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परमेश्वर मनुष्य के साथ अपनी वाचा के लिए इंद्रधनुष को चिन्ह के रूप में ठहराता है

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उत्पत्ति 9:11-13 "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग-युग की पीढ़ियों के लिये बाँधता हूँ, उसका यह चिह्न है: मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिह्न होगा।"

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अधिकांश लोग जानते हैं कि इंद्रधनुष क्या है और उन्होंने इंद्रधनुष से जुड़ी कुछ कहानियों को सुना है। जहाँ तक बाइबल में इंद्रधनुष के बारे में उस कहानी की बात है, कुछ लोग इसका विश्वास करते हैं, कुछ दंतकथा के रूप में इससे व्यवहार करते हैं, जबकि अन्य लोग इस पर बिलकुल भी विश्वास नहीं करते हैं। चाहे कुछ भी हो, सब कुछ जो इंद्रधनुष के सम्बन्ध में घटित हुआ था वह सब ऐसी चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर ने किसी समय किया था, और ऐसी चीज़ें हैं जो मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रबंधन की प्रक्रिया के दौरान घटित हुई थीं। इन चीज़ों को बाइबल में हू-बहू लिखा गया है। ये लेख हमें यह नहीं बताते हैं कि उस समय परमेश्वर किस मनोदशा में था या इन वचनों के पीछे उसके क्या इरादे थे जिन्हें परमेश्वर ने कहा था। इसके अतिरिक्त, कोई भी समझ नहीं सकता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा था जब उसने उन्हें कहा था। फिर भी, इस समूचे हालात के लिहाज से परमेश्वर के मन की दशा को पाठ की पंक्तियों के बीच प्रकट किया गया है। यह ऐसा है मानो उस समय के उसके विचार परमेश्वर के वचन के प्रत्येक शब्द एवं वाक्यांश के ज़रिये पन्नों से निकल पड़ते हैं।

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मूल रूप से, परमेश्वर ने ऐसी मानवता की सृष्टि की थी जो उसकी दृष्टि में बहुत ही अच्छी और उसके बहुत ही निकट थी, किन्तु उसके विरुद्ध विद्रोह करने के पश्चात् जलप्रलय के द्वारा उनका विनाश कर दिया गया था। क्या इसने परमेश्वर को कष्ट पहुँचाया कि एक ऐसी मानवता तुरन्त ही इस तरह विलुप्त हो गई थी? निश्चय ही इसने कष्ट पहुँचाया था! तो उसकी इस दर्द की अभिव्यक्ति क्या थी? बाइबल में इसे कैसे लिखा गया था? इसे बाइबल में इस रूप से लिखा गया: "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जल-प्रलय से नष्‍ट न होंगे: और पृथ्वी का नाश करने के लिये फिर जल-प्रलय न होगा।" यह साधारण वाक्य परमेश्वर के विचारों को प्रकट करता है। संसार के इस विनाश ने उसे बहुत अधिक दुःख पहुँचाया। मनुष्य के शब्दों में, वह बहुत ही दुःखी था। हम कल्पना कर सकते हैं: जलप्रलय के द्वारा नाश किए जाने के बाद पृथ्वी जो किसी समय जीवन से भरी हुई थी वह कैसी दिखाई देती थी? वह पृथ्वी जो किसी समय मानवों से भरी हुई थी अब कैसी दिखती थी? कोई मानवीय निवास नहीं, कोई जीवित प्राणी नहीं, हर जगह पानी ही पानी और जल की सतह पर सब कुछ अस्तव्यस्त था। जब परमेश्वर ने संसार को बनाया तो क्या उसका मूल इरादा ऐसा कोई दृश्य था? बिलकुल भी नहीं! परमेश्वर का मूल इरादा था कि समूची धरती पर जीवन को देखे, कि उन मानवों को जिन्हें उसने बनाया था, उन्हें अपनी आराधना करते हुए देखे, सिर्फ नूह के लिए ही नहीं कि वह उसकी आराधना करनेवाला एकमात्र व्यक्ति हो या ऐसा एकमात्र व्यक्ति जो उसकी बुलाहट का उत्तर दे सके ताकि जो कुछ उसे सौंपा गया था उसे पूर्ण करे। जब मानवता विलुप्त हो गई, तो परमेश्वर ने वह नहीं देखा जिसका उसने