कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है

कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है। क्योंकि सभी लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होता है और किसी के पास सत्य नहीं होता, इसलिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग के जरिए ही वे अपने कर्तव्य ठीक से निभा सकते हैं। सामंजस्यपूर्ण सहयोग न केवल लोगों के जीवन प्रवेश के लिए बल्कि उनके उचित रूप से कर्तव्य निर्वहन और कलीसिया के कार्य के लिए भी फायदेमंद होता है। जो लोग सामंजस्यपूर्ण सहयोग करते हैं उनमें अपेक्षाकृत अच्छी मानवता और ईमानदारी होती है, लेकिन अगर किसी की मानवता अच्छी नहीं है, अगर वे बहुत अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं, या बहुत कुटिल और चालाक हैं तो वे दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण सहयोग नहीं कर पाएँगे। कुछ लोग ईमानदारी का कार्य नहीं करते, अपना कर्तव्य निभाने के दौरान कर्तव्यनिष्ठ नहीं होते और हमेशा कोई न कोई साजिश रचते रहते हैं। इस तरह के लोग दूसरों के साथ सहयोग नहीं कर सकते, और न ही किसी के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से या मिल-जुलकर रह सकते हैं। ऐसे लोगों में कोई मानवता नहीं होती, वे जानवर और दानव और शैतान होते हैं। अच्छी मानवता वाले सभी आज्ञाकारी और समर्पणशील लोगों को अपना कर्तव्य निभाने पर निश्चित रूप से नतीजे मिलेंगे और वे आसानी से दूसरों के साथ सहयोग कर सकेंगे। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो ईमानदारी से अपना कर्तव्य नहीं निभाते, जो जानबूझकर मुसीबत खड़ी करते हैं या यहाँ तक कि जो अन्य लोगों के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालते हैं—अगर वे कई उपदेशों के बाद भी सुधार से परे रहते हैं और कभी पश्चात्ताप के लिए तैयार नहीं होते, हमेशा अपने कर्तव्यों में गड़बड़ियाँ करते और बाधाएँ डालते हैं और जिनका चरित्र नीच होता है, उन्हें बिना कोई देरी किए बाहर निकाल देना चाहिए, ताकि कलीसिया के कार्य पर कोई परेशानी या आपदा आने से बचाया जा सके। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को यह समस्या अवश्य हल करनी चाहिए।

कुछ लोग अपना कर्तव्य निभाते समय गैर-जिम्मेदार होते हैं, जिसके कारण कार्य को हर बार नए सिरे से करना पड़ता है। इससे कार्य की प्रभावशीलता पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। किसी व्यक्ति में विशेषज्ञ ज्ञान की कमी और अनुभव की कमी के अलावा, क्या ऐसी समस्या दिखने के कोई अन्य कारण होते हैं? (जब कोई व्यक्ति तुलनात्मक रूप से अहंकारी और आत्म-तुष्ट होता है, मनमाने ढंग से और एकतरफा तरीके से कार्य करता है और सिद्धांत के अनुसार अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता है।) विशेषज्ञ ज्ञान और अनुभव धीरे-धीरे सीखा और जमा किया जा सकता है, लेकिन अगर किसी के स्वभाव में ही समस्या है, तो क्या तुम लोगों को लगता है कि उसे हल करना आसान है? (नहीं, यह आसान नहीं है।) तो इसे कैसे हल किया जाना चाहिए? (व्यक्ति को न्याय, ताड़ना और काट-छाँट का अनुभव करना चाहिए।) उन्हें न्याय, ताड़ना और काट-छाँट का अनुभव करने की जरूरत है—ये वचन सही हैं, लेकिन केवल सत्य का अनुसरण करने वाले ही इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, क्या वे काट-छाँट को स्वीकार सकते हैं? नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकते। जब लोगों द्वारा किए गए काम को फिर से करना पड़ता है, सबसे बड़ी समस्या विशेषज्ञ ज्ञान या अनुभव की कमी नहीं होती, बल्कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे बहुत आत्मतुष्ट और अहंकारी होते हैं, क्योंकि वे मिलजुलकर सहयोग नहीं करते हैं, बल्कि मनमाने और एकतरफा तरीके से कार्य करते हैं—परिणामस्वरूप वे काम में गड़बड़ी कर देते हैं, और कुछ हासिल नहीं होता, सारा प्रयास बर्बाद हो जाता है। इसमें सबसे गंभीर समस्या लोगों का भ्रष्ट स्वभाव है। जब लोगों का भ्रष्ट स्वभाव बहुत गंभीर होता है, तो वे अच्छे लोग नहीं होते, वे बुरे लोग होते हैं। बुरे लोगों का स्वभाव सामान्य भ्रष्ट स्वभावों की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होता है। बुरे लोग बुरे कर्म ही करते हैं, वे कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी करते और बाधा डालते हैं। जब बुरे लोग कोई कार्य करते हैं, तो वे कार्य को बुरे ढंग से करते हैं और सब गड़बड़ कर देते हैं; उनका श्रम अच्छाई के बजाय मुसीबत बन जाता है। कुछ लोग बुरे तो नहीं होते, लेकिन वे अपने भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार कार्य करते हैं—और इस तरह, वे अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाते। संक्षेप में, भ्रष्ट स्वभाव लोगों के ठीक से अपना कर्तव्य निभाने में अत्यंत बाधक होता है। तुम लोगों के अनुसार, इंसान के भ्रष्ट स्वभाव का कौन-सा पहलू उसके द्वारा अपना कर्तव्य निभाने की प्रभावशीलता में सबसे ज्यादा बुरा असर डालता है? (अहंकार और आत्म-तुष्टता।) अहंकार और आत्मतुष्टता की मुख्य अभिव्यक्तियाँ क्या होती हैं? मनमाने और एकतरफा ढंग से कार्य करना, अपने हिसाब से चलना, दूसरों के सुझाव न सुनना, दूसरों के साथ परामर्श न करना, सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग न करना और हमेशा चीज़ों के बारे में अंतिम निर्णय लेने की कोशिश करना। भले ही काफी भाई-बहन कोई विशेष कर्तव्य निभाने के लिए सहयोग कर रहे हों, सभी अपना-अपना कार्य कर रहे हों, निश्चित टीम अगुआ या पर्यवेक्षक हमेशा अंतिम निर्णय लेना चाहते हैं; वे जो भी कर रहे होते हैं, वे सामंजस्यपूर्ण ढंग से दूसरों के साथ सहयोग नहीं करते और संगति में संलग्न नहीं होते, और वे दूसरों के साथ सर्वसम्मति पर पहुँचने से पहले ही बिना सोचे-विचारे काम करते हैं। वे सबको केवल अपनी बात सुनने के लिए मजबूर करते हैं, और समस्या इसी में है। इतना ही नहीं, दूसरे जब समस्या को देख लेते हैं, और फिर भी वे प्रभारी व्यक्ति को रोकने के लिए आगे नहीं आते, तो अंततः यह ऐसी स्थिति में परिणत हो जाता है, जहाँ लोग अपने कर्तव्यों में प्रभावशाली नहीं होते, काम पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है, और इसमें शामिल हरेक व्यक्ति को अपना कार्य फिर से करना पड़ता है, और उस प्रक्रिया में स्वयं को थकाना पड़ता है। ऐसे गंभीर परिणाम के लिए कौन जिम्मेदार है? (प्रभारी व्यक्ति।) क्या इसमें शामिल दूसरे लोग भी जिम्मेदार हैं? (हाँ।) प्रभारी व्यक्ति ने मनमाने और एकतरफा ढंग से कार्य किया, अपने तरीके से चीजों को करने पर जोर दिया और दूसरों ने समस्या देखकर भी उन्हें रोकने के लिए कुछ नहीं किया, और इससे भी गंभीर बात यह है कि वे उसके साथ चलते भी हैं; क्या यह उन्हें सह-अपराधी नहीं बनाता? यदि तुम इस व्यक्ति को बाधित नहीं करते, नहीं रोकते या उजागर नहीं करते, बल्कि इसके बजाय उसका अनुसरण करते हो और उसे स्वयं को बहकाने देते हो, तो क्या तुम शैतान को कलीसिया के कार्य में बाधा डालने की खुली छूट नहीं दे रहे? यह निश्चित रूप से तुम्हारी समस्या है। जब तुम लोग पर्यवेक्षकों के काम में समस्याएँ देखकर भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं करते, संगति नहीं करते और उन्हें उजागर नहीं