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मानवजाति के प्रति सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाएं

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लोग अक्सर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फ़िर भी, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर को जानना बिल्कुल भी कठिन विषय नहीं है, क्योंकि वह बार-बार मनुष्य को अपने कार्यों का गवाह बनने देता है। परमेश्वर ने कभी भी मनुष्य के साथ संवाद करना बंद नहीं किया है; उसने कभी भी मनुष्य से अपने आपको गुप्त नहीं रखा है, न ही उसने स्वयं को छिपाया है। उसके विचारों, उसके उपायों, उसके वचनों और उसके कार्यों को मानवजाति के लिए पूरी तरह से प्रकाशित किया गया है। इसलिए, जब तक मनुष्य परमेश्वर को जानने की कामना करता है, वह सभी प्रकार के माध्यमों और पद्धतियों के जरिए उसे समझ और जान सकता है। मनुष्य का आँखें मूंदकर यह सोचने का कि परमेश्वर ने जानबूझकर उससे परहेज किया है, कि परमेश्वर ने जानबूझकर स्वयं को मनुष्य से छिपाया है, कि परमेश्वर का मनुष्य को परमेश्वर को समझने या जानने देने का कोई इरादा नहीं है, कारण यह है कि मनुष्य नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, और न ही वह परमेश्वर को समझने की इच्छा करता है; उससे भी बढ़कर, वह सृष्टिकर्ता के विचारों, वचनों या कार्यों की परवाह नहीं करता है...। सच कहूँ तो, यदि कोई सृष्टिकर्ता के वचनों या कार्यों पर ध्यान केन्द्रित करने और समझने के लिए सिर्फ अपने खाली समय का उपयोग करे, और सृष्टिकर्ता के विचारों एवं उनके हृदय की वाणी पर थोड़ा सा ध्यान दे, तो उन्हें यह एहसास करने में कठिनाई नहीं होगी कि सृष्टिकर्ता के विचार, वचन और कार्य दृश्यमान और पारदर्शी हैं। उसी प्रकार, यह महसूस करने में उन्हें बस थोड़ा सा प्रयास लगेगा कि सृष्टिकर्ता हर समय मनुष्य के मध्य में है, कि वह मनुष्य और सम्पूर्ण सृष्टि के साथ हमेशा से वार्तालाप में है, और वह प्रतिदिन नए कार्य कर रहा है। उसके सार और स्वभाव को मनुष्य के साथ उसके संवाद में प्रकट किया गया है; उसके विचारों और उपायों को उसके कार्यों में पूरी तरह से प्रकट किया गया है; वह हर समय मनुष्य के साथ रहता है और उसे ध्यान से देखता है। वह ख़ामोशी से अपने शांत वचनों के साथ मानवजाति और समूची सृष्टि से बोलता है: मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर हूँ, और मैं अपनी सृष्टि के मध्य हूँ। मैं रखवाली कर रहा हूँ, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ; मैं तुम्हारे साथ हूँ...। उसके हाथों में गर्मजोशी है और वे बलवान हैं, उसके कदम हल्के हैं, उसकी आवाज़ कोमल और अनुग्रहकारी है; उसका स्वरूप हमारे पास से होकर गुज़र जाता है और मुड़ जाता है, और समूची मानवजाति का आलिंगन करता है; उसका मुख सुन्दर और सौम्य है। वह छोड़कर कभी नहीं गया, और न ही वह गायब हुआ है। सुबह से लेकर शाम तक, वह मानवजाति का निरन्तर साथी है। मनुष्यों के लिए उसकी समर्पित देखभाल और विशेष स्नेह, साथ ही साथ मनुष्य के लिए उसकी सच्ची चिंता और प्रेम, को उस समय थोड़ा-थोड़ा करके प्रदर्शित किया गया जब उसने नीनवे के नगर को बचाया था। विशेष रूप से, यहोवा परमेश्वर और योना के बीच के संवाद ने उस मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता की दया को खुलकर प्रकट किया जिसे उसने स्वयं सृजा था। इन वचनों के माध्यम से, तुम मनुष्यों के प्रति परमेश्वर की सच्ची भावनाओं की एक गहरी समझ हासिल कर सकते हो।

निम्नलिखित वचन को योना की पुस्तक 4:10-11 में दर्ज किया गया है: "तब यहोवा ने कहा, 'जिस रेंड़ के पेड़ के लिये तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्‍ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहिचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?'" ये यहोवा परमेश्वर के वास्तविक वचन हैं, उसके और योना के बीच का वार्तालाप हैं। यद्यपि यह संवाद एक संक्षिप्त वार्तालाप है, यह मनुष्य के निमित्त सृष्टिकर्ता की चिंता और उसे त्यागने की उसकी अनिच्छा से लबालब भरा हुआ है। ये वचन उस सच्चे रवैये और एहसासों को प्रकट करते हैं जिसे परमेश्वर ने अपनी सृष्टि के लिए अपने हृदय के भीतर संजोकर रखा है, और इन स्पष्ट वचनों से, जिस प्रकार के वचन मनुष्य कभी कभार ही सुनते हैं, परमेश्वर मनुष्यों के लिए अपने सच्चे इरादों को बताता है। यह संवाद नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये को दर्शाता है—किन्तु यह किस प्रकार का रवैया है? यह वह रवैया है जिसे परमेश्वर नीनवे के लोगों के प्रति उनके पश्चाताप से पहले और बाद में अपनाता है। परमेश्वर मनुष्यों से इसी रीति से बर्ताव करता है। इन वचनों के भीतर कोई भी व्यक्ति उसके विचारों के साथ उसके स्वभाव को पा सकता है।