मूल रूप से इरादा किया था बल्कि पूर्णतः विपरीत देखा। उसका हृदय तकलीफ में कैसे नहीं हो सकता था? अतः जब वह अपने स्वभाव को प्रकट कर रहा था और अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा था, तब परमेश्वर ने एक निर्णय लिया। उसने किस प्रकार का निर्णय लिया? मनुष्य के साथ एक वाचा के रूप में बादल में एक धनुष बनाने का (टिप्पणी: वह इंद्रधनुष जो हम देखते हैं), ऐसी प्रतिज्ञा कि परमेश्वर मानवजाति का जलप्रलय से दोबारा नाश नहीं करेगा। साथ ही, यह लोगों को यह बताने के लिए भी था कि परमेश्वर ने संसार का किसी समय जलप्रलय से नाश किया था, ताकि मानवजाति हमेशा याद रखे कि परमेश्वर ने ऐसा कार्य क्यों किया था।

क्या इस समय संसार का विनाश कुछ ऐसा था जो परमेश्वर चाहता था? यह निश्चित रूप से वह नहीं था जो परमेश्वर चाहता था। संसार के विनाश के बाद हम शायद पृथ्वी के दयनीय दृश्य के एक छोटे से भाग की कल्पना कर सकते हैं, परन्तु हम कल्पना कर ही नहीं सकते हैं कि उस समय परमेश्वर की निगाहों में वह तस्वीर कैसी थी। हम कह सकते हैं कि, चाहे यह आज के लोग हों या उस समय के, कोई भी यह सोच या सराह नहीं सकता कि, परमेश्वर ने उस समय क्या महसूस किया जब उसने वो दृश्य, संसार की वो तस्वीर देखी जो जलप्रलय के द्वारा विनाश के बाद की थी। मनुष्य की अनाज्ञाकारिता की वजह से परमेश्वर इसे करने के लिए मजबूर था, परन्तु जलप्रलय के द्वारा संसार के विनाश से परमेश्वर के हृदय के द्वारा सहा गया वह दर्द एक वास्तविकता है जिसे कोई नाप या सराह नहीं सकता है। इसीलिए परमेश्वर ने मानवजाति के साथ एक वाचा बाँधी, जो लोगों को यह बताने के लिए थी कि वे स्मरण रखें कि परमेश्वर ने किसी समय ऐसा कुछ किया था, और उन्हें यह वचन देने के लिए था कि परमेश्वर कभी इस संसार का इस तरह से दोबारा नाश नहीं करेगा। इस वाचा में हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं—हम देखते हैं कि परमेश्वर का हृदय पीड़ा में था जब उसने मानवता का नाश किया। मनुष्य की भाषा में, जब परमेश्वर ने मानवजाति का नाश किया और मानवजाति को विलुप्त होते हुए देखा, तो उसका हृदय रो रहा था और उससे लहू बह रहा था। क्या उसके वर्णन का यह सबसे उत्तम तरीका नहीं है? मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए इन शब्दों को मनुष्य के द्वारा उपयोग किया जाता है, परन्तु चूँकि मनुष्य की भाषा में बहुत कमी है, तो परमेश्वर के एहसासों एवं भावनाओं का वर्णन करने के लिए उनका उपयोग करना मुझे बुरा नहीं लगता है, और न ही यह बहुत ज़्यादा है। कम से कम यह तुम लोगों को उस समय परमेश्वर की मनोदशा क्या थी उसके विषय में एक बहुत ही स्पष्ट, एवं बहुत ही उपयुक्त समझ प्रदान करता है। जब तुम लोग इंद्रधनुष को दोबारा देखोगे तो अब तुम लोग क्या सोचोगे? कम से कम तुम लोग स्मरण करोगे कि किस प्रकार एक समय परमेश्वर जल-प्रलय के द्वारा संसार के विनाश पर दुःखी था। तुम लोग स्मरण करोगे कि, परमेश्वर ने इस संसार से नफ़रत की और इस मानवता को तुच्छ जाना था, फिर भी जब उसने उन मनुष्यों का विनाश किया जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था, तो उसका हृदय दुख रहा था, उसका हृदय उन्हें छोड़ने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका हृदय नहीं चाह रहा था, उसके हृदय को इसे सहना कठिन महसूस हो रहा था। उसका सुकून सिर्फ नूह के परिवार के आठ लोगों में ही था। यह नूह का सहयोग था जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि करने के उसके अत्यधिक सावधानी से किए गए प्रयासों को सार्थक बनाया था। एक समय जब परमेश्वर कष्ट सह रहा था, तब यह एकमात्र चीज़ थी जो उसकी पीड़ा की क्षतिपूर्ति कर सकती थी। उस बिन्दु से, परमेश्वर ने मानवता की अपनी सारी अपेक्षाओं को नूह के परिवार के ऊपर डाल दिया था, यह आशा करते हुए कि वे उसकी आशीषों के अधीन जीवन बिताएँगे और उसके श्राप के अधीन नहीं, यह आशा करते हुए कि वे परमेश्वर को फिर कभी संसार का जलप्रलय से नाश करते हुए नहीं देखेंगे, और साथ ही यह भी आशा करते हुए कि उनका विनाश नहीं किया जाएगा।