करते, उन्हें सीमित करने की कोशिश नहीं करते और यहाँ तक कि इस समस्या की रिपोर्ट अपने से ऊपर वालों को भी नहीं देते, बल्कि इसके बजाय एक चापलूस की भूमिका निभाते हो, तो क्या यह परमेश्वर के प्रति बेवफा होने की अभिव्यक्ति नहीं है? क्या चापलूस परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं? बिल्कुल नहीं। तुम न केवल परमेश्वर के प्रति बेवफा हो—तुम लगातार शैतान के साथी और अनुयायी के रूप में कार्य कर रहे हो। तुममें अपने कर्तव्य और अपनी जिम्मेदारियों के प्रति बिल्कुल भी कोई वफादारी नहीं है, लेकिन तुम शैतान के प्रति काफी वफादार हो। समस्या का सार यहीं निहित है। जहाँ तक पेशेवर अपर्याप्तता का सवाल है, अपना कर्तव्य निभाते समय लगातार सीखना और अपने अनुभव को एक साथ लाना संभव है। ऐसी समस्याओं का आसानी से समाधान किया जा सकता है। सबसे मुश्किल चीज जिसका समाधान करना जरूरी है, वह है मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव। यदि तुम लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते या अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हमेशा चापलूस की भूमिका निभाते हो—जो सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं उन्हें उजागर नहीं करते और उनकी काट-छाँट नहीं करते, न ही उन्हें मार्गदर्शन देने और मदद करने की पेशकश करते हो, बल्कि हमेशा पीछे हटते हो, बिल्कुल भी कोई जिम्मेदारी नहीं लेते—तो तुम्हारा ऐसा कर्तव्य निर्वहन केवल कलीसिया के काम को कमजोर करेगा और उसमें देरी करेगा। अपने कर्तव्य निर्वहन को एक खेल मानने और रत्ती भर भी जिम्मेदारी नहीं लेने से न केवल कार्य की प्रभावशीलता पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि कलीसिया के कार्य की प्रगति में बार-बार देरी भी होती है। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाकर क्या तुम लापरवाह नहीं हो रहे हो और परमेश्वर को धोखा नहीं दे रहे हो? क्या इससे परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भी निष्ठा दिखती है? अगर तुम अपना कर्तव्य निभाते हुए लगातार लापरवाह रहते हो, और कभी पश्चात्ताप नहीं करना चाहते, तो तुम्हें अवश्य हटा दिया जाएगा।

अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें आने वाली कठिनाइयों से कैसे निपटना चाहिए? किसी समस्या को हल करने और आम सहमति पर पहुँचने का सबसे अच्छा तरीका है कि सभी साथ मिलकर सत्य खोजें। अगर तुम्हें सिद्धांतों की समझ होगी, तो यह भी पता होगा कि आगे क्या करना है। यह समस्याएँ हल करने का बेहतरीन तरीका है। अगर तुम किसी समस्या को हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते, बल्कि केवल अपनी व्यक्तिगत धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर कार्य करते हो, तो तुम अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे हो। इसमें और अविश्वासी समाज और शैतान की दुनिया में काम करने में क्या अंतर है? परमेश्वर के घर में सत्य और परमेश्वर का शासन होता है। चाहे कोई भी समस्या सामने आए, उसे हल करने के लिए सत्य खोजना ही चाहिए। चाहे कितनी भी अलग-अलग राय हों या उनमें आपस में कितने ही मतभेद क्यों न हों, उन सभी को सामने लाकर संगति की जानी चाहिए। फिर आम सहमति होने के बाद ही सिद्धांतों के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। इस तरह तुम न केवल समस्या का समाधान कर सकते हो, बल्कि तुम सत्य का अभ्यास करके अपना कर्तव्य भी ठीक से पूरा कर सकते हो। तुम समस्या हल करने की प्रक्रिया के दौरान सामंजस्यपूर्ण सहयोग भी प्राप्त कर सकते हो। अगर अपना कर्तव्य निभाने वाले सभी लोग सत्य से प्रेम करते हैं, तो उनके लिए सत्य को स्वीकारना और उसके आगे समर्पण करना आसान होता है; लेकिन अगर वे अहंकारी और आत्म-तुष्ट होते हैं, तो उनके लिए सत्य स्वीकारना आसान नहीं होता, भले ही लोग उस पर संगति करें। ऐसे लोग भी हैं जो सत्य को नहीं समझते, फिर भी हमेशा यही चाहते हैं कि दूसरे उनकी बात सुनें। ऐसे लोग केवल अपना कर्तव्य निभाने वाले दूसरे लोगों के सामने बाधा ही डालते हैं। यही समस्या की जड़ है और अपना कर्तव्य ठीक से निभाने के लिए इसे सुलझाया जाना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति अपना कर्तव्य निभाने में हमेशा अहंकार दिखाता है या मनमर्जी करता है, हमेशा मनमाने और एकतरफा ढंग से कार्य करता है, हर काम बेतरतीब ढंग से और अपनी मर्जी से करता है, दूसरों के साथ सहयोग या चीजों पर चर्चा नहीं करता और सत्य सिद्धांतों को नहीं खोजता—तो यह अपने कर्तव्य के प्रति कैसा रवैया है? क्या इस तरह अपना कर्तव्य ठीक से पूरा किया जा सकता है? अगर ऐसा व्यक्ति कभी काट-छाँट को नहीं स्वीकारता, सत्य बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करता, और अभी भी बिना किसी पश्चात्ताप या बदलाव के, बेतरतीब ढंग से और मनमर्जी से, बस अपने तरीके से काम करता रहता है—तो यह केवल रवैये की समस्या नहीं है, बल्कि उसकी मानवता और चरित्र की समस्या है। यह ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता नहीं है। क्या बिना मानवता वाला कोई अपना कर्तव्य ठीक से पूरा कर सकता है? जाहिर है कि नहीं। अगर अपना कर्तव्य निभाते हुए कोई व्यक्ति लापरवाही से भी गलत कर्म करता है और कलीसिया के कार्य में बाधा डालता है, तो वह एक बुरा व्यक्ति है। ऐसे लोग अपना कर्तव्य निभाने के योग्य नहीं होते। उनके कर्तव्य निर्वहन से केवल गड़बड़ी और नुकसान ही होता है, वे काम सँभालते कम और बिगाड़ते ज्यादा हैं, इसलिए उन्हें अपने कर्तव्य निर्वहन से अयोग्य बताकर कलीसिया से दूर कर दिया जाना चाहिए। इसीलिए कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकता है या नहीं केवल उस व्यक्ति की काबिलियत पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मुख्य रूप से अपने कर्तव्य निभाते समय उसके रवैये, उसके चरित्र, उसकी मानवता अच्छी है या बुरी, और क्या वह सत्य स्वीकार सकता है, इस पर निर्भर करता है। ये मूल मुद्दे हैं। तुम्हारा दिल अपने कर्तव्य में लगा है या नहीं, क्या तुम इसमें अपना पूरा दिल लगा रहे हो और पूरा दिल लगाकर काम कर रहे हो, अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया गंभीर और कर्तव्यनिष्ठ है या नहीं, तुम सच्चे और लगनशील इंसान हो या नहीं : परमेश्वर इन्हीं चीजों पर ध्यान देता है, और परमेश्वर हर किसी की पड़ताल करता है। क्या लोगों के कर्तव्य ठीक से पूरे किए जा सकते हैं अगर उनमें से ज्यादातर गैर-जिम्मेदार हैं और कोई भी गंभीर नहीं है और अपने दिल में यह जानने के बाद भी कि क्या करना सही है, वे सिद्धांतों के लिए कोशिश नहीं करते और कोई भी इसे गंभीरता से नहीं लेता है? इस तरह की स्थिति में, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को आगे की कार्रवाई करनी चाहिए, निरीक्षण करना चाहिए और निर्देश प्रदान करने चाहिए या टीम अगुआ या प्रभारी बनाने के लिए किसी जिम्मेदार व्यक्ति को ढूँढ़ना चाहिए। इस तरह अधिकांश लोगों को कार्य करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है और जब वे अपने कर्तव्य निभाते हैं तो अच्छा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है। अगर कोई व्यक्ति कार्य में बाधा डालता या नुकसान पहुँचाता दिखता है, तो उसे सीधे दूर कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि मूल समस्या हल हो जाने से लोगों के लिए अपने कर्तव्य में प्रभावी होना आसान हो जाएगा। कुछ लोगों में थोड़ी काबिलियत हो सकती है, लेकिन वे अपने कर्तव्य निर्वहन में गैर-जिम्मेदार होते हैं। उनके पास तकनीकी कौशल या पेशेवर ज्ञान हो सकता है, लेकिन वे इसे दूसरे लोगों को नहीं सिखाते। