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परमेश्वर राज्य के युग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम क्यों लेते हैं?

बहुत से लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि चूँकि सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंतिम दिनों में प्रभु यीशु की वापसी हैं, तो क्यों जब प्रभु यीशु अंतिम दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए आते हैं, तो उन्हें सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाता है। क्यों उन्हें प्रभु यीशु के नाम से ही बुलाना जारी नहीं रखा जाता है? वास्तव में, हर बार जब भी परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करते हैं, तो उनका एक नया नाम होता है। यह नया नाम कार्य के मुताबिक परमेश्वर स्वयं लेते हैं—ऐसा नहीं है कि लोग जैसे चाहें वैसे ही उन्हें पुकारते हैं। कार्य के प्रत्येक चरण में परमेश्वर द्वारा लिया गया नाम बाइबल पर आधारित है। आखिरी दिनों में लौटे प्रभु यीशु के नाम की बहुत पहले बाइबल में भविष्यवाणी की गयी थी। यशायाह ने कहा, "तब जाति जाति के लोग तेरा धर्म और सब राजा तेरी महिमा देखेंगे, और तेरा एक नया नाम रखा जाएगा जो यहोवा के मुख से निकलेगा।" (यशायाह 62:2)। प्रकाशित वाक्य में यह भी कहा गया था कि "फिलदिलफिया की कलीसिया के दूत को यह लिख…. जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा।" (प्रकाशितवाक्य 3:7, 12) प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है,जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, "मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ।" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। "फिर मैं ने बड़ी भीड़ का सा और बहुत जल का सा शब्द, और गर्जन का सा बड़ा शब्द सुना: "हल्‍लिलूय्याह! क्योंकि प्रभु हमारा परमेश्‍वर सर्वशक्‍तिमान राज्य करता है।"" (प्रकाशितवाक्य 19:6)। राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम प्रकाशित वाक्य पुस्तक में की गई भविष्यवाणियों की पूर्ण पूर्ति है। प्रत्येक युग में परमेश्वर जो नाम लेते हैं, उसका गहरा महत्व है और उस युग के दौरान परमेश्वर के कार्य से उसका गहरा संबंध है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इससे संबंधित रहस्यों को उजागर किया जब उन्होंने कहा, "प्रत्येक युग में,परमेश्वर नया कार्य करता है और उसे एक नए नाम से बुलाया जाता है;वह भिन्न-भिन्न युगों में एक ही कार्य कैसे कर सकता है?वह पुराने सेकैसे चिपका रह सकता है? यीशु का नाम छुटकारे के कार्यहेतु लिया गया था, तो क्या जब वह अंत के दिनों में लौटेगा तो तब भी उसे उसी नाम से बुलाया जाएगा?क्या वह अभी भी छुटकारे का कार्य करेगा? ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं कि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक ही नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? इस तरह, भिन्न युग में परमेश्वर को भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। और प्रत्येक नाम केवल एक निश्चित युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए आवश्यक है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर अपने स्वभाव के लिए हितकारी किसी भी नाम को चुन सकता है। इस बात की परवाह किए बिना कि क्या यह यहोवा का युग है, या यीशु का युग है, प्रत्येक युग का एक नाम के द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है।" ("वचन देह में प्रकट होता है"में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से)

""यहोवा"वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। "यीशु" इम्मानुएल है, और इसका मतलब है वह पाप बलि जो प्रेम से परिपूर्ण है, करुणा से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा देता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह प्रबन्धन योजना के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। अर्थात्, केवल यहोवा ही इस्राएल के चुने हुए लोगों का परमेश्वर, इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, मूसा का परमेश्वर, और इस्राएल के सभी लोगों का परमेश्वर है। और इसलिए वर्तमान युग में, यहूदा के कुटुम्ब के अलावा सभी इस्राएली यहोवा की आराधना करते हैं। वे वेदी पर उसके लिए बलिदान करते हैं, और याजकीय लबादे पहनकर मन्दिर में उसकी सेवा करते हैं। वे बस यहोवा के पुनः-प्रकट होने की आशा करते हैं। केवल यीशु ही मानवजाति को छुटकारा दिलाने वाला है। यीशु वह पाप बलि है जिसने मानवजाति को पाप से छुटकारा दिलाया है। जिसका अर्थ है, कि यीशु का नाम अनुग्रह के युग से आया, और अनुग्रह के युग में छुटकारे के कार्य के कारण विद्यमान रहा। अनुग्रह के युग के लोगों को आध्यात्मिक रूप से पुनर्जीवित किए जाने और उनका उद्धार किए जाने हेतु अनुमति देने के लिए यीशु का नाम विद्यमान था, और यीशु का नाम पूरी मानवजाति के उद्धार के लिए एक विशेष नाम है। और इस प्रकार यीशु का नाम छुटकारे के कार्य को दर्शाता है, और अनुग्रह के युग का द्योतक है। यहोवा का नाम इस्राएल के लोगों के लिए एक विशेष नाम है जो व्यवस्था के अधीन जीए थे। प्रत्येक युग में और कार्य के प्रत्येक चरण में, मेरा नाम आधारहीन नहीं है, किन्तु प्रतिनिधिक महत्व रखता हैः प्रत्येक नाम एक युग का प्रतिनिधित्व करता