(छवि स्त्रोत: Fotolia)

यहाँ से हमको परमेश्वर के स्वभाव के किस भाग को समझना चाहिए? परमेश्वर ने मनुष्य को तुच्छ जाना था क्योंकि मनुष्य उसके प्रति शत्रुतापूर्ण था, लेकिन उसके हृदय में, मानवता के लिए उसकी देखभाल, चिंता एवं दया अपरिवर्तनीय बनी रही। यहाँ तक कि जब उसने मानवजाति का नाश किया, उसका हृदय अपरिवर्तनीय बना रहा। जब मानवता परमेश्वर के प्रति एक हद तक भ्रष्टता एवं अनाज्ञाकारिता से भर गई थी, परमेश्वर को अपने स्वभाव एवं अपने सार के कारण, और अपने सिद्धान्तों के अनुसार इस मानवता का विनाश करना पड़ा था। लेकिन परमेश्वर के सार के कारण, उसने तब भी मानवजाति पर दया की, और यहाँ तक कि वह मानवजाति को छुड़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग करना चाहता था ताकि वे निरन्तर जीवित रह सकें। इसके बदले में, मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया, निरन्तर परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करता रहा, और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से इंकार किया, अर्थात्, उसके अच्छे इरादों को स्वीकार करने से इंकार किया। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर ने उन्हें कैसे पुकारा, उन्हें कैसे स्मरण दिलाया, कैसे उनकी आपूर्ति की, कैसे उनकी सहायता की, या कैसे उनको सहन किया, क्योंकि मनुष्य ने न तो इसे समझा न सराहा, न ही उन्होंने कुछ ध्यान दिया। अपनी पीड़ा में, परमेश्वर अब भी मनुष्य को अपनी सर्वाधिक सहनशीलता देना नहीं भूला था, वह मनुष्य के वापस मुड़ने का इन्तज़ार कर रहा था। अपनी सीमा पर पहुँचने के पश्चात्, उसने वह किया जो उसे बिना किसी हिचकिचाहट के करना था। दूसरे शब्दों में, उस घड़ी से जब से परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने की योजना बनायी तब से उसके मानवजाति के विनाश के अपने कार्य की आधिकारिक शुरुआत करने तक, वहाँ एक विशेष समय अवधि एवं प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया मनुष्य को पीछे मुड़ने के योग्य बनाने के उद्देश्य के लिए अस्तित्व में थी, और यह वह आख़िरी मौका था जो परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था। अतः परमेश्वर ने मानवजाति का विनाश करने से पहले इस अवधि में क्या किया था? परमेश्वर ने प्रचुर मात्रा में स्मरण दिलाने एवं उत्साहवर्धन करने का कार्य किया था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर का हृदय कितनी पीड़ा एवं दुःख में था, उसने मानवता पर अपनी देखभाल, चिंता और अत्यंत दया का अभ्यास करना जारी रखा। हम इससे क्या देखते हैं? बेशक, हम देखते हैं कि मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम वास्तविक है और कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके प्रति वह दिखावा कर रहा है। यह वास्तविक, स्‍पर्शगम्‍य एवं प्रशंसनीय है, जाली, मिलावटी, झूठा या कपटपूर्ण नहीं है। परमेश्वर कभी किसी छल का उपयोग नहीं करता है या झूठी तस्वीरें नहीं बनाता है कि लोगों को यह दिखाए कि वह कितना