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इस समस्या का समाधान करना चाहिए। उनके साथ संगति करनी चाहिए, और उन्हें दूसरों को अपना कौशल सिखाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि दूसरे लोग जल्द से जल्द कौशल सीख सकें, और पेशेवर ज्ञान में महारत पा सकें। पेशेवर ज्ञान में माहिर होने के नाते तुम्हें अपनी योग्यता का दिखावा नहीं करना चाहिए या दूसरों पर इसका धौंस नहीं जमाना चाहिए; तुम्हें नौसिखियों को अपना कौशल और ज्ञान आगे बढ़कर सिखाना चाहिए, ताकि हर कोई मिलकर अपने कर्तव्यों का अच्छी तरह पालन कर सके। ऐसा हो सकता है कि तुम अपने पेशे के बारे में सबसे अधिक जानकार हो और कौशल में सबसे आगे हो, लेकिन यह खूबी तुम्हें परमेश्वर ने दी है, तो तुम्हें इसका उपयोग अपने कर्तव्य को निभाने और अपनी खूबियों के सही इस्तेमाल में करना चाहिए। चाहे तुम कितने भी कुशल या प्रतिभाशाली क्यों न हो, तुम अकेले कार्य की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते; किसी कर्तव्य को सबसे अधिक प्रभावी ढंग से तभी किया जाता है जब हर कोई उस पेशे के कौशल और ज्ञान को आत्मसात करने में सक्षम हो। जैसे कि कहावत है, एक योग्य मनुष्य को तीन अन्य लोगों का सहारा चाहिए। कोई व्यक्ति कितना भी काबिल क्यों न हो, एक-दूसरे की मदद के बिना वह काफी नहीं होता। इसलिए किसी को भी अहंकारी नहीं होना चाहिए और किसी को भी मनमाने या एकतरफा ढंग से कार्य नहीं करना चाहिए। लोगों को देह के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए, अपने विचारों और मतों को किनारे रख देना चाहिए और बाकी सबके साथ मिलजुलकर सहयोग करना चाहिए। जिसके पास पेशेवर ज्ञान है, उसे प्रेम से दूसरों की मदद करनी चाहिए, ताकि वे भी इस तरह के कौशल और ज्ञान में महारत पा सकें। यह कर्तव्य निर्वहन के लिए फायदेमंद है। अगर तुम अपने कौशल को आजीविका के रूप में देखते और मानते हो, तुम्हें डर लगता है कि इसे दूसरों को सिखाने से तुम खुद ही भुखमरी के कगार पर पहुँच जाओगे—यह अविश्वासियों का दृष्टिकोण है। यह एक स्वार्थी और घटिया तरीका है, जो परमेश्वर के घर में नहीं चल सकता। अगर तुम कभी सत्य स्वीकारने में सक्षम नहीं होते, और कभी श्रम करने के लिए तैयार नहीं होते, तो तुम्हें हटा दिया जाएगा। अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो और उसके घर के कार्य के प्रति वफादार रहने को तैयार हो, तो तुम्हें अपनी खूबियों और कौशल को अर्पित कर देना चाहिए, ताकि दूसरे लोग उन्हें सीखकर और आत्मसात करके अपने कर्तव्यों को बेहतर ढंग से निभा सकें। यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है; केवल ऐसे ही लोगों में मानवता होती है, और उन्हें ही परमेश्वर का प्रेम और आशीष प्राप्त होता है।

अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए? उसे अपने कर्तव्य के निर्वहन में सभी चीजों में सत्य सिद्धांतों को खोजना चाहिए और इसे पूरे दिल और पूरी क्षमता से निभाने के लिए आगे आना चाहिए—केवल यही करना सही होगा। पूरे दिल और क्षमता का उपयोग करने का मतलब है अपने पूरे दिल को अपने कर्तव्य में लगाना और दूसरी चीजों को उस पर कब्जा न करने देना, अपने पूरे प्रयास को अपने कर्तव्य में लगाना और अपनी काबिलियत, गुणों, क्षमताओं और जो चीजें वे समझते हैं, उन्हें काम में लाना। यदि तुममें बोध क्षमता और समझने की क्षमता है, जब तुम्हारे पास एक अच्छा विचार हो, तो तुम्हें दूसरों के साथ इसके बारे में संवाद करना चाहिए, हर किसी की बात को सुनना चाहिए, एक-दूसरे की मजबूतियों से सीखना चाहिए ताकि अपनी कमजोरियों की भरपाई की जा सके और सामंजस्यपूर्ण रूप से सहयोग करना चाहिए। इस तरह, तुम्हारे कर्तव्य के निर्वहन से नतीजे हासिल होंगे और तुम मानक के अनुसार अपना कर्तव्य निभा रहे होगे। यदि तुम हमेशा सब कुछ खुद ही करना चाहते हो, अकेले बड़े काम करना चाहते हो और दूसरों के मन में अपने प्रति उच्च सम्मान पाने के लिए खुद का दिखावा करना चाहते हो और तुम उन लोगों को अस्वीकार करते और दबाते हो जिनमें क्षमताएँ हैं, उन्हें काम में लाने का कोई अवसर नहीं देते, तो क्या तुम अपना कर्तव्य निभा रहे हो? यह एक तानाशाह होना है; यह दिखावा करना है। यह शैतानी व्यवहार है, कर्तव्य का निर्वहन नहीं। चाहे किसी व्यक्ति में कितनी भी क्षमताएँ, गुण, या विशेष प्रतिभाएँ क्यों न हों, वह अकेले पूरे काम का बोझ नहीं उठा सकता; यदि उसे कलीसिया का काम अच्छी तरह से करना है तो उन्हें सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना सीखना होगा। इसलिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग, अपना कर्तव्य निभाने में अभ्यास का एक सिद्धांत है। जब तक तुम इसमें अपना पूरा दिल, अपना पूरा प्रयास और अपनी पूरी भक्ति लगाते हो, और जो हो सके, वह अर्पित करते हो, तो तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा रहे हो। यदि तुम्हारे पास कोई खयाल या विचार है, तो उसे दूसरों को बताओ; इसे स्वयं तक न रखो या रोके मत रहो। यदि तुम्हारे पास सुझाव हैं, तो उन्हें पेश करो; जिसका भी विचार सत्य के अनुरूप हो, उसे स्वीकार किया जाना और उसका पालन किया जाना चाहिए। ऐसा करोगे तो तुम सद्भाव में सहयोग प्राप्त कर लोगे। अपने कर्तव्य का लगन से निर्वहन करने का यही अर्थ है। अपने कर्तव्य निभाने में, तुम लोगों को सब कुछ अपने ऊपर लेने की जरूरत नहीं है, न ही खुद को अत्यधिक थका देने की जरूरत है या “खिलने वाला एकमात्र फूल” या “सबसे अलग सोचने वाला” बनने की जरूरत नहीं है; इसके बजाय तुम्हें सीखना है कि दूसरों के साथ मिल-जुलकर कैसे सहयोग करना है, जो बन पड़े वो कैसे करना है, अपनी जिम्मेदारियाँ कैसे पूरी करनी हैं और अपना पूरा प्रयास कैसे करना है। अपने कर्तव्य के निर्वहन का यही अर्थ है। अपना कर्तव्य निभाने का मतलब है कि तुम्हारे पास जो भी क्षमता और प्रकाश है, उसका एक हिस्सा सामने लाना और नतीजे हासिल करना। बस इतना ही करना काफी है। हमेशा दिखावा करने, ऊँची-ऊँची बातें करने, चीजें खुद करने की कोशिश मत करो। तुम्हें दूसरों के साथ सहयोग करने का तरीका सीखना चाहिए, दूसरों के सुझाव सुनने और उनकी क्षमताएँ खोजने पर अधिक ध्यान देना चाहिए। इस तरह मिल-जुलकर सहयोग करना आसान हो जाता है। यदि तुम हमेशा दिखावा करने और आख़िरी फैसला खुद करने की कोशिश करते हो, तो तुम मिल-जुलकर सहयोग नहीं कर रहे हो। तुम क्या कर रहे हो? तुम विघ्न पैदा कर रहे हो और दूसरों का काम खराब कर रहे हो। विघ्न पैदा करना और दूसरों का काम खराब करना शैतान की भूमिका निभाना है; यह कर्तव्य का निर्वहन नहीं है। यदि तुम हमेशा ऐसे काम करते हो जो विघ्न पैदा करते हैं और दूसरों का काम खराब करते हैं, तो तुम कितना भी प्रयास करो या ध्यान रखो, परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा। तुम कम सामर्थ्यवान हो सकते हो, लेकिन अगर तुम दूसरों के साथ सहयोग करने में सक्षम हो, और उपयुक्त