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परमेश्वर इसहाक के प्रति अर्पण करने के लिए अब्राम को आज्ञा देता है

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अब्राहम को एक पुत्र देने के बाद, जो वचन परमेश्वर ने अब्राहम से कहे थे वे पूरे हो गए थे। इसका अर्थ यह नहीं है कि परमेश्वर की योजना यहाँ पर रुक गयी थी; इसके विपरीत, मनुष्यजाति के प्रबन्धन और उद्धार की परमेश्वर की महाप्रतापी योजना का बस आरम्भ ही हुआ था, और अब्राहम को दी गयी सन्तान की आशीष उसकी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना का एक प्रस्तावना मात्र था। उस पल, कौन जानता था कि जब अब्राहम ने इसहाक की बलि दी थी तब शैतान के साथ परमेश्वर का युद्ध ख़ामोशी से आरम्भ हो चुका है।

परमेश्वर मनुष्य के मूर्ख होने की परवाह नहीं करता है—वह केवल यह माँग करता है कि मनुष्य सच्चा हो

आओ आगे देखें कि परमेश्वर ने अब्राहम के साथ क्या किया। उत्पत्ति 22:2 में, परमेश्वर ने अब्राहम को निम्नलिखित आज्ञा दी: "अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।" परमेश्वर का आशय बिल्कुल स्पष्ट था: परमेश्वर अब्राहम से अपने इकलौते पुत्र को, जिससे वह प्रेम करता था, होमबलि के रूप में देने के लिए कह रहा था। आज इस पर नज़र डालें तो, क्या परमेश्वर की आज्ञा अभी भी मनुष्य की धारणाओं से विपरीत है? हाँ! जो कुछ परमेश्वर ने उस समय किया वह मनुष्य की धारणाओं के बिलकुल विपरीत और मनुष्य की समझ से बाहर था। उनकी धारणाओं में, लोग निम्नलिखित पर विश्वास करते हैं: जब एक मनुष्य ने विश्वास नहीं किया, इसे असम्भव माना, तो परमेश्वर ने उसे एक पुत्र दिया, और उसे एक पुत्र प्राप्त हो जाने के बाद, परमेश्वर ने उससे अपने पुत्र की बलि देने के लिए कहा—कितना अविश्वसनीय है! परमेश्वर ने वास्तव में क्या करने का इरादा किया था? परमेश्वर का वास्तविक उद्देश्य क्या था? उसने अब्राहम को बिना शर्त एक पुत्र दिया, मगर उसने कहा कि अब्राहम एक बेशर्त बलि दे। क्या यह अतिशय था? किसी तीसरे पक्ष के दृष्टिकोण से, यह न केवल अतिशय था बल्कि कुछ-कुछ "बिना बात के मुसीबत खड़ा करने" का मामला था। परन्तु अब्राहम ने स्वयं यह नहीं माना कि परमेश्वर बहुत ज़्यादा माँग रहा है। हालाँकि उसके मन में कुछ मामूली विचार आये थे, और उसे परमेश्वर पर थोड़ा सन्देह हुआ था, तब भी वह बलि देने के लिए तैयार था। इस स्थिति में, तुम क्या देखते हो जो यह साबित करता है कि अब्राहम अपने पुत्र की बलि देने के लिए तैयार था? इन वाक्यों में क्या कहा जा रहा है? मूल पाठ निम्नलिखित विवरण प्रदान करता है: "अत: अब्राहम सबेरे तड़के उठा और अपने गदहे पर काठी कसकर अपने दो सेवक, और अपने पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिये लकड़ी चीर ली; तब निकल कर उस स्थान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्‍वर ने उससे की थी" (उत्पत्ति 22:3)। "जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे" (उत्पत्ति 22:9-10)। जब अब्राहम ने अपने हाथ को आगे बढ़ाया, और अपने बेटे को मारने के लिए छुरा लिया, तो क्या उसके कार्यकलापों को परमेश्वर के द्वारा देखा गया था? उन्हें देखा गया था। सम्पूर्ण प्रक्रिया ने—आरम्भ से, जब परमेश्वर ने कहा कि अब्राहम इसहाक का बलिदान करे से लेकर, उस समय तक जब अब्राहम ने अपने पुत्र का वध करने के लिए वास्तव में छुरा उठा लिया—परमेश्वर को अब्राहम का हृदय दिखाया, परमेश्वर के बारे में उसकी पहले की मूर्खता, अज्ञानता और ग़लतफ़हमी चाहे जो भी रही हो, उस समय अब्राहम का हृदय परमेश्वर के प्रति सच्चा, और ईमानदार था, और वह परमेश्वर के द्वारा दिये गए पुत्र, इसहाक को सचमुच में परमेश्वर को वापस देने जा रहा था। परमेश्वर ने उसमें आज्ञाकारिता—उसी आज्ञाकारिता को देखा जिसकी उसने इच्छा की थी।