प्रेमयोग्य है। वह लोगों को अपनी मनोहरता दिखाने के लिए, या अपनी मनोहरता एवं पवित्रता के दिखावे के लिए झूठी गवाही का उपयोग नहीं करता है। क्या परमेश्वर के स्वभाव के ये पहलू मनुष्य के प्रेम के लायक नहीं हैं? क्या वे आराधना के योग्य नहीं हैं? क्या वे संजोकर रखने के योग्य नहीं हैं? इस बिन्दु पर, मैं तुम लोगों से पूछना चाहता हूँ: इन शब्दों को सुनने के बाद, क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर की महानता कागज के टुकड़ों पर लिखे गए मात्र शब्द हैं? क्या परमेश्वर की मनोहरता केवल खोखले शब्द ही हैं? नहीं! बिलकुल भी नही! परमेश्वर की सर्वोच्चता, महानता, पवित्रता, सहनशीलता, प्रेम, इत्यादि—परमेश्वर के स्वभाव एवं सार के इन सब विभिन्न पहलुओं को हर उस समय लागू किया जाता है जब वह अपना कार्य करता है, मनुष्य के प्रति उसकी इच्छा में मूर्त रूप दिया जाता है, और प्रत्येक व्यक्ति पर पूरा एवं प्रतिबिम्बित किया जाता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुमने इसे पहले महसूस किया है या नहीं, परमेश्वर हर संभव तरीके से प्रत्येक व्यक्ति की देखभाल कर रहा है, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय को स्नेह देने, और प्रत्येक व्यक्ति के आत्मा को जगाने के लिए अपने निष्कपट हृदय, बुद्धि एवं विभिन्न तरीकों का उपयोग कर रहा है। यह एक निर्विवादित तथ्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यहाँ कितने लोग बैठे हैं, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के पास परमेश्वर की सहनशीलता, धीरज एवं मनोहरता के विषय में अलग अलग अनुभव और उसके प्रति अलग अलग भावनाएँ हैं। परमेश्वर के ये अनुभव और उसकी ये भावनाएँ या स्वीकृतियाँ, संक्षेप में, ये सभी सकरात्मक चीज़ें परमेश्वर की ओर से हैं। अतः परमेश्वर के विषय में प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव एवं ज्ञान को मिलाने के द्वारा और इन्हें आज बाइबल के इन अंशों के हमारे पठन से जोड़ने के द्वारा, क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर की और अधिक वास्तविक एवं उचित समझ है?

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परमेश्वर ने मानवजाति की सृष्टि की; इसकी परवाह किये बगैर कि उन्हें भ्रष्ट किया गया है या नहीं या वे उसका अनुसरण करते है या नहीं करते, परमेश्वर मनुष्य से अपने प्रियजनों के समान व्यवहार करता है—या जैसा मानव कहेंगे, ऐसे लोग जो उसके लिए अतिप्रिय हैं—और उसके खिलौने नहीं हैं। हालाँकि परमेश्वर कहता है कि वह सृष्टिकर्ता है और मनुष्य उसकी सृष्टि है, जो सुनने में ऐसा लग सकता है कि यहाँ पद में थोड़ा अन्तर है, फिर भी वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी परमेश्वर ने मानवजाति के लिए किया है वह इस प्रकार के रिश्ते से कहीं बढ़कर है। परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, मानवजाति की देखभाल करता है, मानवजाति के लिए चिन्ता दिखाता है, इसके साथ ही साथ लगातार और बिना रुके मानवजाति की आपूर्ति करता है। वह कभी अपने हृदय में यह महसूस नहीं करता है कि यह एक अतिरिक्त कार्य है या कुछ ऐसा है जो ढेर सारे श्रेय के लायक है। न ही वह यह महसूस करता है कि मानवता को बचाना, उनकी आपूर्ति करना, और उन्हें सबकुछ देना, मानवजाति के लिए एक बहुत बड़ा योगदान देना है। अपने स्वयं के तरीके से और अपने स्वयं के सार और जो वह है उसके माध्यम से, वह बस खामोशी से एवं चुपचाप मानवजाति के लिए प्रदान करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मानवजाति