सुझाव स्वीकार सकते हो, और अगर तुम्हारे पास सही प्रेरणाएँ हैं, और तुम परमेश्वर के घर के कार्य की रक्षा कर सकते हो, तो तुम एक सही व्यक्ति हो। कभी-कभी तुम एक ही वाक्य से किसी समस्या का समाधान कर सकते हो और सभी को लाभान्वित कर सकते हो; कभी-कभी सत्य के एक ही कथन पर तुम्हारी संगति के बाद हर किसी के पास आगे बढ़ने का एक मार्ग होता है, वह मिलजुलकर सहयोग करने में सक्षम होता है, सभी दिल से एकजुट होकर एक साथ प्रयास करते हैं, समान विचार और राय रखते हैं और इसलिए काम विशेष रूप से प्रभावी होता है। हालाँकि यह भी हो सकता है कि किसी को याद ही न रहे कि यह भूमिका तुमने निभाई है और शायद तुम्हें भी ऐसा महसूस न हो मानो तुमने कोई बहुत अधिक प्रयास किए हों, लेकिन परमेश्वर की नजरों में तुम वह इंसान होगे जो सत्य का अभ्यास करता है, जो सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। तुमने जो भी किया उसे परमेश्वर याद रखेगा। इसे ही लगन से अपना कर्तव्य निभाना कहते हैं। अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हारे सामने चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ, वास्तव में उन सभी को आसानी से हल किया जा सकता है। जब तक तुम एक ईमानदार व्यक्ति बने रहते हो जिसका दिल परमेश्वर की ओर झुका हुआ है, और सत्य खोज करने में सक्षम हो, तब तक ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे हल नहीं किया जा सकता। अगर तुम सत्य नहीं समझते, तो तुम्हें आज्ञापालन करना सीखना चाहिए। अगर कोई ऐसा है जो सत्य समझता है या सत्य के अनुरूप बोलता है, तो तुम्हें उसे स्वीकार कर उसकी बात माननी चाहिए। किसी भी तरीके से तुम्हें ऐसी चीजें नहीं करनी चाहिए जो बाधा डालती या काम खराब करती हों, तुम्हें मनमाने और एकतरफा ढंग से काम नहीं करना चाहिए। इस तरह से तुम कोई बुराई नहीं करोगे। तुम्हें याद रखना चाहिए : अपने कर्तव्य का निर्वहन करना तुम्हारे अपने परिचालन या अपने उद्यम में व्यस्त होने का मामला नहीं है। यह तुम्हारा निजी कार्य नहीं है, यह कलीसिया का कार्य है, और तुम उसमें केवल अपनी उस क्षमता का योगदान करते हो जो तुम्हारे पास है। तुम परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में जो कुछ करते हो वह मनुष्य के सहयोग का एक छोटा-सा हिस्सा है। किसी कोने में तुम्हारी सिर्फ एक छोटी-सी भूमिका है। यही तुम्हारी जिम्मेदारी है। तुम्हारे दिल में यह समझ होनी चाहिए। और इसलिए, चाहे कितने भी लोग अपने कर्तव्य साथ मिलकर निभा रहे हों या वे कैसी भी समस्याओं का सामना कर रहे हों, सबसे पहले सभी को परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और मिलकर संगति करनी चाहिए, सत्य खोजना चाहिए, और फिर यह निर्धारित करना चाहिए कि अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं। जब वे इस तरीके से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे, तो उनके पास अभ्यास का मार्ग होगा। कुछ लोग दिखावा करने की कोशिश करते रहते हैं, और जब उन्हें काम की कोई जिम्मेदारी दी जाती है, तो वे चाहते हैं कि अंतिम निर्णय उन्हीं का हो। यह किस तरह का व्यवहार है? यह मनमाने और एकतरफा ढंग से कार्य करना है। वे अपने तरीके से अपने काम की योजना बनाते हैं, वे दूसरों को न तो सूचित करते हैं और न ही किसी से अपने विचारों पर चर्चा करते हैं; वे न तो उन्हें किसी से साझा करते हैं और न ही उनके बारे में खुलकर बात करते हैं, बल्कि उन्हें अपने तक ही सीमित रखते हैं। और जब काम करने का समय आता है, तो वे हमेशा अपने शानदार करतब से दूसरों को विस्मित करना चाहते हैं, सभी को आश्चर्यचकित कर देना चाहते हैं ताकि लोग उनके बारे में ऊँचा सोचें। क्या यह अपना कर्तव्य निभाना है? वे दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं; और जब उनके पास रुतबा और ख्याति होगी तब वे अपना खुद का उद्यम शुरू कर देंगे। क्या ऐसे लोग अति-महत्वाकांक्षी नहीं होते? तुम किसी को यह क्यों नहीं बताते कि तुम क्या कर रहे हो? चूँकि यह कार्य अकेले तुम्हारा नहीं है, तुम उसे बिना किसी से चर्चा किए क्यों करोगे और अपने आप निर्णय कैसे लोगे? तुम गुप्त रूप से सारी जानकारी छिपाकर काम क्यों करोगे, जिससे कि किसी को उसके बारे में पता न चले? तुम हमेशा ऐसी कोशिश क्यों करते हो कि सब तुम्हारा ही आदेश मानें? जाहिर है कि तुम इसे अपना निजी कार्य समझते हो। तुम मालिक हो और बाकी सब कार्यकर्ता हैं—वे सभी तुम्हारे लिए काम करते हैं। जब लगातार तुम्हारी मानसिकता ऐसी होती है, तो क्या यह परेशानी वाली बात नहीं है? क्या इस प्रकार का व्यक्ति शैतान के स्वभाव को प्रकट नहीं करता है? जब इस तरह के लोग कोई कर्तव्य निभाते हैं, तो देर-सवेर उन्हें हटा दिया जाएगा।

यह जानना आवश्यक है कि जब लोगों को अपने कर्तव्य के दौरान दूसरों के साथ सहयोग करने में समस्याएँ आएँ, तो वे इसे कैसे सँभालें। उन्हें सँभालने का सिद्धांत क्या है? क्या प्रभाव हासिल किया जाना चाहिए? सभी के साथ मिलजुलकर सहयोग करना सीखें, लोगों के साथ सत्य, परमेश्वर के वचनों और सिद्धांतों के अनुसार बातचीत करें, न कि भावनाओं या उतावलेपन से। इस तरह, क्या कलीसिया में सत्य का बोलबाला न होगा? अगर सत्य का बोलबाला होगा, तो क्या सभी चीजें उचित और न्यायपूर्ण तरीके से नहीं संभाली जाएँगी? क्या तुम्हें नहीं लगता कि सामंजस्यपूर्ण सहयोग सभी के लिए फायदेमंद होता है? (हाँ, बिल्कुल।) इस तरह से काम करना तुम लोगों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। सबसे पहली बात, कर्तव्यों का पालन करते समय, यह तुम लोगों के लिए सकारात्मक रूप से शिक्षाप्रद और मूल्यवान होता है। इसके अलावा यह तुम्हें गलतियाँ करने, व्यवधान और गड़बड़ी पैदा करने और मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलने से बचाता है। क्या तुम लोग मसीह-विरोधी के मार्ग पर चलने से डरते हो? (हाँ।) क्या डर अपने आप में उपयोगी है? नहीं—अकेले डर से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलने से डरना एक सामान्य बात है। यह दिखाता है कि व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है, सत्य के लिए प्रयास करने और उसका अनुसरण करने को तैयार है। यदि तुम्हारे मन में भय है, तो तुम्हें सत्य की खोज कर उसके अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हें इसकी शुरुआत लोगों के साथ सद्भावपूर्वक सहयोग करना सीखने से करनी चाहिए। यदि कोई समस्या आए, तो उसे संगति और चर्चा से हल करो, ताकि सभी को सिद्धांतों की जानकारी हो, साथ ही उसके समाधान के बारे में विशिष्ट तर्क और कार्यक्रम का पता चल सके। क्या यह तुम्हें मनमाने और एकतरफा ढंग से कार्य करने से नहीं रोकता है? साथ ही, अगर तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, तो तुम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करने में सक्षम होगे। लेकिन तुम्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों के पर्यवेक्षण को स्वीकार करना भी सीखना होगा, जिसके लिए तुम्हें खुले विचारों वाला और उदार होना जरूरी है। अगर तुम किसी को तुम्हारी निगरानी करते, तुम्हारे काम का निरीक्षण करते या बिना तुम्हारी जानकारी के जाँच करते देखते हो और अगर तुम गुस्से में तमतमा जाते हो, उस व्यक्ति से दुश्मन की तरह पेश आते हो, उसका तिरस्कार