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परमेश्वर संसार को जलप्रलय से नाश करने का इरादा करता है, नूह को एक जहाज़ बनाने का निर्देश देता है

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उत्पत्ति 6:9-14 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरुष और अपने समय के लोगों में खरा था; और नूह परमेश्‍वर ही के साथ साथ चलता रहा। और नूह से शेम, और हाम, और येपेत नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। उस समय पृथ्वी परमेश्‍वर की दृष्‍टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी। और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था। तब परमेश्‍वर ने नूह से कहा, "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा। इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उसमें कोठरियाँ बनाना, और भीतर-बाहर उस पर राल लगाना।"

उत्पत्ति 6:18-22 "परन्तु तेरे संग मैं वाचा बाँधता हूँ; इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। और सब जीवित प्राणियों में से तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात् एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपने साथ जीवित रखना। एक एक जाति के पक्षी, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएँगे, कि तू उनको जीवित रखे। और भाँति भाँति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपने पास इकट्ठा कर रखना; जो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा।" परमेश्‍वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

…………

उस युग में, परमेश्वर ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए नूह को बुलाने का इरादा किया। उसे यह क्यों करना पड़ा? क्योंकि उस घड़ी परमेश्वर के हृदय में एक योजना थी। उसकी योजना जलप्रलय से संसार का नाश करने की थी। संसार का नाश क्यों करना है? यहाँ कहा गया है: "उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी।" तुम लोग इस वाक्यांश से क्या देखते हो "पृथ्वी उपद्रव से भर गई थी"? यह पृथ्वी पर एक घटना है जब संसार और इसके लोग चरमावस्था तक बिगड़ गए हैं, और यही: "पृथ्वी उपद्रव से भर गई थी", है। आज की भाषा में, "उपद्रव से भर गई थी" मतलब सब कुछ गड़बड़ है। मनुष्य के लिए, इसका मतलब है कि जीवन के सभी दौर में कोई क्रम नहीं है, और परिस्थितियाँ बहुत ही अस्तव्यस्त हैं और उन्हें सम्भालना कठिन है। परमेश्वर की नज़रों में, इसका मतलब है कि संसार के लोग बहुत ही भ्रष्ट हैं। किस हद तक भ्रष्ट हैं? उस हद तक भ्रष्ट हैं कि परमेश्वर उन्हें देखना अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता है और वह इस विषय में और अधिक धीरज नहीं धर सकता है। उस हद तक भ्रष्ट कि परमेश्वर उसे नष्ट करने का निर्णय लेता है। जब परमेश्वर ने संसार को नष्ट करने की ठान ली, तो उसने जहाज़ बनाने के लिए किसी को ढूंढने की योजना बनाई। फिर परमेश्वर ने इस कार्य को करने के लिए नूह को चुना, अर्थात नूह को जहाज़ बनाने दिया। नूह को क्यों चुना? परमेश्वर की नज़रों में, नूह एक धर्मी पुरुष है, और चाहे परमेश्वर उसे कुछ भी करने का निर्देश दे वह उसी के अनुसार कार्य करेगा। इसका मतलब है कि जो कुछ भी परमेश्वर उसे करने के लिए कहेगा वह उसे करेगा। परमेश्वर अपने साथ कार्य करने के लिए, जो कुछ उसने सौंपा है उसे पूर्ण करने के लिए, और पृथ्वी पर अपने कार्य को पूर्ण करने के लिए ऐसे ही व्यक्ति को ढूँढना चाहता था। उस समय अतीत में, क्या नूह के अलावा कोई और व्यक्ति था जो ऐसे कार्य को पूर्ण कर सकता था? निश्चित रूप से नहीं! नूह ही एकमात्र