उससे कितने प्रयोजन एवं कितनी सहायता प्राप्त करती है, क्योंकि परमेश्वर इसके बारे में कभी नहीं सोचता है या न ही श्रेय लेने की कोशिश करता है। यह परमेश्वर के सार के द्वारा निर्धारित होता है, और साथ ही यह परमेश्वर के स्वभाव की बिलकुल सही अभिव्यक्ति भी है। इसीलिए, चाहे यह बाइबल हो या कोई अन्य पुस्तक, हम परमेश्वर को कभी अपने विचारों को व्यक्त करते हुए नहीं पाते हैं, और हम कभी परमेश्वर को मनुष्यों को यह वर्णन करते या घोषणा करते हुए नहीं पाते हैं कि वह इन कार्यों को क्यों करता है, या वह मानवजाति की इतनी देखरेख क्यों करता है, जिससे वह मानवजाति को अपने प्रति आभारी बनाए या उससे अपनी स्तुति कराए। यहाँ तक कि जब उसे क़़ष्ट भी होता है, जब उसका हृदय अत्यंत पीड़ा में होता है, वह मानवजाति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी या मानवजाति के लिए अपनी चिन्ता को कभी नहीं भूलता है, वह पूरे समय इस कष्ट एवं दर्द को चुपचाप अकेला सहता रहता है। इसके विपरीत, परमेश्वर निरन्तर मानवजाति को प्रदान करता है जैसा वह हमेशा से करता आया है। हालाँकि मानवजाति अक्सर परमेश्वर की स्तुति करती है या उसकी गवाही देती है, फिर भी इसमें से किसी भी व्यवहार की माँग परमेश्वर के द्वारा नहीं की जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर, किसी भी अच्छे कार्य के लिए जिसे वह मानवजाति के लिए करता है, कभी ऐसा इरादा नहीं करता है कि उसे धन्यवाद से बदल दिया जाए या उसका मूल्य वापस किया जाए। दूसरी ओर, ऐसे लोग जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं, ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उसको ध्यान से सुनते हैं और उसके प्रति वफादार हैं, और ऐसे लोग जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं—ये ऐसे लोग हैं जो प्रायः परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं, और परमेश्वर बिना किसी हिचकिचाहट के ऐसे आशीष प्रदान करेगा। इसके अतिरिक्त, ऐसी आशीष जिन्हें लोग परमेश्वर से प्राप्त करते हैं वे अक्सर उनकी कल्पना से परे होती हैं, और साथ ही किसी भी ऐसी चीज़ से परे होती हैं जिसे मानव उससे बदल सकते हैं जो उन्होंने किया है या उस कीमत से बदल सकते हैं जिसे उन्होंने चुकाया है। जब मानवजाति परमेश्वर की आशीषों का आनन्द ले रही है, तब क्या कोई परवाह करता है कि परमेश्वर क्या कर रहा है? क्या कोई किसी प्रकार की चिन्ता को दर्शाता है कि परमेश्वर कैसा महसूस कर रहा है? क्या कोई परमेश्वर की पीड़ा की सराहना करने की कोशिश करता है? इन प्रश्नों का बिलकुल सही उत्तर है: नहीं! क्या नूह समेत, कोई मनुष्य, उस दर्द की सराहना कर सकता है जिसे परमेश्वर उस समय महसूस कर रहा था? क्या कोई समझ सकता है कि क्यों परमेश्वर एक ऐसी वाचा ठहराएगा? वे नहीं समझ सकते हैं! मानवजाति परमेश्वर की पीड़ा की सराहना नहीं करती है इसलिए नहीं कि वो परमेश्वर की पीड़ा को नहीं समझती है, और परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच अन्तर या उनकी हैसियत के बीच अन्तर के कारण नहीं; बल्कि इसलिए क्योंकि मानवजाति परमेश्वर की किसी भावना की परवाह भी नहीं करती है। मानवजाति सोचती है कि परमेश्वर तो आत्मनिर्भर है—परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है कि लोग उसकी देखरेख करें, उसे समझें या उसके प्रति विचारशीलता दिखाएं। परमेश्वर तो परमेश्वर है, अतः उसे कोई दर्द नहीं है, उसकी कोई भावनाएँ नहीं हैं; वह दुःखी नहीं होगा, वह शोक महसूस नहीं करता है, यहाँ तक कि वह रोता भी नहीं है। परमेश्वर