करते हो, यहाँ तक कि उस पर वार भी कर बैठते हो और उससे एक आस्तीन के साँप यानी एक विश्वासघाती की तरह निपटते हो, उसे अपनी आँखों से ओझल कर देना चाहते हो, तो यह एक समस्या है। क्या यह अत्यंत दुष्टतापूर्ण नहीं है? तो फिर तुममें और एक राक्षस राजा में क्या अंतर है? क्या यह लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना है? यदि तुम निष्कपट रूप से और ईमानदार तरीके से काम करते हो, तो क्या लोगों द्वारा तुम्हारी जाँच करना डरने की बात है? यदि तुम डरते हो, तो इसका मतलब है कि तुम कुछ छिपा रहे हो। यदि तुम अपने दिल में जानते हो कि तुममें कोई समस्या है, तो तुम्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए। यह दिखाता है कि तुममें विवेक है। यदि तुम जानते हो कि तुममें कोई समस्या है, लेकिन तुम किसी को भी अपना पर्यवेक्षण करने, अपने काम का निरीक्षण करने या अपनी समस्या की जाँच करने की अनुमति नहीं देते, तो तुम इतने विवेक-शून्य हो, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और प्रतिरोध करता है और इस मामले में, तुम्हारी समस्या और भी गंभीर है। यदि परमेश्वर के चुने हुए लोग यह भेद पहचान लेते हैं कि तुम एक बुरे व्यक्ति या एक छद्म-विश्वासी हो, तो परिणाम और भी मुसीबत भरे होंगे—तुम्हें दूर कर दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा। इस प्रकार, जो दूसरों द्वारा निगरानी, निरीक्षण और जाँच किए जाने को स्वीकार करने में सक्षम हैं, उनमें सबसे अधिक विवेक है; उनमें मन की विशालता और सामान्य मानवता होती है। जब तुम यह पाते हो कि तुम्हारा तरीका गलत है या तुम एक भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो, यदि तुम लोगों के सामने खुलकर बोलने और संवाद करने में सक्षम हो, तो यह तुम्हारे आसपास के लोगों को तुम्हारा पर्यवेक्षण करने में मदद करेगा। पर्यवेक्षण स्वीकार करना निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन मुख्य बात परमेश्वर से प्रार्थना करना, उस पर भरोसा करना और लगातार खुद की जाँच करना है। विशेष रूप से जब तुमने गलत रास्ता अपना लिया हो या कुछ गलत किया हो या जब तुम मनमाने और तानाशाही तरीके से काम करने वाले हो और तुम्हारे आसपास कोई इसके बारे में बताता है और तुम्हें सचेत करता है, तो तुम्हें उसे स्वीकार करना चाहिए और जल्दी से आत्म-चिंतन करना चाहिए, अपनी गलती माननी चाहिए और उसे सुधारना चाहिए। इससे तुम मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलने से बच जाओगे। अगर कोई इस तरह तुम्हारी मदद कर तुम्हें सचेत कर रहा है, तो क्या तुम्हारे जाने बगैर ही तुम्हें सुरक्षित नहीं रखा जा रहा है? तुम्हारे लिए यह एक प्रकार की सुरक्षा है। इसलिए तुम्हें हमेशा अपने भाई-बहनों या अपने आस-पास के लोगों से सतर्कता नहीं बरतनी चाहिए। दूसरों को तुम्हें समझने न देकर या तुम कौन हो यह न जानने देकर हमेशा खुद को छिपाने और ढँकने की कोशिश मत करो। अगर तुम्हारा दिल हमेशा दूसरों से अपनी रक्षा करता रहेगा, तो इसका असर तुम्हारी सत्य की खोज पर पड़ेगा, और तुम पवित्र आत्मा के कार्य के साथ ही पूर्ण किए जाने के कई अवसरों को आसानी से गँवा दोगे। अगर तुम हमेशा अपने आपको दूसरों से बचाते फिरोगे, तो तुम दिल में रहस्य रखोगे, और तुम लोगों के साथ सहयोग नहीं कर पाओगे। तुम्हारे लिए गलत चीजें करना और गलत रास्ते पर चलना आसान हो जाएगा, और जब तुम गलतियाँ करोगे तो भौचक्के रह जाओगे। तुम उस समय क्या सोचोगे? “अगर मुझे पता होता, तो मैं शुरू से ही अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने भाई-बहनों के साथ सहयोग करता, और निश्चित रूप से मुझे कोई समस्या नहीं होती। लेकिन क्योंकि मैं हमेशा इस बात से डरता था कि दूसरे मेरी असलियत जान जाएँगे, इसलिए मैंने दूसरों के प्रति चौकन्ना रहने लगा। लेकिन आखिरकार किसी और ने गलती नहीं की—पहली गलती मुझसे ही हुई। कितनी शर्मनाक और मूर्खतापूर्ण बात है!” अगर तुम सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हो, और कठिनाइयाँ आने पर अपने भाई-बहनों के साथ संगति में खुलकर बात कर सकते हो, तो तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारी मदद कर सकते हैं, और अभ्यास के सही मार्ग और अभ्यास के सिद्धांतों को तुम्हें समझने में सक्षम बना सकते हैं। यह तुम्हें अपना कर्तव्य निभाते समय गलत रास्ते पर चलने से बचा सकता है, ताकि तुम असफल न हो या गिरो नहीं, या परमेश्वर तुम्हें ठुकरा कर हटा न दे। इसके बजाय तुम्हें सुरक्षा मिलेगी, तुम अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाओगे, और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करोगे। सामंजस्यपूर्ण सहयोग से लोगों को कितना बड़ा लाभ मिलता है!

“सौहार्दपूर्ण सहयोग” शब्दों को अक्षरशः समझना तो आसान है, लेकिन उन्हें व्यवहार में लाना मुश्किल है। इन शब्दों के व्यावहारिक पक्ष को जीना कोई आसान बात नहीं है। आसान क्यों नहीं है? (लोगों के भ्रष्ट स्वभाव के कारण।) सही कहा। इंसान के अंदर अहंकार, दुष्टता, हठ इत्यादि भ्रष्ट स्वभाव हैं और ये उसके सत्य के अभ्यास में बाधा डालते हैं। जब तुम दूसरों के साथ सहयोग करते हो, तो तुम्हारे अंदर हर तरह का भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होता है। उदाहरण के लिए, तुम सोचते हो : “तुम चाहते हो कि मैं उस व्यक्ति के साथ सहयोग करूँ, लेकिन क्या वह इस योग्य है? अगर मैं किसी ऐसे व्यक्ति के साथ सहयोग करूँ जिसमें कोई काबिलियत न हो, तो क्या लोग मुझे हिकारत से नहीं देखेंगे?” और कभी-कभी तुम यह भी सोच सकते हो, “वह व्यक्ति इतना चेतनहीन है कि मेरी बात ही नहीं समझता!” “मेरी बातों में विचारशीलता और अंतर्दृष्टि है। अगर मैंने उसे बताया और उसने उसे अपना लिया, क्या तब भी मेरी अलग पहचान बनेगी? मेरा प्रस्ताव सबसे अच्छा है। अगर मैं अपना प्रस्ताव बता दूँ और वह उसे ले उड़े, तो कौन जानेगा कि यह मेरा योगदान था?” ऐसे विचार और मत—ऐसी शैतानी बातें—आमतौर पर देखी-सुनी जाती हैं। अगर तुम्हारे विचार और राय ऐसी हो, तो क्या तुम लोगों के साथ सहयोग करने के इच्छुक हो? क्या तुम सौहार्दपूर्ण सहयोग कर पाओगे? यह आसान नहीं है; इसमें भी अलग-अलग तरह की चुनौतियाँ हैं! “सामंजस्यपूर्ण सहयोग” बोलने में तो आसान हैं—बस मुँह खोला और फौरन निकल गया। लेकिन जब उन पर अमल करने की बात आती है, तो तुम्हारे अंदर ही रुकावटें उभरकर आ खड़ी होती हैं। तुम्हारे विचार इधर-उधर डोलने लगते हैं। अगर कभी तुम्हारी मनोदशा अच्छी हुई, तो हो सकता है कि तुम दूसरों के साथ थोड़ी-बहुत संगति कर पाओ; लेकिन अगर तुम्हारी मनोदशा खराब हुई और भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें बाधित करे, तो तुम इसका बिल्कुल अभ्यास नहीं कर पाओगे। कुछ लोग, बतौर अगुआ किसी के साथ सहयोग नहीं कर सकते। वे हमेशा दूसरों को हिकारत से देखते हैं, लोगों के प्रति नुक्ताचीन होते हैं और अगर किसी में कमियाँ नजर आ जाएँ, तो वे उन लोगों की आलोचना और उन पर हमला करते हैं। इससे अगुआ सड़े हुए सेब की तरह हो जाते हैं और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता है। क्या वे “सौहार्दपूर्ण सहयोग” शब्दों का अर्थ नहीं समझते? वास्तव में, वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं, बस उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाते। वे उन्हें अभ्यास में क्यों नहीं ला पाते? क्योंकि वे रुतबे को बहुत अधिक महत्व देते हैं और उनका स्वभाव भी बहुत अहंकारी होता है। वे दिखावा करना चाहते हैं और जब रुतबा उनकी मुट्ठी में आ जाता है, तो वे उसे छोड़ना नहीं चाहते, उन्हें डर होता है कि वह किसी और के हाथ में चला जाएगा और उनके पास असल सत्ता नहीं बचेगी। वे डरते हैं कि लोग उनका सामाजिक बहिष्कार कर देंगे और उनका सम्मान नहीं करेंगे, उनकी बातों में कोई सामर्थ्य या अधिकार नहीं रह जाएगा। उन्हें इसी बात का डर होता है। उनका अहंकार कहाँ तक जाता है? वे विवेक खो बैठते हैं और बेलगाम होकर मनमानी कार्रवाई करते हैं। और इससे क्या होता है? न केवल वे अपना कर्तव्य खराब तरीके से निभाते हैं, बल्कि उनके क्रियाकलापों से गड़बड़ी और बाधा भी पैदा होती है और फिर उनकी कर्तव्य संबंधी स्थिति में बदलाव कर दिया जाता है और उन्हें बर्खास्त कर दिया जाता है। अच्छा बताओ, क्या ऐसा व्यक्ति, जिसका स्वभाव ऐसा है, कहीं भी कर्तव्य निभाने योग्य होता है? मुझे डर है कि ऐसे व्यक्ति को कहीं भी लगा दिया जाए, वह अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाएगा। वह किसी के भी साथ सहयोग नहीं कर सकता—अच्छा, तो क्या इसका मतलब यह है कि वह अकेले अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकता है? हरगिज नहीं। अगर वह अकेले अपना कर्तव्य निभाएगा, तो उस पर और भी कम पाबंदियाँ होंगी, वह और भी अधिक मनमानी करेगा, बेलगाम कार्रवाई करेगा। तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभा सकते हो या नहीं, यह तुम्हारी योग्यता, तुम्हारी काबिलियत की श्रेष्ठता, तुम्हारी मानवता, तुम्हारी क्षमताओं या तुम्हारे कौशल का मामला नहीं है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम सत्य स्वीकार सकते हो और क्या सत्य को अभ्यास में ला सकते हो। अगर तुम सत्य को अभ्यास में लाने और दूसरों के साथ उचित व्यवहार करने में सक्षम हो, तो तुम दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण सहयोग कर सकते हो। व्यक्ति अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकता है या नहीं और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण सहयोग कर सकता है या नहीं, इसकी कुंजी इसमें निहित है कि वह सत्य स्वीकार कर उसको समर्पित हो सकता है या नहीं। लोगों की काबिलियत, गुण, योग्यता, उम्र आदि मुख्य चीजें नहीं हैं, वे सभी गौण हैं। सबसे महत्वपूर्ण चीज यह देखना है कि व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है या नहीं, और वह सत्य का अभ्यास कर सकता है या नहीं। उपदेश सुनने के बाद, जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, वे स्वीकार करेंगे कि यह सही है। वास्तविक जीवन में, जब उनका सामना लोगों, घटनाओं और चीजों से होता है, तो वे ये सत्य स्वयं पर लागू करेंगे। वे सत्य को अभ्यास में लाएँगे, यह उनकी वास्तविकता और उनके जीवन का एक हिस्सा बन जाएगा। यह ऐसा मानदंड और सिद्धांत बन जाएगा, जिनके अनुसार वे आचरण और चीजें करते हैं; यह वह चीज बन जाएगी, जिसे वे जीते और प्रकट करते हैं। उपदेश सुनते समय, जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, वे भी उसे सही मानते हैं, और सोचते हैं कि वे सब समझते हैं। उन्होंने अपने दिल में सिद्धांत दर्ज कर लिए हैं, लेकिन कोई काम करते समय उस पर विचार करने के लिए वे किन सिद्धांतों और मानदंड का उपयोग करते हैं? वे हमेशा चीजों पर अपने हितों के अनुसार विचार करते हैं; वे सत्य का उपयोग करके चीजों पर विचार नहीं करते। वे डरते हैं कि सत्य का अभ्यास करने पर उन्हें नुकसान होगा और वे दूसरों के द्वारा आलोचना किए जाने और नीचा दिखाए जाने से डरते हैं—इज्जत खोने से डरते हैं। वे बार-बार विचार करते हैं, फिर अंत में सोचते हैं, “मैं सिर्फ अपने रुतबे, प्रतिष्ठा और हितों की रक्षा करूँगा, यही मुख्य बात है। जब ये चीजें प्राप्त हो जाएँगी, मैं संतुष्ट हो जाऊँगा। अगर ये चीजें प्राप्त नहीं होतीं, तो मुझे सत्य का अभ्यास करने में खुशी नहीं होगी, और न ही यह सुखद लगेगा।” क्या यह वह व्यक्ति है, जो सत्य से प्रेम करता है? बिल्कुल नहीं। कुछ लोग धर्मोपदेश सुनते समय बहुत गंभीर होते हैं, और नोट्स भी लेते हैं। जब भी वे कोई अहम शब्द या महत्वपूर्ण वाक्यांश सुनते हैं, तो वे इसे नोटबुक में दर्ज कर लेते हैं, मगर बाद में इसका उपयोग नहीं करते या प्रयोग में नहीं लाते। चाहे जितना भी समय बीत गया हो, कोई वास्तविक बदलाव दिखाई नहीं देता। क्या यह सत्य से प्रेम करने वाला व्यक्ति मालूम पड़ता है? सत्य से प्रेम करने वाले—बशर्ते कि वे इसे समझते हों—इसे अभ्यास में ला सकते हैं, जबकि सत्य से प्रेम नहीं करने वाले इसे समझ लेने पर भी इसे अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। कोई व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है या नहीं, इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि वह इसे अभ्यास में ला सकता है या नहीं। क्या तुम लोगों को लगता है कि जो सत्य से प्रेम नहीं करता वह सही-गलत में अंतर कर सकता है? (वे ऐसा नहीं कर सकते।) दरअसल, वे कर सकते हैं। उदाहरण के लिए अगर वे अतीत में किसी के प्रति दयालु थे, लेकिन फिर वह व्यक्ति उनके हितों को ठेस पहुँचाता है, तो वे कहेंगे, “वह व्यक्ति जमीर से विहीन है। मैंने पहले उसकी मदद की थी, और अब वह मेरे साथ ऐसा बर्ताव कर रहा है!” तुमने देखा, वे अंतरात्मा के बारे में बात करते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की अंतरात्मा या सही-गलत को मापने के लिए वे किस मानक का उपयोग करते हैं? जो कोई भी उनके लिए उपयोगी हो, और जिन वचनों या कर्मों से उनका फायदा होता हो—ये चीजें सकारात्मक हैं, जबकि जो कुछ भी उनके लिए फायदेमंद नहीं है, वह नकारात्मक होता है। उनका दृष्टिकोण कितना स्वार्थी है। क्या तुम लोगों को लगता है कि इस प्रकार का व्यक्ति कभी सत्य प्राप्त कर सकता है? (नहीं, वे नहीं कर सकते।) क्यों नहीं? (वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि उनके कार्य सिद्धांतहीन हैं, और वे सत्य के अनुसार अभ्यास नहीं करते। इसके बजाय वे अपने फायदे के लिए काम करते हैं, और हर तरह से अपने लिए योजनाएँ बनाते हैं।) बिल्कुल सही। वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते। तो सत्य किस प्रकार के व्यक्ति के लिए बनाया गया है? यह उन लोगों के लिए बनाया गया है जो सत्य से प्रेम करते हैं और इसके लिए सब कुछ त्यागने में सक्षम हैं। यही वे लोग हैं जो सत्य प्राप्त कर सकते हैं, और आखिरकार सत्य इनके लिए ही है और इन्हें ही दिया जाता है। इसका अर्थ है सत्य को अभ्यास में लाना और हर कीमत पर सत्य को जीने में सक्षम होना, फिर चाहे इसके लिए तुम्हें अपने व्यक्तिगत हितों या जिन चीजों से तुम सबसे अधिक प्रेम करते हो उन सभी को त्यागना और सौंप देना पड़े। इस प्रकार सत्य प्राप्त किया जा सकता है।