उम्मीदवार था, ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसे पूर्ण कर सकता था जिसे परमेश्वर ने सौंपा था, और इस प्रकार परमेश्वर ने उसे चुना। लेकिन क्या उस समय लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर का दायरा एवं मापदंड वैसे ही थे जैसे अब हैं? उत्तर यह है कि इसमें बिलकुल एक अन्तर है! मैं क्यों पूछता हूँ? उस समय के दौरान परमेश्वर की नज़रों में केवल नूह ही एक धर्मी पुरुष था, एक अर्थ में उसकी पत्नी और उसके बेटे और बहूएँ सभी धर्मी लोग नहीं थे, लेकिन परमेश्वर ने नूह के कारण इन लोगों को अब भी बचाकर रखा था। परमेश्वर ने उनसे उस तरह से अपेक्षा नहीं की थी जैसे वह आज के लोगों से अपेक्षा करता है, और इसके बजाए उसने नूह के परिवार के आठ सदस्यों को सुरक्षित रखा। उन्होंने नूह की धार्मिकता के कारण परमेश्वर के आशीष को प्राप्त किया। यदि नूह नहीं होता, तो उनमें से कोई भी उस कार्य को पूर्ण नहीं कर सकता था जो परमेश्वर ने सौंपा था। इसलिए, नूह ही ऐसा एकमात्र व्यक्ति था जिसे कि उस समय संसार के विनाश में जीवित बचना था, अन्य लोग बस अतिरिक्त सहायक लाभार्थी थे। यह दर्शाता है कि, परमेश्वर ने अपने प्रबंधकीय कार्य को आधिकारिक रूप से प्रारम्भ किया उसके पहले के युग में, ऐसे सिद्धान्त एवं मापदंड जिसके तहत वह लोगों से व्यवहार करता और उनसे अपेक्षा करता था वे अपेक्षाकृत शिथिल थे। आज के लोगों के लिए, ऐसा प्रतीत होता है कि जिस तरह से परमेश्वर ने नूह के परिवार के आठ सदस्यों से व्यवहार किया उसमें निष्पक्षता का अभाव है। किन्तु कार्य के उस परिमाण की तुलना में जिसे वह अब लोगों पर करता है और उसके वचन की मात्रा की तुलना में जिसे वह देता है, वह व्यवहार जो परमेश्वर ने नूह के परिवार के आठ लोगों से किया वह महज उस समय उसके कार्य की पृष्ठभूमि के मद्देनज़र एक कार्य सिद्धान्त था। तुलनात्मक रूप से, क्या नूह के परिवार के आठ लोगों ने परमेश्वर से कहीं ज़्यादा प्राप्त किया था या आज के लोग ज़्यादा प्राप्त करते हैं?

नूह का बुलाया जाना एक साधारण तथ्य है, परन्तु वह मुख्य बिन्दु जिसके विषय में हम बात कर रहे हैं—इस अभिलेख में परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की इच्छा एवं उसका सार—वह साधारण नहीं है। परमेश्वर के इन विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए, हमें पहले समझना होगा कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को बुलाने की इच्छा करता है, और इसके माध्यम से, हमें उसके स्वभाव, इच्छा एवं सार को समझना होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः परमेश्वर की नज़रों में, यह किस प्रकार का व्यक्ति है जिसे वह बुलाता है? यह ऐसा व्यक्ति होगा जो उसके वचनों को सुन सके, जो उसके निर्देशों का अनुसरण कर सके। साथ ही, यह ऐसा व्यक्ति भी होगा जिसके पास ज़िम्मेदारी की भावना हो, कोई ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को ऐसी ज़िम्मेदारी एवं कर्तव्य मानकर क्रियान्वित करेगा जिसे निभाने के लिए वो बाध्य है। तब क्या इस व्यक्ति को ऐसा व्यक्ति होने की आवश्यकता है जो परमेश्वर को जानता है? नहीं। उस समय अतीत में, नूह ने परमेश्वर की शिक्षाओं के बारे में बहुत कुछ नहीं सुना था या परमेश्वर के किसी कार्य का अनुभव नहीं किया था। इसलिए, परमेश्वर के बारे में नूह का ज्ञान बहुत ही कम था। हालाँकि यहाँ लिखा है कि नूह परमेश्वर के साथ साथ चलता रहा, फिर भी क्या उसने कभी परमेश्वर के व्यक्तित्व को देखा था? उत्तर है पक्के तौर पर नहीं! क्योंकि उन दिनों में, सिर्फ परमेश्वर के संदेशवाहक ही लोगों के पास आते थे। जबकि वे चीज़ों को