तो परमेश्वर है, इसलिए उसे किसी भावनात्मक अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं है और उसे किसी भावनात्मक सुकून की आवश्यकता नहीं है। यदि उसे कुछ निश्चित परिस्थितियों के अंतर्गत इनकी आवश्यकता होती है, तो वह स्वयं ही इसे सुलझा लेगा और उसे मानवजाति से किसी सहायता की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके विपरीत, यह तो कमज़ोर, एवं अपरिपक्व मनुष्य हैं जिन्हें परमेश्वर की सांत्वना, प्रयोजन एवं प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है, और यहाँ तक कि उन्हें उनकी भावनाओं को किसी भी समय एवं किसी भी स्थान पर सांत्वना देने के लिए भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है। ऐसा विचार मानवजाति के हृदय के भीतर गहराई में छुपा होता है: मनुष्य कमज़ोर प्राणी है; उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता होती है कि वह हर तरीके से उनकी देखरेख करे, वे सब प्रकार की देखभाल के हकदार हैं जिन्हें वे परमेश्वर से प्राप्त करते हैं, और उन्हें परमेश्वर से किसी भी ऐसी चीज़ की माँग करनी चाहिए जिसे वे महसूस करते हैं कि वह उनकी होनी चाहिए। परमेश्वर बलवान है; उसके पास सब कुछ है, और उसे मानवजाति का अभिभावक और आशीष प्रदान करने वाला अवश्य होना चाहिए। जबकि वह पहले से ही परमेश्वर है, वह सर्वशक्तिमान है और उसे मानवजाति से कभी किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं होती है।

चूँकि मनुष्य परमेश्वर के किसी भी प्रकाशन पर ध्यान नहीं देता है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर के शोक, पीड़ा, या आनन्द को महसूस नहीं किया है। परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर मनुष्य की सभी अभिव्यक्तियों को अपनी हथेली के समान जानता है। परमेश्वर सभी समयों एवं सभी स्थानों में प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, प्रत्येक मनुष्य के बदलते विचारों का अवलोकन करता है और इस प्रकार उनको सांत्वना एवं प्रोत्साहन देता है, और उन्हें मार्गदर्शन देता है और प्रकाशित करता है। उन सभी चीजों के सम्बन्ध में जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति पर किया है और पूरी कीमत जो उसने उनके कारण चुकाई है, क्या लोग बाइबल में से या किसी ऐसी चीज़ से एक अंश ढूँढ़ सकते हैं जिसे अब तक परमेश्वर ने कहा है जो साफ़-साफ़ कहता हो कि परमेश्वर मनुष्य से किसी चीज़ की माँग करेगा? नहीं! इसके विपरीत, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस प्रकार लोग परमेश्वर की सोच को अनदेखा करते हैं, वह फिर भी लगातार मानवजाति की अगुवाई करता है, लगातार मानवजाति की आपूर्ति करता है और उनकी सहायता करता है, कि वे परमेश्वर के मार्गों पर चल सकें ताकि वे उस खूबसूरत मंज़िल को प्राप्त कर सकें जो उसने उनके लिए तैयार की है। जब परमेश्वर की बात आती है, तो जो वह है, उसके अनुग्रह, उसकी दया और उसके सभी प्रतिफलों को बिना किसी हिचकिचाहट के उन लोगों को प्रदान किया जाएगा जो उससे प्रेम एवं उसका अनुसरण करते हैं। किन्तु वह उस पीड़ा को जो उसने सहा है या अपनी मनोदशा को कभी किसी व्यक्ति पर प्रकट नहीं करता है, और वह किसी के विषय में कभी शिकायत नहीं करता कि वह उसके प्रति ध्यान नहीं देता है या उसकी इच्छा नहीं जानता है। वह खामोशी से यह सब सह लेता है, उस दिन का इंतज़ार करता है जब मानवजाति समझने के योग्य हो जाएगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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