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परमेश्वर अब्राहम को एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

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1. परमेश्वर अब्राहम को एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है

उत्पत्ति 17:15-17 फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूँगा कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य-राज्य के राजा उत्पन्न होंगे।" तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?"

उत्पत्ति 17:21-22 परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।

2. अब्राहम इसहाक की बलि देता है

उत्पत्ति 22:2-3 उसने कहा, "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी।

उत्पत्ति 22:9-10 जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे।

कोई भी उस कार्य को बाधित नहीं कर सकता है जिसे करने का परमेश्वर संकल्प लेता है

तो, तुम सभी लोगों ने अभी-अभी अब्राहम की कहानी सुनी। जब बाढ़ ने संसार को नष्ट कर दिया उसके पश्चात् उसे परमेश्वर के द्वारा चुना गया था, उसका नाम अब्राहम था, जब वह सौ वर्ष का था, और उसकी पत्नी सारा नब्बे वर्ष की थी, तब परमेश्वर की प्रतिज्ञा उस तक आयी। परमेश्वर ने उससे क्या प्रतिज्ञा की थी? परमेश्वर ने वह प्रतिज्ञा की थी जिसका संकेत हमें पवित्रशास्त्र में मिलता हैः "और मैं उसको आशीष दूँगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूँगा।" परमेश्वर के द्वारा उसे पुत्र दिए जाने के पीछे क्या पृष्ठभूमि थी? पवित्रशास्त्र निम्नलिखित विवरण प्रदान करते हैं: "तब अब्राहम मुँह के बल गिर पड़ा और हँसा, और मन ही मन कहने लगा, 'क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी?'" दूसरे शब्दों में, यह बुज़ुर्ग दम्पत्ति इतने वृद्ध थे कि सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते थे। जब परमेश्वर ने अब्राहम से अपनी प्रतिज्ञा की तो उसके पश्चात् उसने क्या किया? वह हँसता हुआ अपने मुँह के बल गिर पड़ा, और उसने मन में कहा, "क्या सौ वर्ष के पुरुष के भी सन्तान होगी?" अब्राहम मानता था कि यह असम्भव है—जिसका अर्थ था कि वह मानता था कि उससे की गयी परमेश्वर की प्रतिज्ञा एक मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं है। मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से, यह मनुष्य के लिए अप्राप्य था, और उसी तरह परमेश्वर के द्वारा भी अप्राप्य थी, असंभव थी। कदाचित्, अब्राहम के लिए, यह हँसी की बात थी: परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया, फिर भी ऐसा लगता है कि वह यह नहीं जानता है कि कोई इतना वृद्ध व्यक्ति सन्तान उत्पन्न करने में अक्षम होता है; उसे लगता है कि वह मुझे सन्तान उत्पन्न करने की अनुमति दे सकता है, वह कहता है कि वह मुझे एक पुत्र देगा—निश्चित रूप से यह असम्भव है! और इस प्रकार, अपने मन में यह सोचते हुए अब्राहम हँसते हुए मुँह के बल गिर पड़ा कि: निश्चित रूप से ये असम्भव है—परमेश्वर मुझसे मज़ाक कर रहा है, यह सत्य नहीं हो सकता है! उसने परमेश्वर के वचनों को गम्भीरता से नहीं लिया। इसलिए, परमेश्वर की नज़रों में, अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति था? (धार्मिक।) यह कहाँ कहा गया था कि वह एक धार्मिक मनुष्य है? तुम लोगों को लगता है कि वे सभी जिन्हें परमेश्वर बुलाता है वे धार्मिक, और सिद्ध, और ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। तुम लोग सिद्धान्त से चलते हो! तुम लोगों को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि जब परमेश्वर किसी को परिभाषित करता है, तो वह ऐसा मनमाने ढंग से नहीं करता है। यहाँ, परमेश्वर ने यह नहीं कहा कि अब्राहम धार्मिक है। अपने हृदय में, परमेश्वर के पास प्रत्येक व्यक्ति को मापने के लिए एक मानक हैं। यद्यपि परमेश्वर यह नहीं कहता है कि अब्राहम किस प्रकार का व्यक्ति है, फिर भी अपने आचरण के लिहाज से, अब्राहम को परमेश्वर में किस प्रकार का विश्वास था? क्या यह थोड़ा सा अमूर्त था? या वह बड़े विश्वास वाला व्यक्ति था? नहीं, वह नहीं था! उसकी हँसी और विचारों ने यह प्रकट किया कि वह कौन था, इसलिए तुम लोगों का विश्वास कि वह धार्मिक था सिर्फ तुम लोगों की कल्पना की उपज है, यह सिद्धान्त को आँख बन्द करके लागू करना