कहने एवं करने के द्वारा परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, वे महज परमेश्वर की इच्छा एवं इरादों को सूचित कर रहे थे। परमेश्वर का व्यक्तित्व मनुष्य पर आमने-सामने प्रकट नहीं हुआ था। पवित्र शास्त्र के इस भाग में, हम सब मूल रूप से देखते हैं कि इस व्यक्ति नूह को क्या करना था और उसके लिए परमेश्वर के निर्देश क्या थे। अतः वह सार क्या था जिसे यहाँ परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किया गया था? सब कुछ जो परमेश्वर करता है उसकी योजना सटीकता के साथ बनाई जाती है। जब वह किसी चीज़ या परिस्थिति को घटित होते देखता है, तो उसकी दृष्टि में इसे नापने के लिए एक मापदंड होगा, और यह मापदंड निर्धारित करेगा कि इसके साथ निपटने के लिए वह किसी योजना की शुरुआत करता है या नहीं या उसे इस चीज़ एवं परिस्थिति के साथ किस प्रकार निपटना है। वह उदासीन नहीं है या उसके पास सभी चीज़ों के प्रति कोई भावनाएँ नहीं हैं। यह असल में पूर्णत: विपरीत है। यहाँ एक वचन है जिसे परमेश्वर ने नूह से कहा था: "सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे सामने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उनको पृथ्वी समेत नष्‍ट कर डालूँगा।" इस समय परमेश्वर के वचनों में, क्या उसने कहा था कि वह सिर्फ मनुष्यों का विनाश कर रहा था? नहीं! परमेश्वर ने कहा कि वह हाड़-मांस के सब जीवित प्राणियों का विनाश करने जा रहा था। परमेश्वर ने विनाश क्यों चाहा? यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का एक और प्रकाशन है: परमेश्वर की दृष्टि में, मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति, सभी प्राणियों की अशुद्धता, उपद्रव एवं अनाज्ञाकारिता के प्रति उसके धीरज की एक सीमा होती है। उसकी सीमा क्या है? यह ऐसा है जैसा परमेश्वर ने कहा था: "और परमेश्‍वर ने पृथ्वी पर जो दृष्‍टि की तो क्या देखा कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था।" इस वाक्यांश "क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपना अपना चाल-चलन बिगाड़ लिया था" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कोई भी जीवित प्राणी, परमेश्वर का अनुसरण करने वालों समेत, ऐसे लोग जो परमेश्वर का नाम पुकारते थे, ऐसे लोग जो किसी समय परमेश्वर को होमबलि चढ़ाते थे, ऐसे लोग जो मौखिक रूप से परमेश्वर को स्वीकार करते थे और यहाँ तक कि परमेश्वर की स्तुति भी करते थे—जब एक बार उनका व्यवहार भ्रष्टता से भर गया और परमेश्वर की दृष्टि तक पहुँच गया, तो उसे उन्हें नाश करना होगा। यह परमेश्वर की सीमा थी। अतः परमेश्वर किस हद तक मनुष्य एवं सभी प्राणियों की भ्रष्टता के प्रति सहनशील बना रहा? उस हद तक जब सभी लोग, चाहे परमेश्वर के अनुयायी हों या अविश्वासी, सही मार्ग पर नहीं चल रहे थे। उस हद तक कि मनुष्य केवल नैतिक रूप से भ्रष्ट और बुराई से भरा हुआ नहीं था, बल्कि जहाँ कोई व्यक्ति नहीं था जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता था, किसी ऐसे व्यक्ति की तो बात ही छोड़ दीजिए जो विश्वास करता था कि परमेश्वर के द्वारा इस संसार पर शासन किया जाता है और यह कि परमेश्वर लोगों को ज्योति में और सही मार्ग पर ला सकता है। उस हद तक जहाँ मनुष्य ने परमेश्वर के अस्तित्व को तुच्छ जाना और परमेश्वर को अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं दी। जब एक बार मनुष्य की भ्रष्टता इस बिन्दु पर पहुँच गई, तो परमेश्वर के पास और अधिक धीरज नहीं होगा। इसके बजाए उसका स्थान कौन लेगा? परमेश्वर के क्रोध और परमेश्वर के दण्ड का आगमन। क्या यह परमेश्वर के स्वभाव का एक आंशिक प्रकाशन