इन वचनों में परमेश्वर के किस प्रकार के विचारों को प्रकट किया गया है? सावधानीपूर्वक पढ़ने से तुरन्त ही प्रकट हो जाता है कि उसने "दया" शब्द का प्रयोग किया है; इस शब्द का उपयोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के सच्चे रवैये को दिखाता है।

शब्दों एवं वाक्यांशों के अर्थ-संबंधी दृष्टिकोण से, कोई व्यक्ति "दया" शब्द की विभिन्न प्रकार से व्याख्या कर सकता हैः पहला, प्रेम करना और रक्षा करना, किसी चीज़ के प्रति कोमलता महसूस करना; दूसरा, अत्यंत प्रेम करना; और अंततः, नुकसान पहुँचाना न चाहना और इस प्रकार के कार्य को बर्दाश्त करने में असमर्थ होना। संक्षेप में, इसका तात्पर्य कोमल स्नेह और प्रेम है, साथ ही साथ किसी व्यक्ति या किसी चीज़ को छोड़ने की अनिच्छा है; इसका अर्थ मनुष्य के प्रति परमेश्वर की दया और सहनशीलता है। यद्यपि परमेश्वर ने एक ऐसे शब्द का उपयोग किया जिसे मनुष्यों के बीच सामान्य तौर पर बोला जाता है, फ़िर भी इस शब्द के इस्तेमाल ने मानवजाति के प्रति परमेश्वर के हृदय की आवाज़ और उनके रवैये को खुलकर प्रकट किया है।

यद्यपि नीनवे का नगर ऐसे लोगों से भरा हुआ था जो सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, बुरे और उपद्रवी थे, उनके पश्चाताप ने परमेश्वर को बाध्य किया कि वो अपना मन बदल दे और उन्हें नाश न करने का निर्णय ले। क्योंकि परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति उनकी प्रतिक्रिया ने एक ऐसे रवैये का प्रदर्शन किया जो सदोम के नागरिकों के रवैये के ठीक विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके सच्चे समर्पण और अपने पापों के लिए उनके सच्चे पश्चाताप, साथ ही साथ हर लिहाज से उनके सच्चे और हार्दिक आचरण के कारण, परमेश्वर ने एक बार फ़िर से उनके ऊपर अपनी हार्दिक दया दिखाई और उन्हें इसे प्रदान किया। मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रतिफल और उसकी दया की नकल कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है; कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की दया या सहनशीलता को धारण नहीं कर सकता है, न ही मनुष्य के प्रति उसके सच्चे एहसासों को धारण कर सकता है। क्या कोई है जिसे तुम महान पुरुष या स्त्री मानते हो, या कोई अलौकिक मानव भी, जो श्रेष्ठ नज़रिए से, एक महान पुरुष या स्त्री के रूप में, या उच्चतम बिन्दु पर बोलते हुए, मानवजाति या सृष्टि के लिए इस प्रकार का कथन कहेगा? मानवजाति के मध्य ऐसा कौन है जो मनुष्य के जीवन की स्थितियों को अपनी हथेली के समान जान सकता है? मनुष्य के अस्तित्व के लिए बोझ और ज़िम्मेदारी कौन उठा सकता है? किसी नगर के विनाश की घोषणा करने में कौन समर्थ है? और किसी नगर को क्षमा करने में कौन सक्षम है? कौन कह सकता है कि वह अपनी स्वयं की सृष्टि को संजोता है? केवल सृष्टिकर्ता! केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के ऊपर दया करता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति को कोमलता और स्नेह दिखाता है। केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति के लिए सच्चा और अटूट प्रेम रखता है। उसी प्रकार, केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति पर दया कर सकता है और अपनी सम्पूर्ण सृष्टि को संजो सकता है। उसका हृदय मनुष्य के हर एक कार्यों से खुशी से उछलता और दुखित होता है: वह मनुष्य की दुष्टता और भ्रष्टता के ऊपर क्रोधित, परेशान और दुखित होता है; वह मनुष्य के पश्चाताप और विश्वास के लिए प्रसन्न, आनंदित, क्षमाशील और प्रफुल्लित होता है; उसका हर एक विचार और अभिप्राय मानवजाति के लिए अस्तित्व में है और उसके चारों ओर परिक्रमा करता है; उसका स्वरूप पूरी तरह से मानवजाति के वास्ते प्रकट किया जाता है; उसकी भावनाओं की सम्पूर्णता मानवजाति के अस्तित्व के साथ आपस में गुथी हुई है। मनुष्य के वास्ते, वह भ्रमण करता है और यहां वहां भागता है, वह खामोशी से अपने जीवन का हर अंश दे देता है; वह अपने जीवन का हर मिनट और क्षण समर्पित कर देता है...। उसने कभी नहीं जाना कि स्वयं अपने जीवन पर किस प्रकार दया करनी है, फ़िर भी उसने हमेशा से उस मानवजाति पर दया की है और उसे संजोया है जिसे उसने स्वयं सृजा था...। वह सब कुछ देता है जिसे उसे इस मानवजाति को देना है...। वह बिना किसी शर्त के और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति उसकी नज़रों के सामने निरन्तर जीवित रहे, और जीवन के उसके प्रावधान प्राप्त करती रहे; वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है कि मानवजाति एक दिन उसके सम्मुख समर्पित हो जाए और यह पहचान जाए कि यह वही परमेश्वर है जो मुनष्य के अस्तित्व का पालन पोषण करता है और समूची सृष्टि के जीवन की आपूर्ति करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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