तुम लोगों को क्या लगता है, लोग किस चीज को सबसे ज्यादा सँजोकर रखते हैं? क्या यह मानव जीवन है? (बिल्कुल।) दरअसल, ऐसा नहीं है। मान लो कि तुम्हें परमेश्वर के लिए अपना जीवन त्यागने को कहा जाए। क्या तुम इसे त्याग दोगे? मान लो कि तुम्हें खुद को परमेश्वर को सौंपकर तुरंत मर जाने को कहा जाता है, क्या तुम ऐसा कर पाओगे? कुछ लोग हैं जो ऐसा कर सकते हैं। इसलिए, जीवन लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज नहीं है, क्योंकि वास्तव में कुछ लोग किसी भी समय और कहीं भी, खुद को परमेश्वर को सौंप देने या परमेश्वर के लिए अपना जीवन त्यागने को तैयार होते हैं। मगर जब उनके अपने व्यक्तिगत हित या प्रतिष्ठा और रुतबा दाँव पर लगा होता है, खासकर जब इसमें उनका भविष्य और नियति शामिल होती है, तो क्या वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं? यह करना सबसे कठिन काम है। इस स्थिति में किसी व्यक्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज क्या है? (उसके हित, भविष्य और नियति।) बिल्कुल सही। यह जीवन नहीं, बल्कि उनके हित, रुतबा, भविष्य और नियति हैं—यही वे चीजें हैं जिन्हें लोग सबसे अधिक महत्व देते और सँजोते हैं। अगर कोई परमेश्वर के लिए अपना जीवन त्याग सकता है, तो यह जरूरी नहीं कि वह सत्य से प्रेम करने और उसे अभ्यास में लाने वाला व्यक्ति हो। परमेश्वर के लिए अपना जीवन त्याग देने में सक्षम होना बस एक नारा हो सकता है। तुम कहते हो कि तुम अपना जीवन परमेश्वर को सौंप सकते हो, पर क्या तुम रुतबे के फायदे त्याग सकते हो? अभिमान त्याग सकते हो? किसका त्याग करना आसान है? (अपने जीवन का त्याग करना आसान है।) बिल्कुल। जब कुछ लोगों को विकल्प चुनना पड़ता है, तो भले ही वे अपने जीवन का त्याग कर सकते हैं, पर वे रुतबे के फायदों या अपने गलत मार्ग का त्याग नहीं कर पाते। मान लो कि तुम्हें दो रास्तों में से एक चुनना है। पहला रास्ता है ईमानदार इंसान बनने, सच बोलने और अपने दिल की बात कहने का, दूसरों के साथ अपने दिल की बात साझा करने या अपनी गलतियों को स्वीकारने और तथ्यों को जस-का-तस सामने रखने, और दूसरों को अपनी भ्रष्ट कुरूपता दिखाकर खुद को शर्मिंदा करने का। दूसरा रास्ता है परमेश्वर के लिए शहादत में अपना जीवन त्याग देने और मरने पर स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का। तुम किसे चुनोगे? कुछ लोग कह सकते हैं, “मैं परमेश्वर के लिए अपना जीवन त्याग देने का विकल्प चुनता हूँ। मैं उसके लिए मरने को तैयार हूँ; मरने के बाद मुझे मेरा पुरस्कार मिल जाएगा और मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करूँगा।” परमेश्वर के लिए अपना जीवन न्योछावर करने का लक्ष्य उन लोगों द्वारा एक ही प्रयास में पूरा किया जा सकता है जिनमें संकल्प होता है। लेकिन क्या एक ईमानदार व्यक्ति होने के सत्य को अभ्यास में लाना ऐसे एक ही प्रयास में पूरा किया जा सकता है? यह संभवतः दो प्रयासों में भी हासिल नहीं किया जा सकता। यदि तुम केवल कुछ महत्वहीन कर्तव्यों को निभाने और कुछ सरल सत्यों का अभ्यास करने की कोशिश कर रहे हो और इसमें सही और गलत की गंभीर समस्याएँ शामिल नहीं हैं, तो यह कुछ ऐसा है जिसे तुममें थोड़ा-सा भी संकल्प होने पर एक ही प्रयास में हासिल किया जा सकता है। हालाँकि, यदि तुम सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों का सामना करते हो, तो संभवतः दो प्रयास भी पर्याप्त नहीं होंगे—तुम्हें सत्य सिद्धांतों को समझना होगा। सिर्फ एक बार सच बोलने और झूठ न बोलने से तुम किसी भी तरह से हमेशा के लिए ईमानदार व्यक्ति नहीं बन जाते। ईमानदार व्यक्ति बनने में तुम्हारे स्वभावों को बदलना शामिल है और इसके लिए दस या बीस साल के अनुभव की आवश्यकता होती है। ईमानदार व्यक्ति होने के मानक को मूल रूप से पूरा करने से पहले तुम्हें झूठ बोलने और धोखा देने के अपने कपटी स्वभाव को उतार फेंकना होगा। क्या यह हर किसी के लिए मुश्किल है? यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। परमेश्वर अब लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना चाहता है और जो भी सत्य का अनुसरण करते हैं, उन्हें न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शोधन को स्वीकार करना होगा। परमेश्वर के इस तरह से कार्य करने का उद्देश्य उनके कपटी स्वभावों का समाधान करना और उन्हें ईमानदार लोग और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले लोग बनाना है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे एक ही प्रयास में हासिल किया जा सकता है; इसके लिए सच्ची आस्था की आवश्यकता होती है, इसे हासिल करने से पहले व्यक्ति को परीक्षणों और शोधन से बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। मान लो कि परमेश्वर अब तुमसे एक ईमानदार व्यक्ति बनने और किसी चीज के बारे में सच बताने के लिए कहता है, जिसमें तथ्य या तुम्हारा भविष्य और तुम्हारी नियति शामिल है। तुम्हारे ऐसा करने के परिणाम शायद तुम्हारे लाभ के लिए न हों : हो सकता है कि दूसरे अब तुम्हारा बहुत आदर न करें और तुम्हें लगे कि तुम्हारी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है। ऐसी परिस्थितियों में, क्या तुम स्पष्टवादी हो सकते हो और सच बोल सकते हो? क्या तुम ईमानदार हो सकते हो? यह करना सबसे मुश्किल काम है, अपना जीवन देने से भी कहीं ज़्यादा मुश्किल। तुम शायद कहो, “मैं परमेश्वर के लिए मर सकता हूँ, लेकिन अगर परमेश्वर मुझसे सच बोलने को कहे, तो मैं यह नहीं कर सकता। मैं बिल्कुल भी ईमानदार व्यक्ति नहीं बनना चाहता। मैं मरना पसंद करूँगा बजाय इसके कि हर कोई मेरा आदर न करे, बजाय इसके कि हर कोई देखे कि मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ।” इससे यह देखा जा सकता है कि लोग जिसे सबसे ज्यादा संजोते हैं, वह अभी भी रुतबा और प्रतिष्ठा है—वे इन चीजों को अपने जीवन से भी ज्यादा संजोते हैं। यह स्पष्ट है कि वे अभी भी शैतानी स्वभावों के बीच जीते हैं और उनके दिल अभी भी शैतान द्वारा नियंत्रित हैं। यदि वे बड़े खतरे का सामना करते हैं, तो वे शायद एक ही झटके में अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं, लेकिन उनके लिए रुतबा और प्रतिष्ठा छोड़ना आसान नहीं है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए अपना जीवन देना सबसे अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग सत्य को स्वीकार करें, और वास्तव में ऐसे ईमानदार लोग बनें जो अपने दिल की बात कहते, खुलकर बोलते और सबके सामने खुद को उजागर करते हैं। क्या ऐसा करना आसान है? (नहीं, यह आसान नहीं है।) वास्तव में, परमेश्वर तुमसे अपना जीवन त्यागने के लिए नहीं कहता। क्या तुम्हारा जीवन तुम्हें परमेश्वर ने ही नहीं दिया था? परमेश्वर के लिए तुम्हारे जीवन का क्या उपयोग होगा? परमेश्वर उसे नहीं चाहता। वह चाहता है कि तुम सच्चाई से बोलो, दूसरों को बताओ कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो और अपने दिल में क्या सोचते हो। क्या तुम ये बातें कह सकते हो? यहाँ, चीजें कठिन हो जाती हैं और तुम कह सकते हो, “मुझे थोड़ी कड़ी मेहनत करने दो, मुझमें उसे करने की ताकत होगी। मुझे अपनी सारी संपत्ति का त्याग करने दो, और मैं ऐसा कर सकता हूँ। मैं आसानी से अपने माता-पिता और बच्चों, अपनी शादी और आजीविका का त्याग कर सकता हूँ। लेकिन मुझसे अपने दिल की एक बात कहलवाना या एक ईमानदार वाक्य बुलवाना—यही एक काम मैं नहीं कर सकता।” क्या कारण है कि तुम ऐसा नहीं कर सकते? इसका कारण यह है कि तुम्हारे ऐसा करने के बाद जो कोई भी तुम्हें जानता है या तुमसे परिचित है, वह तुम्हें