नहीं था? इस वर्तमान युग में, क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई धर्मी मनुष्य है? क्या परमेश्वर की दृष्टि में अभी भी कोई सिद्ध मनुष्य है? क्या यह युग ऐसा युग है जिसके अंतर्गत परमेश्वर की दृष्टि में पृथ्वी पर सभी प्राणियों का व्यवहार भ्रष्ट हो गया है? आज के दिन और युग में, ऐसे लोगों को छोड़ कर जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करना चाहता है, ऐसे लोग जो परमेश्वर का अनुसरण और उसके उद्धार को स्वीकार कर सकते हैं, क्या हाड़-मांस के सभी लोग परमेश्वर के धीरज की सीमा को चुनौती नहीं दे रहे हैं? क्या सभी चीज़ें जो तुम लोगों के आस-पास घटित होती हैं, जिन्हें तुम लोग अपनी आँखों से देखते हो और अपने कानों से सुनते हो, और इस संसार में व्यक्तिगत रूप से अनुभव करते हो उपद्रव से भरी हुई नहीं हैं? परमेश्वर की दृष्टि में, क्या एक ऐसे संसार, एवं ऐसे युग को समाप्त नहीं कर देना चाहिए? यद्यपि इस वर्तमान युग की पृष्ठभूमि नूह के समय की पृष्ठभूमि से पूर्णतः अलग है, फिर भी वे भावनाएँ एवं क्रोध जो मनुष्य की भ्रष्टता के प्रति परमेश्वर में है वे वैसी ही बनी रहती हैं जैसी वे पिछले समय में थीं। परमेश्वर अपने कार्य के कारण सहनशील होने में समर्थ है, किन्तु सब प्रकार की परिस्थितियों एवं हालातों के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में इस संसार को बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था। जैसा पिछले समय में था जब जलप्रलय के द्वारा संसार का विनाश किया गया था उसके लिहाज से परिस्थिति बिल्कुल अलग है।

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इन परिस्थितियों के अंतर्गत, परमेश्वर किस बात की सबसे अधिक परवाह करता है? इसकी नहीं कि किस प्रकार ऐसे लोग जो उसका अनुसरण बिलकुल भी नहीं करते हैं या ऐसे लोग जो हर तरह से उसका विरोध करते हैं वे उससे कैसा व्यवहार करते हैं या उसका कैसे प्रतिरोध करते हैं, या मानवजाति किस प्रकार उस पर कलंक लगा रही है। वह केवल इसके विषय में परवाह करता है कि वे लोग जो उसकी प्रबंधन योजना में उसके उद्धार के विषय हैं, जो उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें उसके द्वारा पूर्ण बनाया गया है या नहीं, उन्होंने उसकी संतुष्टि को हासिल किया है या नहीं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो उसका अनुसरण करने वालों के अतिरिक्त हैं, वह मात्र कभी कभार ही अपने क्रोध को व्यक्त करने के लिए थोड़ा सा दण्ड देता है। उदाहरण के लिए: सुनामी, भूकम्प, ज्वालामुखी का विस्फोट, एवं इत्यादि। ठीक उसी समय, वह उनको भी प्रभावशाली ढंग से बचाता है, उनकी देखरेख करता है जो उसका अनुसरण करते हैं और जिन्हें उसके द्वारा बचाया जानेवाला है। परमेश्वर का स्वभाव यह है: एक ओर, वह उन लोगों को अधिकतम धीरज एवं सहनशीलता प्रदान कर सकता है जिन्हें वह पूर्ण बनाने का इरादा करता है, और जब तक वह संभवतः कर सकता है वह उनके लिए इंतज़ार करता है; दूसरी ओर, परमेश्वर शैतान-प्रकार के लोगों से, जो उसका अनुसरण नहीं करते हैं और उसका विरोध करते हैं, अत्यंत नफ़रत एवं घृणा करता है। यद्यपि वह इस बात की परवाह नहीं करता है कि ये शैतान-प्रकार के लोग उसका अनुसरण करते या उसकी आराधना करते हैं या नहीं, वह तब भी उनसे घृणा करता है जबकि उसके हृदय में उनके लिए धीरज होता है, और चूँकि वह इन शैतान-प्रकार के लोगों के अन्त को निर्धारित करता है, इसलिए वह अपने प्रबंधकीय योजना के चरणों के आगमन का भी इन्तज़ार कर रहा होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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