मनुष्य के लिए, परमेश्वर बहुत कुछ करता है जो समझ से बाहर है और यहाँ तक कि अविश्वसनीय भी है। जब परमेश्वर किसी को आयोजित करने की इच्छा करता है, तो यह आयोजन प्रायः मनुष्य की धारणाओं के विपरीत होता है, और उसकी समझ से परे होता है, फिर भी यह निश्चित रूप से ये असंगति और अबोधगम्यता ही परमेश्वर द्वारा मनुष्य का परीक्षण और परीक्षा हैं। इसी बीच, अब्राहम अपने भीतर ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्रदर्शित करने में समर्थ था, जो परमेश्वर की अपेक्षाओं को संतुष्ट करने में उसके समर्थ होने की सबसे प्रमुख शर्त थी। जब अब्राहम परमेश्वर की माँग को मानने में समर्थ हुआ, जब उसने इसहाक को अर्पित किया, केवल तभी परमेश्वर ने मनुष्यजाति के प्रति—अब्राहम के प्रति, जिसे उसने चुना था—सचमुच में आश्वासन और स्वीकृति महसूस की। केवल तभी परमेश्वर आश्वस्त हुआ कि यह व्यक्ति जिसे उसने चुना था एक अत्यंत महत्वपूर्ण अगुवा है जो उसकी प्रतिज्ञा और उसके बाद की प्रबंधन योजना का उत्तरदायित्व ले सकता था। यद्यपि यह सिर्फ एक परीक्षण और परीक्षा थी, फिर भी परमेश्वर ने संतुष्टि महसूस की, उसने अपने लिए मनुष्य के प्रेम को महसूस किया, और उसे मनुष्य के द्वारा ऐसा आराम महसूस किया जैसा उसे पहले कभी नहीं महसूस हुआ था। जिस पल अब्राहम ने इसहाक को मारने के लिए अपना छुरा उठाया था, क्या परमेश्वर ने उसे रोका? परमेश्वर ने अब्राहम को इसहाक की बलि नहीं देने दी, क्योंकि परमेश्वर का इसहाक का जीवन लेने का कोई इरादा ही नहीं था। इसलिए, परमेश्वर ने अब्राहम को बिलकुल सही समय पर रोक दिया। परमेश्वर के लिए, अब्राहम की आज्ञाकारिता ने पहले ही परीक्षा को उत्तीर्ण कर लिया था, जो कुछ उसने किया वह पर्याप्त था, और परमेश्वर ने उस परिणाम को पहले से ही देख लिया था जो उसने इरादा किया था। क्या यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था? ऐसा कहा जा सकता है कि यह परिणाम परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, कि यही वह परिणाम था जो परमेश्वर चाहता था, और जिसे देखने की परमेश्वर ने लालसा की थी। क्या यह सही है? यद्यपि, भिन्न-भिन्न संदर्भों में, परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों का उपयोग करता है, किन्तु अब्राहम में परमेश्वर ने वह देखा जो वह चाहता था, उसने देखा कि अब्राहम का हृदय सच्चा था, और यह कि उसकी आज्ञाकारिता बेशर्त थी, और यह यही "बेशर्त" आज्ञाकारिता परमेश्वर इच्छा की थी। लोग प्रायः कहते हैं, मैंने पहले ही चढ़ावा चढ़ा दिया है, मैंने पहले ही उसका परित्याग कर दिया है—तब भी परमेश्वर मुझ से संतुष्ट क्यों नहीं है? क्यों वह मुझे परीक्षाओं के अधीन करता रहता है? क्यों वह मेरी परीक्षा लेता रहता है? यह एक तथ्य को प्रदर्शित करता हैः परमेश्वर ने तुम्हारे हृदय को नहीं देखा है, और तुम्हारे हृदय को प्राप्त नहीं किया है। कहने का तात्पर्य है कि, उसने ऐसी ईमानदारी नहीं देखी जैसी तब देखी थी जब अब्राहम अपने ही हाथ से अपने पुत्र को मारने के लिए छुरा उठाने, और उसे परमेश्वर के लिए बलि देने में समर्थ था। उसने तुम्हारी बेशर्त आज्ञाकारिता को नहीं देखा है, और उसे तुम्हारे द्वारा आराम नहीं पहुँचाया गया है। तो यह स्वाभाविक है कि परमेश्वर तुम्हारी परीक्षा लेता रहे। क्या यह सही नहीं है? हम इस विषय को यहीं पर छोड़ देंगे। इसके बाद, हम "अब्राहम के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा" को पढ़ेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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