है, यह एक गैरज़िम्मेदार मूल्यांकन है। क्या परमेश्वर ने अब्राहम की हँसी और उसके हाव-भाव देखे थे, क्या वह उनके बारे में जानता था? परमेश्वर जानता था। परन्तु क्या परमेश्वर उस कार्य को बदल देता जिसे करने का उसने संकल्प लिया था? नहीं! जब परमेश्वर ने योजना बनाई और संकल्प लिया कि वह इस मनुष्य को चुनेगा, तो वह मामला पहले ही पूरा हो चुका था। न तो मनुष्य के विचार और न ही उसका आचरण परमेश्वर को जरा सा भी प्रभावित कर सकता या परमेश्वर के साथ हस्तक्षेप नहीं कर सकता; परमेश्वर अपनी योजना को मनमाने ढंग से नहीं बदलेगा, न ही वह मनुष्य के आचरण की वजह से अपनी योजना को बदलेगा या उसमें उलट-पलट करेगा, जो कि मूर्खतापूर्ण भी हो सकता है। तो उत्पत्ति 17:21-22 में क्या लिखा है? "परन्तु मैं अपनी वाचा इसहाक ही के साथ बाँधूँगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा। तब परमेश्‍वर ने अब्राहम से बातें करनी बन्द की और उसके पास से ऊपर चढ़ गया।" जो कुछ अब्राहम ने सोचा या कहा परमेश्वर ने उन पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया। उसकी उपेक्षा का कारण क्या था? इसका कारण यह था कि उस समय परमेश्वर ने यह माँग नहीं की कि मनुष्य बड़ा विश्वास वाला हो, या वह परमेश्वर के बारे में अत्यधिक ज्ञान को रखने में समर्थ हो, या जो कुछ परमेश्वर के द्वारा किया और कहा गया वह उसे पूरी तरह से समझने में समर्थ हो। इस प्रकार, उसने यह माँग नहीं की कि जो कुछ उसने करने का संकल्प किया था, या जिन लोगों को चुनने का उसने निर्णय लिया था, या उसके कार्यों के सिद्धान्तों को मनुष्य पूरी तरह से समझे, क्योंकि मनुष्य की कद-काठी पूरी तरह से अपर्याप्त थी। उस समय, अब्राहम ने जो कुछ भी किया और जिस प्रकार उसने आचरण किया उसे परमेश्वर ने सामान्य माना। उसने निंदा नहीं की, या फटकार नहीं लगाई, बल्कि सिर्फ़ इतना ही कहाः "इसहाक सारा अगले वर्ष केइसी नियुक्‍त समय में उत्पन्न होगा।" जब उसने इन वचनों की घोषणा की उसके पश्चात्, परमेश्वर के लिए, ये वचन, यह मामला कदम दर कदम सत्य होता गया; परमेश्वर की नज़रों में, जिसे उसकी योजना के द्वारा पूरा किया जाना था उसे पहले से ही पूरा कर लिया गया था। इन सबकी व्यवस्थाएँ पूरी करने के बाद, परमेश्वर चला गया। जो कुछ मनुष्य करता या सोचता है, जो कुछ मनुष्य समझता है, मनुष्य की योजनाएँ—इनमें से किसी का भी परमेश्वर से कोई संबंध नहीं है। सब कुछ परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार, उन समयों और चरणों के अनुरूप आगे बढ़ता है जिन्हें परमेश्वर के द्वारा नियत किया जाता है। परमेश्वर के कार्य का सिद्धान्त ऐसा ही है। मनुष्य जो कुछ भी सोचता है या जानता है परमेश्वर इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं करता है, फिर भी मनुष्य के विश्वास न करने या न समझने के कारण न तो वह अपनी योजनाओं को छोड़ता है, न ही अपने कार्यों को त्यागता है। इस प्रकार से तथ्य परमेश्वर की योजना और विचारों के अनुसार पूरे होते हैं। यह बिलकुल वही है जिसे हम बाइबल में देखते हैं: परमेश्वर ने इसहाक को अपने द्वारा नियत समय में जन्म लेने दिया। क्या तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य के व्यवहार और आचरण ने परमेश्वर के कार्य में बाधा डाली थी? उन्होंने परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डाली थी! क्या परमेश्वर में मनुष्य के थोड़े से विश्वास, परमेश्वर के बारे में उसकी धारणाओं और कल्पना ने परमेश्वर के कार्य को प्रभावित किया? नहीं, उन्होंने प्रभावित नहीं किया! जरा सा भी नहीं! परमेश्वर की प्रबन्धन योजना किसी भी मनुष्य, मामले, या परिवेश से अप्रभावित रहती है। वह सब कुछ जिसे करने का वह संकल्प करता है, समय पर तथा उसकी योजना के अनुसार खत्म और पूर्ण होगा, उसके कार्य में किसी भी मनुष्य के द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर मनुष्य की कुछ मूर्खताओं और अज्ञानताओं को, और यहाँ तक उसके प्रति मनुष्य के कुछ प्रतिरोध और धारणाओं को भी अनदेखा कर देता है; उन पर ध्यान दिए बिना वह उस कार्य को करता रहता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। यह परमेश्वर का स्वभाव है, और उसकी सर्वशक्तिमत्ता का प्रतिबिम्ब है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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