है। "यहोवा" व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस परमेश्वर के लिए सम्मानसूचक है जिसकी आराधना इस्राएल के लोगों के द्वारा की जाती है। "यीशु" अनुग्रह के युग को दर्शाता है, और यह उन सब के परमेश्वर का नाम है जिन्हें अनुग्रह के युग के दौरान छुटकारा दिया गया था। यदि मनुष्य तब भी अंत के दिनों के दौरान उद्धारकर्त्ता यीशु के आगमन की अभिलाषा करता है, और तब भी उस से अपेक्षा करता है कि वह उस प्रतिरूप में आए जो उसने यहूदिया में धारण किया था, तो छः हज़ार सालों की सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना छुटकारे के युग में रूक जाएगी, और थोड़ा सा भी प्रगति करने में अक्षम होगी। इसके अतिरिक्त, अंत के दिन का आगमन कभी नहीं होगा, और युग का समापन कभी नहीं होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उद्धारकर्त्ता यीशु सिर्फ मानवजाति के छुटकारे और उद्धार के लिए है। मैंने अनुग्रह के युग के सभी पापियों के लिए यीशु का नाम अपनाया था, और यह वह नाम नहीं है जिसके द्वारा मैं पूरी मानवजाति को समाप्त करूँगा। यद्यपि यहोवा, यीशु, और मसीहा सभी मेरे पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु ये नाम मेरी प्रबन्धन योजना में केवल विभिन्न युगों के द्योतक हैं, और मेरी सम्पूर्णता में मेरा प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। ऐसे नाम जिनके द्वारा पृथ्वी के लोग मुझे पुकारते हैं मेरे सम्पूर्ण स्वभाव को और वह सब कुछ जो मैं हूँ उसे स्पष्ट रूप से नहीं कह सकते हैं। वे मात्र अलग-अलग नाम हैं जिनके द्वारा विभिन्न युगों के दौरान मुझे पुकारा जाता है। और इसलिए, जब अंतिम युग—अंत के दिनों के युग—का आगमन होगा, तो मेरा नाम पुनः बदल जाएगा। मुझे यहोवा, या यीशु नहीं कहा जाएगा, मसीहा तो कदापि नहीं, बल्कि मुझे स्वयं सामर्थ्यवान सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाएगा, और इस नाम के अंतर्गत मैं समस्त युग को समाप्त करूँगा। एक समय मुझे यहोवा के नाम से जाना जाता था। मुझे मसीह भी कहा जाता था, और लोगों ने एक बार मुझे उद्धारकर्त्ता यीशु कहा था क्योंकि वे मुझ से प्रेम करते थे और मेरा आदर करते थे। किन्तु आज मैं वह यहोवा और यीशु नहीं हूँ जिसे लोग बीते समयों में जानते थे—मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आ गया है, वह परमेश्वर जो युग को समाप्त करेगा। वह परमेश्वर मैं स्वयं हूँ जो अपने स्वभाव की परिपूर्णता के साथ, और अधिकार, आदर एवं महिमा से भरपूर होकर पृथ्वी के अंतिम छोर से उदय होता हूँ।" ("वचन देह में प्रकट होता है"में "उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल"पर सवार होकर वापस आ चुका है" से)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से कहा कि हर युग में परमेश्वर के नाम का प्रतिनिधिक महत्व है: प्रत्येक नाम परमेश्वर के कार्य को और उस युग के दौरान व्यक्त स्वभाव को दर्शाता है। व्यवस्था के युग के दौरान, परमेश्वर ने अपने नियमों और आदेशों की घोषणा करने और धरती पर मानव जीवन का मार्गदर्शन करने के लिए यहोवा के नाम का प्रयोग किया; अनुग्रह के युग के दौरान, परमेश्वर ने मानव जाति के छुटकारे के कार्य को करने के लिए यीशु के नाम का इस्तेमाल किया; और राज्य के युग के दौरान, परमेश्वर को सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहा जाता है, वे परमेश्वर के घर से शुरू करते हुए मानव को शुद्ध करने, बदलने और बचाने के लिए न्याय का कार्य करते हैं। परमेश्वर अपने नाम का उपयोग कर युग को बदलते हैं, और युग के कार्य को दर्शाने के लिए इस नाम का इस्तेमाल करते हैं। जब यहोवा परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का कार्य किया, तो केवल यहोवा के नाम से प्रार्थना कर और उनके नियमों और आदेशों का पालन कर लोग परमेश्वर का आशीर्वाद और सरंक्षण पा सकते थे। अनुग्रह के युग के आगमन के साथ, परमेश्वर ने छुटकारे का कार्य करने के लिए प्रभु यीशु के नाम का इस्तेमाल किया, और लोगों के लिए प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना और प्रभु के नाम पर पश्चाताप के लिए प्रार्थना करना आवश्यक था, ताकि उनके पापों के लिए उन्हें क्षमा मिल सके और प्रभु यीशु द्वारा दिए गए सत्य और अनुग्रह का वे आनंद ले सकें। यदि लोग तब भी यहोवा के नाम से चिपके रहते और प्रभु यीशु को स्वीकार करने से इनकार करते, तो वे परमेश्वर की देखभाल और संरक्षण को खो देते थे, और यहूदी फरीसियों की तरह परमेश्वर से शापित और दण्डित होकर अंधेरे में गिर जाते थे। आखिरी दिनों के आगमन के साथ, परमेश्वर अपने घर से शुरू होने वाले न्याय का कार्य करने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम का प्रयोग करते हैं। केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हुए, परमेश्वर के कार्य के चरणों से साथ निभाते हुए, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय और ताड़ना से गुजरने के द्वारा लोग सत्य को समझ सकते और पा सकते हैं, पाप से दूर हो सकते हैं, शुद्ध हो सकते हैं, और परमेश्वर से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम को स्वीकार करने से और आखिरी दिनों के उनके न्याय के कार्य को स्वीकार करने से इंकार करते हैं, वे पाप के बंधन से मुक्त होने में असमर्थ हैं, और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए हमेशा अयोग्य रहेंगे।