अलग तरह से देखेगा। वह अब तुम्हारा आदर नहीं करेगा। तुम्हारी मान-मर्यादा चली जाएगी और तुम बुरी तरह से अपमानित होगे, तुम्हारी सत्यनिष्ठा और गरिमा खत्म हो जाएगी। दूसरों के दिलों में तुम्हारा ऊँचा रुतबा और प्रतिष्ठा नहीं रहेगी। इसलिए ऐसे हालात में चाहे कुछ भी हो जाए, तुम सच नहीं कहोगे। जब लोगों के सामने यह स्थिति आती है, तो उनके दिलों में एक जंग होती है। जब वह जंग खत्म होती है, तो कुछ लोग अंततः अपनी कठिनाइयों से निकल आते हैं, जबकि अन्य अपने शैतानी स्वभावों की बेड़ियों और बाधाओं को आज तक तोड़ नहीं पाए हैं और अपने रुतबे, अभिमान, घमंड और तथाकथित गरिमा से नियंत्रित होते रहते हैं। यह एक कठिनाई है, है न? ईमानदारी से बोलना और सच बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, फिर भी इतने सारे बहादुर नायक, इतने सारे लोग जिन्होंने परमेश्वर के सामने खुद को समर्पित करने, खुद को खपाने और परमेश्वर के लिए अपना जीवन बिताने की गंभीर शपथें ली हैं और जिन्होंने परमेश्वर से इतने सारे भव्य शब्द कहे हैं, वे इससे पूरी तरह बाधित हो गए हैं। इससे मेरा क्या मतलब है? जब परमेश्वर यह अपेक्षा करता है कि लोग अपना कर्तव्य पूरा करें, तो वह उनसे एक निश्चित संख्या में कार्यों को पूरा करने या कोई महान उपलब्धि हासिल करने के लिए नहीं कहता, न ही वह कोई अभूतपूर्व करतब हासिल करने के लिए कह रहा है। परमेश्वर जो चाहता है वह यह है कि लोग व्यावहारिक तरीके से वह सब कर सकें जो वे कर सकते हैं और उसके वचनों के अनुसार जिएँ। परमेश्वर को तुम्हारे महान या कुलीन होने की या कोई चमत्कार करने की आवश्यकता नहीं है, न ही वह तुममें कोई सुखद आश्चर्य देखना चाहता है। उसे ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर को बस इतना चाहिए कि तुम व्यावहारिक तरीके से उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करो। परमेश्वर के वचनों को समझने के बाद, उन पर कार्य करो और उन्हें पूरा करो या परमेश्वर के वचनों को सुनने के बाद, उन्हें अच्छी तरह से याद रखो और जब अभ्यास करने का समय आए, तो परमेश्वर के वचनों के अनुसार ऐसा करो। उन्हें तुम्हारा जीवन, तुम्हारी वास्तविकताएँ और जो तुम जीते हो, वह बन जाने दो। इस तरह, परमेश्वर संतुष्ट होगा। तुम हमेशा महानता, उच्च नैतिकता और रुतबे के पीछे भागते हो; तुम हमेशा दूसरों से श्रेष्ठ बनने का प्रयास करते हो। इसे देखकर परमेश्वर को कैसा लगता है? वह इससे घृणा करता है और वह खुद को तुमसे दूर कर लेगा। तुम जितनी अधिक महानता और उच्च नैतिकता का अनुसरण करते हो और दूसरों से अलग दिखने, भीड़ से ऊपर उठने, असाधारण और उत्कृष्ट बनने का प्रयास करते हो, परमेश्वर तुमसे उतना ही अधिक विमुख होता है। यदि तुम आत्म-चिंतन नहीं करते और पश्चात्ताप नहीं करते, तो परमेश्वर तुमसे नफरत करेगा और तुम्हें त्याग देगा। तुम्हें बिल्कुल भी ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जिससे परमेश्वर विमुख हो जाए; तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जिससे परमेश्वर प्रेम करे। तो तुम एक ऐसे व्यक्ति कैसे बन सकते हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है? आज्ञाकारिता से सत्य को स्वीकार करो, एक सृजित प्राणी के रूप में अपने उचित स्थान पर रहो, परमेश्वर के वचनों के आधार पर व्यावहारिक ढंग से काम करो, अपना कर्तव्य ठीक से निभाओ, एक ईमानदार व्यक्ति बनो और मनुष्य जैसा जीवन जियो। इतना ही काफी है और यह परमेश्वर को संतुष्ट करेगा। लोगों को बिल्कुल भी महत्वाकांक्षाएँ या व्यर्थ सपने नहीं पालने चाहिए, उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे नहीं भागना चाहिए या भीड़ से ऊपर उठने का प्रयास नहीं करना चाहिए। इससे भी बढ़कर, उन्हें अतिमानव या कोई महान व्यक्ति बनने, औरों से बेहतर बनने और दूसरों से अपनी पूजा करवाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। भ्रष्ट इंसान इसी की लालसा करते हैं और यह शैतान का मार्ग है; परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं बचाता। यदि लोग लगातार प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे भागते हैं और हठपूर्वक पश्चात्ताप करने से इनकार करते हैं, तो उन्हें मुक्ति नहीं मिल सकती और उनके लिए केवल एक ही परिणाम है : हटा दिया जाना। आज, अगर तुम लोग शीघ्रता से पश्‍चात्ताप करो, तो अभी भी समय है; लेकिन जब वह दिन आएगा और परमेश्वर अपना काम पूरा करेगा, विनाश और भी बढ़ जाएँगे, और तुम मौका खो चुके होगे। जब वह समय आएगा, तब जो लोग शोहरत, लाभ और प्रतिष्ठा के पीछे भाग रहे होंगे और अड़ियल बनकर पश्चात्ताप करने से इनकार करेंगे, वे हटा दिए जाएँगे। तुम सब लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य किस तरह के लोगों को बचाता है, और उसके उद्धार का क्या अर्थ है। परमेश्वर लोगों को अपने वचन सुनने, सत्य को स्वीकारने, भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने के लिए अपने सामने आने, और परमेश्वर के कथन और उसकी आज्ञा के अनुसार अभ्यास करने को कहता है। इसका अर्थ है उसके वचनों के अनुसार जीना, न कि अपनी धारणाओं, कल्पनाओं और शैतानी फलसफों के अनुसार जीना या इंसानी “आनंद” का अनुसरण करना। जो कोई भी परमेश्वर के वचन नहीं सुनता या सत्य नहीं स्वीकारता है, बल्कि अभी भी पश्चात्ताप किए बिना शैतान के फलसफों के अनुसार और शैतानी स्वभाव के साथ जीता है, तो इस तरह के व्यक्ति को परमेश्वर नहीं बचा सकता। तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, मगर बेशक यह भी इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हें चुना है—मगर परमेश्वर द्वारा तुम्हें चुने जाने का क्या अर्थ है? यह तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनाना है, जो परमेश्वर पर भरोसा करता है, जो वास्तव में परमेश्वर का अनुसरण करता है, जो परमेश्वर के लिए सब कुछ त्याग सकता है, और जो परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने में सक्षम है; जिसने अपना शैतानी स्वभाव त्याग दिया है, जो अब शैतान का अनुसरण नहीं करता या उसकी सत्ता के अधीन नहीं जीता है। अगर तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उसके घर में अपना कर्तव्य निभाते हो, फिर भी हर मामले में सत्य का उल्लंघन करते हो, और उसके वचनों के अनुसार अभ्यास या अनुभव नहीं करते हो, यहाँ तक कि उसका विरोध भी करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें स्वीकार सकता है? बिल्कुल नहीं। इससे मेरा क्या आशय है? अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में कठिन नहीं है, और न ही इसे लगन से और मानक स्तर तक करना कठिन है। तुम्हें अपने जीवन का बलिदान या कुछ भी खास या मुश्किल नहीं करना है, तुम्हें केवल एक आज्ञाकारी और व्यावहारिक तरीके से परमेश्वर के वचनों और निर्देशों का पालन करना है, अपने खुद के विचार नहीं रखने हैं और न ही अपना खुद का उद्यम चलाना है, बल्कि सत्य के अनुसरण के रास्ते पर चलना है। अगर लोग ऐसा कर सकते हैं, तो वे मूल रूप से मानव के समान होंगे। जब उनमें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण होता है और वे ईमानदार लोग बन जाते हैं, तो वे एक सच्चे मनुष्य के समान होंगे।

25 जून 2019

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