मैं तुझे दंडित करूँगा। जो कोई भी सत्य का अभ्यास नहीं करता है, उसे निकाल दिया जाएगा!

जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं, वे लोग भी हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग कुटिल और अधर्मी अभ्यासों में लिप्त होते हैं, उन सभी में सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर का अनादर करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के सेवक हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत दुर्भावनापूर्ण होता है। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है और जो सत्य के पक्ष में खड़े होने में असमर्थ होते हैं वे सभी वे लोग हैं जो दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। वे शैतान के अधिक ठेठ प्रतिनिधि हैं; वे छुटकारे से परे हैं और स्वाभाविक रूप से हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर का घर उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ प्रकट किया जाएगा और अंत में निकाल दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जो शैतान हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिए गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति के परिणाम का खुलासा किया जाए, जो लोग कलीसिया में बाधा डालते हैं और कार्य में गड़बड़ी करते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले किनारे कर दिया जाएगा और अकेला छोड़ दिया जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक-एक करके बेनकाब किया जाएगा और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मानवजाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाएगा, तो लोगों को हटाना शुरू कर दिया जाएगा; यही वह समय होगा जब सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जाएँगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं, ये बुरे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे बुरे लोग बुराई प्रकट करते हैं, फिर भी वे अड़ियल बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, बुराई नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो “सम्राटों” की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और पूर्ण बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे परिणाम हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं। जो सत्य का अभ्यास करने की कोई योजना नहीं बना रहे, ऐसे लोगों को मेरी सलाह है कि वे यथाशीघ्र कलीसिया को छोड़ दें ताकि और अधिक पापों को करने से बचें। जब समय आएगा तो पश्चाताप के लिए भी बहुत देर हो चुकी होगी। विशेष रूप से, जो गुट बनाते हैं और विभाजन पैदा करते हैं उन्हें और कलीसिया के भीतर उन स्थानीय गुंडों को और भी जल्दी छोड़कर चले जाना चाहिए। जिनकी प्रकृति दुष्ट भेड़ियों की है ऐसे लोग बदलने में असमर्थ हैं। बेहतर होगा वे कलीसिया से तुरंत चले जाएँ और फिर कभी भाई-बहनों के सामान्य जीवन में बाधा न डालें, कहीं ऐसा न हो कि वे परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँ। तुम लोगों में से जो भी उनके साथ चले गए हैं, वे आत्म-चिंतन के लिए इस अवसर का उपयोग करें। क्या तुम लोग ऐसे कुकर्मी लोगों के साथ कलीसिया से बाहर जाओगे या यहीं रहकर आज्ञाकारिता के साथ अनुसरण करोगे? तुम लोगों को इस बात पर सावधानी से विचार अवश्य करना चाहिए। मैं चुनने के लिए तुम लोगों को एक और अवसर देता हूँ; मुझे तुम लोगों के उत्तर की प्रतीक्षा है।

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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